026.प्रथम महाधिकार - पर्याय आदि श्रुतज्ञान के भेद......

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प्रथम महाधिकार - पर्याय आदि श्रुतज्ञान के भेद......

धवलाटीकासमेतषट्खण्डागमग्रन्था: तथा मुद्रितास्त्रयोऽपि सिद्धान्तग्रन्था: फल्टननगर्यां श्रीचन्द्रप्रभमंदिरे ‘‘आचार्य श्रीशांतिसागर-श्रुतभाण्डारभवने’’ स्थापिता: सन्ति। एवमेव ताम्रपत्रोत्कीर्णा: जयधवलासमेत-कषायप्राभृतग्रन्था: महाबंधग्रन्थाश्च मुम्बईपत्तने कालवादेवीदिगम्बरजैनमंदिरे स्थापिता: सन्तीति ज्ञातव्यं।

वर्तमानकाले इह पृथिव्यां जैनधर्मावलम्बि-श्रावकाणामुपरि अस्याचार्यदेवस्य महानुपकारो वर्तते। जैनश्रुतसुरक्षा-करणं प्रकाशनं च ग्रन्थानां, तीर्थक्षेत्रेषु भगवतां मूर्तिनिर्मापणं, दिगम्बरजैनमुनीनां दीक्षाशिक्षादानं आर्यिका-दीक्षादानं क्षुल्लक-क्षुल्लिकादीक्षादानं च कृत्वा चतुर्विधसंघस्य व्यवस्थापनादिकार्यं कृतं गुरुदेवेन श्री चारित्रचक्रवर्तिनाचार्येण।
अस्य प्रथमाचार्यस्योपकारं स्मारं स्मारं अस्मै नमोऽस्तु विधीयते मया कोटिश:।
अथ पर्यायाक्षरादिश्रुतज्ञानानि कथ्यंते-
अत्र ग्रन्थकर्तृ-प्रकरणे गौतमगणधरादिभि: ग्रथित-अंग-पूर्वाणां अंगबाह्यप्रकीर्णकानां च लक्षणं संक्षेपेण कथितं। अधुना पर्यायाक्षरपदसंघातादिश्रुतज्ञानभेदानां संक्षिप्तलक्षणं वक्ष्यते। अथवा अग्रे द्वितीयसूत्रस्य टीकायां अक्षरपदसंघातप्रतिपत्तिअनुयोगद्वाराणां नामानि पुन: पुनरागतानि तेषां किं लक्षणमिति पृच्छायां अत्र संक्षेपेण विवेच्यते-
अस्मिन् श्रुतज्ञानप्रकरणे अक्षरानक्षरात्मकयो: शब्दज-लिंगजयो: श्रुतज्ञान-भेदयोर्मध्ये शब्दजं, वर्णपदवाक्यात्मकशब्दजनितं श्रुतज्ञानं प्रधानं दत्तग्रहणशास्त्राध्ययनादिसकलव्यवहाराणां तन्मूलत्वात्। अनक्षरात्मकं तु लिंगजं श्रुतज्ञानं एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यंतेषु जीवेषु विद्यमानमपि व्यवहारानुपयोगित्वादप्रधानं भवति।
अथ श्रुतज्ञानस्य अक्षरानक्षरात्मकभेदौ प्ररूपयति-
पज्जायक्खरपदसंघादं, पडिवत्तियाणिजोगं च।
दुगवारपाहुडं च य, पाहुडयं वत्थु पुव्वं च।।३१७।।
तेसिं च समासेहि य, वीसविधं वा हु होदि सुदणाणं।
आवरणस्स वि भेदा, तत्तियमेत्ता हवंतित्ति।।३१८।।,

हिन्दी अनुवाद- पर्याय आदि श्रुतज्ञान के भेद

आज भी ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण धवला टीका समेत षट्खंडागम ग्रंथ तथा मुद्रित तीनों ही सिद्धांत ग्रंथ फल्टण नगरी के ‘‘श्रीचंद्रप्रभ मंदिर में’’ ‘‘आचार्य श्री शांतिसागर श्रुतभण्डार’’ नामक भवन में स्थापित-विराजमान हैं। इसी प्रकार ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण जयधवला टीका सहित कषायप्राभृत ग्रंथ तथा महाबन्ध ग्रंथ मुम्बई शहर के ‘‘कालवा देवी दिगम्बर जैन मंदिर’’ में स्थापित हैं ऐसा जानना चाहिए। वर्तमान काल में इस पृथ्वी पर जैन धर्मावलम्बी श्रावकों पर इन आचार्य देव का महान् उपकार है। जैन श्रुत की सुरक्षा करने का और ग्रंथों के प्रकाशन का, तीर्थक्षेत्रों पर भगवन्तों की मूतियाँ निर्माण की प्रेरणा देकर, दिगम्बर जैन मुनियों को दीक्षा-शिक्षा देकर, आर्यिका दीक्षा देकर, क्षुल्लक-क्षुल्लिका आदि की दीक्षा प्रदान कर उन शांतिसागर गुरुदेव ने चतुर्विध संघ की व्यवस्था बनाई थी। अब पर्यायाक्षर आदि श्रुतज्ञानों का कथन करते है— इन प्रथमाचार्य के उपकारों को स्मरण करते हुए मेरा उन्हें बारम्बार नमस्कार है। यहाँ ग्रंथकर्ता के प्रकरण में गौतम गणधर आदि के द्वारा गूँथे गए अंग-पूर्वों का, अंगबाह्य और प्रकीर्णकों का लक्षण संक्षेप में किया गया। अब पर्याय, अक्षर, पद, संघात आदि श्रुतज्ञान के भेदों का संक्षेप में लक्षण कहेंगे अथवा द्वितीय सूत्र की टीका के अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्ति, अनुयोगद्वारों के नाम पुन:-पुन: आने वाले हैं, उनके लक्षण क्या हैं ? ऐसी पृच्छा होने पर यहाँ संक्षिप्त विवेचन करते हैं— इस श्रुतज्ञान के प्रकरण में अक्षरात्मक, अनक्षरात्मक तथा शब्दज और लिंगज श्रुतज्ञान के इन दो भेदों में से शब्दज श्रुतज्ञान का लक्षण कहते हैं— वर्ण, पद, वाक्यों से उत्पन्न हुआ ज्ञान शब्दज श्रुतज्ञान कहलाता है, वह श्रुतज्ञान प्रधानता से दत्त-देना, ग्रहण करना, शास्त्र अध्ययन आदि समस्त व्यवहारों का मूल है। अनक्षरात्मक ज्ञान लिंगज श्रुतज्ञान है, वह एकेन्द्रिय आदि जीवों से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त सभी जीवों में विद्यमान रहते हुए भी व्यवहार में उपयोगी न होने के कारण अप्रधान-गौण रहता है। अब श्रुतज्ञान के अक्षर एवं अनक्षरात्मक दोनों भेदों का प्ररूपण करते हैं—

गाथार्थ—पर्याय, अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्तिक, अनुयोग, प्राभृत-प्राभृत, प्राभृतक, वस्तु और पूर्व इन सबमें ‘समास’ शब्द जोड़ने से श्रुतज्ञान के बीस भेद हो जाते हैं इनमें आवरण के भेद भी उतने ही-बीस होते हैं।।३१७-३१८।।

पर्याय ज्ञान का लक्षण

पर्याय:, पर्यायसमास:, अक्षरं, अक्षरसमास:, पदं, पदसमास:, संघात:, संघातसमास:, प्रतिपत्तिक:, प्रतिपत्तिकसमास:, अनुयोग:, अनुयोगसमास:, प्राभृतक-प्राभृतकं, प्राभृतकप्राभृतकसमास:, प्राभृतकं, प्राभृतकसमास:, वस्तु, वस्तुसमास:, पूर्वं, पूर्वसमासश्चेति।

इतो विस्तर:-श्रुतज्ञानस्य अक्षरानक्षरात्मकौ द्वौ भेदौ, तत्रानक्षरात्मके श्रुतज्ञाने पर्याय-पर्यायसमासौ द्वौ भेदौ स्त:। अक्षरात्मके श्रुतज्ञाने अक्षराक्षरसमासादि-अष्टादशभेदा: सन्ति।
तत्रानक्षरात्मके पर्यायपर्यायसमासलक्षणे सर्वजघन्यज्ञानमादिं कृत्वा स्वोत्कृष्टपर्यंतं असंख्येयलोकमात्रा: ज्ञानविकल्पा भवन्ति। ते च असंख्येयलोकमात्रवारषट्स्थानवृद्ध्या संवर्धिता भवन्ति। अक्षरात्मकं श्रुतज्ञानं अक्षरअक्षरसमासादि-अष्टादशभेदभिन्नं द्विरूपवर्गधारोत्पन्नषष्ठवर्गस्य एकट्ठनाम्नो यावन्ति रूपाणि एकरूपोनानि सन्ति-तावन्ति अक्षराणि अपुनरुक्ताक्षराण्याश्रित्य संख्यातविकल्पं भवति। विवक्षितार्थाभिव्यक्तिनिमित्तं पुनरुक्ताक्षरग्रहणे ततोऽधिकप्रमाणं भवतीत्यर्थ:[१]
अथ पर्यायज्ञानस्य लक्षणं कथ्यते—
पर्यायाख्यं प्रथमं श्रुतज्ञानं तु पुन: सूक्ष्मनिगोदलब्ध्यपर्याप्तकस्य संबंधि सर्वजघन्यं श्रुतज्ञानं भवति।
सूक्ष्मनिगोदलब्ध्यपर्याप्तकस्य जातस्य प्रथमसमये निरावरणं-प्रच्छादन रहितं नित्योद्घाटं अतएव सर्वदा प्रकाशमानं सर्वजघन्यं-सर्वनिकृष्टशक्तिवंâ पर्यायाख्यं श्रुतज्ञानं भवति। यदि अस्य पर्यायज्ञानस्योपरि आवरणं भवेत्तर्हि जीवस्यैव अभावो भवेत् अतो नास्यावरणं। एतल्लब्ध्यक्षरापरनामधेयमपि, लब्धिर्नाम-श्रुत-ज्ञानावरणक्षयोपशम: अर्थग्रहणशक्तिर्वा, लब्ध्या अक्षरं अविनश्वरं लब्ध्यक्षरं तावत: क्षयोपशमस्य सर्वदा विद्यमानत्वात्। द्वितीयादि-समयेषु ज्ञानदर्शनवृद्धिसंभवात्।

हिन्दी अनुवाद-

पर्याय, पर्यायसमास, अक्षर, अक्षरसमास, पद, पदसमास, संघात, संघातसमास, प्रतिपत्तिक, प्रतिपत्तिकसमास, अनुयोग, अनुयोगसमास, प्राभृतक-प्राभृतक, प्राभृतकप्राभृतकसमास, प्राभृतक, प्राभृतकसमास, वस्तु, वस्तुसमास, पूर्व और पूर्वसमास ये कुल बीस भेद हैं। इनका विस्तार से वर्णन करते हैं— श्रुतज्ञान के अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक ये दो भेद हैं, उनमें अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान के दो भेद हैं—पर्याय और पर्याय समास तथा अक्षरात्मक श्रुतज्ञान के अक्षर, अक्षरसमास आदि अठारह भेद हैं। उनमें अनक्षरात्मक पर्याय तथा पर्यायसमास श्रुतज्ञान के लक्षण में सर्वजघन्य ज्ञान को आदि में करके उत्कृष्ट पर्यन्त असंख्येय लोकमात्र ज्ञान के विकल्प-भेद होते हैं। और वे असंख्यात लोक प्रमाण बार-असंख्यात बार षट्स्थान वृद्धिरूप से संवर्धित होते हैं—वृद्धि को प्राप्त होते हैं। अक्षरात्मक श्रुतज्ञान अक्षर, अक्षरसमास आदि अठारह भेदों से भिन्न द्विरूपवर्गधारा में उत्पन्न छठे वर्ग का, जिसका प्रमाण एकट्ठी है उसके प्रमाण में से एक कम करने पर जितने अपुनरुक्त अक्षर होते हैं उतने हैं। ये संख्यात भेदरूप हैं। इसका आशय यह है कि विवक्षित अर्थ को प्रगट करने के लिए पुनरुक्त अक्षरों के ग्रहण करने पर उससे अधिक प्रमाण हो जाता है। अब पर्यायज्ञान का लक्षण कहते हैं— पर्याय नामका जो प्रथम श्रुतज्ञान है वह पुन: सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के सर्वजघन्य रूप से होता है। सूूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीव के जन्म लेने के प्रथम समय में आवरण रहित नित्य उद्घाटित रहता है अतएव हमेशा प्रकाशमान रहने वाला सर्वजघन्य-अत्यन्त निकृष्ट शक्ति वाला पर्याय नामक श्रुतज्ञान होता है। यदि इस पर्यायज्ञान के ऊपर आवरण आ जावे तो जीव का ही अभाव हो जाएगा इसलिए इस ज्ञान पर कभी भी आवरण नहीं पड़ता है। इसका दूसरा नाम लब्ध्यक्षर ज्ञान भी है, श्रुतज्ञानावरण के क्षयोपशम का नाम लब्धि है अथवा अर्थग्रहण की शक्ति भी लब्धि कहलाती है उस लब्धि से अक्षर-अविनश्वर—कभी नष्ट नहीं होने वाला ज्ञान लब्ध्यक्षर कहलाता है क्योंकि उसके उतने मात्र का क्षयोपशम सदैव विद्यमान रहता है। उन जीवों के द्वितीय आदि समयों में ज्ञान-दर्शन की वृद्धि भी संभव है।

अधुना पर्यायसमासप्रकरणं प्ररूपयति-

सर्वजघन्यपर्यायज्ञानस्य उपरि क्रमेण वक्ष्यमाणपरिपाट्या अनंतभागवृद्धि: असंख्यातभागवृद्धि: संख्यातभागवृद्धि: संख्यातगुणवृद्धि: असंख्यातगुणवृद्धि: अनंतगुणवृद्धिश्चेति षट्स्थानपतिता वृद्धयो भवन्ति खलु। द्विरूपवर्गधारायां अनंतानंतानि वर्गस्थानानि अतीत्यातीत्य उत्पन्नानां जीवपुद्गलकालाकाश-श्रेणीनां उपर्युपरि अनंतानंतवर्गस्थानानि अतीत्य सूक्ष्मनिगोदलब्ध्यपर्याप्तकस्य जघन्यज्ञानाविभागप्रतिच्छेदाना-मुत्पत्तिकथनात् तज्जघन्यज्ञानस्यानन्तात्मकभागहार: सुघटन् न विरुद्ध्यते।

पूर्ववृद्धौ-अनन्तभागवृद्धौ सूच्यंगुलासंख्यातभागमात्रवारान् गतायां सत्यां तु पुन: परवृद्धि:-असंख्यातभागवृद्धिरेकवारं भवति खलु स्टंफु, पुनरपि अनंतभागवृद्धौ सूच्यंगुलासंख्यातैकभागमात्रवारान् गतायां सत्यां असंख्यात-भागवृद्धिरेकवारं भवति। अनेन क्रमेण तावद्गन्तव्यं यावदसंख्यातभागवृद्धिरपि सूच्यंगुलासंख्यातैकभागमात्रवारान् गच्छति। तत: पुनरपि अनंतभागवृद्धौ सूच्यंगुलासंख्यातैकभागमात्रवारान् गतायां संख्यातभागवृद्धिरेकवारं भवति। पुनरपि पूर्वोक्तक्रमेण पूर्वपूर्ववृद्धौ सूच्यंगुलासंख्यातभागमात्रवारान् गतायां परवृद्धिरेकवारं भवतीत्यंगुलासंख्यातभागमात्रसंख्यातभागवृद्धौ गतायां पुन: पूर्ववृद्धिषु सर्वासु पूर्वोक्तक्रमेण संख्यातभागवृद्धिरहितं आवर्तितासु संख्यातगुणवृद्धिरेकवारं भवति। इत्यादिप्रकारेण षट्स्थानवृद्धीनां वृत्तिक्रम: गोम्मटसारजीवकाण्डग्रन्थस्य जीवतत्त्वप्रदीपिकाटीकायां दृष्टव्योऽस्ति विशेषजिज्ञासुजनै: नात्र विस्तीर्यते गहनविषयत्वात्।
एवमुक्तप्रकारेण अनक्षरात्मके पर्यायसमासज्ञानविकल्पसमूहे षट्स्थानवारा असंख्यातलोकमात्रा भवन्ति।

अब पर्यायसमास प्रकरण का कथन करते हैं—

सर्वजघन्य पर्यायज्ञान के ऊपर क्रम से वक्ष्यमाण-भाविकथन परिपाटी क्रम से अनंतभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनंतगुणवृद्धि इस प्रकार षट्स्थान पतित वृद्धि होती हैं। द्विरूपवर्गधारा के अनंतानंत वर्गस्थानों को छोड़-छोड़ कर उत्पन्न हुए जीव, पुद्गल, काल, आकाशश्रेणियों के ऊपर-ऊपर अनंतानंत भाग वर्गस्थानों के उल्लंघन करके सूक्ष्मनिगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव के जघन्य ज्ञान के अविभागीप्रतिच्छेदों की उत्पत्ति का कथन किया जाता है, क्योंकि तज्जन्य ज्ञान का अनंतात्मकरूप से भागहार घटित करने में कोई विरोध नहीं आता है।

पूर्ववृद्धि-अनंतभाग वृद्धि के सूच्यंगुल के असंख्यात भाग मात्र बार होने पर परवृद्धि अर्थात् असंख्यातभागवृद्धि एक बार होती है। पुन: अनंतभागवृद्धि सूच्यंगुल के असंख्यात भाग बार होने पर असंख्यातभाग वृद्धि एक बार होती है। इस क्रम से तब तक जानना चाहिए जब तक असंख्यातभागवृद्धि भी सूच्यंगुल के असंख्यात भाग बार होवे। उसके पश्चात् पुन: अनंतभागवृद्धि के सूच्यंगुल के असंख्यात भाग मात्र बार होने पर संख्यात भाग वृद्धि एक बार होती है। पुन: पूर्वोक्त क्रम से पूर्व-पूर्व वृद्धि के सूच्यंगुल के असंख्यात भाग मात्र बार होने पर वृद्धि एक-एक बार होती है। इस प्रकार सूच्यंगुल के असंख्यात भाग मात्र संख्यात भागवृद्धि के होने पर पुन: पूर्वोक्त क्रम से संख्यात भाग वृद्धि के सिवाय सब पूर्व वृद्धियों की आवृत्ति होने पर एक बार संख्यातगुण वृद्धि होती है।

इत्यादि प्रकार से षट्स्थान वृद्धि का वृत्तिक्रम गोम्मटसारजीवकाण्ड ग्रंथ की जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका में विशेष जिज्ञासुओं को देखना चाहिए, यहाँ पर गहन विषय होने से अधिक विस्तार नहीं किया गया है। उक्त प्रकार से अनक्षरात्मक पर्याय समास ज्ञान के भेदों के समूह में असंख्यात लोकमात्र बार षट्स्थान होते हैं।

अक्षरज्ञानं कथ्यते-

सर्वोत्कृष्टपर्यायसमासज्ञानादनन्तगुणमर्थाक्षरज्ञानं भवति। अस्य विस्तर:-

रूपोनैकट्ठमात्रापुनरुक्ताक्षरसंदर्भरूपद्वादशांगश्रुतस्कंधजनितार्थज्ञानं श्रुतकेवलमित्युच्यते। तस्य श्रुत-केवलस्य संख्यातभागमात्रं अर्थाक्षरज्ञानमित्युच्यते। अक्षराज्जातं ज्ञानं अक्षरज्ञानं अर्थविषयं अर्थस्य ग्राहकं ज्ञानं अर्थाक्षरज्ञानं।
अथवा त्रिविधमक्षरं-लब्ध्यक्षरं निर्वृत्त्यक्षरं स्थापनाक्षरं चेति। तत्र पर्यायज्ञानावरणप्रभृतिश्रुतकेवलज्ञाना-वरणपर्यंतक्षयोपशमादुद्भूतात्मनोऽर्थग्रहणशक्तिर्लब्धि: भावेन्द्रियं, तद्रूपं अक्षरं लब्ध्यक्षरं, अक्षर-ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वात्। कंठोष्ठताल्वादिस्थान-स्पष्टतादिकरण-प्रयत्ननिर्वत्त्र्यमानस्वरूपं अकारादि-ककारादि-स्वरव्यञ्जनरूपं मूलवर्णतत्संयोगादिसंस्थानं निर्वृत्त्यक्षरं। पुस्तकेषु तत्तद्देशानुरूपतया लिखितसंस्थानं स्थापनाक्षरम्। एवंविधैकाक्षरश्रवणसंजातार्थज्ञानमेकाक्षरश्रुतज्ञानमिति जिनै: कथितत्वात् किंचित्प्रतिपादितम्।
अत्र श्रुतनिबद्धविषयप्रमाणं दश्र्यते—
पण्णवणिज्जा भावा अणंतभागो दु अणभिलप्पाणं।
पण्णवणिज्जाणं पुण अणंतभागो सुदणिबद्धो।।३३४।।[२]
अनभिलाप्यानां अवाग्विषयाणां केवलं केवलज्ञानगोचराणां भावानां जीवाद्यर्थानां अनंतैकभागमात्रा: भावा: जीवाद्यर्था: प्रज्ञापनीया: तीर्थकरसातिशयदिव्यध्वनिप्रतिपाद्या भवन्ति। पुन: प्रज्ञापनीयानां भावानां जीवाद्यर्थानां अनंतैकभाग: श्रुतनिबद्ध: द्वादशांगश्रुतस्कंधस्य निबद्ध: भवतीत्यर्थ:।[३]
अक्षरसमासलक्षणं कथ्यते—
एकाक्षरजनितार्थज्ञानस्योपरि तु पुन: पूर्वोक्तषट्स्थानवृद्धिक्रमरहिततया एवैकाक्षरेणैव वर्धमाना: द्व्यक्षर-त्र्यक्षरादिरूपोनैकपदाक्षरमात्रपर्यंताक्षरसमुदायश्रवणसंजनिताक्षरसमासज्ञानविकल्पा: संख्येया: द्विरूपोनैकपदाक्षरप्रमितागता:।
वर्तमानकाले इमे अक्षर-अक्षरसमासज्ञाने एवास्मा विद्येते इति अवबुध्यते।

अक्षरज्ञान को कहते हैं—

सर्वोत्कृष्ट पर्याय समास ज्ञान को अनंत से गुणा करने पर अर्थाक्षर श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है। इसी का विस्तार करते हैं- एक कम एक ही मात्र अपुनरुक्त अक्षरों की रचना रूप द्वादशांग श्रुतस्कन्ध से उत्पन्न हुए ज्ञान को श्रुतकेवलज्ञान कहते हैं। उस श्रुतकेवलज्ञान का संख्यातभागमात्र अर्थाक्षरज्ञान कहलाता है। अक्षर से उत्पन्न हुआ ज्ञान अक्षरज्ञान है, अर्थ के विषय को अथवा अर्थ के ग्राहक ज्ञान को अर्थाक्षरज्ञान कहते हैं। अथवा अक्षर तीन प्रकार का है—लब्ध्यक्षर, निर्वृत्यक्षर और स्थापनाक्षर। उनमें से पर्याय ज्ञानावरण से लेकर श्रुतकेवलज्ञानावरण पर्यन्त के क्षयोपशम से उत्पन्न आत्मा के अर्थ को ग्रहण करने की शक्ति लब्धिरूप भावेन्द्रिय है। उस रूप अक्षर लब्ध्यक्षर है क्योंकि वह अक्षर ज्ञान की उत्पत्ति में कारण है। कण्ठ, ओष्ठ, तालु आदि स्थानों की हलन-चलन आदि रूप क्रिया तथा प्रयत्न से जिनके स्वरूप की रचना होती है वे अकारादि स्वर, ककारादि व्यंजनरूप मूलवर्ण और उनके संयोग से बने अक्षर निर्वृत्यअक्षर हैं। पुस्तकों में उस-उस देश के अनुरूप लिखित अकारादि का आकार स्थापनाक्षर है। इस प्रकार के एक अक्षर के सुनने पर उत्पन्न हुआ अर्थज्ञान एकाक्षर श्रुतज्ञान है ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसी के आधार से मैंने किंचित् कहा है। अब श्रुत के विषय को तथा श्रुत में कितना निबद्ध है इसे कहते हैं— गाथार्थ—अनभिलप्य पदार्थों के अनंतवें भाग प्रमाण प्रज्ञापनीय पदार्थ होते हैं और प्रज्ञापनीय पदार्थों के अनंतवें भाग प्रमाण श्रुत में निबद्ध है।।३३४।। जो भाव अनभिलप्य अर्थात् वचन के द्वारा कहने में नहीं आ सकते, मात्र केवलज्ञान के ही विषय हैं ऐसे पदार्थ जीवादि के अनंतवें भाग मात्र प्रज्ञापनीय हैं अर्थात् तीर्थंकर की सातिशय दिव्यध्वनि के द्वारा कहे जाते हैं। पुन: प्रज्ञापनीय जीवादि पदार्थों का अनंतवाँ भाग द्वादशांग श्रुतस्कन्ध के विषयरूप से निबद्ध होता है ऐसा भावार्थ हुआ। अब अक्षर समास का लक्षण कहा जाता है— एक अक्षर से उत्पन्न अर्थज्ञान के ऊपर पूर्वोक्त षट्स्थान पतित वृद्धि के क्रम के बिना एक-एक अक्षर बढ़ते हुए दो अक्षर, तीन अक्षर आदि रूप एक हीन पद के अक्षर पर्यन्त अक्षर समूह के सुनने से उत्पन्न अक्षरसमास ज्ञान के विकल्प संख्यात हैं अर्थात् दो हीन पद के अक्षर प्रमाण हैं। वर्तमान काल में ये अक्षर और अक्षरसमास ज्ञान ही हम लोगों के हैं ऐसा माना जाता है।

पदनामश्रुतज्ञानमुच्यते-

उत्कृष्ट-अक्षरसमासज्ञानस्योपरि एकाक्षरवृद्धौ सत्यां पदनाम श्रुतज्ञानं भवति। पदं त्रिविधं-अर्थपदं, प्रमाणपदं, मध्यमपदं चेति। एतेषां त्रयाणां लक्षणं प्रागेव कथितमस्ति। अत्र परमागमे षोडशशत-चतुस्त्रिंशत्कोट्य: त्र्यशीतिलक्षाणि सप्तसहस्राणि अष्टशतानि अष्टाशीतिश्च अपुनरुक्ताक्षरसमूहो मध्यमपदमेव पदज्ञानं भवति। अस्मिन् पदे एकाक्षरन्यूने सति उत्कृष्टाक्षरसमास: जायते।

पदसमासज्ञानं कथ्यते-
एकपदस्य उक्तप्रमाणाक्षरसमूहस्योपरि एवैकाक्षरवृद्ध्या एकपदाक्षरमात्रेषु पदसमासज्ञानविकल्पेषु गतेषु द्विगुणपदज्ञानं भवति। तस्योपरि पुनरपि एकपदाक्षरमात्रेषु पदसमासज्ञानविकल्पेषु गतेषु त्रिगुणपदज्ञानं भवति एवं प्रत्येकमेकपदाक्षरमात्रविकल्पसहचरितेषु चतुर्गुणपदादिषु संख्यातसहस्रगुणितपदमात्रेषु रूपोनेषु पदसमासज्ञानविकल्पा: भवन्ति।
संघातश्रुतज्ञानं वण्र्यते-
उत्कृष्टपदसमासज्ञानस्य उपरि एकस्मिन्नक्षरे वृद्धे सति संघातश्रुतज्ञानं भवति। तच्चतस¸णां गतीनां मध्ये एकतमगतिस्वरूपनिरूपक-मध्यमपदसमुदायरूप-संघातश्रवणजनितार्थज्ञानं कथ्यते।
संघातसमासस्य लक्षणमुच्यते-
पूर्वोक्तप्रमाणस्य एकतमगतिनिरूपकसंघातश्रुतस्य उपरि पूर्वोक्तप्रकारेण एवैककवर्णवृद्धिसह-चरितैकैकपदवृद्धिक्रमेण संघातसहस्रपदमात्रसंघातेषु संख्यातसहस्रेषु रूपोनेषु संघातसमासज्ञानभेदा: भवन्ति।


अब पद नामक श्रुतज्ञान को कहते हैं-

उत्कृष्ट अक्षरसमास ज्ञान के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि होने पर पद नाम का श्रुतज्ञान होता है। पद तीन प्रकार का है-अर्थपद, प्रमाणपद और मध्यमपद। इन तीनों का लक्षण पहले ही कर चुके हैं। यहाँ परमागम में सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी अक्षरों का एक पद होता है और इस एकपद के अपुनरुक्त अक्षरों का समूह मध्यम पद है इसका ज्ञान ही पद ज्ञान होता है। इस पद में एक अक्षर के न्यून होने पर उत्कृष्ट अक्षरसमास होता है। अब पदसमास ज्ञान को कहते हैं- एक पद के उक्त प्रमाण अक्षर समूह के ऊपर एक-एक अक्षर की वृद्धि होते-होते एक पद के अक्षर प्रमाण पद समास ज्ञान के विकल्पों के होने पर पदश्रुतज्ञान दूना होता है। उसके ऊपर पुन: एक पद के अक्षर प्रमाण पदसमास ज्ञान के विकल्प बीतने पर पद ज्ञान तिगुना होता है। इस प्रकार प्रत्येक एक पद के अक्षर मात्र विकल्पों के बीतने पर पदज्ञान के चतुर्गुणे-पंचगुणे होते-होते संख्यात हजार गुणित पद मात्र पदसमास ज्ञान के विकल्पों में एक अक्षर घटाने पर जो प्रमाण रहे उतने पदसमास ज्ञान के विकल्प होते हैं। अब संघातश्रुतज्ञान का वर्णन करते हैं- उत्कृष्ट पद समास ज्ञान के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि करने पर संघातश्रुतज्ञान होता है। वह चार गतियों में से किसी एक गति के स्वरूप का कथन करने वाले मध्यम पद के समुदाय रूप संघात श्रुतज्ञान के सुनने से उत्पन्न हुआ अर्थज्ञान कहलाता है। अब संघात समास का लक्षण बताते हैं- पूर्वोक्त प्रमाण किसी एक गति के निरूपक संघात श्रुत के ऊपर पूर्वोक्त प्रकार से एक-एक अक्षर की वृद्धिपूर्वक एक-एक पद की वृद्धि के क्रम से संख्यात हजार पदप्रमाण संख्यात हजार संघात में होते हैं। उनमें एक अक्षर कम करने पर संघात समास ज्ञान के भेद होते हैं।

प्रतिपत्तिकज्ञानं प्रोच्यते-

अंतिमसंघातसमासस्योपरि एकस्मिन्नक्षरे वृद्धे सति प्रतिपत्तिकनाम श्रुतज्ञानं भवति। तच्च नारकादिचतुर्गतिस्वरूप-सविस्तरप्ररूपकप्रतिपत्तिकाख्यग्रन्थश्रवणजनितार्थज्ञानमिति निश्चेतव्यम्।

प्रतिपत्तिकसमासज्ञानं प्ररूप्यते-
चतुर्गतिस्वरूपनिरूपकप्रतिपत्तिकात् परं तस्योपरि प्रत्येकमेकैकवृद्धिक्रमेण संख्यातसहस्रेषु पदसंघातप्रतिपत्तिकेषु वृद्धेषु रूपोनतावन्मात्रा प्रतिपत्तिकसमासज्ञानविकल्पा: भवन्ति।
अधुना अनुयोगज्ञानं कथ्यते-
तच्च उत्कृष्टप्रतिपत्तिकसमासविकल्पस्य उपरि एकस्मिन्नक्षरे वृद्धे सति अनुयोगाख्यं श्रुतज्ञानं भवति। एतत् चतुर्दशमार्गणास्वरूपप्रतिपादकानुयोगसंज्ञशब्दसंदर्भश्रवणजनितार्थज्ञानमित्यर्थ:।
अनुयोगसमासज्ञानं वण्र्यते-
चतुर्दशमार्गणासंयुतानुयोगात्परं तस्योपरि पूर्वोक्तक्रमेण प्रत्येकमेकैकवर्णवृद्धिसहचरितपदादि-वृद्धिभिश्चतुराद्यनुयोगेषु संवृद्धेषु सत्सु रूपोनतावन्मात्रानुयोगसमासज्ञानविकल्पा: भवन्ति।
अथ प्राभृतकप्राभृतकज्ञानस्वरूपं निरूप्यते-
तच्चरमानुयोगसमासोत्कृष्टविकल्पस्योपरि एकाक्षरवृद्धौ सत्यां प्राभृतक-प्राभृतकनाम श्रुतज्ञानं भवति। अत्र वस्तुनाम श्रुतज्ञानस्य अधिकार: प्राभृतकं वेति द्वौ एकार्थौ। प्राभृतकस्य अधिकारोऽपि प्राभृतक-प्राभृतकनामा भवति, तत: कारणात् एकार्थ: पर्यायशब्द: इति जिनै:-अर्हद्भट्टारकै: निर्दिष्टं न स्वरुचिविरचितमित्यर्थ:।

प्रतिपत्तिक ज्ञान को कहते हैं-

अंतिम संघात समास के ऊपर एक अक्षर को बढ़ाने पर प्रतिपत्तिक नाम का श्रुतज्ञान होता है। नारक आदि चार गतियों के स्वरूप का विस्तार से कथन करने वाले प्रतिपत्तिक नामके ग्रंथ को सुनने से उत्पन्न होने वाला अर्थज्ञान प्रतिपत्तिक श्रुतज्ञान होता है। प्रतिपत्तिक समास ज्ञान का प्ररूपण करते हैं- चतुर्गति के स्वरूप को कहने वाले प्रतिपत्तिक से आगे उसके ऊपर एक-एक अक्षर की वृद्धि के क्रम से संख्यात हजार पदों के समुदायरूप संख्यात हजार संघात और संख्यात हजार संघातों के समूह रूप प्रतिपत्तिक की संख्यात हजार प्रमाण वृद्धि होने पर उसमें से एक अक्षर कम करने पर प्रतिपत्तिक समास ज्ञान के विकल्प होते हैं। अब अनुयोग ज्ञान को कहते हैं- उसके अंतिम प्रतिपत्तिक समास के उत्कृष्ट विकल्प के ऊपर एक अक्षर वृद्धि करने पर अनुयोग नाम का श्रुतज्ञान होता है। चौदह मार्गणाओं के स्वरूप के प्रतिपादक अनुयोग नामक श्रुतग्रन्थ के सुनने से हुआ अर्थज्ञान अनुयोग श्रुतज्ञान है। अब अनुयोग समास ज्ञान का वर्णन करते हैं- चौदह मार्गणाओं से सम्बद्ध अनुयोग के आगे उसके ऊपर पूर्वोक्त क्रम से प्रत्येक एक-एक अक्षर की वृद्धि से युक्त पद आदि की वृद्धि के द्वारा चार आदि अनुयोगों की वृद्धि होने पर उसमें एक अक्षर कम करने पर उतने मात्र अनुयोग समास ज्ञान के विकल्प होते हैं। अब प्राभृतकप्राभृतक ज्ञान का स्वरूप निरूपित करते हैं- उस उत्कृष्ट अनुयोग समास में उत्कृष्ट भेदों के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि करने पर ‘‘प्राभृतक प्राभृतक’’ नामक श्रुतज्ञान होता है। यहाँ वस्तु नामक श्रुतज्ञान का अधिकार कहो या प्राभृतक कहो, दोनों का एक ही अर्थ है। प्राभृतक का अधिकार भी प्राभृतक-प्राभृतक नामक होता है, इस कारण से एकार्थवाची-पर्यायवाची पर्यायशब्द जिनेन्द्रदेव-अर्हन्तदेव ने कहा है, यह स्वरुचि द्वारा रचित नहीं है।

प्राभृतक-प्राभृतकसमासज्ञानमुच्यते-

द्विकबारप्राभृतकात्परं तस्योपरि पूर्वोक्तक्रमेण प्रत्येकमेकैकवर्णवृद्धिसहचरितपदादिवृद्धिभि: चतुर्विंशतिप्राभृतक-प्राभृतकेषु वृद्धेषु रूपोनतावन्मात्रेषु प्राभृतक-प्राभृतकज्ञानविकल्पेषु गतेषु प्राभृतक-प्राभृतकसमासभेदा: भवन्ति।

अथ प्राभृतकज्ञानमुच्यते-
तत्प्राभृतक-प्राभृतकसमासस्य उत्कृष्टविकल्पस्योपरि एकाक्षरवृद्धौ सत्यां प्राभृतकं नाम श्रुतज्ञानं भवति।
प्राभृतकसमासज्ञानं निरूप्यते-
पूर्वोक्तप्राभृतकस्याग्रे तदुपरि पूर्वोक्तक्रमेण एकैकवर्णवृद्धिसहचरितपदादिभि: विंशतिप्राभृतक-नामाधिकारेषु संवृद्धेषु सत्सु रूपोनतावन्मात्रा: प्राभृतकसमासज्ञानविकल्पा: भवन्ति।
अथ वस्तुनाम श्रुतज्ञानं कथ्यते-
तच्चरमप्राभृतकसमासोत्कृष्टविकल्पस्योपरि एकाक्षरवृद्धौ सत्यां एवं वस्तुनामाधिकारश्रुतज्ञानं भवति।
‘वीसं वीसं’ इति उत्पादादिपूर्वाश्रितवस्तुसमूहवीप्सायां द्विर्वचनमुत्तं। सर्वत्राक्षरसमासप्रथमविकल्पात् प्रभृति पूर्वसमासोत्कृष्टविकल्पपर्यंतेषु क्रमेण पर्यायाक्षरपदसंघातेत्यादिपरिपाट्या एकैकवर्णवृद्धि: इदमुपलक्षणं, तेन एकैकवर्णपदसंघातादिवृद्धयो ज्ञातव्या:। एतत्सूत्रानुसारेण वृत्तौ तथा लिखितम्।
अथ पूर्वनामश्रुतज्ञानस्वरूपं प्ररूपयंस्तदवयवभूतोत्पादपूर्वादिचतुर्दशपूर्वाणामुत्पत्तिक्रमं च दर्शयन् वस्तुसमासश्रुतज्ञानमपि प्ररूप्यते-
पूर्वोक्तवस्तुश्रुतज्ञानस्य उपरि प्रत्येकमेकैकवर्णवृद्धिसहचरितपदादिवृद्धिभि: वक्ष्यमाणोत्पादादिचतुर्दश-पूर्वाधिकारे यथासंख्यं दश-चतुर्दश-अष्ट-अष्टादश-द्वादश-द्वादश-षोडश-विंशति-त्रिंशत्-पंचदश-दश-दश-दश-दश वस्तुषु वृद्धेषु सत्सु-यथाक्रमं उत्पादपूर्वं अग्रायणीयपूर्वं वीर्यप्रवादपूर्वं अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वं ज्ञानप्रवादपूर्वं सत्यप्रवादपूर्वं आत्मप्रवादपूर्वं कर्मप्रवादपूर्वं प्रत्याख्यानपूर्वं विद्यानुवादपूर्वं कल्याणवादपूर्वं प्राणवादपूर्वं क्रियाविशालपूर्वं त्रिलोकबिन्दुसारपूर्वं चेति चतुदर्शपूर्वाणि भवन्ति।

प्राभृतक-प्राभृतक समास ज्ञान को कहते हैं-

प्राभृतक-प्राभृतक से आगे उसके ऊपर पूर्वोक्त प्रकार से प्रत्येक एक-एक अक्षर की वृद्धि के क्रम से पद आदि की वृद्धि के होते-होते चौबीस प्राभृतक प्राभृतकों की वृद्धि में एक अक्षर घटाने पर प्राभृतक-प्राभृतक समास ज्ञान के भेद होते हैं। अब प्राभृतक ज्ञान को कहते हैं- उस प्राभृतक-प्राभृतक समास ज्ञान के उत्कृष्ट विकल्प के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि करने पर प्राभृतक नामक श्रुतज्ञान कहलाता है। प्राभृतक समास ज्ञान का कथन- पूर्वोक्त प्राभृतक के आगे उसके ऊपर पूर्वोक्त क्रम से एक-एक वर्ण की वृद्धि से सहित पदादिकों के द्वारा बीस प्राभृतक नाम वाले अधिकारों की वृद्धि करते हुए उसमें एक अक्षर कम करने पर उतने मात्र प्राभृतक समास ज्ञान के विकल्प होते हैं। अब वस्तु नामक श्रुतज्ञान का कथन करते हैं- उसके अंतिम प्राभृतक समास के उत्कृष्ट विकल्प के ऊपर एक अक्षर बढ़ने पर एक वस्तु नामका श्रुतज्ञान होता है। उत्पादपूर्व आदि पूर्वों के वस्तु समूह की वीप्सा में ‘‘वीसं वीसं’’ ऐसा दो बार कथन किया है। सर्वत्र अक्षर समास के प्रथम भेद से लेकर पूर्व समास के उत्कृष्ट विकल्प पर्यन्त क्रम से पर्याय, अक्षर, पद, संघात इत्यादि परिपाटी से एक-एक अक्षर की वृद्धि करना यह उपलक्षण है। अत: एक-एक अक्षर, पद, संघात आदि की वृद्धि जानना चाहिए। इस सूत्र के अनुसार टीका में सर्वत्र यथास्थान लिखा गया है। अब पूर्व नामक श्रुतज्ञान का स्वरूप कहते हुए उसके अवयवभूत उत्पादपूर्व आदि चौदह पूर्वों की उत्पत्ति का क्रम दर्शाते हुए वस्तुसमास श्रुतज्ञान का प्ररूपण करते हैं– पूर्वोक्त वस्तु श्रुतज्ञान के ऊपर एक-एक अक्षर की वृद्धि के साथ पद आदि की वृद्धि होते-होते आगे कहे गये उत्पादपूर्व आदि चौदह अधिकारों के क्रम से दश, चौदह, आठ, अठारह, बारह, बारह, सोलह, बीस, तीस, पन्द्रह, दश, दश, दश, दश वस्तु अधिकारों के वृद्धि करने पर यथाक्रम उत्पादपूर्व, अग्रायणीयपूर्व, वीर्यप्रवादपूर्व, अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व, ज्ञानप्रवादपूर्व, सत्यप्रवादपूर्व, आत्मप्रवादपूर्व, कर्मप्रवादपूर्व, प्रत्याख्यानपूर्व, विद्यानुवादपूर्व, कल्याणवादपूर्व, प्राणवादपूर्व, क्रियाविशालपूर्व और त्रिलोकविन्दुसारपूर्व ऐेसे चौदह पूर्व होते हैं।

अधुना वस्तुसमासश्रुतज्ञानं उच्यते-

पूर्वोक्तवस्तुश्रुतज्ञानस्य उपरि अग्रे प्रत्येकमेकैकवर्णवृद्धिसहचरितपदादिवृद्ध्या दशवस्तुप्रमितवस्तुसमास-ज्ञानविकल्पेषु गतेषु रूपोनैतावन्मात्रवस्तुश्रुतसमासज्ञानविकल्पा: भवन्ति।

चतुर्दशपूर्वाणामन्तर्गत-उत्पादपूर्वं कथ्यते-
वस्तुसमासोत्कृष्टविकल्पस्योपरि एकाक्षरवृद्धौ सत्यां उत्पादपूर्वश्रुतज्ञानं भवति।
अथ उत्पादपूर्वसमासज्ञानमुच्यते-
तत: उत्पादपूर्वश्रुतज्ञानस्य उपरि प्रत्येकमेकैकाक्षरवृद्धिसहचरितपदादिवृद्ध्या चतुर्दशवस्तुषु वृद्धेषु रूपोनतावन्मात्रोत्पादपूर्वसमासज्ञानविकल्पा: भवन्ति।
अथ अग्रायणीयपूर्वं कथ्यते–
तच्चरमोत्कृष्टोत्पादपूर्वसमासज्ञानविकल्पस्य उपरि एकाक्षरवृद्धौ सत्यां अग्रायणीयपूर्वश्रुतज्ञानं भवति।
एवमग्रेऽग्रेऽष्ट-अष्टादश-द्वादश-द्वादश-षोडश-विंशति-त्रिंशत्-पंचदश-दश-दश-दश-दशवस्तुक्रमेण वृद्धेषु रूपोनतावन्मात्र-तत्तत्पूर्वसमास-ज्ञानविकल्पेषु गतेषु तत्तत्पूर्वसमासोत्कृष्टज्ञानविकल्पस्योपरि एकैकाक्षरे वृद्धे सति तत्तद्वीर्यप्रवादपूर्वास्तिनास्तिप्रवादपूर्व-ज्ञानप्रवादपूर्व-सत्यप्रवादपूर्व-आत्मप्रवादपूर्व-कर्मप्रवादपूर्व-प्रत्याख्यानपूर्व-विद्यानुवादपूर्व-कल्याणवादपूर्व-प्राणवादपूर्व-क्रियाविशालपूर्व-त्रिलोकबिंदुसारपूर्व-नामश्रुतज्ञानान्युत्पद्यन्ते।
अत्र त्रिलोकबिंदुसारस्य तु समासो नास्ति उत्तरज्ञानविकल्पाभावात्। तात्पर्यमेतत्–
अर्थाक्षरं तु रूपोनैकट्ठविभक्तश्रुतकेवलमात्रं एकाक्षरज्ञानं। तच्च तथापदं च संघातं प्रतिपत्तिकादिपूर्वपर्यंतं चेति नव पुन: एषामेव नवानां क्रमवर्णोत्तरवर्धिता: समासाश्च नव एवमष्टादशभेदा अक्षरगतद्रव्यश्रुतविकल्पा भवन्ति। तद्द्रव्यश्रुतश्रवणसंजनितश्रुतज्ञानमेव पुन: ज्ञाने विवक्षिते अनक्षरात्मकपर्यायपर्यायसमासज्ञानद्वययुतं सत् विंशतिविधं श्रुतज्ञानं भवति।
ग्रन्थे शास्त्रसंदर्भे विवक्षिते सति आचारादिद्वादशविकल्पं उत्पादपूर्वादिचतुर्दशपूर्वभेदं च द्रव्यश्रुतं तच्छ्रवणसंजनितज्ञानस्वरूपं भावश्रुतम्। पुनरपि अंगबाह्यसामायिकादिचतुर्दशप्रकीर्णकभेदद्रव्यभावात्मकश्रुतं। पुद्गलद्रव्यरूपं वर्णपदवाक्यात्मकं द्रव्यश्रुतं तच्छ्रवणसमुत्पन्नश्रुतज्ञानपर्यायरूपं भावश्रुतं चेति निश्चीयते।
अत्र पूर्वाणि चतुर्दश, वस्तूनि पंचनवत्युत्तरशतप्रमितानि वस्तुसंख्यायां विंशत्या गुणितायां एतत्संख्यासंभवात्, प्राभृतकानि नवशतोत्तरत्रिसहस्राणि, द्विकवारप्राभृतकानि त्रिनवतिसहस्र-षट्शतानि, अनुयोगा: त्रयलक्ष-चतु:सप्ततिसहस्र-चतु:शतप्रमितानि, प्रतिपत्तिकसंघातपदानि संख्यातसहस्रगुणितक्रमाणि, एकपदाक्षराणि षोडशशतचतुस्त्रिंशत्कोट्य: त्र्यशीतिलक्षा: सप्तसहस्राणि अष्टशतानि अष्टाशीतिश्चेति। समस्ताक्षराणि रूपोनैकट्ठप्रमितानि-१८४४६७४४०७३७०९५५१६१५। एतेषु एकपदाक्षरै: प्रमाणितेषु-हतेषु यल्लब्धं तद्द्वादशांगपदप्रमाणं शेषमंगबाह्याक्षराणि।


अब वस्तुसमास श्रुतज्ञान कहते हैं–

पूर्वोक्त वस्तु श्रुतज्ञान के ऊपर एक-एक अक्षर की वृद्धि के साथ दस वस्तु प्रमाण वस्तुसमास ज्ञान के विकल्पों में एक अक्षर से हीन विकल्पपर्यन्त वस्तुसमास श्रुतज्ञान के विकल्प होते हैं। चौदह पूर्वों के अंतर्गत उत्पादपूर्व का कथन करते हैं– वस्तु समास के उत्कृष्ट विकल्प के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि होने पर उत्पादपूर्व श्रुतज्ञान होता है। अब उत्पादपूर्व समास ज्ञान बताते हैं– फिर उत्पादपूर्व श्रुतज्ञान के ऊपर एक-एक अक्षर की वृद्धि के क्रम से पद आदि की वृद्धि के साथ चौदह वस्तुओं की वृद्धि होने पर उसमें एक अक्षर कम विकल्प पर्यन्त उत्पाद पूर्व समास ज्ञान के विकल्प होते हैं। अब अग्रायणीयपूर्व का वर्णन करते हैं– उसके अंतिम उत्कृष्ट उत्पादपूर्व समास ज्ञान विकल्प के ऊपर एक अक्षर की वृद्धि होने पर अग्रायणीयपूर्व श्रुतज्ञान होता है।ं इसी प्रकार आगे-आगे आठ, अठारह, बारह, बारह, सोलह, बीस, तीस, पन्द्रह, दस, दस, दस, दस वस्तुओं की क्रम से वृद्धि होने पर एक अक्षर कम उतने-उतने उस-उस पूर्व समास ज्ञान पर्यन्त उस-उस पूर्व समास ज्ञान संबंधी विकल्प होते हैं। उन विकल्पों के ऊपर एक-एक अक्षर बढ़ाने पर उस-उस वीर्यप्रवाद, अस्ति-नास्ति प्रवादपूर्व आदि त्रिलोकबिन्दुसारपूर्व पर्यन्त पूर्व श्रुतज्ञान उत्पन्न होते हैं।

यहाँ त्रिलोकबिन्दुसार का समास ज्ञान नहीं है क्योंकि उसके आगे श्रुतज्ञान के विकल्प नहीं है। तात्पर्य यह है-एक कम एकट्ठी प्रमाण से विभक्त श्रुतकेवल मात्र एकाक्षर का ज्ञान अर्थाक्षर है। अर्थाक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्ति, अनुयोग, प्राभृतक-प्राभृतक, प्राभृतक, वस्तु और पूर्व ये नौ तथा इन्हीं नौ के क्रम से एक-एक अक्षर से बढ़े नौ-नौ समास, इस प्रकार अठारह भेद अक्षरात्मक द्रव्य श्रुत के होते हैं। उस द्रव्य श्रुत के सुनने से उत्पन्न हुआ श्रुतज्ञान ही अनक्षरात्मक पर्याय और पर्यायसमास ज्ञानों को मिलाने पर बीस प्रकार का श्रुतज्ञान होता है।

ग्रंथ में शास्त्रसंदर्भ की विवक्षा होने पर आचारांग आदि बारह भेदरूप और उत्पादपूर्व आदि चौदह भेदरूप द्रव्यश्रुत है और उसके सुनने से उत्पन्न ज्ञानस्वरूप भावश्रुत है। पुनरपि अंगबाह्य, सामायिकादि चौदह प्रकीर्णक भेदरूप द्रव्यश्रुत और भावश्रुत का निश्चय किया जाता है। पुद्गलद्रव्य वर्ण, पद और वाक्यात्मक द्रव्यश्रुत होता है और उसके श्रवण से उत्पन्न ज्ञान भावश्रुत है।

यहाँ पूर्व चौदह हैं, वस्तु एक सौ पंचानवे हैं। वस्तु संख्या को बीस से गुणा करने पर यह संख्या निकलती है। प्राभृतक तीन हजार नौ सौ (३९००) हैं, प्राभृतक-प्राभृतक तिरानवे हजार छह सौ (९३,६००) हैं। अनुयोग तीन लाख चौहत्तर हजार चार सौ (३७४४००) हैं। प्रतिपत्तिक, संघात और पद उत्तरोत्तर क्रम से संख्यात हजार गुणित हैं। एक पद के अक्षर सोलह सौ चौंतिस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी (१६३४८३०७८८८) हैं। समस्त अक्षर एक कम एकट्ठी प्रमाण-१८४४६७४४०७३७०९५५१६१५ हैं। इन अक्षरों में एक पद के अक्षरों से भाग देने पर जो लब्ध आवे वह द्वादशांग के पदों का प्रमाण है और शेष बचा अंगबाह्य के अक्षरों का प्रमाण है।


द्वादशांगपदसंख्या:-

द्वादशोत्तरशतकोट्य: त्र्यशीतिलक्षाणि अष्टपंचाशत्सहस्राणि पंच च द्वादशांगपदसंख्या: मध्यमपदै: गृहीता: सन्ति।

अंंगबाह्याक्षरसंख्या:-
एकपदनिर्मितकरणे न्यूनानि अक्षराणि अंगबाह्येषु चतुर्दशसु संगृहीतानि सन्ति। तानि-अष्टकोट्येकलक्षाष्ट-सहस्रैकशतपंचसप्ततिप्रमाणा: चतुर्दशप्रकीर्णकानां वर्णा: भवन्ति।
अस्यांगबाह्यस्याक्षराणां श्लोकसंख्या: कथ्यन्ते—
पंचविंशतिलक्षा: त्रयस्त्रिंशत्शतानि अशीतिश्च श्लोकसंख्येयं।
उक्त च-
‘‘पुणो एदम्हि बत्तीसक्खरेहि भागे हिदे पंचवीसलक्ख-तिण्णिसहस्स-तिण्णसयं सासीदं च चोद्दसपइण्णयाणं पमाणपद-गंथपमाणं होदि एगक्खरूणगंथद्धं च २५०३३८०, एसो खंडगंथो १५/३२।’’[४]
चतु:षष्टिमूलवर्णै: द्वादशांगांगबाह्यवर्णा: भवन्तीति निरूप्यते-
तेत्तीसवेंजणाइं सत्तावीसा सरा तहा भणिया।
चत्तारि य जोगवहा चउसट्ठी मूलवण्णा ओ।।३५।।
ओ-अहो भव्य! व्यञ्जनानि अर्धमात्राणि क् ख् ग् घ् ङ्। च् छ् ज् झ् ञ्। ट् ठ् ड् ढ् ण्। त् थ् द् ध् न्। प् फ् ब् भ् म्। य् र् ल् व् श् ष् स् ह्। इत्येतानि त्रयस्त्रिंशत् ३३। स्वरा: एकद्वित्रिमात्रा:। अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ एत्येते नव, प्रत्येकं ह्रस्वदीर्घप्लुतभेदैस्त्रिभिर्गुणिता: अ आ आ ३, इ ई ई ३, उ ऊ ऊ ३, ऋ ऋ¸ ऋ¸ ३, ऌ ल¸ ल¸ ३, ए १ ए २ ए ३, ऐ १ ऐ २ ऐ ३, ओ १ ओ २ ओ ३, औ १ औ २ औ ३ इत्येते सप्तविंशति: २७। योगवाहा: अं अ: क प[५] इत्येते चत्वार: ४ एवं मिलित्वा मूलवर्णाश्चतु:षष्टि: ६४। यथानादिनिधने परमागमे प्रसिद्धास्तथैवात्र भणिता: संजानीहि। व्यज्यते स्फुटीक्रियते अर्थो यैस्तानि व्यञ्जनानि। स्वरन्ति-अर्थं कथयन्तीति स्वरा:। योगं-अन्याक्षरसंयोगं वहन्तीति योगवाहा:। मूलानि संयुक्तोत्तरवर्णोत्पत्तिकारणानि वर्णा: मूलवर्णा: इति समासार्थबलेन असंयुक्ता एव चतु:षष्टिरिति लभ्यन्ते। ऌवर्ण: संस्कृते दीर्घो नास्ति तथापि अनुकरणे देशान्तरभाषायां चास्ति। ए ऐ ओ औ इति चत्वारोऽस्ति संस्कृते ह्रस्वा न सन्ति तथापि प्राकृते देशान्तरभाषायां च सन्ति।
मूलवर्णप्रमाणं चतु:षष्टिपदं एकैकरूपेण विरलयित्वा रूपं रूपं प्रति द्विकं दत्त्वा परस्परं सङ्गुण्य तल्लब्धे रूपोने वृृते सति श्रुतज्ञानस्य द्वादशाङ्गप्रकीर्णकरूपश्रुतस्कन्धस्य द्रव्यश्रुतस्य अपुनरुक्ताक्षराणि भवन्ति। वाक्यार्थप्रतीत्यर्थं गृहीतानां पुनरुक्ताक्षराणां संख्यानियमाभावात्।[६]
एतद्विंशतिविधश्रुतज्ञानं गोम्मटसारजीवकाण्डग्रन्थात् अस्य टीकाजीवतत्त्वप्रदीपिकाया: संगृहीतं अस्ति।
असौ नेमिचन्द्राचार्योऽपि धवलाटीकासमेतमिमं षट्खण्डागममधीत्यैव सिद्धान्तचक्रवर्ती बभूवेति।
उक्त च स्वयमेवानेनाचार्येण गोम्मटसारकर्मकाण्डनाम्नि ग्रन्थे-
जइ चक्केण य चक्की, छक्खंडं साहियं अविग्घेण।
तह मइचक्केण मया, छक्खंडं साहियं सम्मं।।३९७।।
अतो ज्ञायते तत: प्रभृति एव अस्य षट्खंडागमसिद्धान्तस्य ज्ञातारं महामुनिं ‘‘सिद्धान्तचक्रवर्ती’’ इति पदव्यालंकर्तुं परंपरा संजाता। ये केचित् अस्य त्रिखण्डस्य ज्ञातार: तेषां ‘‘त्रैविद्यदेवं’’ इति पदव्या विभूषयितुं व्यवस्थासीत्।
धवलाटीकारचनाया: पश्चादेव श्रीमन्नेमिचंद्रसिद्धान्तचक्रवर्तिदेवेन स्वस्य प्रमुखशिष्य ‘‘चामुण्डराय’’-श्रावकस्य सिद्धान्तग्रन्थरहस्यस्य जिज्ञासया गोम्मटसारजीवकाण्ड-कर्मकाण्ड-त्रिलोकसार-लब्धिसार-क्षपणासारनामधेया: पंचसंग्रहग्रन्था विरचिता:[७]। इमे पंचापि ग्रन्था: सिद्धान्तार्णवं अवगाहयितुं अस्मत्सदृश-जनेभ्य: सक्षमा: सन्ति।


द्वादशांग पद संख्या—'

एक सौ बारह करोड़ तिरासी लाख अठावन हजार पाँच (११२८३५८००५) रूप यह द्वादशांग पद संख्या मध्यम पदों के द्वारा ग्रहण की गई है।
अंगबाह्य की अक्षर संख्या—
एक पद को निर्मित करने से न्यून अक्षरों को चौदह अंगबाह्यों में संगृहीत किया गया है। अर्थात् एक पद जिनसे नहीं बन सका उतने उन अक्षरों से अंगबाह्य बना दिया गया। वे आठ करोड़ एक लाख आठ हजार एक सौ पिचहत्तर (८०१०८१७५) प्रमाण पद चौदह प्रकीर्णक के हैं।
इस अंगबाह्य के अक्षरों की श्लोकसंख्या कहते हैं—
पच्चीस लाख तेंतीस सौ अस्सी श्लोक प्रमाण अंगबाह्य की श्लोक संख्या है।
कहा भी है—
अनंतर इन ८०१०८१७५ अक्षरों को बत्तीस अक्षरों से भाजित करने पर चौदह प्रकीर्णकों का और उनके श्लोकों का प्रमाण पच्चीस लाख तीन हजार तीन सौ अस्सी होता है और एक श्लोक के प्रमाण के आधे में से एक अक्षर कम कर देने पर जितना शेष रहे उतना होता है। गिनती में चौदह अंगबाह्यों में २५०, ३३८० पूर्ण श्लोक और १५/३२ खण्ड श्लोक समझना चाहिए।
चौंसठ मूलवर्णों के द्वारा द्वादशांग के अंगबाह्य वर्ण होते हैं ऐसा निरूपण करते हैं—
गाथार्थ—तेंतीस व्यंजन, सत्ताईस स्वर और योगवाह चार ऐसे चौंसठ मूलवर्ण होते हैं।।३५२।।
अहो भव्य प्राणी! व्यञ्जन वर्ण अद्र्धमात्रा वाले होते हैं। जैसे-क् ख् ग् घ् ङ्। च् छ् ज् झ् ञ्। ट् ठ् ड् ढ् ण्। त् थ् द् ध् न्। प् फ् ब् भ् म्। य् र् ल् व् श् ष् स् ह् ये ३३ व्यञ्जन हैं। स्वर एक, दो और तीन मात्रा वाले होते हैं। जैसे-अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ ये (९) नौ, इन सभी को ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत तीनों से गुणित करने पर-अ आ आ ३, इ ई ई ३, उ ऊ ऊ ३, ऋ ऋृ ऋृ ३, ऌ ल¸ ल¸ ३, ए १ ए २ ए ३, ऐ १ ऐ २ ऐ ३, ओ १ ओ २ ओ ३, औ १ औ २ औ ३ ये २७ स्वर होते हैं। योगवाह-अं अ: क प ये ४ योगवाह हैं इस प्रकार सब मिलाकर ३३±२७±४·६४ मूलवर्ण होते हैं। जैसा अनादिनिधन परमागम में प्रसिद्ध है वैसा ही वर्णन यहाँ जानना चाहिए।
‘व्यज्यते’ अर्थात् जिनके द्वारा अर्थ प्रकट किया जाता है वे व्यंजन हैं। ‘स्वरन्ति’ अर्थात् जो अर्थ को कहते हैं वे स्वर हैं। ‘योग’ अर्थात् अन्य अक्षरों के संयोग को जो ‘वहन्ति’ वहन करते हैं वे योगवाह हैं। ‘मूल’ अर्थात् संयुक्त उत्तर वर्णों की उत्पति के कारण वर्ण मूलवर्ण हैं। इस समास के अर्थ के बल से असंयुक्त अक्षर ही चौंसठ हैं यह ज्ञान होता है। ऌ वर्ण संस्कृत भाषा में दीर्घ नहीं है, तथापि देशान्तर की भाषा (हिन्दी) में है। ए ऐ ओ औ ये चारों संस्कृत में ह्रस्व नहीं हैं तथापि प्राकृत और देश भाषा (हिन्दी) में हैं।
मूल अक्षर प्रमाण चौंसठ पदों को एक-एक रूप से विरलन करके एक-एक रूप पर दो-दो का अंक देकर परस्पर में गुणा करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उसमें एक कम करने पर द्वादशांग और प्रकीर्णक श्रुतस्कंधरूप द्रव्य श्रुत के अपुनरुक्त अक्षर होते हैं। वाक्य के अर्थ का ज्ञान कराने के लिए गृहीत पुनरुक्त अक्षरों की संख्या का कोई नियम नहीं है।
यह बीस प्रकार का श्रुतज्ञान गोम्मटसार जीवकाण्ड ग्रंथ से उसकी जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका से संगृहीत किया गया है।
वे श्रीनेमिचंद्र आचार्य धवला टीका समेत इस षट्खण्डागम ग्रंथ को पढ़कर ही सिद्धान्तचक्रवर्ती कहलाए थे।
गोम्मटसारकर्मकाण्ड नामक ग्रंथ में उन आचार्यदेव ने स्वयं ही कहा है—
गाथार्थ—जिस प्रकार चक्रवर्ती अपने चक्ररत्न के द्वारा षट्खंडरूप भरतक्षेत्र को बिना किसी विघ्न बाधा के ही साधित-वश में कर लेता है उसी प्रकार मैंने भी अपनी बुद्धि रूपी चक्र के द्वारा जीवस्वामी, क्षुद्रबन्ध, बन्धस्वामी, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड और महाबन्ध इन छह खण्डों से युक्त परमागम को अच्छी तरह साधित किया है-उसका अध्ययन किया है।।३९७।।
इससे ज्ञात होता है कि तब से ही इस षट्खण्डागम सिद्धान्त ग्रंथ के ज्ञाता महामुनि को ‘सिद्धान्त चक्रवर्ती ’ इस पद से अलंकृत करने की परम्परा शुरू हुई है। जो कोई इसके तीन खण्ड के ज्ञाता हैं उनको ‘‘त्रैविद्यदेव’’ इस पदवी से विभूषित करने की व्यवस्था है।
धवला टीका रचना के पश्चात् ही श्रीमन् नेमिचंद्राचार्य सिद्धान्तचक्रवर्तीदेव ने अपने प्रमुख शिष्य श्रावक चामुण्डराय के लिए सिद्धांतग्रंथों के रहस्य को जानने की इच्छा से गोम्मटसार जीवकाण्ड, कर्मकाण्ड, त्रिलोकसार, लब्धिसार, क्षपणासार नामवाले पञ्चसंग्रह ग्रंथ रचे थे। ये पाँचों ही ग्रंथ सिद्धान्तरूप समुद्र में अवगाहन करने के लिए हम जैसे लोगों के लिए सक्षम हैं।
विशेषार्थ—कुछ साधु एवं विद्वानों से ऐसा सुना जाता है कि एक बार श्रीनेमिचंद्राचार्य षट्खण्डागम ग्रंथ के स्वाध्याय में निमग्न थे, उस समय चामुण्डराय शिष्य के आने पर गुरु ने स्वाध्याय समाप्त कर दिया। पुन: ‘‘भगवन्! आपने स्वाध्याय बंद क्यों कर दिया ?’’ ऐसा शिष्य के द्वारा पूछने पर उन मुनिश्वर ने कहा-श्रावकों को इस ग्रंथ के पढ़ने का अधिकार नहीं है। तब चामुण्डराय बोले कि फिर मुझे इसका रहस्य कैसे ज्ञात होेगा ? तो गुरुदेव ने महान् उपकार की भावना से षट्खण्डागम के सारभूत पंचसंग्रह ग्रंथों की रचना कर दी।

उपसंहार:-

अस्य षट्खण्डागमग्रन्थराजस्य मंगलाचरणस्योपसंहार: क्रियते-

अत्र णमोकारमहामंत्रो मंगलाचरणं। अस्मिन् सार्धद्वयद्वीप-द्वयसमुद्रेषु संजातास्त्रिकालगोचरा: सर्वे पञ्चपरमेष्ठिनो भगवन्तो नमस्कृता: भवन्ति। तेषां परमेष्ठिनां संक्षेपेणार्थो विहित:। तदनु अर्हत्सिद्धयो: क्रमो दर्शित:, आचार्योपाध्यायसाधूनां देवत्वं पूज्यत्वं च। पुन: महामंत्रस्याक्षरपदमात्रादयो वर्णिता:। ततश्चास्मिन् महामन्त्रे द्वादशाङ्गरूपा जिनवाणी अंतर्गर्भा वर्तते इति दर्शितं। तत्पश्चात् मंगल-निमित्त-हेतु-परिमाण-नाम-कतर्¸णाम् निरूपणायां-मंगलस्य धातु-निक्षेप-नय-एकार्थ-निरुक्ति-अनुयोगै: एतत्षड्भि: व्याख्यानं कृतं संक्षेपेण। अत्रैव षड्भिर्निक्षेपै: स्वल्पो विशेषो ग्रथित: धवलाटीकाकारस्य पंक्तिभि:। ततो मंगलस्य षट् दण्डका:-मंगलं मंगलकर्ता मंगलकरणीयं मंगलोपाय: मंगलविधानं मंगलफलमिति वर्णितं।
तदनु मंगलं कदा कर्तव्यं ? मंगलं द्रव्यार्थिकनयापेक्षया अनादि: पर्यायार्थिकनयापेक्षया सादिर्वा। इत्यादिकथनं कृतं पाठांतेरणान्यग्रन्थाधारेण च। तत्पश्चात् सूत्रग्रन्थो मंगलं तथापि ग्रन्थस्यादौ मंगलं विधातव्यमिति प्रतिपादितं टीकाकाराभिप्रायेण। अत्रपर्यंतं मंगलाचरणस्य स्पष्टीकरणं जातं।
पुन: ग्रन्थराजस्य षट्खण्डागमशास्त्रस्य निमित्तं, ग्रन्थस्य हेतु:, ग्रन्थस्य नाम निरूपितं भवति। पुनश्च अस्य ग्रन्थस्य कर्ता अर्थतो भावतो वा भगवान् महावीर: त्रिशलानन्दनोऽन्तिमतीर्थकरदेव:। अस्य प्रकरणे द्रव्यक्षेत्रकालभावै: कर्ता निरूपित:। तत्पश्चात् द्वादशाङ्गरूपस्य द्रव्यश्रुतस्य कर्ता गौतमस्वामी प्रथमगणधरो भगवतो महावीरस्येति कथयित्वा श्रावणकृष्णाप्रतिपत्तिथौ श्रीवद्र्धमानजिनेन्द्रस्य दिव्यध्वनिरा-विर्बभूव विपुलाचले, तां श्रुत्वावधार्य इन्द्रभूतिनामा गौतमस्वामी द्वादशांगरचनां कृत्वा मुख्यग्रन्थकर्ता बभूवेति कथितं।
तदनु द्वादशांगानां दिङ्मात्रलक्षणं निरूप्य श्रुतावतारकथा कथिता। अस्या: कथाया निमित्तेन तदुत्तरोत्तरग्रन्थकर्तार: प्ररूपिता:। श्रीकुन्दकुन्ददेवप्रभृतिटीकाकतर्¸णां संक्षिप्तविवरणं वर्णितं। पुन: चारित्रचक्रवर्तिना श्रीशांतिसागराचार्येण षट्खंडागमादिसिद्धान्तग्रन्थानां ताम्रपत्राणामुपरि उत्कीर्णं कारयित्वा स्थायित्वं प्रदत्तमिति कथितं।
तदनंतरं पर्यायपर्यायसमासाक्षरादिविंशतिभेदयुतं श्रुतज्ञानं निरूप्य चतु:षष्टिमूलवर्णेभ्य: श्रुतज्ञानाक्षराणि निगदितानि। तत: षट्खण्डागमस्य ज्ञाता सिद्धान्तचक्रवर्ती बभूवेति दर्शितं।
तत्पश्चात् जीवस्थाननाम्न: प्रथमखण्डस्यावतारश्चतुर्विध:, उपक्रमनिक्षेपनयानुगमभेदैरिति निरूपणायां उपक्रमस्य पंचभेदान् संक्षेपेण कथयित्वा निक्षेपनययोरपि समासेन कथतं कृतं इति तात्पर्यमवबोद्धव्यम्।
अत्र जीवस्थानावतारस्य चत्वारो भेदास्तेषां विस्तरश्च श्रीवीरसेनाचार्येण कथ्यते-
संप्रति जीवस्थानस्यावतार उच्यते[८]-सोऽपि अवतारश्चतुर्विध:-उपक्रमनिक्षेपनयानुगमभेदात्।
उपक्रमस्यापि पंच भेदा-आनुपूर्वी-नाम-प्रमाण-वक्तव्यता-अर्थाधिकारैरिति।


उपसंहार-

इस षट्खंडागम ग्रंथराज के मंगलाचरण का उपसंहार करते हैं— ग्रंथ के प्रारंभ में णमोकार महामंत्र को मंगलाचरण के रूप में लिया है। इसमें ढाई द्वीप और दो समुद्रों में होने वाले त्रिकाल गोचर सभी पञ्चपरमेष्ठी भगवान् नमस्कृत होते हैं। उन परमेष्ठियों का संक्षेप से अर्थ बताया गया, उसके पश्चात् अर्हन्त और सिद्ध का क्रम बताया और आचार्य, उपाध्याय एवं साधुओं के देवपना तथा पूज्यपना दर्शाया। पुन: महामंत्र के अक्षर, पद, मात्रा आदि का वर्णन किया। उसके बाद ‘‘महामंत्र में द्वादशांगरूप जिनवाणी अंतर्गर्भित है’’ यह बताया। तत्पश्चात् मंगल, निमित्त, हेतु, परिमाण, नाम और कर्ता के निरूपण करने में सर्वप्रथम मंगल का धातु, निक्षेप, नय, एकार्थ, निरुक्ति और अनुयोग इन छह के द्वारा संक्षेप में व्याख्यान किया। यहीं पर छह निक्षेपों के द्वारा धवला टीकाकार की पंक्तियों के द्वारा कुछ विशेष रूप से कथन किया गया है। पुन: मंगल के छह दण्डक-मंगल, मंगलकर्ता, मंगल करने योग्य, मंगल का उपाय, मंगल का विधान और मंगल का फल वर्णित किये गये हैं।

उसके पश्चात् मंगल कब करना चाहिए ? मंगल द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि है और पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से सादि है, इत्यादि कथन पाठान्तर के द्वारा एवं अन्य ग्रंथों के आधार से किया गया। तत्पश्चात् सूत्रग्रंथ स्वयं मंगल है फिर भी ग्रंथ की आदि में मंगल करना चाहिए ऐसा टीकाकार के अभिप्राय से प्रतिपादित किया। यहाँ तक मंगलाचरण का स्पष्टीकरण हुआ है।

पुन: ग्रंथराज षट्खण्डागम शास्त्र का निमित्त, ग्रंथ का हेतु, ग्रंथ का नाम निरूपित किया है। उसके बाद बताया कि इस ग्रंथ के अर्थ और भाव रूप से कर्ता अंतिम तीर्थंकर त्रिशलानंदन भगवान महावीर हैं। इस प्रकरण में द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के द्वारा कर्ता का निरूपण किया पुन: द्वादशांगरूप द्रव्य श्रुत के कर्ता भगवान महावीर के प्रथम गणधर श्रीगौतमस्वामी हैं ऐसा कहकर बताया है कि श्रावण कृष्णा प्रतिपदा तिथि को श्री वर्धमान जिनेन्द्र की दिव्यध्वनि विपुलाचल पर्वत पर प्रगट हुई उसे सुनकर तथा अवधारण करके इन्द्रभूति नामक गौतम स्वामी द्वादशांग की रचना करके मुख्य ग्रंथकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए।

उसके पश्चात् द्वादशांगों का किंचित् मात्र लक्षण निरूपित करके श्रुतावतार की कथा कही। इस कथा के निमित्त से उसके आगे-आगे के ग्रंथकत्र्ताओं का प्ररूपण हुआ। श्रीकुन्दकुन्ददेव आदि टीकाकारों का संक्षिप्त इतिहास बताया गया, पुन: चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्रीशांतिसागर महाराज के द्वारा षट्खंडागम आदि सिद्धांत ग्रंथों को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराकर उन्हें स्थायित्व प्रदान करने की बात बताई गई। तदनंतर पर्याय, पर्यायसमास, अक्षर आदि बीस भेद युक्त श्रुतज्ञान का निरूपण करके चौंसठ मूलवर्णों के द्वारा श्रुतज्ञान के अक्षर बताये। फिर षट्खंडागम के ज्ञाता सिद्धांतचक्रवर्ती होते हैं यह कथन किया। तत्पश्चात् जीवस्थान नाम के प्रथम खंड का अवतार चार प्रकार से हुआ। उपक्रम, निक्षेप, नय और अनुगम भेदों के द्वारा निरूपण करने पर उपक्रम के पाँच भेदों को संक्षेप से कह कर निक्षेप और नय का भी संक्षेप से कथन किया ऐसा तात्पर्य जानना चाहिए। यहाँ जीवस्थान अवतार के ४ भेद और उनका विस्तार श्रीवीरसेनाचार्य के द्वारा कहा जाता है- अब जीवस्थान के अवतार का प्रतिपादन करते हैं-वह अवतार उपक्रम, निक्षेप, नय और अनुगम के भेद से चार प्रकार का है। उनमें से उपक्रम के भी पाँच भेद हैं-आनुपूर्वी, नाम, प्रमाण, वक्तव्यता और अर्थाधिकार।


उक्तं च-

तिविहा य आणुपुव्वी, दसहा णामं च छव्विहं माणं।

वत्तव्वदा य तिविहा, तिविहो अत्थाहियारो वि।।[९]
तत्र पूर्वानुपूर्वी-पश्चादानुपूर्वी-यथातथानुपूर्वीषु-इदं पुण जीवट्ठाणं खण्डसिद्धंतं पडुच्च पुव्वाणुपुव्वीए ट्ठिदं छण्हं खंडाणं पढमखंडं जीवट्ठाणमिदि। [१०]षट्खण्डागमानां प्रथमखंडं जीवस्थानं नाम पूर्वानुपूव्र्या ज्ञायते।
णामस्स दस ट्ठाणाणि भवन्ति[११]-गौण्यपद-नोगौण्यपद-आदानपद-प्रतिपक्षपद-अनादिसिद्धान्तपद-प्राधान्यपद-नामपद-प्रमाणपद-अवयवपद-संयोगपदभेदैरिति।
गुणानां भावो गौण्यम्। यथा, आदित्यस्य तपनो भास्कर इत्यादीनि नामानि।[१२] अत्र जीवाणं ट्ठाण-वण्णणादो जीवट्ठाणमिदि गोण्णपदं।[१३] ततोऽत्र ग्रंथे जीवस्थानं इति नाम गौण्यपदनाम्ना गीयते।
अत्र प्रमाणस्य पंचभेदा: कथ्यन्ते-द्रव्यक्षेत्रकालभावनयविकल्पात्। द्रव्यप्रमाणं संख्यातासंख्यातानन्तभेदरूपं। क्षेत्रप्रमाणं एकप्रदेशादि। कालप्रमाणं समयावलि-आदि। भावप्रमाणं पंचविधं-आभिनिबोधि-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय-केवलज्ञानभेदात्। नयप्रमाणं सप्तविधं-नैगमसंग्रह-व्यवहार-ऋजुसूत्र-शब्द-समभिरूढ-एवंभूतभेदैरिति।
अत्र इदं जीवस्थानं एतेषु पंचसु प्रमाणेषु कतमं प्रमाणं ? भावप्रमाणमिति। तत्रापि पंचविधभावप्रमाणेषु श्रुतभावप्रमाणमिति[१४]
अथवा प्रमाणं षड्विधं-नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालभावप्रमाणभेदात्। [१५]अतोऽत्र इदं जीवस्थानं प्रथमखंडसिद्धांतं श्रुतज्ञानप्रमाणात् श्रुतज्ञानमेव।
अधुना वक्तव्यता कथ्यते-सा त्रिविधा-स्वसमयवक्तव्यता, परसमयवक्तव्यता, तदुभयवक्तव्यता चेति। यस्मिन् शास्त्रे स्वसमयश्चैव वण्र्यते तच्छास्त्रंं स्वसमयवक्तव्यं कथ्यते।
अत्र जीवस्थाने ग्रन्थे स्वसमयवक्तव्यतास्ति, स्वसमयस्यैव प्ररूपणात्।[१६] अधुना अर्थाधिकारो वर्ण्यते- अर्थाधिकार: त्रिविध:-प्रमाणं, प्रमेयं तदुभयं चेति। अत्र जीवस्थाननामप्रथमखंडग्रंथे एकश्चैवाधिकार: प्रमेयाभिधेयो वर्तते। प्रमेयस्यैव प्ररूपणत्वादिति।[१७]
एष उपक्रमो गत:।
निक्षेपो नामस्थापनाद्रव्यभावभेदाच्चतुर्विध:। अत्र प्रकृतं जीवस्थानं नोआगमभावनिक्षेपरूपं अस्ति।[१८] निक्षेपो गत:।


कहा भी है-

गाथार्थ-आनुपूर्वी तीन प्रकार की है, नाम के दश भेद हैं, प्रमाण के छह भेद हैं, वक्तव्यता के तीन भेद हैं और अर्थाधिकार के भी तीन भेद हैं।
उसमें पूर्वानुपूर्वी, पश्चादानुपूर्वी, यथातथानुपूर्वी इन तीन में से ‘‘यह जीवस्थान नामक शास्त्र खण्ड सिद्धान्त की अपेक्षा पूर्वानुपूर्वी क्रम से लिखा गया है, क्योंकि षट्खण्डागम में जीवस्थान प्रथम खण्ड है। षट्खण्ड रूप आगम का प्रथमखण्ड जीवस्थान नाम का है और वह पूर्वानुपूर्वी क्रम से जाना जाता है।
नाम उपक्रम के दश भेद हैं-गौण्यपद, नोगौण्यपद, आदानपद, प्रतिपक्षपद, अनादिसिद्धान्तपद, प्राधान्यपद, नामपद, प्रमाणपद, अवयवपद और संयोगपद।
गुणों के भाव को गौण्य कहते हैं। जैसे-सूर्य की तपन और भास् गुण की अपेक्षा तपन और भास्कर इत्यादि संज्ञाएँ हैं। यहाँ जीवों के स्थानों का वर्णन करने से ‘‘जीवस्थान’’ यह गौण्य नाम पद है। इसलिए इस ग्रंथ में जीवस्थान यह नाम गौण्यपद नाम से जाना जाता है।
अब प्रमाण के पाँच भेद कहते हैं-द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और नय के भेद से यह पाँच प्रकार का है। इनमें से द्रव्यप्रमाण संख्यात, असंख्यात और अनन्त भेदरूप है।
क्षेत्रप्रमाण एक प्रदेश आदि है। समय, आवली आदि रूप काल प्रमाण है। भावप्रमाण-आभिनिबोधि, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान के भेद से पाँच प्रकार का है।
नयप्रमाण के सात भेद हैं-नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत नय।
प्रश्न-यहाँ यह जीवस्थान इन पाँचों प्रमाणों में से कौन सा प्रमाण है ?
उत्तर-यह भावप्रमाण है। उनमें भी पाँच प्रकार के भाव प्रमाणों में से यह ‘‘जीवस्थान’’ श्रुतभाव प्रमाण है।
अथवा नाम प्रमाण, स्थापना प्रमाण, द्रव्य प्रमाण, क्षेत्र प्रमाण, काल प्रमाण और भाव प्रमाण के भेद से प्रमाण छह प्रकार का है। उनमें से यहाँ यह ‘जीवस्थान’ नाम का प्रथम खण्ड रूप सिद्धान्तग्रंथ श्रुतज्ञान प्रमाण से श्रुतज्ञान रूप ही है।
अब वक्तव्यता का कथन करते हैं-
वह वक्तव्यता तीन प्रकार की है-स्वसमयवक्तव्यता, परसमयवक्तव्यता और तदुभयवक्तव्यता।
जिन शास्त्रों में स्वसमय-जिनधर्म का ही वर्णन होता है वे ‘‘स्वसमयवक्तव्य’’ कहलाते हैं। इनमें से इस जीवस्थान शास्त्र में स्वसमयवक्तव्यता समझनी चाहिए, क्योंकि इसमें स्वसमय का ही वर्णन किया गया है।
अब अर्थाधिकार का वर्णन करते हैं-प्रमाण, प्रमेय और तदुभय के भेद से अर्थाधिकार तीन प्रकार का है। इस जीवस्थान नाम के प्रथम खंड में प्रमेय नामक एक अर्थाधिकार का ही वर्णन है क्योंकि इसमें प्रमाण के विषयभूत प्रमेय का ही प्ररूपण किया गया है।
इस प्रकार उपक्रम नाम का प्रकरण समाप्त हुआ।
निक्षेप नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के भेद से चार प्रकार का है। इस जीवस्थान शास्त्र में नोआगमभाव जीवस्थान निक्षेप प्रकृत है।
इस तरह निक्षेप का वर्णन हुआ।

इदानीं नया: कथ्यन्ते। तथाहि-

नयैर्विना लोकव्यवहारनुपपत्तेर्नया उच्यन्ते। तद्यथा-प्रमाणपरिगृहीतार्थैकदेशे वस्त्वध्यवसायो नय:। स द्विविध:-द्रव्यार्थिक: पर्यायार्थिकश्चेति। द्रव्यार्थिकस्त्रिविध:-नैगम: संग्रहो व्यवहारश्चेति। पर्यायार्थिको द्विविध:-अर्थनयो व्यञ्जननयश्चेति। तत्रार्थनय:-ऋजुसूत्र:। व्यञ्जननयस्त्रिविध:-शब्द: समभिरूढ एवंभूत इति।

एवमेते संक्षेपेण नया: सप्तविधा:, अवान्तरभेदेन पुनरसंख्येया:। एते च पुनर्व्यवहर्तृभिरवश्यमवगन्तव्या:, अन्यथार्थप्रतिपादनावगमानुपपत्ते:[१९]
एवं नयप्ररूपणा गता।
अत्र पर्यंतं ग्रन्थावतारस्य चतुर्विधस्य मध्ये उपक्रम-निक्षेप-नया: कथिता: सन्ति।
इति मंगलगाथासूत्रस्य विस्तृतविवेचनरूपेण प्रथमस्थले एकं गाथासूत्रं गतम्।
अधुना अनुगमस्य कथनरूपेण द्वितीयसूत्रस्यावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्यदेवेन-
तद्यथा अणुगमं वत्तइस्सामो[२०] -
एत्तो इमेसिं चोद्दसण्हं जीव-समासाणं मग्गणट्ठदाए तत्थ इमाणि चोद्दस चेव ट्ठाणाणि णादव्वाणि भवंति।।२।।


अब यहाँ नयों का कथन करते हैं-

नयों के बिना लोकव्यवहार नहीं चल सकता है इसलिए नयों का वर्णन किया जाता है। प्रमाण के द्वारा ग्रहण की गई वस्तु के एक अंश में वस्तु का निश्चय करने वाले ज्ञान को नय कहते हैं। उस नय के द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ये दो भेद होते हैं। द्रव्यार्थिक नय के तीन भेद हैं-नैगम, संग्रह और व्यवहार।

पर्यायार्थिक नय दो प्रकार का है-अर्थनय और व्यञ्जननय। इसमें अर्थनय ऋजुसूत्र है और व्यञ्जननय तीन प्रकार का है-शब्द, समभिरूढ़, एवंभूत।
इस प्रकार संक्षेप से ये सातों प्रकार के नय कहे और अवान्तर भेदों से यह नय असंख्यात भेदों वाला है। व्यवहारकुशल लोगों को इन नयों का स्वरूप अवश्य समझ लेना चाहिए अन्यथा नयों के स्वरूप को समझे बिना पदार्थों के स्वरूप का प्रतिपादन और उसका ज्ञान अथवा पदार्थों के स्वरूप के प्रतिपादन का ज्ञान नहीं हो सकता है।
इस तरह नयप्ररूपणा का वर्णन समाप्त हुआ।

विशेषार्थ-आगम ग्रंथों में नय का विशद विवेचन किया गया है। वचनालाप की पद्धति को सुन्दर और प्रामाणिक बनाने के लिए नयों का ज्ञान अति आवश्यक है। इनमें सर्वप्रथम जो द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय बताए गए हैं उनका अभिप्राय यह है कि द्रव्य ही जिसका अर्थप्रयोजन हो उसे द्रव्यार्थिक नय कहते हैं और ‘‘परि’’ अर्थात् भेद को जो प्राप्त होता है उसे पर्याय कहते हैं, वह पर्याय ही जिस नय का प्रयोजन हो उसे पर्यायार्थिक नय कहते हैं।

पुन: इन दोनों नयों के भेद-प्रभेदों में नैगम आदि सात नयों को गर्भित कर दिया है एवं व्यंजन नय की व्याख्या में धवला टीकाकार श्री वीरसेनाचार्य ने कहा है कि ‘‘शब्द के आधार से अर्थ के ग्रहण करने में समर्थ शब्दनय है। यह नय लिंग, संख्या, काल, कारक, पुरुष और उपग्रह के व्यभिचार की निवृत्ति करने वाला है। स्त्रीलिंग के स्थान पर पुल्लिंग का कथन करना और पुल्लिंग के स्थान पर स्त्रीिंलग का कथन करना आदि ‘‘लिंगव्यभिचार’’ है, जैसे-‘‘तारका स्वाति: अर्थात् तारे स्वाति हैं। इस प्रयोग में तारका शब्द स्त्रीलिंग है और स्वाति शब्द पुल्लिंग है इसलिए स्त्रीलिंग के स्थान पर पुल्लिंग शब्द का प्रयोजन करना लिंगव्यभिचार है। इसी प्रकार अन्य लिंगों के साथ भी समझना चाहिए।

एकवचन आदि की जगह द्विवचन आदि का कथन करना ‘‘संख्याव्यभिचार’’ है। जैसे-‘‘नक्षत्रं शतभिषज:’’ अर्थात् नक्षत्र शतभिषज हैं। यहाँ पर नक्षत्र शब्द एकवचनान्त है और शतभिषज शब्द बहुवचनान्त है, इसलिए एकवचन के स्थान में बहुवचन का कथन करने से संख्याव्यभिचार है।
भविष्यत् आदि काल के स्थान पर भूत आदि काल का प्रयोग करना ‘‘कालव्यभिचार’’ है। जैसे-‘विश्वदृश्वास्य पुत्रो जनिता’’ जिसने समस्त विश्व को देख लिया है ऐसा इसके पुत्र होगा। यहाँ पर विश्व का देखना भविष्यत् काल का कार्य है परन्तु उसका भूतकाल के प्रयोग द्वारा कथन किया गया है। इसलिए यहाँ पर भविष्यत् काल का कार्य भूतकाल में कहने से कालव्यभिचार है।

एक साधन अर्थात् एक कारक के स्थान पर दूसरे कारक के प्रयोग करने को ‘‘साधनव्यभिचार’’ कहते हैं। जैसे-‘ग्राममधिशेते’ वह ग्राम में शयन करता है। यहाँ पर सप्तमी कारक के स्थान पर द्वितीया कारक का प्रयोग किया गया है इसलिए यह साधन व्यभिचार है।

उत्तमपुरुष के स्थान पर मध्यमपुरुष और मध्यमपुरुष के स्थान पर उत्तमपुरुष आदि के कथन करने को ‘‘पुरुषव्यभिचार’’ कहते हैं। जैसे-‘‘एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यसि यातस्ते पिता’’ अर्थात् आओ, तुम समझते हो कि मैं रथ से चला जाऊँगा परन्तु अब न जाओगे, तुम्हारा पिता चला गया।’’ यहाँ पर ‘मन्यसे’ के स्थान पर ‘मन्ये’ यह उत्तमपुरुष का और ‘यास्यामि’ के स्थान पर ‘यास्यसि’ यह मध्यमपुरुष का प्रयोग हुआ है, इसलिए पुरुषव्यभिचार है।

उपसर्ग के निमित्त से परस्मैपद के स्थान पर आत्मनेपद और आत्मनेपद के स्थान पर परस्मैपद के कथन कर देने को ‘‘उपग्रहव्यभिचार’’ कहते हैं। जैसे-‘‘रमते’’ के स्थान पर ‘विरमति’, ‘तिष्ठति’ के स्थान पर ‘संतिष्ठते’ का प्रयोग किया जाता है।
इस तरह जितने भी लिंग आदि व्यभिचार कहे गये हैं वे सभी अयुक्त हैं, क्योंकि अन्य अर्थ का अन्य अर्थ के साथ संबंध नहीं हो सकता है। इसलिए समानलिंग, समानसंख्या और समानसाधन आदि का कथन करना ही उचित है। इसी प्रकार अन्य नयों के अनुसार आगम का सार समझा जाता है।
कहा भी है-णत्थि णएहि विहूणं, सुत्तं अत्थोव्व जिणवरमदम्हि।
तो णयवादे णिउणा, मुणिणो सिद्धंतिया होंति।।६८।।
तम्हा अहिगय-सुत्तेण अत्थ सम्पायणम्हि जइयव्वं।
अत्थ गई वि य णय-वाद-गहण-लीणा दुरहियम्मा।।६९।।
अर्थात् जिनेन्द्र भगवान् के मत में नयवाद के बिना सूत्र और अर्थ कुछ भी नहीं कहा गया है, इसलिए जो मुनि नयवाद में निपुण होते हैं वे सच्चे सिद्धान्त के ज्ञाता समझने चाहिए। अत: जिसने सूत्र अर्थात् परमागम को भले प्रकार जान लिया है उसे ही अर्थ सम्पादन में अर्थात् नय और प्रमाण के द्वारा पदार्थ के परिज्ञान करने में प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि पदार्थों का परिज्ञान भी नयवादरूपी जंगल में अन्तर्निहित है अतएव दुरधिगम्य-जानने के लिए कठिन है।

अब अनुगम का कथन करते हैं-
यहाँ तक ग्रंथ अवतार के चार प्रकारों में से उपक्रम, निक्षेप और नय कहे गये हैं। इस प्रकार मंगल गाथा सूत्र के विस्तृत विवेचन रूप से प्रथमस्थल के द्वारा एक गाथासूत्र हुआ।
अब अनुगम के कथनरूप से श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्य देव के द्वारा द्वितीय सूत्र का अवतार किया जाता है-
जैसे कि-अनुगम को कहेंगे-
सूत्रार्थ-
इस द्रव्यश्रुत और भावश्रुतरूप प्रमाण से इन चौदह गुणस्थानों के अन्वेषणरूप प्रयोजन के होने पर वहाँ ये चौदह ही मार्गणास्थान जानने योग्य हैं।।२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘एत्तो’ ‘एतस्मात् प्रमाणात्’। [२१]‘इमेसिं’-एतेषाम् प्रत्यक्षीभूतानां। चोद्दसण्हं-चतुर्दशानां ‘जीवसमासाणं’-जीवसमासानां-गुणस्थानानां मग्गणट्ठदाए-मार्गणार्थतायाम्-मार्गणारूप-प्रयोजनविशेष-विवक्षायां तत्थ-तत्र तस्यां इमाणि-इमानि प्रत्यक्षीभूतानि भावमार्गणास्थानानि चोद्दस चेव-चतुर्दश चैव ट्ठाणाणि णादव्वाणि भवंति-मार्गणास्थानानि ज्ञातव्यानि भवन्तीति। अस्यायमर्थ:-एतस्मात् द्रव्यश्रुतभावश्रुतप्रमाणात् एतेषां चतुर्दशगुणस्थानानां मार्गणार्थतायां अन्वेषणरूपप्रयोजने सति तत्र चतुर्दशैव मार्गणास्थानानि ज्ञातव्यानि भवन्ति।[२२]

इतो विस्तर:-प्रमाणं द्विविधं-द्रव्यभावप्रमाणभेदात्। द्रव्यप्रमाणात् संख्येयासंख्येयानन्तात्मक-द्रव्यजीवस्थानस्यावतार:।[२३] भावप्रमाणं पंचविधं-आभिनिबोधिक-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय-केवलभाव-प्रमाणभेदात्।
अत्र ग्रंथं प्रतीत्य श्रुतप्रमाणात्, अर्थत: केवलप्रमाणात्[२४] प्रयोजनमस्ति। अत्रापि आनुपूर्वी-नाम-वक्तव्यता-अर्थाधिकार: कथनीयो भवति।
अत्र पूर्वानुपूव्र्या गणनायां द्रव्य-भावश्रुतज्ञानं प्रतीत्य द्वितीयश्रुतप्रमाणात् अर्थं प्रतीत्य पंचमकेवल-ज्ञानप्रमाणात् प्रयोजनं वर्तते। नामापेक्षया श्रुतज्ञानमिति गुणनाम। इदं श्रुतज्ञानं अक्षर-पद-संघात-प्रतिपत्त्याद्यपेक्षया संख्यातमर्थतोऽनंतं। एतस्य श्रुतप्रमाणस्य तदुभयवक्तव्यतास्ति।
अर्थाधिकारो द्विविध:-अंगबाह्य: अंगप्रविष्टश्चेति। तत्रांगबाह्यस्य चतुर्दशार्थाधिकारास्ते सामायिकचतु-र्विंशतिस्तवादय:। इमे चतुर्दश अंगबाह्यभेदा: प्रागेव प्रतिपादिता: सन्ति।[२५]
अंगप्रविष्टस्यार्थाधिकारो द्वादशविधस्ते आचारांगादयो दृष्टिवादपर्यन्ता: इमे द्वादशांगा: सन्ति।
अस्मिन् ग्रन्थे किं आचारांगेण प्रयोजनं सूत्रकृतांगेन वा कतमेनांगेन प्रयोजनं ? इति आशंकायामाह-
अस्मिन् ग्रन्थे दृष्टिवादांगेन प्रयोजनमस्ति।
आनुपूव्र्या द्वादशमांगोऽयं।
अयमंगो नानादृष्टिं वर्णयति इति दृष्टिवादनाम सार्थकं वर्तते। अतो गुणनाम।
उक्त च-णामं-दिट्ठीओ वददीदि दिट्ठिवादं ति गुणणामं।
प्रमाणापेक्षया-अक्षरपदसंघातप्रतिपत्ति-अनियोगद्वारै: संख्यातं, अर्थतोऽनन्तं- वक्तव्यतापेक्षया तदुभयवक्तव्यतास्ति अत्र अंगे। तस्य पंचार्थाधिकारा भवन्ति-परिकर्म-सूत्र-प्रथमानुयोग-पूर्वगत-चूलिकाश्चेति।
अत्रापि प्रश्नमालायां-परिकर्मादिपंचभेदेषु कतमेन प्रयोजनमत्र ? अस्मिन् जीवस्थानशास्त्रे पूर्वगतेन प्रयोजनमस्ति।
पूर्वगतस्य चतुर्दश भेदा:-उत्पादपूर्वं अग्रायणीयं इत्यादय: प्रागेव प्रतिपादिता:।
अत्रापि पंचविध उपक्रम: कथयितव्योऽस्ति।
अत्र पूर्वानुपूव्र्या गणनायां अग्रायणीयनामद्वितीयपूर्वेण प्रयोजनं। नामापेक्षया-अंगानां अग्रं प्रधानभूतपदं वर्णयतीति गुणनाम सार्थकं वर्तते। प्रमाणापेक्षया-अक्षरपदसंघातप्रतिपत्ति-अनुयोगद्वारै: संख्यातमर्थतोऽनन्तं। वक्तव्यतापेक्षया-स्वसमयवक्तव्यतास्ति अस्मिन् पूर्वे।
अग्रायणीयपूर्वस्य चतुर्दश अर्थाधिकारा: सन्ति-तद्यथा-पूर्वान्त-अपरान्त-ध्रुव-अध्रुव-चयनलब्धि-अर्धोपम-प्रणधिकल्प-अर्थ-भौम-व्रतादिक-सर्वार्थ-कल्पनिर्याण-अतीतकालसिद्ध-बुद्ध-अनागतकालसिद्ध-बुद्धाश्चेति चतुर्दश वस्तूनि।
एषु वस्तुषु अत्र ग्रन्थे कतमेन प्रयोजनम् ?
अत्र पंचमवस्तुचयनलब्धिनाम्ना प्रयोजनम् अस्ति।[२६]
पंचविध उपक्रम: कथयितव्य:-
पूर्वानुपूर्व्या पंचमाधिकारवस्तुन:। अयं चयनविधिं लब्धिविधिं च वर्णयतीति सार्थकं गुणनाम। अक्षरपदसंघातप्रतिपत्त्यनुयोगद्वारै: संख्यातमर्थतोऽनन्तं। वक्तव्यतायां स्वसमयवक्तव्यतास्ति।
अस्मिन् चयनलब्धे: विंशतयोऽर्थाधिकारा:। तेषु अत्र कतमेन प्रयोजनं ?
विंशति-अर्थाधिकारेषु मध्येऽत्र चतुर्थप्राभृतेन प्रयोजनम्।
अत्रापि उपक्रम: पंचविध:-
पूर्वानुपूर्व्या ‘कर्मप्रकृतिप्राभृतनाम्ना’ चतुर्थेन प्राभृतेन प्रयोजनम्।
अयं प्राभृतग्रन्थ: कर्मप्रकृतीनां स्वरूपं वर्णयति। अतोऽस्य कर्मप्रकृतिप्राभृतमिदं गौण्यनाम। अस्य ‘वेदनाकृत्स्नप्राभृतमपि’ द्वितीयं नामास्ति। कर्मणामुदयो वेदना इति भण्यते, तां निरवशेषेण वर्णयति इति वेदनाकृत्स्नप्राभृतमपि गौण्यनाम वर्तते। इदं अक्षरपदसंघातप्रतिपत्ति-अनुयोगापेक्षया संख्यातप्रमाणमपि अर्थतोऽनन्तं वर्तते। स्वसमयस्य प्रतिपादनेन स्वसमयवक्तव्यतास्ति।
कर्मप्रकृतिप्राभृतस्य चतुर्विंशति-अर्थाधिकारा: सन्ति। तद्यथा-कृति-वेदना-स्पर्श-कर्म-प्रकृति-बंधन-निबंधन-प्रक्रम-उपक्रम-उदय-मोक्ष-संक्रम-लेश्या-लेश्याकर्म-लेश्यापरिणाम-सातासात-दीर्घह्रस्व-भव-धारणीय-पुद्गलत्व[२७]-निधत्तानिधत्त-निकाचित-अनिकाचित-कर्मस्थिति-पश्चिमस्कंधाश्चेति। एषु सर्वेषु अल्पबहुत्वं योजनीयं।
अत्र एषु विंशतिअर्थाधिकारेषु कतमेन प्रयोजनम् ?
अत्र बन्धननाम्ना षष्ठाधिकारेण प्रयोजनमस्ति।
अत्रापि पंचविध उपक्रमो वक्तव्योऽस्ति। तथाहि-
पूर्वानुपूर्व्या षष्ठाधिकारेण प्रयोजनं।
अयं बन्धननामाधिकारो बंधस्वरूपं वर्णयतीति अस्य इदं गौण्यनाम। अक्षरपदसंघातप्रतिपत्त्यनुयोगापेक्षया संख्यातप्रमाणमर्थतोऽनन्तम्। स्वसमयं कथयतीति स्वसमयवक्तव्यतास्ति अत्र।
अस्य बन्धन-अर्थाधिकारस्य चत्वारो भेदा: सन्ति। तथाहि-
बंधो बंधको बंधनीयो बंधविधानं चेति।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ पर ‘‘एत्तो’’ अर्थात् ‘‘एतद्’’ पद से प्रमाण का ग्रहण किया है इसलिए एतद् अर्थात् इससे-प्रमाण से ऐसा अर्थ समझना चाहिए। पुन: सूत्र में जो ‘इमेसिं’ पद आया है उससे प्रत्यक्षीभूत पदार्थ का निर्देश होता है। इसी प्रकार ‘‘चोद्दसण्हं’’ पद से चौदह जीवसमासों-गुणस्थानों को ग्रहण किया है। ‘मग्गणट्ठदाए’’ पद मार्गणारूपप्रयोजनविशेष की विवक्षा में प्रयुक्त है। तत्थ और इमाणि पद का अर्थ है-ये प्रत्यक्षीभूत भावमार्गणास्थान हैं जो चौदह ही हैं, न्यूनाधिक नहीं।

इसका अर्थ यह है कि इन द्रव्यश्रुत और भावश्रुत प्रमाणों से उन चौदह गुणस्थानों के मार्गणारूप भाव के होने पर-अन्वेषणरूप प्रयोजन के होने पर वे मार्गणास्थान चौदह ही होते हैं ऐसा जानना चाहिए।

उसी का विस्तार करते हैं-द्रव्य और भाव के भेद से प्रमाण दो प्रकार का है। द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा शब्द, प्रमातृ और प्रमेय के आलम्बन से क्रमश: संख्यात, असंख्यात और अनन्तरूप द्रव्य जीवस्थान का अवतार हुआ है।

भावप्रमाण के पाँच भेद हैं-आभिनिबोधिक, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान। यहाँ पर ग्रंथ की अपेक्षा श्रुतप्रमाण से और अर्थ की अपेक्षा केवलज्ञानप्रमाण से प्रयोजन है। यहाँ भी आनुपूर्वी, नाम, वक्तव्यता और अर्थाधिकार कथन करने योग्य हैं।

यहाँ पर पूर्वानुपूर्वी से गणना करने पर द्रव्यश्रुत और भावश्रुत की अपेक्षा तो दूसरे श्रुतप्रमाण से प्रयोजन है और अर्थ की अपेक्षा पाँचवे केवलज्ञानप्रमाण से प्रयोजन है।

नाम की अपेक्षा से इस श्रुतज्ञान का यह सार्थक नाम है। यह श्रुतज्ञान अक्षर, पद, संघात और प्रतिपत्ति आदि की अपेक्षा संख्यात भेदरूप है और अर्थ की अपेक्षा अनन्त है।

तीन वक्तव्यताओं में से इस श्रुतप्रमाण की तदुभयवक्तव्यता (स्वसमय-परसमयवक्तव्यता) जानना चाहिए।
आचार्य कहते हैं कि-अर्थाधिकार दो प्रकार का है-अंगबाह्य और अंगप्रविष्ट। उनमें से अंगबाह्य के चौदह अर्थाधिकार हैं। वे सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव आदि चौदह अंगबाह्य के भेद पहले ही प्रतिपादित किये जा चुके हैं।
 
अंगप्रविष्ट के अर्थाधिकार बारह प्रकार के हैं। आचारांग आदि से लेकर दृष्टिवाद पर्यन्त बारह अंग हैं।
इस ग्रंथ में क्या आचारांग से प्रयोजन है ? अथवा सूत्रकृतांग से अथवा किस अंग से प्रयोजन है ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं-
इस ग्रंथ में दृष्टिवादअंग से प्रयोजन है। आनुपूर्वी की अपेक्षा यह दृष्टिवाद अंग बारहवाँ है।

यह अंग नाना दृष्टियों का वर्णन करता है इसलिए इसका दृष्टिवाद यह नाम सार्थक है, अत: यह गुणसहित सार्थक नाम वाला है।
कहा भी है-

नाम-इनमें अनेक दृष्टियों का वर्णन किया गया है इसलिए इसका ‘दृष्टिवाद’ यह गुणनाम-गौण्यनाम-गुणसहित सार्थक नाम वाला है।
प्रमाण की अपेक्षा से अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्ति और अनुयोगद्वारों से संख्यातप्रमाण और अर्थ की अपेक्षा अनन्तप्रमाण है।
वक्तव्यता की अपेक्षा से इस अंग में तदुभयवक्तव्यता है।

उस दृष्टिवाद के पाँच अधिकार हैं-परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत और चूलिका। यहाँ भी प्रश्नमाला में-परिकर्म आदि पाँच भेदों में इस अंग में किस भेद से प्रयोजन है ? ऐसी पृच्छा होने पर कहते हैं-
इस जीवस्थान शास्त्र में पूर्वगत से प्रयोजन है।

पूर्वगत के चौदह भेद हैं-उत्पादपूर्व, अग्रायणीय पूर्व इत्यादि चौदह अर्थाधिकार हैं। इनके नाम पहले कहे जा चुके हैं।
यहाँ पाँच प्रकार का उपक्रम भी कथन करने योग्य है।

यहाँ पूर्वानुपूर्वी से गणना करने पर अग्रायणीय नामक द्वितीय पूर्व से प्रयोजन है।
नाम की अपेक्षा से-अंगों में अग्र प्रधानभूत पद का वर्णन करता है इसलिए गुणसहित सार्थक नाम है।
प्रमाण की अपेक्षा से-अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्ति और अनुयोग द्वारों से संख्यात है और अर्थ की अपेक्षा अनन्तप्रमाण है।
वक्तव्यता की अपेक्षा-इस पूर्व में स्वसमयवक्तव्यता है।

अग्रायणीय पूर्व के चौदह अर्थाधिकार हैं, जो कि इस प्रकार हैं-
पूर्वान्त, अपरान्त, ध्रुव, अध्रुव, चयनलब्धि, अर्धोपम, प्रणधिकल्प, अर्थ, भौम, व्रतादिक, सर्वार्थ, कल्पनिर्याण, अतीतकालसिद्धबुद्ध और अनागतकालसिद्धबुद्ध ये चौदह वस्तु हैं।

इन वस्तुओं में से इस ग्रंथ में किस वस्तु से प्रयोजन है ?
यहाँ पंचम वस्तु की चयन नामक लब्धि से प्रयोजन है।
अब पाँच प्रकार का उपक्रम कथन किया जाना चाहिए-

पूर्वानुपूर्वी से वस्तु का पाँचवाँ अधिकार है। यह अधिकार चयनलब्धि का और लब्धि की विधि का वर्णन करने वाला सार्थक नाम वाला है। अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्ति और अनुयोग द्वारों से असंख्यात है और अर्थ की अपेक्षा अनन्तप्रमाण है।
वक्तव्यता की अपेक्षा इस अधिकार में स्वसमयवक्तव्यता है।

इस चयनलब्धि के बीस अर्थाधिकार हैं, उनमें से यहाँ किस अर्थाधिकार से प्रयोजन है ?
बीस अर्थाधिकारों के मध्य में यहाँ चतुर्थप्राभृत से प्रयोजन है।

यहाँ उपक्रम नामक चतुर्थप्राभृत अर्थाधिकार भी पाँच प्रकार का है-

यहाँ पूर्वानुपूर्वी क्रम से कर्मप्रकृतिप्राभृत नाम के चतुर्थ प्राभृत से प्रयोजन है।
यह प्राभृतग्रंथ कर्मप्रकृतियों के स्वरूप का वर्णन करता है इसलिए इसका ‘‘कर्मप्रकृति प्राभृत’’ यह नाम सार्थक गुणवाला है। इसका दूसरा नाम ‘‘वेदनाकृत्स्नप्राभृत’’ भी है।

कर्मों का उदय वेदना कहलाता है, उस वेदना-उदय का पूर्णरूप से वर्णन करने वाला होने से इसका ‘‘वेदनाकृत्स्नप्राभृत’’ यह गौण्य-सार्थक नाम है।
यह प्राभृत अक्षर,पद, संघात, प्रतिपत्ति और अनुयोग द्वारों से संख्यात प्रमाण वाला है एवं अर्थ की अपेक्षा अनन्त प्रमाण है। स्वसमय के प्रतिपादन की मुख्यता से इस प्राभृत में ‘‘स्वसमयवक्तव्यता’’ है।

कर्मप्रकृतिप्राभृत के चौबीस अर्थाधिकार हैं, जो इस प्रकार हैं-

कृति, वेदना, स्पर्श, कर्म, प्रकृति, बंधन, निबंधन, प्रक्रम, उपक्रम, उदय, मोक्ष, संक्रम, लेश्या, लेश्याकर्म, लेश्यापरिणाम, सातअसात, दीर्घह्रस्व, भवधारणीय, पुद्गलत्व, निधत्त-अनिधत्त, निकाचित, अनिकाचित, कर्मस्थिति और पश्चिमस्कंध। इन सबमें अल्पबहुत्व की योजना कर लेना चाहिए।

यहाँ इन चौबीस अर्थाधिकारों में किस अधिकार से प्रयोजन है ?
यहाँ बंधन नाम के छठे अधिकार से प्रयोजन है।

इस शास्त्र में भी यहाँ पाँच प्रकार का उपक्रम वक्तव्य-कथन करने योग्य है। जैसे-पूर्वानुपूर्वी की अपेक्षा से छठे अधिकार से प्रयोजन है।

यह बंधन नाम का अधिकार बंधनस्वरूप का वर्णन करता है ऐसा इसका सार्थक नाम है। अक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्ति और अनुयोग की अपेक्षा इसका प्रमाण संख्यातरूप है और अर्थ की अपेक्षा अनन्त प्रमाण है। स्वसमय का कथन करने से इसमें स्वसमयवक्तव्यता है।

इस बंधन नामक अर्थाधिकार के चार भेद हैं। उनके नाम-बंध, बन्धक, बंधनीय और बन्धविधान।

टिप्पणी

  1. गोम्मटसारजीवकाण्ड, टीका जीवतत्त्वप्रदीपिका, गाथा ३१६, पृ. ५२५ (ज्ञानपीठ प्रकाशन)।
  2. गोम्मटसार जीवकाण्ड, जीवतत्त्वप्रदीपिका टीकायां, गाथा ३३४।
  3. गोम्मटसार जीवकाण्ड, पृ. ५३१-५६५।
  4. कसायपाहुड़, पुस्तक १, पृ. ९३।
  5. कातंत्रव्याकरण में इन्हें जिह्वामूलीय और उपध्मानीय कहते हैं संज्ञा के समान चिन्ह में भी कुछ अन्तर है-क इति जिह्वामूलीय: ‘‘।।१९।।’’ प इति उपध्मानीय:।।२०।। (कातंत्ररूपमाला) पृ. ६।
  6. गोम्मटसार जीवकांड, जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका, पृ. ५८४।
  7. एतच्छ्रूयते कतिपयसाधुभि: कतिपयविद्वद्भिश्च-यत् एकदा श्रीनेमिचंद्राचार्य: षट्खण्डागमग्रन्थस्य स्वाध्याये निमग्न आसीत्, तदानीं चामुण्डरायशिष्ये समागते सति गुरुणा स्वाध्याय: समापित:। भगवन्! भवता कथमयं स्वाध्यायोऽवरुद्ध:। इति पृष्टे सति तेन मुनीश्वरेणोत्तंâ-श्रावकाणां इमं सिद्धान्तग्रन्थं पठितुमधिकारो नास्ति। तर्हि मया कथमवबुध्यते एषां रहस्यं? तदा गुरुदेवेण महदुपकारभावनया षट्खंडागमसारभूता: पंचसंग्रहग्रन्था: रचिता: इति।
  8. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ७३।
  9. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ७३
  10. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ७५।
  11. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ७५।
  12. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ७५।
  13. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ८०।
  14. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पृ. ८१।
  15. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ८२।
  16. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ८३।
  17. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ८३।
  18. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ८४।
  19. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ८४-९२।
  20. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ९२।
  21. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ९३।
  22. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. १३२।
  23. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ९४।
  24. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पृ. ९६।
  25. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पु. १, पृ. ९७।
  26. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, भाग १, पृ. १०१ से १२४ तक।
  27. ‘पुद्गलात्त’ इति वा पाठ:।