025..प्रथम महाधिकार - द्वादशांग का वर्णन...

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प्रथम महाधिकार - द्वादशांग का वर्णन से ताम्रपट्टों पर उत्कीर्ण ग्रंथ तक

अथ द्वादशाङ्गकथनं-

द्वादशाङ्गस्य नामानि-आचारांग-सूत्रकृतांग-स्थानांग-समवायांग-व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग-नाथधर्मकथांग-उपासकाध्ययनांग-अंत:कृद्दशांग-अनुत्तरौपपादिकदशांग-प्रश्नव्याकरणांग-विपाकसूत्रांग-दृष्टिवादांगानि चेति।


१. तत्र आचारांगं-अष्टादशसहस्रपदैर्मुनीनामाचारं वर्णयति। यथा-

कधं चरे कधं चिट्ठे, कधमासे कधं सए, कधं भुंजेज्ज भासेज्ज कधं पावं ण बज्झई।
जदं चरे जदं चिट्ठे जदमासे जदं सए, जदं भुंजेज्ज भासेज्ज एवं पावं ण बज्झई।।

२. सूत्रकृतांगं-षट्त्रिंशत्सहस्रपदै: ज्ञानविनय-प्रज्ञापना-कल्प्याकल्प्य-छेदोपस्थापना-व्यवहारधर्मक्रिया: प्ररूपयति, स्वसमय-परसमयस्वरूपं चापि कथयति।

३. स्थानांगं-द्विचत्वािंरशत्सहस्रपदै: एकादि-एवैकाधिक-स्थानानि वर्णयति। यथा-अयं जीवश्चैतन्यान्वयविधायिधर्मेण एक:, ज्ञानदर्शनोपयोगात् द्विविध:, कर्मफलचेतना-कर्मचेतना-ज्ञानचेतना- भेदात् त्रिविध: इत्यादि।

४. समवायांगं-एकलक्षचतु:षष्टिसहस्रपदै: सर्वपदार्थानां समवायं कथयति। तत्र द्रव्यसमवायो धर्मास्तिकाय-अधर्मास्तिकाय-लोकाकाश-एकजीवप्रदेशाश्च समाना:। क्षेत्रसमवायः सीमन्तनरक-मनुष्यक्षेत्र-ऋजुविमान-सिद्धक्षेत्रानि च समप्रमाणानि। कालसमवाय: समयो समयेन मुहूर्तो मुहूर्तेन सम:। भावसमवाय: केवलज्ञानं केवलदर्शनेन सममिति।

५. व्याख्याप्रज्ञप्त्यंंगं-द्विलक्ष-अष्टाविंशतिसहस्रपदै: किमस्तिजीव: किं नास्ति जीव इत्यादीनि षष्टिसहस्रप्रश्नानि प्ररूपयति।

६. नाथधर्मकथांगं-पञ्चलक्ष-षट्पंचाशत्सहस्रपदै: सूत्रपौरुषीं तीर्थंकरधर्मोपदेशनां गणधरदेवस्य संदेहापाकरणविधानं बहुविधकथा: उपकथाश्च वर्णयति।

७. उपासकाध्ययनांगं-एकादशलक्ष-सप्ततिसहस्रपदै:-
दंसणवदसामाइय-पोसहसच्चित्तराइ-भत्ते य।
बम्हारंभपरिग्गह-अणुमण-उद्दिट्ठदेसविरदी य।।
इति एकादशविध-उपासकानां लक्षणं, तेषां व्रतारोपणविधानं आचरणं च निरूपयति।

८. अंत:कृद्दशांगं-त्रयोविंशतिलक्ष-अष्टाविंशतिसहस्रपदै: एवैकस्मिन् तीर्थे दारुणान् बहुविधोपसर्गान् षोढ्वा प्रातिहार्यं लब्ध्वा निर्वाणगतान् दश दश केवलिनो वर्णयति।

हिंदी अनुवाद

अब बारह अंगों के नाम दर्शाते हैं-

आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, व्याख्या-प्रज्ञप्ति अंग, नाथधर्मकथांग, उपासकाध्ययनांग, अन्त:कृद्दशांग, अनुत्तरौपपादिकदशांग, प्रश्नव्याकरणांग, विपाकसूत्रांग और दृष्टिवादांग ये द्वादशांग के नाम हैं।

१. आचारांग-अठारह हजार पदों के द्वारा मुनियों के आचार/आचरण/चर्या का वर्णन करने वाला पहला आचारांग श्रुत है। यथा-

श्लोकार्थ-शिष्य पूछता है कि हे भगवन्! मैं कैसे विचरण करूँ ? कैसे ठहरूँ ? कैसे बैठूँ ? कैसे शयन करूँ ? कैसे भोजन करूँ ? और कैसे भाषण करूँ-बोलूँ ? जिससे पाप का बंध न हो। तब आचार्य कहते हैं कि हे शिष्य! तू यत्नपूर्वक-सावधानीपूर्वक (समितिपालनयुक्त यत्नाचारपूर्वक) विचरण कर, यत्नपूर्वक ठहर, यत्नपूर्वक बैठ, यत्नपूर्वक शयन कर, यत्नपूर्वक भोजन कर और यत्नपूर्वक वचन बोल जिससे कि पाप का बंध नहीं होगा।

२. सूत्रकृतांग-छत्तीस हजार पदों के द्वारा यह अंग ज्ञानविनय-प्रज्ञापना-कल्प्याकल्प्य-छेदोपस्थापना और व्यवहार धर्मक्रिया की प्ररूपणा करता है तथा स्वसमय (जैनागम) और परसमय (अन्य मतावलम्बी ग्रंथों) को भी कहता है।

३. स्थानांग-ब्यालीस हजार पदों के द्वारा एक से लेकर, उत्तरोत्तर एक-एक अधिक स्थानों का वर्णन करता है। जैसे-यह जीव चैतन्य गुण से समन्वित धर्म वाला होने से एक है, ज्ञान-दर्शन उपयोग रूप से दो प्रकार का है तथा कर्मफलचेतना, कर्मचेतना और ज्ञानचेतना के भेद से तीन प्रकार का है इत्यादि।

४. समवायांग-एक लाख चौंसठ हजार पदों के द्वारा समस्त पदार्थों के समवाय का वर्णन करने वाला यह अंग है। उनमें से द्रव्यसमवाय की अपेक्षा धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, लोकाकाश और एक जीव के प्रदेश समान हैं। क्षेत्रसमवाय की अपेक्षा प्रथम नरक के प्रथम पटल का सीमन्तक नामक प्रथम इन्द्रकबिल, ढाई द्वीप प्रमाण मनुष्य क्षेत्र, प्रथम स्वर्ग के प्रथम पटल का ऋजु नाम का इन्द्रक विमान और सिद्धक्षेत्र ये सब समान प्रमाण वाले हैं अर्थात् इन सबका विस्तार ४५ लाख योजन प्रमाण है। कालसमवाय की अपेक्षा एक समय एक समय के बराबर है और एक मुहूर्त एक मुहूर्त के बराबर है। भावसमवाय की अपेक्षा केवलज्ञान केवलदर्शन के समान है।

५. व्याख्याप्रज्ञप्तिअंग-दो लाख अट्ठाईस हजार पदों के द्वारा क्या जीव है ? क्या जीव नहीं है ? इत्यादि साठ हजार प्रश्नों का व्याख्यान करने वाला यह पाँचवाँ अंग है।

६. नाथधर्मकथांग-पाँच लाख छप्पन हजार पदों के द्वारा सूत्र पौरुषी अर्थात् सिद्धान्तोक्त विधि से तीर्थंकरों की धर्मदेशना, संदेह को प्राप्त गणधरदेव के संदेह को दूर करने की विधि का तथा अनेक प्रकार की कथा और उपकथाओं का वर्णन करने वाला यह अंग ‘‘ज्ञातृधर्मकथांग’’ के नाम से भी जाना जाता है।

७. उपासकाध्ययनांग-ग्यारह लाख सत्तर हजार पदों के द्वारा- गाथार्थ-दर्शन, व्रत, सामायिक, प्रोषधोपवास, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचर्य, आरम्भत्याग, परिग्रहत्याग, अनुमतित्याग और उद्दिष्टत्याग इस प्रकार ग्यारह प्रतिमारूप व्रतों के द्वारा उपासकों-श्रावकों के लक्षण, उनके व्रतारोपण-व्रत धारण करने की विधि और उनके आचरण का वर्णन यह ‘‘उपासकाध्ययन अंग’’ नामक ग्रंथ करता है।

८. अन्त:कृद्दशांग-तेईस लाख अट्ठाईस हजार पदों के द्वारा एक-एक तीर्थंकर के तीर्थ में नाना प्रकार के दारुण उपसर्गों को सहन कर और प्रातिहार्य प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त हुए दश-दश अन्तकृत केवलियों का वर्णन करता है।

उक्त चं तत्त्वार्थभाष्ये-

संसारस्यान्त: कृतो यैस्तेऽन्तकृत: नमि-मतङ्ग-सोमिल-रामपुत्र-सुदर्शन-यमलीक-वलीक-किष्कंविल-पालम्बाष्टपुत्रा इति एते दश वद्र्धमानतीर्थंकरतीर्थे। एवमृषभादीनां त्रयोविंशतेस्तीर्थेष्वन्येऽन्ये, एवं दश दशानगारा: दारुणानुपसर्गान्निर्जित्य कृत्स्नकर्मक्षयादन्तकृतो दशास्यां वण्र्यन्त इति अंतकृद्दशा।


९. अनुत्तरौपपादिकदशांगं-द्विनवतिलक्ष-चतुश्चत्वािंरशत्सहस्रपदै: एकस्मिन् एकस्मिन् तीर्थे दारुणान् बहुविधोपसर्गान् षोढ्वा प्रातिहार्यं लब्ध्वा अनुत्तरविमानं गतान् दश दश महामुनीन् वर्णयति।

उक्तकं च तत्त्वार्थभाष्ये-उपपादो जन्म प्रयोजनमेषां त इमे औपपादिका:, विजय-वैजयन्त-जयन्तापराजितसर्वार्थसिद्धाख्यानि पंचानुत्तराणि। अनुत्तरेष्वौपपादिका: अनुत्तरौपपादिका:, ऋषिदास-धन्य-सुनक्षत्र-कार्तिकेय-नन्द-नन्दन-शालिभद्राभय-वारिषेण-चिलातपुत्रा इत्येते दश वद्र्धमानतीर्थंकरतीर्थें। एवमृषभादीनां त्रयोविंशतेस्तीर्थेष्वन्येऽन्ये एवं दश दशानगारा: दारुणानुपसर्गान्निर्जित्य विजयाद्यनुत्तरेषूत्पन्ना: इत्येवमनुत्तरौपपादिका: दशास्यां वण्र्यन्त इत्यनुत्तरौपपादिकदशा।

१०. प्रश्नव्याकरणांगं-त्रिनवतिलक्ष-षोडशसहस्रपदै: आक्षेपणी विक्षेपणी संवेदनी निर्वेदनी चेति चतुर्विधकथा: कथयति। तत्राक्षेपणी नानाविधैकान्तदृष्टीनां परसमयानां च निराकरणपूर्वकं शुद्धिं कृत्वा षड्द्रव्य-नवपदार्थानां स्वरूपं प्ररूपयति। विक्षेपणी कथा-परसमयेण स्वसमयं दूषयन्तीं पश्चात् नानाविधदृष्टि-शुद्धिं कुर्वन्तीं स्वसमयं स्थापयन्तीं षड्द्रव्यनवपदार्थान् प्ररूपयति। संवेदनीकथा-तीर्थंकर-गणधर-ऋषि-चक्रवर्ति-बलदेव-वासुदेव-सुर-विद्याधराणां ऋद्धी: पुण्यफलसंकथा: कथयति। निर्वेदनीकथा-नरक-तिर्यक्कुमानुषयोनिषु जातिजरामरणव्याधिवेदना-दारिद्र्यादीनि पापफलानि कथयति। इयं संसारशरीरभोगेषु वैराग्योत्पादिनी कथास्ति।

अत्र मध्ये या विक्षेपणीकथा, सा सर्वेषां समक्षे न कथयितव्या। य: कश्चिद् जिनवचनं न जानाति स: कदाचित् परसमयप्रतिपादनपरां इमां कथां श्रुत्वा मिथ्यात्वं गच्छेत्तर्हि तस्य विक्षेपणीकथामनुपदिश्य तिस्र: कथा: एव वक्तव्या: सन्ति। किंच-व्रतनियमशीलतपोयुक्तस्य स्वसमयज्ञातु: जिनशासने अस्थिमज्जा-नुरक्तस्य भोगरतिविरतस्य महामुने: समक्षे सा एषा विक्षेपणीकथापि कथयितव्यास्ति।

एतद् अंगं प्रश्नापेक्षया हत-नष्ट-मुष्टि-चिंता-लाभालाभ-सुखदु:ख-जीवित-मरण-जय-पराजय-नाम-द्रव्यायु:-संख्याश्च निरूपयति।

११. विपाकसूत्रांगं-एककोटि-चतुरशीतिलक्षपदै: पुण्य-पापकर्मणां विपाकं वर्णयति।
एतदेकादशाङ्गानां सर्वपदसमास: चतु:कोटि-पञ्चदशलक्ष-द्विसहस्र-प्रमाणानि।

१२. दृष्टिवादस्य स्वरूपं निरूप्यते-कौत्कल-काण्ठेविद्धि-कौशिकहरिश्मश्रु-मांद्धपिक-रोमश-हारीत-मुण्ड-अश्वलायनादीनां क्रियावाददृष्टीनामशीतिशतम्। मरीचिकपिलोलूक-गाग्र्य-व्याघ्रभूति-वाद्वलि-माठर-मौद्गल्यायनादीना-मक्रियावाददृष्टीनां चतुरशीति:, शाकल्यवल्कल-कुथुमिसात्यमुग्रि-नारायण-कण्व-माध्यंदिन-मोद-पैप्पलाद-बादरायण-स्वेष्टकृदैतिकायन-वसु-जैमिन्यादीना-मज्ञानिकदृष्टीनां सप्तषष्टि:, वशिष्ठ-पाराशर-जतुकर्ण-वाल्मीकि-रोमहर्षणी-सत्यदत्त-व्यासैलापुत्रौपमन्यवैन्द्रदत्तायस्थूणादीनां वैनयिकदृष्टीनां द्वात्रिंशत्। एषां दृष्टिशतानां त्रयाणां त्रिषष्ट्युत्तराणां प्ररूपणं निग्रहश्च दृष्टिवादे क्रियते[१]

तत्त्वार्थभाष्य में कहा भी है-

जिन्होंने संसार का अन्त कर दिया उन्हें ‘‘अन्तकृतकेवली’’ कहते हैं। वर्धमान तीर्थंकर के तीर्थ में नमि, मतंग, सोमिल, रामपुत्र, सुदर्शन, यमलीक, वलीक, किष्कंविल, पालम्ब और अष्टपुत्र ये दश अन्तकृत्केवली हुए हैं। इसी प्रकार ऋषभदेव आदि तेईस तीर्थंकरों के तीर्थ में और दूसरे दश-दश अनगार दारुण उपसर्गों को सहनकर सम्पूर्ण कर्मों के क्षय से अन्तकृतकेवली हुए। इन सबकी दशा का जिसमें वर्णन किया जाता है उसे ‘‘अन्तकृद्दश’’ नामक अंग कहते हैं।

९.अनुत्तरौपपादिकदशांग-बानवे लाख चवालीस हजार पदों द्वारा एक-एक तीर्थंकर के तीर्थ में नाना प्रकार के दारुण उपसर्गों को सहन करके प्रातिहार्यों को प्राप्त करके पाँच अनुत्तर विमानों में गए हुए दश-दश महामुनियों का वर्णन करने वाला यह अंग है। तत्त्वार्थभाष्य में भी कहा है- उपपाद जन्म ही जिनका प्रयोजन है उन्हें औपपादिक कहते हैं। विजय-वैजयन्त-जयन्त-अपराजित और सर्वार्थसिद्धि ये पाँच अनुत्तर विमान हैं। जो इन अनुत्तरों में उपपाद जन्म से पैदा होते हैं उन्हें अनुत्तरौपपादिक कहते हैं। ऋषिदास, धन्य, सुनक्षत्र, कार्तिकेय, आनन्द, नन्दन, शालिभद्र, अभय, वारिषेण और चिलातपुत्र ये दश अनुत्तरौपपादिक वर्धमान तीर्थंकर के तीर्थ में हुए हैं। इसी प्रकार ऋषभनाथ आदि तेईस तीर्थंकरों के तीर्थ में अन्य दश-दश महासाधु दारुण उपसर्गों को जीतकर विजयादिक पाँच अनुत्तरों में उत्पन्न हुए। इस तरह अनुत्तरोें में उत्पन्न होने वाले दश साधुओं का जिसमें वर्णन किया जावे, उसे अनुत्तरौपपादिकदशांग नाम का अंग कहते हैं।

१०. प्रश्नव्याकरणांग-तिरानवे लाख सोलह हजार पदों के द्वारा आक्षेपणी, विक्षेपणी, संवेदनी, निर्वेदनी इन चार कथाओं का वर्णन करता है अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्तमानकाल संबंधी धन-धान्य, लाभ-अलाभ, जीवन-मरण, जय और पराजय संबंधी प्रश्नों के पूछने पर उनके उपाय का लाभ वर्णन करने वाला यह अंग है।

जो नाना प्रकार की एकान्त दृष्टियों का और दूसरे समयों - ग्रंथों का निराकरणपूर्वक शुद्धि करके छह द्रव्य और नौ पदार्थ का प्ररूपण करती है उसे आक्षेपणी कथा कहते हैं। जिसमें पहले परसमय के द्वारा स्वसमय में दोष बतलाये जाते हैं पश्चात् परसमय की आधारभूत अनेक एकान्त दृष्टियों का शोधन करके स्वसमय की स्थापना की जाती है और छह द्रव्य, नव पदार्थों का वर्णन किया जाता है, उसे विक्षेपणी कथा कहते हैं।

तीर्थंकर, गणधर, ऋषि, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, देव और विद्याधरों की ऋद्धियों का एवं उनकी पुण्यकथा का वर्णन करने वाली संवेदनी कथा है। नरक, तिर्यंच और कुमानुष की योनियों में जन्म, जरा, मरण, व्याधि, वेदना और दारिद्र्य आदि पाप-फलों को बतलाने वाले निर्वेदनी कथा है। यह संसार, शरीर और भोगों में वैराग्य को उत्पन्न करने वाली कथा है।

यहाँ समस्त कथाओं के मध्य में जो विक्षेपणी कथा है उसे सबके सामने नहीं कहना चाहिए। क्योंकि जिसे जिनवचनों का ज्ञान नहीं है वह कदाचित् परसमय का प्रतिपादन करने वाली इन कथाओं को सुनकर मिथ्यात्वपने को स्वीकार कर सकता है अत: उसके लिए विक्षेपणी कथा का उपदेश न देकर शेष तीन कथाओं को ही कहना चाहिए-वे ही उसके लिए सुनने योग्य हैं।

दूसरी बात यह है कि जो व्रत, नियम, शील, तप से युक्त स्वसमय के ज्ञाता हैं, जिनशासन में जिनके अस्थि, मज्जा सब अनुरक्त हैं अर्थात् जिस तरह हड्डियों के मध्य में रहने वाला रस हड्डी से संसक्त होकर ही शरीर में रहता है उसी तरह जो जिनशासन में अनुरक्त हैं, जिनवचनों मेें जिसकी किसी प्रकार की विचिकित्सा-ग्लानि नहीं है, जो भोग और रति से विरक्त हैं ऐसे महामुनि के सामने ही उस विक्षेपणी कथा का वर्णन करना चाहिए। यह दशवाँ अंग प्रश्न की अपेक्षा से हत, नष्ट, मुष्टि, चिन्ता, लाभ-अलाभ, सुख-दु:ख, जीवन-मरण, जय-पराजय, नाम, द्रव्य, आयु और संख्या का निरूपण भी करता है।

११. विपाकसूत्रांग-एक करोड़ चौरासी लाख पदों के द्वारा पुण्य-पाप कर्मों के विपाक-फल का वर्णन करता है। इन ग्यारह अंगों के कुल पदों का जोड़ चार करोड़ पन्द्रह लाख दो हजार प्रमाण है।

१२. अब आगे बारहवें दृष्टिवाद अंग का निरूपण करते हैं- इसमें कौत्कल, काण्ठेविद्धि, कौशिक, हरिश्मश्रु, मांधपिक, रोमश, हारीत, मुण्ड और अश्वलायन आदि क्रियावादियों के एक सौ अस्सी मतों का मरीचि, कपिल, उलूक, गाग्र्य, व्याघ्रभूति, वाद्बलि, माठर और मौद्गल्यायन आदि अक्रियावादियों के चौरासी मतों का, शाकल्य, वल्कल, कुथुमि, सात्यमुग्रि, नारायण, कण्व, माध्यंदिन, मोद, पैप्पलाद, वादरायण, स्वेष्टकृत, ऐतिकायन, वसु, जैमिनी आदि अज्ञानवादियों के सड़सठ (६७) मतों का तथा वशिष्ट, पाराशर, जतुकर्ण, वाल्मीकि,रोमहर्षिणी, सत्यदत्त, व्यास, एलापुत्र, औपमन्यु, ऐन्द्रदत्त और अयस्थूल आदि वैनयिकवादियों के बत्तीस मतों का वर्णन और निराकरण किया गया है। पूर्व में कहे हुए क्रियावादी आदि के कुल भेद तीन सौ त्रेसठ होते हैं। इस प्रकार इन ३६३ पाखंड मतों का वर्णन और निराकरण दृष्टिवाद अंग में किया गया है।

अस्य दृष्टिवादाङ्गस्य पंचभेदा:

अस्य दृष्टिवादाङ्गस्य पंचभेदा: सन्ति-परिकर्म-सूत्र-प्रथमानुयोग-पूर्वगत-चूलिकाश्चेति।

परिकर्मापि पंचविधं-चन्द्रप्रज्ञप्ति-सूर्यप्रज्ञप्ति-जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति-द्वीपसागरप्रज्ञप्ति-व्याख्याप्रज्ञप्तिभेदात्।

१. तत्र चन्द्रप्रज्ञप्ति:-षट्त्रिंशल्लक्ष-पंचसहस्रपदै: चन्द्रायु:-परिवार-ऋद्धि-गति-बिंबोत्सेधादीन् वर्णयति।

२. सूर्यप्रज्ञप्ति:-पंचलक्ष-त्रिसहस्रपदै: सूर्यस्यायु:-भोगोपभोग-परिवार-ऋद्धि-गति-बिम्बोत्सेध-दिन-किरण-उद्योतादीन् वर्णयति।

३. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति:-त्रयलक्षपंचविंशतिसहस्रपदै: नानाविध-मनुष्याणां भोगभूमिज-कर्मभूमिजानां अन्येषां च पर्वतद्रह-नदी-वेदिका-वर्ष-आवास-अकृत्रिमजिनालयादीनां कथनं करोति।

४. द्वीपसागरप्रज्ञप्ति:-द्वापंञ्चाशल्लक्ष-षट्त्रिंशत्सहस्रपदै: उद्धारपल्यप्रमाणेन द्वीपसागरप्रमाणं अन्यमपि द्वीपसागरान्तर्गतपदार्थानां बहुभेदं वर्णयति।
 
५. व्याख्याप्रज्ञप्ति:-चतुरशीतिलक्ष-षट्त्रिंशत्सहस्रपदै: रूपि-अजीवद्रव्यं, अरूपि-अजीवद्रव्यं भव्यसिद्ध-अभव्यसिद्धजीवराशिं च वर्णयति।

दृष्टिवादस्य ‘सूत्रं’ नाम द्वितीयभेदं-अष्टाशीतिलक्षपदै: जीव: एकान्तेन अबन्धक एव अलेपक: अकर्ता अभोक्ता निर्गुण: सर्वगत एव इत्यादि त्रिषष्टिअधिकत्रयशतमतानां कथनं करोति। इदं त्रैराशिकवाद-नियतिवाद-विज्ञानवाद-शब्दवाद-प्रधानवाद-द्रव्यवाद-पुरुषवादांश्च वर्णयति।
प्रथमानुयोगनाम तृतीयभेद:-पंचसहस्रपदै: पुराणं वर्णयति।
उक्तकं च-
बारसविहं पुराणं, जगदिट्ठं जिणवरेहि सव्वेहिं।
तं सव्वं वण्णेदि हु, जिणवंसे रायवंसे य।।
पूर्वगतं नाम चतुर्थभेदं-पंचनवतिकोटि-पंचाशल्लक्ष-पंचपदै: उत्पाद-व्यय-धु्रवत्वादीन् वर्णयति। अस्य चतुर्दशभेदा अग्रे वक्ष्यन्ते।

हिंदी अनुवाद

इस दृष्टिवाद अंग के पाँच भेद हैं-परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका। परिकर्म भी पाँच प्रकार का है-चन्द्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, द्वीपसागरप्रज्ञप्ति, व्याख्याप्रज्ञप्ति।

१. उनमें से चन्द्रप्रज्ञप्ति नाम का परिकर्म छत्तीस लाख पाँच हजार पदों के द्वारा चन्द्रमा की आयु, परिवार, ऋद्धि, गति और बिम्ब की ऊँचाई आदि का वर्णन करता है।

२. सूर्यप्रज्ञप्ति नाम का परिकर्म पाँच लाख तीन हजार पदों के द्वारा सूर्य की आयु, भोग, उपभोग, परिवार, ऋद्धि, गति, बिम्ब की ऊँचाई, दिन की हानि-वृद्धि, किरणों का प्रमाण और प्रकाश आदि का वर्णन करता है।

३. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति नाम का परिकर्म तीन लाख पच्चीस हजार पदों के द्वारा जम्बूद्वीपस्थ भोगभूमि और कर्मभूमि में उत्पन्न हुए नाना प्रकार के मनुष्य तथा अन्य तिर्यंच आदि का और पर्वत, द्रह, नदी, वेदिका, वर्ष, आवास, अकृत्रिम जिनालय आदि का वर्णन करता है।

४. द्वीपसागर प्रज्ञप्ति नाम का परिकर्म बावनलाख छत्तीस हजार पदों के द्वारा उद्धार पल्य से द्वीप और समुद्रों के प्रमाण का तथा द्वीप सागर के अन्तर्भूत नाना प्रकार के अन्य पदार्थों का वर्णन करता है।

५. व्याख्याप्रज्ञप्ति नाम का परिकर्म चौरासी लाख छत्तीस हजार पदों के द्वारा रूपी अजीवद्रव्य अर्थात् पुद्गल, अरूपी अजीवद्रव्य अर्थात् धर्म, अधर्म, आकाश और काल, भव्यसिद्ध और अभव्यसिद्ध जीवराशि का वर्णन करता है।

दृष्टिवाद अंग के द्वितीय भेद ‘‘सूत्र’’ का वर्णन करते हैं-अठासी (८८) लाख पदों के द्वारा जीव एकान्त से अबन्धक है, अलेपक है, अकर्ता है, अभोक्ता है, निर्गुण है, सर्वगत ही है इत्यादि ३६३ (तीन सौ त्रेसठ) मतों का वर्णन करने वाला ‘‘सूत्र’’ है। यह सूत्र नामक अर्थाधिकार त्रैराशिकवाद, नियतिवाद, विज्ञानवाद, शब्दवाद, प्रधानवाद, द्रव्यवाद और पुरुषवाद का भी वर्णन करता है। दृष्टिवाद अंंग के तृतीय भेद ‘‘प्रथमानुयोग’’ में पाँच हजार पदों के द्वारा पुराण गं्रथों का वर्णन किया गया है। कहा भी है-

गाथार्थ-जिनेन्द्रदेव ने जगत में बारह प्रकार के पुराणों का उपदेश दिया है। वे समस्त पुराण जिनवंश और राजवंशों का वर्णन करते हैं।

विशेषार्थ-प्रथमानुयोग में जिस बारह पुराणों के उपदेश का कथन आया है, उनके नाम इस प्रकार हैं-

१. अरिहंत अर्थात् तीर्थंकरों का पुराण

२. चक्रवर्तियों का पुराण

३. विद्याधरों का पुराण

४. नारायण-प्रतिनारायण पुराण

५. चारण ऋद्धिधारियों का प्रमाण

६. प्रज्ञाश्रमणों के वंश का वर्णन करने वाले पुराण

७. कुरुवंश पुराण

८. हरिवंश पुराण

९. इक्ष्वाकुवंश पुराण

१०. काश्यपवंश पुराण

११. वादियों के वंश का वर्णन करने वाला पुराण

१२. नाथवंश पुराण।

अब पूर्वगत नाम के चतुर्थ भेद का वर्णन करते हैं-पंचानवे करोड़, पचास लाख, पाँच पदों द्वारा उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य आदि का वर्णन करने वाला पूर्वगत अर्थाधिकार है। इसके चौदह भेद आगे कहेंगे।

दृष्टिवादस्य पंचमभेदं चूलिकानाम

दृष्टिवादस्य पंचमभेदं चूलिकानाम-इयं पंचविधा-जलगता स्थलगता मायागता रूपगता आकाशगता चेति।

१. तत्र जलगता-द्विकोटि-नवलक्ष-एकोननवतिसहस्र-द्विशतपदै: जलगमन-जलस्तंभनकारण-मंत्र-तंत्र-तपश्चरणानि वर्णयति।

२. स्थलगता-एतावद्भिरेव पदै: भूमिगमन-कारण-मंत्र-तंत्र-तपश्चरणानि वास्तुविद्यां भूमिसंबंधमन्यमपि शुभाशुभकारणं वर्णयति।

३. मायागता-एतावद्भिरेव पदै: इन्द्रजालं वर्णयति।

४. रूपगता-एतावद्भिरेव पदै: सिंह-अश्व-हरिणादि-रूपाकारेण परिणमनहेतु-मंत्र-तंत्र-तपश्चरणानि चित्र-काष्ठ-लेप्य-लयन-कर्मादिलक्षणं च वर्णयति।

५. आकाशगता-तावद्भिरेव पदै: आकाशगमन-निमित्त-मंत्र-तंत्र-तपश्चरणानि वर्णयति।
 
चूलिकानां सर्वपदसंख्या: दशकोटि-एकोनपंचाशल्लक्ष-षट्चत्वारिंशत्सहस्राणि सन्ति।
अधुना चतुर्दशपूर्वाणां कथनं क्रियते-तद्यथा-उत्पादपूर्वं अग्रायणीयं वीर्यानुप्रवादं अस्तिनास्तिप्रवादं ज्ञानप्रवादं सत्यप्रवादं आत्मप्रवादं प्रत्याख्याननामधेयं विद्यानुप्रवादं कल्याणनामधेयं प्राणावायं क्रियाविशालं लोकबिन्दुसारमिति।
एतच्चतुर्दशपूर्वाणां क्रमशो यानि वस्तूनि तानि वण्र्यन्ते। उक्तअकं च गोम्मटसारे[२]-
दस चोदसट्ठ अट्ठारसयं बारं च बार सोलं च।
वीसं तीसं पण्णारसं च दस चदुसु वत्थूणं।।३४४।।
प्रथम उत्पादपूर्वे दश वस्तूनि, अग्रायणीयपूर्वे चतुर्दशवस्तूनि इत्यादिना क्रमेण योजयितव्यानि। एवैकवस्तुनि विंशति-विंशतिप्राभृतानि सन्ति।

हिंदी अनुवाद

दृष्टिवाद अंग के पंचमभेद का नाम चूलिका है। यह पाँच प्रकार की है-जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता और आकाशगता।

१. उनमें से जलगता चूलिका में दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ (२०९८९२००) पदों के द्वारा जल में गमन और जलस्तम्भन के कारणभूत मंत्र-तंत्र और तपश्चर्यारूप अतिशय आदि का वर्णन आता है।

२. स्थलगता चूलिका उतने ही अर्थात् दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ पदों द्वारा पृथ्वी के भीतर गमन करने के कारणभूत मंत्र, तंत्र और तपश्चरणरूप अतिशय आदि का तथा वास्तुविद्या और भूमि संबंधी अन्य शुभाशुभ कारणों का भी वर्णन करती है।

३. मायागता चूलिका भी उपर्युक्त पदों द्वारा इन्द्रजाल आदि के कारणों का वर्णन करती है।

४. रूपगता चूलिका में इतने ही पदों द्वारा सिंह, घोड़ा, हिरण आदि के आकाररूप से परिणमन करने के कारणभूत मंत्र-तंत्र का तथा चित्रकर्म, काष्ठकर्म, लेप्यकर्म और लेनकर्म आदि के लक्षण का वर्णन है।

५. आकाशगता चूलिका भी उपर्युक्त २०९८९२०० पदोें द्वारा आकाशगमन में निमित्तभूत मंत्र, तंत्र, तपश्चरण का वर्णन करती है।

इन पाँचों ही चूलिका की समस्त पद संख्या दश करोड़ उनचास लाख छियालिस हजार आती है। अब चौदहपूर्वों का कथन किया जाता है, वह इस प्रकार है- उत्पादपूर्व, अग्रायणीयपूर्व, वीर्यानुप्रवादपूर्व, अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व, ज्ञानप्रवादपूर्व, सत्यप्रवादपूर्व, आत्मप्रवादपूर्व, प्रत्याख्यानपूर्व, विद्यानुप्रवादपूर्व, कल्याणप्रवादपूर्व, प्राणावायपूर्व, क्रियाविशालपूर्व और लोकबिन्दुसारपूर्व। इन चौदह पूर्वों की क्रम से जो वस्तु हैं उनका वर्णन करते हैं। गोम्मटसार में कहा भी है-

गाथार्थ-पूर्व ज्ञान के चौदह भेद हैं जिनमें से प्रत्येक में क्रम से दश, चौदह, आठ, अठारह, बारह, बारह, सोलह, बीस, तीस, पन्द्रह, दश, दश, दश, दश वस्तु नामक अधिकार हैं। प्रथम उत्पादपूर्व में दश वस्तु हैं, अग्रायणीय पूर्व में चौदह वस्तु हैं इत्यादि क्रम से इन्हें प्रत्येक पूर्व के साथ जोड़ लेना चाहिए और एक-एक वस्तु में बीस-बीस प्राभृत होते हैं।

उक्तं च गोम्मटसार जीवकाण्डे-[३]

पणणवदिसया वत्थू, पाहुडया तियसहस्सणवयसया।

एदेसु चोद्दसेसु वि, पुव्वेसु हवंति मिलिदाणि।।३४७।।
तात्पर्यमेतत्-चतुर्दशपूर्वाणां समस्तवस्तूनि पंचनवत्यधिकशतानि (१९५)। पुन: सम्पूर्णप्राभृतानां प्रमाणं त्रयसहस्र-नवशतानि सन्ति (३९००)। ‘‘एवैकप्राभृतानां चतुर्विंशति-चतुर्विंशति अनुयोगद्वारसंज्ञिता अर्थाधिकारा: भवन्तीति।’’[४]

१. तत्र उत्पादपूर्वं-दशवस्तुगत-द्विशतप्राभृतानां एककोटिपदै: जीव-काल-पुद्गलानां उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्वं वर्णयति।

२. अग्रायणीयपूर्वं-चतुर्दशवस्तूनां अशीत्यधिकद्विशतप्राभृतानां षण्णवतिलक्षपदै: अंगानां अग्रं वर्णयति। तच्च सप्तशतसुनय-दुर्णय-पंचास्तिकाय-षड्द्रव्य-सप्ततत्त्व-नवपदार्थादीन् वर्णयति।[५]

३. वीर्यानुप्रवादपूर्वं-अष्टवस्तूनां षष्ट्युत्तरशतप्राभृतानां सप्ततिलक्षपदै: आत्मवीर्यं परवीर्यं उभयवीर्यं क्षेत्रवीर्यं भववीर्यं तपोवीर्यं च कथयति।

४. अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वं-अष्टादशवस्तूनां षष्ट्युत्तरत्रिशतप्राभृतानां षष्टिलक्षपदै: जीवाजीवानां अस्तिनास्तित्वं निगदति।

५. ज्ञानप्रवादपूर्वं-द्वादशवस्तूनां चत्वािंरशदधिक-द्विशतप्राभृतानां एकोनकोटिपदै: पंचज्ञानानि त्रीणि अज्ञानानि वदति।

६. सत्यप्रवादपूर्वं-द्वादशवस्तूनां चत्वािंरशदधिक-द्विशतप्राभृतानां षडुत्तर-एककोटिपदै: वाग्गुप्ति: वाक्संस्कारकारणं प्रयोगो द्वादशधा भाषा वक्तारश्च अनेकप्रकारं मृषाभिधानं दशप्रकारश्च सत्यसद्भावो यत्र निरूपितस्तत्सत्यप्रवादं प्ररूपयति।

७. आत्मप्रवादपूर्वं-षोडशवस्तूनां विंशत्यधिक-त्रिशतप्राभृतानां षड्विंशतिकोटिपदै: आत्मनां स्वरूपं विस्तरेण कथयति।

८. कर्मप्रवादपूर्वं-विंशतिवस्तूनां चतु:शतप्राभृतानां एककोटि-अशीतिलक्षपदै: अष्टविधकर्माणि प्ररूपयति।

९. प्रत्याख्यानपूर्वं-त्रिंशत्वस्तूनां षट्शतप्राभृतानां चतुरशीतिलक्षपदै: द्रव्य-भावपरिमितापरिमित-प्रत्याख्यानं उपवासविधिं पंचसमिती: त्रिगुप्तीश्च प्ररूपयति।
 
१०. विद्यानुवादपूर्वं-पंचदशवस्तूनां त्रयशतप्राभृतानां एककोटिदशलक्षपदै: अंगुष्ठप्रसेनादीनां अल्पविद्यानां सप्तशतानि रोहिण्यादीनां महाविद्यानां पंचशतानि अंतरिक्षभौमाङ्ग-स्वर-स्वप्न-लक्षण-व्यञ्जन-छिन्नान्यष्टौ महानिमित्तानि च कथयति।

११. कल्याणवादपूर्वं-दशवस्तूनां द्विशतप्राभृतानां षड्विंशतिकोटिपदै: रविशशिनक्षत्रतारागणानां चारोपपादगतिविपर्ययफलानि शकुनव्याहृतमर्हद्बलदेववासुदेवचक्रधरादीनां गर्भावतरणादिमहाकल्याणानि च कथयति।

१२. प्राणावायपूर्वं-दशवस्तूनां द्विशतप्राभृतानां त्रयोदशकोटिपदै: कायचिकित्साद्यष्टाङ्गमायुर्वेदं भूतिकर्म जांगुलिप्रक्रमं प्राणापानविभागं च विस्तरेण कथयति।

१३. क्रियाविशालपूर्वं-दशवस्तूनां द्विशतप्राभृतानां नवकोटिपदै: लेखादिका: द्वासप्ततिकला: स्त्रैणाँश्चतु:षष्टिगुणान् शिल्पानि काव्यगुणदोषक्रियां छन्दोविचितिक्रियां च कथयति।

१४. लोकविन्दुसारपूर्वं-दशवस्तूनां द्विशतप्राभृतानां द्वादशकोटि-पंचाशल्लक्षपदै: अष्टौ व्यवहारान् चत्वारि बीजानि मोक्षगमनक्रिया: मोक्षसुखं च कथयति।[६]

गोम्मटसार जीवकांड में कहा भी है-

गाथार्थ-इन चौदह पूर्वों की सम्पूर्ण वस्तुओं का जोड़ एक सौ पंचानवे (१९५) होता है और एक-एक वस्तु में बीस-बीस प्राभृत होते हैं इसलिए सम्पूर्ण प्राभृतों का प्रमाण तीन हजार नौ सौ (३९००) होता है। तात्पर्य यह है कि चौदह पूर्वों की समस्त वस्तुएँ एक सौ पंचानवे हैं और सम्पूर्ण प्राभृतों का प्रमाण तीन हजार नौ सौ है। ‘‘एक-एक प्राभृतों के चौबीस-चौबीस अनुयोग द्वारों के नाम से अर्थाधिकार होते हैं।’’ ऐसा कसायपाहुड़ में कहा है।

१. उनमें से उत्पादपूर्व दश वस्तुगत दो सौ प्राभृतों के एक करोड़ पदों द्वारा जीव-काल और पुद्गलों के उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य का वर्णन करता है।

२. अग्रायणीय पूर्व-चौदह वस्तुगत दो सौ अस्सी प्राभृतों के छ्यानवे लाख पदों द्वारा अंगों के अग्र-परिमाण का कथन करता है और वह सात सौ सुनय-दुर्नय, पाँच अस्तिकाय, छहद्रव्य, साततत्त्व, नवपदार्थ आदि का वर्णन भी करता है।

३. वीर्यानुप्रवाद पूर्व-इसमें आठ वस्तुगत एक सौ साठ प्राभृतों का सत्तर लाख पदों के द्वारा आत्मवीर्य, परवीर्य, उभयवीर्य, क्षेत्रवीर्य, भववीर्य और तपोवीर्य का वर्णन है।

४. अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व-अठारह वस्तुगत तीन सौ आठ प्राभृतों के साठ लाख पदों द्वारा जीव-अजीव के अस्तित्त्व और नास्तित्त्व धर्म का वर्णन करता है।

५. ज्ञानप्रवाद पूर्व-बारहवस्तुगत दो सौ चालीस प्राभृतों के एक कम एक करोड़ पदों द्वारा पाँच ज्ञान, तीन अज्ञानों का वर्णन करता है।

६. सत्यप्रवादपूर्व-बारह वस्तुगत दो सौ चालीस प्राभृतों के एक करोड़ छह पदों द्वारा वचनगुप्ति, वाक्संस्कार के कारण, वचनप्रयोग, बारह प्रकार की भाषा, अनेक प्रकार के वक्ता, अनेक प्रकार के असत्यवचन और दश प्रकार के सत्यवचन इन सबका वर्णन करता है।

भावार्थ-दश प्रकार के सत्य के नाम इस प्रकार हैं-नामसत्य, रूपसत्य, स्थापनासत्य, प्रतीतिसत्य, संवृतिसत्य, संयोजनासत्य, जनपदसत्य, देशसत्य, भावसत्य और समयसत्य के भेद से सत्यवचन दश प्रकार का है। इनका विशेष वर्णन गोम्मटसार जीवकाण्ड से देखना चाहिए।

७. आत्मप्रवादपूर्व-सोलह वस्तुगत तीन सौ बीस प्राभृतों के छब्बीस करोड़ पदों द्वारा जीव वेत्ता है, विष्णु है, भोक्ता है, बुद्ध है इत्यादिरूप से आत्मा का वर्णन विस्तार से करता है।

८. कर्मप्रवादपूर्व-बीस वस्तुगत चार सौ प्राभृतों के एक करोड़ अस्सी लाख पदों द्वारा आठ प्रकार के कर्मों का वर्णन करता है।

९. प्रत्याख्यानपूर्व-तीस वस्तुगत छह सौ प्राभृतों के चौरासी लाख पदों द्वारा द्रव्य, भाव आदि की अपेक्षा परिमित कालरूप और अपरिमित कालरूप प्रत्याख्यान, उपवास विधि, पाँच समिति और तीन गुप्तियों का वर्णन करता है।

१०. विद्यानुवादपूर्व-पन्द्रह वस्तुगत तीन सौ प्राभृतों के एक करोड़ दश लाख पदों द्वारा अंगुष्ठप्रसेना आदि सात सौ अल्प विद्याओं का, रोहिणी आदि पाँच सौ महाविद्याओं का और अन्तरिक्ष, भौम, अंग, स्वर, स्वप्न, लक्षण, व्यंजन और चिन्ह इन आठ महानिमित्तों का वर्णन करता है।

११. कल्याणवादपूर्व-दश वस्तुगत दो सौ प्राभृतों के छब्बीस करोड़ पदों द्वारा सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और तारागणों के चार क्षेत्र, उपपाद स्थान, गति, वक्रगति तथा उनके फलों का, पक्षी के शब्दों का और अरिहंत अर्थात् तीर्थंकर, बलदेव, वासुदेव और चक्रवर्ती आदि के गर्भावतार आदि महाकल्याणकों का वर्णन करता है।

१२. प्राणावायपूर्व-दश वस्तुओं का, दो सौ प्राभृतों के तेरह करोड़ पदों के द्वारा कायचिकित्सा आदि अष्टांग आयुर्वेद को, भूतिकर्म अर्थात् शरीर आदि की रक्षा के लिए किए गए भस्मलेपन सूत्रबन्धनादि कर्म, जांगुलि प्रक्रम (विषविद्या) और श्वासोच्छ्वास के विभाग को विस्तार से बतलाने वाला प्राणावायपूर्व है।

१३. क्रियाविशालपूर्व-दशवस्तुगत दो सौ प्राभृतों के नौ करोड़ पदों के द्वारा लेखनकला आदि बहत्तर कलाओं का, स्त्री सम्बन्धी चौंसठ गुणों का, शिल्पकला का, काव्यसम्बन्धी गुण-दोष विधि का और छन्दनिर्माण कला का वर्णन करने वाला क्रियाविशालपूर्व है।

१४. लोकविन्दुसारपूर्व-दशवस्तुगत दो सौ प्राभृतों के बारह करोड़ पचास लाख पदों के द्वारा आठ प्रकार के व्यवहारों का, चार प्रकार के बीजों का, मोक्ष को ले जाने वाली क्रिया का और मोक्षसुख का वर्णन करने वाला यह चौदहवाँ पूर्व है।

अस्मिन् षट्खण्डागममहाशास्त्रे अग्रायणीयनामद्वितीयपूर्वस्य

अस्मिन् षट्खण्डागममहाशास्त्रे अग्रायणीयनामद्वितीयपूर्वस्य पंचमवस्तुन: चयनलब्धिनाम्न: चतुर्थप्राभृत- ‘‘कर्मप्रकृतिप्राभृतनाम्न:’’ प्रयोजनं अस्ति। एतस्य स्पष्टीकरणमग्रे वक्ष्यते।

अधुना पदभेदा: कथ्यन्ते-
तिविहिं पदं तु भणिदं, अत्थपद-पमाण-मज्झिमपदं ति।
मज्झिमपदेण भणिदा, पुव्वंगाणं पदविभागा।।[७]
पदानि त्रिविधानि-अर्थपदप्रमाणपदमध्यमपदभेदात्। तत्रार्थपदं अनियताक्षराणां समूहो यथा-ग्रन्थमानय देवपूजां कुरुध्वम् इत्यादय:। प्रमाणपदं अष्टाद्यक्षराणां समूहो यथा-अनुष्टुप्छन्दसि एवैकस्मिन् पादे, अष्टौ अक्षराणि इत्यादय:। मध्यमपदं-अस्य पदस्य अक्षराणां प्रमाणं सर्वकालं निश्चितमेव।
उक्त च-
परमागमे अङ्गपूर्वाणां पदसंख्या मध्यमपदैरेव गीयन्ते। अस्यैकमध्यमपदस्याक्षराणां प्रमाणं कथ्यते-
सोलससयचउतीसा, कोडी तियसीदिलक्खयं चेव।
सत्तसहस्साट्ठसया, अट्ठासीदी य पदवण्णा।।[८]
एकस्मिन् मध्यमपदे षोडशशतचतुस्त्रिंशत्कोटि-त्र्यशीतिलक्ष-सप्तसहस्र-अष्टशत-अष्टाशीति-अक्षराणि सन्ति। अनेन प्रकारेण द्वादशांगस्य समस्तपदानां संख्या: कथ्यन्ते-
बारुत्तरसयकोडी, तेसीदी तहय होंति लक्खाणं।
अट्ठावण्णसहस्सा, पंचेव पदाणि अंगाणं।।३५०।।<ref.गोम्मटसार जीवकाण्ड, ज्ञानमार्गणा, गा. ३५०।</ref>
एकशतद्वादशकोटि-त्र्यशीतिलक्ष-अष्टपंचाशत्सहस्र-पंचपदानि द्वादशांगे सन्तीत्यर्थ:।
अधुना अंगबाह्यस्याक्षराणि कथ्यन्ते-
अडकोडिएयलक्खा, अट्ठसहस्सा य एयसदिगं च।
पण्णत्तरि वण्णाओ, पइण्णयाणं पमाणं तु।।३५१।।[९]
अष्टकोटि-एकलक्ष-अष्टसहस्र-एकशत-पंचसप्तति अक्षराणि प्रकीर्णकअंगबाह्ये सन्तीत्यर्थ:। एतावद्भि: अक्षरैर्मध्यमपदं न भवति अतएव इयद्भि: अक्षरै: अंगपूर्वाणां पदसंख्या न भवति तस्मात् कारणादेव एतदक्षरै: ग्रथितश्रुतस्य अंगबाह्यसंज्ञा वर्तते। अस्यांगबाह्यस्य चतुर्दशभेदा: सन्ति-सामायिक-चतुर्विंशतिस्तव-वंदना-प्रतिक्रमण-वैनयिक-कृतिकर्म-दशवैकालिक-उत्तराध्ययन-कल्पव्यवहार-कल्पाकल्प-महाकल्प-पुण्डरीक-महापुण्डरीक-निषिद्धिकाश्चेति।

हिंदी अनुवाद

इस षट्खंडागम महाशास्त्र में अग्रायणीय नामक द्वितीय पूर्व के पंचम वस्तु की चयन लब्धि नामके चतुर्थप्राभृत ‘‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’’ नाम से प्रयोजन है। इसका स्पष्टीकरण आगे करेंगे। अब पद भेदों को कहते हैं-

श्लोकार्थ—अर्थपद, प्रमाणपद और मध्यमपद ये पद के तीन भेद माने गए हैं। इनमें से मध्यम पद के द्वारा अंग एवं पूर्वों का पदविभाग किया गया है।

पद तीन प्रकार के होते हैं-अर्थपद, प्रमाणपद और मध्यमपद। इनमें से अनियत अक्षरों का समूह ‘‘अर्थपद’’ है। जैसे-ग्रंथ को लाओ, देवपूजा करो इत्यादि। आठ अक्षरों के समूह को ‘‘प्रमाणपद’’ कहते हैं। यथा—अनुष्टुप् छंद के एक-एक चरण में आठ-आठ अक्षर होते हैं इत्यादि। मध्यमपद के अक्षरों का प्रमाण सर्वकाल (हमेशा) निश्चित ही रहता है। कहा भी है-परमागम में अंग पूर्वों की पदसंख्या मध्यम पदों के द्वारा ही बतलाई गई है। उस एक मध्यमपद के अक्षरों का प्रमाण कहते हैं-

गाथार्थ-सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी अक्षरों का एक मध्यम पद होता है। अर्थात् एक मध्यमपद में सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी अक्षर होते हैं। इस प्रकार से द्वादशांग के समस्त पदों की संख्या कहते हैं-

गाथार्थ-द्वादशांग के सब मध्यम पदों का प्रमाण एक सौ बारह करोड़ तिरासी लाख अठावन हजार पाँच है। अर्थात् ११२८३५८००५ पद द्वादशांग में होते हैं ऐसा अभिप्राय है। अब अंगबाह्य के अक्षरों की संख्या कहते हैं-

गाथार्थ-प्रकीर्णक अर्थात् सामायिक आदि चौदह अंग बाह्यों के अक्षर आठ करोड़ एक लाख आठ हजार एक सौ पिचहत्तर प्रमाण होते हैं। अर्थात् ८०१०८१७५ अक्षर प्रकीर्णक-अंगबाह्य में होते हैं ऐसा अर्थ हुआ।

इतने अक्षरों से मध्यमपद नहीं होते हैं अतएव इतने अक्षरों के द्वारा अंग पूर्व की पदसंख्या नहीं बनती है, इसी कारण इन अक्षरों के द्वारा ग्रथित—गूूँथे गये-वर्णित किए गए श्रुत की ‘अंगबाह्य’ संज्ञा मानी गई है। इस अंगबाह्य के चौदह भेद हैं- सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्पाकल्प, महाकल्प, पुण्डरीक, महापुण्डरीक और निषिद्धिका ये चौदह भेद अंगबाह्य के हैं।


. तत्र सामायिकनाम श्रुतं

१. तत्र सामायिकनाम श्रुतं-नाम-स्थापना-द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावेषु समताविधानं वर्णयति। उक्त चान्यत्र-‘‘तीसु वि संज्झासु पक्खमासदिणेसु वा सगिच्छिदबेलासु वा बज्झंतरंगासेसत्थेसु संपरायनिरोहो वा सामायियं णाम।’’[१०]


२. चतुर्विंशतिस्तवचतुर्विंशति-तीर्थकराणां वंदनाविधि-तन्नाम-संस्थान-उत्सेध-पंचमहाकल्याण-चतुस्त्रिंशदतिशयस्वरूपं तीर्थकरवंदनासफलत्वं च प्ररूपयति।

३. वंदना-एकजिन-जिनालयविषय-वंदनाया: निरवद्यभावं कथयति।

४. प्रतिक्रमणं-कालं पुरुषं च आश्रित्य सप्तविधप्रतिक्रमणानि निरूपयति।

५. वैनयिकं-ज्ञान-दर्शन-चारित्र-तप-उपचारविनयान् वर्णयति।

६. कृतिकर्म-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधूनां पूजाविधानं कथयति।
अन्यत्र चोत्तं-तस्स आदाहीण-तिक्खुत्त-पदाहिण-तिओणद-चदुसिर-वारसा वत्तादिलक्खणं विहाणं फलं च किदियम्मं वण्णेदि।।’’[११]

७. दशवैकालिकआचार-गोचरविधिं वर्णयति।

८. उत्तराध्ययनंउत्तरपदानि वर्णयति। ‘‘तच्च चतुर्विधोपसर्गाणां द्वाविंशति-परीषहाणां च सहनविधानं तत्फलं एवं प्रश्ने एवमुत्तरमित्युरविधानं वर्णयति।’’[१२]

९. कल्पव्यवहारसाधूनां योग्यमाचरणं अकल्पसेवनेभ्य: प्रायश्चित्तं कथयति।

१०. कल्पाकल्पिकंसाधूनां यत्कल्प्यते यच्च न कल्प्यते तत्सर्वं वर्णयति।

११. महाकल्पिकं-काल-संहननानि आश्रित्य साधु-प्रायोग्य-द्रव्य-क्षेत्रादीनां कथनं करोति।

१२. पुण्डरीकं-चतुर्विधदेवेषूपपादकारण-अनुष्ठानानि प्ररूपयति।

१३. महापुण्डरीकं-सकलेन्द्र-प्रतीन्द्रेषु उत्पत्तिकारणं कथयति।

१४. निषिद्धिका-बहुविध-प्रायश्चित्तविधानकथनं करोति।[१३]

हिंदी अनुवाद

१. इनमें से सामायिक नामका श्रुत अंगबाह्य अर्थाधिकार नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव इन छह भेदों द्वारा समता भाव के विधान का वर्णन करता है। अन्यत्र कहा भी है-तीनों ही सन्ध्याओं में या पक्ष और मास के संधि दिनों में या अपने इच्छित समय में बाह्य और अंतरंग समस्त पदार्थों में कषाय का निरोध करना सामायिक है।

२. चतुर्विंशतिस्तव श्रुत उस-उस काल संबंधी चौबीस तीर्थंकरों की वंदना करने की विधि, उनके नाम, संस्थान, उत्सेध, पाँच महाकल्याणक, चौंतीस अतिशयों के स्वरूप और तीर्थंकरों की वंदना की सफलता का वर्णन करता है।

३. वंदना नाम का अर्थाधिकार एक जिनेन्द्रदेव सम्बंधी और उनके जिनालय संबंधी वंदना के निरवद्यभाव का अर्थात् प्रशस्तरूप भाव का वर्णन करता है।

४. प्रतिक्रमण नामका अर्थाधिकार काल और पुरुष का आश्रय लेकर सात प्रकार के प्रतिक्रमणों का निरूपण करता है। भावार्थ-प्रमाद कृत दैवसिक आदि दोषों का निराकरण जिसके द्वारा किया जाता है उसे प्रतिक्रमण कहते हैं। वह दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, सांवत्सरिक, ऐर्यापथिक और औत्तमार्थिक के भेद से सात प्रकार का है। दुष्षम आदि काल और छह संहनन से युक्त स्थिर तथा अस्थिर स्वभाव वाले पुरुषों का आश्रय लेकर यथायोग्य इन सातों प्रतिक्रमणों का प्ररूपण करने वाला यह प्रतिक्रमण अर्थाधिकार है।

५. वैनयिक नामका अर्थाधिकार ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, तप विनय और उपचार विनय इन पाँच प्रकार के विनयों का वर्णन करता है।

६. कृतिकर्म नामका अर्थाधिकार अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु की पूजा आदि की विधि का वर्णन करता है। अन्यत्र भी कहा है- उस कृतिकर्म के आत्माधीन होकर किए गए तीन बार प्रदक्षिणा, तीन अवनति, चार नमस्कार और बारह आवर्त आदि रूप लक्षण, भेद फल का वर्णन कृतिकर्म प्रकीर्णक करता है।

७. दशवैकालिक अर्थाधिकार मुनियों के आचार और गोचरी विधि का वर्णन करता है। भावार्थ-विशिष्ट काल को विकाल कहते हैं। उसमें जो विशेषता होती है उसे वैकालिक कहते हैं। वे वैकालिक दश हैं। उनको कहने वाला दशवैकालिक है।

८. उत्तराध्ययन अर्थाधिकार उत्तरपदों का वर्णन करता है। यह चार प्रकार के उपसर्गों का, बाईस प्रकार के परीषहों का एवं उन सबके सहन करने की विधि का तथा फल का प्रश्नोत्तर रूप में वर्णन करता है।

९. कल्पव्यवहार साधुओं के योग्य आचरण का और अयोग्य आचरण के होने पर प्रायश्चित विधि का वर्णन करता है। भावार्थ-कल्प नाम योग्य का है और व्यवहार नाम आचार का है उन सबका वर्णन करने वाला कल्पव्यवहार है।

१०. कल्पाकल्पिक द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव की अपेक्षा मुनियों के लिए यह योग्य है और यह अयोग्य है इस तरह इन सबका वर्णन करता है।

११. महाकल्प काल और संहनन का आश्रय कर साधुओं के द्रव्य-क्षेत्रादि का वर्णन करता है। भावार्थ-इसमें उत्कृष्ट संहनन आदि विशिष्ट द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का आश्रय लेकर प्रवृत्ति करने वाले जिनकल्पी साधुओं के योग्य त्रिकालयोग आदि अनुष्ठान का और स्थविरकल्पी साधुओं की दीक्षा, शिक्षा, गणपोषण, आत्मसंस्कार, सल्लेखना आदि का विशेष वर्णन है।

१२. पुण्डरीक नामका अर्थाधिकार भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और कल्पवासी इन चार प्रकार के देवों में उत्पत्ति के कारणरूप, दान, पूजा, तपश्चरण, अकामनिर्जरा, सम्यग्दर्शन और संयम आदि अनुष्ठानों का वर्णन करता है।

१३. महापुण्डरीक समस्त इंद्र और प्रतीन्द्रों में उत्पत्ति के कारण रूप तपोविशेष आदि आचरण का वर्णन करता है।

१४. निषिद्धिका अनेक प्रकार के प्रायिश्चत विधान का कथन करता है। भावार्थ-प्रमादजन्य दोषों के निराकरण करने को निषिाqद्ध कहते हैं और इस निषिद्धि अर्थात् बहुत प्रकार के प्रायश्चित के प्रतिपादन करने वाले शास्त्र को निषिद्धिका कहते हैं।

प्रोक्तं च श्रीमद्भट्टाकलंकदेवेन अंगांगबाह्यलक्षणं-

अङ्गप्रविष्टमाचारादिद्वादशभेदं बुद्ध्यतिशयर्द्धियुक्तगणधरानुस्मृतग्रन्थरचनम्।।१२।।[१४]

आरातीयाचार्यकृताङ्गार्थप्रत्यासन्नरूपमङ्गबाह्यम्।।१३।।
यद्गणधरशिष्यप्रशिष्यै-रारातीयै-रधिगतश्रुतार्थतत्त्वै: कालदोषादल्पमेधायुर्बलानां प्राणिनामनुग्रहार्थ-मुपनिबद्धं संक्षिप्ताङ्गार्थवचनविन्यासं तदङ्गबाह्यम्।
तदनेकविधं कालिकोत्कालिकादिविकल्पात्।।१४।।
तदङ्गबाह्यमनेकविधं-कालिकमुत्कालिकमित्येवमादिविकल्पात्। स्वाध्याय-काले नियतकालं कालिकं। अनियतकालमुत्कालिकं। तद्भेदा उत्तराध्ययनादयोऽनेकविधा:।[१५]
अत्र पर्यन्तं अंगांगबाह्यानां लक्षणं समासेन कथितम्।
श्रुतदेव्या: लक्षणं-
इयं द्वादशांगवाणी ग्रन्थेषु श्रुतदेवीरूपेणापि वर्णिताऽस्ति।
उक्तं च प्रतिष्ठातिलकग्रन्थे-
आर्याछन्द:-
बारहअंगंगिज्जा-दंसणतिलया चरित्तवत्थहरा। चोद्दसपुव्वाहरणा, ठावे दव्वा य सुयदेवी।।१।।
अनुष्टुप् छंद:-
आचारशिरसं सूत्र-कृतवक्त्रां सुकंठिकाम्। स्थानेन समवायांग-व्याख्याप्रज्ञप्तिदोर्लताम् ।।२।।
वाग्देवतां ज्ञातृकथो-पासकाध्ययनस्तनीम्। अंतकृद्दशसन्नाभि-मनुत्तरदशांगत:।।३।।
सुनितम्बां सुजघनां, प्रश्नव्याकरणश्रुतात्। विपाकसूत्रदृग्वाद-चरणां चरणाम्बराम्।।४।।
सम्यक्त्वतिलकां पूर्व-चतुर्दशविभूषणाम्। तावत्प्रकीर्णकोदीर्ण-चारुपत्रांकुरश्रियम्।।५।।
आप्तदृष्टप्रवाहौघ-द्रव्यभावाधिदेवताम्। परब्रह्मपथादृप्तां, स्यादुत्तिं भुक्तिमुक्तिदाम्।।६।।
पुनश्च-मालिनीछंद:-
सकलयुवतिसृष्टेरम्ब! चूड़ामणिस्तवं, त्वमसि गुणसुपुष्टेर्धर्मसृष्टेश्च मूलम्।
त्वमसि च जिनवाणि! स्वेष्टमुक्त्यंगमुख्या। तदिह तव पदाब्जं भूरिभक्त्या नमाम:।।
श्रीवीरसेनाचार्येणापि प्रोत्तं-
बारहअंगंगिज्जा वियलिय-मल-मूढ-दंसणुत्तिलया।
विविह-वर-चरण-भूसा पसियउ सुय-देवया सुइरं[१६]।।२।।
अन्यत्र चापि-
अंगंगबज्झणिम्मी, अणाइमज्झंत-णिम्मलंगाए।
सुयदेवय-अंबाए, णमो सया चक्खुमइयाए[१७]।।४।।

श्री भट्टाकलंकदेव ने भी अगांगबाह्य का लक्षण कहा है-

अंगप्रविष्ट के आचारांग आदि बारह भेद हैं जिन्हें बुद्धि आदि अतिशयकारी ऋद्धियों से संपन्न गणधर देवों ने स्मरण करके ग्रंथरचना की है।।१२।। आरातीय आचार्यकृत अंग अर्थ के आधार से रचे गए ग्रंथ अंगबाह्य हैं।।१३।।

श्रुत अर्थ के ज्ञाता गणधर देव के शिष्य-प्रशिष्यों के द्वारा कालदोष से अल्प आयु एवं अल्प बुद्धि वाले प्राणियों के अनुग्रह के लिए अंगों के आधार से रचे गए संक्षिप्त ग्रंथ अंगबाह्य हैं।

वह अंगबाह्य कालिक, उत्कालिक आदि विकल्प से अनेक प्रकार का है।।१४।।

कालिक और उत्कालिक आदि की अपेक्षा उस अंगबाह्य के अनेक भेद हैं। स्वाध्याय काल में जिनके पठन-पाठन का नियम अर्थात् नियतकाल है वे ‘कालिक’ कहलाते हैं तथा जिनके पठन-पाठन का कोई नियत समय न हो वे ‘उत्कालिक’ हैं।

उत्तराध्ययन आदि अनेक प्रकार के अंगबाह्य ग्रंथ हैं।

यहाँ तक अंगांगबाह्य का संक्षेप से लक्षण कहा है।

श्रुतदेवी का लक्षण-

यह द्वादशांग वाणी ग्रंथों में श्रुतदेवीरूप से भी वर्णित की गई है। प्रतिष्ठातिलक ग्रंथ में कहा भी है—

गाथार्थ—श्रुतदेवी के बारह अंग हैं, सम्यग्दर्शन यह तिलक है, चारित्र उनका वस्त्र है, चौदह पूर्व उनके आभरण हैं ऐसी कल्पना करके श्रुतदेवी की स्थापना करनी चाहिए।

बारह अंगों में से प्रथम जो ‘‘आचारांग’’ है, वह श्रुतदेवी-सरस्वती देवी का मस्तक है, ‘‘सूत्रकृतांग’’ मुख है, ‘‘स्थानांग’’ कण्ठ है, समवायांग और व्याख्याप्रज्ञप्ति ये दोनों अंग उनकी दोनों भुजाएँ हैं, ज्ञातृकथांग और उपासकाध्ययनांग ये दोनों अंग उस सरस्वती देवी के दो स्तन हैं, अंतकृद्दशांग यह नाभि है, अनुत्तरदशांग श्रुतदेवी का नितम्ब है, प्रश्नव्याकरणांग यह जघन भाग है, विपाकसूत्रांग और दृष्टिवादांग ये दोनों अंग उन सरस्वती देवी के दोनों पैर हैं। ‘‘सम्यक्त्व’’ यह उनका तिलक है, चौदह पूर्व अलंकार हैं और ‘‘प्रकीर्णक श्रुत’’ सुन्दर बेल-बूटे सदृश हैं। ऐसी कल्पना करके यहाँ पर द्वादशांग जिनवाणी को सरस्वती देवी के रूप में लिया गया है।

श्री जिनेन्द्रदेव ने सर्व पदार्थों की सम्पूर्ण पर्यायों को देख लिया है, उन सर्व द्रव्य पर्यायों की यह ‘‘श्रुतदेवता’’ अधिष्ठात्री देवी हैं अर्थात् इनके आश्रय से पदार्थों की सर्व अवस्थाओं का ज्ञान होता है। परमब्रह्म के मार्ग का अवलोकन करने वाले लोगोें के लिए यह स्याद्वाद के रहस्य को बतलाने वाली है तथा भव्यों के लिए भुक्ति और मुक्ति को देने वाली ऐसी यह सरस्वती माता है।

हे अम्ब! आप सम्पूर्ण स्त्रियों की सृष्टि में चूड़ामणि हो। आपसे ही धर्म की और गुणों की उत्पत्ति होती है। आप मुक्ति के लिए प्रमुख कारण हो, इसलिए मैं अतीव भक्तिपूर्वक आपके चरणकमलों को नमस्कार करता हूूूँ। श्रीवीरसेनाचार्य ने भी कहा है-

गाथार्थ-जो श्रुतज्ञान के प्रसिद्ध बारह अंगों से ग्रहण करने योग्य हैं अर्थात् बारह अंगों का समूह ही जिसका शरीर है, जो सर्व प्रकार के मल (अतीचार) और तीन मूढ़ताओं से रहित सम्यग्दर्शन रूप उन्नत तिलक से विराजमान है और नाना प्रकार के निर्मल चारित्र ही जिनके आभूषण हैं ऐसी भगवती श्रुतदेवता चिरकाल तक प्रसन्न रहो। अन्यत्र भी कहा है-

गाथार्थ—जिसका आदि-मध्य और अन्त से रहित निर्मल शरीर, अंग और अंगबाह्य से निर्मित है और जो सदा चक्षुष्मती अर्थात् जागृतचक्षु हैं ऐसी श्रुतदेवी माता को नमस्कार हो।

सरस्वतीस्तोत्रेऽपि सरस्वतीदेव्या लक्षणानि सन्ति। यथा-

चन्द्रार्वककोटिघटितोज्ज्वलदिव्यमूर्ते! श्रीचन्द्रिकाकलितनिर्मलशुभ्रवासे!।

कामार्थदे! च कलहंससमाधिरूढे! वागीश्वरि! प्रतिदिनं मम रक्ष देवि[१८]।।१।।
अन्यच्च-
सरस्वती मया दृष्टा, दिव्या कमललोचना।
हंसस्कंधसमारूढा, वीणापुस्तकधारिणी[१९]।।
अस्या: सरस्वतीमातु: षोडशनामान्यपि गीयन्ते-
भारती, सरस्वती, शारदा, हंसगामिनी, विदुषांमाता, वागीश्वरी, कुमारी, ब्रह्मचारिणी, जगन्माता, ब्राह्मणी, ब्रह्माणी, वरदा, वाणी, भाषा, श्रुतदेवी गौश्चेति।[२०]
अन्यत्र-अष्टोत्तरशतनाममंत्रा:[२१] अपि विद्यन्ते।
सरस्वतीदेव्या: मूर्तयो जैनमंदिरेषु अपि दृश्यन्ते। नेयं चतुर्णिकायदेवानां देवी। प्रत्युत द्वादशांगजिनवाणी स्वरूपा माता एव अतएव इयं मुनिभिरपि वंद्या भवति इति ज्ञातव्य:। वस्त्रालंकारभूषितापि न सरागिणी वस्त्रवेष्टितशास्त्रमिव सर्वदा पूज्या एव सर्वैस्तस्मान्नाशंकनीयं किंचिदपि विद्वद्भि:।
अत्रोपसंहार:-
अनेन भगवान् महावीरोऽर्थकर्ता श्रीगौतमस्वामी गणधरदेवो ग्रन्थकर्ता इति वर्णितं भवति।

सरस्वती स्तोत्र में भी सरस्वती देवी के लक्षण कहते हैं।

श्लोकार्थ—करोड़ों सूर्य और चन्द्रमा के एकत्रित तेज से भी अधिक तेज धारण करने वाली, चन्द्र किरण के समान अत्यंत स्वच्छ एवं श्वेत वस्त्र को धारण करने वाली तथा कलहंस पक्षी पर आरूढ़ दिव्यमूर्ति श्री सरस्वती देवी हमारी प्रतिदिन रक्षा करें। अन्यत्र भी कहा है—

श्लोकार्थ—दिव्य कमल के समान नेत्रों वाली, हंस वाहन पर आरूढ़, वीणा और पुस्तक को हाथ में धारण करने वाली सरस्वती देवी मैंने देखी है।

उस सरस्वती माता के सोलह नाम भी गाये जाते हैं—

१. भारती

२. सरस्वती

३. शारदा

४. हंसगामिनी

५. विद्वानों की माता

६. वागीश्वरी

७. कुमारी

८. ब्रह्मचारिणी

९. जगन्माता

१०. ब्राह्मिणी

११. ब्रह्माणी

१२. वरदा

१३. वाणी

१४. भाषा

१५. श्रुतदेवी और

१६. गो।

अन्यत्र एक सौ आठ नाम मंत्र भी सुने जाते हैं।

सरस्वती देवी की मूर्ति जैन मंदिरों में भी देखी जाती हैं, ये चार निकाय वाले देवों में से किसी निकाय की देवी नहीं हैं बल्कि द्वादशांग जिनवाणी स्वरूप माता ही हैं इसलिए मुनियों के द्वारा भी वंद्य हैं ऐसा जानना चाहिए। वस्त्र-अलंकारों से भूषित होने पर भी वे सरागी नहीं हैं। वस्त्र से वेष्टित शास्त्र के समान वे सरस्वती की प्रतिमाएँ भी सभी के द्वारा सर्वदा पूज्य ही हैं इसलिए विद्वानों को इस विषय में किंचित् भी शंका नहीं करनी चाहिए।

इस प्रकार से भगवान महावीर स्वामी द्वादशांग के अर्थकर्ता हैं तथा श्री गौतमस्वामी गणधर देव ग्रंथकर्ता हैं ऐसा वर्णन हुआ।

तेन गौतमस्वामिना द्विविधमपि श्रुतज्ञानं लोहाचार्याय प्रदत्तं।

तेन गौतमस्वामिना द्विविधमपि श्रुतज्ञानं लोहाचार्याय प्रदत्तं। तेनापि जम्बूस्वामिन: संचारितं। परिपाटीक्रमेण एते त्रयोऽपि सकलश्रुतधारका: भणिता:। अपरिपाट्या पुन: सकलश्रुतपारगा: संख्यातसहस्रा जाता:। तदनु विष्णु-नन्दिमित्र-अपराजित-गोवर्धन-भद्रबाहुनामधेया इमे पंच आचार्या: परिपाटीक्रमेण चतुर्दशपूर्वधारिण: संजाता:। तत्पश्चात् विशाखाचार्य-प्रोष्ठिल-क्षत्रिय-जयाचार्य-नागाचार्य-सिद्धार्थ स्थविर-धृतिसेन-विजयाचार्य-बुद्धिल्ल-गंगदेव-धर्मसेननामधेया: एकादशाचार्या: एकादशांग-दशपूर्वाणां ज्ञातार: तथा च उपरिमचतु:पूर्वाणां एकदेशज्ञातारो बभूवु:।

तदनंतरं नक्षत्राचार्य-जयपाल-पांडुस्वामि-ध्रुवसेन-कंसाचार्यनामधेया: एते पंचाचार्या: परिपाटीक्रमेण सर्व-अंग-पूर्वाणां एकदेशधारका: संजाता:। तदनु सुभद्र-यशोभद्र-यशोबाहु-लोहार्याख्या इमे चत्वार: आचार्या: आचारांगधारिण: शेषदश-अंग-चतुर्दशपूर्वाणां एकदेशज्ञातार: अभवन्।
तदनु एकादशांग-चतुर्दशपूर्वाणां एकदेशज्ञानं आचार्यपरम्पराभि: समायातं श्रीधरसेनाचार्येण लब्धम्।
अधुना श्रुतावतारकथा वक्ष्यते-
सौराष्ट्रदेशस्य गिरिनगरचन्द्रगुहानिवासिना अष्टांगमहानिमित्तपारगेन श्रीधरसेनाचार्येण एकदा मनसि चिन्तितं, अग्रे अंगश्रुतस्य व्युच्छेदो भविष्यति इति केनाप्युपायेन तस्यांगश्रुतज्ञानस्य रक्षार्थं प्रयत्नो विधेय:, तर्हि पंचवर्षीय-साधुसम्मेलने सम्मिलितदक्षिणदेशवासिसूरीणां पाश्र्वे एको लेख: प्रेषित:। लेखस्थितधरसेना-चार्यवचनमवधार्य तैराचार्यै: ग्रहणधारणसमर्थौ देशकुलजातिशुद्धौ द्वौ साधू प्रेषितौ आन्ध्रदेशस्य वेणानदीतटात्।,

हिंदी अनुवाद

उन गौतम स्वामी के द्वारा दोनों प्रकार का श्रुतज्ञान लोहाचार्य को प्रदान किया गया, लोहाचार्य ने भी जम्बूस्वामी को दिया अत: परिपाटी-परम्परा क्रम से ये तीनों भी सकलश्रुत के धारक माने गये। पुन: अपरिपाटी-अक्रम परम्परा से सकलश्रुत के पारगामी संख्यात हजार हुए हैं। उसके पश्चात् विष्णु, नन्दिमित्र, अपराजित, गोवर्धन, भद्रबाहु नाम वाले ये पाँच आचार्य परम्परा क्रम से चौदह पूर्व के धारी हुए। तत्पश्चात् विशाखाचार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जयाचार्य, नागाचार्य, सिद्धार्थस्थविर, धृतिसेन, विजयाचार्य, बुद्धिल्ल, गंगदेव और धर्मसेन नामके ग्यारह आचार्य ग्यारह अंग और दश पूर्व के ज्ञाता हुए तथा उपरिम चार पूर्वों के एक देश ज्ञाता हुए हैं।

तदनन्तर नक्षत्राचार्य, जयपाल, पांडुस्वामी, ध्रुवसेन, कंसाचार्य नामके ये पाँच आचार्य परिपाटी क्रम से सभी अंग और पूर्वों के एक देश धारक हुए। उसके बाद सुभद्र, यशोभद्र, यशोबाहु, लोहार्य नाम वाले चार आचार्य एक आचारांग के धारी थे तथा शेष दश अंग एवं चौदह पूर्वों के एक देश ज्ञाता थे।

उसके पश्चात् चौदह पूर्वों का एक देश ज्ञान आचार्य परम्परा से चलता हुआ श्रीधरसेनाचार्य को प्राप्त हुआ। यहाँ इसी प्रसंग में श्रुतावतार की कथा का वर्णन करेंगे-

सौराष्ट्र देश के गिरिनगर-गिरनार की ‘‘चन्द्र’’ नामक गुफा में निवास करने वाले अष्टांगमहानिमित्त के पारगामी-ज्ञानी श्रीधरसेन आचार्य ने एक बार मन में विचार किया कि आगे भविष्य में अंग श्रुत का व्युच्छेद-खंडन हो जाएगा अत: किसी भी उपाय से उस अंग श्रुतज्ञान की रक्षा का प्रयत्न करना चाहिए, तब उन्होंने पंचवर्षीय साधुसम्मेलन में सम्मिलित दक्षिणदेशवासी आचार्यों के पास एक लेख-संदेश भिजवाया। लेख में लिखित श्रीधरसेनाचार्य के वचनों पर विचार-विमर्श करके उन आचार्यों ने श्रुत को अच्छी प्रकार से ग्रहण एवं धारण करने में समर्थ, देश, कुल, जाति से शुद्ध दो दिगम्बर मुनियों को आन्ध्रदेश के वेणा नदी के तट से गिरनार की ओर विहार करा दिया-भेज दिया।


उक्तं च-[२२]

देशे तत: सुराष्ट्रे, गिरिनगरपुरान्तिकोर्जयन्तगिरौ।

चन्द्रगुहाविनिवासी, महातपा: परममुनिमुख्य:।।१०३।।
अग्रायणीयपूर्वस्थित-पंचम-वस्तुगत-चतुर्थमहा-
कर्मप्राभृतज्ञ:, सूरिर्धरसेननामाभूत्।।१०४।।
सोऽपि निजायुष्यांतं, विज्ञायास्माभिरलमधीतमिदम्।
शास्त्रं व्युच्छेदमवाप्स्यतीति संचिन्त्य निपुणमति:।।१०५।।
देशेन्द्रदेशनामनि, वेणाकतटीपुरे महामहिमा।
समुदितमुनीन् प्रति ब्रह्मचारिणा प्रापयल्लेखम्।।१०६।।
आदाय लेखपत्रं तेप्यथ तद्ब्रह्मचारिणो हस्तात्।
प्रविमुच्य बंधनं वाचयाम्बभूवुस्तदा महात्मान:।।१०७।।
स्वस्ति श्रीमत ऊर्जयन्ततटनिकटचन्द्रगुहा-
वासाद् धरसेनगणी वेणाकतटसमुदित-यतीन्।।१०८।।
अभिवंद्य कार्यमेवं निगदत्यस्माकमायुरवशिष्टम्।
स्वल्पं तस्मादस्मच्छ्रुतस्य शास्त्रस्य व्युच्छित्ति:।।१०९।।
न स्याद् यथा तथा द्वौ, यतीश्वरौ ग्रहणधारणसमर्थौ।
निशितप्रज्ञौ यूयं, प्रस्थापयतीति लेखार्थम्।।११०।।
सम्यगवधार्य तैरपि, तथाविधौ द्वौ मुनी समन्विष्य।
प्रहितौ तावपि गत्वा, चापतुररमूर्जयन्तगिरिम्।।१११।।,

हिंदी अनुवाद

श्रुतावतार कथा में कहा भी है—

श्लोकार्थ—सौराष्ट्र देश के गिरिनगरपुर के समीप ऊर्जयन्त पर्वत पर चंद्रगुफा में निवास करने वाले महातपस्वी, मुनिश्रेष्ठ, आग्रायणीय पूर्व स्थित पंचमवस्तुगत चतुर्थ महाकर्म प्राभृत के ज्ञाता श्रीधरसेनाचार्य थे। उन्होंने अपनी आयु का अंत निकट जानकर और आगे श्रुत का विच्छेद होने वाला है-हो जायेगा अत: मुझे इसे किसी निपुणमति-बुद्धिमान के लिए प्रदान करना चाहिए ऐसा विचार करके वेणानदी के तट पर महामहिम उत्सव में एकत्रित हुए मुनियों के पास एक ब्रह्मचारी के द्वारा लेख-पत्र भिजवाया।

उन मुनियों ने ब्रह्मचारी से लेख प्राप्त करके समस्त मुनिसभा के बीच में उन महात्मा महामुनि का लिखित संदेश सुनाया कि— ऊर्जयन्त तट के निकट चन्द्रगुफा निवासी मैं धरसेन आचार्य वेणाक तट पर एकत्रित स्वस्ति श्रीमान् मुनियों की वंदना करते हुए इस कार्य के लिए निवेदन करता हूँ कि मेरी आयु अब थोड़ी ही शेष बची है और मेरे पास स्थित श्रुत का आगे व्युच्छेद हो जाएगा अत: आप लोग श्रुत को ग्रहण-धारण करने में समर्थ ऐसे दो शिष्य मुझसे श्रुत को प्राप्त करने तथा आगे की श्रुत परम्परा चलाने हेतु मेरे पास भिजवाने का अनुग्रह करें।

उन मुनियों ने श्रीधरसेनाचार्य के लेख का अभिप्राय भलीभाँति समझ कर उपर्युक्त गुणों के धारक दो मुनियों का पूरे संघ में से अन्वेषण करके श्री धरसेनाचार्य के पास भेज दिया। वे दोनों विहार करते हुए ऊर्जयन्त पर्वत पर पहुँच गए। (१०३-१११ तक)

एकस्मिन् दिने पश्चिमरात्रौ श्रीधरसेनाचार्येण

एकस्मिन् दिने पश्चिमरात्रौ श्रीधरसेनाचार्येण स्वप्ने दृष्टं यत् समस्तशुभलक्षणान्वितौ द्वौ शुभ्रवृषभौ मां त्रि:प्रदक्षिणीकृत्य नम्रीभूतांगौ मच्चरणयो: पतितौ। तदा संतुष्टमना: आचार्य: ‘‘जयतु श्रुतदेवता’’ इति वाक्यमुच्चार्य उदतिष्ठत्। तस्मिन्नेव दिने दक्षिणापथप्रस्थापितौ द्वौ मुनी समागतौ। तौ धरसेनभगवन्तं कृतिकर्मविधिना नमस्कृत्य द्विदिवसानंतरं तृतीयदिवसे विनयेन धरसेनभट्टारकं अकथयतां।

भगवन्! भवत्पत्रानुसारेण आवां द्वौ मुनी भवत्पादमूलमुपगतौ। ‘सुष्ठु भद्रं’ इत्युक्त्वा श्रीसूरिणा द्वावपि आश्वासितौ। तदा चिंतितं भगवता-‘स्वैरमुनीनां विद्यादानं संसारभयवद्र्धनं’ इति। यद्यपि शुभस्वप्नदर्शनेन अनयोर्मुन्योर्योग्यत्वं ज्ञायते तथापि सुपरीक्षा हृदये संतोषं करोतीति निर्णयं कृत्वा ताभ्यां द्वे विद्ये दत्ते, तत्रैका अधिकाक्षरा अपरा हीनाक्षरा। ‘‘युवां इमे विद्ये साधयतं षष्ठोपवासेण’’ इति।
'उक्त च-'
‘‘श्रीमन्नेमिजिनेश्वर-सिद्धिशिलायां विधानतो विद्या-
संसाधनं विदधतोस्तयोश्च पुरत: स्थिते देव्यौ।।११६।।’’[२३]
तत: तौ सिद्धविद्यौ विद्यादेवते पश्यत:। हीनाक्षरविद्यासाधकस्य एकलोचना देवी अग्रे स्थिता। अधिकाक्षरविद्यासाधकस्य दंतुरा देवी सन्मुखे स्थिता। नायं देवतानां स्वभावो भवितुमर्हतीति संचिन्त्य मन्त्रव्याकरणकुशलौ तौ हीनाक्षरमंत्रे वर्णं क्षिप्त्वा अधिकाक्षरमंत्रात् वर्णं निष्कास्य च मंत्रयो: शुद्धी अकुरुतां। पुनश्च विधिवन्मंत्रसाधनेन देव्यौ दिव्यरूपेण समागते। ताभ्यां ‘किं करणीयं’ इति पृष्टे सति नावयो: किमपि कार्यमिति गदिते सति ते देव्यौ स्वास्पदं जग्मतु:। पुन: ताभ्यां धरसेनभगवत: सकाशे आगत्य यथावत् सर्वं वृत्तान्तं विनयेन निवेदितं, तत्सर्वं श्रुत्वा तुष्टमनसा श्रीधरसेनभट्टारकेण सौम्यतिथिनक्षत्रवारे ग्रन्थस्याध्यापनं प्रारब्धं ताभ्याम्।
यदि तौ मुनी विद्यासिद्धे: प्रागेव मंत्रयो: संशोधनं अकरिष्यतां तर्हि आचार्यदेवं प्रति श्रद्धाभक्ति-गुणयोर्लोपोऽभविष्यत्। तथा च यदि पश्चात् संशोधनं अकरिष्यतां तर्हि कुशाग्रबुद्धेरभावात् अपात्रतां अगमिष्यतां।
अत: सर्वाङ्गीणयोग्यतामवलोक्य ताभ्यां मुनीभ्यां आचार्यप्रवरधरसेनभट्टारकेण स्वस्थितद्वितीयपूर्वस्यां-तर्गतैकदेशविद्या प्रदत्ता। क्रमेण व्याख्यानं कुर्वता तेन आषाढमास-शुक्लपक्ष-एकादश्यां पूर्वाण्हे ग्रन्थसमाप्ति: कृता विधिना।
विनयेन ग्रन्थास्याध्ययनं कृतं इति तुष्टैर्भूतजातिव्यंतरदेवैरेकस्य महती पूजा पुष्प-बलि-शंख-तूर्यरवसंकुला कृता, तां पूजां दृष्ट्वा तस्य ‘‘भूतबलि:’’ इति नाम कृतं भट्टारकेण। अपरस्य भूतै: पूजितस्य अस्त-व्यस्तस्थितदंत-पंक्तिमपसार्य तैरेव देवै: समीकृतदन्तस्य तस्य गुरुणा ‘पुष्पदन्त:’ इति नाम कृतं।
तत: ‘‘गुरुवयणमलंघणिज्जं’’इति चिंतयित्वा तत्रत्यात् विहारं कृत्वा अंकलेश्वरग्रामे आगत्य वर्षायोग: कृत: ताभ्यां।

हिंदी अनुवाद

एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीधरसेनाचार्य ने स्वप्न में देखा कि समस्त शुभ लक्षणों से समन्वित दो सुन्दर वृषभ-बैल मेरी तीन प्रदक्षिणा करके नम्रीभूत अंगों से मेरे चरणों में झुककर नमन कर रहे हैं। तब संतुष्टमना आचार्य ‘‘जयतु श्रुतदेवता’’ इस वाक्य का उच्चारण करके निद्रा से उठकर बैठ गए। उसी दिन प्रात:काल दक्षिणापथ से विहार करते हुए वे दोनों मुनि वहाँ पहुँच गए। उन दोनों मुनियों ने कृतिकर्म विधिपूर्वक श्रीधरसेन भगवन्त को नमस्कार किया। पुन: दो दिन के बाद तीसरे दिन विनयपूर्वक श्री धरसेन- भट्टारक से निवेदन किया—

भगवन्! आपके पत्रानुसार हम दो मुनि आपके पादमूल में आ गए हैं। ‘‘बहुत अच्छा’’ ऐसा बोलकर आचार्यश्री ने भी उन दोनों को आश्वस्त किया। तब श्रीधरसेनाचार्य ने चिन्तन किया कि—‘‘स्वैराचारी-स्वच्छन्द प्रवृत्ति वाले मुनियों को दिया गया विद्यादान संसार भय को बढ़ाने वाला है।’’ यद्यपि शुभ स्वप्न के दर्शन से उन्होंने इन दोनों मुनियों की योग्यता को जान लिया था फिर भी ‘‘अच्छी तरह से परीक्षा कर लेने पर हृदय पूर्ण सन्तुष्ट हो जाता है’’ ऐसा निर्णय करके उन्होंने दोनों को दो विद्या मंत्र दिए जिसके एक मंत्र में एक अक्षर अधिक था एवं दूसरे मंत्र में एक अक्षर कम था। ‘‘आप दोनों षष्ठोपवास-बेला (दो उपवास) करके इन विद्याओं की सिद्धि करें’’ ऐसी आज्ञा देकर उन्हें गिरनार पर्वत पर भेज दिया। श्रुतावतार कथा में कहा भी है—

श्लोकार्थ—श्रीनेमिनाथ जिनेश्वर की सिद्धभूमि पर दोनों मुनियों ने विधिपूर्वक विद्या साधना की तब उनके सामने दो विद्या देवियाँ प्रगट हो गर्इं।।११६।।

तब उन दोनों मुनिराजों ने अपने सामने विद्या देवियों को देखा। एक अक्षर कम वाले मंत्र की साधना करने वाले मुनि के समक्ष जो देवी प्रगट हुई वह एक आँख वाली थी। अधिकाक्षर मंत्र की साधना करते हुए साधक मुनि के सम्मुख लम्बे-लम्बे दाँत वाली देवी प्रगट हुई। ‘‘देवताओं का स्वभाव-रूप ऐसा तो नहीं होता है’’ अर्थात् देवों का स्वरूप-आकार विकृत नहीं होता है ऐसा सोचकर मंत्रव्याकरण में कुशल उन दोनों मुनियों ने हीन अक्षर वाले मंत्र में एक वर्ण मिलाकर तथा अधिक अक्षर वाले मंत्र में एक अक्षर निकाल कर मंत्रों को शुद्ध किया। पुन: विधिवत् मंत्र साधना करने से उनके समक्ष दिव्य रूप वाली देवियाँ प्रगट हो गर्इं। ‘‘क्या कार्य है ?’’ ऐसा उन देवियों के पूछने पर ‘‘हम लोेगों का कुछ भी कार्य-प्रयोजन नहीं है’’ मुनियों का उत्तर सुनकर वे दोनों अपने-अपने स्थान पर वापस चली गर्इं।

पुन: दोनों मुनियों ने श्री धरसेन आचार्य के पास आकर यथावत् समस्त वृत्तान्त विनयपूर्वक निवेदन किया, जिसे सुनकर सन्तुष्टमना श्रीधरसेन भट्टारक ने शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र एवं शुभ वार-दिन में उन दोनों को ग्रंथ अध्ययन प्रारंभ करा दिया।

यदि वे मुनि विद्यासिद्धि करने से पहले ही मंत्रों में संशोधन कर लेते तो आचार्य देव के प्रति श्रद्धा-भक्ति गुण का लोप हो जाता और यदि बाद में संशोधन नहीं करते तो कुशाग्र बुद्धि के अभाव में उनमें अपात्रता हो जाती।

अत: उन मुनियों की सर्वांगीण योग्यता देखकर आचार्यप्रवर धरसेन भट्टारक ने अपने में स्थित-अपने अंदर स्थित जो ज्ञान था इस द्वितीय पूर्व के अंतर्गत एकदेश विद्या-ज्ञान को उन्हें प्रदान किया। क्रमपूर्वक व्याख्यान करते हुए उन्होंने आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि के पूर्वाह्व काल में विधिपूर्वकग्रंथसमाप्त किया।

विनयपूर्वकग्रंथका अध्ययन इन लोगों ने किया है इस बात से संतुष्ट होकर भूत जाति के व्यन्तर देवों ने पुष्प, बलि (नैवेद्य), शंख, तूर्य आदि के शब्दों से गुंजायमान एक बहुत बड़ी पूजा का आयोजन किया। उस पूजा को देखकर आचार्य भट्टारक देव ने उन मुनिराज का ‘‘भूतबलि’’ यह नामकरण कर दिया। दूसरे मुनि की भूतों ने पूजा करके उनकी अस्त-व्यस्त स्थित दन्तपंक्ति को हटाकर उन्हें एक समान कर दिया तब गुरुदेव ने उनका ‘‘पुष्पदन्त’’ यह नाम रख दिया।

उसके पश्चात् ‘‘गुरु वचन अलंघनीय होते हैं’’ ऐसा चिन्तन करके उन दोनों मुनियों ने वहाँ से विहार करके गुजरात के ‘‘अंकलेश्वर’’ ग्राम में आकर वर्षायोग किया।


उक्तं च-

स्वासन्नमृतिं ज्ञात्वा माभूत्संक्लेशमेतयोरस्मिन्।

इति गुरुणा संचिन्त्य द्वितीयदिवसे ततस्तेन।।१२९।।

प्रियहितवचनैरमुष्य तावुभौ एव कुरीश्वरं प्रहितौ।
तावपि नवभिर्दिवसैर्गत्वा तत्पत्तनमवाप्य।।१३०।।

योगं प्रगृह्य तत्राषाढे मास्यसितपक्षपंचम्याम्।
वर्षाकालं कृत्वा विहरन्तौ दक्षिणाभिमुखम्[२४]।।१३१।।

अत्र आषाढमासशुक्लपक्षएकादश्यां ग्रन्थाध्यापनं पूर्णीकृतं पश्चात् विहारं कृत्वा आषाढमासि कृष्णपक्षपञ्चम्यां वर्षायोग: कृत:। अत्र शुक्लपक्षानंतरं कृष्णपक्षव्यवस्था दक्षिणे वर्तते। उत्तरप्रान्ते तु आषाढशुक्लपक्षानंतरं श्रावणमासं आगच्छति। अत्र श्रावणमासि कृष्णपक्षपंचम्यां ताभ्यां वर्षायोग: स्थापित:।
तदनु वर्षायोगं समाप्य पुष्पदन्ताचार्यो जिनपालितनाम-स्वभागिनेयेन समं वनवासदेशं अगच्छत्। भूतबलिभट्टारकोेऽपि तमिलदेशं अगच्छत्। तत: पुष्पदंताचार्येण जिनपालिताय दीक्षां दत्वा पुन: विंशतिसूत्राणि[२५] रचयित्वा तस्मै पाठयित्वानन्तरं भूतबलिभगवत: पाश्र्वे प्रेषित:। भूतबलिभगवता जिनपालितमुनिं विंशतिसूत्राणि च दृष्ट्वा एनं पुष्पदंताचार्यमल्पायुष्कं च जिनपालितमुनिना ज्ञात्वा मनसि चिंतितं।
‘महाकर्मप्रकृतिप्राभृतस्य’ व्युच्छेदो भविष्यति इति विचार्य सहपाठिपुष्पदंतमुनेरभिप्रायं च अवबुद्ध्य पुन: द्रव्यप्रमाणानुगमं आदौ कृत्वा ग्रन्थरचना कृता। तत: षट्खण्डागमसिद्धांतं प्रतीत्य पुष्पदन्तभूतबलिसूरी अपि ग्रन्थकर्तारौ उच्येते।
अत्र ‘विंशतिसूत्राणि’ पदेन विंशतिप्ररूपणागर्भितसत्प्ररूपणासूत्राणि बोद्धव्यानि, इमानि सूत्राणि सप्तसप्तत्यधिकशतानि सन्ति। अगे्रे द्रव्यप्रमाणानुगमात् तृतीयपुस्तकात् ग्रथितसूत्राणि भूतबलिसूरिणा विरचितानि सन्ति इति ज्ञातव्यं पाठवै:।
एतदेवोत्तं श्री वीरसेनाचार्येणैव मंगलगाथासूत्रस्यादौ-
‘‘इदि णायमाइरियपरंपरागयं मणेणावहारिय पुव्वाइरियायाराणुसरणं ति-रयण हेउ त्ति पुफ्फदंताइरियो मंगलादीणं छण्णं सकारणाणं परूवणट्ठं सुत्तमाह-
‘णमो अरिहंताणं’ [२६]इत्यादि।
पुन: अग्रे द्रव्यप्रमाणानुगमस्यादौ कथ्यते श्रीवीरसेनाचार्येण-
‘‘संपहि चोद्दसण्हं जीवसमासाण-मत्थित्त-मवगदाणं सिस्साणं तेसिं चेव परिमाणपडिवोहणट्ठं भूदबलियाइरियो सुत्तमाह-
दव्वपमाणाणुगमेण दुविहो णिद्देसो ओघेण आदेसेण य[२७]।।१।।

हिंदी अनुवाद

कहा भी है— श्लोकार्थ—अपनी मृत्यु को निकट जान कर इन शिष्यों को संक्लेश नहीं होने पावे ऐसा विचार करके उन गुरुदेव ने हित, मित, प्रिय वचनों के द्वारा उन दोनों मुनियों को कुरीश्वर की ओर भेज दिया, वे दोनों भी नौ (९) दिनों में उस पत्तन में पहुँच गए और आषाढ़ कृष्णा पंचमी (उत्तर भारत के अनुसार श्रावण कृ. ५) को वर्षायोग स्थापित करके, वर्षाकाल व्यतीत करके पुन: दक्षिण भारत की ओर दोनों विहार कर गए।।१२९, १३०, १३१।।

यहाँ विशेष ज्ञातव्य यह है कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को ग्रंथ का अध्ययन पूर्ण किया, उसके बाद विहार करके आषाढ़ कृष्ण की पंचमी तिथि में वर्षायोग स्थापन किया। यह शुक्लपक्ष के अनंतर कृष्णपक्ष की व्यवस्था दक्षिण भारत में चलती है और उत्तर प्रांत के आषाढ़ शुक्लपक्ष के अनंतर श्रावण मास आता है अत: यहाँ यह समझना कि श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को उन दोनों मुनियों ने वर्षायोग स्थापन किया।

उसके पश्चात् वर्षायोग समाप्त करके ‘‘पुष्पदन्त’’ आचार्य ‘‘जिनपालित’’ नामके अपने भानजे के साथ ‘‘वनवास ’’ देश को चले गये, ‘भूतबलि’ भट्टारक भी ‘तमिल’ देश को चले गये। उसके बाद पुष्पदन्ताचार्य ने जिनपालित को दीक्षा देकर पुन: बीस सूत्र रचकर उनको पढ़ाकर अनंतर उन्हें भूतबलि भगवान् के पास में भेज दिया। भूतबलि भगवान् जिनपालित मुनि को और उन बीसों सूत्रों को देखकर तथा जिनपालित के मुख से पुष्पदन्ताचार्य को अल्पायुष्क जानकर मन में चिन्तित हो गये।

‘‘महाकर्मप्रकृतिप्राभृत’’ का विनाश हो जाएगा ऐसा विचार करके, अपने सहपाठी पुष्पदंत मुनिराज के अभिप्राय को जान कर पुन: उन भूतबलि मुनिराज ने ‘‘द्रव्यप्रमाणानुगम’’ को आदि में करके ग्रंथ रचना की। उसके बाद षट्खंडागम सिद्धान्त की प्रतीति करके पुष्पदंत-भूतबलि दोनों आचार्य भी ग्रंथकत्र्ता कहे जाते हैं।

यहाँ ‘‘बीस सूत्र’’ इस पद से बीस प्ररूपणा गर्भित सत्प्ररूपणा सूत्रों को जानना चाहिए। ये सभी सत्प्ररूपणा के कुल सूत्र एक सौ सतत्तर (१७७) हैं। आगे ‘‘द्रव्यप्रमाणानुगम’’ नाम की षट्खंडागम की तृतीय पुस्तक से गूँथे गये सूत्रों को भूतबलि आचार्य ने रचा है ऐसा पाठकों को जानना चाहिए।

भावार्थ—यहाँ उत्थानिका में यह स्पष्ट किया है कि यहाँ जो ‘‘विंशतिसूत्राणि’’ पद से बीससूत्रों का वर्णन है उनसे बीस प्ररूपणा गर्भित सूत्रों को लेना चाहिए। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि श्रीपुष्पदन्ताचार्य ने प्रथमखण्ड के बीस प्ररूपणा गर्भित एक सौ सतत्तर (१७७) सूत्रों को रचा है और उसके बाद की समस्त रचना श्रीभूतबलि आचार्य द्वारा हुई है। श्रीवीरसेनाचार्य ने ही मंगल गाथा सूत्र की आदि में कहा है—

‘‘आचार्य परम्परा से आए हुए इस न्याय को मन में धारण करके और पूर्वाचार्यों के आचार अर्थात् व्यवहार-परम्परा का अनुसरण करना रत्नत्रय का कारण है ऐसा समझकर पुष्पदन्त आचार्य सकारण मंगलादिक छहों अधिकारों का व्याख्यान करने के लिए मंगल सूत्र कहते हैं-

‘‘अरिहन्तों को नमस्कार हो’’ इत्यादि।

पुन: आगे द्रव्यप्रमाणानुगम की आदि में श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं—

‘‘जिन्होेंने चौदह गुणस्थानों के अस्तित्व को जान लिया है ऐसे शिष्यों को अब उन्हीं चौदह गुणस्थानों के अर्थात् चौदहों गुणस्थानवर्ती जीवों के परिमाण (संख्या) के ज्ञान कराने के लिए भूतबलि आचार्य आगे का सूत्र कहते हैं- द्रव्यप्रमाणानुगम की अपेक्षा निर्देश दो प्रकार का है, ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश।।१।।

एतदेवोत्तंकं श्रुतावतारेऽपि-

अथ पुष्पदंतमुनिरप्यध्यापयितुं स्वभागिनेयं तम्।

कर्मप्रकृतिप्राभृत-मुपसंहार्यैव षड्भिरिह खण्डै:।।१३४।।
वाञ्छन् गुणजीवादिक-विंशतिविधसूत्रसत्प्ररूपणया।
युत्तंकं जीवस्थानाद्यधिकारं व्यरचयत्सम्यक्।।१३५।।
सूत्राणि तानि शतमध्याप्य ततो भूतबलिगुरो: पाश्र्वं।
तदभिप्रायं ज्ञातुं, प्रस्थापदगमदेषोऽपि।।१३६।।
तेन तत: परिपठितां भूतबलि: सत्प्ररूपणा: श्रुत्वा।
षट्खण्डागमरचना - भिप्रायं पुष्पदंतगुरो:।।१३७।।
विज्ञायाल्पायुष्या-नल्पमतीन् मानवान् प्रतीत्य तत:।
द्रव्यप्ररूपणाद्यधिकार: खंडपंचकस्यान्वक्।१३८।।
सूत्राणि षट्सहस्र-ग्रन्थान्यथ पूर्वसूत्रसहितानि।
प्रविरच्य महाबन्धाह्वयं तत: षष्ठकं खंडम्।।१३९।।
त्रिंशत्सहस्रसूत्र - ग्रन्थं व्यरचयदसौ महात्मा।
तेषां पंचानामपि, खण्डानां शृणुत नामानि।।१४०।।
आद्यं जीवस्थानं क्षुल्लकबन्धाह्वयं द्वितीयमत:।
बंधस्वामित्वं भाव - वेदनावर्गणाखण्डे।।१४१।।
एवं षट्खण्डागम-रचनां प्रविधाय भूतबल्यार्य:।
आरोप्यासद्भाव-स्थापनया पुस्तकेषु तत:।।१४२।।
ज्येष्ठसितपक्षपञ्च-म्यां चातुर्वण्र्यसंघसमवेत:।
तत्पुस्तकोपकरणै-व्र्यधात्क्रियापूर्वकं पूजाम्।।१४३।।
श्रुतपंचमीति तेन, प्रख्यातिं ‘तिथिरियं’ परामाप।
अद्यापि येन तस्यां, श्रुतपूजां कुर्वते जैना:।।१४४।।
जिनपालितं ततस्तं, भूतबलि: पुष्पदन्तगुरुपाश्र्वम्।
षट्खण्डान्यप्यध्यगमयत्तत्पुस्तकसमेतम्।।१४५।।
अथ पुष्पदन्तगुरुरपि जिनपालितहस्तसंस्थितमुदीक्ष्य।
षट्खण्डागमपुस्तकमहो! मया चिंतितं कार्यम्।।१४६।।
संपन्नमिति समस्ताङ्गोत्पन्न-महाश्रुतानुरागभर:।
चातुर्वण्र्यसुसंघान्वितो विहितवान् क्रियाकर्म।।१४७।।
गंधाक्षतमाल्याम्बर-वितानघण्टाध्वजादिभि: प्राग्वत्।
श्रुतपंचम्यामकरोत् सिद्धांतसुपुस्तकमहेज्याम्।।१४८।।
एवं षट्खण्डागम-सूत्रोत्पत्तिं प्ररूप्य पुनरधुना।
कथयामि कषायप्राभृतस्य सत्सूत्रसंभूतिम्[२८]।।१४९।।

ततो मूलतन्त्रकर्ता वर्धमानभट्टारक:, अनुतन्त्रकर्ता गौतमस्वामी, उपतन्त्रकर्तारो भूतबलिपुष्पदन्तादयो वीतरागद्वेष-मोहा मुनिवरा:।

हिन्दी अनुवाद

ऐसा ही श्रुतावतार में भी कहा है-

श्लोकार्थ-इसके अनंतर पुष्पदंत मुनि ने भी उस अपने भगिनीपुत्र (भानजे) जिनपालित को पढ़ाने के लिए इस करहाट नगर में छह खण्डों के द्वारा गुणस्थान, जीवसमास आदि बीस प्रकार की सत्प्ररूपणा से युक्त कर्मप्रकृति से युक्त प्रकरण का संक्षेप में सम्यक् रीति से जीवस्थानादि अधिकार की रचना की।।१३४-१३५।।

उन सौ सूत्रों को पढ़ाकर अनंतर भूतबलि गुरु के निकट उनका अर्थ जानने के लिए भेजा। वह जिनपालित भी शिष्यबुद्धि से उनके पास पहुँचे।।१३६।।

इसके अनंतर महात्मा भूतबलि ने उन पुष्पदन्त आचार्य के शिष्य जिनपालित द्वारा पढ़ी गई सत्प्ररूपणा को सुनकर जिनवाणी के पिपासु भव्य जीवों को अल्प आयु तथा अल्पबुद्धि का जानकर तथा पुष्पदंत गुरु के षट्खंडागम की रचना के अभिप्राय को जानकर द्रव्यप्ररूपणा अधिकार के बाद पुष्पदन्त गुरु द्वारा लिखित जिनपालित द्वारा सुनाए गए सौ सूत्रों सहित छह हजार सूत्र प्रमाण की रचना कर तीस हजार सूत्रों के ग्रथनपूर्वक छठे महाबन्ध नामक को बनाया। उन पाँच खण्डों के नामों को कहते हैं सो सुनिये।।१३७-३८-३९-४०।।

इनमें पहला जीवस्थान, दूसरा क्षुल्लकबन्ध (क्षुद्रकबंध), तीसरा बन्धस्वामित्व, चौथा वेदनाखण्ड तथा पाँचवां वर्गणा खण्ड थे।।१४१।।

इस प्रकार भूतबलि महाराज ने षट्खंडागम ग्रंथ की रचना की। अनंतर असद्भाव स्थापना से पुस्तकों में आरूढ़ कर-लिपिबद्ध करके चातुर्वण्र्य संघ की सन्निधि में ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन पुस्तक संबंधि उपकरणों-वेष्टन आदि द्वारा विधिपूर्वक पूजा की।।१४२-१४३।।

उस कारण से यह ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी की तिथि श्रुतपंचमी के नाम से पर्व के रूप में अत्यन्त प्रसिद्धि को प्राप्त हुई, जिसके कारण जैन समुदाय आज भी इस दिन श्रुतज्ञान की पूजा करते हैं।।१४४।।

तदनन्तर भूतबलि महाराज ने उन जिनपालित मुनि से पुष्पदन्त गुरु के निकट षट्खंडागम नामक यह पुस्तक भिजवाई।।१४५।।

इसके पश्चात् पुष्पदंत गुरु ने भी जिनपालित के हाथ में सुस्थित षट्खंडागम ग्रंथ को भले प्रकार से देखकर आश्चर्य में पड़ते हुए-‘अरे! मेरे द्वारा विचारा गया कार्य सम्पन्न हो गया’’ कह कर समस्त अंगों में उल्लास से भरकर चातुर्वण्र्य-मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविकारूप संघ से युक्त होकर पूजा की।।१४६-१४७।।

उन पुष्पदंत आचार्य ने भी भूतबलि आचार्य की भाँति उसी तरह गंध, अक्षत, माला, वस्त्र, चन्दोवा, घण्टा, ध्वजा आदि के द्वारा श्रुतपंचमी के दिन सिद्धान्त महागम की पूजा करवाई।।१४८।।

इस प्रकार षट्खण्डागम सूत्र की उत्पत्ति का प्ररूपण करके फिर इस समय कषायप्राभृत सूत्र की उत्पत्ति कहता हूँ।।१४९।।

इसलिए मूलतन्त्रकर्ता श्रीवर्धमान भगवान् हैं, अनुतन्त्रकर्ता-उनकी वाणी के अनुसरण कर्ता गौतम स्वामी हैं, उपतन्त्रकर्ता-परंपरा से ग्रंथकर्ता श्री भूतबलिपुष्पदन्तादि राग, द्वेष, मोह से रहित मुनिवर हैं।

किमर्थं कर्ता प्ररूप्यते

किमर्थं कर्ता प्ररूप्यते ? शास्त्रस्य प्रामाण्यप्रदर्शनार्थम् ‘‘वत्तृकप्रामाण्याद् वचनप्रामाण्यम्’’ इति न्यायात्।[२९] अत्र एतज्ज्ञायते यत् जिनपालितमुने: पाठनार्थं श्रीपुष्पदंतगुरुणा सत्प्ररूपणासूत्राणि विरचितानि पुन: द्रव्यप्रमाणानुगमं आदौ कृत्वा पूर्णरूपेण षट्खण्डागमे विभक्तानि सर्वाणि सूत्राणि भूतबलिसूरिणा विरचितानि सन्ति। अतएव अस्य षट्खण्डागमग्रन्थस्य ‘‘निमित्तं जिनपालित:’’[३०] इति उक्त श्रीवीरसेनाचार्येण। षट्खण्डागमस्य षट् टीका:- अधुना अस्य सिद्धान्तग्रन्थस्य टीकाकाराणां नामोल्लेखं क्रियते संक्षेपेण- सर्वप्रथम एषां आद्यानां त्रयखंडानां ‘परिकर्म नाम’ टीकाकर्ता श्रीकुंदकुदाचार्यो बभूव। विद्वद्भि: अस्य काल: विक्रमाब्दस्य द्वितीयशताब्दि: अनुमीयते।

उक्त च-

एवं द्विविधो द्रव्यभावपुस्तकगत: समागच्छन्।

गुरुपरिपाट्या ज्ञात:, सिद्धान्त: कुण्डकुन्दपुरे।।१६०।।
श्रीपद्मनन्दिमुनिना, सोऽपि द्वादशसहस्रपरिमाण:।
ग्रन्थपरिकर्मकत्र्रा, षट्खण्डाद्य-त्रिखण्डस्य।।१६१[३१]।।

हिन्दी अनुवाद

शंका-ग्रंथकर्ता का प्ररूपण किसलिए किया जाता है ?

समाधान-शास्त्र की प्रमाणता दिखाने के लिए कर्ता का प्ररूपण किया जाता है, क्योंकि ‘‘वक्ता की प्रमाणता से ही वचनों में प्रमाणता आती है’’ ऐसा न्याय है।

यहाँ ऐसा जानना चाहिए कि जिनपालित मुनि को पढ़ाने के लिए श्री पुष्पदन्त गुरु ने सत्प्ररूपणा सूत्रों को रचा था पुन: द्रव्यप्रमाणानुगम को आदि करके पूर्णरूप से षट्खण्डागम में विभक्त सभी सूत्र भूतबली आचार्य के द्वारा रचे गये हैं। अतएव षट्खण्डागम ग्रंथ की रचना में निमित्त जिनपालित हैं ऐसा श्रीवीरसेनाचार्य ने कहा है।

अब इस सिद्धान्त ग्रंथ के टीकाकारों का नामोल्लेख संक्षेप में करते हैं—

सबसे पहले इस ग्रंथ के आदि के तीन खण्डों पर ‘‘परिकर्म’’ नाम की टीका के कर्ता श्री कुन्दकुन्दाचार्य हुए। कुछ विद्वानों के द्वारा उनका काल विक्रम की द्वितीय शताब्दी माना गया है।

कहा भी है-

श्लोकार्थ-इस प्रकार द्रव्य-भावरूप पुस्तक गत दो प्रकार का सिद्धांत गुरुपरिपाटी से कुण्डकुन्दपुर में पद्मनंदी मुनि द्वारा (प्रचलित नाम आचार्य कुन्दकुन्द) द्वारा जाना गया। उन्होेेंने भी बारह हजार श्लोक प्रमाण परिकर्म नामक टीका ग्रंथ की रचना षट्खंडागम के आदि के तीन खंडों पर टीका या भाष्य रूप में की।।१६०-१६१।।

तदनु श्रीशामकुंडाचार्यकृत-पद्धतिनामा टीका अभूत्।

तदनु श्रीशामकुंडाचार्यकृत-पद्धतिनामा टीका अभूत्। षष्ठं खंडं विहाय पंचखण्डानां कषायप्राभृतग्रन्थस्यापि च टीका द्वादशसहस्रश्लोकप्रमाणास्ति, संस्कृत-प्राकृत-कन्नडभाषा-मिश्रिता। अस्या: टीकाया: कालो विक्रमाब्दस्य तृतीयशताब्दि: अनुमीयते।

तत्पश्चात् तुम्बुलूरग्रामवासी श्रीतुंबुलूराचार्यो द्वयो: सिद्धान्तग्रन्थयो: महाबंधनाम्ना षष्ठखंडेन विना ‘चूड़ामणि:’ नामा टीका रचिता। इयं टीका चतुरशीतिसहस्रश्लोकप्रमितासीत् कर्णाटभाषया, पुन: षष्ठखंडे ‘पंचिकानामा’ व्याख्या सप्तसहस्रश्लोकप्रमाणा कृता। अस्याचार्यस्य काल: विक्रमाब्दस्य चतुर्थशताब्दि: अनुमीयते।
चतुर्थी टीका तार्विककार्केण श्रीसमन्तभद्रस्वामिना रचिता संस्कृत-मृदुसरलभाषया षष्ठं खण्डं अन्तरेण पंचखण्डानामुपरि अष्टचत्वािंरशत्सहस्रश्लोकप्रमितासीत्। अस्यापि सूरे: कालो विक्रमाब्दस्य पंचमशताब्दिरनुमीयते।
तदनु श्रीवप्पदेवगुरुणा गुरुपरंपरया सिद्धान्तज्ञानं संप्राप्य महाबंधमन्तरेण पंचखंडानामुपरि ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति:’ टीका रचिता, पश्चात् षष्ठखण्डस्य संक्षिप्ता व्याख्या लिखिता। पंचखंडस्य कषायप्राभृतस्य च टीकाया: प्रमाणं षष्ठिसहस्रश्लोकप्रमितमासीत्, महाबन्धस्य टीकाया: प्रमाणं पंचाधिक-अष्टसहस्रश्लोकप्रमितं च। इयं टीका प्राकृतभाषायां श्रूयते। अस्याचार्यस्य काल: विक्रमाब्दस्य षष्ठस्याष्टमस्य च शताब्दिमध्ये अनुमीयते।[३२]
संप्रति इमा: पंच टीका: नोपलभ्यन्ते, अस्माकं जैनधर्मावलम्बिनां दौर्भाग्येन एता: सर्वा: कालस्यास्ये समाविष्टा: केवलं ग्रन्थेषु एव श्रूयन्ते।

तदनन्तरं श्रीवीरसेनाचार्येण कृता ‘धवला’ नामधेया इयं टीका वर्तमानकाले उपलब्धास्ति।

हिंदी अनुवाद

उसके पश्चात् श्रीशामकुंड आचार्य ने ‘‘पद्धति’’ नामकी टीका लिखी। छठे खण्ड को छोड़कर पाँच खण्डों की तथा कषायप्राभृतग्रंथ की टीका बारह हजार श्लोक प्रमाण है और वह टीका संस्कृत, प्राकृत, कन्नड़ भाषा मिश्रित लिखी गई है। इस टीका का काल विक्रम की तृतीय शताब्दी अनुमानित किया जाता है।

तत्पश्चात् ‘‘तुम्बुलूर’’ ग्रामवासी श्रीतुम्बुलूर नामके आचार्य ने दोनों सिद्धांत ग्रंथों पर ‘‘महाबन्ध’’ नामके छठे खंड के बिना (पाँच खण्डों पर) ‘‘चूड़ामणि’’ नामकी टीका लिखी। यह टीका कर्नाटक भाषा में चौरासी हजार श्लोक प्रमाण थी, पुन: छठे खंड पर ‘‘पंचिका’’ नामकी व्याख्या सात हजार श्लोक प्रमाण की थी। अनुमानत: इन आचार्यश्री का काल विक्रमसंवत् की चतुर्थ शताब्दी माना जाता है।

चौथी टीका तार्विकसूर्य श्रीसमन्तभद्र स्वामी के द्वारा मिष्ट, सरल संस्कृत भाषा में रची गई, जो कि छठे खंड को छोड़कर पाँच खण्डों के ऊपर अड़तालीस हजार श्लोक प्रमाण है। इन आचार्यश्री का काल विक्रम की पाँचवीं शताब्दी अनुमानित किया जाता है।

उसके बाद श्रीवप्पदेवगुरु ने गुरुपरम्परा से सिद्धांतज्ञान को प्राप्त करके महाबन्ध के अतिरिक्त पाँच खण्डों के ऊपर ‘‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’’ टीका लिखी, पुन: छठे खंड की संक्षिप्त व्याख्या लिखी। पाँच खंडों की एवं कषायप्राभृत की टीका का प्रमाण साठ हजार श्लोक प्रमाण है और महाबंध की टीका का प्रमाण पाँच अधिक आठ हजार श्लोक है। यह टीका प्राकृतभाषा में सुनी जाती है। इस टीका के कर्ता आचार्य का काल विक्रम की छठी और आठवीं शताब्दी के मध्य में अनुमानित किया जाता है।

आज वर्तमान में ये पाँचों टीकाएँ उपलब्ध नहीं हैं, हम जैनधर्मावलम्बियों के दुर्भाग्य से वे सभी टीकाएँ काल के मुख में समाविष्ट हो गर्इं और केवल ग्रंथो मेें ही इनकी महिमा सुनने को मिलती है।

विशेषार्थ—यद्यपि जैनसिद्धांत के समस्त ग्रंथों का लेखन लगभग दो हजार वर्षों से ही सुनने और देखने में आता है, उससे पूर्व का कोई गं्रथ उपलब्ध नहीं है फिर भी बीच के इस दीर्घ काल में मुगल एवं अन्य सम्प्रदायों के शाही राजतन्त्र ने जैन सम्प्रदाय के मंदिरों को एवं ग्रंथों को भारी क्षति पहुँचाई। उस समय जैन लोग अहिंसक बने, घरों में बैठे अपने धर्मायतनों पर होते अत्याचारों को सहन करते रहे। उसी का दुष्परिणाम है कि हमारे आचार्यों द्वारा दी गई अमूल्य निधियाँ समाप्त हो गर्इं और उनका लाभ समाज नहीं उठा सका।

आचार्य श्रीकुन्दकुन्द स्वामी द्वारा रचित चौरासी पाहुड़ ग्रंथ सुने जाते हैं किन्तु वर्तमान में उनके केवल ९ ग्रंथ ही उपलब्ध हो रहे हैं, शेष ७५ ग्रंथ संभवत: इसी तरह नष्ट-भ्रष्ट हो गये। काल की यह स्थिति देखकर ही बीसवीं सदी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज ने धवल, जयधवल, महाधवल गं्रथों को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करने की श्रावकों को प्रेरणा दी थी तथा उन ग्रंथों के हिन्दी अनुवाद हेतु विद्वानों को प्रेरणा प्रदान की थी, जिसके फलस्वरूप आज देशभर के मंदिरों, पुस्तकालयों में वे ग्रंथ उपलब्ध हो रहे हैं। उन्हीं ग्रंथों की प्रस्तावनाओं में विद्वानों ने खोज के आधार पर उपर्युक्त टीका-ग्रंथों का वर्णन किया है।

उसके पश्चात् श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा रचित ‘‘धवला’’ नाम की टीका वर्तमान में उपलब्ध है। श्रुतावतार कथा में लिखा भी है—

उक्त च श्रुतावतारे-

उक्त च श्रुतावतारे-

काले गते कियत्यपि तत: पुनश्चित्रकूटपुरवासी।

श्रीमानेलाचार्यो बभूव सिद्धान्ततत्त्वज्ञ:।।१७७।।
तस्य समीपे सकलं, सिद्धान्तमधीत्य वीरसेनगुरु:।
उपरितमनिबंधना-द्यधिकारानष्ट च लिलेख।।१७८।।
आगत्य चित्रकूटात्तत: स भगवान् गुरोरनुज्ञानात्।
वाटग्रामे चात्राऽनतेन्द्रकृतजिनगृहे स्थित्वा।।१७९।।
व्याख्याप्रज्ञप्तिमवाप्य पूर्वषट्खण्डतस्ततस्तस्मिन्।
उपरितमबन्धनाद्यधिकारैरष्टादशविकल्पै: ।।१८०।।
सत्कर्मनामधेयं षष्ठं खण्डं विधाय संक्षिप्य।
इति षष्णां खण्डानां, ग्रन्थसहस्रैद्र्विसप्तत्या।।१८१।।
प्राकृतसंस्कृतभाषा-मिश्रां टीकां विलिख्य धवलाख्याम्।
जयधवलां च कषायप्राभृतके चतस¸णां विभक्तीनां।।१८२।।
विंशतिसहस्रसद्ग्रन्थरचनया संयुतां विरच्य दिवम्।
यातस्तत: पुनस्तच्छिष्यो जयसेन-गुरुनामा।।१८३।।
तच्छेषं चत्वारिंशता सहस्रै: समापितवान्।
जयधवलैवं षष्ठिसहस्रग्रन्थोऽभवट्टीका[३३]।।१८४।।

हिंदी अनुवाद

गाथार्थ—कितना ही समय व्यतीत होने पर इसके बाद फिर चित्रपुर में रहने वाले श्रीमान् एलाचार्य सिद्धांत तत्त्व को जानने वाले हुए।।१७७।।

उन चित्रकूटपुर में निवास करने वाले श्रीमान् एलाचार्य के निकट सम्पूर्ण सिद्धांतों को पढ़कर वीरसेन गुरु ने उपरितम निबन्धनादि आठ अधिकारों को लिखा।।१७८।।

तदनन्तर भगवान् वीरसेनाचार्य गुरु के आदेश से चित्रकूटपुर से आकर वाटग्राम में यहाँ के आनतेन्द्र द्वारा निर्मित जिनमंदिर में ठहरकर उसमें वप्पदेव गुरु द्वारा रचित ‘‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’’ नामक टीका प्राप्त कर पूर्व षट्खण्ड से अर्थात् षट्खंडागम के छठवें (महाबन्ध) खण्ड को छोड़ कर शेष पाँच खण्डों की उपरितम निबन्धनादि अठारह अधिकारों द्वारा ‘‘सत्कर्म’’ नामक तथा छठे खण्ड को संक्षिप्त किया। इस प्रकार छहों खण्डों की बहत्तर हजार श्लोक प्रमाण प्राकृत, संस्कृत मिश्रित ‘‘धवला’’ नामक टीका को लिखकर कषायप्राभृत पर चार विभक्तियों की बीस हजार श्लोक प्रमाण ‘‘जयधवला’’ नामक टीका लिखकर स्वर्गवासी हो गये। तत्पश्चात् उनके शिष्य जयसेन अपरनाम जिनसेन ने उनके (कषायप्राभृत-जिस पर वीरसेनाचार्य ने जयधवला टीका लिखी) शेष भाग टीका को उससे आगे चालीस हजार श्लोक प्रमाण में लिख कर उसे समाप्त किया। इस प्रकार कषायप्राभृत की जयधवला टीका साठ हजार श्लोक प्रमाण हुई।। १७९ से १८४ तक।।

एतेन ज्ञायते श्रीमान् एलाचार्यो श्रीवीरसेनस्य शिक्षागुरु:

एतेन ज्ञायते श्रीमान् एलाचार्यो श्रीवीरसेनस्य शिक्षागुरु:, अस्य समीपे एव अनेन सिद्धान्तस्याध्ययनं कृतं। पुनश्च व्याख्याप्रज्ञप्तिनामधेयां षट्खण्डागमस्य टीकां श्रीवप्पदेवगुरुणा कृतां संप्राप्याधीत्य च प्राकृतसंस्कृतभाषामिश्रां धवलाख्यां टीकां द्विसप्ततिसहस्रश्लोकप्रमाणै: व्यरचयत्। तदनु कषायप्राभृत-सिद्धान्तग्रन्थस्य जयधवलाख्यां टीकां आरभ्य विंशतिसहस्रश्लोकप्रमितं रचयित्वा समाधिमरणमवाप्नोत्। पश्चात् तस्य शिष्य: जयसेन[३४] मुनि: गुरुदेवस्यावशेषकार्यं पूरयितव्यमिति मत्वा चत्वारिंशत्सहस्रश्लोक-प्रमाणामिमां जयधवलाटीकां अपूरयत्।

अस्या धवलाटीकाया: समापनकालो विद्वद्भि: एवं निर्णीयते।
अष्टत्रिंशदधिक-सप्तशततमे शकसंवत्सरे कार्तिकमासि शुक्लपक्षे त्रयोदशीतिथौ इयं धवलाटीका पूर्णा जाता। तदनुसारं अष्टदिनांके, अक्टूबरमासे षोडशाधिकाष्टशततमे खिष्टाब्दे बुधवारदिवसे असौ टीका संपन्नाभवत्[३५]
तत: बृहत्कायधवलाटीकापेक्षया टीकासहितस्यास्य ग्रन्थस्य वीरसेनस्वामी अपि कथंचित् ग्रन्थकर्ता भवितुमर्हति।
अत्र गद्यरूपा टीकायां यत् श्लोकप्रमाणसंख्या: कथ्यंते तदनुष्टुपि छन्दसि श्लोके चतु:पादेषु द्वात्रिंशदक्षरा: भवन्ति। अनेन द्वात्रिंशदक्षरप्रमाणेन प्रमाणपदेन श्लोकानां संख्या गण्यन्ते। उक्त च-
‘‘तत्थ पमाणपदं अट्ठक्खरणिप्पण्णं, जहा, ‘‘धम्मो मंगलमुक्कट्ठं’’ इच्चाइ। एदेहि चदुहि पदेहि एगो गंथो[३६]।’’
एवं श्रुतावतारकथां निरूप्य ग्रन्थकर्तारो निरूपिता: सन्ति।


हिंदी अनुवाद

इससे यह ज्ञात होता है कि श्रीमान् एलाचार्य श्रीवीरसेनस्वामी के शिक्षागुरु थे, उनके समीप ही उन्होंने सिद्धान्त का अध्ययन किया था। पुन: श्रीवप्पदेवगुरु द्वारा रचित षट्खंडागम की ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’ नामक टीका को प्राप्त करके और पढ़ करके प्राकृत, संस्कृत भाषा से मिश्रित बहत्तर हजार श्लोक प्रमाण ‘‘धवला’’ नाम की टीका रची। उसके पश्चात् ‘‘कषायप्राभृत’’ सिद्धांत ग्रंथ की ‘‘जयधवला’’ नाम की टीका प्रारंभ करके बीस हजार श्लोक प्रमाण उसकी रचना करके वे वीरसेन स्वामी समाधिमरण को प्राप्त हो गये। पुन: उनके शिष्य ‘जयसेन’ मुनि ने ‘‘गुरुदेव के अवशेष कार्य को पूर्ण करना चाहिए’’ ऐसा सोचकर चालीस हजार श्लोक प्रमाण उस जयधवला टीका को लिखकर पूर्ण किया। विद्वान लोग इस धवला टीका का समापन काल इस प्रकार निर्णीत करते हैं— शक संवत् सात सौ अड़तीस (७३८)में कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में त्रयोदशी तिथि को यह धवला टीका पूर्ण हुई, तदनुसार ८ अक्टूबर सन् ८१६ बुधवार के दिन प्रात:काल में यह टीका सम्पन्न हुई थी। उसके पश्चात् वृहत्काय धवला टीका की अपेक्षा से टीका सहित इस ग्रंथ के कर्ता कथंचित् श्रीवीरसेन स्वामी भी माने जाते हैं। यहाँ गद्यरूप टीका में जो श्लोक प्रमाण संख्या कही गई है वह अनुष्टुप् छन्द के श्लोक के चार चरणों में जो बत्तीस अक्षर (३२) अक्षर होते हैं उन्हीं बत्तीस अक्षर प्रमाण से प्रमाणपद के द्वारा श्लोकों की संख्या इसमें गणना की जाती है। कहा भी है— ‘‘वह प्रमाणपद आठ अक्षरों से निष्पन्न होता है, यथा—‘‘धम्मो मंगलमुक्कट्ठं’’ इसमें ८ अक्षर हैं इत्यादि। इसी प्रकार के ८ अक्षर के ४ पदों से एक ग्रंथ—श्लोक बनता है। इस प्रकार श्रुतावतार कथा का निरूपण करके ग्रंथकत्र्ता आचार्यों का निरूपण हो जाता है।

षट्खण्डागमादिसिद्धान्तग्रन्थानां स्थायित्वं

अस्मिन् विंशतिशताब्दौ प्रथमाचार्येण चारित्रचक्रवर्ति-श्रीशांतिसागरगुरुदेवेन एकदा वारामतीनगर्यां गुरुभक्तानां श्रीमतां धीमतां च सभामध्ये सिद्धान्तश्रुत-संरक्षणचिंतया धवलाटीकासमेत: षट्खंडागमो, जयधवलाटीकासमेत: कषायप्राभृतग्रन्थो, महाधवलाटीकासमेतो महाबंधग्रन्थश्चेति त्रयाणामपि सिद्धान्तमहाग्रन्थानां ताम्रपत्राणामुपरि टंकोत्कीर्णार्थं अन्येषामपि पूर्वाचार्यप्रणीतग्रन्थानां प्रकाशनार्थं च प्रेरणा कृता। तदानीं आचार्यदेवस्य प्रेरणयाशीर्वादेन च तत्काले फाल्गुनकृष्णाद्वितायायां एकसप्तत्यधिक-चतुर्विंशतिशततमे वीराब्दे ‘‘श्री १०८ चारित्रचक्रवर्ति-आचार्यशांतिसागरदिगम्बरजैनजिनवाणीजीर्णोद्धारक-संस्था’’ इति नाम्ना एकस्या: संस्थाया: स्थापना संजाता।


तत: प्रभृति अनेके विद्वान्स: श्रेष्ठिनश्च ग्रन्थप्रकाशनकार्येषु संलग्ना: बभूवु:। तदा नववर्षान्तरं अशीत्यधिकचतुर्विंशतिशततमे वीराब्दे फल्टननाम्नि नगरे गुरूणां गुरो: श्रीशांतिसागराचार्यवर्यस्य हीरक- जयन्तीमहोत्सवे गजराजस्योपरि ग्रन्थान् समारोप्य महामहोत्सवेन सह शोभायात्रां कृत्वा मुद्रितास्ताम्रपत्रोत्कीर्णा ग्रन्थाश्च विद्वद्गण-श्रेष्ठिवर्गसमन्वितै: समस्तश्रावकजनै: श्रीशांतिसागरसूरे: करकमलयो: समर्पिता:।

हिंदी अनुवाद

षट्खण्डागम आदि सिद्धांतग्रंथों का स्थायित्व कैसे हुआ यह बताते हैं-

इस बीसवीं शताब्दी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर गुरुदेव ने एक बार ‘‘बारामती’’ नगरी में गुरुभक्त श्रेष्ठी एवं विद्वानों की सभा में सिद्धांत श्रुत ग्रंथों के संरक्षण की चिंता से धवला टीका सहित षट्खंडागम, जयधवला टीका समेत कषायप्राभृत ग्रंथ एवं महाधवला टीका समन्वित महाबन्ध इन तीनों महाग्रंथों को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराने की तथा अन्य भी पूर्वाचार्य प्रणीत ग्रंथों के प्रकाशन की प्रेरणा प्रदान की।

तब आचार्यदेव की प्रेरणा और आशीर्वाद से तत्काल में फाल्गुन कृष्णा द्वितीया को चौबीस सौ इकहत्तर (२४७१) वीर निर्वाण संवत् में ‘‘श्री १०८ चारित्रचक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर दिगम्बर जैन जिनवाणी जीर्णोद्धारक संस्था’’ के नाम से एक संस्था की स्थापना हुई।

तब से ही अनेक विद्वान् और श्रेष्ठी ग्रंथ प्रकाशन के कार्यों में संलग्न हो गये। तब नौ (९) वर्ष के बाद चौबीस सौ अस्सी (२४८०) वीर निर्वाण संवत् में ‘‘फल्टण’’ नामक नगर में गुरुणांगुरु श्री शांतिसागर आचार्यवर्य के हीरक जयंती महोत्सव में हाथी के ऊपर ग्रंथो को विराजमान करके महामहोत्सवपूर्वक शोभायात्रा निकाल कर मुद्रित एवं ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण ग्रंथो को विद्वानों एवं श्रेष्ठियों से समन्वित समस्त श्रावक बन्धुओं ने श्री शांतिसागर महाराज के करकमलों में समर्पित किया था।


टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम (धवलाटीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. १०० से १०९।
  2. गोम्मटसारजीवकाण्ड, ज्ञानमार्गणा, गाथा ३४४।
  3. गोम्मटसारजीवकाण्ड, ज्ञानमार्गणा, गाथा ३४७।
  4. कसायपाहुड़ पुस्तक १, पृ. १५१।
  5. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. ११६, टिप्पण से।
  6. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १२३।
  7. कसायपाहुड़ग्रन्थ पुस्तक १, पृ. ९२।
  8. गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा ३३६।
  9. गोम्मटसार जीवकांड, ज्ञानमार्गणा, गाथा ३५१।
  10. कसायपाहुड़ पुस्तक १, पृ. ९८।
  11. कसायपाहुड़ पुस्तक १, पृ. ११८।
  12. गोम्मटसार जीवकाण्ड, जीवप्रबोधिनी टीका।
  13. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ९७-९९।
  14. तत्त्वार्थवार्तिक अ. १, सूत्र २०।
  15. तत्त्वार्थवार्तिक अ. १, सूत्र २० के अंतर्गत अंश।
  16. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ६।
  17. कसायपाहुड़ पु. १, पृ. ३।
  18. जिनस्तोत्रसंग्रह (वीर ज्ञानोदय गं्रथमाला, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से प्रकाशित)।
  19. जिनस्तोत्रसंग्रह (वीर ज्ञानोदय गं्रथमाला, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से प्रकाशित)।
  20. जिनस्तोत्रसंग्रह (वीर ज्ञानोदय गंथमाला, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से प्रकाशित)।
  21. श्रुतस्कंधविधान (वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से प्रकाशित)।
  22. श्रुतावतारकथा श्रीइन्द्रनंदिविरचित।
  23. श्रुतावतारकथा।
  24. श्रुतावतार:।
  25. ‘‘विंसदि-सुत्ताणि’’ षट्खण्डागम पु. १ (धवला टीका समन्वित), पृ. ७२।
  26. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ८।
  27. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक ३, पृ. १।
  28. श्रुतावतार।
  29. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ७३।
  30. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. ६१।
  31. श्रुतावतार।
  32. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, प्रस्तावना प्रकरणे, पृ. ४० से।
  33. श्रुतावतार।
  34. जिनसेनाचार्योऽपि अपरनाम वर्तते।
  35. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, प्रस्तावना, पृ. ३९।
  36. कसायपाहुड़, पुस्तक १, पृ. ९०-९१।