024.प्रथम महाधिकार - नय का अर्थ ...

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प्रथम महाधिकार - नय का अर्थ से लेकर ग्रंथकर्ता तक

तित्थयरवयणसंगह-विसेसपत्थारमूलवायरणी।

दव्वट्ठिओ अ पज्जय-णयो य सेसा वियप्पा सिं।।[१]
तीर्थंकरदेववचनानां सामान्यप्रस्तारस्य मूलव्याख्याता द्रव्यार्थिकनय:। तेषामेव विशेषप्रस्तारस्य मूलव्याख्याता पर्यायार्थिकनय:। अनयोर्द्वयोरेव विकल्पा: शेषा नया:।
अधुना मंगले नामादिनिक्षेपा: कथ्यन्ते-
नाम निक्षेप:-
‘‘वच्चत्थ-णिरवेक्खो मंगलसद्दो णाममंगलं। तस्स मंगलस्स आधारो अट्ठविहो। तं जहा-जीवो वा, जीवा वा, अजीवो वा, अजीवा वा, जीवो य अजीवो य, जीवा य अजीवो य, जीवो य अजीवा य, जीवा या अजीवा य इदि।’’[२]
वाच्यार्थनिरपेक्षो मंगलशब्दो नाममंगलं। तस्य मंगलस्य आधारो अष्टविध:। तद्यथा-जीवो वा-एकजिनेन्द्रदेवस्याश्रयात् यन्मंगलं क्रियते तदेकजीवाश्रितमंगलमुच्यते इत्यादि।

हिंदी अनुवाद

नय का क्या अर्थ है ? सो बताते हैं-

गाथार्थ-तीर्थंकरों के वचन सामान्य प्रस्तार का मूल व्याख्यान करने वाला द्रव्यार्थिक नय है और उन्हीं वचनों के विशेष प्रस्तार का मूल व्याख्याता पर्यायार्थिक नय है। शेष सभी नय इन दोनों नयों के ही विकल्प-भेद हैं।

तीर्थंकर देव के वचनों के सामान्य प्रस्तार का मूल व्याख्यान द्रव्यार्थिक नय करता है। उन्हीं वचनों के विशेष प्रस्तार-विस्तार का मूल व्याख्यान-वर्णन पर्यायार्थिक नय करता है। शेष समस्त नय इन्हीं दोनों के भेद-प्रभेद रूप हैं।

भावार्थ-‘‘आलाप पद्धति’’ में जो अनेक नयों का वर्णन है वे सब इन्हीं द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिक दो नयों से ही उत्पन्न हुए हैं अत: इन दो नयों को ही समस्त नयों का मूल मानना चाहिए। नैगम-संग्रह आदि सातों नयों के मूल आधार भी ये दोनों नय हैं।

अब ‘‘मंगल’’ में नाम आदि निक्षेपों को घटित करते हैं-

वाच्यार्थ-शब्दार्थ की अपेक्षा से रहित ‘‘मंगल’’ शब्द नाम मंगल है। उस मंगल का आधार आठ प्रकार का है। जैसे-

१. एक जीव,

२. अनेक जीव,

३. एक अजीव,

४. अनेक अजीव,

५. एक जीव और एक अजीव,

६. अनेक जीव और एक अजीव,

७. एक जीव और अनेक अजीव,

८. अनेक जीव और अनेक अजीव।

वाच्यार्थ से निरपेक्ष-मंगल शब्द नाम मंगल कहलाता है अर्थात् किसी का नाम तो मंगल रख दिया गया किन्तु उसमें मंगलपने का कोई गुण घटित नहीं होता है। न ही उसका नाम लेने से पापों का नाश होता है, न उसे देखने से पुण्य की प्राप्ति होती है और न उसके वचनालाप से सुख मिलता है, वह तो केवल ‘‘मंगल’’ संज्ञा को प्राप्त एक साधारण मनुष्य है इसीलिए उसका यह नाम ‘‘नाम मंगल’’ निक्षेप कहा जाता है।

उस मंगल के आठ आधार होते हैं-एक जीव आदि। जैसे-एक जिनेन्द्रदेव के आश्रय से जो मंगल-मंगलाचरण किया जाता है वह ‘एक जीवाश्रित मंगल’ कहलाता है, इसी प्रकार आठों में समझ लेना चाहिए।

विशेषार्थ

यहाँ जिनेन्द्रदेव के स्थान पर एक जिन-यति भी लिया जा सकता है। अनेक यतियों के आश्रय से जो मंगल किया जाता है उसे अनेक जीवाश्रित मंगल कहते हैं। एक जिनेन्द्रदेव की प्रतिमा के आश्रय से जो मंगल किया जाता है उसे एक अजीवाश्रित मंगल कहते हैं। अनेक जिनप्रतिमाओं के आश्रय से जो मंगल किया जाता है उसे अनेक अजीवाश्रित मंगल कहते हैं। एक जिनेन्द्रदेव और एक ही उनकी प्रतिमा के आश्रय से एक ही समय जो मंगल किया जाता है उसे एक जीव और एक अजीवाश्रित मंगल कहते हैं। अनेक यति और एक जिनेन्द्रदेव की प्रतिमा के आश्रय से एक ही समय जो मंगल किया जाता है उसे अनेक जीव और एक अजीवाश्रित मंगल कहते हैं। एक जिनेन्द्रदेव और अनेक जिनप्रतिमाओं के आश्रय से एक ही समय जो मंगल किया जाता है उसे एक जीव और अनेक अजीवाश्रित मंगल कहते हैं। अनेक यति और अनेक जिनप्रतिमाओं के आश्रय से एक ही समय जो मंगल किया जाता है उसे अनेक जीव और अनेक अजीवाश्रित मंगल कहते हैं।

आगम में चतुर्थगुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि जीव से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक के अयोगिकेवली को ‘‘जिन’’ संज्ञा प्रदान की गई है किन्तु यहाँ जिन शब्द से जो ‘यति’ को ही ग्रहण किया गया है वह छठे-सातवें गुणस्थानवर्ती मुनिराज अथवा श्रेणी में आरोहण करने वाले शुक्लध्यानी महामुनियों को ही लेना चाहिए न कि चतुर्थ-पंचमगुणस्थानवर्ती एकदेश जिन को।

सभी ग्रंथकार अपने ग्रंथ के प्रारंभ, मध्य और अंत में मंगलाचरण करते हैं। कोई तो किन्हीं एक तीर्थंकर की प्रमुखता करके अपने इष्टदेव का स्मरण करते हैं, जैसे-श्री समन्तभद्राचार्य ने रत्नकरंडश्रावकाचार में ‘‘नम: श्री वद्र्धमानाय’’ रूप मंगलपद में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को नमस्कार किया है। तो यह एक जीवाश्रित मंगल है पुन: उन्होंने अपने स्वयम्भूस्तोत्र में चौबीसों तीर्थंकर की स्तुति की है वह अनेक जीवाश्रित मंगल में गर्भित हो जाएगा।

इसी प्रकार इस षट्खण्डागम ग्रंथ में प्रस्तुत ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ टीका की रचयित्री गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित इन्द्रध्वज, जम्बूद्वीप, सर्वतोभद्र आदि महापूजाविधानों के ग्रंथ ‘अनेक जीव और अनेक अजीव आश्रित’ मंगल सिद्ध होते हैं।

स्थापनानिक्षेप:-

तत्र स्थापनामंगलं नाम आहितस्य नाम्न: अन्यस्य सोऽयमिति स्थापना स्थापनामंगलं। सा द्विविधा सद्भावासद्भावस्थापना चेति। तत्राकारवति वस्तुनि सद्भावस्थापना यथा चन्द्रप्रभप्रतिमायां सोऽयं चन्द्रप्रभो भगवान्, तद्विपरीते असद्भावस्थापना यथा पूगादिषु क्षेत्रपालस्थापना इति।[३]

हिंदी अनुवाद

मंगल में स्थापना निक्षेप दिखाते हैं-

किसी नाम को धारण करने वाले दूसरे पदार्थ की ‘वह यह है’ इस प्रकार स्थापना करने को स्थापना कहते हैं। वह स्थापना दो प्रकार की है-सद्भावस्थापना, असद्भावस्थापना। इन दोनों में से आकारवान वस्तु में सद्भाव स्थापना होती है और इससे विपरीत असद्भावस्थापना जाननी चाहिए। उनमें स्थापना मंगल में किसी दूसरे नाम को धारण करने वाले पदार्थ में ‘‘यह वही है’’ इस प्रकार स्थापना करने को ‘स्थापना मंगल’ कहते हैं। वह स्थापना दो प्रकार की है-सद्भाव स्थापना और असद्भाव स्थापना। उनमें से किसी आकार वाली वस्तु में सद्भाव स्थापना होती है। जैसे-चन्द्रप्रभ की प्रतिमा में ‘ये चन्द्रप्रभ भगवान् हैं’ ऐसा मानना, इससे विपरीत में-बिना आकार वाली वस्तु में असद्भावस्थापना होती है, जैसे-सुपारी, नारियल आदि में क्षेत्रपाल की स्थापना कर लेना।

द्रव्यनिक्षेप:-

द्रव्यमंगलं नाम अनागतपर्यायविशेषं प्रतीत्य ग्राह्याभिमुखं द्रव्यं अतद्भावं वा। तद् द्विविधं आगमनोआगमद्रव्यं चेति।[४] मंगलप्राभृतज्ञायकोऽनुपयुक्तो, मंगलप्राभृतशब्दरचना वा आगमद्रव्यमंगलं। नोआगमद्रव्यमंगलं त्रिविधं ज्ञायकशरीरभावितद्व्यतिरिक्तभेदात्। तत्र ज्ञायकशरीरमपि त्रिविधं भाविवर्तमानातीतशरीरभेदात्। तत्रातीतशरीरं अपि त्रेधा च्युतच्यावितत्यक्तभेदात्।

हिंदी अनुवाद

भावार्थ-इन्हें तदाकार और अतदाकार स्थापना के नाम से भी जाना जाता है। ये दोनों स्थापनाएँ वर्तमान में व्यवहार में प्रचलित हैं। पंचपरमेष्ठी, नवदेवता, पंचबालयति, चौबीस तीर्थंकर, भरत, बाहुबली आदि प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सद्भाव स्थापना मंगल को ही दर्शाने वाली है तथा क्षेत्रपाल आदि की स्थापना जो नारियल, सुपारी आदि से की जाती है वह असद्भाव स्थापना की प्रतीक है एवं अनेक मंदिरों में इनकी तदाकार प्रतिमाएँ भी देखी जाती हैं।

अब मंगल में द्रव्यनिक्षेप घटित किया जाता है-

आगे होने वाली मंगल पर्याय को ग्रहण करने के सन्मुख हुए द्रव्य (उस पर्याय की अपेक्षा) को द्रव्य मंगल कहते हैं। अथवा वर्तमान पर्याय की विवक्षा से रहित द्रव्य को ही द्रव्यमंगल कहते हैं। वह द्रव्य मंगल आगम और नो-आगम के भेद से दो प्रकार का है।

भविष्य में होने वाली पर्याय विशेष की अपेक्षा करके उसी भावी पर्याय के सन्मुख हुए द्रव्य को अथवा अतद्भाव रूप द्रव्य को द्रव्यमंगल कहते हैं। वह द्रव्यमंगल दो प्रकार का है-आगमद्रव्य मंगल और नोआगम द्रव्यमंगल। मंंगलप्राभृत के ज्ञान में उपयोगरहित जीव को अथवा मंगलप्राभृत रूप शब्दों की रचना को ‘‘आगमद्रव्यमंगल’’ कहते हैं।

नोआगमद्रव्यमंगल ज्ञायक शरीर, भावि और तद्व्यतिरिक्त के भेद से तीन प्रकार का है। उनमें से ज्ञायक शरीर भावि, वर्तमान और अतीत के भेद से तीन प्रकार का होता है। इनमें से अतीत शरीर के भी तीन भेद हैं-च्युत, च्यावित, त्यक्त।

विशेषार्थ

आगे होने वाली पर्याय के सन्मुख अथवा वर्तमान पर्याय की विवक्षा से रहित अर्थात् भूत या भविष्यत् पर्याय की विवक्षा से द्रव्य को द्रव्य मंगल कहा है और तद्विषयक ज्ञान को आगम कहा है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि जो मंगलविषयक शास्त्र का जानकार वर्तमान में उसके उपयोग से रहित हो वह आगमद्रव्यमंगल है। यहाँ पर जो मंगलविषयक शास्त्र की शब्द रचना अथवा मंगल शास्त्र के अर्थ की स्थापना रूप अक्षरों की रचना को आगम द्रव्य मंगल कहा है वह उपचार से ही समझना चाहिए। क्योंकि, मंगलविषयक शास्त्रज्ञान में मंगलविषयक शास्त्र की शब्द रचना और मंगल शास्त्र के अर्थ की स्थापना रूप अक्षरों की रचना ये मुख्यरूप से बाह्य निमित्त पड़ते हैं। वैसे तो सहकारी कारण शरीरादिक और भी होते हैं, परन्तु वे मुख्य बाह्य निमित्त न होने से उनका ग्रहण नो आगम में किया है। अथवा, मंगलविषयक, शास्त्रज्ञान से और दूसरे बाह्य निमित्तों की अपेक्षा इन दोनों बाह्य निमित्तों की विशेषता दिखाने के प्रयोजन से इन दोनों बाह्य निमित्तों का आगमद्रव्यमंगल में ग्रहण कर लिया है।

आगम के बाह्य सहकारी कारण होने से शरीर को नो आगम कहा गया है और उसमें अन्वय प्रत्यय की उपलब्धि होने से उसे द्रव्य कहा गया है। ये दोनों बातें अतीत, वर्तमान और अनागत इन तीनों शरीरों में घटित होती हैं, इसलिए इनमें मंगलपने का व्यवहार हो सकता है। इसका खुलासा इस प्रकार है-

औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर मंगलविषयक शास्त्र के परिज्ञान में बाह्य सहकारी कारण हैं, क्योंकि इनके बिना कोई शास्त्र का अभ्यास ही नहीं कर सकता है। अब इनमें अन्वय प्रत्यय कैसे पाया जाता है इसका खुलासा करते हैं। जिस शरीर में मैंने मंगल शास्त्र का अभ्यास किया था, वही शरीर उक्त अभ्यास को पूरा करते समय भी विद्यमान है, इस प्रकार तो वर्तमान ज्ञायक शरीर में अन्वय-प्रत्यय पाया जाता है। मंगल शास्त्र ज्ञान से उपयुक्त मेरा जो शरीर था, तद्विषयक शास्त्रज्ञान से रहित मेरे अब भी वही शरीर विद्यमान है, इस प्रकार अतीत ज्ञायक शरीर में अन्वय-प्रत्यय की उपलब्धि होती है। मंगल शास्त्र ज्ञान के उपयोग से रहित मेरा जो शरीर है, वही तद्विषयक तत्त्व ज्ञान की उपयोग दशा में भी होगा, इस प्रकार अनागत ज्ञायक शरीर में अन्वय प्रत्यय की उपलब्धि बन जाती है। इसलिए वर्तमान शरीर की तरह अतीत और अनागत शरीर में भी मंगलरूप व्यवहार हो सकता है।

इनमें से अतीत शरीर के तीन भेद हैं-च्युत, च्यावित और त्यक्त।

कदलीघातमरण के बिना पके हुए फल के समान कर्म के उदय से झड़ने वाले आयु कर्म के क्षय से अपने आप पतित शरीर को च्युत शरीर कहते हैं। जैसे पका हुआ फल अपना समय पूरा हो जाने के कारण वृक्ष से स्वयं गिर पड़ता है। वृक्ष से अलग होने के लिए और दूसरे बाह्य निमित्तों की अपेक्षा नहीं पड़ती है। उसी प्रकार आयुकर्म के पूरे हो जाने पर जो शरीर शस्त्रादिक के बिना छूट जाता है, उसे च्युत शरीर कहते हैं।

कदलीघात के द्वारा छिन्न आयु के क्षय हो जाने से छूटे हुए शरीर को च्यावित शरीर कहते हैं। कहा भी है-

विष के खा लेने से, वेदना से, रक्त का क्षय हो जाने से, तीव्र भय से, शस्त्राघात से, संक्लेश की अधिकता से तथा आहार और श्वासोच्छ्वास के रुक जाने से आयु क्षीण हो जाती है।

जैसे कदली (केला) के वृक्ष का तलवार आदि के प्रहार से एकदम विनाश हो जाता है, उसी प्रकार विष भक्षणादि निमित्तों से भी जीव की आयु एकदम उदीर्ण होकर छिन्न हो जाती है। इसे ही अकाल मरण कहते हैं और इसके द्वारा जो शरीर छूटता है उसे च्यावित शरीर कहते हैं।

त्यक्त शरीर तीन प्रकार का है-प्रायोपगमन विधान से छोड़ा गया, इंगिनी विधान से छोड़ा गया और भक्तप्रत्याख्यान से छोड़ा गया। इस तरह त्यक्त शरीर के तीन भेद हो जाते हैं।

अपने और पर के उपकार की अपेक्षा से रहित समाधिमरण को प्रायोपगमन कहते हैं।

प्रायोपगमन समाधिमरण को धारण करने वाला साधु संस्तर का ग्रहण करना, बाधा के निवारण के लिए हाथ-पाँव का हिलाना, एक क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्र में जाना आदि क्रियाएँ न तो स्वयं करता है और न दूसरे से कराता है। जैसे काष्ठ सर्वथा निश्चल रहता है, उसी प्रकार वह साधु समाधि में सदा निश्चल रहता है। शास्त्रों में प्रायोपगमन के अनेक प्रकार के अर्थ मिलते हैं। जैसे-संघ को छोड़कर अपने पैरों द्वारा किसी योग्य देश का आश्रय करके जो समाधिमरण किया जाता है उसे पादोपगमन समाधिमरण कहते हैं। अथवा प्राय अर्थात् संन्यास की तरह उपवास के द्वारा जो समाधिमरण होता है, उसे प्रायोपगमन समाधिमरण कहते हैं। अथवा पादप अर्थात् वृक्ष की तरह निष्पन्द रूप से रहकर, शरीर से किसी भी प्रकार की क्रिया न करते हुए जो समाधिमरण होता है उसे पादपोपगमन समाधिमरण कहते हैं। इन सब अर्थों का मुख्य अभिप्राय यही है कि इस विधान में अपने व पर के उपकार की अपेक्षा नहीं रहती है।

जिस संन्यास में, अपने द्वारा किये गए उपकार की अपेक्षा रहती है, किन्तु दूसरे के द्वारा किए गये वैयावृत्य आदि उपकार की अपेक्षा सर्वथा नहीं रहती, उसे इंगिनीसमाधि कहते हैं।

इंगिनी शब्द का अर्थ इंगित (अभिप्राय) है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि इस समाधिमरण को करने वाला स्वत: किए हुए उपकार की अपेक्षा रखता है। इस समाधिमरण में साधु संघ से निकलकर किसी योग्य देश में समभूमि अथवा शिलापट्ट देखकर उसके ऊपर स्वयं तृण का संस्तर तैयार करके समाधि की प्रतिज्ञा करता है। इसमें उठना, बैठना, सोना, हाथ-पैर का पसारना, मल-मूत्र का विसर्जन करना आदि क्रियाएँ क्षपक स्वयं करता है, किसी दूसरे साधु की सहायता नहीं लेता है। इस तरह यावज्जीवन चार प्रकार के आहार के त्याग के साथ स्वयं किए गए उपचार सहित समाधिमरण को इंगिनी-संन्यास कहते हैं।

जिस संन्यास में अपने और दूसरे के द्वारा किए गए उपकार की अपेक्षा रहती है उसे भक्तप्रत्याख्यान संन्यास कहते हैं। भक्तनाम भोजन का है और प्रत्याख्यान त्याग को कहते हैं। इसका यह अभिप्राय है कि जिस संन्यास में क्रम-क्रम से आहारादि का त्याग करते हुए अपने और पराए उपकार की अपेक्षा रखकर समाधिमरण किया जाता है, उसे भक्त प्रत्याख्यान संन्यास कहते हैं।

इन तीनों प्रकार के समाधिमरणों में से भक्त प्रत्याख्यान विधि जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से तीन प्रकार की है। जघन्य भक्तप्रत्याख्यान विधि का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त मात्र है, उत्कृष्ट भक्तप्रत्याख्यान विधि का प्रमाण बारह वर्ष है और मध्यम भक्त प्रत्याख्यान विधि का प्रमाण जघन्य अन्तर्मुहूर्त से लेकर बारह वर्ष के भीतर है।

तद्व्यतिरिक्तं द्विविधं

‘‘तद्व्यतिरित द्विविधं-कर्मनोकर्ममंगलभेदात्। तत्र कर्ममंगलं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशधा-प्रविभक्त-तीर्थकर-नामकर्मकारणैर्जीवप्रदेशनिबद्धतीर्थंकर-नामकर्ममांगल्यनिबंधनत्वान्मंगलं। यत्तन्नोकर्ममंगलं तद्द्विविधं लौकिकं लोकोत्तरमिति। तत्र लौकिकं त्रिविधं सचित्तमचित्तं मिश्रमिति।’’[५]

तत्र सिद्धार्था:-श्वेतसर्षपा: पूर्णकुंभादय: अचित्तं, बालकन्याश्वेतगजादय: सचित्तं, सालज्ररकन्यादि: मिश्रमंगलं। लोकोत्तरमंगलमपि त्रिविधं सचित्ताचित्तमिश्रभेदात्। सचित्तमर्हदादीनामनाद्यनिधनजीवद्रव्यं।

हिंदी अनुवाद

जिस संन्यास में, अपने द्वारा किये गए उपकार की अपेक्षा रहती है, किन्तु दूसरे के द्वारा किए गये वैयावृत्य आदि उपकार की अपेक्षा सर्वथा नहीं रहती, उसे इंगिनीसमाधि कहते हैं।

इंगिनी शब्द का अर्थ इंगित (अभिप्राय) है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि इस समाधिमरण को करने वाला स्वत: किए हुए उपकार की अपेक्षा रखता है। इस समाधिमरण में साधु संघ से निकलकर किसी योग्य देश में समभूमि अथवा शिलापट्ट देखकर उसके ऊपर स्वयं तृण का संस्तर तैयार करके समाधि की प्रतिज्ञा करता है। इसमें उठना, बैठना, सोना, हाथ-पैर का पसारना, मल-मूत्र का विसर्जन करना आदि क्रियाएँ क्षपक स्वयं करता है, किसी दूसरे साधु की सहायता नहीं लेता है। इस तरह यावज्जीवन चार प्रकार के आहार के त्याग के साथ स्वयं किए गए उपचार सहित समाधिमरण को इंगिनी-संन्यास कहते हैं।

जिस संन्यास में अपने और दूसरे के द्वारा किए गए उपकार की अपेक्षा रहती है उसे भक्तप्रत्याख्यान संन्यास कहते हैं। भक्तनाम भोजन का है और प्रत्याख्यान त्याग को कहते हैं। इसका यह अभिप्राय है कि जिस संन्यास में क्रम-क्रम से आहारादि का त्याग करते हुए अपने और पराए उपकार की अपेक्षा रखकर समाधिमरण किया जाता है, उसे भक्त प्रत्याख्यान संन्यास कहते हैं।

इन तीनों प्रकार के समाधिमरणों में से भक्त प्रत्याख्यान विधि जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से तीन प्रकार की है। जघन्य भक्तप्रत्याख्यान विधि का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त मात्र है, उत्कृष्ट भक्तप्रत्याख्यान विधि का प्रमाण बारह वर्ष है और मध्यम भक्त प्रत्याख्यान विधि का प्रमाण जघन्य अन्तर्मुहूर्त से लेकर बारह वर्ष के भीतर है।

तद्व्यतिरिक्त के दो भेद हैं-कर्ममंगल तद्व्यतिरिक्त और नोकर्ममंगल तद्व्यतिरिक्त। उनमें दर्शनविशुद्धि आदि सोलह प्रकार के तीर्थंकर नामकर्म के कारणों से जीव के प्रदेशों से बन्धे हुए तीर्थंकर नामकर्म को कर्मतद्व्यतिरिक्त नोआगम द्रव्य मंगल कहते हैं क्योंकि वह मंगलपने का हेतु है और जो तद्व्यतिरिक्त नोकर्म मंगल है वह भी दो प्रकार का है-एक लौकिक नोकर्मतद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यमंगल और दूसरा लोकोत्तर नोकर्मतद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यमंगल। उन दोनों में से लौकिक मंगल सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेद से तीन प्रकार का है।

उनमें सिद्धार्थ-सफेद सरसों, पूर्णकुंभ-जल से भरा हुआ मंगल कलश आदि अचित्त मंगल हैं, कुमारीकन्या, श्वेत ऐरावत हाथी आदि सचित्त मंगल हैं और अलंकार-कंकण, मुकुट, हार आदि से सुसज्जित कन्या, सौभाग्यवती स्त्री आदि मिश्र मंगल हैं।

इसी प्रकार लोकोत्तर मंगल भी सचित्त, अचित्त और मिश्र के भेद से तीन प्रकार का होता है। अर्हन्त आदि का अनादि और अनन्त स्वरूप जीवद्रव्य सचित्त लोकोत्तर मंगल है। कृत्रिम, अकृत्रिम चैत्यालय आदि अचित्त लोकोत्तर मंगल हैं।

अचित्त मंगलं कृत्रिमाकृत्रिमचैत्यालयादि:

अचित्तमंगलं कृत्रिमाकृत्रिमचैत्यालयादि:, न तत्स्थप्रतिमा: तासां स्थापनांतर्भावात्। अकृत्रिमाणां कथं स्थापनाव्यपदेश: ? इति चेन्न तत्रापि बुद्ध्या प्रतिनिधौ स्थापितमुख्योपलम्भात्। तदुभयमपि मिश्रमंगलं।[६]

क्षेत्र निक्षेप:-
तत्र क्षेत्रमंगलं-गुणपरिणतासन-परिनिष्क्रमण-केवलज्ञानोत्पत्ति-परिनिर्वाणक्षेत्रादि:। तस्योदाहरणं- ऊज्र्जयन्त-चम्पा-पावानगरादि:। अर्धाष्टा[७] रत्न्यादि-पंचविंशत्युत्तर-पंचधनु:शतप्रमाण-शरीरस्थितवल्याद्य-वष्टब्धाकाशदेशा वा, लोकमात्रात्मप्रदेशैर्लोक-पूरणा-पूरित-विश्वलोकप्रदेशा वा।

हिंदी अनुवाद

उन चैत्यालयों में स्थित प्रतिमाओं का इस निक्षेप में ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि उनका स्थापना निक्षेप में अन्तर्भाव होता है।

शंका-अकृत्रिम प्रतिमाओं में स्थापना का व्यवहार कैसे संभव है ?

समाधान-ऐसी शंका उचित नहीं है। क्योंकि अकृत्रिम प्रतिमाओं में भी बुद्धिपूर्वक ‘‘ये जिनेन्द्रदेव हैं’’ ऐसा उनका प्रतिनिधित्व मान लेने पर मुख्य स्थापना व्यवहार की उपलब्धि होती है। इन दोनों प्रकार के सचित्त और अचित्त से मिश्रित गंधकुटी, समवसरण आदि को मिश्र मंगल कहते हैं।

विशेषार्थ-पंचास्तिकाय की टीका में भी जयसेन आचार्य ने इन पदार्थों को मंगलरूप मानने में भिन्न-भिन्न कारण दिए हैं। वे इस प्रकार हैं, जिनेन्द्रदेव ने व्रतादिक के द्वारा परमार्थ को प्राप्त किया और उन्हें सिद्ध यह संज्ञा प्राप्त हुई, इसलिए लोेक में सिद्धार्थ अर्थात् श्वेत सरसों मंगलरूप माने गए। जिनेन्द्रदेव सम्पूर्ण मनोरथों से अथवा केवलज्ञान से परिपूर्ण है, इसलिए पूर्णकलश मंगलरूप से प्रसिद्ध हुआ। बाहर निकलते समय अथवा प्रवेश करते समय चौबीस ही तीर्थंकर वंदना करने योग्य हैं, इसलिए भरत चक्रवर्ती ने वन्दनमाला की स्थापना की। ध्यान, शुक्ललेश्या इत्यादि को श्वेत वर्ण की उपमा दी जाती है। इसलिए श्वेतवर्ण मंगलरूप माना गया है। जिनेन्द्रदेव के केवलज्ञान में जिस प्रकार लोक और अलोक प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार दर्पण में भी अपना बिम्ब झलकता है, अतएव दर्पण मंगलरूप माना गया है। जिस प्रकार वीतराग सर्वज्ञदेव लोक में मंगल स्वरूप हैं, उसी प्रकार बालकन्या भी रागभाव से रहित होने के कारण लोक में मंगल मानी गई है। जिस प्रकार जिनेन्द्रदेव ने कर्म-शत्रुओं पर विजय पाई, उसी प्रकार उत्तम जाति के घोड़े से भी शत्रु जीते जाते हैं, अतएव उत्तम जाति का घोड़ा मंगलरूप माना गया है।

अब मंगल में क्षेत्र निक्षेप बताते हैं-

गुणपरिणत आसन क्षेत्र अर्थात् जहाँ पर योगासन, वीरासन इत्यादि अनेक आसनों से तदनुकूल अनेक प्रकार के योगाभ्यास, जितेन्द्रियता आदि गुण प्राप्त किये गये हों, ऐसा क्षेत्र परिनिष्क्रमणक्षेत्र, अर्थात् जहाँ तीर्थंकर आदि महापुरुषों ने दीक्षा ली है ऐसा क्षेत्र, केवलज्ञानोत्पत्ति क्षेत्र और निर्वाण क्षेत्र (सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर आदि) को क्षेत्र मंगल कहते हैं।

उदाहरणपूर्वक इनका खुलासा करते हैं-

ऊर्जयन्त (गिरनार पर्वत) चम्पापुर, पावापुर नगर आदि क्षेत्र मंगल हैं। अथवा साढ़े तीन हाथ से लेकर पाँच सौ पच्चीस धनुष तक के शरीर में स्थित और केवलज्ञानादि से व्याप्त आकाश प्रदेशों को क्षेत्र मंगल कहते हैं अथवा लोकप्रमाण आत्मप्रदेशों से लोकपूरण समुद्घात दशा में व्याप्त किए गए समस्त लोक के प्रदेशों को क्षेत्र मंगल कहते हैं।

कालनिक्षेप

तत्र कालमंगलं नाम-यस्मिन् काले केवलज्ञानादिपर्यायै: परिणत: स काल: पापमलगालनत्वान्मंगलम्। तस्योदाहरणं, परिनिष्क्रमणकेवलज्ञानोत्पत्ति-परिनिर्वाणदिवसादय:। जिनमहिमासंबद्ध-कालोऽपि मंगलं। यथा नन्दीश्वरदिवसादि:[८]


भावनिक्षेप:-

तत्र भावमंगलं नाम, वर्तमानपर्यायोपलक्षितं भाव:। स द्विविध: आगमनोआगमभेदात्। आगम: सिद्धान्त:। आगमतो मंगल-प्राभृत-ज्ञायक उपयुक्तो, नोआगमतो भावमंगलं द्विविधं उपयुक्तस्तत्परिणत इति। आगममन्तरेण अर्थोपयुक्त उपयुक्त:। मंगलपर्यायपरिणतस्तत्परिणत इति।[९]
एतेषु निक्षेपेषु अत्र ग्रंथे केन निक्षेपेण प्रयोजनं ? एतत्पृष्टे सति श्रीवीरसेनाचार्यो कथयति-
अत्र ग्रंथे नोआगमभावनिक्षेपेण तत्परिणतेन प्रयोजनं वर्तते।
इति वचनात् निक्षेपो वर्णित:।

हिंदी अनुवाद

अब मंगल में कालनिक्षेप का दिग्दर्शन कराया जा रहा है-

जिस काल में जीव केवलज्ञानादि अवस्थाओं को प्राप्त होता है, उसे पापरूपी मल का गलाने वाला होने के कारण कालमंगल कहते हैं। उदाहरणार्थ-दीक्षाकल्याणक, केवलज्ञान की उत्पत्ति और निर्वाणप्राप्ति के दिवस आदि को काल मंगल समझना चाहिए। जिनमहिमा संबंधी काल को भी कालमंगल कहते हैं, जैसे-नंदीश्वर (आष्टान्हिक) आदि पर्व के दिवस।

अब भावनिक्षेप में मंगल का कथन प्रस्तुत है-

वर्तमान पर्याय से युक्त द्रव्य को भाव कहते हैं। वह दो प्रकार का है-आगमभावमंगल और नोआगमभावमंगल। सिद्धान्त को आगम कहते हैं इसलिए जो मंगलविषयक शास्त्र का ज्ञाता होते हुए वर्तमान में उसमें उपयुक्त है उसे आगम भाव मंगल कहते हैं।

नो आगमभाव मंगल के दो भेद हैं-उपयुक्त और तत्परिणत। जो आगम के बिना ही मंगल के अर्थ में उपयोगसहित है उसे ‘‘उपयुक्त नो आगम भावमंगल’’ कहते हैं और मंगलरूप पर्याय अर्थात् जिनेन्द्रदेव आदि की वंदना, भावस्तुति आदि में परिणत जीव को ‘‘तत्परिणत नो आगम भावमंगल’’ कहते हैं।

इस ग्रंथ में यहाँ इन निक्षेपों में से किस निक्षेप से प्रयोजन है ? ऐसा किसी के द्वारा पूछे जाने पर श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं कि-

इस ग्रंथ में तत्परिणत नोआगमभावमंगल रूप निक्षेप से प्रयोजन है। इस प्रकार निक्षेपों का वर्णन पूर्ण हुआ।

विशेषार्थ-यहाँ पर निक्षेपों का कथन करते हुए आचार्य ने कहा है कि श्रोता तीन प्रकार के होते हैं। पहला अव्युत्पन्न अर्थात् वस्तु-स्वरूप से अनभिज्ञ, दूसरा सम्पूर्ण विवक्षित पदार्थ को जानने वाला और तीसरा एकदेश विवक्षित पदार्थ को जानने वाला। इनमें से पहला श्रोता अव्युत्पन्न होने के कारण विवक्षित पद के अर्थ को कुछ भी नहीं समझता है। दूसरा ‘‘यहाँ पर इस पद का कौन सा अर्थ अधिकृत है’’ इस प्रकार विवक्षित पद के अर्थ में संदेह करता है, अथवा, प्रकरण प्राप्त अर्थ को छोड़कर और दूसरे अर्थ को ग्रहण करके विपरीत समझता है। दूसरी जाति के श्रोता के समान तीसरी जाति का श्रोता भी प्रकृत पद के अर्थ में या तो संदेह करता है अथवा, विपरीत निश्चय कर लेता है।

मंगलस्यैकार्थ:-

अधुना क्रमप्राप्तस्य मंगलस्यैकार्थ उच्यते-मंगलं पुण्यं पूतं पवित्रं प्रशस्तं शिवं शुभं कल्याणं भद्रं सौख्यमित्येवमादीनि मंगलपर्यायवचनानि। एकार्थप्ररूपणं किमर्थमिति चेत् ?

यतो मङ्गलार्थोऽनेकशब्दाभिधेयस्ततोऽनेकेषु शास्त्रेष्वनेकाभिधानैर्मंगलार्थ: प्रयुक्तश्चिरंतनाचार्यै:, सोऽव्यामोहेन शिष्यै: सुखेनावगम्यते इत्येकार्थ: उच्यते। ‘यद्येकशब्देन न जानाति ततोऽन्येनापि शब्देन ज्ञापयितव्य: इति वचनाद्वा’[१०]। इति वचनात् एकार्थनिरूपणं गतं।


हिंदी अनुवाद

इनमें से यदि अव्युत्पन्न श्रोता पर्याय का अर्थी अर्थात् पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा वस्तु की किसी विवक्षित पर्याय को जानना चाहता है, तो उस अव्युत्पन्न श्रोता को प्रकृत विषय की व्युत्पत्ति के द्वारा अप्रकृत विषय के निराकरण करने के लिए निक्षेप का कथन करना चाहिए। यदि वह अव्युत्पन्न श्रोता द्रव्यार्थिक है, अर्थात् सामान्यरूप से किसी वस्तु का स्वरूप जानना चाहता है, तो भी निक्षेपों के द्वारा प्रकृत पदार्थ के प्ररूपण करने के लिए सम्पूर्ण निक्षेप कहे जाते हैं, क्योंकि, व्यतिरेक धर्म के निर्णय के बिना विधि का निर्णय नहीं हो सकता है। दूसरे और तीसरे प्रकार के श्रोताओं को यदि संदेह हो, तो उनके संदेह को दूर करने के लिए सम्पूर्ण निक्षेपों का कथन किया जाता है और यदि उन्हें विपरीत ज्ञान हो गया हो, तो प्रकृत अर्थात् विवक्षित वस्तु के निर्णय के लिए सम्पूर्ण निक्षेपों का कथन किया जाता है। कहा भी है-

अवगय-णिवारणट्ठं पयदस्स परूवणा-णिमित्तं च।

संसय-विणासणट्ठं तच्चत्थवधारणट्ठं च।।

अर्थात् अप्रकृत विषय के निवारण करने के लिए, प्रकृत विषय के प्ररूपण करने के लिए, संशय का विनाश करने के लिए और तत्त्वार्थ का निश्चय करने के लिए निक्षेपों का कथन करना चाहिए।

अथवा संभव है कि निक्षेपों को छोड़कर वर्णन किया गया सिद्धान्त वक्ता और श्रोता दोनों को कुमार्ग में ले जावे, इसलिए भी निक्षेपों का कथन करना चाहिए।

मंगल के एक अर्थवाची शब्द इस प्रकार हैं-

अब क्रम प्राप्त ‘‘मंगल’’ शब्द के एकार्थवाची शब्द कहते हैं-

मंगल, पुण्य, पूत, पवित्र, प्रशस्त, शिव, शुभ, कल्याण, भद्र, सौख्य इत्यादि सभी शब्द मंगल के पर्यायवाची नाम हैं।

शंका-यहाँ पर मंगल के एकार्थवाचक अनेक नामों का प्ररूपण किसलिए किया गया है ?

समाधान-क्योंकि मंगलरूप अर्थ अनेक शब्दों का वाच्य है अर्थात् अनेक शास्त्रों में अनेक पर्यायवाची नामों के द्वारा मंगलरूप अर्थ का प्रयोग किया गया है। अर्थात् प्राचीन आचार्यों ने अनेक शास्त्रों में अनेक अर्थात् भिन्न-भिन्न शब्दों के द्वारा मंगलरूप अर्थ का कथन किया है। उसका मतिभ्रम के बिना शिष्यों को सरलतापूर्वक ज्ञान हो जावे, इसलिए यहाँ पर मंगल के एकार्थवाची नाम कहे हैं।

अथवा ‘‘यदि शिष्य एक शब्द से प्रकृत विषय को नहीं समझ पावे, तो दूसरे शब्दों के द्वारा भी उसे ज्ञान कराना चाहिए’’। इस वचन के अनुसार भी यहाँ पर मंगलरूप अर्थ के पर्यायवाची अनेक नाम कहे गये हैं। इस प्रकार मंगल के एकार्थवाची नामों का निरूपण किया गया, अब आगे निरुक्ति अर्थ कहेंगे।

विशेषार्थ-जैसे समयसार की आठवीं गाथा में आचार्यश्री कुन्दकुन्द स्वामी के अभिप्राय को व्यक्त करते हुए ‘‘श्री अमृतचन्द्रसूरि’’ ने कहा है ‘‘यथा खलु म्लेच्छ: स्वस्तीत्यभिहिते सति.....न किंचिदपि प्रतिपद्यमानो मेष इवानिमेषोन्मेषितचक्षु: प्रेक्षत एव।.......एकार्थ ज्ञेनान्येन तेनैव वा म्लेच्छभाषां समुपादाय......तदा सद्य एवोद्यदमंदानंदमयाश्रु-झलज्झलल्लोचनपात्रस्तत्प्रतिपद्यत एव। इस आत्मख्याति टीका का हिन्दी अनुवाद करते हुए पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी ने लिखा है-

जैसे कोई म्लेच्छ पुरुष है उसको किसी ब्राह्मण ने ‘‘स्वस्ति भवतु’’ ऐसा आशीर्वाद दिया किन्तु वह म्लेच्छ स्वस्ति शब्द के ज्ञान से शून्य था अत: उसका अर्थ समझे बिना मेढ़े की तरह टकटकी लगाकर प्रश्नवाचक मुद्रा में ब्राह्मण की ओर देखता ही रहा कि इसने क्या कहा है ?

तब उस ब्राह्मण की भाषा और म्लेच्छ की भाषा इन दोनों भाषा के संबंध के एक अर्थ को जानने वाले ऐसे उसी ब्राह्मण ने या अन्य किसी ने उसे म्लेच्छ भाषा के आश्रय से समझाया कि ‘स्वस्ति’ इस पद का यह अर्थ है कि ‘तुम्हारा कल्याण हो’। उस समय उसकी आँखों में आनन्द अश्रु आ गए और वह इस अर्थ को समझकर अतिशय प्रसन्न हो गया। इसी प्रकार एकार्थवाचक-पर्यायवाची अनेक नामों को ग्रहण करने पर सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी उसका अर्थ समझ में आ जाता है जिससे वे उस विषय में दिग्भ्रमित नहीं होते हैं। मंगलवाचक अनेक नामों को यहाँ देने का भी आचार्य का यही अभिप्राय है अत: इसे गुण अर्थ में ही ग्रहण करना चाहिए।

अधुना निरुक्तिरुच्यते- मंगलस्य निरुक्ति:-

मंगलस्य निरुक्तिरुच्यते-मलं गालयति विनाशयति घातयति दहति हंति विशोधयति विध्वंसयतीति मंगलम्। तन्मलं द्विविधं द्रव्यभावमलभेदात्। द्रव्यमलं द्विविधं-बाह्यमभ्यन्तरं च। तत्र स्वेदरजोमलादि बाह्यं, घनकठिन-जीवप्रदेश-निबद्ध-प्रकृति-स्थित्यनुभाग-प्रदेश-विभक्त-ज्ञानावरणाद्यष्टविधकर्माभ्यन्तर-द्रव्यमलं। अज्ञानादर्शनादिपरिणामो भावमलम्।

हिंदी अनुवाद

मंगल शब्द की निरुक्ति- ‘मंगल’ शब्द की निरुक्ति करते हुए कहते हैं कि जो मल को गलाता है, विनाश करता है, घात करता है, जलाता है, नष्ट करता है (मारता है), विशोधन करता है, विध्वंस करता है उसे ‘मंगल’ कहते हैं। वह मल, द्रव्यमल और भावमल के भेद से दो प्रकार का है। द्रव्यमल के दो भेद हैं-बाह्यद्रव्यमल और अभ्यन्तरद्रव्यमल। उनमें पसीना, धूल, मल, मूत्रादि बाह्य द्रव्यमल हैं। घन (समूह) और कठिन रूप से जीव के प्रदेशों से बंधे हुए प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश इन भेदों में विभक्त ऐसे ज्ञानावरणादि आठ प्रकार के कर्म अभ्यन्तर द्रव्यमल हैं। अज्ञान और अदर्शन आदि परिणाम भावमल कहलाते हैं।

भावार्थ-यहाँ मल के प्रकरण में अर्थ, अभिधान (शब्द) और प्रत्यय (ज्ञान) के भेद से मल के तीन भेद भी श्री वीरसेन स्वामी ने बताये हैं। इनमें से जो ऊपर द्रव्यमल और भावमल का वर्णन किया है उन्हें ही अर्थमल समझना चाहिए तथा मल के वाचक अन्य शब्दों को अभिधान मल कहते हैं और अर्थमल एवं अभिधान मल में उत्पन्न हुई बुद्धि को प्रत्यय मल कहते हैं।

पुन: नाममल, स्थापनामल, द्रव्यमल और भावमल के भेद से मल चार प्रकार का भी बताया है अथवा इसी प्रकार विवक्षा भेद से मल अनेक प्रकार का भी होता है। उस मल का जो गालन करे, विनाश करे, ध्वंस करे उसे मंगल कहते हैं।

अथवा मंगं सुखं तल्लाति आदत्त इति वा मङ्गलम्

अथवा मङ्गति गच्छति कर्ता कार्यसिद्धिमनेनास्मिन् वेति मंगलं। मंगलशब्दस्यार्थविषयनिश्चयोत्पादनार्थं निरुक्तिरुक्ता[११]
मंगलस्यानुयोग:-
अधुना क्रमप्राप्तस्य मंगलस्यानुयोग उच्यते-
किं कस्स केण कत्थ व केवचिरं कदिविधो य भावो त्ति।
छहि अणिओगद्दारेहि सव्वभावाणुगंतव्वा।।
अस्यैव स्पष्टीकरणं-किं मङ्गलं ? जीवो मङ्गलम्। कस्य मङ्गलम् ? जीवस्य मंगलं। वै: मंगलं ? औदयिकादिभावै: मंगलं-पूजा-भक्ति अणुव्रत-महाव्रतादि-प्रशस्तरागरूपौदयिकभावोऽपि मंगलकारणं भवतीत्यर्थ:। क्व मंगलम् ? जीवे मंगलम्। कियच्चिरं मंगलं ? नानाजीवापेक्षया सर्वाद्धा। एकजीवापेक्षया अनाद्यपर्यवसितं साद्यपर्यवसितं सादिसपर्यवसितं इति त्रिविधं।

हिंदी अनुवाद

अथवा, मंग का अर्थ है-सुख, उस सुख को जो लाता है-प्राप्त कराता है उसे मंगल कहते हैं।

अथवा कत्र्ता-किसी उद्देश्यपूर्वक कार्य को करने वाला, जिसके द्वारा या जिसके किये जाने पर कार्य की सिद्धि को प्राप्त होता है, उसे भी मंगल कहते हैं। इस तरह मंगल शब्द के अर्थ विषयक निश्चय के उत्पन्न करने के लिए निरुक्ति कही गई है।

भावार्थ-यहाँ मंग शब्द पुण्यरूप अर्थ का प्रतिपादन करने वाला माना गया है। उस पुण्य को जो लावे-प्राप्त करावे उसे मंगलार्थी जन मंगल कहते हैं। तिलोयपण्णत्ति में भी श्रीयतिवृषभ आचार्य ने कहा है-

पुव्वं आइरियेहिं, मंगलपुव्वं च वाचिदं भणियं।

तं लादि हु आदत्ते, जदो तदो मंगलप्पवरं।।

अर्थात् पूर्व में आचार्यों द्वारा मंगलपूर्वक ही शास्त्र का पठन-पाठन किया गया है। उसी मंगल को यह निश्चय से लाता है-ग्रहण कराता है इसीलिए यह मंगल सर्वश्रेष्ठ है।

कुछ आचार्यों ने उपचार से पाप को भी मल कहा है और उस पाप का जो नाश करता है उसे मंगल संज्ञा प्रदान की है।

अब क्रम प्राप्त मंगल का अनुयोग कहते हैं-

गाथार्थ-पदार्थ क्या है ? किसका है ? किसके द्वारा होता है ? कहाँ पर होता है ? कितने समय तक रहता है ? कितने प्रकार का है ? इस प्रकार छह अनुयोगद्वारों से सम्पूर्ण पदार्थों का ज्ञान करना चाहिए।

इसी का स्पष्टीकरण करते हैं-मंगल क्या है ? जीव द्रव्य मंगल है। मंगल किसका है ? जीवद्रव्य का मंगल है। किनके द्वारा मंगल किया जाता है ? औदयिक आदि भावों के द्वारा मंगल किया जाता है अर्थात् पूजा-भक्ति-अणुव्रत-महाव्रत आदि प्रशस्तरागरूप औदयिक भाव-परिणाम भी मंगल में कारण होते हैं ऐसा अर्थ हुआ। मंगल कहाँ होता है ? जीव में मंगल होता है। कितने समय तक मंगल रहता है ? नाना जीवोें की अपेक्षा सर्वदा-हमेशा मंगल रहता है और एक जीव की अपेक्षा अनादि-अनन्त, सादि-अनन्त और सादि-सान्त इस प्रकार मंगल के तीन भेद हो जाते हैं।

कथमनाद्यपर्यवसितता मंगलस्य ?

कथमनाद्यपर्यवसितता मंगलस्य ? द्रव्यार्थिकनयार्पणया[१२]। नोआगमभव्यद्रव्यमंगलापेक्षया वा मंगलमनाद्यपर्यवसानमिति। रत्नत्रयमुपादायाविनष्टेनैवाप्त-सिद्धस्वरूपापेक्षया नैगमनयेन साद्यपर्यवसितं मंगलम्। सादिसपर्यवसितं सम्यग्दर्शनापेक्षया जघन्येनान्तर्मुहूर्तकाल-मुत्कर्षेण षट्षष्टिसागरा देशोना:।[१३] कतिविधं मंगलं ? मंगलसामान्यात्तदेकविधम्। मुख्यामुख्यतो द्विविधम्। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रभेदात्त्रिविधं मंगलं। धर्मसिद्धसाध्वर्हद्भेदाच्चतुर्विधम्। ज्ञानदर्शनत्रिगुप्तिभेदात् पंचविधम्। ‘‘णमो जिणाणं’’ इत्यादिनानेकविधं वा।[१४]

इति अनुयोगद्वारै: मंगलं वर्णितं।
मंगलस्य दण्डका:-

हिंदी अनुवाद

प्रश्न-मंगल में एक जीव की अपेक्षा अनादि-अनन्तपना कैसे बनता है ?

उत्तर-द्रव्यार्थिक नय की प्रधानता से मंगल में अनादि अनन्तपना बन जाता है। अर्थात् द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से जीव अनादिकाल से अनन्तकाल तक सर्वथा एक स्वभावरूप में अवस्थित है अतएव मंगल में भी अनादि अनन्तपना बन जाता है। अथवा नोआगमभाविद्रव्यमंगल की अपेक्षा मंगल अनादि-अनन्त है। रत्नत्रय को धारण करके कभी भी नष्ट नहीं होने वाले रत्नत्रय के द्वारा ही प्राप्त हुए सिद्ध के स्वरूप की अपेक्षा नैगम नय से मंगल सादि-अनन्त है। सम्यग्दर्शन की अपेक्षा मंगल सादि-सान्त समझना चाहिए, उसका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टकाल कुछ कम छ्यासठ सागर प्रमाण है।

विशेषार्थ-यहाँ पर यह शंका उठती है कि द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से तो मिथ्यादृष्टि अवस्था वाले जीव को भी मंगलपने की प्राप्ति हो जायेगी ? इस पर श्री वीरसेन स्वामी ने कहा है कि इससे मिथ्यात्व-अविरति-प्रमाद आदि को मंगलपना नहीं प्राप्त हो सकता है क्योंकि उनमें जीवत्व नहीं पाया जाता है। मंगल तो जीव ही है और वह जीव केवलज्ञानादि अनन्त धर्म वाला है।

जीव के कर्म आवरण अवस्था में भी शक्तिरूप से केवलज्ञानादि पाये जाते हैं क्योंकि वे जीव के गुण हैं। यदि इस अवस्था में उनका अभाव माना जावे तो जीव का भी अभाव मानना पड़ेगा। जैसे-राख से ढकी हुई अग्नि में भी उसके गुण, धर्म, ताप और प्रकाश की उपलब्धि अनुमान आदि प्रमाणों से बराबर सिद्ध होती है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि जीव की आत्मा में भी चूँकि शक्ति रूप से परमात्म तत्त्व विद्यमान है इसलिए उन्हें भी मंगल कह देना कोई अनुचित नहीं है।

जो आत्मा वर्तमान में मंगलपर्याय से युक्त तो नहीं है किन्तु भविष्य में मंगलपर्याय से युक्त होगा उसके शक्ति की अपेक्षा से अनादि-अनन्त रूप मंगलपना बन जाता है।

रत्नत्रय की प्राप्ति से सादिपना और रत्नत्रय प्राप्ति के अनन्तर सिद्धस्वरूप की जो प्राप्ति हुई है उसका कभी अन्त आने वाला नहीं है। इस तरह इन दोनों धर्मों को ही विषय करने वाले (न एकं गम: नैगम:) नैगमनय की अपेक्षा मंगल सादि-अनन्त है।

मंगल कितने प्रकार का है ? मंगल, सामान्य की अपेक्षा एक प्रकार का है। मुख्य और गौण के भेद से दो प्रकार का है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के भेद से तीन प्रकार का है। धर्म, सिद्ध, साधु और अर्हन्त के भेद से चार प्रकार का है। ज्ञान-दर्शन और तीन गुप्ति के भेद से पाँच प्रकार का है अथवा ‘जिनेन्द्रदेव को नमस्कार हो’ इत्यादि रूप से अनेक प्रकार का है। इस प्रकार अनुयोगद्वारों के द्वारा मंगल का वर्णन हुआ।

अब मंगल के दण्डकों का वर्णन करते हैं

अथवा मंगलविषये षड्भि: अधिकारै: दण्डका वक्तव्या भवन्ति।

तद्यथा-मंगलं, मंगलकर्ता, मंगलकरणीयं, मंगलोपाय:, मंगलविधानं, मंगलफलमिति। एतेषां षण्णामपि अर्थ उच्यते-
मंगलस्यार्थ: पूर्वोक्त:। मंगलकर्ता चतुर्दशविद्यास्थानपारग आचार्य:। मंगलकरणीयं भव्यजन:। मंगलोपाय: त्रिरत्नसाधनानि। मंगलविधानं एकविधादि पूर्वोत्तं। मंगलफलं अभ्युदय-नि:श्रेयससुखादि:।
मंगलं कदा कर्तव्यं-
एतन्मंगलं सूत्रस्य आदौ मध्येऽवसाने च वक्तव्यं।
उत्तंकं च-
आदि-अवसाण-मज्झे पण्णत्तं मंगलं जिणिंदेहिं।
तो कय-मंगलविणयो इणमो सुत्तं पवक्खामि।।
त्रिषु स्थानेषु मंगलं किमर्थमुच्यते ?
तदेव कथ्यते श्रीवीरसेनाचार्येण-
कय-कोउय-मंगल-पायच्छित्ता विणयोवगया सिस्सा अज्झेदारो सोदारो वत्तारो आरोग्गमविग्घेण विज्जं विज्जाफलं च पावेंतु त्ति।
उत्तं च-
आदिम्हि भद्दवयणं सिस्सा लहु पारया हवंतु त्ति।
मज्झे अव्वोच्छित्ती विज्जा विज्जा-फलं चरिमे।।[१५]

हिंदी अनुवाद

अथवा मंगल के विषय में छह अधिकारों द्वारा दंडकों का कथन करना चाहिए। वे इस प्रकार हैं-

१. मंगल

२. मंगलकर्ता

३. मंगलकरणीय

४. मंगल का उपाय

५. मंगल के भेद

६. मंगल का फल।

अब इन छह अधिकारों का अर्थ कहते हैं। मंगल का अर्थ तो पहले कहा जा चुका है। चौदह विद्यास्थानों के पारगामी आचार्य परमेष्ठी मंगलकर्ता हैं। भव्यजन मंगल करने योग्य हैं। रत्नत्रय की साधक सामग्री मंगल का उपाय है। एक प्रकार का, दो प्रकार का इत्यादि रूप से मंगल के भेद पहले वर्णन कर चुके हैं। अभ्युदय और मोक्षसुख मंगल का फल है अर्थात् जितने प्रमाण में यह जीव मंगल के साधन मिलाता है उतने ही प्रमाण में उससे जो यथायोग्य अभ्युदय और नि:श्रेयस सुख मिलता है वही उसके मंगल का फल है।

मंगल कब करना चाहिए ?

वह मंगल सूत्र-ग्रंथ के आदि, मध्य और अन्त में करना चाहिए। कहा भी है-

गाथार्थ-जिनेन्द्रदेव ने आदि, मध्य और अन्त में मंगल करने का विधान किया है। अत: मंगल विनय को करके मैं इस सूत्र का वर्णन करता हूँ।

प्रश्न-ग्रंथ में आदि-मध्य और अन्त ऐसे तीन स्थानों में मंगल करने का उपदेश क्यों किया है ? इसी बात को श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं-

उत्तर-मंगल संबंधी आवश्यक कृतिकर्म करने वाले तथा मंगलसंंबधी प्रायश्चित्त करने वाले और विनय को प्राप्त ऐसे शिष्य, अध्येता-पढ़ने वाले, श्रोता और वक्ता आरोग्य और निर्विघ्न रूप से विद्या तथा विद्या के फल को प्राप्त हों, इसीलिए तीनों जगह मंगल करने का उपदेश दिया गया है।

कहा भी है-

शिष्य सरलतापूर्वक प्रारंभ किये गये ग्रंथ के अध्ययन-स्मरण आदि कार्य में पारंगत हों इसलिए आदि में भद्रवचन अर्थात् मंगलाचरण करना चाहिए। प्रारंभ किये गये कार्य की व्युच्छित्ति न हो अर्थात् किसी विघ्न आदि के उपस्थित हो जाने पर वह अध्ययनादि कार्य बीच में ही छूट न जावे, इसलिए मध्य में मंगलाचरण करना चाहिए और विद्या तथा विद्या के फल की प्राप्ति हो इसलिए अन्त में मंगलाचरण करना चाहिए।

मंगलस्य भेदौ-

तं च मंगलं दुविहं, णिबद्धमणिबद्धमिदि। तत्थ णिबद्धं णाम, जो सुत्तस्सादीए सुत्त-कत्तारेण कयदेवदा-णमोक्कारो तं णिबद्धमंगलं। जो सुत्तस्सादीए सुत्तकत्तारेण ण णिबद्धो देवदाणमोक्कारो तमणिबद्धमंगलं। इदं पुण जीवट्ठाणं णिबद्धमंगलं ‘‘एत्तो इमेसिं चोद्दसण्हं जीवसमासाणं’’ इदि एदस्स सुत्तस्सादीए णिबद्ध-‘‘णमो अरिहंताणं’’ इच्चादि-देवदा-णमोक्कार-दसंणादो।[१६]

तच्च मंगलं द्विविधं निबद्धमनिबद्धमिति। तत्र निबद्धलक्षणं-य: सूत्रग्रंथस्यादौ सूत्रकत्र्रा श्रीपुष्पदन्ताचार्येण कृत: देवतानमस्कार: स निबद्धमंगलम्। य: सूत्रग्रंथस्यादौ सूत्रकत्र्रा न निबद्धो देवतानमस्कार: स अनिबद्धमंगलम्।
इदं च पुन: जीवस्थानमिति नाम षट्खण्डागमग्रंथस्य प्रथमखण्डग्रन्थ: निबद्धमंगलं।
अयं महामंत्र: सादिरनादिर्वा ?
अथवा षट्खण्डागमस्य मु प्रतौ पाठांतरं। यथा-(मुद्रितमूलग्रन्थस्य प्रथमावृत्तौ)
‘‘जो सुत्तस्सादीए सुत्तकत्तारेण णिबद्धदेवदाणमोक्कारो तं णिबद्धमंगलं। जो सुत्तस्सादीए सुत्तकत्तारेण कयदेवदाणमोक्कारो तमणिबद्धमंगलं’’[१७]

हिंदी अनुवाद

मंगल के दो भेद हैं-

वह मंगल दो प्रकार का है-निबद्धमंगल और अनिबद्धमंगल। जो ग्रंथ की आदि में ग्रंथकार के द्वारा इष्टदेवता को नमस्कार किया जाता है उसे निबद्ध मंगल कहते हैं।

ग्रंथ के प्रारंभ में ग्रंथकार के द्वारा जो देवता नमस्कार रूप मंगल निबद्ध नहीं किया जाता है वह अनिबद्ध मंगल है।

उनमें से यह ‘‘जीवस्थान’’ नामक प्रथम खण्डागम निबद्धमंगल है क्योंकि इसमें ‘‘एत्तो इमेसिं चोद्दसण्हं जीवसमासाणं’’ इत्यादि प्रथम सूत्र के पहले ‘‘णमो अरिहंताणं’’ इत्यादिरूप से देवता नमस्कार निबद्धरूप से देखने में आता है।

वह मंगल दो प्रकार का कहा गया है-निबद्ध और अनिबद्ध मंगल। जो सूत्रग्रंथ के आदि में सूत्रकर्ता श्री पुष्पदन्ताचार्य के द्वारा किया गया देवतानमस्कार है वह निबद्धमंगल है और जो सूत्र की आदि में सूत्रकत्र्ता देवता नमस्कार रूप मंगल को निबद्ध नहीं करते हैं वह अनिबद्धमंगल है। यह जीवस्थान नाम का षट्खण्डागम का जो प्रथम खण्ड है वह निबद्धमंगल है।

यह महामंत्र सादि है अथवा अनादि ?

अथवा, प्रति में मुद्रितमूल प्रथम आवृत्ति में पाठान्तर है। जैसे-

जो सूत्र की आदि में सूत्रकत्र्ता के द्वारा देवता नमस्कार निबद्ध किया जाता है, वह निबद्ध मंगल है और जो सूत्र की आदि में सूत्रकर्ता के द्वारा देवता नमस्कार किया जाता है-रचा जाता है वह अनिबद्धमंगल है।

उक्तं च णमोकारमंत्रकल्पे

अस्यायमर्थ:-य: सूत्रस्यादौ सूत्रकर्त्रा निबद्ध:-संग्रहीत: न च ग्रथित: देवतानमस्कार: स निबद्धमंगलं। य: सूत्रस्यादौ सूत्रकत्र्रा कृत:-ग्रथित: देवतानमस्कार: स अनिबद्धमंगलं। अनेन एतज्ज्ञायते-अयं महामंत्र: मंगलाचरणरूपेणात्र संग्रहीतोऽपि अनादिनिधन:, न तु केनापि रचितो ग्रथितो वा।

उक्तं च णमोकारमंत्रकल्पे श्रीसकलकीर्तिभट्टारकै:-
महापंचगुरोर्नाम, नमस्कारसुसम्भवम्।
महामंत्रं जगज्जेष्ठ-मनादिसिद्धमादिदम्[१८]।।६३।।
महापंचगुरूणां, पंचत्रिंशदक्षरप्रमम्।
उच्छ्वासैस्त्रिभिरेकाग्र-चेतसा भवहानये।।[१९]६८।।
श्रीमदुमास्वामिनापि प्रोक्तम्-
ये केचनापि सुषमाद्यरका अनन्ता, उत्सर्पिणी-प्रभृतय: प्रययुर्विवर्ता:।
तेष्वप्ययं परतर: प्रथितप्रभावो, लब्ध्वामुमेव हि गता: शिवमत्र लोका:[२०]।।३।।
अथवा द्रव्यार्थिकनयापेक्षयानादिप्रवाहरूपेणागतोऽयं महामंत्रोऽनादि:, पर्यायार्थिकनयापेक्षया हुंडावसर्पिणीकालदोषापेक्षया तृतीयकालस्यान्ते तीर्थंकरदिव्यध्वनिसमुद्गत: सादिश्चापि संभवति।

हिंदी अनुवाद

इसका अर्थ यह है-सूत्र ग्रंथ के प्रारंभ में ग्रंथकार जो देवता नमस्कार रूप मंगल कहीं से संग्रहीत करते हैं, स्वयं नहीं रचते हैं वह तो निबद्धमंगल है और सूत्र के प्रारंभ में ग्रंथकर्ता के द्वारा जो देवतानमस्कार स्वयं रचा जाता है वह अनिबद्धमंगल है। इससे यह ज्ञात होता है कि यह णमोकार महामंत्र मंगलाचरणरूप से यहाँ संग्रहीत होते हुए भी अनादिनिधन है। यह मंत्र किसी के द्वारा रचित या गूँथा हुआ नहीं है। प्राकृतिक रूप से अनादिकाल से चला आ रहा है।

‘‘णमोकार मंत्रकल्प’’ में श्री सकलकीर्ति भट्टारक ने कहा भी है-

'श्लोकार्थ-नमस्कार मंत्र में रहने वाले पाँच महागुरुओं के नाम से निष्पन्न यह महामंत्र जगत् में ज्येष्ठ-सबसे बड़ा और महान है, अनादिसिद्ध है और आदि अर्थात् प्रथम है।।६३।।

पाँच महागुरुओं के पैंतीस अक्षर प्रमाण मंत्र को तीन श्वासोच्छ्वासों में संसार भ्रमण के नाश हेतु एकाग्रचित्त होकर सभी भव्यजनों को जपना चाहिए अथवा ध्यान करना चाहिए।।६८।।

श्रीमत् उमास्वामी आचार्य ने भी कहा है-

श्लोकार्थ- उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी आदि के जो सुषमा, दु:षमा आदि अनन्त युग पहले व्यतीत हो चुके हैं उनमें भी यह णमोकार मंत्र सबसे अधिक महत्त्वशाली प्रसिद्ध हुआ है। मैं संसार से बहिर्भूत (बाहर) मोक्ष प्राप्त करने के लिए उस णमोकार मंत्र को नमस्कार करता हूँ।।३।।

अथवा द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि प्रवाहरूप से चला आ रहा यह महामंत्र अनादि है और पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा हुंडावसर्पिणी कालदोष के कारण तृतीय काल के अंत में तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से उत्पन्न होने के कारण यह सादि भी है।

अत्र कश्चिदाह

अत्र कश्चिदाह-सूत्रस्यादौ मंगलं कृतं श्रीपुष्पदन्ताचार्येण तर्हि-सूत्रं किं मंगलमुतामंगलमिति ? यदि अमंगलं तर्हि तत्सूत्रं सूत्रमेव न भवेत्, पापकारणस्य सूत्रत्वविरोधात्। अथ सूत्रं मंगलं, किं तत्र मंगलेन एकतश्चैव कार्यनिष्पत्ते: इति ? तादृशप्रतिज्ञाभावात् परिशेषात् मंगलं एव ?

आचार्य: प्राह-सूत्रस्यादौ मंगलं पठ्यते, अतो न पूर्वोक्तदोषोऽपि, द्वयोरपि पृथक्-पृथग् विनाश्यमाण-पापदर्शनात्। मंगलस्य पठ्यमाने सति विघ्नस्य विनाशनं भवति। सूत्रं पुन: समयं प्रति असंख्यातगुणश्रेणीरूपेण पापं गालयित्वा पश्चात् सर्वकर्मक्षयकारणमिति।[२१]
पुनरपि कश्चिदाशंकते-देवतानमस्कारोऽपि चरमावस्थायां कृत्स्नकर्मक्षयकारीति द्वयोरप्येककार्यकर्तृत्वं इति चेत् ?
आचार्य: समाधत्ते-नैतत् कथयितव्यं, सूत्रविषयपरिज्ञानमन्तरेण तस्य तथाविधसामथ्र्याभावात्। शुक्लध्यानान्मोक्ष: न च देवतानमस्कार: शुक्लध्यानमिति।[२२]
अत्र पर्यन्तं णमोकारमंगलगाथासूत्रस्यार्थ: कथित:, तत्र च मंगले धातु-निक्षेप-नय-एकार्थ-निरुक्ति-अनियोगद्वारै: संक्षेपेण कथनं कृतम्।
अस्य महामंत्रस्य संक्षिप्तरूप: ‘ॐकारो’ भवति, तस्य व्याख्या कथ्यते-
अरिहंता असरीरा आइरिया तह उवज्झाया मुणिणो।
पढमक्खरणिप्पण्णो, ओंकारो पंच परमेट्ठी।।

हिंदी अनुवाद

सूत्र ग्रंथ मंगलरूप है अथवा अमंगलरूप है ?

यहाँ कोई कहता है कि सूत्र की आदि में श्रीपुष्पदन्त आचार्य के द्वारा मंगल किया गया है तो शंका होती है कि सूत्र ग्रंथ स्वयं मंगलरूप हैं या अमंगलरूप ? यदि सूत्र स्वयं मंगलरूप नहीं हैं तो वह सूत्र भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मंगल के अभाव में पाप का कारण होने से उसमें सूत्रपने का विरोध आता है और यदि सूत्र मंगलरूप हैं तो फिर उसमें अलग से मंगल करने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि मंगलरूप सूत्र से ही कार्य की निष्पत्ति हो जाती है। यदि कहा जाये कि सूत्र मंगल नहीं है तो यह बात भी नहीं है क्योंकि ऐसी प्रतिज्ञा नहीं पाई जाती है, अतएव ‘‘परिशेष न्याय’’ से वह मंगल है। तब फिर यहाँ अलग से मंगल क्यों किया गया ?

इस शंका पर आचार्य समाधान करते हुए कहते हैं कि-

सूत्र की आदि में जो मंगल किया गया है उसमें पूर्वोक्त दोष नहीं आता है क्योंकि सूत्र और मंगल इन दोनों से पृथक्-पृथक् रूप में पापों का विनाश होता हुआ देखा जाता है। पठन-पढ़ने रूप क्रिया में आने वाले विघ्नों को दूर करने वाला तो मंगल है और सूत्र, प्रतिसमय असंख्यातगुणश्रेणी रूप से पापों का नाश करके उसके बाद सम्पूर्ण कर्मों के क्षय का कारण होता है।

पुन: कोई शंका करता है कि देवता नमस्कार भी अंतिम अवस्था में सम्पूर्ण कर्मों का क्षय करता है अत: मंगल और सूत्र दोनों का एक ही कार्य हुआ ?

इस पर आचार्य समाधान करते हैं कि ऐसा नहीं है, सूत्रग्रंथ में वर्णित विषय का ज्ञान हुए बिना उसकी उस प्रकार के कार्य-कर्मक्षय रूप सामथ्र्य नहीं हो सकती है। मोक्ष की प्राप्ति शुक्लध्यान से होती है परन्तु देवता नमस्कार शुक्लध्यान नहीं है।

यहाँ तक णमोकार मंगलगाथा सूत्र का अर्थ हुआ, उस मंगल में धातु, निक्षेप, नय, एकार्थ, निरुक्ति और अनुयोगद्वारों के द्वारा संक्षेप से कथन किया गया।

इस महामंत्र का संक्षिप्त रूप ‘‘ॐकार’’ होता है उसकी व्याख्या करते हैं-

गाथार्थ-अरिहंत, अशरीरी (सिद्ध), आचार्य, उपाध्याय, मुनि (सर्वसाधु) इन पाँचों परमेष्ठी पदों के प्रथम अक्षर लेने से ‘‘ओंकार’’ शब्द बना है जो कि पंचपरमेष्ठी का वाचक है।

ऊँ मंत्र कैसे बना?

अर्हतां प्रथमाक्षर: ‘अ’ सिद्धानां-अशरीराणां प्रथमाक्षर: ‘अ’, अ+अ ‘‘समान: सवर्णे दीर्घीभवति परश्च लोपम्’’ इति सूत्रेण ‘आ’ संजात:। पुनश्च आचार्याणां ‘आ’, आ+आ ‘‘समान:..’’ इत्यादिसूत्रेण आ एव संजात:। तत उपाध्यायानां ‘उ’, आ + उ ‘‘उवर्णे ओ’’ इति सूत्रेण ‘ओ’ संजात:। तत: परं साधूनां-मुनीनां प्रथमाक्षरो मकारो गृहीत: अत: ‘ओम्’ भवति, ‘‘विरामे वा[२३]’’ इति सूत्रेण ‘ओें’ अथवा ‘ॐ’ मंत्रो जात:।

हस्तिनापुरक्षेत्रे जम्बूद्वीपस्थले एकस्मिन् मन्दिरे एकोनविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे वीराब्दे मत्प्रेरणया ‘ॐ’ निर्मापितोऽस्ति। अस्मिन् ॐकारे पंचपरमेष्ठिनां मूर्तयो विराजमाना भविष्यन्ति। अयं ॐ मंत्र: किञ्चिन्न्यूनं सार्धत्रिहस्तप्रमाणमस्ति। एष मंत्रो बृहदाकारेण प्रथमबारमेवात्र निर्मापितोऽभवत्। अयं मंत्राकार: सदैव जम्बूद्वीपस्थलं हस्तिनापुरक्षेत्रं च रक्षेदिति प्रार्थयामहे।
एवं प्रथमस्थले णमोकारमहामंत्रस्यार्थ-अनादिनिधनत्वादिविवेचनरूपेण प्रथमगाथासूत्रेण मंगलाचरणे एकं गाथासूत्रं गतम्।

अरिहंतों का प्रथम अक्षर ‘‘अ’’ लिया पुन: सिद्धों को अशरीरी माना है अतः अशरीरी का प्रथम अक्षर ‘‘अ’’ लेकर ‘समान: सवर्णे दीर्घीभवति परश्च लोपम्’ इस सूत्र से अ+अ·आ (दीर्घ आ) हो गया पुन: आचार्यों के नमस्काररूप पद का प्रथम अक्षर ‘‘आ’’ लेने से उपर्युक्त ‘‘समान.....’’ इत्यादि सूत्र से आ+आ मिलकर ‘‘आ’’ ही रहा और उपाध्यायों का ‘‘उ’’ लिया तो आ+उ को ‘‘उवर्णे ओ’’ सूत्र से ‘‘ओ’’ हो गया, उसके पश्चात् साधु का अर्थ ‘‘मुनि’’ होता है सो मुनि का प्रथम अक्षर ‘‘म्’’ ग्रहण किया गया अत: ओ+म्·ओम् बन गया पुन: ‘‘विरामे वा’’ सूत्र से पदान्त मकार को विकल्प से अनुस्वार होकर ‘‘ओं’’ बन जाता है। इस ओं को ‘‘ॐ’’ इस आकार में भी लिखा जाता है अत: यह ‘‘ॐ’’ शब्द बीजाक्षरमंत्र कहलाता है।

हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र में जम्बूद्वीप स्थल पर एक मंदिर के अंदर वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ इक्कीसवें (२५२१) वर्ष में मेरी प्रेरणा से ‘‘ॐ’’ प्रतिमा का निर्माण किया गया है। इस ॐकार बिम्ब में पाँच मूर्तियाँ विराजमान होंगी। यह ‘‘ॐ’’ मंत्र कुछ कम साढ़े तीन हाथ प्रमाण (लगभग ५ फुट) ऊँचा है। इतने बड़े आकाररूप में इस ॐ मंत्र का हस्तिनापुर में यह प्रथम निर्माण हुआ है अर्थात् देशभर में अभी तक कहीं भी ऐसे विशाल ॐ बिम्ब का निर्माण नहीं हुआ है प्रत्युत सर्वप्रथम यहीं बना है। मंत्र के आकाररूप में निर्मित यह ॐ जम्बूद्वीपस्थल तथा सम्पूर्ण हस्तिनापुर क्षेत्र की सदैव रक्षा करे यही मेरी प्रार्थना है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में णमोकार महामंत्र का अर्थ एवं उसकी अनादिनिधनता के विवेचनरूप से प्रथम गाथासूत्र के द्वारा मंगलाचरण में एक गाथासूत्र समाप्त हुआ।

ग्रन्थस्य निमित्तं कथ्यते-

संप्रति सूत्रावतारस्य निमित्तमुच्यते-‘बद्ध-बंध-बंधकारण-मुक्त-मोक्ष-मोक्षकारणानि निक्षेप-नय- प्रमाण-अनियोगद्वारै: अधिगम्य भव्यजनो जानातु इति। एतत् श्री वीरसेनाचार्येण कथ्यते-

‘‘सुत्तमोदिण्णं अत्थदो तित्थयरादो, गंथदो गणहरदेवादो त्ति।’’
कश्चिदाशंकते-द्रव्यभावाभ्यामकृत्रिमत्वत: सदा स्थितस्य श्रुतस्य कथमवतार: इति चेत् ?
आचार्यदेव: प्राह-एतत्सर्वमभविष्यद् यदि द्रव्यार्थिकनयोऽविवक्षिष्यत। पर्यायार्थिकनया-पेक्षायामवतारस्तु पुनर्घटत एव[२४]
निमित्तस्य कथनं जातम्।
ग्रन्थस्य हेतु:-
सांप्रतं हेतुरुच्यते। तत्र हेतुद्र्विविध:-प्रत्यक्षहेतु: परोक्षहेतुरिति। कस्य हेतु: ? सिद्धान्ताध्ययनस्य। तत्र प्रत्यक्षहेतुद्र्विविध:-साक्षात्प्रत्यक्ष-परपंराप्रत्यक्षभेदात्। तत्र साक्षात्प्रत्यक्षमज्ञानविनाश: सज्ज्ञानोत्पत्ति-र्देवमनुष्यादिभि: सततमभ्यर्चनम्। प्रतिसमयमसंख्यातगुणश्रेण्या कर्मनिर्जरा च। कर्मणामसंख्यातगुणश्रेणिनिर्जरा केषां प्रत्यक्षेति चेन्न, अवधिमन:पर्ययज्ञानिनां सूत्रमधीयानानां तत्प्रत्यक्षताया: समुपलम्भात्।
तत्र परम्पराप्रत्यक्षं शिष्यप्रशिष्यादिभि: सततमभ्यर्चनम्। परोक्षं द्विविधं, अभ्युदयं नै:श्रेयसमिति। तत्राभ्युदयसुखं इन्द्रप्रतीन्द्र-चक्रवत्र्यादि दिव्यमानुष्यसुखम्।[२५]

हिंदी अनुवाद

अब क्रमप्राप्त ग्रंथ के निमित्त का वर्णन किया जाता है-

अब निमित्त का कथन करते हैं। किसके निमित्त का कथन यहाँ किया जाता है ? यहाँ पर सूत्रावतार अर्थात् ग्रंथ प्रारंभ होने के निमित्त का वर्णन किया जाता है।

बद्ध, बंध, बंध के कारण, मुक्त, मोक्ष और मोक्ष के कारण इन छह तत्त्वों को निक्षेप, नय, प्रमाण और अनुयोग द्वारों से भलीभांति समझकर भव्यजन उसके ज्ञाता बनें, ऐसा श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं। इसलिए यह सूत्र अर्थप्ररूपणा की अपेक्षा तीर्थंकर से और ग्रंथरचना की अपेक्षा गणधर देव से अवतीर्ण हुआ है।

अब यहाँ पर कोई शंका करता है-

शंका-द्रव्य और भाव से अकृत्रिम होने के कारण सर्वदा एक रूप से अवस्थित श्रुत का अवतार कैसे हो सकता है ? तब आचार्यदेव कहते हैं-

समाधान-यह शंका तो तब बनती जब यहाँ पर द्रव्यार्थिक नय की विवक्षा होती। परन्तु यहाँ तो पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा होने से श्रुत का अवतार तो बन ही जाता है-घटित हो जाता है।

यहाँ भावार्थ यह है कि भव्यजीव श्रुतज्ञानरूपी सूर्य के दीप्त तेज से छह द्रव्य और नव पदार्थों को देखें अर्थात् भलीभांति जानें, इस निमित्त से श्रुतज्ञानरूपी सूर्य का उदय हुआ है।

यहाँ तक निमित्त का कथन पूर्ण हुआ।

ग्रंथ का हेतु- अब हेतु का कथन किया जाता है। हेतु दो प्रकार का है-प्रत्यक्ष हेतु, परोक्ष हेतु। यहाँ पर किसके हेतु का कथन है ? सिद्धान्त अध्ययन के हेतु का कथन यहाँ किया जा रहा है। उन हेतुओं में से प्रत्यक्ष हेतु के दो भेद हैं-साक्षात् प्रत्यक्ष हेतु और परम्परा प्रत्यक्ष हेतु। उनमें से अज्ञान का विनाश-सम्यग्ज्ञान की उत्पत्ति-देव, मनुष्य आदि के द्वारा निरन्तर पूजा का होना और प्रतिसमय असंख्यातगुणश्रेणी कर्मों की निर्जरा का होना ‘‘साक्षात्प्रत्यक्ष हेतु’’ समझना चाहिए।

शंका-असंख्यात गुणित श्रेणीरूप से कर्मों की निर्जरा होती है यह किनके प्रत्यक्ष है ? अर्थात् यह बात प्रत्यक्षरूप से कौन जानता है ?

समाधान-ऐसी शंका ठीक नहीं है, क्योंकि सूत्र ग्रंथ का अध्ययन करने वालों के असंख्यात गुणश्रेणी रूप से निर्जरा होती है यह बात अवधिज्ञानी और मन:पर्ययज्ञानी को प्रत्यक्षरूप से दिखती है।

तत्र नै:श्रेयसं नाम सिद्धानामर्हतां चातीन्द्रियसुखम्।[२६]

अथवा जिनपालितो[२७] निमित्तम्। हेतुर्मोक्ष:।
शिक्षकाणां हर्षोत्पादनं निमित्तहेतुकथने प्रयोजनम्।
निमित्तहेतुकथनं जातम्। परिमाणमुच्यते-
उत्तं च-अक्खर-पय-संघाय-पडिवत्ति-अणियोगद्दारेहि संखेज्जं, अत्थदो अणंतं। पदं पडुच्च अट्ठारहपद-सहस्सं। शिक्षकाणां हर्षोत्पादनार्थं मतिव्याकुलता-विनाशनार्थं च परिमाणमुच्यते। परिमाणकथनं जातम्।
ग्रन्थस्य नाम-
इदानीं नामनिरूपणं क्रियते-
नाम जीवस्थानमिति।
षट्खण्डागमग्रन्थस्य प्रथमखण्डो जीवस्थानं नाम। अस्मिन् प्रथमखण्डे-सत्संख्या-क्षेत्र-स्पर्शन-कालान्तर-भावाल्पबहुत्व-नामाष्टानुयोगद्वाराणि, प्रकृति-समुत्कीर्तना-स्थानसमुत्कीर्तने द्वे, त्रयो महादण्डका: जघन्योत्कृष्टस्थिती द्वे, सम्यक्त्वोत्पत्ति:, गत्यागती चेति नव चूलिका: सन्ति।

हिंदी अनुवाद

शिष्य-प्रशिष्यादि के द्वारा सतत अर्चन-पूज्यता को प्राप्त करना ‘‘परम्परा प्रत्यक्ष हेतु’’ है। परोक्ष हेतु, अभ्युदयसुख और नैश्रेयस सुख के भेद से दो प्रकार का होता है। इन्द्र-प्रतीन्द्र आदि के दिव्यसुख तथा चक्रवर्ती आदि मनुष्यगति के सुखों की प्राप्ति ‘अभ्युदयसुख’ है और अर्हन्त सिद्ध के अतीन्द्रियसुख का नाम ‘‘नैश्रेयस सुख’’ है।

अथवा जिनपालित इस श्रुत के अवतार में निमित्त हैं और उस श्रुत अवतार का हेतु मोक्ष है अर्थात् मोक्ष के हेतु जिनपालित के निमित्त से इस श्रुत का अवतार हुआ है। यहाँ पर निमित्त और हेतु के कथन करने से शिक्षकों-पाठक जनों को हर्ष का उत्पन्न कराना ही प्रयोजन है।

निमित्त और हेतु का कथन पूर्ण हुआ।

अब परिमाण का कथन करते हैं-

कहा भी है-अक्षर-पद-संघात-प्रतिपत्ति और अनुयोग द्वारों की अपेक्षा श्रुत का परिमाण संख्यात है और अर्थ की अपेक्षा अनन्त है। पद की अपेक्षा अठारह हजार प्रमाण है। शिक्षक जनों को हर्ष उत्पन्न कराने के लिए और मतिसंबंधी व्याकुलता दूर करने के लिए यहाँ परिमाण का कथन किया गया है। इस प्रकार परिमाण का कथन पूर्ण हुआ।

ग्रंथ का नाम- अब ग्रंथ के नाम का निरूपण करते हैं-

इस शास्त्र का नाम जीवस्थान है।

षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड का नाम जीवस्थान है। इस प्रथम खण्ड में सत्-संख्या-क्षेत्र-स्पर्शन-काल-अन्तर-भाव और अल्पबहुत्त्व नाम के आठ अनुयोग द्वार हैं। प्रकृतिसमुत्कीर्तना-स्थानसमुत्कीर्तना ये दो समुत्कीर्तना हैं, तीन महादण्डक हैं, जघन्य और उत्कृष्ट ये दो स्थिति हैं, सम्यक्त्व उत्पत्ति का वर्णन है, गति-आगति का वर्णन है। इस प्रकार से प्रथम खण्ड में आठ अनुयोग और नव चूलिकाओं का वर्णन है।

ग्रन्थस्य अर्थकर्ता-

इदानीं ग्रन्थस्य कर्ता निरूप्यते-

उत्तंकं च-
तत्थ कत्ता दुविहो-अत्थकत्ता गंथकत्ता चेदि। तत्थ अत्थकत्ता दव्वादीहि चउहि परूविज्जदि। तत्र तस्य तावद् द्रव्यनिरूपणं क्रियते[२८] संक्षेपेण-
द्रव्यापेक्षया अर्थकर्ता-
स्वेदरजोमलादि-शरीरगताशेषदोषरहित: दिव्यविशिष्टदेहधर: शतेन्द्रगणधरादिभ्य: प्राप्तपूजातिशयो-ऽन्तिमतीर्थकरो भगवान् महावीरोऽर्थकर्ता।
क्षेत्रापेक्षया अर्थकर्ता-राजगृहनगरस्य सन्निकटे पंचशैलपुरे विपुलाचलनाम्नि पर्वते भगवतो महावीरस्य दिव्यध्वनि: संजाता।
उत्तंकं च-
सुरखेयरमणहरणे गुणणामे पंचसेलणयरम्हि।
विउलम्मि पव्वदवरे वीरजिणो अत्थकत्तारो।।[२९]
कालापेक्षया अर्थकर्ता-
उत्तंकं च-
इमिसेऽवसप्पिणीए, चउत्थ-समयस्य पच्छिमे भाए।
चोत्तीस-वाससेसे, किंचि विसेसूणए संते।।
वासस्स पढममासे, पढमे पक्खम्हि सावणे बहुले।
पाडिवद-पुव्वदिवसे, तित्थुप्पत्ती दु अभिजिम्हि।।

अब ग्रंथ के कत्र्ता का निरूपण करते हैं-

कहा भी है-

कत्र्ता के दो भेद हैं-अर्थकत्र्ता और ग्रंथकर्ता। इनमें से अर्थकत्र्ता का द्रव्यादि चार भेदों द्वारा प्ररूपण किया जाता है। उनमें से पहले द्रव्य की अपेक्षा अर्थकर्ता का निरूपण करते हैं-

अब द्रव्य की अपेक्षा अर्थकर्ता का निरूपण करते हैं-

पसीना, धूल, मल आदि शरीर में होने वाले सम्पूर्ण दोषों से रहित, दिव्य-विशिष्ट देहधारी, सौ इन्द्रों एवं गणधर आदि महामुनियों के द्वारा अतिशय पूजा को प्राप्त अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी अर्थकत्र्ता हैं।

अब क्षेत्र की अपेक्षा अर्थकर्ता का वर्णन करते हैं-

क्षेत्र की अपेक्षा अर्थकत्र्ता का वर्णन-राजगृह नगर के निकट पंचशैलपुर-पंचपहाड़ी के विपुलाचल नामक पर्वत पर भगवान् महावीर जिनेन्द्र की दिव्यध्वनि उत्पन्न हुई थी-खिरी थी।

कहा भी है-

गाथार्थ-सुर-खेचर के मन को हरने वाले, गुणों से परिपूर्ण, राजगृही के निकट पंचशैल नामक नगर में विपुलाचल पर्वत पर श्री वीरजिनेन्द्र अर्थकत्र्ता हुए-उनकी दिव्यध्वनि खिरी थी।

अब काल की अपेक्षा अर्थकत्र्ता का वर्णन करते हैं-

इस अवसर्पिणी कल्पकाल के दु:षमासुषमा नाम के चौथे काल के पिछले भाग में कुछ कम चौंतीस वर्ष बाकी रहने पर वर्ष के प्रथम मास-श्रावण मास में, प्रथम पक्ष-कृष्णपक्ष में प्रतिपदा के दिन प्रात:काल के समय आकाश में अभिजित् नक्षत्र के उदित रहने पर तीर्थ-धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई।

सावणबहुलपडिवदे, रुद्दमुहुत्ते सुहोदए रविणो।

अभिजिस्स पढमजोए, एत्थ जुगाई मुणेयव्वो।।[३०]
अस्यामवसर्पिण्यां चतुर्थकाले किंचिन्न्यून<ref.त्रयस्त्रिंशत्वर्ष अष्टमासैकपक्षहीने इत्यर्थ:। </ref> चतुस्त्रिंशद्वर्षशेषे सति वर्षाणां प्रथममासे श्रावणमासे कृष्णपक्षे प्रतिपत्तिथौ धर्मतीर्थस्योत्पत्तिर्जाता, भगवतो महावीरस्य दिव्यध्वनिराविर्बभूव। इयमेव तिथि: युगादि: कथ्यते। आषाढपौर्णमासीचरमसमय: पुन: श्रावणकृष्णप्रतिपदि युगादौ युगारम्भदिवसे धर्मतीर्थस्योत्पत्तिर्जाता।
अद्य कार्तिककृष्णात्रयोदश्या: तिथे: पूर्वं एकपञ्चाशदधिक पंचविंशतिशतानि संवत्सराणि व्यतीतानि बभूवु:। [३१]
अथ दिव्यध्वनिलक्षणं उच्यते-
जोयणपमाणसंट्ठिद-तिरियामरमणुवणिवहपडिबोहो।
मिदमधुरगभीरतरा-विसदविसयसयल-भासाहिं।।६०।।
अट्ठरसमहाभासा खुल्लयभासा वि सत्तसयसंखा।
अक्खरअणक्खरप्पय सण्णीजीवाण सयलभासाओ।।६१।।
एदासिं भासाणं तालुवदंतोट्ठकंठवावारं।
परिहरिय एक्ककालं भव्वजणाणंदकरभासो।।६२।।[३२]

हिंदी अनुवाद

श्रावण प्रतिपदा के दिन रुद्रमुहूर्त में सूर्य का शुभ उदय होने पर और अभिजित् नक्षत्र के प्रथम योग में युग की आदि में तीर्थ की उत्पत्ति समझना चाहिए।

इस अवसर्पिणी के चतुर्थ काल में कुछ कम चौंतीस वर्ष के शेष रहने पर वर्षों के प्रथम मास श्रावणमास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि में धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई-भगवान् महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि खिरी थी। यही तिथि युगादि की प्रथमतिथि कही जाती है। आषाढ़मास की पूर्णिमा तिथि युग की अंतिम तिथि के पश्चात् श्रावण कृष्णा प्रतिपदा को युग के प्रारम्भिक दिवस पर धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई।

आज कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी (धनतेरस) है इससे पूर्व पच्चीस सौ इक्यावन (२५५१) संवत्सर (वर्ष) व्यतीत हो चुके हैं।

भावार्थ-इस ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ टीका की रचयित्री परमविदुषी गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी जिस दिन इस प्रकरण को लिख रही थीं वह वीर निर्वाण संवत् २५२१वें वर्ष का कार्तिक कृष्णा तेरस का पवित्र दिवस था। अत: उन्होंने इस महत्त्वपूर्ण इतिहास को बतलाया कि निर्वाण प्राप्ति के ३० वर्ष पूर्व भगवान महावीर को केवलज्ञान हो चुका था अत: केवलज्ञान की अपेक्षा आज २५२१±३०·२५५१ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं।

इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी आज तक उनके शासन के अपरवर्ती आचार्यों द्वारा अवधारित उस श्रुत की परम्परा अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है और पंचमकाल के अंत तक वही परम्परा चलती रहेगी।

श्रावण कृष्णा प्रतिपदा का दिन कर्मभूमि की आदि का प्रथम दिवस है। इसी दिन भगवान महावीर की दिव्यध्वनि भी खिरी थी अत: इसे ‘‘वीरशासन जयंती दिवस’’ भी कहते हैं।

अब दिव्यध्वनि का लक्षण बताते हैं-

गाथार्थ-एक योजन प्रमाण वाली समवसरण सभा में स्थित तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि मृदु-मधुर-अतिगंभीर और विशद विषय का प्रतिपादन करने वाली सम्पूर्ण भाषाओं से सहित है और वह वाणी तिर्यंच-देव और मनुष्यों के समूह को प्रतिबोध प्रदान करने वाली है।

संज्ञी जीवों की अक्षर और अनक्षर रूप अठारह महाभाषा और सात सौ लघु भाषाओं में परिणत हुई और तालु-ओष्ठ-दन्त तथा कण्ठ के हलन-चलन रूप व्यापार से रहित होकर एक ही समय में भव्यजीवों को आनन्दित करने वाली भाषाओं के स्वामी तीर्थंकर भगवान हैं।

भाव से अर्थकर्ता एवं ग्रन्थकर्ता कौन हैं ?

अष्टादशमहाभाषासप्तशतकलघुभाषामयदिव्यध्वने: स्वामी भगवान् महावीर: समवसरणे असंख्यभव्य-जीवानां धर्मोपदेशको बभूव।

भावतोऽर्थकर्ता निरूप्यते-
ज्ञानावरणादिनिश्चयव्यवहारापायातिशयजातानन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्य-क्षायिकसम्यक्त्वदानलाभ-भोगोपभोग-निश्चयव्यवहारप्राप्त्यतिशयभूत-नवकेवललब्धिपरिणत:।[३३]
एवं विधो महावीरोऽर्थकर्ता।
ग्रंथकर्ता-
संप्रति ग्रंथकर्ता निरूप्यते धवलाटीकायां-
तेण महावीरेण केवलणाणिणा कहिदत्थो तम्हि चेव काले तत्थेव खेत्ते खयोवसम-जणिद-चउरमलबुद्धिसंपण्णेण बम्हणेण गोदमगोत्तेण सयलदुस्सुदि-पारएण जीवाजीवविसयसंदेह-विणासणट्ठमु-वगयवड्ढमाणपादमूलेण इंदभूदिणावहारिदो।

हिंदी अनुवाद

अठारह महाभाषा और सात सौ लघु भाषामय दिव्यध्वनि के स्वामी भगवान महावीर ने समवसरण में असंख्य जीवों को धर्म का उपदेश दिया। अब भाव की अपेक्षा अर्थकर्ता का निरूपण करते हैं-

ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों के निश्चय-व्यवहाररूप विनाश कारणों की विशेषता से उत्पन्न हुए अनन्तज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य तथा क्षायिक सम्यक्त्व, दान-लाभ-भोग और उपभोग की निश्चय और व्यवहाररूप प्राप्ति के अतिशय से प्राप्त हुई नौ केवललब्धियों से परिणत भगवान महावीर ने भावश्रुत का उपदेश दिया। इस प्रकार श्री महावीर स्वामी भाव की अपेक्षा अर्थकर्ता कहलाए हैं।

अब धवला टीका में ग्रंथकत्र्ता का वर्णन करते हैं-

इस प्रकार केवलज्ञानी भगवान महावीर के द्वारा कहे गये अर्थ-पदार्थ को उसी काल में और उसी क्षेत्र में क्षयोपशम विशेष से उत्पन्न चार प्रकार के-मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्ययरूप निर्मल ज्ञान से युक्त, ब्राह्मणवर्णी, गौतम गोत्री, सम्पूर्ण दु:श्रुति-अन्य मतावलम्बी वेद-वेदांग के पारंगत और जीव-अजीवविषयक संदेह को दूर करने के लिए श्रीवद्र्धमान तीर्थंकर के पाद-मूल में जाकर इन्द्रभूति ने केवलज्ञान से विभूषित उन भगवान महावीर के द्वारा कथित अर्थ को ग्रहण किया।

भावार्थ-ये इन्द्रभूति गौतम भगवान के समवसरण में आने से पूर्व सम्पूर्ण मिथ्याशास्त्रों के ज्ञाता थे अत: चार ज्ञान होने के पश्चात् भी उनका वह ज्ञान विद्यमान तो था किन्तु उस पर से उनका श्रद्धान समाप्त हो गया था।

उक्तं च उत्तरपुराणे

पुणो तेणिंदभूदिणा भावसुदपज्जय-परिणदेण बारहंगाणं चोद्दसपुव्वाणं च गंथाणमेक्केण चेव मुहुत्तेण रयणा कदा।[३४]

उक्तं च महापुराणांतर्गत-उत्तरपुराणे-
भट्टारकोपदेशेन, श्रावणे बहुले तिथौ।।३६९।।

पक्षादावर्थरूपेण, सद्य: पर्याणमन् स्फुटम्।
पूर्वाण्हे पश्चिमे भागे, पूर्वाणामप्यनुक्रमात्।।३७०।।

इत्यनुज्ञातसर्वांग - पूर्वार्थो धीचतुष्कवान्।
अंगानां ग्रंथसंदर्भं, पूर्वरात्रौ व्यधामहम्।।३७१।।

पूर्वाणां पश्चिमे भागे, ग्रंथकर्ता ततोऽभवम्।
इति श्रुतद्र्धिभि: पूर्णो-ऽभूवं गणभृदादिम:।।३७२।।[३५]

अस्याभिप्रायोऽयं-भट्टारकवद्र्धमानस्वामिन उपदेशेन मया श्रावणकृष्णाप्रतिपत्तिथौ पूर्वाण्हकाले समस्त-अंगानां ज्ञानं प्राप्तं, अपराण्हकाले चतुर्दशपूर्वाणां च बोध: संजात:। मया पुन: तद्रात्रिपूर्वभागे अंगानां रचना कृता, रात्रौ पश्चिमभागे पूर्वाणां रचना कृता। ततोऽहं गौतमो ग्रंथकर्ता अभूवम् प्रथमो गणधरश्च भगवतो महावीरस्येति।

अत्र श्रीगुणभद्रसूरिणा श्री गौतमस्वामिमुखेनैतत्प्रकरणं निगदितं।

पुन: उन इन्द्रभूति ने भावश्रुतरूप पर्याय से परिणत होकर बारह अंग और चौदह पूर्व रूप ग्रंथों की रचना एक ही मुहूर्त में कर दी। महापुराण के अन्तर्गत उत्तरपुराण में कहा भी है-

श्लोकार्थ-भट्टारक-भगवान महावीर के उपदेश से श्रावण कृष्णा एकम् तिथि को पूर्वाण्हकाल में समस्त अंगों के अर्थ और पद स्पष्ट जान पड़े। पुन: उसी दिन अपराण्ह काल में अनुक्रम से पूर्वों के अर्थ तथा पदों का भी स्पष्ट बोध हो गया।

इस प्रकार जिसे समस्त अंगों तथा पूर्वों का ज्ञान हुआ है और जो चार ज्ञान से सम्पन्न हैं ऐसे मैंने रात्रि के पूर्व भाग में अंगों की और पिछले भाग में पूर्वों की ग्रंथरचना की, उसी समय मैं ग्रंथकर्ता हुआ। इस तरह श्रुतज्ञानरूपी ऋद्धि से पूर्ण हुआ मैं भगवान महावीर स्वामी का प्रथम गणधर हो गया।।३७०-७१-७२।।

इसका अभिप्राय यह है कि भट्टारक-भगवान वद्र्धमान स्वामी के उपदेश से मैंने श्रावण कृष्णा प्रतिपदा तिथि में पूर्वाण्हकाल-प्रात:काल में समस्त अंगों का ज्ञान प्राप्त किया और अपराण्ह काल में चौदह पूर्वों का मुझे बोध हुआ। पुन: मैंने उसी रात्रि के पूर्व भाग में अंगों की रचना की और रात्रि के पिछले भाग में पूर्व रूप श्रुत को रचा। इसलिए मैं गौतम ग्रंथकर्ता के रूप में तथा भगवान् महावीर के प्रथम गणधर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यहाँ श्री गुणभद्रसूरि ने श्रीगौतमस्वामी के मुख से निकले हुए उपर्युक्त इस प्रकरण को वर्णित किया है।


टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. १२।
  2. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. १९।
  3. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. २०।
  4. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. २१।
  5. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. २७।
  6. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. २९।
  7. षट्खण्डागम (धवला.) पु. १, पृ. ३०, ‘अर्धाष्ट’ इत्यत्र ‘अर्धचतुर्थ’, इति पाठेन भाव्यं।
  8. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ३०।
  9. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ३१।
  10. षट्खण्डागम (धवलाटीका समन्वित) पृ. ३३।
  11. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ३५।
  12. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ३७।
  13. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ३९।
  14. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४०।
  15. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. ४१।
  16. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४२।
  17. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. ४२, टिप्पणौ।
  18. आदिदं-प्रथममित्यर्थ:।
  19. णमोकारमंत्रकल्पे।
  20. णमोकारमंत्रकल्पे।
  21. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४३।
  22. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ४३।
  23. कातंत्ररूपमाला सूत्र ९२।
  24. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५६।
  25. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५७।
  26. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ५९।
  27. ‘जिनपालित’ की कथा आगे कहेंगे।
  28. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ६१।
  29. तिलोयपण्णत्ति, अ. १, श्लोक ६५।
  30. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ६४।
  31. आज कार्तिक कृष्णा तेरस (धनतेरस) है, अभी वीर नि. सं. २५२१ चल रहा है। अत: आज से २५५१ वर्ष पूर्व भगवान की दिव्यध्वनि खिरी है। नि. सं. २५२१ में दिव्यध्वनि के बाद ३० वर्ष भगवान का श्रीविहार हुआ है। यह जोड़ देने से २५५१ वर्ष होते हैं।
  32. तिलोयपण्णत्ति, अ. १, गाथा ६०-६१-६२।
  33. षट्खण्डागम (धवलाटीका समन्वित) पुस्तक १, भाग १, पृ. ६४।
  34. षट्खण्डागम (धवलाटीका समन्वित) पु. १, पृ. ६५-६६।
  35. उत्तरपुराण, पर्व ७४।