020.हस्तिनापुर चातुर्मास, सन् १९७५

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


हस्तिनापुर चातुर्मास, सन् १९७५

समाहित विषयवस्तु

१. तीर्थों का उदय कैसे?

२. हस्तिनापुर क्षेत्र का परिचय।

३. माता ज्ञानमती ने श्रवणबेलगोल के सपने को साकार किया।

४. चातुर्मास की स्थापना।

५. माताजी के प्रात:-दोपहर प्रवचन।

६. पर्यूषण पर्व में मोक्षशास्त्र एवं दशधर्मों पर प्रवचन।

७. इन्द्रध्वज विधान की रचना।

८. नियमसार अनुवाद आदि अनेक ग्रंथों की रचना।

९. जम्बूद्वीप रचना मॉडल का अनावरण।

१०. सुमेरु पर्वत का निर्माण प्रारंभ-अक्षयतृतीया को।

११. माताजी की उत्तम प्रकृति-कार्य को पूर्ण करके ही दम लेती हैं।

१२. चातुर्मास निष्ठापित-खतौली प्रस्थान।

काव्य पद

होती जहाँ पुण्य की वर्षा, बहती शांति सु धारा है।

जहाँ लगा सुध्यान आत्मा, पाती मुक्ति किनारा है।।
अतिशयता अवलोक जहाँ की, मन विस्मित रह जाता है।
हो जाती भू पूज्य वहाँ की, तीर्थ नया बन जाता है।।६२३।।

ऐसा ही है तीर्थ महत्तम, नाम हस्तिनापुर विख्यात।
इतिहास झरोखे बैठ के देखें, अन्य नाम भी होते ज्ञात।।
हस्तिनागपुर अथवा गजपुर, इत्यादिक मिलते हैं नाम।
अति पवित्र यह तीर्थक्षेत्र है, इससे पावन हो जाते परिणाम।।६२४।।

हुए चार कल्याण यहाँ पर, शांति-कुन्थु-अरह भगवान।
कामदेव-चक्री-तीर्थंकर, तीन-तीन पदयुक्त महान।।
जन्मे-राज्य किया-दीक्षा ली, उपदेश दिया मंगलकारी।
उनके दर्शन जगज्जनों को, होते भवातापहारी।।६२५।।

इसके पहले आदिनाथ जिन, प्रथम पारणा हुई यहाँ।
नृप श्रेयांस ने अहार दान दे, पुण्य कमाया महत् यहाँ।।
कोड़ाकोड़ी वर्ष पूर्व तक, जाता है इसका इतिहास।
रक्षा बंधन की घटना का, है सम्बन्ध इसी से खास।।६२६।।

पाँच शतक मुनियों को यहाँ पर, घानी में था पेल दिया।
गुरूदत्त मुनि के ऊपर भी, रुई जला उपसर्ग किया।।
कौरव-पाण्डव-श्रीकृष्ण के, जीवन क्रम के तार जुड़े।
जर-जमीन-जोरू की खातिर, यहाँ के भाई-भाई लड़े।।६२७।।

पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, इसको अधिक महत्त्व दिया।
ज्ञान-ध्यान-तप-क्षेत्र बनाकर, अतिशय पावन प्रथित किया।।
दक्षिण स्थित श्रवणबेलगुल, बाहुबली के चरण कमल।
ध्यानकाल जो देखा सपना, उसे यहाँ पर किया सफल।।६२८।।

एतदर्थ प्राचीन क्षेत्र से, एक मील की दूरी पर।
माताजी ने कर्मठता से, स्वर्ग उतार दिया भू-पर।।
प्राक्कार्य सम्पूर्णता मिले, यह विचार आचार्यश्री।
माताजी को इसी क्षेत्र पर, चतुर्मास की आज्ञा दी।।६२९।।

चातुर्मास हुआ स्थापित, जन-जन का मन कमल खिला।
क्षेत्र पुरातन, भक्तजनों को, माताजी सान्निध्य मिला।।
बहने लगी ज्ञान की गंगा, पाया जन जीवन का सार।
प्रातकाल माँ प्रवचन करतीं, कुन्दकुन्द का प्रवचन सार।।६३०।।

जीवन्धर चम्पू, वृत्त रत्नाकर, धवला क्रम दोपहर आता।
शिष्यवर्ग अध्यापित होकर, सम्यग्ज्ञान तुष्टि पाता।।
पर्वराज आया पर्यूषण, हस्तिनागपुर हुआ निहाल।
वर्षों बाद मिले सुनने को, सरल-सरस प्रवचन इस साल।।६३१।।

माताजी के प्रवचन होते, प्रातकाल श्री प्रवचनसार।
इसमें वर्णित, कुन्दकुन्द से, महावीर वाणी का सार।।
मध्यकाल में पूज्य मातश्री, मोक्षशास्त्र इक-इक अध्याय।
उद्घाटित करतीं रहस्य सब, हिन्दी में अति सरल बनाय।।६३२।।

उमास्वामि के तत्त्वामृत को, श्रोताओं ने खूब पिया।
जो माताजी दिया है हमको, अब तक कोई नहीं दिया।।
धन्य-धन्य माताजी तुमको, धन्य-धन्य हुए हम आज।
हम कृतज्ञ हैं, आभारी हैं, करे वन्दामि सकल समाज।।६३३।।

तत्त्वार्थ सूत्र से दश धर्मों का, अविनाभावी नाता है।
पर्यूषण के दश दिवसों में, उन्हें सुनाया जाता है।।
एक-एक दिन एक धर्म पर, माताजी व्याख्यान दिया।
धर्मांगों को समझा करके, सबको सम्यग्ज्ञान दिया।।६३४।।

क्रोध-मान-लोभ-माया का, प्रबल प्रदूषण चारों ओर।
झूठ-कुशील-असंयम-गृह का, अंधकार छाया घनघोर।।
पाप-ताप-संताप मेटने, दश रत्नों का पहने हार।
आया पर्वराज पर्यूषण, सकल जगत् करने उपकार।।६३५।।

पर्व पर्यूषण धार्मिक यात्रा, होता इसमें आत्म विकास।
ऊर्ध्र्वारोहण के प्रयास से, जीवन पाता धर्म-प्रकाश।।
धर्म परम संजीवन औषध, मिटते हैं असाध्यतम रोग।
मूल प्रकृति में लौट आत्मा, करती है चेतन का भोग।।६३६।।

दशधर्मी मंगलयात्रा का, क्षमाभाव उत्तम सोपान।
धर्मदेवता, क्षमा प्राण है, क्षमाधर्म की है पहचान।।
मान महाविष, गरल हलाहल, मन को करता कलुष-कठोर।
विनय बिना प्राणी दुख पाता, जाता नीच नरक में घोर।।६३७।।

मायाचारी-कुटिल-वक्रता, अवगुण महान दु:ख की खान।
मन-वच-काय सरलता प्रियवर, यह है आर्जव धर्म महान।।
जहाँ सत्य है वहीं धर्म है, जहाँ असत्य महत्तम पाप।ॄ
असत्-कटुक-निन्दक वचनों से, जन पाते अतिशय संताप।।६३८।।

लोभ लोक में भटकाता है, पाप-कषायों के द्वारा।
भूल आपको चतुर्गति में, फिरता जन मारा-मारा।।
संयम यम को जय करने की, श्रेष्ठकला, उत्कृष्ट विधि।
संयम नर को पूज्य बनाने, वाली है अनमोल निधि।।६३९।।

भव से तारे पार उतारे, उसी क्रिया का तप है नाम।
तप के द्वारा जल जाते हैं, कर्म सघन सन्ताप तमाम।।
औषध-शास्त्र-अभय-आहारा, कहे जिनेन्द्र चतुर्विध दान।
त्यागो, दान करो, पर मन में, लाओ नहीं लेश अभिमान।।६४०।।

ग्रंथ त्याग निर्ग्रन्थ हुए हैं, शल्य न किंचित् वे ही धन्य।
सुर-सुरेन्द्र नमते चरणों में, मुनिवर पालें आकिंचन्य।।
ब्रह्मचर्य जीवन सुख सागर, परमानंद-शांति भण्डार।
पालन करना अतिशय मुश्किल, जैसे चलना असि की धार।।६४१।।

माताजी के सरल-प्रभावी, धर्मांगों पर सुन व्याख्यान।
श्रोता बोले अब तक हमने, पाया नहीं धर्म का ज्ञान।।
आज हमें निज बोध हुआ है, माताजी के प्रवचन सुन।
क्रोधादिक तो सब विभाव हैं, क्षमा आदि हैं आतम गुण।।६४२।।

इस प्रवास में माताजी ने, रचा इन्द्रध्वज नाम विधान।
पूरे देश में उस विधान से, बढ़ा ज्ञानमति जी का नाम।।
तेरहद्वीपों के अकृत्रिम, जिनमंदिर का है अर्चन।
इस विधान के द्वारा हो जाते भक्तों के भाव सफल।।६४३।।

नियमसार अनुवाद किया माँ, दशलक्षण पर पद्य रचे।
प्रतिज्ञा नाम उपन्यास रचा, रोहिणी नाम नाटक विरचे।।
माँ की प्रतिभा बहुमुखी है, सूर्य गगन ज्यों करे प्रकाश।
विविध विधाओं में रचनाकर, सबका माँ ने किया विकास।।६४४।।

बालविकास छात्र उपयोगी, माताजी के रचे हुए।
चारों भाग माँग जनता की, अत: प्रकाशित यहाँ हुए।।
जम्बूद्वीप रचना का मॉडल, हुआ अनावृत शास्त्र प्रमाण।
तदनुरूप अक्षय तृतीया को, शुरू हुआ सुमेरु निर्माण।।६४५।।

उत्तम-मध्यम नीच भेद से, मानव होते तीन प्रकार।
विघ्नों से डर शुरू न करते, नीच कार्य को किसी प्रकार।।
शुरू कार्य को बीच त्यागते, विघ्नाहत हो मध्यमजन।
किन्तु कार्य को पूर्ण ही करें, विघ्न नष्ट कर उत्तम जन।।६४६।।

नहीं विघ्न बाधाओं को माँ, कहीं बुलाने जाती हैं।
फिर भी यदि वे आ जायें तो, कभी नहीं घबराती हैं।।
कार्य पूर्ण करके ही मानीं, विघ्न प्रभंजन दूर हटा।
रवि प्रकाश को रोक न पातीं, कैसी भी हों मेघ घटा।।६४७।।

कल्पवृक्ष महावीर चरण ही, रहा सकल कार्य का भार।
आशिष उनका, कार्य संभाला, मोतीचंद्र-रवीन्द्र कुमार।।
चातुर्मास हुआ निष्ठापित, हुआ पिच्छिका परिवर्तन।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती ने, किया खतौली ओर गमन।।६४८।।