027.प्रथम महाधिकार - चौबीस अनुयोग द्वार

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प्रथम महाधिकार - चौबीस अनुयोग द्वार

अत्रापि काभ्यां इति प्रश्ने सति बन्धकेन बंधविधानेन च प्रयोजनम्।

अत्र बन्धकार्थाधिकारस्य एकादश अनुयोगद्वाराणि। तद्यथा-एकजीवापेक्षया स्वामित्वानुगम:, एकजीवापेक्षया कालानुगम:, एकजीवापेक्षया अन्तरानुगम:, नानाजीवापेक्षया भंगविचयानुगम:, द्रव्यप्रमाणानुगम:, क्षेत्रानुगम:, स्पर्शनानुगम:, नानाजीवापेक्षया कालानुगम:, नानाजीवापेक्षया अन्तरानुगम:, भागाभागानुगम:, अल्पबहुत्वानुगमश्चेति।
अत्रापि पृच्छायां सत्यां एतस्मिन् ग्रन्थे पंचमद्रव्यप्रमाणानुगमात् प्रयोजनमस्ति इति वक्तव्यम्।
एतस्मिन् जीवस्थानमहाशास्त्रे यो द्रव्यप्रमाणानुगमोऽधिकारोऽस्ति स अस्य बंधकनामाधिकारस्य द्रव्यप्रमाणानुगमनाम्न: पंचमाधिकारान्निर्गतोऽस्ति।
द्वितीयस्य बंधविधानस्य चत्वारो भेदा:-प्रकृतिबंध-स्थितिबंध-अनुभागबंध-प्रदेशबन्धाश्चेति।
प्रकृतिबंधस्य मूलप्रकृतिबन्धोत्तरप्रकृतिबन्धौ द्वौ भेदौ स्त:। तयोद्र्वयो: मूलप्रकृतिबंधकथनं स्थगितं कृत्वा उत्तरप्रकृतिबंधो वदति।
उत्तरप्रकृतिबंधस्य द्वौ भेदौ-एकैकोत्तरप्रकृतिबन्धाव्वोगाढउत्तरप्रकृतिबंधौ। तयोद्र्वयो: मध्ये एकैकोत्तरप्रकृतिबन्धस्य चतुर्विंशति अनुयोगद्वाराणि भवन्ति। ते ईदृशा:-
समुत्कीर्तना-सर्वबंध-नोसर्वबंध-उत्कृष्टबंध-अनुत्कृष्टबंध-जघन्यबंध-अजघन्यबंध-सादिबन्ध-अनादिबंध-ध्रुवबंध-अध्रुवबंध-बन्धस्वामित्वविचय-बन्धकाल-बन्धान्तर-बन्धसन्निकर्ष-नानाजीवापेक्षा भंगविचय-भागाभागानुगम-परिमाणानुगम-क्षेत्रानुगम-स्पर्शनानुगम-कालानुगम-अन्तरानुगम-भावानुगम-अल्पबहुत्वानुगमश्चेति।
एषु चतुर्विंशति-अधिकारेषु य: समुत्कीर्तनानामाधिकारोऽस्ति। तस्मात् प्रकृतिसमुत्कीर्तना, स्थानसमुत्कीर्तना, त्रयो महादण्डकाश्च निर्गता:। तथा च त्रयोविंशतितमात् भावानुगमात् भावानुगमो निर्गतोऽस्तीति।
अव्वोगाढ-उत्तरप्रकृतिबंधस्य द्वौ भेदौ स्त:-भुजगारबन्ध: प्रकृतिस्थानबन्धश्चेति। अत्रापि प्रकृतिस्थान-बंधस्याष्टौ अनुयोगद्वाराणि। ते ईदृशा:-सत्प्ररूपणा द्रव्यप्रमाणानुगम: क्षेत्रानुगम: स्पर्शनानुगम: कालानुगम: अन्तरानुगमो भावानुगमोऽल्पबहुत्वानुगमश्चेति।
एभ्योऽष्टाभ्योऽनुयोगद्वारेभ्य: षडनुयोगद्वाराणि निर्गतानि। ते इमे-सत्प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा स्पर्शन-प्ररूपणा कालप्ररूपणा अन्तरप्ररूपणा अल्पबहुत्वप्ररूपणा चेति। इमे षडनुयोगद्वाराणि सन्ति। पुन: बंधकनामाधिकारस्य एकादशाधिकारेषु द्रव्यप्रमाणानुगमात् द्रव्यप्रमाणानुगमो निर्गत:।
पुनश्च-एवैâकोत्तरप्रकृतिबंधस्य चतुर्विंशतिअधिकारेषु त्रयोविंशतितमभावानुगमात् भावप्रमाणानुगमो निर्गत इति।
षड् द्वौ मिलित्वा अस्य जीवस्थानस्याष्टौ अनियोगद्वाराणि भवन्ति। ते के इति चेत् ? उच्यते-सत्प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा स्पर्शनप्ररूपणा कालप्ररूपणा अन्तरप्ररूपणा अल्पबहुत्वप्ररूपणा द्रव्यप्रमाणानुगमो भावप्रमाणानुगमश्चेति अष्टौ अनुयोगद्वाराणि अस्मिन् जीवस्थाननाम्नि महाग्रंथे सन्तीति।
स्थितिबंधस्य द्वौ भेदौ-मूलप्रकृतिस्थितिबंध उत्तरप्रकृतिस्थितिबंधश्च। तत्रोत्तरप्रकृतिस्थितिबंधस्य चतुर्विंशति अनुयोगद्वाराणि-अर्धच्छेद: सर्वबंध: नोसर्वबंध: उत्कृष्टबंध: अनुत्कृष्टबंध: जघन्यबंध: अजघन्यबंध: सादिबंध: अनादिबंध: ध्रुवबंध: अधु्रवबंध: बंधस्वामित्वविचय: बंधकाल: बंधान्तरं बंधसन्निकर्ष: नानाजीवापेक्षा भंगविचय: भागाभागानुगम: परिमाणानुगम: क्षेत्रानुगम: स्पर्शनानुगम: कालानुगम: अन्तरानुगम: भावानुगम: अल्पबहुत्वानुगमश्चेति।तत्रार्धच्छेदो द्विविध:-जघन्यस्थिति अर्धच्छेद: उत्कृष्टस्थिति अर्धच्छेदश्चेति।
जघन्यस्थित्यर्धच्छेदात् जघन्यस्थितिर्निगता।
उत्कृष्टस्थित्यर्धच्छेदादुत्कृष्टस्थितिर्निगता च।
दृष्टिवादाङ्गस्यांतर्गतात् सूत्रभेदात्सम्यक्त्वोत्पत्तिर्नामाधिकारो निर्गत:।
व्याख्याप्रज्ञप्तिनामपंचमांगात् ‘गत्यागती’ नामाधिकारो निर्गत:।


यहाँ पर किन दो से प्रयोजन है ? ऐसा प्रश्न होने पर बंधक और बंधविधान से प्रयोजन है। उस बंधक अर्थाधिकार के ग्यारह अनुयोगद्वार हैं। वे इस प्रकार हैं-एक जीव की अपेक्षा से स्वामित्वानुगम, एक जीव की अपेक्षा कालानुगम, एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम, नाना जीव की अपेक्षा भंगविचयानुगम, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, नाना जीव की अपेक्षा कालानुगम, नाना जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम, भागाभागानुगम और अल्पबहुत्वानुगम। यहाँ भी पृच्छा होने पर इस ग्रंथ में पंचमद्रव्यप्रमाणानुगम से प्रयोजन है ऐसा कहना चाहिए। इस जीवस्थान नामक महाशास्त्र में जो द्रव्यप्रमाणानुगम अधिकार है वह इस बंधक नामक अधिकार के द्रव्यप्रमाणानुगम नाम के पंचम अधिकार से निकला है। द्वितीय बंधविधान के चार भेद हैं-प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, अनुभागबंध और प्रदेशबंध। प्रकृतिबंध के मूलप्रकृतिबंध और उत्तरप्रकृतिबंध ये दो भेद हैं। इन दोनों में मूलप्रकृतिबंध का कथन स्थगित करके उत्तर-प्रकृतिबंध का कथन करते हैं। उत्तरप्रकृतिबंध के दो भेद हैं-एकैकोत्तर प्रकृतिबंध और अव्वोगाढ़ उत्तरप्रकृतिबंध। इन दोनों के मध्य में एकैकोत्तरप्रकृतिबंध के चौबीस अनुयोगद्वार होते हैं। वे इस प्रकार हैं- समुत्कीर्तना, सर्वबंध, नोसर्ववंध, उत्कृष्टबंध, अनुत्कृष्टबंध, जघन्यबंध, अजघन्यबंध, सादिबंध, अनादिबंध, ध्रुवबंध, अध्रुवबंध, बन्धस्वामित्वविचय, बंधकाल, बन्धान्तर, बन्धसन्निकर्ष, नानाजीव की अपेक्षा भंगविचय, भागाभागानुगम, परिमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम। इन चौबीस अधिकारों में जो समुत्कीर्तना नाम का अधिकार है उससे प्रकृतिसमुत्कीर्तना, स्थान समुत्कीर्तना और तीन महादण्डक निकले हैं और तेईसवें भावानुगम से भावानुगम निकला है। अव्वोगाढ़उत्तरप्रकृतिबंध के दो भेद हैं-भुजगारबंध और प्रकृतिस्थानबंध। उसमें भी प्रकृतिस्थानबंध के आठ अनुयोगद्वार हैं, जो इस प्रकार है-सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम। इन आठ अनुयोगद्वारों से छह अनुयोग द्वार निकले हैं। वे इस प्रकार हैं- सत्प्ररूपणा, क्षेत्रप्ररूपणा, स्पर्शनप्ररूपणा, कालप्ररूपणा, अन्तरप्ररूपणा और अल्पबहुत्वप्ररूपणा ये छह अनुयोगद्वार हैं। पुन: बंधक नामक अधिकार के ग्यारह अधिकारों में द्रव्यप्रमाणानुगम से द्रव्यप्रमाणानुगम निकलता है। पुनश्च, एकैकोत्तरप्रकृतिबंध के चौबीस अधिकारों में तेईसवें भावानुगम से भावप्रमाणानुगम निकला है। छह और दो (६±२·८) मिलकर इस जीवस्थान के आठ अनियोगद्वार होते हैं। वे कौन हैं ? उन्हें कहते हैं-सत्प्ररूपणा, क्षेत्रप्ररूपणा, स्पर्शनप्ररूपणा, कालप्ररूपणा, अन्तरप्ररूपणा, अल्पबहुत्वप्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम और भावप्रमाणानुगम ये आठ अनुयोगद्वार इस जीवस्थान नामक महाग्रंथ में हैं। स्थितिबंध के दो भेद हैंं-मूलप्रकृतिस्थितिबंध और उत्तरप्रकृतिस्थितिबंध। उनमें से उत्तरप्रकृतिबंध के चौबीस अनुयोगद्वार हैं-अर्धच्छेद, सर्वबंध, नोसर्वबंध, उत्कृष्टबंध, अनुत्कृष्टबंध, जघन्यबंध, अजघन्यबंध, सादिबंध, अनादिबंध, ध्रुवबंध, अधु्रवबंध, बंधस्वामित्वविचय, बंधकाल, बन्धान्तर, बन्धसन्निकर्ष, नानाजीव की अपेक्षा भंगविचय, भागाभागानुगम, परिमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम। इनमें से अर्धच्छेद के दो भेद हैं-जघन्यस्थितिअर्धच्छेद और उत्कृष्टस्थिति अर्धच्छेद। जघन्यस्थितिअर्धच्छेद से जघन्यस्थिति निकली है और उत्कृष्टस्थितिअर्धच्छेद से उत्कृष्टस्थिति निकली है। दृष्टिवाद अंग के अन्तर्गत सूत्र भेद से सम्यक्त्वउत्पत्ति नामका अधिकार निकला है। व्याख्याप्रज्ञप्ति नामक पंचम अंग से गत्यागती नामका अधिकार निकला है। अब नवचूलिकाओं का उत्पत्तिक्रम दर्शाते हैं- पूर्वोक्त एकैकोत्तर प्रकृति नामक अधिकार के प्रथम समुत्कीर्तना अधिकार से प्रकृति समुत्कीर्तना, स्थान समुत्कीर्तना और तीन महादण्डक ये पाँच चूलिकाएँ निकली हैं। उनमें जघन्यस्थिति अर्धच्छेद, उत्कृष्टस्थिति अर्धच्छेद, सम्यक्त्वोत्पत्ति और गत्यागती इन चार अधिकारों को मिला देने पर नवचूलिका हो जाती हैं ऐसा जानना चाहिए।

अस्य जीवस्थानस्योपसंहार:-

द्वादशाङ्गेषु दृष्टिवादाङ्गश्चरम:। अस्य दृष्टिवादाङ्गस्य पूर्वगतनाम चतुर्थो भेद:। तेषु पूर्वेषु अग्रायणीयनाम द्वितीयपूर्वं। अस्याग्रायणीयपूर्वस्य चतुर्दशार्थाधिकारेभ्य: चयनलब्धिर्नाम पंचमं वस्तु ग्राह्यं। अस्या: चयनलब्धे: विंशति अधिकारा: प्राभृतनाम्ना सन्ति। तेभ्य: विंशतिप्राभृतेभ्य: चतुर्थं कर्मप्रकृतिप्राभृतं। अस्यापि कर्मप्रकृतिप्राभृतस्य चतुर्विंशति-अर्थाधिकारेषु ‘बन्धन’-नाम षष्ठाधिकारो गृह्यते।

अस्य बन्धनाधिकारस्य चतुर्षु भेदेषु बन्धको बन्धविधानं चेति द्वौ अधिकारौ गृहीतव्यौ। बन्धकस्य एकादशानुयोगद्वारेभ्यो द्रव्यप्रमाणानुगमो नामपंचमानियोगद्वारं ग्राह्यं।
द्वितीयबंधविधानस्य प्रकृतिबंधादिचतुर्भेदेषु प्रकृतिबन्धस्य द्वयोर्भेदयो: उत्तरप्रकृतिबंधो गृहीतव्य:। अस्योत्तरप्रकृतिबन्धस्य एकैकोत्तरप्रकृतिबन्धनाम प्रथमभेदे समुत्कीर्तनादय: चतुर्विंशति-अनुयोगद्वाराणि सन्ति। तेभ्य: प्रथमं समुत्कीर्तनानाम अनुयोगद्वारं गृहीतव्यं। एकैकोत्तरप्रकृतिबंधात् एभ्य एव चतुर्विंशति-अनुयोगद्वारेभ्य: त्रयोविंशतितमात् भावानुगमाद् भावप्रमाणानुगमो ग्राह्य:।
उत्तरप्रकृतिबंधात् निर्गत-अव्वोगाढउत्तरप्रकृतिबंधस्य प्रकृतिस्थानबन्धनाम्नो द्वितीयभेदात् अष्टसु अनुयोगद्वारेषु सत्प्ररूपणादिषडधिकारा गृहीतव्या:, एषु द्रव्यप्रमाणानुगमं भावानुगमं च प्रक्षिप्य अष्टौ अनियोगद्वाराणि ज्ञातव्यानि।
ते इमे ज्ञातव्या:-सत्प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा स्पर्शनप्ररूपणा कालप्ररूपणा अन्तरप्ररूपणा अल्पबहुत्व-प्ररूपणा द्रव्यप्रमाणानुगमो भावप्रमाणानुगमश्चेति अष्टौ अनुयोगद्वाराणि।
नव चूलिकानां कथनं-
एकैकोत्तरप्रकृतिबंधस्य चतुर्विंशति-अनुयोगद्वारेभ्य: प्रथम: समुत्कीर्तनाधिकारो गृहीतव्य:। अस्या: प्रकृतिसमुत्कीर्तना स्थानसमुत्कीर्तना त्रयो महादण्डका: निर्गता:।
स्थितिबंधस्य द्वितीयेषु उत्तरप्रकृतिस्थितिबंधेषु चतुर्विंशति-अनुयोगद्वारेभ्य: अर्धच्छेदो नाम्ना प्रथमो भेद:। अस्य जघन्यस्थितिअर्धच्छेद: उत्कृष्टस्थितिअर्धच्छेदश्चेति द्वाभ्यां भेदाभ्यां जघन्यस्थिति: उत्कृष्टस्थिति: इमे द्वे चूलिके निर्गते।
दृष्टिवादांगस्य सूत्रात् सम्यक्त्वोत्पत्ति: व्याख्याप्रज्ञप्तिनामपंचमाङ्गात् गत्यागती इति। अत:-प्रकृतिसमुत्कीर्तना स्थानसमुत्कीर्तना त्रयो महादण्डका: जघन्यस्थिति-अर्धच्छेद: उत्कृष्टस्थिति-अर्धच्छेद: सम्यक्त्वोत्पत्ति: गत्यागती चेमा: नव चूलिका: भवन्तीति।
षट्खण्डागममहाग्रन्थस्य जीवस्थाननाम्नि प्रथमखण्डे पूर्वकथिताष्टौ अनुयोगद्वाराणि, इमा: नव चूलिकाश्च वर्णिता: सन्तीति अवबोद्धव्या भव्यजनै:।


इस जीवस्थान का उपसंहार करते है-

बारह अंगों में दृष्टिवाद नाम का अंतिम अंग है। इस दृष्टिवाद अंग का पूर्वगत नामक चौथा भेद है। उन पूर्वों में द्वितीय अग्रायणीय नाम का पूर्व है। उस अग्रायणीयपूर्व के चौदह अधिकारों में से चयनलब्धि नामक पंचम वस्तु ग्रहण करने योग्य है। इस चयनलब्धि के प्राभृत आदि नाम से बीस अधिकार हैं। उन बीस प्राभृतों में से कर्मप्रकृतिप्राभृत नाम का चतुर्थ अधिकार है। इस कर्मप्रकृतिप्राभृत के भी चौबीस अर्थाधिकारों में से बंधन नाम का छठा अधिकार यहाँ ग्रहण किया गया है।

इस बंधन अधिकार के चार भेदों में बंधक और बंधविधान ये दो अधिकार यहाँ ग्रहण करना चाहिए। बंधक के ग्यारह अनुयोग द्वारों में से ‘‘द्रव्यप्रमाणानुगम’’ नाम का पंचम अनियोगद्वार ग्राह्य है।

द्वितीय बंध विधान के प्रकृतिबंधादि चार भेदों में से प्रकृतिबंध के दो भेदो में उत्तरप्रकृतिबंध ग्रहण करना चाहिए। इस उत्तरप्रकृतिबंध के एकैकोत्तरप्रकृतिबंध नामक प्रथम भेद में समुत्कीर्तना आदि चौबीस अनुयोग द्वार हैं, उनमें से प्रथम समुत्कीर्तना नाम का अनुयोग द्वार ग्रहण करना चाहिए। एकैकोत्तरप्रकृतिबंध से ही निकले हुए चौबीस अनुयोग द्वारों में से तेईसवाँ भावानुगम है उस भावानुगम से भावप्रमाणानुगम ग्राह्य है। उत्तरप्रकृतिबंध से निर्गत अव्वोगाढउत्तरप्रकृतिबंध के प्रकृतिस्थानबंधनामक द्वितीय भेद से आठ अनुयोग द्वारों में सत्प्ररूपणा आदि छह अधिकार ग्रहण करना चाहिए। उन छह अधिकारों में द्रव्यप्रमाणानुगम और भावानुगम को मिलाकर आठ अनुयोगद्वार जानना चाहिए। वे इस प्रकार हैं-सत्प्ररूपणा, क्षेत्रप्ररूपणा, स्पर्शनप्ररूपणा, कालप्ररूपणा, अन्तरप्ररूपणा, अल्पबहुत्वप्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम और भावप्रमाणानुगम ये आठ अनुयोगद्वार हैं।

नवचूलिकाओं का कथन- एकैकोत्तरप्रकृतिबंध के चौबीस अनुयोगद्वारों में से प्रथम समुत्कीर्तना अधिकार ग्रहण करना चाहिए। इससे प्रकृतिसमुत्कीर्तना, स्थानसमुत्कीर्तना और तीन महादण्डक निकले हैं। स्थितिबंध के द्वितीय भेद उत्तरप्रकृति स्थितिबंध में चौबीस अनुयोगद्वारों से ‘‘अर्धच्छेद’’ नाम का प्रथम भेद निकला है। इसकी जघन्यस्थिति अर्धच्छेद और उत्कृष्टस्थिति अर्धच्छेद इन दो भेदों में से जघन्यस्थिति, उत्कृष्टस्थिति ये दो चूलिका निकली हैं। दृष्टिवाद अंग के सूत्र से सम्यक्त्वोत्पत्ति, व्याख्याप्रज्ञप्ति नाम के पंचम अंग से गत्यागती अधिकार निकला है। अत: प्रकृतिसमुत्कीर्तना, स्थानसमुत्कीर्तना, तीनों महादंडक, जघन्यस्थिति अर्धच्छेद, उत्कृष्टस्थिति अर्धच्छेद, सम्यक्त्वोत्पत्ति और गत्यागती ये नव चूलिका होती हैं। षट्खण्डागम महाग्रंथ के जीवस्थान नामक प्रथमखण्ड में पूर्वकथित आठ अनुयोगद्वार हैं और ये नव चूलिकाएँ वर्णित हैं ऐसा भव्यजनों को जानना चाहिए।


ग्रन्थस्य प्रामाण्यं-

अस्य षट्खण्डागमग्रन्थस्य भगवन्महावीरस्वामिनो दिव्यध्वने: संबंधोऽस्ति। किंच तदेव श्री वीरसेनस्वामिना कतिपये स्थले स्वयमेव कथितं। तद्यथा-

‘‘सांप्रतमन्त्यस्य गुणस्य स्वरूपनिरूपणार्थमर्हन्मुखोद्गतार्थं गणधरदेवग्रथितशब्दसंदर्भं प्रवाहरूपतया-निधनतामापन्नमशेषदोषव्यतिरिक्तत्वादकलंकमुत्तरसूत्रं पुष्पदन्तभट्टारक: प्राह’’-[१]
अस्मिन्नेव ग्रन्थे अन्यत्रापि-
‘‘नाप्यार्षसन्ततेर्विच्छेद:, विगतदोषावरणार्हद्व्याख्यातार्थस्यार्षस्य चतुरमलबुद्ध्यतिशयोपेतनिर्दोष-गणभृदवधारितस्य ज्ञानविज्ञानसंपन्नगुरुपर्वक्रमेणायातस्याविनष्टप्राक्तनवाच्यवाचकभावस्य विगतदोषावरण-निष्प्रतिपक्षसत्यस्वभावपुरुषव्याख्यातत्वेन श्रद्धाप्यमानस्योपलम्भात्।’’[२]
पुनरपि दृश्यतां-तित्थयरकहियत्थाणं गणहरदेव-कय-गंथरयणाणं बारहंगाणं आइरियपरंपराए णिरंतरमागयाणं जुगसहावेण बुद्धीसु ओहट्टंतीसु भायणाभावेण पुणो ओहट्टिय आगयाणं पुणो सुट्ठु-बुद्धीणं खयं दट्ठूण तित्थ-वोच्छेदभएण वज्ज-भीरुहि गिहिदत्थेहि आइरिएहि पोत्थएसु चडावियाणं असुत्तत्तण-विरोहादो।[३]
एवमेव कसायपाहुडस्य जयधवलाटीकायामपि श्रीवीरसेनाचार्येण उक्त-
‘‘एदम्हादो विउलगिरिमत्थयत्थवड्ढमाणदिवायरादो विणिग्गमिय गोदमलोहज्ज-जंबुसामियादि-आइरियपरंपराए आगंतूण गुणहराइरियं पाविय गाहासरूवेण परिणमिय अज्जमंखुणागहत्थीहितो जयिवसहमुहणयिय चुण्णिसुत्तायारेण परिणददिव्वज्झुणिकिरणादो णव्वदे।’’[४]
एते ग्रन्था: अकाले न पठितव्या:-
एतदुद्धरणेभ्यो ज्ञायते-इमे षट्खण्डागमादय: सूत्रग्रन्था: अकाले पठितुं न युज्यंते। स्वाध्यायस्य पंचभेदा:-
‘‘वाचनापृच्छनानुपे्रक्षाम्नायधर्मोपदेशा:।।’’[५]
अत्रापि वाचनास्वाध्यायो मुख्योऽस्ति। ‘‘शिष्याध्यापनं वाचना, सा चतुर्विधा-नंदा, भद्रा, जया, सौम्या चेति। पूर्वपक्षीकृतपरदर्शनानि निराकृत्य स्वपक्षस्थापिका व्याख्या नन्दा। युक्तिभि: प्रत्यवस्थाय पूर्वापरविरोधपरिहारेण तंत्रस्थाशेषार्थव्याख्या भद्रा। पूर्वापरविरोधपरिहारेण विना तंत्रार्थकथनं जया। क्वचित्क्वचित्स्खलितवृत्तेव्र्याख्या सौम्या। एतासां वाचनानामुपगतं वाचनोपगतं परप्रत्यायनसमर्थं इति यावत्। एत्थ वक्खाणंतेहि सुणंतेहि वि दव्व-खेत्त-काल-भावसुद्धीहि वक्खाण-पढणवावारो कायव्वो।’’ तत्र ज्वर-कुक्षि-शिरोरोग-दु:स्वप्न-रुधिर-विट्-मूत्र-लेपातीसार-पूयस्रावादीनां शरीरे अभावो द्रव्यशुद्धि:। व्याख्यातृव्यावस्थितप्रदेशात् चतसृष्वपि दिक्ष्वष्टाविंशतिसहस्रायतासु[६] विण्मूत्रास्थि-केश-नख-त्वगाद्यभाव: षष्ठातीतवाचनात:[७] आरात्पंचेन्द्रियशरीराद्र्रास्थि-त्वग्मांसासृक्संबंधाभावश्च क्षेत्रशुद्धि:। विद्युदिन्द्रधनुर्ग्रहोपरागा-कालवृष्ट्यभ्रगर्जन-जीमूतव्रातप्रच्छाददिग्दाह-धूमिकापात-संन्यास-महोपवास-नन्दीश्वर-जिनमहिमाद्यभाव: कालशुद्धि:। अत्र कालशुद्धिकरणविधानमभिधास्ये। तं जहा-पच्छिमरत्तिसज्झायं खमाविय बहि णिक्कलिय पासुगे भूमिपदेसे काओसग्गेण पुव्वाहिमुहो ट्ठाइदूण णवगाहापरियट्ठणकालेण पुव्वदिसं सोहिय पुणो पदाहिणेण पल्लट्टिय एदेणेव कालेण जम-वरुण-सोमदिसासु सोहिदासु छत्तीसगाहुच्चारणकालेण (३६) अट्ठसदुस्सासकालेण वा कालसुद्धी समप्पदि (१०८) अवरण्हे वि एवं चेव कालसुद्धी कायव्या। णवरि एक्केक्काए दिसाए सत्त-सत्तगाहापरियट्टणेण परिच्छिण्णकाला त्ति णायव्वा। एत्थ सव्वगाहापमाणमट्ठावीस (२८) चउरासीदिउस्सासा (८४) पुणो अणत्थमिदे दिवायरे खेत्तसुद्धिं कादूण अत्थमिदे कालसुद्धिं पुव्वं व कुज्जा। णवरि एत्थ कालो वीसगाहुच्चारणमेत्तो (२०) सट्ठिउस्सासमेत्तो वा (६०) अवररत्ते णत्थि वायणा, खेत्तसुद्धिकरणोवायाभावादो। ओहि-मणपज्जवणाणीणं सयलंगसुदधराणमागासट्ठियचारणाणं मेरु-कुलसेलगब्भट्ठियचारणाणं च अवररत्तियवाचणा वि अत्थि अवगयखेत्तसुद्धीदो। अवगयराग-दोसाहंकारट्ट-रुद्दज्झाणस्स पंचमहव्वयकलिदस्स तिगुत्तिगुत्तस्स णाण-दंसण-चरणादिचारणवड्ढिदस्स भिक्खुस्स भावसुद्धी होदि।


ग्रंथ की प्रमाणता

इस षट्खण्डागम ग्रंथ का भगवान महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि से संबंध है। इसी बात को श्री वीरसेनस्वामी ने भी कतिपय स्थलों पर स्वयमेव कहा है। वह इस प्रकार है-

अब पुष्पदंतभट्टारक अंतिम गुणस्थान के स्वरूप के निरूपण करने के लिए, अर्थरूप से अरहंत परमेष्ठी के मुख से निकले हुए गणधर देव के द्वारा गूँथे गये शब्द रचना वाले, प्रवाहरूप से कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होने वाले और सम्पूर्ण दोषों से रहित होने के कारण निर्दोष ऐसे आगे के सूत्र को कहते हैं-

इसी ग्रंथ में अन्यत्र भी कहा है- हमारे यहाँ आर्षपरम्परा का विच्छेद भी नहीं है, क्योंकि जिसका दोष और आवरण से रहित अरहंत परमेष्ठी ने अर्थरूप से व्याख्यान किया है, जिसको चार निर्मल बुद्धिरूप अतिशय से युक्त और निर्दोष गणधरदेव ने धारण किया है, जो ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न गुरुपरम्परा से चला आ रहा है, जिसका पहले का वाच्य-वाचक भाव अभी तक नष्ट नहीं हुआ है और जो दोषावरण से रहित तथा निष्प्रतिपक्ष सत्य स्वभाव वाले पुरुष के द्वारा व्याख्यान होने से श्रद्धा के योग्य है ऐसे आगम की आज भी उपलब्धि होती है।

पुन: अन्यत्र और भी देखें- तीर्थंकरों ने अर्थरूप से जिनका प्रतिपादन किया है और गणधर देव ने जिनकी ग्रंथरचना की ऐसे बारह अंग आचार्य परम्परा से निरन्तर चले आ रहे हैं। परन्तु काल के प्रभाव से उत्तरोत्तर बुद्धि के क्षीण होने पर और उन अंगों को धारण करने वाले योग्य पात्र के अभाव में वे उत्तरोत्तर क्षीण होते हुए आ रहे हैं। इसलिए जिन आचार्यो ने आगे श्रेष्ठ बुद्धिवाले पुरुषों का अभाव देखा और जो अत्यन्त पापभीरू थे, जिन्होंने गुरुपरम्परा से श्रुतार्थ ग्रहण किया था उन आचार्यों ने तीर्थ विच्छेद के भय से उस समय अवशिष्ट रहे हुए अंग संबंधी अर्थ को पोथियों में लिपिबद्ध किया, अतएव उनमें असूत्रपना नहीं आ सकता है।

इसी प्रकार कषायपाहुड़ की जयधवला टीका में श्री वीरसेनाचार्य ने कहा है- ‘‘विपुलाचल के शिखर पर स्थित महावीर रूपी दिवाकर से निकल कर गौतम, लोहार्य, जम्बूस्वामी आदि आचार्यपरम्परा से आकर गुणधराचार्य को प्राप्त होकर गाथारूप से परिणत हो पुन: आर्यमंक्षु-नागहस्ति के द्वारा यतिवृषभ के मुख से चूर्णिसूत्ररूप से परिणत हुई दिव्यध्वनिरूपी किरणों से हमने जाना है।’’

इन ग्रंथों को अकाल में नहीं पढ़ना चाहिए- इन उद्धरणों से यह ज्ञात होता है कि ये षट्खण्डागम आदि सूत्रग्रंथ अकाल में पढ़ना योग नहीं है। स्वाध्याय के पाँच भेद हैं-वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश।

यहाँ भी वाचना स्वाध्याय मुख्य है। शिष्यों को पढ़ाना वाचना है, वह वाचना चार प्रकार की है-नंदा, भद्रा, जया और सौम्या। अन्य दर्शनों को पूर्वपक्ष करके उनका निराकरण करते हुए अपने पक्ष को स्थापित करने वाली व्याख्या नन्दा कहलाती है। आगम और युक्तियों द्वारा समाधान करके पूर्वापर विरोध का परिहार करते हुए सिद्धान्त में स्थित समस्त पदार्थों की व्याख्या का नाम भद्रा है। पूर्वापर विरोध के परिहार के बिना सिद्धान्त के अर्थों का कथन करना जया वाचना कहलाती है। कहीं-कहीं स्खलनपूर्ण वृत्ति से जो व्याख्या की जाती है वह सौम्या वाचना कही जाती है। इन चार प्रकार की वाचनाओं को प्राप्त वाचनोपगत कहलाता है। अभिप्राय यह है कि जो दूसरों को ज्ञान कराने के लिए समर्थ है वह वाचनोपगत है।

यहाँ व्याख्यान करने वालों और सुनने वालों को भी द्रव्यशुद्धि, क्षेत्रशुद्धि, कालशुद्धि और भावशुद्धि से व्याख्यान करने या पढ़ने में प्रवृत्ति करना चाहिए। उनमें ज्वर, कुक्षिरोग, शिरोरोग, कुत्सित स्वप्न, रुधिर, विष्ठा, मूत्र, लेप, अतीसार और पीव का बहना इत्यादिकों का शरीर में न रहना द्रव्यशुद्धि कही जाती है। व्याख्याता से अधिष्ठित प्रदेश से चारों ही दिशाओं में अट्ठाईस हजार आयत क्षेत्र में विष्ठा, मूत्र, हड्डी, केश, नख और चमड़े आदि के अभाव को; तथा छठी अतीत वाचना से समीप में (या दूरी तक) पंचेन्द्रिय जीव के शरीर संबंधी गीली हड्डी, चमड़ा, मांस और रुधिर के संंबंध के अभाव को क्षेत्रशुद्धि कहते हैं। बिजली, इन्द्र-धनुष, सूर्य-चन्द्र का ग्रहण, अकालवृष्टि, मेघगर्जन, मेघों के समूह से आच्छादित दिशायें, दिशादाह, धूमिकापात (कुहरा), संन्यास, महोपवास, नन्दीश्वरमहिमा और जिनमहिमा इत्यादि के अभाव को कालशुद्धि कहते हैं।

यहाँ कालशुद्धि करने के विधान को कहते हैं। वह इस प्रकार है-पश्चिम रात्रि के स्वाध्याय को समापन करके बाहर निकल कर प्रासुक भूमिप्रदेश में कायोत्सर्ग से पूर्वाभिमुख स्थित होकर नौ गाथाओं के उच्चारण काल से पूर्व दिशा को शुद्ध करके फिर प्रदक्षिणरूप से पलटकर इतने ही काल से दक्षिण, पश्चिम व उत्तर दिशाओं को शुद्ध कर लेने पर छत्तीस (३६) गाथाओं के उच्चारणकाल से अथवा एक सौ आठ (१०८) उच्छ्वासकाल से कालशुद्धि समाप्त होती है। अपराण्हकाल में भी इसी प्रकार ही कालशुद्धि करना चाहिए। विशेष इतना है कि इस समय की कालशुद्धि एक-एक दिशा में सात-सात गाथाओं के उच्चारणकाल से सीमित है, ऐसा जानना चाहिए। यहाँ सब गाथाओं का प्रमाण अट्ठाईस एवं उच्छ्वासों का प्रमाण चौरासी (८४) है। पश्चात् सूर्य के अस्त होने से पहले क्षेत्रशुद्धि करके सूर्य के अस्त हो जाने पर पूर्व के समान कालशुद्धि करना चाहिए। विशेष इतना है यह काल बीस (२०) गाथाओं के उच्चारण प्रमाण और साठ (६०) उच्छ्वास प्रमाण है। अपररात्र अर्थात् रात्रि के पिछले भाग में वाचना नहीं है क्योंकि उस समय क्षेत्रशुद्धि करने का कोई उपाय नहीं है। अवधिज्ञानी, मन:पर्ययज्ञानी, समस्त अंगश्रुत के धारक, आकाशस्थित चारण तथा मेरु व कुलाचलों के मध्य में स्थित चारण ऋषियों के अपररात्रिक वाचना भी है, क्योंकि वे क्षेत्रशुद्धि से रहित हैं, अर्थात् भूमि पर न रहने से उन्हें क्षेत्रशुद्धि करने की आवश्यकता नहीं होती। राग, द्वेष, अहंकार, आर्त व रौद्र ध्यान से रहित, पाँच महाव्रतो से युक्त, तीन गुप्तियों से रक्षित, तथा ज्ञान, दर्शन व चारित्र आदि आचार से वृद्धि को प्राप्त भिक्षु के भावशुद्धि होती है।

अत्रोपयोगिश्लोका:। तद्यथा-

यमपटवहरश्रवणे रुधिरस्रावेंऽगतोऽतिचारे[८] च।

दातृष्वशुद्धकायेषु भुक्तवति चापि नाध्येयम्।।९२।।
तिलपलल-पृथुक-लाजा-पूपादिस्निग्धसुरभिगंधेषु।
भुत्तेâषु भोजनेषु च दावाग्निधूमे च नाध्येयम्।।९३।।
योजनमण्डलमात्रे संन्यासविधौ महोपवासे च।
आवश्यकक्रियायां केशेषु च लुच्यमानेषु।।९४।।
सप्तदिनान्यध्ययनं प्रतिषिद्धं स्वर्गगते श्रमणसूरौ।
योजनमात्रे दिवसत्रितयं त्वतिदूरतो दिवसम्।।९५।।
प्राणिनि च तीव्रदु:खान्म्रियमाणे स्फुरति चातिवेदनया।
एकनिवर्तनमात्रे तिर्यक्षु चरत्सु च न पाठ्यम्।।९६।।
तावन्मात्रे स्थावरकायक्षयकर्मणि प्रवृत्ते च।
क्षेत्राशुद्धौ दूराद् दुग्र्गंधे वातिकुणपे वा।।९७।।
विगतार्थागमने वा स्वशरीरे शुद्धिवृत्तिविरहे वा।
नाध्येय: सिद्धान्त: शिवसुखफलमिच्छता व्रतिना।।९८।।
प्रमितिररत्निशतं स्यादुच्चारविमोक्षणक्षितेरारात्।
तनुसलिलमोक्षणेऽपि च पंचाशदरत्निरेवात:।।९९।।
मानुषशरीरलेशावयवस्याप्यत्र दण्डपंचाशत्।
संशोध्या तिरश्चां तदद्र्धमात्रैव भूमि: स्यात्।।१००।।
व्यन्तरभेरीताडन-तत्पूजासंकटे कर्षणे वा।
संमृक्षण-संमाज्र्जनसमीपचाण्डालबालेषु।।१०१।।
अग्निजलरुधिरदीपे मांसास्थिप्रजनने तु जीवानां।
क्षेत्रविशुद्धिर्न स्याद्यथोदितं सर्वभावज्ञै:।।१०२।।
क्षेत्रं संशोध्य पुन: स्वहस्तपादौ विशोध्य शुद्धमना:।
प्रासुकदेशावस्थो गृह्णीयाद् वाचनां पश्चात्।।१०३।।
युक्त्या समधीयानो वक्षणकक्षाद्यमस्पृशन् स्वाङ्गम्।
यत्नेनाधीत्य पुनर्यथाश्रुतं वाचनां मुंचेत्।।१०४।।
तपसि द्वादससंख्ये स्वाध्याय: श्रेष्ठ उच्यते सद्भि:।
अस्वाध्यायदिनानि ज्ञेयानि ततोऽत्र विद्वद्भि:।।१०५।।
पर्वसु नन्दीश्वरवर महिमा दिवसेषु चोपरागेषु।
सूर्याचन्द्रमसोरपि नाध्येयं जानता व्रतिना।।१०६।।
अष्टम्यामध्ययनं गुरु-शिष्यद्वयवियोगमावहति।
कलहं तु पौर्णमास्यां करोति विघ्नं चतुर्दश्याम्।।१०७।।
कृष्णचतुर्दश्यां यद्यधीयते साधवो ह्यमावस्याम्।
विद्योपवासविधयो विनाशवृत्तिं प्रयान्त्यशेषं सर्वे।।१०८।।
मध्यान्हे जिनरूपं नाशयति करोति संध्ययोव्र्याधिम्।
तुष्यन्तोऽप्यप्रियतां मध्यमरात्रौ समुपयान्ति।।१०९।।
अतितीव्रदु:खितानां रुदतां संदर्शने समीपे च।
स्तनयित्नुविद्युदभ्रेष्वतिवृष्ट्या उल्कनिर्घाते।।११०।।
प्रतिपद्येक: पादो ज्येष्ठामूलस्य पौर्णमास्यां तु।
सा वाचनाविमोक्षे छाया पूर्वाण्हबेलायां।।१११।।
सैवापराण्हकाले वेला स्याद्वाचनाविधौ विहिता।
सप्तपदी पूर्वाण्हापराण्हयोग्र्रहण-मोक्षेषु।।११२।।
ज्येष्ठामूलात्परतोऽप्यापौषाद्द्वयंगुला हि वृद्धि: स्यात्।
मासे मासे विहिता क्रमेण सा वाचना छाया।।११३।।
एवं क्रमप्रवृद्ध्या पादद्वयमत्र हीयते पश्चात्।
पौषादाज्येष्ठान्ताद् द्व्यंगुलमेवेति विज्ञेयम्।।११४।।
दव्वादिवदिक्कमणं करेदि सुत्तत्थसिक्खलोहेण।
असमाहिमसज्झायं कलहं वाहिं वियोगं च।।११५।।
विणएण सुदमधीदं किह वि पमादेण होइ विस्सरिदं।
तमुवट्ठादि परभवे केवलणाणं च आवहदि।।११६।।
अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद् गूढनिर्णयम्।
निर्दोषं हेतुमत्तथ्यं सूत्रमित्युच्यते बुधै:।।११७।।[९]


यहाँ उपयोगी श्लोक इस प्रकार हैं-

गाथार्थ- यमपटह का शब्द सुनने पर, अंग से रक्तस्राव के होने पर, अतिचार के होने पर तथा दाताओं के अशुद्धकाय होते हुए भोजन कर लेने पर स्वाध्याय नहीं करना चाहिए।।९२।।

तिलमोदक, चिउड़ा, लाई और पुआ आदि चिक्कण एवं सुगंधित भोजनों के खाने पर तथा दावानल का धुआँ होने पर अध्ययन नहीं करना चाहिए।।९३।

एक योजन के घेरे में संन्यासविधि, महोपवासविधि, आवश्यकक्रिया एवं केशों का लोंच होने पर तथा आचार्य का स्वर्गवास होने पर सात दिन तक अध्ययन का प्रतिषेध है। उक्त घटनाओं के योजनमात्र में होने पर तीन दिन तक तथा अत्यन्त दूर होने पर एक दिन तक अध्ययन निषिद्ध है।।९४-९५।।

प्राणी के तीव्र दु:ख से मरणासन्न होने पर या अत्यन्त वेदना से छटपटाने पर तथा एक निवर्तन (एक बीघा या गुंठा) मात्र में तिर्यंचों का संचार होने पर अध्ययन नहीं करना चाहिए।।९६।।

उतने मात्र में स्थावरकाय जीवों के घातरूप कार्य में प्रवृत्त होने पर, क्षेत्र की अशुद्धि होने पर, दूर से दुर्गन्ध आने पर अथवा अत्यन्त सड़ी गंध के आने पर, ठीक अर्थ समझ में न आने पर अथवा अपने शरीर के शुद्धि से रहित होने पर मोक्षसुख के चाहने वाले व्रती पुरुष को सिद्धान्त का अध्ययन नहीं करना चाहिए।।९७-९८।।

मल छोड़ने की भूमि से नौ अरत्नि प्रमाण दूर, तनुसलिल अर्थात् मूत्र के छोड़ने में भी इस भूमि से पचास अरत्नि दूर, मनुष्य शरीर के लेशमात्र अवयव के स्थान से पचास धनुष तथा तिर्यंचों के शरीरसंबंधी अवयव के स्थान से उससे आधी मात्र अर्थात् पच्चीस धनुष प्रमाण भूमि को शुद्ध करना चाहिए।।९९-१००।

व्यन्तरों के द्वारा भेरीताड़न करने पर, उनकी पूजा का संकट होने पर, कर्षण के होने पर, चाण्डाल बालकों के समीप में झाड़ा-बुहारी करने पर, अग्नि, जल व रुधिर की तीव्रता होने पर तथा जीवों के मांस व हड्डियों के निकाले जाने पर क्षेत्र की विशुद्धि नहीं होती जैसा कि सर्वज्ञों ने कहा है।।१०१-१०२।।

क्षेत्र की शुद्धि करने के पश्चात् अपने हाथ और पैरों को शुद्ध करके तदनन्तर विशुद्ध मन युक्त होता हुआ प्रासुक देश में स्थित होकर वाचना को ग्रहण करे।।१०३।।

बाजू और काँख आदि अपने अंग का स्पर्श न करता हुआ उचित रीति से अध्ययन करे और यत्नपूर्वक अध्ययन करके पश्चात् शास्त्रविधि से वाचना को छोड़ दे।।१०४।।

साधु पुरुषों ने बारह प्रकार के तप में स्वाध्याय को श्रेष्ठ कहा है। इसलिए विद्वानों को स्वाध्याय न करने के दिनों को जानना चाहिए।।१०५।।

पर्वदिनों (अष्टमी व चतुर्दशी आदि) नन्दीश्वर के श्रेष्ठ महिमदिवसों अर्थात् अष्टाह्निक दिनों में और सूर्य-चन्द्र का ग्रहण होने पर विद्वान् व्रती को अध्ययन नहीं करना चाहिए।।१०६।

अष्टमी में अध्ययन गुरु और शिष्य दोनों के वियोग को करता है। पूर्णमासी के दिन किया गया अध्ययन कलह और चतुर्दशी के दिन किया गया अध्ययन विघ्न को करता है।।१०७।।

यदि साधुजन कृष्ण चतुर्दशी और अमावस्या के दिन अध्ययन करते हैं तो विद्या और उपवासविधि सब विनाशवृत्ति को प्राप्त होते हैं।।१०८।।

मध्यान्हकाल में किया गया अध्ययन जिनरूप को नष्ट करता है, दोनों संध्याकालों में किया गया अध्ययन व्याधि को करता है तथा मध्यम रात्रि में किये गये अध्ययन से अनुरक्तजन भी द्वेष को प्राप्त होते हैं।।१०९।।

अतिशय तीव्र दु:ख से युक्त और रोते हुए प्राणियों को देखने या समीप में होने पर मेघों की गर्जना व बिजली के चमकने पर और अतिवृष्टि के साथ उल्कापात होने पर अध्ययन नहीं करना चाहिए।।११०।।

जेठ मास की प्रतिपदा एवं पूर्णमासी को पूर्वान्ह काल में वाचना की समाप्ति में एक पाद अर्थात् एक वितस्ति प्रमाण (जांघों की) वह छाया कही गई है। अर्थात् इस समय पूर्वान्हकाल में बारह अंगुल प्रमाण छाया के रह जाने पर अध्ययन समाप्त कर देना चाहिए।।१११।।

वही समय (एक पाद) अपरान्हकाल में वाचना की विधि में अर्थात् प्रारंभ करने में कहा गया है। पूर्वान्हकाल में वाचना का प्रारंभ करने और अपरान्हकाल में उसके छोड़ने में सात पाद (वितस्ति) प्रमाण छाया कही गई है (अर्थात् प्रात:काल जब सात पाद छाया हो जावे तब अध्ययन प्रारंभ करे और अपरान्ह में सात पाद छाया रह जाने पर समाप्त करे।)।।११२।।

ज्येष्ठ मास के आगे पौष मास तक प्रत्येक मास में दो अंगुल प्रमाण वृद्धि होती है। यह क्रम से वाचना समाप्त करने की छाया का प्रमाण कहा गया है।।११३।।

'इस प्रकार क्रम से वृद्धि होने पर पौष मास तक दो पाद हो जाते हैं। पश्चात् पौष मास से ज्येष्ठ मास तक दो अंगुल ही क्रमश: कम होते जाते हैं, ऐसा जानना चाहिए।।११४।।

सूत्र और अर्थ की शिक्षा के लोभ से किया गया द्रव्यादिक का अतिक्रमण असमाधि अर्थात् सम्यक्त्वादि की विराधना, अस्वाध्याय अर्थात् शास्त्रादिकों का अलाभ, कलह, व्याधि और वियोग को करता है।।११५।।

विनय से पढ़ा गया श्रुत यदि किसी प्रकार भी प्रमाद से विस्मृत हो जाता है तो परभव में वह उपस्थित हो जाता है और केवलज्ञान को भी प्राप्त कराता है।।११६।।

जो थोड़े अक्षरों से संयुक्त हो, संदेह से रहित हो, परमार्थ सहित हो, गूढ पदार्थों का निर्णय करने वाला हो, निर्दोष हो, युक्तियुक्त हो और यथार्थ हो उसे पण्डित जन सूत्र कहते हैं।।११७।।

श्रीकुन्दकुन्ददेवेनापि प्रोक्त दिक्शुद्धिप्रकरणं-

णवसत्तपंचगाहापरिमाणं दिसिविभागसोधीए।

पुव्वण्हे अवरण्हे, पदोसकाले य सज्झाए।।२७३।।[१०]
पुन: द्रव्यक्षेत्रकालभावशुद्धिं प्रतिपाद्य सूत्रस्य लक्षणमपि निरूप्य अस्वाध्यायकाले कस्य के के ग्रन्था: पठितुं न शक्यन्ते।
इति प्ररूपयन्नाह-
तं पढिदुमसज्झाये णो कप्पदि विरदइत्थिवग्गस्स।
एत्तो अण्णो गंथो कप्पदि पढिदुं असज्झाए।।२७८।।[११]
तत्सूत्रं पठितुमस्वाध्याये न कल्प्यते न युज्यते विरतवर्गस्य संयत समूहस्य स्त्रीवर्गस्य चार्यिकावर्गस्य च इतोऽस्मादन्यो ग्रन्थ: कल्प्यते पठितुमस्वाध्यायेऽन्यत्पुन: सूत्रं कालशुद्ध्याद्यभावेऽपि युक्त पठितुमिति।
किं तदन्यत् सूत्रमित्यत आह-
आराहणणिज्जुत्ती मरणविभत्ती य संगहत्थुदिओ।
पच्चक्खाणावासय-धम्मकहाओ य एरिसओ।।२७९।।[१२]
संग्रह: पंचसंग्रहादय:-गोम्मटसारादयो ग्रन्था: अस्वाध्यायकालेऽपि पठितुं शक्यन्ते। अत्रैतत् ज्ञातव्यं- मुनीनामिव आर्यिकाणामपि सिद्धान्तग्रन्थपठनस्याधिकारोऽस्ति। किं च-मूलाचारे गाथायामपि ‘विरदइत्थिवग्गस्स’ पाठो वर्तते। टीकायामपि सिद्धांतचक्रवर्तिश्रीवसुनन्दिसूरिणा कथितं-‘‘स्त्रीवर्गस्य चार्यिकावर्गस्य इति’’ तथा च ‘‘वर्तमाने काले षट्खण्डागम-कषायप्राभृत-महाबंधग्रन्था: एतेषां धवलाजयधवला-महाधवला टीका: सिद्धान्तग्रन्थरूपेण मान्या: सन्ति इति ज्ञातव्यं’’ श्रीटीकाकारवीर-सेनाचार्यवाक्यैरिति नात्र संदेहो विधातव्य:।
तात्पर्यमेतत्-द्वादशम-दृष्टिवादांगस्यांतर्गत-द्वितीयाग्रायणीयपूर्वस्यांशात्मके अस्मिन् आगमग्रन्थे मंगलाचरणरूपस्य प्रथमगाथासूत्रस्यानन्तरं ग्रन्थप्रतिपाद्यविषयप्रतिज्ञारूपे द्वितीयसूत्रे एतत्कथितं, यत् चतुर्दशगुणस्थानानि चतुर्दशमार्गणास्थानानि वक्तव्यानि भवन्ति। तत्रापि प्रथमत: मार्गणानामानि वक्ष्यन्ते। तत्वकं मार्गणं नाम ? इति पृष्टे सति प्रत्युत्तरयत्याचार्यदेव:-
सत्संख्याक्षेत्राद्यनुयोगद्वारै: विशिष्टानि चतुर्दशगुणस्थानानि माग्र्यन्तेऽस्मिन्ननेन वेति मार्गणम्।
अथ मार्गणाप्रतिपादनसूचनार्थं तृतीयसूत्रमवतरति-
तं जहा।।३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अस्मिन् सूत्रे तदिति शब्देन पूर्वप्रकरणं परामृश्यते ‘‘तं’’ तत् मार्गणविधानं ‘जहा’ यथा इति। येन प्रकारेण ग्रन्थे प्रतिपादितमस्ति। ‘तथा’ तेनैव प्रकारेण वक्ष्यामीति एतदेवबोद्धव्यम्। अथवा तानि मार्गणास्थानानि कानि ? इति शिष्यस्य प्रश्ने सति-
तत् मार्गणास्थानप्रतिपादनार्थं उत्तरसूत्रस्यावतारो भवति-
गइ इंदिए काए जोगे वेदे कसाए णाणे संजमे दंसणे लेस्सा भविय सम्मत्त सण्णि आहारए चेदि।।४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतानि चतुर्दशमार्गणानामानि-गइ-गतौ, इंदिए-इन्द्रिये, काए-काये, जोगे-योगे, वेदे-वेदे, कसाए-कषाये, णाणे-ज्ञाने, संजमे-संयमे, दंसणे-दर्शने, लेस्सा भविय समत्त सण्णि आहारए-लेश्यायां, भव्ये, सम्यक्त्वे, संज्ञिनि, आहारे, चेदि-च इति। एषु जीवसमासा-गुणस्थानानि मृग्यन्ते। अत्र ‘च’ शब्द: प्रत्येकं परिसमाप्यते समुच्चयार्थ:। ‘इति’ शब्द: समाप्तौ वर्तते।
अत्र सूत्रे सप्तमीनिर्देश: किमर्थ: ?
तेषामधिकरणत्वप्रतिपादनार्थ:। तृतीयानिर्देशोऽपि अविरुद्ध:।
स तृतीया निर्देश: कथमवबुद्ध्यते ?
निर्देशस्य देशामर्शकत्वात्। यत्र च गत्यादौ विभक्तिर्न श्रूयते तत्रापि ‘आइ-मज्झंत-वण्ण-सर-लोवो’ इति लुप्ता विभक्तिरित्यभ्यूह्यम्। अहवा ‘लेस्सा-भविय-सम्मत्त-सण्णि-आहारए चेदि’ एकपदत्वात् न अवयवविभक्तय: श्रूयन्ते।
अथ लोकेऽपि चतुर्भि: प्रकारै: अन्वेषणं दृश्यते-ततोऽत्रापि चतुर्भि: मार्गणा निष्पद्यमाना उपलभ्यते। तद्यथा-मृगयिता, मृग्यं, मार्गणं, मार्गणोपाय: इति। एषु तावत्-मृगयिता भव्यपुण्डरीक: तत्त्वार्थश्रद्धालुर्जीव:, चतुर्दशगुणस्थानविशिष्टजीवा: मृग्यं, मृग्यस्याधारतां आस्कंदन्ति मृगयितु: करणतामादधानानि वा गत्यादीनि मार्गणम्, विनेयोपाध्यायादयो मार्गणोपाय: इति।
सूत्रे शेषत्रितयं परिहृत्य किमिति मार्गणमेवोक्तमिति चेन्न, तस्य देशामर्शकत्वात्, तन्नान्तरीयकत्वाद्वा।[१३]


श्री कुन्दकुन्ददेव ने भी दिक्शुद्धिप्रकरण को कहा है-

गाथार्थ-पूर्वान्ह, अपरान्ह और प्रदोषकाल के स्वाध्याय करने में दिशाओं के विभाग की शुद्धि के लिए नव, सात और पाँच बार गाथा प्रमाण णमोकार मंत्र को पढ़े।।२७३।।

पुन: द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव शुद्धि का प्रतिपादन करके सूत्र के लक्षण का भी निरूपण करके अस्वाध्याय काल में किसको कौन-कौन से ग्रंथ नहीं पढ़ना चाहिए, ऐसा प्ररूपित करते हैं-

गाथार्थ-अस्वाध्याय काल में मुनिवर्ग और आर्यिकाओं को इन सूत्रग्रंथ का पढ़ना ठीक नहीं है। इनसे भिन्न अन्य ग्रंथ को अस्वाध्याय काल में पढ़ सकते हैं।।२७८।।

विरत वर्ग अर्थात् संयतसमूह को और स्त्रीवर्ग अर्थात् आर्यिकाओं को अस्वाध्याय काल में-पूर्वोक्त कालशुद्धि आदि से रहित काल में इन सूत्रग्रंथों का स्वाध्याय करना युक्त नहीं है किन्तु इन सूत्रग्रंथों से अतिरिक्त अन्य ग्रंथों को कालशुद्धि आदि के अभाव में भी पढ़ा जा सकता है ऐसा समझना चाहिए। इनसे भिन्न अन्य सूत्र ग्रंथ कौन-कौन से हैं ? ऐसा पूछने पर कहते हैं-

गाथार्थ-आराधना के कथन करने वाले ग्रंथ, मरण को कहने वाले ग्रंथ, संग्रह ग्रंथ, स्तुतिग्रंथ, प्रत्याख्यान, आवश्यक क्रिया और धर्मकथा संबंधी ग्रंथ तथा और भी ऐसे ही ग्रंथ अस्वाध्याय काल में भी पढ़ सकते हैं।।२७९।।

‘संग्रह’ ग्रंथ से पञ्चसंग्रह आदि-गोम्मटसार आदि ग्रंथ अस्वाध्याय काल में भी पढ़े जा सकते हैं। यहाँ यह जानना चाहिए कि मुनियों के समान ही आर्यिकाओं को भी सिद्धान्तग्रंथ पढ़ने का अधिकार है। दूसरी बात यह है कि मूलाचार की गाथा में भी विरतस्त्रीवर्ग पाठ है। उसकी टीका में भी सिद्धान्तचक्रवर्ती श्री वसुनन्दि आचार्य ने कहा है कि यहाँ स्त्रीवर्ग से आर्यिकावर्ग को ग्रहण करना चाहिए। वर्तमानकाल में षट्खण्डागम, कषायप्राभृत और महाबंध नाम के ग्रंथ है, उनकी धवला, जयधवला, महाधवला टीकाएँ सिद्धान्तग्रंथ रूप से मान्य हैं ऐसा टीकाकार श्री वीरसेनाचार्य के वाक्यों से मानना चाहिए इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

विशेषार्थ

वर्तमानकाल में षट्खण्डागम सूत्र, कसायपाहुड़ सूत्र और महाबंध सूत्र अर्थात् धवला, जयधवला और महाधवला को सूत्रग्रंथ माना जाता है। चूँकि श्रीवीरसेनाचार्य ने धवला, जयधवला टीका में इन्हें सूत्रसदृश मानकर सूत्रग्रंथ कहा है। इनके अतिरिक्त अन्य ग्रंथों को अस्वाध्याय काल में भी पढ़ा जा सकता है।

मूलाचार ग्रंथ में उपर्युक्त दिक्शुद्धि प्रकरण को टीकाकार श्री वसुनन्दि आचार्य ने अपनी आचारवृत्ति टीका में खुलासा किया है जिसकी हिन्दी टीका करते हुए पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी लिखती हैं-

दिशाओं का विभाग दिग्विभाग है। उसकी शुद्धि अर्थात् दिशाओं का उल्कापात आदि से रहित होना। पूर्वान्हकाल के स्वाध्याय के विषय में इस दिग्विभाग की शुद्धि के निमित्त प्रत्येक दिशा में कायोत्सर्ग से स्थित होकर नव-नव गाथा प्रमाण जाप्य करना चाहिए। उसमें यदि दिशादाह आदि होते हैं तब कालशुद्धि नहीं होती है। जैसे-पश्चिमरात्रि में स्वाध्याय समाप्त कर वसतिका से बाहर निकलकर प्रासुक भूमिप्रदेश में कायोत्सर्ग से पूर्वाभिमुख स्थित होकर नौ गाथाओें के उच्चारण काल से पूर्व दिशा को शुद्ध करके फिर प्रदक्षिणा क्रम से पलटकर इतने ही काल से दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशा को शुद्ध कर लेने पर छत्तीस गाथाओं के उच्चारणकाल से अथवा एक सौ आठ उच्छ्वास काल से (एक बार णमोकार मंत्र में तीन उच्छ्वास होने से चार दिशा संबंधी नव-नव के छत्तीस ९²४·३६ के ३६²३·१०८ एक सौ आठ उच्छ्वासों से) कालशुद्धि समाप्त होती है। अपरान्हिक काल में भी इसी प्रकार कालशुद्धि करनी चाहिए। विशेष इतना है कि इस समय की कालशुद्धि एक-एक दिशा में सात-सात गाथाओं के उच्चारण से होती है। यहाँ सब गाथाओं का प्रमाण अट्ठाईस अथवा उच्छ्वासों का प्रमाण चौरासी है। पश्चात् सूर्य के अस्त होने से पहले क्षेत्रशुद्धि करके सूर्यास्त हो जाने पर पूर्व के समान कालशुद्धि करना चाहिए। विशेष इतना है कि यहाँ काल बीस गाथाओं के उच्चारण प्रमाण अर्थात् साठ उच्छ्वास प्रमाण है।

अपररात्रि के समय वाचना नहीं है क्योंकि उस समय क्षेत्रशुद्धि करने का उपाय नहीं है, अवधिज्ञानी, मन:पर्ययज्ञानी, समस्त अंगश्रुत के धारक, आकाश स्थित चारणमुनि तथा मेरु व कुलाचलों के मध्य स्थित चारण ऋषियों के अपररात्रिक वाचना भी है, क्योंकि वे क्षेत्रशुद्धि से रहित हैं। अभिप्राय यह हुआ कि पिछली रात्रि के स्वाध्याय में आजकल मुनि और आर्यिकाएँ सूत्रग्रंथों का वाचना नामक स्वाध्याय न करें एवं उनसे अतिरिक्त आराधना ग्रंथ आदि का स्वाध्याय करके सूर्योदय के दो घड़ी (४८ मिनट) पहले स्वाध्याय समाप्त कर बाहर निकलकर प्रासुक प्रदेश में खड़े होकर चारों दिशाओं में तीन-तीन उच्छ्वासपूर्वक नव-नव बार णमोकारमंत्र का जाप्य करके दिशा-शुद्धि करें। पुन: पूर्वान्ह स्वाध्याय समाप्ति के बाद भी अपरान्ह स्वाध्याय हेतु चारों दिशाओं में सात-सात बार महामंत्र जपें। तथैव अपरान्ह स्वाध्याय के अनन्तर भी पूर्वरात्रिक स्वाध्याय हेतु पाँच-पाँच महामंत्र से दिशाशोधन कर लेवें। अपररात्रिक के लिए दिक्शोधन का विधान नहीं है, क्योंकि उस काल में ऋद्धिधारी महामुनि ही वाचना स्वाध्याय करते हैं और उनके लिए दिशा-शुद्धि की आवश्यकता नहीं है।

तात्पर्य यह है कि बारहवें दृष्टिवाद अंग के अन्तर्गत द्वितीय अग्रायणीय पूर्व के अंशरूप इस आगमग्रंथ में मंगलाचरणरूप प्रथम गाथासूत्र के अनन्तर ग्रंथ के प्रतिपाद्यविषय की प्रतिज्ञारूप द्वितीय सूत्र में यह कहा है कि चौदह गुणस्थान और चौदह मार्गणास्थान कहे गये हैं। उसमें भी पहले मार्गणा के नामों को कहेंगे। वह ‘‘मार्गणा’’ नाम क्यों पड़ा ? ऐसा पूछने पर आचार्यदेव प्रत्युत्तर देते हैं- सत्, संख्या, क्षेत्रादि आठ अनुयोगद्वारों से विशिष्ट चौदह गुणस्थानों को जिसमें खोजा जाता है वह मार्गणा है। अब मार्गणाओं के प्रतिपादन की सूचना के लिए तृतीय सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

वे चौदह मार्गणास्थान हैं जैसे कि अगले सूत्र में प्रतिपादित हैं।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इस सूत्र में जो ‘तं’ शब्द है उससे तत् इस अर्थ से पूर्व प्रकरण का परामर्श-ग्रहण होता है। ‘तत्’ इस शब्द से मार्गणा के भेदों का विधान करना चाहिए। ‘जहा’ अर्थात् ‘यथा’ जिसका अर्थ है-जैसे। अर्थात् जिस प्रकार से ग्रंथ में प्रतिपादित है उसी प्रकार से मैं कहूँगा ऐसा जानना चाहिए। अथवा वे मार्गणास्थान कौन से हैं ? ऐसा किसी शिष्य के द्वारा प्रश्न किये जाने पर उन मार्गणास्थानों के प्रतिपादन के लिए उत्तर सूत्र का अवतार हुआ है।

सूत्रार्थ-

गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञी और आहार ये चौदह मार्गणाएँ हैं और इनमें जीव खोजे जाते हैं।।४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चौदह मार्गणाओं के ये नाम हैं-गति में, इन्द्रिय में, काय में, योग में, वेद में, कषाय में, ज्ञान में, संयम में, दर्शन में, लेश्या में, भव्यत्व में, सम्यक्त्व में, संज्ञी में और आहार में जीवसमास अर्थात् गुणस्थानों को खोजा जाता है। यहाँ सूत्र में ‘च’ शब्द प्रत्येक के साथ लगाने वाला समुच्चयार्थ का सूचक है। ‘इति’ शब्द समाप्तिरूप अर्थ में आया है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि मार्गणाएँ चौदह ही होती हैं।

प्रश्न-सूत्र में यहाँ सप्तमी निर्देश क्यों किया है ?

उत्तर-उन गति आदि मार्गणाओं को जीवों का आधार बताने के लिए सप्तमी विभक्ति का निर्देश किया है।

इसी तरह सूत्र में प्रत्येक पद के साथ तृतीया विभक्ति का निर्देश भी हो सकता है इसमें कोई विरोध नहीं आता है।

प्रश्न-वह तृतीया विभक्ति का निर्देश कैसे जाना जाता है ?

उत्तर-यहाँ तृतीया विभक्ति का कथन देशामर्शक है इसलिए तृतीया और सप्तमी दोनों का ग्रहण किया जा सकता है। सूत्रोक्त गति आदि जिनपदों में विभक्ति नहीं पाई जाती है, वहाँ पर भी ‘‘आइमज्झंतवण्णसरलोवो’’ अर्थात् आदि, मध्य और अन्त के वर्ण और स्वर का लोप हो जाता है। इस प्राकृत व्याकरण के सूत्र के नियमानुसार विभक्ति का लोप हो गया है फिर भी उसका अस्तित्व समझ लेना चाहिए। अथवा ‘‘लेस्साभवियसम्मत्तसण्णिआहारए’’ यह एक पद समझना चाहिए, इसलिए लेश्या आदि प्रत्येक पद में विभक्तियाँ देखने में नहीं आती हैं। लोक में अर्थात् व्यवहारिक पदार्थों का विचार करते समय भी चार प्रकार से अन्वेषण देखा जाता है। वे चार प्रकार ये हैं-मृगयिता, मृग्य, मार्गणा और मार्गणोपाय। वे इस प्रकार हैं-जीवादि पदार्थों का श्रद्धान करनेवाला भव्यपुण्डरीक मृगयिता अर्थात् लोकोत्तर पदार्थों का अन्वेषण करने वाला है। चौदह गुणस्थानों से युक्त जीव मृग्य अर्थात् अन्वेषण करने योग्य है। जो मृग्य अर्थात् चौदह गुणस्थानविशिष्ट जीवों के आधारभूत हैं अथवा अन्वेषण करने वाले भव्य जीव को अन्वेषण करने में अत्यन्त सहायक कारण हैं ऐसी गति आदिक मार्गणा हैं। शिष्य और उपाध्याय आदिक मार्गणा के उपाय हैं।

प्रश्न-इस सूत्र में मृगयिता, मृग्य और मार्गणोपाय इन तीन को छोड़कर केवल मार्गणा का ही उपदेश क्यों दिया गया है ?

उत्तर-यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि गति आदि मार्गणावाचक पद देशामर्शक हैं इसलिए इस सूत्र में कही गई मार्गणाओं से तत्संबंधी शेष तीनों का ग्रहण हो जाता है अथवा मार्गणा पद शेष तीनों का अविनाभावी है, इसलिए भी केवल मार्गणा का कथन करने से शेष तीनों का ग्रहण हो जाता है।


अत्र तावन्मार्गणाया: लक्षणमुच्यते-

जाहि व जासु व जीवा, मग्गिज्जंते जहा तहा दिट्ठा।

ताओ चोद्दस जाणे, सुदणाणे मग्गणा होंति।।[१४]
आसां मार्गणानां उत्तरभेदा: पंचनवति: भवन्ति। चतु:कषायापेक्षया चतु:सप्तति:, षोडशकषायापेक्षया षडशीति: पंचविंशतिकषायापेक्षया वा पंचनवति: इति। इतो विस्तर:-गतयश्चतस्र:, इन्द्रियाणि पंच, काया: षट्, योगा: पंचदश, वेदास्त्रय:, कषाया: चत्वार: क्रोधमानमायालोभा:, अनन्तानुबन्ध्यादि-अपेक्षया षोडश, हास्यादिनवनोकषायापेक्षया पंचविंशतयो भवन्ति, ज्ञानानि अष्टौ, संयमा: सप्त-सामायिकछेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययथाख्याताख्यभेदै: पंच, देशसंयमोऽसंयमश्चेति सप्त। दर्शनानि चत्वारि चक्षुरचक्षुरवधिकेवलभेदात्। लेश्या: षट् कृष्णनीलकापोतपीतपद्मशुक्लभेदात्। भव्यमार्गणा द्विविधा भव्यत्वाभव्यत्वभेदात्। संज्ञिमार्गणा द्विविधा संज्ञित्वासंज्ञित्वभेदात्।
सम्यक्त्वमार्गणा: षट्विधा उपशमक्षयक्षयोपशम-मिश्रसासादनमिथ्यात्वभेदात्। संज्ञिमार्गणा द्विविधा संज्ञित्वासंज्ञित्वभेदात्। आहारकमार्गणा द्विविधा आहारकानाहारकभेदात्।
अस्मिन् सत्प्ररूपणाग्रन्थे कषायस्य चत्वारो भेदा एव विवक्षिता: सन्ति।
मेरठजनपदे कमलानगरस्य जिनमंदिरे विदेहक्षेत्रेषु विहरमाण-सीमन्धरादिविंशतितीर्थकराणां मूर्तय: कमल-कमलस्योपरि स्थापयितव्या इति नूतनयोजना प्रेमचंद्रश्रावकस्य मया दत्ता। अग्रे विराजयिष्यमाणा: सर्वा: जिनप्रतिमा मह्यं चतुर्विधस्य संघस्य च सर्वसौख्यं वितरन्तु इति भावयामहे।[१५]
अधुना संक्षेपेण प्रत्येकमार्गणानामर्थो निगद्यते-
१. गम्यत इति गति:। भवाद्भवसंक्रान्तिर्वा गति:, सिद्धिगतिस्तद्विपर्यासात्।
उक्त च-
गइकम्मविणिव्वत्ता जा चेट्ठा सा गई मुणेयव्वा।
जीवा हु चाउरंगं गच्छंति त्ति य गई होइ।।[१६]
गतिनामकर्मोदयेन विनिर्वृत्ता जीवस्य या काचित् चेष्टा पर्याया सा गति: अथवा जीवा यस्या निमित्तेन नारकतिर्यग्मनुष्यदेवरूपां चतुर्गतिं गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति सा गतिर्गीयते।

२. प्रत्यक्षनिरतानीन्द्रियाणि। अक्षाणीन्द्रियाणि, अक्षमक्षं प्रति वर्तत इति प्रत्यक्षं विषयोऽक्षजो बोधो वा। तत्र निरतानि व्यापृतानि इन्द्रियाणि। शब्दस्पर्शरसरूपगन्धज्ञानावरणकर्मणां क्षयोपशमाद् द्रव्येन्द्रिय-निबन्धनादिन्द्रियाणीति यावत्। भावेन्द्रियकार्यत्वाद् द्रव्यस्येन्द्रियव्यपदेश:।
स्वविषयनिरतानीन्द्रियाणि इति वा। अथवा स्वार्थनिरतानीन्द्रियाणि। अथवा इन्दनादाधिपत्यादिन्द्रियाणि।


अब मार्गणा का लक्षण कहते हैं-

गाथार्थ-प्रवचन में जिस प्रकार से देखे हों उसी प्रकार से जीवादि पदार्थों का जिन भावों के द्वारा अथवा जिन पर्यायों में विचार-अन्वेषण किया जाए उनको ही मार्गणा कहते हैं, उनके चौदह भेद हैं ऐसा समझना चाहिए।

इन मार्गणाओं के उत्तरभेद पंचानवे (९५) होते हैं। चार कषायों की अपेक्षा इनके चौहत्तर (७४) भेद हैं, सोलह कषाय की अपेक्षा छियासी (८६) भेद हैं और पच्चीस कषाय की अपेक्षा पंचानवे (९५) भेद हैं।

उन्हीं का विस्तार करते हैं- चार गति, पाँच इन्द्रियाँ, छह काय, पन्द्रह योग, तीन वेद, क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषाय अनन्तानुबंधी आदि की अपेक्षा सोलह कषाय और हास्यादि नौ नोकषाय की अपेक्षा कषाय के पच्चीस भेद होते हैं। ज्ञान आठ हैं, संयम सात हैं-सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात के भेद से पाँच और देशसंयम तथा असंयम ये सात संयम हैं। चक्ष़्, अचक्षु, अवधि और केवल के भेद से दर्शन चार प्रकार का है। कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल के भेद से लेश्या छह प्रकार की है। भव्यमार्गणा भव्यत्व और अभव्यत्व के भेद से दो प्रकार की है। संज्ञित्व और असंज्ञित्व की अपेक्षा संज्ञी मार्गणा के दो भेद हैं।

सम्यक्त्व मार्गणा के छह भेद हैं-उपशम, क्षय, क्षयोपशम, मिश्र, सासादन और मिथ्यात्व। संज्ञित्व और असंज्ञित्व के भेद से संज्ञी मार्गणा दो प्रकार की है। आहारकमार्गणा आहारक, अनाहारक के भेद से दो प्रकार की है। इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ में कषाय के चार भेद ही विवक्षित हैं।

मेरठ जनपद में कमलानगर के जिनमंदिर में मैंने प्रेमचंद जैन नाम के श्रावक को प्रेरणा दी कि विदेह क्षेत्रों में विहार करने वाले सीमंधर आदि विद्यमान बीस तीर्थंकरों की मूर्तियों को विराजमान करने हेतु बीस कमलों की रचना करनी चाहिए। ये कमल निर्माण होने के पश्चात् आगे इनमें विराजमान होने वाली समस्त जिनप्रतिमाएँ मेरे लिए, चतुर्विध संघ के लिए तथा सभी के लिए सर्वसुखों को प्रदान करें, ऐसी मेरी भावना है। अब संक्षेप में प्रत्येक मार्गणा का अर्थ बताते हैं-

१. जो प्राप्त की जाय, उसे गति कहते हैं। अथवा एक भव से दूसरे भव का परिवर्तन गति है। पूर्व में जो गति नामा नामकर्म के उदय से प्राप्त होने वाली पर्यायविशेष को अथवा एक भव से दूसरे भव में जाने को गति कह आये हैं, ठीक इससे विपरीत स्वभाववाली सिद्धगति होती है। कहा भी है-

गाथार्थ-गति नामा नामकर्म के उदय से जो जीव की चेष्टा विशेष उत्पन्न होती है उसे गति कहते हैं अथवा जिसके निमित्त से जीव चतुर्गति में जाते हैं उसे गति कहते हैं।

गतिनामकर्मोदय से बनी हुई जीव की जो कोई चेष्टारूप पर्याय है वह गति है। अथवा जिसके निमित्त से जीव नरक, तिर्यंच, मनुष्य एवं देवरूप चार गतियों को प्राप्त करते हैं वह गति कहलाती है।

२. जो प्रत्यक्ष में व्यापार करती हैं उन्हें इन्द्रियाँ कहते हैं। अक्ष इन्द्रिय को कहते हैं और जो अक्ष-अक्ष के प्रति अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के प्रति रहता है उसे प्रत्यक्ष कहते हैं। जो कि इन्द्रियों का विषय अथवा इन्द्रियजन्य ज्ञानरूप पड़ता है। उस इन्द्रियविषय अथवा इन्द्रिय ज्ञानरूप प्रत्यक्ष में जो व्यापार करती हैं उन्हें इन्द्रियाँ कहते हैं।

द्रव्येन्द्रियों के निमित्तरूप ऐसे शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गंध नामक ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से इन्द्रियाँ होती हैं यह उक्त कथन का तात्पर्य है। क्षयोपशम रूप भावेन्द्रियों के होने पर ही द्रव्येन्द्रियों की उत्पत्ति होती है इसलिए भावेन्द्रियाँ कारण हैं और द्रव्येन्द्रियाँ कार्य हैं। इसीलिए द्रव्येन्द्रियों को भी इन्द्रिय यह संज्ञा प्राप्त है। जो नियमित अपने-अपने विषय मे या उस-उस इन्द्रिय से उत्पन्न हुए ज्ञान में ‘‘निरतानि’’ अर्थात् निरत हैं-लगी हुई हैं-व्यापार करती हैं वे इन्द्रियाँ हैं अथवा अपने-अपने विषयरूप अर्थ में जो व्यापार करती हैं उन्हें इन्द्रियाँ कहते हैं। अथवा अपने-अपने विषय का स्वतंत्र आधिपत्य करने से इन्द्रियाँ कहलाती हैं।

उक्तं च-

अहमिंदा जह देवा, अविसेसं अहमहं ति मण्णंता।

ईसंति एक्कमेक्कं, इंदा इव इंदिए जाण।।[१७]
यथा अहमिन्द्रा देवा: स्वामिसेवकादिभेदरहिता एकोऽहं इन्द्र:, एकोऽहमिन्द्र:, इति मन्यमाना ईशन्ते-ईश्वरत्वं प्राप्नुवन्ति। तथैव इन्द्रियाण्यपि स्व-स्वविषये स्वतन्त्राणि इति। स्पर्शनरसनघ्राणचक्षु:श्रोत्रभेदात् पंच भवन्ति।
३. चीयत इति काय:। अथवा आत्मप्रवृत्त्युपचितपुद्गलपिण्ड: काय:।


उक्तं च-

अप्पप्पवुत्तिसंचिद-पोग्गलपिंडं वियाण कायो त्ति।

सो जिणमदम्हि भणिओ, पुढविक्कायादिछब्भेदो।।
जह भारवहो पुरिसो, वहइ भरं गेण्हिऊण कावोडिं।
एमेव वहइ जीवो, कम्मभरं कायकावोडिं।।[१८]
योगरूपात्मप्रवृत्त्या संचित: औदारिकादिरूपपुद्गलपिंड: कायो भवति स: जिनमते पृथ्वीजलाग्निवायु-वनस्पतित्रसभेदात् षड्विधो भणित: इति।
४. युज्यत इति योग:। आत्मप्रवृत्ते: कर्मादाननिबन्धनवीर्योत्पादो वा योग:। अथवात्मप्रदेशानां संकोचविकोचो योग:।


उक्तं च-

मणसा वचसा काएण, चावि जुत्तस्स विरिय-परिणामो।

जीवस्सप्पणिओगो, जोगो त्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठो।।[१९]
मनोवचनकायनिमित्तोद्भूतक्रियायुक्तस्यात्मन: य: कश्चित् वीर्योत्पाद: शक्तिविशेष: स योग:। अथवा जीवस्य परिस्पंदनरूपाक्रिया योग इति जिनवरैर्निर्दिष्ट: भवति।
सत्यमनोयोगमृषामनोयोग-सत्यमृषामनोयोग-असत्यमृषामनोयोगाश्च चत्वार: मनोयोगा:। सत्य-वचनयोग-मृषावचनयोग-सत्यमृषावचनयोग-असत्यमृषावचनयोगाश्चेति चत्वार: वचनयोगा:। औदारिक-काययोग-औदारिकमिश्रकाययोग-वैक्रियिककाययोग-वैक्रियिकमिश्रकाययोग-आहारककाययोग-आहारकमिश्रकाययोग-कार्मणकाययोगाश्चेति सप्तविधा: काययोगा: इति पंचदश योगा: भवन्ति।
५. वेद्यत इति वेद:। अत्रापि रूढिवशाद् वेदनाम्नां कर्मणामुदयस्यैव वेदव्यपदेशात्। अथवात्मप्रवृत्ते-र्मैथुनसम्मोहोत्पादो वेद:।

उक्तं च-

वेदस्सुदीरणाए, बालत्तं पुण णियच्छदे बहुसो।

थी-पुं-णवुंसए वि य, वेए त्ति तओ हवइ वेओ।।[२०]
वेदकर्मोदयोदीरणानिमित्तेन जीवस्य नानाविधं बालत्वं चांचल्यं वा उत्पद्यते स एव वेद: स्त्री-पुं-नपुंसकभेदात् त्रिधा भिद्यते।
६. सुखदु:खबहुसस्य-कर्मक्षेत्रं कृषन्तीति कषाया:।

उक्तं च-

सुहदुक्ख-सुबहु-सस्सं, कम्मक्खेत्तं कसेदि जीवस्स।

संसार-दूर-मेरं, तेण कसाओ त्ति णं वेंति।।[२१]
सुखदु:खादिनानाविधसस्यानुत्पादयितुं योग्यं जीवस्य कर्मक्षेत्रं कृषन्ति कर्षणं कुर्वन्ति, संसारमर्यादां अत्यंतं दूरीकुर्वन्ति तत: कारणात् इमे कषाया: इति कथयन्ति महर्षय:। क्रोधमानमायालोभभेदैश्चतुर्धा कषाया: सन्ति।
७. भूतार्थप्रकाशकं ज्ञानम्। अथवा सद्भावविनिश्चयोपलम्भकं ज्ञानं। एतेन संशयविपर्ययानध्य-वसायावस्थासु ज्ञानाभाव: प्रतिपादित: स्यात्। शुद्धनयविवक्षायां तत्त्वार्थोपलम्भकं ज्ञानं। ततो मिथ्यादृष्ट्यो न ज्ञानिन: इति सिद्धम् द्रव्यगुणपर्यायाननेन जानातीति ज्ञानम्।

उक्तं च-

जाणइ तिकाल-सहिए, दव्वगुणे पज्जए य बहुभेए।

पच्चक्खं च परोक्खं, अणेण णाणं ति णं वेंति।।[२२]
अनेन जीव: त्रिकालविषयान् समस्तद्रव्यगुणान् तेषां बहुभेदयुक्तान् पर्यायानपि प्रत्यक्षं परोक्षं च जानाति तज्ज्ञानं इति विदन्ति मुनय:। कुमतिकुश्रुतविभंगावधिभेदै: मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलज्ञान-भेदैश्चाष्टविधानि ज्ञानानि ज्ञानमार्गणायाम्।
८. संयमनं संयम:। न द्रव्ययम: संयम:, तस्य ‘सं’ शब्देनापादितत्वात्। अतोऽत्र ‘सं’ शब्देनात्मसात्कृता-शेषसमितित्वात्। अथवा व्रतसमितिकषायदण्डेन्द्रियाणां धारणानुपालननिग्रहत्यागजया: संयम:।

कहा भी है-

गाथार्थ-जिस प्रकार ग्रैवेयकादि में उत्पन्न हुए अहमिन्द्र देव ‘‘मै सेवक हूँ, मैं स्वामी हूँ’’ इत्यादि विशेषभाव से रहित अपने को मानते हुए एक-एक होकर अर्थात् कोई किसी की आज्ञा आदि के पराधीन न होते हुए स्वयं स्वामीपने को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी अपने-अपने स्पर्शादिक विषय का ज्ञान उत्पन्न करने में समर्थ हैं और दूसरी इन्द्रियों की अपेक्षा से रहित हैं अतएव अहमिन्द्रों की तरह इन्द्रियाँ जानना चाहिए।

जैसे अहमिन्द्र आदि स्वामी-सेवक के भेद से रहित होते हुए ‘‘मैं इन्द्र हूँ, मैं अहमिन्द्र हूँ’’ ऐसा मानते हुए ईश्वरत्व-प्रभुत्व को प्राप्त करते हैं उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी अपने-अपने विषय में स्वतंत्र होती हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र के भेद से वे इन्द्रियाँ पाँच होती हैं।

३. जो संचित किया जाता है उसे काय कहते हैं। अथवा योगरूप आत्मा की प्रवृत्ति से औदारिकादिरूप पुद्गल पिण्ड को काय कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ

योगरूप आत्मा की प्रवृत्ति से संचय को प्राप्त हुए औदारिक आदिरूप पुद्गलपिण्ड को काय समझना चाहिए। वह काय जिनमत में पृथिवीकाय आदि के भेद से छह प्रकार का कहा गया है। वे पृथिवी आदि छह काय, त्रसकाय और स्थावरकाय के भेद से दो प्रकार के हैं।

जिस प्रकार से भार को ढोने वाला पुरुष कावड़ को लेकर भार ढोता है उसी प्रकार यह जीव शरीररूपी कावड़ को लेकर कर्मरूपी भार को ढोता है। योगरूप आत्मप्रवृत्ति से संचित औदारिक आदिरूप पुद्गल पिण्ड काय होता है वह जिनमत-जैन शासन में पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस के भेद से छह प्रकार का कहा गया है।

४. जो संयोग को प्राप्त हो उसे योग कहते हैं। अथवा प्रदेशपरिस्पन्दरूप आत्मा की प्रवृत्ति के निमित्त से कर्मों के ग्रहण करने में कारणभूत वीर्य की उत्पत्ति को योग कहते हैं। अथवा आत्मा के प्रदेशों के संकोच और विस्ताररूप होने को योग कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ

मन, वचन और काय के निमित्त से होने वाली क्रिया से युक्त आत्मा के जो वीर्यविश् उत्पन्न होता है उसे योग कहते हैं अथवा जीव के प्रणियोग अर्थात् परिस्पन्दरूप क्रिया को योग कहते हैं ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कथन किया है। मन, वचन, काय के निमित्त से उत्पन्न क्रिया से युक्त आत्मा के जो कुछ वीर्य की उत्पत्तिरूप शक्तिविशेष है वह योग है अथवा जीव के परिस्पन्दनरूप क्रिया योग है ऐसा जिनवरों ने कहा है।

इनमें से मनोयोग के चार भेद हैं-सत्यमनोयोग, मृषामनोयोग, सत्यमृषामनोयोग और असत्यमृषामनोयोग। सत्यवचनयोग, मृषावचनयोग, सत्यमृषावचनयोग और असत्यमृषावचनयोग के भेद से वचनयोग चार प्रकार का है। औदारिक काययोग, औदारिकमिश्रकाययोग, वैक्रियिककाययोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग, आहारककाययोग, आहारकमिश्रकाययोग और कार्मणकाययोग ये सात काययोग होते हैं। इस प्रकार सब मिलाकर ४±४±७·१५ योग होते हैं।

५. जो वेदा जाय, अनुभव किया जाये उसे वेद कहते हैं। इस व्युत्पत्ति के अनुसार भी रूढ़ि के बल से वेद नामक कर्मों के उदय को ही वेद संज्ञा प्राप्त है। अथवा आत्मप्रवृत्ति में स्त्री-पुरुष विषयक मैथुनरूप चित्तविक्षेप के उत्पन्न होने को वेद कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ

वेद कर्म की उदीरणा से यह जीव नाना प्रकार के बालभाव अर्थात् चांचल्य को प्राप्त होता है और स्त्रीभाव, पुरुषभाव तथा नपुंसकभाव का वेदन करता है, इसलिए उस वेद कर्म के उदय से प्राप्त होने वाले भाव को वेद कहते हैं। वेदकर्म की उदीरणा के निमित्त से जीव के नाना प्रकार के बालपन अथवा चंचलता की उत्पत्ति ही वेद है। स्त्री, पुरुष और नपुंसक के भेद से वह वेद तीन प्रकार का है।

६. सुख-दु:खरूपी नानाप्रकार के धान्य को उत्पन्न करने वाले कर्मरूपी क्षेत्र को जो कर्षण करती हैं अर्थात् फल उत्पन्न करने के योग्य करती हैं उन्हें कषाय कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ

सुख-दु:ख आदि अनेक प्रकार के धान्य को उत्पन्न करने वाले तथा जिसकी संसार रूप मर्यादा अत्यन्त दूर है ऐसे कर्मरूपी क्षेत्र को जो कर्षण करती हैं उन्हें कषाय कहते हैं।

सुख-दु:खादि नाना प्रकार के धान्य को उत्पन्न करने योग्य जीव के कर्मक्षेत्र को जो कर्षण करती हैं, संसारमर्यादा को अत्यन्त दूर करती हैं इस कारण से महर्षियों ने इन्हें ‘कषाय’ कहा है। क्रोध, मान, माया और लोभ के भेद से कषायें चार प्रकार की हैं।

७. सत्यार्थ के प्रकाश करने वाले को ज्ञान कहते हैं अथवा सद्भाव अर्थात् वस्तु स्वरूप का निश्चय कराने वाले धर्म को ज्ञान कहते हैं। ज्ञान का इस प्रकार का लक्षण करने से संशय, विपर्यय और अनध्यवसायरूप अवस्था में ज्ञान का अभाव प्रतिपादित हो जाता है। कारण कि शुद्ध निश्चयनय की विवक्षा में तत्त्वार्थ को उपलब्ध कराने वाले धर्म को ही ज्ञान कहा है। इसलिए मिथ्यादृष्टि जीव ज्ञानी नहीं हो सकते हैं। इस प्रकार जिसके द्वारा द्रव्य, गुण और पर्यायों को जानते हैं उसे ज्ञान कहते हैं यह बात सिद्ध होती है। कहा भी है-

गाथार्थ

जिसके द्वारा जीव त्रिकाल विषयक समस्त द्रव्य, उनके गुण और उनकी अनेक प्रकार की पर्यायों को प्रत्यक्ष और परोक्षरूप जाने उसको ज्ञान कहते हैं।

इसके द्वारा जीव त्रिकाल विषयक समस्त द्रव्य-गुणों को और उनकी बहुत भेद युक्त पर्यायों को भी प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से जानता है इसीलिए मुनियों ने उसे ज्ञान कहा है। कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान के भेद से आठ प्रकार का ज्ञान ज्ञानमार्गणा में कहा गया है।

८. संयमन करने को संयम कहते हैं। संयम का इस प्रकार लक्षण करने पर द्रव्य यम अर्थात् भावचारित्रशून्य द्रव्यचारित्र संयम नहीं हो सकता है। क्योंकि संयम शब्द में ग्रहण किये गये ‘सं’ शब्द से उसका निराकरण कर दिया है। अथवा पाँच व्रतों का धारण करना, पाँच समितियों का पालन करना, क्रोधादि कषायों का निग्रह करना, मनवचनकायरूप तीन दण्डों का त्याग करना और पाँच इन्द्रियों के विषयों का जीतना संयम है।

उक्तं च-

वदसमिइ-कसायाणं, दण्डाण तहिंदियाण पंचण्हं।

धारण-पालण-णिग्गह-चाग-जया संजमो भणिओ।।[२३]
पंचमहाव्रतानां धारणं, पंचसमितीनां पालनं, चतु:कषायानां निग्रह:, मनोवचनकायानां त्रिदण्डानां त्याग:, पंचेन्द्रियाणां जयश्चेति संयमो भणित: जिनशासने। सामायिकछेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्म-सांपराययथाख्याताख्यपंचविधा: संयमा:, देशसंयमोऽसंयमश्चेति सप्तविधा: संयमा: संयममार्गणायाम्।

९. दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्। नाक्ष्णालोकेन चातिप्रसंग:, तयोरनात्मधर्मत्वात्। अंतर्मुखचित्प्रकाश: दर्शनं, बहिर्मुखचित्प्रकाश: ज्ञानं इति न दर्शनज्ञानयोरेकत्वम्। कश्चिदाशंकते-अंतर्बाह्यसामान्यग्रहणं दर्शनम् अंतर्बाह्यविशेषग्रहणं ज्ञानमिति चेत् ? अस्यैव समाधानं क्रियते-नैतद्वक्तव्यं, सामान्यविशेषात्मक-बाह्यार्थग्रहणं ज्ञानं, तथा सामान्यविशेषात्मक-स्वरूपग्रहणं दर्शनमिति।
पुनरपि कश्चिदाह-‘‘जं सामण्णग्गहणं तं दंसणं’’ इति वचनेन विरोध: स्यादिति चेत् ?
अस्यैव समाधानं क्रियते-नैतत्, किंच-तत्रात्मन: सकलबाह्यार्थसाधारणत्वत: सामान्यव्यपदेशभाजो ग्रहणात्।
सामान्यपदेनात्रात्मन एव ग्रहणमिति कथमवसीयते ?
‘‘भावाणं णेव कट्टु आयारं’’ इति वचनात्। तद्यथा-भावानां बाह्यार्थानामाकारं प्रतिकर्मव्यवस्थां अकृत्वा यद् ग्रहणं तद्दर्शनम्। अस्यैवार्थस्य पुनरपि दृढीकरणार्थमाह-‘‘अविसेसिऊण अट्ठे’’ इति, पदार्थान् अविशेष्य यद् ग्रहणं तद्दर्शनमिति।
बाह्यार्थगतसामान्यग्रहणं दर्शनमिति चेत् ?
नैतत् सुष्ठु-विशेषरहितस्य केवलसामान्यस्य वस्तुत्वविरोधात्। तस्यावस्तुनश्च कर्मत्वाभावात्। न च सामान्यमंतरेण विशेषो ग्राह्यत्वं प्राप्नोति, अतिप्रसंगात्।
एवं सति दर्शनं अनध्यवसायरूपं स्यादिति चेत् ?
बाह्यस्यार्थस्यानध्यवसायेऽपि स्वस्याध्यवसायो भवतीति दर्शनमनध्यवसायरूपं नास्ति। एवं सति दर्शनं प्रमाणमेव, अविसंवादित्वात्। प्रतिभास: ज्ञानसामान्यं तत्प्रमाणं च अप्रमाणं च, विसंवादाविसंवादो-भयरूपस्य तत्रोपलम्भात्।
आलोकनवृत्तिर्वा दर्शनम्। अस्य गमनिका-अस्यार्थोऽयं-आलोकते इति आलोकनमात्मा, वर्तनम् वृत्ति:, आलोकनस्य वृत्तिरालोकनवृत्ति: स्वसंवेदनम्। तद्दर्शनमिति लक्ष्यनिर्देश:। प्रकाशवृत्तिर्वा दर्शनं। अस्यार्थ:-प्रकाशो ज्ञानं, तदर्थमात्मनो वृत्ति: प्रकाशवृत्तिस्तद्दर्शनम्। विषयविषयिसंपातात् पूर्वावस्था दर्शनं इत्यर्थ:।

उक्तं च-

जं सामण्णग्गहणं, भावाणं णेव कट्टु आयारं।

अविसेसिऊण अट्ठे, दंसणमिदि भण्णदे समये।।[२४]
सामान्यविशेषात्मबाह्यपदार्थान् पृथक्-पृथक् भेदरूपेण न गृहीत्वा यत् सामान्यग्रहणं-स्वरूपमात्रावभासनं तदेव परमागमे दर्शनमिति उच्यते। तच्चतुर्विधं-चक्षुरचक्षुरवधिकेवलदर्र्शनभेदादिति।

१०. लिम्पतीति लेश्या। अत्र कर्मभिरात्मानमित्यध्याहारापेक्षित्वात्। अथवा आत्मप्रवृत्तिसंश्लेषणकरी लेश्या, अत्र प्रवृत्तिशब्दस्य कर्मपर्यायत्वात्। अथवा कषायानुरञ्जिता कायवाङ्मनोयोगप्रवृत्तिर्लेश्या। ततो न केवल: कषायो लेश्या, नापि योग:। ततो न वीतरागाणां योगो लेश्येति न निश्चेतव्यं, योगस्य प्रधानत्वात्, न कषायस्तन्त्रं विशेषणत्वतस्तस्य प्राधान्याभावात्।

उक्तं च-

लिंपदि अप्पीकीरदि, एदाए णियय-पुण्ण-पावं च।

जीवो त्ति होइ लेस्सा, लेस्सा-गुण-जाणय-क्खादा।।[२५]
एतया अयं जीव: निजात्मानं पुण्यपापाभ्यां लिम्पति, अथवा एतया पुण्य-पापं आत्मसात् करोति सा लेश्या भवति, इति लेश्यागुणज्ञायवैर्गणधरदेवै: कथिता। अस्या लेश्याया: षड्भेदा:-कृष्णनीलकापोत-पीतपद्मशुक्लाश्चेति।
भारतदेशस्य इन्द्रप्रस्थनामधेया राजधान्यां प्रीतविहारे (कालोनीमध्ये) अनिलकुमारश्रावकस्य गृहस्याग्रे प्रांगणे कमलाकृतेर्जिनमंदिरस्य निर्मापणार्थं मया यंत्रं स्थापितं। एतद्भाविमन्दिरं अस्मिन् स्थापयिष्यन्त्य: श्रीऋषभदेवप्रमुखजिनप्रतिमाश्चास्माकं सर्वत्र भारतदेशे च सर्वशान्तिं सर्वसिद्धिं च वितरन्त्विति कामयामहे।[२६]
११. निर्वाणपुरस्कृतो भव्य:। सिद्धपदं प्राप्तुं योग्यो भव्य:।

उक्तं च-

सिद्धत्तणस्स जोग्गा, जे जीवा ते हवंति भवसिद्धा।

ण उ मलविगमे णियमो, ताणं कणगोवलाणमिव।।[२७]
ये जीवा: सिद्धत्वं प्राप्तुं योग्या: सर्वकर्मरहितां सिद्धावस्थां प्राप्तुं योग्या:, ते भव्यसिद्धा: भवन्ति, किंन्तु तेषां सर्वेषां मलविगमे नियमो नास्ति कनकोपलानामिव-यथा कस्मांश्चित् स्वर्णपाषाणात् सुवर्णत्वं पृथक्कर्तुं न शक्यते, तथैव केचित् भव्या अपि दूरानुदूरभव्या: प्रोच्यन्ते तेषां तदनुकूलबाह्याभ्यन्तरसामग्र्यभावात् सिद्धत्वं भवितुं नार्हति। तद्विपरीतोऽभव्य:। अस्या भव्यमार्गणाया द्वौ भेदौ-भव्याभव्यौ इति।
१२. प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्तिलक्षणं सम्यक्त्वं, शुद्धनयापेक्षया एतल्लक्षणं। अथवा तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं, अशुद्धनयापेक्षया एतल्लक्षणं। अथवा तत्त्वरुचि: सम्यक्त्वं, अशुद्धतरनय-समाश्रयणात्।

उक्त च-

छप्पंच-णवविहाणं, अत्थाणं जिणवरोवइट्ठाणं।

आणाए अहिगमेण व, सद्दहणं होइ सम्मत्तं।।[२८]
षड्द्रव्य-पंचास्तिकाय-नवपदार्था: जिनेन्द्रदेवै: उपदिष्टा: सन्ति, तेषां आज्ञया अधिगमेन वा-जिनवरस्याज्ञामात्रेण प्रमाणनयनिक्षेपादिज्ञानेन वा श्रद्धानं सम्यक्त्वं भवति। अस्य विस्तर: सम्यक्त्वमार्गणायां औपशमिक-क्षायिक-क्षायोपशमिक-मिथ्यात्व-सासादन-सम्यग्मिथ्यात्वभेदात् षड्विधं वक्ष्यते।
१३. सम्यक् जानातीति संज्ञं मन:, तदस्यास्तीति संज्ञी। नैकेन्द्रियादिनातिप्रसंग:, तस्य मनसोऽभावात्। अथवा शिक्षाक्रियोपदेशालापग्राही संज्ञी।

उक्तं च-

सिक्खाकिरियुवदेसा-लावग्गाही-मणोवलंबेण।

जो जीवो सो सण्णी, तव्विवरीदो असण्णी दु।।[२९]
यो जीवो मनसोऽवलंबनेन शिक्षा-क्रिया-उपदेश-आलापान् गृहीतुं शक्नोति स संज्ञी इति कथ्यते। य: शिक्षादिग्रहणे अक्षम: स असंज्ञी भवति। अस्यां संज्ञि-असंज्ञिभेदात् द्वौ भेदौ भवत:।
१४. शरीरप्रायोग्यपुद्गलपिंडग्रहणमाहार:। औदारिकादिशरीरयोग्यानां पुद्गलपिंडानां ग्रहणं आहार:।


कहा भी है-

गाथार्थ -अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह इन पाँच महाव्रतों का धारण करना, ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण और उत्सर्ग इन पाँच समितियों का पालना, क्रोध, मान, माया लोभ इन चार कषायों का निग्रह करना, मन, वचन और कायरूप तीन दण्डों का त्याग करना और पाँच इन्द्रियों का जय, इसको संयम कहते हैं।

पाँच महाव्रतों का धारण, पंच समितियों का पालन, चार कषायों का निग्रह, तीन दण्डों का त्याग और पञ्चेन्द्रियों के जय को जिनशासन में संयम कहा है। सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय, यथाख्यात यह पाँच प्रकार का संयम है तथा देशसंयम और असंयम यह सात प्रकार का संयम संयममार्गणा में कहा है।

९. जिसके द्वारा देखा जाये उसे दर्शन कहते हैं। दर्शन का ऐसा लक्षण करने पर चक्षु इन्द्रिय और आलोक भी देखने में सहकारी होने से उनमें से दर्शन का लक्षण चला जाता है इसलिए अतिप्रसंग दोष आता है।

अन्तर्मुख चित्प्रकाश को दर्शन और बहिर्मुख चित्प्रकाश को ज्ञान माना है इसलिए इन दोनों के एक होने में विरोध आता है। यहाँ कोई आशंका करता है कि अन्तरंग सामान्य और बहिरंग सामान्य को ग्रहण करने वाला दर्शन है तथा अन्तर्बाह्य विशेष को ग्रहण करने वाला ज्ञान है ऐसा ग्रहण करना चाहिए ?

इस बात का समाधान करते हैं कि ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि सामान्य विशेषात्मक बाह्य पदार्थ को ग्रहण करने वाला ज्ञान है और सामान्यविशेषात्मक स्वरूप को ग्रहण करने वाला दर्शन है यह सिद्ध हो जाता है।

पुन: भी कोई कहता है-‘‘वस्तु का जो सामान्य ग्रहण होता है उसको दर्शन कहते हैं’’ परमागम के इस वचन के साथ विरोध आता है ? इसका भी समाधान करते हैं-ऐसा नहीं है, क्योंकि आत्मा सम्पूर्ण बाह्य पदार्थों में साधारण रूप से पाया जाता है इसलिए उक्त वचन में सामान्य संज्ञा को प्राप्त आत्मा को ही सामान्य पद से ग्रहण किया गया है।

शंका -सामान्य पद से यहाँ आत्मा का ही ग्रहण क्यों किया जाता है ?

समाधान -‘‘पदार्थों के आकार अर्थात् भेद को नहीं करके’’ इस वचन से उक्त बात जानी जाती है। इसी को स्पष्ट करते हैं कि भावों के अर्थात् बाह्य पदार्थों के आकार अर्थात् प्रतिकर्मव्यवस्था को नहीं करके जो ग्रहण होता है उसको दर्शन कहते हैं। इसी अर्थ को दृढ़ करने के लिए कहते हैं कि ‘यह अमुक पदार्थ है, यह अमुक पदार्थ है’ इत्यादिरूप से पदार्थों की विशेषता न करके जो ग्रहण होता है उसे दर्शन कहते हैं।

शंका -क्या बाह्य पदार्थों में रहने वाले सामान्य को ग्रहण करना दर्शन है ?

समाधान -ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि विशेष रहित केवल सामान्य अवस्तु स्वरूप है इसलिए वह दर्शन के कर्मपने को नहीं प्राप्त हो सकता है। उसी प्रकार सामान्य के बिना केवल विशेष भी ज्ञान के द्वारा ग्राह्य नहीं हो सकता है क्योंकि अवस्तुरूप केवल विशेष अथवा केवल सामान्य का ग्रहण मान लिया जावे तो अतिप्रसंग दोष आता है।

शंका -दर्शन के लक्षण को इस प्रकार का मान लेने पर अनध्यवसाय को दर्शन मानना पड़ेगा ?

समाधान -बाह्यार्थ का निश्चय न करते हुए भी स्वरूप का निश्चय करने वाला दर्शन है। इसलिए वह अनध्यवसाय नहीं है। ऐसा दर्शन अविसंवादी होने के कारण प्रमाण ही है और जो प्रतिभास अर्थात् ज्ञानसामान्य है वह प्रमाण भी है और अप्रमाण भी है क्योंकि उसमें विसंवाद और अविसंवाद ये दोनों रूप पाये जाते हैं।

अथवा आलोकन वृत्ति को दर्शन कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि जो आलोकन करता है उसे आलोकन अर्थात् आत्मा कहते हैं। वर्तन-व्यापार को वृत्ति कहते हैं तथा आलोकन अर्थात् आत्मा की वृत्ति को आलोकनवृत्ति कहते हैं, इसी का नाम स्वसंवेदन है, उसी को दर्शन कहते हैं। यहाँ पर ‘दर्शन’ इस शब्द से लक्ष्य का निर्देश किया गया है। अथवा प्रकाश-वृत्ति को दर्शन कहते हैं।

इसका अर्थ इस प्रकार है-प्रकाश ज्ञान को कहते हैं और उस ज्ञान के लिए जो आत्मा का व्यापार होता है उसे प्रकाशवृत्ति कहते हैं और वही दर्शन है अर्थात् विषय और विषयी के योग्य देश में होने की पूर्वावस्था को दर्शन कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ -सामान्यविशेषात्मक बाह्य पदार्थों को अलग-अलग भेदरूप से ग्रहण करके जो सामान्यग्रहण अर्थात् स्वरूपमात्र का अवभासन होता है उसको परमागम में दर्शन कहा है। सामान्य विशेषात्मक बाह्य पदार्थों को पृथक्-पृथक् भेदरूप से ग्रहण करके जो सामान्यग्रहण-स्वरूपमात्र का अवभासन है उसको ही परमागम में दर्शन कहा है। वह दर्शन चार प्रकार का है-चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवलदर्शन।

१०. जो लिम्पन करती है उसे लेश्या कहते हैं। इस लक्षण में यहाँ ‘‘कर्मों से आत्मा को’’ इतने अध्याहार की अपेक्षा है। इसका तात्पर्य है कि जो कर्मों से आत्मा को लिप्त करती है उसको लेश्या कहते हैं अथवा जो आत्मा और प्रवृत्ति अर्थात् कर्म का संबंध करने वाली है उसको लेश्या कहते हैं। अथवा कषाय से अनुरंजित काययोग, वचनयोग और मनोयोग की प्रवृत्ति को लेश्या कहते हैं। इस प्रकार लेश्या का लक्षण करने पर केवल कषाय और केवलयोग को लेश्या नहीं कह सकते हैं किन्तु कषायानुविद्ध योगप्रवृत्ति को ही लेश्या कहते हैं यह बात सिद्ध हो जाती है। इसमें ग्यारहवें आदि गुणस्थानवर्ती वीतरागियों के केवल योग को लेश्या नहीं कह सकते हैं ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए क्योंकि लेश्या में योग की प्रधानता है। कषाय प्रधान नहीं है क्योंकि वह योगप्रवृत्ति का विशेषण है। अतएव उसकी प्रधानता नहीं है। कहा भी है-

गाथार्थ -जिसके द्वारा जीव पुण्य और पाप से अपने को लिप्त करता है, उनके आधीन करता है उसको लेश्या कहते हैं ऐसा लेश्या के स्वरूप को जानने वाले गणधरदेव आदि ने कहा है।

उस लेश्या के छह भेद हैं-कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल। भारतदेश की इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) नाम की राजधानी में प्रीतविहार कालोनी के श्रावक अनिल कुमार जैन के घर के बाहर प्रांगण (लॉन) में एक कमलाकार जिनमंदिर के निर्माण हेतु मैंने भूमि में यंत्र को स्थापित किया। यह भावी (भविष्य में बनने वाला) जिनमंदिर एवं इसके अंदर विराजमान होने वाली भगवान ऋषभदेव की जिनप्रतिमा हम लोगों को एवं सम्पूर्ण भारतदेश के नागरिकों को सब प्रकार की शांति एवं सिद्धि को प्रदान करें, यही मेरी कामना है।

११. जिसने निर्वाण को पुरस्कृत किया है अर्थात् जो सिद्धपद प्राप्त करने के योग्य है उसको भव्य कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ -जो जीव सिद्धत्व अर्थात् सर्व कर्म से रहित मुक्तिरूप अवस्था पाने के योग्य हैं उन्हें भव्यसिद्ध कहते हैं किन्तु उनके कनकोपल अर्थात् स्वर्णपाषाण के समान मल का नाश होने में नियम नहीं है।

जैसे किसी स्वर्णपाषाण से स्वर्णपना अलग करना शक्य नहीं होता है उसी प्रकार कुछ भव्य भी ‘दूरानुदूर भव्य’ कहलाते हैं। उनको उनके अनुकूल बाह्यआभ्यन्तर सामग्री नहीं मिलने से वे सिद्धत्व पद प्राप्त करने के योग्य नहीं होते हैं। इन गुणों से विपरीत-जिन्होंने निर्वाण को पुरस्कृत नहीं किया है उन्हें अभव्य कहते हैं। इस भव्यमार्गणा के दो भेद हैं-भव्य और अभव्य।

१२. प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य की प्रगटता जिसका लक्षण है उसको सम्यक्त्व कहते हैं। शुद्धनय-निश्चयनय की अपेक्षा यह लक्षण है। अथवा तत्त्व और पदार्थों का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है, अशुद्धनय-व्यवहारनय से सम्यग्दर्शन का यह लक्षण है। अथवा तत्त्वों के प्रति रुचि सम्यक्त्व है अशुद्धतर नय के आश्रय से यह लक्षण कहा गया है। कहा भी है-

गाथार्थ -जिनेन्द्र भगवान के द्वारा उपदेश दिये गये छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय और नव पदार्थों का आज्ञा अर्थात् आप्तवचन के आश्रय से अथवा अधिगम-प्रमाण, नय, निक्षेप और निरुक्ति रूप अनुयोगद्वारों से श्रद्धान करने को सम्यक्त्व कहते हैं।

इसका विस्तार सम्यक्त्वमार्गणा में औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, मिथ्यात्व, सासादन और सम्यग्मिथ्यात्व के भेद से छह प्रकार से करेंगे।

१३. जो भली प्रकार जानता है उसको संज्ञ अर्थात् मन कहते हैं। वह मन जिसके होता है उसको संज्ञी कहते हैं। यह लक्षण एकेन्द्रिय आदि में नहीं घटता है क्योंकि उनके मन का अभाव रहता है। अथवा शिक्षा, क्रिया, उपदेश और आलाप को ग्रहण करने वाले संज्ञी कहलाते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ -जो जीव मन के अवलम्बन से शिक्षा, क्रिया, उपदेश और आलाप को ग्रहण करता है उसे संज्ञी कहते हैं और जो इन शिक्षा आदि को ग्रहण नहीं कर सकता है उसको असंज्ञी कहते हैं।

इस संज्ञी मार्गणा के संज्ञी और असंज्ञी ये दो भेद होते हैं।

१४. शरीर के योग्य पुद्गलपिण्ड के ग्रहण करने को आहार कहते हैं। औदारिक आदि शरीर के योग्य पुद्गल पिण्डों का ग्रहण करना आहार है।


उक्तं च-

आहरदि सरीराणं, तिण्हं एगदर-वग्गणाओ जं।

भासा-मणस्स णियदं, तम्हा आहारओ भणिओ।।[३०]
औदारिकवैक्रियिक-आहारकशरीराणां एकतरशरीरयोग्या: पुद्गलवर्गणा: भाषामनोयोग्यपुद्गलवर्गणाश्च य: नियमेन गृण्हाति स एवाहारक:। तद्विपरीतोऽनाहार:।
उक्तं च-
विग्गहगइमावण्णा, केवलिणो समुहदा अजोगी य।
सिद्धा य अणाहारा, सेसा आहारया जीवा।।
विग्रहगतिं प्राप्ता: चातुर्गतिकजीवा:, प्रतरलोकपूरणसमुद्घातप्राप्ता: सयोगकेवलिन:, अयोगकेवलिन: सिद्धाश्च अनाहारा:, शेषा आहारका: चेति। अत: आहारक-अनाहारकभेदात् द्विभेदयुक्ता इयं मार्गणा अस्ति।
अस्यैवोपसंहार:-अस्मिन् चतुर्थसूत्रे केवलं चतुर्दशमार्गणानां नामानि वर्णितानि सन्ति। अग्रे एषां विस्तर: स्वयमेव श्रीमद्भगवत्पुष्पदंतदेवो वक्ष्यति। तथापि श्रीवीरसेनाचार्येण प्रतिपादितटीकाधारेण संक्षिप्य मया किंचित् लक्षणं कथितं।
एवं तृतीयस्थले चतुर्दशमार्गणानाम् संक्षिप्त लक्षणनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
अधुना मार्गणासु अन्विष्यमाणानां गुणस्थानानां अनुयोगद्वारप्ररूपणार्थं पंचमसूत्रस्यावतारो भवति-
एदेसिं चेव चोद्दसण्हं जीवसमासाणं परूवणट्ठदाए तत्थ इमाणि अट्ठ अणियोगद्दाराणि णायव्वाणि भवंति।।५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतेषां चैव चतुर्दशानां जीवसमासानां-गुणस्थानानां प्ररूपणार्थतायां-कथनस्य प्रयोजने सति तत्र इमानि अष्टौ अनियोगद्वाराणि ज्ञातव्यानि भवन्ति।
‘तत्थ इमाणि अट्ठ अणियोगद्दाराणि’ एतदेवालं, शेषस्य नान्तरीयकत्वादिति चेन्नैष दोष:, मंदबुद्धि-सत्त्वानुग्रहार्थत्वात्। ‘अनुयोगो नियोगो भाषा विभाषा वत्र्तिका’ अनुयोगस्य इमानि पंच पर्यायवाचीनि नामानि सन्ति। इमे अष्टौ अधिकारा: अवश्यं ज्ञातव्या: भवन्ति, अन्यथा गुणस्थानावगमानुपपत्ते:।
तन्निश्चयार्थं आचार्यदेव: पृच्छासूत्रमाह-
तं जहा।।६।।


सिद्धान्तचिन्तामणि टीका- हिन्दी अनुवाद

गाथार्थ-औदारिक, वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीरों में से उदय को प्राप्त हुए किसी एक शरीर के योग्य तथा भाषा और मन के योग्य पुद्गलवर्गणाओं को जो नियम से ग्रहण करता है उसको आहारक कहते हैं। इससे विपरीत अर्थात् औदारिक आदि शरीर के योग्य पुद्गलपिण्ड के ग्रहण नहीं करने को अनाहारक कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-इस तरह विग्रह गति को प्राप्त होने वाले चारों गति के जीव प्रतर और लोकपूरण समुद्घात को प्राप्त हुए सयोगकेवली और अयोगकेवली तथा सिद्ध ये नियम से अनाहारक होते हैं। शेष जीवों को आहारक समझना चाहिए। इस प्रकार आहारक और अनाहारक के भेद से आहारमार्गणा दो प्रकार की है। अब इस मार्गणा प्रकरण का उपसंहार करते हैं-

इस चतुर्थसूत्र में केवल चौदह मार्गणाओं के नामों का वर्णन किया गया है आगे श्रीमत्पुष्पदन्त आचार्य भगवान् स्वयं ही इनका विस्तार करेंगे फिर भी श्रीवीरसेनाचार्य के द्वारा प्रतिपादित टीका के आधार से लेकर मैंने यहाँ कुछ लक्षण कहे हैं। इस प्रकार तृतीय स्थल में चौदह मार्गणाओं के संक्षिप्त लक्षण निरूपण की मुख्यता से दो सूत्र पूर्ण हुए। अब मार्गणाओं में अन्वेषण किये जाने वाले गुणस्थानों के आठ अनुयोगद्वारों के प्ररूपण करने के लिए पंचम सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ- इन ही चौदह जीवसमासों के (गुणस्थानों के) निरूपण करने रूप प्रयोजन के होने पर वहाँ आगे कहे जाने वाले ये आठ अनुयोगद्वार समझना चाहिए।।५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन्हीं चौदह जीवसमासों का अर्थात् गुणस्थानों का प्ररूपण करने की इच्छा से-कथन का प्रयोजन होने पर वहाँ ये आठ अनुयोगद्वार ज्ञातव्य-जानने योग्य होते हैं। ‘‘तत्थ इमाणि अट्ठ अणियोगद्दाराणि’’ इतना सूत्र बनाना ही पर्याप्त था क्योंकि सूत्र का शेष भाग इसका अविनाभावी है। अतएव उसका ग्रहण स्वयं हो जाता है उसे सूत्र में निहित करने की कोई आवश्यकता नहीं थी ? ऐसी आशंका होने पर समाधान करते हैं कि यह कोई दोष नहीं है क्योंकि मंदबुद्धि प्राणियों के अनुग्रह के लिए शेष भाग को सूत्र में ग्रहण किया गया है। अनुयोग, नियोग, भाषा, विभाषा और वत्र्तिका ये पाँचों ही अनुयोग के पर्यायवाची नाम हैं। ये आठों अधिकार अवश्य ज्ञातव्य हैं क्योंकि इनके ज्ञान के बिना गुणस्थानों का ज्ञान नहीं हो सकता है। इस प्रकार का निश्चय होने पर आचार्य पृच्छासूत्र को कहते हैं-

सूत्रार्थ-

वे आठ अधिकार जैसे हैं वैसे ही अगले सूत्र में कहे जाते हैं।।६।।

सिद्धान्तचिंतामणि टीका

सिद्धान्तचिंतामणि टीका-‘तद्’ तेषां अष्टानामनुयोगद्वाराणां निर्देश:। यथेति पृच्छा-कै: प्रकारै: सन्ति ? इति पृच्छायां अग्रिमसूत्रमवतरति। अथवा येन प्रकारेण परमागमे कथनमस्ति तेन प्रकारेणैवाग्रे निर्देश्यते।

ततोऽष्टानुयोगद्वारनामनिर्देशार्थं सप्तमसूत्रावतारो भवति-
संतपरूवणा दव्वपमाणाणुगमो खेत्ताणुगमो फोसणाणुगमो कालाणुगमो अंतराणुगमो भावाणुगमो अप्पाबहुगाणुगमो चेदि।।७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संतपरूवणा-सत्प्ररूपणा पदार्थानां अस्तित्वकथनं। दव्वपमाणाणुगमो-द्रव्याणां ज्ञातास्तित्वपदार्थानां प्रमाणं संख्या, तस्या: अनुगम: बोध: द्रव्यप्रमाणानुगम:, खेत्ताणुगमो-क्षेत्रं द्रव्याणां वर्तमानावगाह्यस्थानं तस्यानुगमो बोध: क्षेत्रानुगम:। फोसणाणुगमो-द्रव्याणां अतीतकालविशिष्ट-वर्तमानस्पर्शानां अनुगमो बोध: कथनं वा स्पर्शनानुगम:, कालाणुगमो-द्रव्याणां काल: स्थिति: तस्या: अनुगमो बोध: कथनं वा कालानुगम:, अंतराणुगमो-पदार्थानां अंतरं विरहकालं तस्य अनुगम: अंतरानुगम:। भावाणुगमो-पदार्थानां भावस्य परिणामस्य अनुगम: कथनं भावानुगम:। अप्पाबहुगाणुगमो चेदि-पदार्थानां अल्पबहुत्वस्यानुगम: कथनं वा अल्पबहुत्वानुगम: च इति।
इतो विस्तर:-अत्राष्टनुयोगद्वारेषु पूर्व-पूर्वानुयोगद्वाराणि उत्तरोत्तरानुयोगद्वारेभ्यो योनिभूतानि वर्तन्ते। यथा-सत्प्ररूपणा द्रव्यप्रमाणानुगमाय योनिभूतास्ति। अत: पूर्व-पूर्वअनुयोगद्वाराणि कारणानि उत्तरोत्तरानुयोग-द्वाराणि कार्याणि सन्ति।
उक्तं च-
अत्थित्तं पुण संतं, अत्थित्तस्स य तहेव परिमाणं। पच्चुप्पण्णं खेत्तं, अदीद-पदुप्पण्णणं फुसणं।।
कालो ट्ठिदि-अवघाणं, अंतरविरहो य सुण्णकालो य। भावो खलु परिणामो, स-णाम सिद्धं खु अप्पबहुं।।[३१]
सत्प्ररूपणा पदार्थानां अस्तित्वं कथयति, येषां पदार्थानामस्तित्वं ज्ञातं तेषामेव प्रमाणं संख्यानां प्रतिपादनं करोति द्रव्यप्रमाणानुयोग:, आभ्यां द्वाभ्यां ज्ञातास्तित्वप्रमाणानां पदार्थानां वर्तमानावगाहनां य: प्ररूपयति स क्षेत्रानुयोग:, त्रिभिरनुयोगद्वारै: ज्ञातसत्संख्याक्षेत्राणां पदार्थानां अतीतकाल-विशिष्ट-स्पर्शनं प्ररूपयति य: स: स्पर्शनानुयोग:, पूर्वोक्तसत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनानुयोगद्वारै: ज्ञातपदार्थानां य: स्थितिं मर्यादां कथयति स कालानुयोग:, पंचभिरेभिरनुयोगद्वारै: ज्ञातास्तित्वादीनां पदार्थानां य: विरहकालं शून्यकालं वर्णयति स अंतरानुयोग:, षड्भिरनुयोगद्वारै: ज्ञातपदार्थानां भावान् य: कथयति स भावानुयोग:, तेषामेव सप्तभिरनुयोगद्वारै: ज्ञातपदार्थानां ‘इमे अल्पा: इमे बहव:’ इति य: प्ररूपयति स अष्टम: अल्पबहुत्वानुयोग: कथ्यते।
एवं अस्मिन् ‘षट्खण्डागम’ नाम्नि परमागमे एभिरष्टानुयोगद्वारै: ‘जीवस्थानं’ नाम प्रथमखण्डं वक्ष्यते। अत्रापि अस्यां सत्प्ररूपणायां पीठिकाधिकारे चतुर्दशगुणस्थानप्रतिपादनार्थं ‘एदेसिं’ इत्यादि त्रिभि: सूत्रैश्चतुर्थस्थलं गतम्।
पंचकल्याणमेदिन्य: सातिशयस्थलानि च। यात्रानिर्विघ्नसिद्ध्यर्थं[३२] नमामश्चात्मशुद्धये।।१।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिभट्टारकविरचितषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्य-
विरचिते सत्प्ररूपणानाम्नि प्रथमप्रकरणे श्रीवीरसेनाचार्यकृत-धवलाटीकाप्रमुखानेकग्रन्थाधारेण
विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ती श्रीशान्तिसागरस्तस्य प्रथमपट्टाधीश:
श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचनाया: प्रेरिकागणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्त-
चिंतामणिनामटीकायां सप्तभि: सूत्रैः पीठिकाप्रतिपादक: प्रथमो महाधिकार: समाप्त:।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-हिन्दी अनुवाद

सूत्र में ‘तद्’ शब्द से आठ अनुयोगद्वारों का निर्देश किया गया है। ‘‘यथा’’ यह पद पृच्छा को प्रगट करता है अर्थात् ये आठ अनुयोगद्वार कौन से हैं ? ऐसा पूछे जाने पर अग्रिम सूत्र का अवतार होता है। अथवा जिस प्रकार से परमागम में कथन है उसी प्रकार से आगे निर्देश करते हैं। अब आठ अनुयोगद्वारों के नाम निर्देश करने के लिए सप्तम सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम ये आठ अनुयोगद्वार हैं।।७।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'पदार्थों के अस्तित्व का कथन करने वाली सत्प्ररूपणा है। द्रव्यों का-जिनका अस्तित्व जान लिया है ऐसे पदार्थों का प्रमाण बतलाने वाली संख्याप्ररूपणा है, उस संख्या का बोध कराने वाला द्रव्यप्रमाणानुगम है।

क्षेत्रानुगम-द्रव्यों का क्षेत्र-उनका वर्तमान अवगाह्य स्थान, उसका बोध कराने वाला क्षेत्रानुगम है। द्रव्यों के अतीतकालविशिष्ट वर्तमान स्पर्शों का बोध अथवा कथन स्पर्शनानुयोग करता है। द्रव्यों की कालस्थिति अथवा उसका बोध कराने का वर्णन जिसमें है वह कालानुगम है। पदार्थों के अन्तर-विरह काल का वर्णन अन्तरानुगम करता है। पदार्थों के भावों का-परिणामों का ज्ञान कराने वाला भावानुगम है और पदार्थों के अल्पबहुत्वपने का कथन कराने वाला अल्पबहुत्वानुगम है।

उसी का विस्तार करते हैं- यहाँ आठ अनुयोगद्वारों में पूर्व-पूर्व के अनुयोगद्वारों को उत्तरोत्तर अनुयोगद्वारों से जाना जाता है क्योंकि वे पूर्व की प्ररूपणायें योनिभूत हैं। यथा-सत्प्ररूपणा द्रव्यप्रमाणानुगम के लिए योनिभूत है। अत: पूर्व-पूर्व के अनुयोगद्वार कारण हैं और आगे-आगे के अनुयोगद्वार कार्यरूप हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-अस्तित्व का प्रतिपादन करने वाली प्ररूपणा को सत्प्ररूपणा कहते हैं। जिन पदार्थों के अस्तित्व का ज्ञान हो गया है ऐसे पदार्थों के परिमाण का कथन करने वाली संख्याप्ररूपणा है। वर्तमान क्षेत्र का वर्णन करने वाली क्षेत्रप्ररूपणा है। अतीतस्पर्श और वर्तमानस्पर्श का वर्णन करने वाली स्पर्शनप्ररूपणा है। जिससे पदार्थों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति का निश्चय हो उसे कालप्ररूपणा कहते हैं। जिसमें विरहरूप शून्यकाल का कथन हो उसे अन्तरप्ररूपणा कहते हैं। जो पदार्थों के परिणामों का वर्णन करे वह भावप्ररूपणा है तथा अल्पबहुत्वप्ररूपणा अपने नाम से ही प्रसिद्ध है। अर्थात् ‘ये कम हैं ये अधिक हैं’ ऐसा प्ररूपण करने वाली आठवीं अल्पबहुत्वप्ररूपणा है।

इस प्रकार इस ‘‘षट्खण्डागम’’ नामक परमागम में इन आठ अनुयोगद्वारों से ‘जीवस्थान’ नाम का प्रथम खण्ड कहेंगे। उसमें भी इस सत्प्ररूपणा के पीठिकाधिकार में चौदह गुणस्थानों का प्रतिपादन करने के लिए ‘‘एदेसिं’’ इत्यादि तीन सूत्रों के द्वारा चतुर्थस्थल पूर्ण हुआ।

श्लोकार्थ-तीर्थंकरों के पंचकल्याणक से पवित्र भूमियाँ अर्थात् तीर्थक्षेत्रों एवं अतिशय क्षेत्रों को हम अपनी यात्रा की निर्विघ्न सिद्धि (पूर्णता) के लिए तथा अपनी आत्मशुद्धि के लिए नमस्कार करते हैं।।१।।


इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदन्त भूतबली भट्टारक द्वारा रचित षट्खण्डागम के प्रथमखण्ड में श्रीमान् पुष्पदन्ताचार्य विरचित सत्प्ररूपणा नाम के प्रथम प्रकरण में श्री वीरसेनाचार्य-कृत धवलाटीका को प्रमुख करके तथा अनेक ग्रंथों के आधार से रचित बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शान्तिसागर महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागर जी की शिष्या जम्बूद्वीप रचना (हस्तिनापुर में निर्मित) की प्रेरिका गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि नाम की टीका में सात सूत्रों के द्वारा भूमिका को प्रतिपादित करने वाला प्रथम महाधिकार समाप्त हुआ।

टिप्पणी

  1. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १९३।
  2. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १९७।
  3. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. २२२।
  4. जयधवला-आ. पत्र ३१३ (कसायपाहुड़ प्रस्तावना पृ. ११ से)।
  5. तत्त्वार्थसूत्र अ. ९, सूत्र २५।
  6. अत्राष्टाविंशतिसहस्रायतासु प्रकरणस्यार्थो नावबुध्यते।
  7. अत्राप्यर्थो नावबुध्यते।
  8. अत्र ‘अतीसार’ शब्द: संगतं प्रतीयते।
  9. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक ९, पृ. २५३ से २५७।
  10. मूलाचार गाथा २७३।
  11. मूलाचार गाथा २७८।
  12. मूलाचार गाथा २७९।
  13. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. १३४-१३५।
  14. गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा १४१।
  15. जब यह प्रकरण लिखा तब ३०-११-१९९५ को मैं मेरठ में थी।
  16. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. १३६।
  17. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित) पुस्तक १, पृ. १३८।
  18. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४०।
  19. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४१।
  20. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४२।
  21. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४३।
  22. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४५।
  23. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४६।
  24. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १४६-१५०।
  25. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १५१।
  26. उपरोक्त विषय यहीं पर दिनाँक १२-१२-९५ को लिखा गया था।
  27. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १५१।
  28. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १५३।
  29. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १५३।
  30. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १५३।
  31. षट्खण्डागम (धवला टीका समन्वित), पुस्तक १, पृ. १६०।
  32. मांगीतुंगी यात्रा के लिए मार्ग के विहार में २३-१२-१९९५ को लिखते हुए यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न हो यह भावना भायी है।