028.द्वितीय महाधिकार - टीकाकर्त्री का मंगलाचरण.......

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विषय सूची

द्वितीय महाधिकार - टीकाकर्त्री का मंगलाचरण

मंगलाचरणं


सिद्धान् नत्वा गुणस्थाना-तीतानन्तगुणान्वितान्।
वंदामहे त्रिसंध्यं ता - ननन्तगुणलब्धये।।१।


अथ स्थलषट्केन षोडशसूत्रै: गुणस्थानप्रतिपादनत्वेन द्वितीयो महाधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सत्प्ररूपणाया: द्वैविध्यकथनप्रतिज्ञारूपेण ‘‘संतपरूवणदाए’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु द्वितीयस्थले ‘‘ओघेण अत्थि’’ इत्यादिसूत्रमािंद कृत्वा बहिरात्मावस्थाप्रतिपादनपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले ‘‘असंजद’’ इत्यादिना अन्तरात्मावस्थाप्ररूपणत्वेन चत्वारि सूत्राणि। तदनंतरं चतुर्थस्थले ‘‘अपुव्वकरण’’ इत्यादिना श्रेण्यारोहणयतीनां परिणामविशुद्धिगुणस्थानपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि। तत्पश्चात् पंचमस्थले उत्कृष्टान्तरात्मनां वीतरागछद्मस्थमुनीनां कथनत्वेन ‘‘उवसंत’’ इत्यादिना द्वे सूत्रे। तदनु षष्ठस्थले परमात्मनां स्वरूपप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘सजोग’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि इति समुदायपातनिका।
अधुना तावत् प्रथमस्य सदनुयोगस्य स्वरूपनिरूपणायाष्टमसूत्रस्यावतार: क्रियते श्रीपुष्पदन्तभट्टारकेण-
संतपरूवणदाए दुविहो णिद्देसो, ओघेण आदेसेण य।।८।।

अब द्वितीय महाधिकार प्रारम्भ होता है

मंगलाचरण

श्लोकार्थ—जिन्होंने गुणस्थानों से अतीत-रहित अवस्था को प्राप्त कर लिया है तथा जो अनंतगुणों से समन्वित हैं ऐसे सम्पूर्ण सिद्ध परमेष्ठियों को हम अनंतगुणों की प्राप्ति के लिए नमस्कार करते हैं।।१।।

अब छह स्थलों में सोलह सूत्रों के द्वारा गुणस्थान प्रतिपादन की मुख्यता से द्वितीय महाधिकार प्रारम्भ किया जाता है। उनमें सर्वप्रथम पहले स्थल में सत्प्ररूपणा को दो प्रकार से कहने की प्रतिज्ञारूप से ‘‘संतपरूवणदाए’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में ‘‘ओघेण अत्थि’’ इत्यादि सूत्र को आदि में करके बहिरात्म अवस्था के प्रतिपादन की मुख्यता से तीन सूत्र हैं। उससे आगे तृतीयस्थल में ‘‘असंजद’’ इत्यादि के द्वारा अंतरात्म अवस्था के कथन की मुख्यता से चार सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल मे ‘‘अपुव्वकरण’’ इत्यादि के द्वारा श्रेणी आरोहण करने वाले यतियों के परिणामविशुद्धिरूप गुणस्थान की मुख्यता से तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचमस्थल में उत्कृष्ट अंतरात्मा वीतराग छद्मस्थ मुनियों का वर्णन करने की मुख्यता से ‘‘उवसंत’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके बाद छठे स्थल में परमात्मा के स्वरूप प्रतिपादन की मुख्यता से ‘‘सजोग’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं, इस प्रकार यह समुदायपातनिका हुई। अब पहले प्रथम सदनुयोग के स्वरूप का निरूपण करने के लिए श्रीपुष्पदन्तभट्टारक अष्टम सूत्र का अवतरण करते हैं—

सूत्रार्थ—

सत्प्ररूपणा में ओघ अर्थात् सामान्य की अपेक्षा से और आदेश अर्थात् विशेष की अपेक्षा से इस तरह दो प्रकार का कथन है।।८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र संतपरूवणदाए-चतुर्दशगुणस्थानानां सत्प्ररूपणायां सत्-सत्त्वं अस्तित्वं, प्ररूपणा निरूपणा प्रज्ञापना तस्यां, चतुर्दशगुणस्थानसत्त्वप्ररूपणायामित्यर्थ:। सत् शब्द: शोभनवाचक: अस्तित्ववाचकश्च। अत्र अस्तित्ववाचको ग्राह्य:। णिद्देसो-निर्देश: प्ररूपणं विवरणं व्याख्यानमिति। दुविहो-स: निर्देश: द्विविध:। ओघेण आदेसेण य-ओघेन सामान्येन अभेदेन, आदेशेन भेदेन विशेषेण च प्ररूपणमिति। न च प्ररूपणायास्तृतीय: प्रकारोऽस्ति।

इतो विस्तर:-अस्मिन् ग्रन्थे गुणस्थानं ‘जीवसमास’ शब्देन कथ्यते। तस्यैव स्पष्टीकरणं-जीवा: सम्यगासतेऽस्मिन्निति जीवसमासा:।
क्वासते ? गुणेषु। के गुणा ? औदयिकौपशमिकक्षायिकक्षायोपशमिकपारिणामिका इति गुणा:। एतद्गुणसहचरितत्वादात्मापि गुणसंज्ञां लभते। अतो जीवसमासेनात्र गुणस्थानानि कथ्यन्ते।
गुणस्थानस्य किं लक्षणम् ?
उक्तं च-
जेहिं दु लक्खिज्जंते, उदयादिसु संभवेहिं भावेहिं।
जीवा ते गुणसण्णा, णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं।।
दर्शनमोहनीयादिकर्मणां उदयोपशमादिअवस्थासु सतीषु संभवैर्यै: भावैर्युक्ता: ये जीवा: लक्ष्यन्ते, सर्वदर्शिभि: भगवद्भि:, ते जीवा एव गुणसंज्ञा: निर्दिष्टा:-गुणस्थानसंज्ञिता: कथिता:। तेषां जीवानां भावानां गुणस्थानसंज्ञा: कथ्यन्ते इत्यर्थ:।
तानि गुणस्थानानि चतुर्दश भवन्ति-
मिच्छो सासण मिस्सो, अविरदसम्मो य देसविरदो य।
विरदो पमत्त इदरो, अपुव्व-अणियट्टि-सुहुमो य।।
उवसंत-खीणमोहो, सजोग-केवलिजिणो अजोगी य।
चउदस जीवसमासा, कमेण सिद्धा य णायव्वा।।
अत्रौघेन गुणस्थानं आदेशेन मार्गणाग्रहणं इत्यपि सूच्यते-
उक्तं च-
संखेओ ओघो त्ति य, गुणसण्णा सा च मोहजोग भवा।
वित्थारादेसो त्ति य, मग्गणसण्णा स कम्मभवा।।
संक्षेप इति ओघ इति च गुणस्थानस्य संज्ञा अनादिनिधनार्थे रूढा प्रसिद्धा, इमौ द्वौ गुणस्थानस्य पर्यायवाचिनौ स्त:। सा च संज्ञा मोहयोगाभ्यां संजाता भवति। सामान्यं चापि गुणस्थानस्य संज्ञा भवति। तथा विस्तार आदेशो विशेषश्चेति मार्गणाया: पर्यायवाचिन: सन्ति।
एवं सत्प्ररूपणानिरूपणपरत्वेन गुणस्थान-मार्गणयो: द्वैविध्यकथनप्रतिज्ञारूपेण एकं सूत्रं गतम्।

अत्राप्यधुना अनन्तसंसारिजीवानां सामान्यगुणस्थानरूपेण प्रथमगुणस्थानस्वरूपनिरूपणार्थं सूत्रस्यावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण-ओघेण अत्थि मिच्छाइट्ठी।।९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ओघेण-सामान्येन गुणस्थानापेक्षया वा, अत्थि मिच्छाइट्ठी-सन्ति मिथ्यादृष्टय:। मिथ्या वितथा व्यलीका असत्या दृष्टिर्दर्शनं विपरीतैकान्तविनयसंशयाज्ञानरूपमिथ्यात्वकर्मोदय-जनिता येषां ते मिथ्यादृष्टय:।
कश्चिदाह-द्वित्र्यादि अनेकभेदा: कथिता: सन्ति पुन: कथं पंचविधनियमो संभवेत् ?
श्रीवीरसेनाचार्य: समाधत्ते-नैतद् नियमोऽस्ति,किंतूपलक्षणमात्रमेतदभिहितं पंचविधं मिथ्यात्वमिति। अथवा मिथ्या वितथं, तत्र दृष्टि: रुचि: श्रद्धा प्रत्ययो येषां ते मिथ्यादृष्टय:। उक्तं च-
मिच्छत्तं वेयंतो, जीवो विवरीय-दंसणो होई।
ण य धम्मं रोचेदि हु, महुरं खु रसं जहा जरिदो।।
मिथ्यात्वप्रकृत्युदयेन मिथ्यात्वभावं अनुभवन् जीव: विपरीतश्रद्धावान् भवति, यथा पित्तज्वररोगिणे मधुररसो न रोचते तथैव अस्मै जीवाय धर्मो न रोचते।
पुनरपि मिथ्यात्वस्य लक्षणं भेदांश्च निरूपयति-
तं मिच्छत्तं जमसद्दहणं तच्चाण होइ अत्थाणं।
संसइदमभिग्गहिदं, अणभिग्गहिदं ति तं तिविहं।।
मिथ्यात्वकर्मोदयेन जीवस्य तत्त्वार्थानां विषये यत् अश्रद्धानं भवति तन्मिथ्यात्वं, तस्य संशयित- अभिगृहीत-अनभिगृहीतापेक्षया त्रयो भेदा: सन्ति। अथवा-
जावदिया वयणपहा, तावदिया चेव होंति णयवादा।
जावदिया णयवादा, तावदिया चेव परसमया।।
अतएव यावन्तो वचनमार्गा:, तावन्तश्चैव नयवादा: यावन्त: नयवादा: तावंतश्चैव परसमया: अनेकान्तमतबाह्या इति।
एवं स्थूलांशाश्रयेण मिथ्यात्वस्य पंचविधत्वादिकं कथितं, सूक्ष्मांशाश्रयेणासंख्यातलोकमात्रविकल्प-संभवात् तत्र व्यवहारानुपपत्ते:।
अन्यत्र ग्रन्थे-गोम्मटसारकर्मकाण्डे-
मिथ्यात्वस्य त्रिषष्टि-उत्तरत्रिशतभेदा अपि कथिता: सन्ति।
कश्चिदाह-अत्र सूत्रे ‘ओघेण’ पदमनर्थकं अस्ति पूर्वसूत्रे गृहीतत्वात् तस्य संबंधो वर्तत एव ?

नैतद्वक्तव्यं,‘‘तस्य दुर्मेधोजनानुग्रहार्थत्वात्। सर्वसत्त्वानुग्रहकारिणो हि जिना: नीरागत्वात्।’’ इति धवलाकारेण कृतानि वाक्यानि सूत्रकाराचार्यं प्रति जिनत्वं स्थापयन्ति।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका—यहाँ सत्त्वप्ररूपणा में चौदह गुणस्थानों का सत्त्व-अस्तित्व है ऐसा सम्बन्ध कर लेना चाहिए और प्ररूपणा-निरूपण-कथन किया गया है ऐसा अर्थ निकलता है। यहाँ प्ररूपणा, निरूपणा, प्रज्ञापना ये सब पर्यायवाची नाम हैं। इसलिए ‘‘चतुर्दशगुणस्थानसत्वप्ररूपणायां’’ इस पद का अर्थ यह हुआ कि चौदह गुणस्थानों से सत्त्व के निरूपण करने में ‘‘सत्’’ शब्द शोभन अर्थात् सुन्दर अर्थ का भी वाचक है और अस्तित्व का भी वाचक है। उनमें से यहाँ पर अस्तित्ववाचक ग्रहण करना चाहिए।

निर्देश, प्ररूपण, विवरण और व्याख्यान ये सब पर्यायवाची नाम हैं। यह निर्देश ओघ और आदेश की अपेक्षा दो प्रकार का है। ओघ-सामान्य या अभेद से निरूपण करना पहली ओघप्ररूपणा है और आदेश-भेद या विशेष रूप से निरूपण करना दूसरी आदेश प्ररूपणा है। इनके अतिरिक्त प्ररूपणा का कोई तृतीय प्रकार नहीं है।

इसी का विस्तार करते हैं—इस ग्रंथ में ‘‘जीवसमास’’ शब्द से गुणस्थान को कहा गया है। उसी का स्पष्टीकरण-जीव जिसमें सम्यक्-भली प्रकार से रहते हैं अर्थात् पाये जाते हैं उन्हें जीवसमास कहते हैं।

जीव कहाँ रहते हैं ? गुणों में जीव रहते हैं। वे गुण कौन से हैं ? औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और पारिणामिक ये पाँच गुण हैं। इन गुणों के साहचर्य से आत्मा भी गुण संज्ञा को प्राप्त होता है। अत: यहाँ ‘जीवसमास’ शब्द से गुणस्थानों का कथन किया गया है। गुणस्थान का क्या लक्षण है ? सो ही कहा है—

गाथार्थ—दर्शन मोहनीय आदि कर्मों के उदय आदि अवस्थाओं में जीव के जो परिणामों की उत्पत्ति होती हैं, उनको ही सर्वज्ञदेव ने गुणस्थान नाम से कहा है।

दर्शनमोहनीय आदि कर्मों के उदय, उपशम आदि अवस्थाओं के होने पर उत्पन्न हुए जिन परिणामों से युक्त जो जीव देखे जाते हैं उन जीवों को सर्वज्ञदेव ने गुणसंज्ञा वाला कहा है अर्थात् गुणस्थान संज्ञा वाला कहा है। उन जीवों के भावों को गुणस्थान संज्ञा से कहते हैं ऐसा अभिप्राय हुआ। वे गुणस्थान चौदह होते हैं—

गाथार्थ—मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरतसम्यक्त्व, देशविरत, प्रमत्तविरत, अप्रमत्तविरत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसाम्पराय, उपशान्तमोह, क्षीणमोह, सयोगिकेवलीजिन और अयोगिजिन ये चौदह जीवसमास-गुणस्थान हैं। उसके पश्चात् सिद्धों को गुणस्थानातीत जानना चाहिए।।

यहाँ ‘ओघ’ शब्द से गुणस्थान और ‘आदेश’ शब्द से मार्गणा का ग्रहण किया है इस बात को भी सूचित करते हैं- कहा भी है-

गाथार्थ—संक्षेप, ओघ और गुणस्थान ये पर्यायवाची नाम हैं जो कि मोह और योग के निमित्त से होते हैं तथा विस्तार, आदेश और मार्गणा ये पर्यायवाची हैं जो कि कर्म के निमित्त से उत्पन्न होते हैं।।

संक्षेप और ओघ यह गुणस्थान की संज्ञा अनादिनिधन अर्थ में रूढ़-प्रसिद्ध है, ये दोनों गुणस्थान के ही पर्यायवाची नाम है और वह संज्ञा मोह तथा योग से उत्पन्न होती है। और ‘सामान्य’ संज्ञा भी गुणस्थान की होती है तथा विस्तार, आदेश एवं विशेष यह मार्गणा के पर्यायवाची हैं। इस प्रकार सत्प्ररूपणा के निरूपण की मुख्यता से गुणस्थान और मार्गणा के दो प्रकार के कथन की प्रतिज्ञारूप से एक सूत्र पूर्ण हुआ। यहाँ अब अनंतसंसारी जीवों का सामान्य गुणस्थानरूप से श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्य प्रथमगुणस्थान के स्वरूप का कथन करने के लिए सूत्र का अवतार करते हैंं—

सूत्रार्थ—

सामान्य से गुणस्थान की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव हैं।।९।।

सिद्धांतचिंतामणि टीका—ओघ से-सामान्य से अथवा गुणस्थान की अपेक्षा से मिथ्यादृष्टि होते हैं। मिथ्या, वितथा, व्यलीक और असत्य ये एकार्थवाची नाम हैं, दृष्टि शब्द का अर्थ दर्शन या श्रद्धान है। इससे यह तात्पर्य हुआ कि जिन जीवों के विपरीत, एकान्त, विनय, संशय और अज्ञानरूप मिथ्यात्व कर्म के उदय से उत्पन्न हुई मिथ्यारूप दृष्टि होती है उन्हें मिथ्यादृष्टि जीव कहते हैं।

यहाँ कोई कहता है कि दो, तीन आदि अनेक भेद कहे गये हैं पुन: पाँच प्रकार के मिथ्यात्व का नियम कैसेसंभव है ? तब श्रीवीरसेनाचार्य समाधान करते हैं कि ऐसा कोई नियम नहीं है किन्तु उपलक्षण मात्र से मिथ्यात्व के पाँच भेद होते हैं। अथवा मिथ्या शब्द का अर्थ वितथ और दृष्टि शब्द का अर्थ रुचि, श्रद्धा या प्रत्यय है। जिन जीवों की रुचि असत्य में होती है उन्हें मिथ्यादृष्टि कहते हैं कहा भी है-

गाथार्थ—मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से उत्पन्न होने वाले मिथ्यात्व भाव का अनुभव करने वाला जीव विपरीत श्रद्धा वाला होता है। जिस प्रकार पित्तज्वर से युक्त जीव को मधुर रस अच्छा नहीं लगता है उसी प्रकार उसे यथार्थ धर्म अच्छा नहीं मालूम होता है। पुन: मिथ्यात्व के लक्षण और भेदों का निरूपण करते हैं—

गाथार्थ—जो मिथ्यात्व कर्म के उदय से तत्त्वार्थ के विषय में अश्रद्धान उत्पन्न होता है अथवा विपरीत श्रद्धान होता है उसको मिथ्यात्व कहते है। उसके संशयित, अभिगृहीत और अनभिगृहीत इस प्रकार तीन भेद हैं। अथवा—

गाथार्थ—जितने भी वचन-मार्ग हैं उतने ही नयवाद अर्थात् नय के भेद हैं और जितने नयवाद हैं उतने ही परसमय-अनेकान्त से बाह्य मत होते हैं। इस प्रकार स्थूल अंश के आश्रय से मिथ्यात्व के पाँचप्रकारपना आदि को कहा है और सूक्ष्म अंश के आश्रय से असंख्यातलोकप्रमाण विकल्प भी संभव हैं क्योंकि व्यवहार में उनकी उपपत्ति-प्राप्ति नहीं होती है। अन्यत्र गोम्मटसार कर्मकाण्ड ग्रंथ में— मिथ्यात्व के तीन सौ त्रेसठ उत्तर भेद कहे गए हैं। कोई शंका करता है कि यहाँ सूत्र में ‘‘ओघेण’ पद अनर्थक है क्योंकि पूर्वसूत्र में ग्रहण किया जा चुका है उसका सम्बन्ध तो चला ही आ रहा है ? उसका समाधान करते हुए कहते हैं कि ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि अल्पबुद्धि या मूढ़जनों के अनुग्रह के लिए सूत्र में ‘ओघ’ शब्द का उल्लेख किया है। जिनदेव सम्पूर्ण प्राणियों का अनुग्रह करने वाले होते हैं क्योंकि वे वीतरागी हैं। धवलाकार श्रीवीरसेनस्वामी के द्वारा कहे गये ये वाक्य सूत्रकार आचार्य के प्रति जिनत्व की स्थापना करते हैं अर्थात् श्रीपुष्पदन्ताचार्य के प्रति अनन्यश्रद्धा को व्यक्त करते हैं। अब आचार्यदेव द्वितीय गुणस्थान के स्वरूप का निरूपण करते हैं—

संप्रति द्वितीयगुणस्थानस्वरूपं निरूपयत्याचार्यदेव:-

सासणसम्माइट्ठी।।१०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सासणसम्माइट्ठी-असनं क्षेपणं सम्यक्त्वविराधनं, तेन सह वर्तते य: स सासन:४ इति निरुक्त्या सासनाश्च सम्यग्दृष्टयश्च सासनसम्यग्दृष्टय: इति। अथवा आसादनं सम्यक्त्वविराधनं सह आसादनेन वर्तते इति सासादन:। विनाशितसम्यग्दर्शनोऽप्राप्तमिथ्यात्वोदयजनितपरिणामो मिथ्यात्वाभिमुख: सासादन: इति भण्यते।
कश्चिदाह-सासादनगुणस्थानवर्ती जीव: न स्यान् मिथ्यादृष्टि: मिथ्यात्वकर्मण उदयाभावात्, न सम्यग्दृष्टि: सम्यक्रुचेरभावात्, न सम्यग्मिथ्यादृष्टि: उभयविषयरुचेरभावात्। न च चतुर्थी दृष्टिरस्ति, ततो नैतद्गुणस्थानं सिद्ध्यति ?
तस्य समाधानं क्रियते-सम्यग्दर्शनचारित्रप्रतिबन्ध्यनन्तानुबंध्युदयोत्पादितविपरीताभिनिवेशस्य तत्र सत्त्वात् भवति मिथ्यादृष्टिरपि तु मिथ्यात्वकर्मोदयजनितविपरीताभिनिवेशाभावात् न तस्य मिथ्यादृष्टिव्यपदेश:, किन्तु ‘सासादन’ इति व्यपदिश्यते। किंच अनन्तानुबंधिनां द्विस्वभावत्वप्रतिपादनफलत्वात्। अस्य गुणस्थानवर्तिन: विपरीताभिनिवेशोऽभूत् अनन्तानुबंधिन:, न तद्दर्शनमोहनीयं तस्य चारित्रावरणत्वात्। विवक्षितदर्शनमोहोदयोपशमक्षयक्षयोपशममन्तरेण उत्पन्नत्वात् पारिणामिक: सासादनगुण: इति।
विपरीताभिनिवेशदूषितस्य तस्य कथं सम्यग्दृष्टित्वं ?
नैतद् वक्तव्यं, भूतपूर्वगत्या तस्य सम्यग्दृष्टित्वव्यपदेशोपपत्तेरिति।
उक्तं च-
सम्मत्तरयणपव्वय, सिहरादो मिच्छभूमि-समभिमुहो।
णासियसम्मत्तो सो, सासणणामो मुणेयव्वो।।
सम्यक्त्वरत्नपर्वतस्य शिखरात् पतित: कश्चिद् जीवो मिथ्यात्वभूमिसमभिमुख एव न चाधोपतित:, किन्तु विराधितसम्यक्त्व: असौ सासादनगुणस्थानवर्ती ज्ञातव्य:।
प्रथमोपशमसम्यक्त्वकाले जघन्येन एकसमये उत्कृष्टेन आवलिषट्के चावशिष्टे सति अनंतानुबंधिकषाय-चतुष्के अन्यतमकषायस्योदये जाते यो विनाशितसम्यक्त्वो जायते स सासादन इत्युच्यते। अथवा द्वितीयोपशम-सम्यक्त्वकालेऽपि सासादनगुणस्थानप्राप्तिर्भवतीति कषायप्राभृताभिप्रायो भवति।

इदानीं तृतीयगुणस्थानस्वरूपप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-सम्मामिच्छाइट्ठी।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र ‘‘सम्मामिच्छाइट्ठी’’ सम्यक् समीचीना च मिथ्या च दृष्टिर्यस्यासौ सम्यग्मिथ्यादृष्टि:। दृष्टि: श्रद्धा रुचि: प्रत्यय: इति यावत्।
न चैतत्काल्पनिकं, पूर्वस्वीकृतदेवतापरित्यागेनार्हन्नापि देव: इत्यभिप्रायवत: पुरुषस्योपलम्भात्। अस्मिन् गुणस्थाने क्षायोपशमिको भावोऽस्ति। तद्यथा-मिथ्यात्वकर्मण: सर्वघातिस्पद्र्धकानामुदयक्षयात् तस्यैव सत: उदयाभावलक्षणोपशमात्सम्यग्मिथ्यात्वकर्मण: सर्वघातिस्पद्र्धकोदयात् चोत्पद्यते इति सम्यग्मिथ्यात्वगुण: क्षायोपशमिक:।
उक्तं च-
दहिगुडमिव वामिस्सं, पुहभावं णेव कारिदुं सक्कं।
एवं मिस्सयभावो, सम्मामिच्छो त्ति णायव्वो।।
जात्यन्तरसर्वघातिकार्यरूपसम्यग्मिथ्यात्वप्रकृत्युदयेन जीवस्य युगपत्सम्यक्त्वमिथ्यात्वशबलितपरिणामो भवति। अयं गुणस्थानवर्ती सकलसंयमं देशसंयमं वा न गृण्हाति, तथा च चतुर्गतिनिबन्धनानि आयूंष्यपि न बध्नाति, मरणकाले नियमेन सम्यग्मिथ्यात्वपरिणामं त्यक्त्वा असंयतसम्यग्दृष्टित्वं वा मिथ्यादृष्टित्वं वा नियमेन प्राप्यैव पश्चात् म्रियते। अस्मिन् मिश्रगुणस्थाने मारणान्तिकसमुद्घातोऽपि नास्ति। इत्थं तृतीयगुणस्थानं संक्षेपेण कथितम्।
एवं मिथ्यात्वस्य तदनुभयरूपसासादनस्य तदुभयमिश्ररूपगुणस्थानस्य च प्रतिपादनपरं द्वितीयान्तरा-धिकारेण सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना जघन्यान्तरात्मन: सम्यग्दृष्टेर्गुणस्थानप्ररूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-
असंजदसम्माइट्ठी।।१२।।

अब आचार्यदेव द्वितीय गुणस्थान के स्वरूप का निरूपण करते हैं—

सूत्रार्थ—

सामान्य से सासादन सम्यग्दृष्टि जीव हैं।।१०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटी का—सासादनसम्यग्दृष्टि का अर्थ है-असन अर्थात् क्षेपण-सम्यक्त्व की विराधना, उस विराधना के साथ जो वर्तन करता है वह सासन है इस निरुक्ति से सासन और सम्यग्दृष्टि इनका द्वन्द्व समास करने से ‘‘सासनसम्यग्दृष्टि’ यह पद बनता है। जहाँ सम्यग्दर्शन का विनाश हो गया है किन्तु मिथ्यात्व कर्म के उदय से उत्पन्न हुए मिथ्यात्व परिणामों की प्राप्ति नहीं हुई है फिर भी मिथ्यात्व गुणस्थान के अभिमुख जो जीव हैं उन्हें सासादन कहते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है—सासादनगुणस्थानवर्ती जीव न तो मिथ्यादृष्टि है क्योंकि उसके मिथ्यात्व कर्म का उदय नहीं होता है, सम्यक् श्रद्धा के अभाव में वह सम्यग्दृष्टि भी नहीं रहता है। पुन: न तो वह सम्यग्मिथ्यादृष्टि है क्योंकि उसके दोनों प्रकार की रुचि का भी अभाव रहता है। इनके अतिरिक्त और कोई चौथी दृष्टि है नहीं, इसलिए इस सासादन गुणस्थान की सिद्धि नहीं बन सकती है ?

आचार्य देव उसका समाधान करते हैं—सम्यग्दर्शन और चारित्र का प्रतिबंध करने वाले अनंतानुबन्धी कषाय के उदय से उत्पन्न हुआ विपरीताभिनिवेश दूसरे गुणस्थान में पाया जाता है इसलिए द्वितीय गुणस्थानवर्ती जीव मिथ्यादृष्टि है। किन्तु मिथ्यात्व कर्म के उदय से उत्पन्न हुआ विपरीताभिनिवेश वहाँ नहीं पाया जाता है इसलिए उसे मिथ्यादृष्टि नहीं कहते हैं किन्तु सासादनसम्यग्दृष्टि कहते हैं। दूसरी बात यह है कि अनंतानुबंधी प्रकृतियों की द्विस्वभावता का कथन सिद्ध हो जाता है। इस गुणस्थानवर्ती विपरीताभिनिवेश से युक्त अनंतानुबन्धी कषाय वाले जीव के दर्शनमोहनीय का उदय नहीं होता है क्योंकि उनके चारित्रावरण का उदय रहता है। विवक्षित दर्शनमोहनीय कर्म के उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशम के बिना उत्पन्न होने से सासादनगुणस्थान पारिणामिक है ऐसा सिद्ध हो जाता है।

शंका—विपरीताभिनिवेश से दूषित उस जीव के सम्यग्दृष्टिपना कैसे हो सकता है ?

समाधान—ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि पहले तो वह सम्यग्दृष्टि था इसलिए भूतपूर्व न्याय की अपेक्षा उसके सम्यग्दृष्टि संज्ञा बन जाती है। कहा भी है-

गाथार्थ—सम्यग्दर्शनरूपी रत्नगिरि के शिखर से गिरकर जो जीव मिथ्यात्वरूपी भूमि के अभिमुख है अतएव जिसका सम्यग्दर्शन नष्ट हो चुका है परन्तु मिथ्यादर्शन की प्राप्ति नहीं हुई है उसे सासन अर्थात् सासादनगुणस्थानवर्ती समझना चाहिए। सम्यक्त्वरूपी रत्नपर्वत के शिखर से गिरा हुआ कोई जीव मिथ्यात्वरूपी भूमि के अभिमुख है, वह अभी नीचे गिरा नहीं है किन्तु उसके सम्यक्त्व की विराधना हो चुकी है उसे सासादनगुणस्थानवर्ती जानना चाहिए।

प्रथमोपशम सम्यक्त्व के काल में जघन्य से एक समय में, उत्कृष्ट से छह आवली के शेष रहने पर अनंतानुबंधि कषाय चतुष्क में से किसी एक के उदय आ जाने पर जो सम्यक्त्व का विनाश हो जाता है वह ‘सासादन’ कहा जाता है। अथवा द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के काल मेें भी सासादन गुणस्थान की प्राप्ति होती है ऐसा कषायप्राभृत ग्रंथ का अभिप्राय है। अब तृतीय गुणस्थान का स्वरूप बतलाने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ—

सामान्य से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव हैं।।११।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—यहाँ ‘‘सम्मामिच्छाइट्ठी’’ पद से सम्यक्-समीचीन और मिथ्या, दृष्टि-रुचि दोनों प्रकार का मिश्ररूप श्रद्धान है जिसके वह सम्यग्मिथ्यादृष्टि है। दृष्टि, श्रद्धा, रुचि और प्रत्यय ये एकार्थवाची हैं। यह सब कथन काल्पनिक नहीं हैं क्योंकि पूर्व स्वीकृत अन्य देवता के अपरित्याग के साथ-साथ अरिहंत भी देव हैं। ऐसा अभिप्राय वाला पुरुष पाया जाता है। इस मिश्र गुणस्थान में क्षायोपशमिक भाव है। वह इस प्रकार है— वर्तमान समय में मिथ्यात्व कर्म के सर्वघाति स्पर्धकों का उदयाभावी क्षय होने से, सत्ता में रहने वाले उसी मिथ्यात्व कर्म के सर्वघाति स्पर्धकों का उदयाभावक्षय लक्षण उपशम होने से और सम्यग्मिथ्यात्व कर्म के सर्वघातिस्पर्धकों के उदय होने से सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान पैदा होता है। इसलिए वह क्षायोपशमिक है। कहा भी है-

गाथार्थ—जिस प्रकार दही और गुड़ को मिला देने पर उनको अलग-अलग नहीं अनुभव किया जा सकता है किन्तु मिले हुए उन दोनों का रस मिश्रभाव को प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार एक ही काल में सम्यक्त्व और मिथ्यात्वरूप मिले हुए परिणामों को मिश्रगुणस्थान कहते हैं ऐसा समझना चाहिए।

जात्यन्तरसर्वघातिकार्यरूप सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से जीव के युगपत् सम्यक्त्व मिथ्यात्व सहित परिणाम होता है। इस गुणस्थानवाला जीव सकलसंयम अथवा देशसंयम को ग्रहण नहीं करता है तथा चारों गतियों का निबन्धन-प्राप्त कराने वाली आयु का बंध भी नहीं करता है। मरणकाल में वह नियम से सम्यग्मिथ्यात्व परिणाम को छोड़कर असंयतसम्यग्दृष्टि अथवा मिथ्यादृष्टि गुणस्थान को प्राप्त करके ही मरता है। अर्थात् मिश्रगुणस्थान में मरण नहीं होता है। इस मिश्रगुणस्थान में मारणान्तिक समुद्घात भी नहीं होता है। इस प्रकार संक्षेप से तृतीयगुणस्थान का लक्षण कहा है। इस प्रकार मिथ्यात्व गुणस्थान का, मिथ्यात्व-सम्यक्त्व दोनों से रहित सासादन गुणस्थान एवं सम्यग्मिथ्यात्व से मिश्रित परिणामरूप मिश्र गुणस्थान के प्रतिपादन की मुख्यता से द्वितीय अंतराधिकार के द्वारा तीन सूत्र हुए। अब जघन्य अंतरात्मा के सम्यग्दृष्टियों का गुणस्थान बताने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव हैं।।१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-समीचीना दृष्टि: श्रद्धा यस्यासौ सम्यग्दृष्टि:, असंयतश्चासौ सम्यग्दृष्टिश्च असंयतसम्यग्दृष्टि:। सोऽपि सम्यग्दृष्टि: त्रिविध:-क्षायिकसम्यग्दृष्टि: वेदकसम्यग्दृष्टि: उपशमसम्यग्दृष्टिश्चेति। दर्शनचरणगुणघातिचतुरनन्तानुबंधिप्रकृतीनां मिथ्यात्व-सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्व त्रिदर्शनमोहप्रकृतीनां चैतासां सप्तप्रकृतीनां निरवशेषक्षयेण क्षायिकसम्यग्दृष्टिरुच्यते। एतासामेव सप्तप्रकृतीनां उपशमेन उपशमसम्यग्दृष्टि-र्भवति। सम्यक्त्वसंज्ञितदर्शनमोहनीयभेदकर्मण: उदयेन वेदकसम्यग्दृष्टिर्गीयते।

तत्र क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्न कदाचिदपि मिथ्यात्वं गच्छति, न संदेहमपि करोति, न मिथ्यात्वोद्भवं अतिशयं दृष्ट्वा विस्मयं याति। एतादृशश्चैव उपशमसम्यग्दृष्टि:, किन्तु परिणामनिमित्तेन मिथ्यात्वं गच्छति, सासादनगुणस्थानमपि प्रतिपद्यते, सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थानमपि प्राप्नोति वेदकसम्यक्त्वमपि लभते। य: पुनो वेदकसम्यग्दृष्टि: स शिथिलश्रद्धान: वृद्धपुरुषहस्तयष्टिग्रहणमिव शिथिलग्राही कुहेतु-कुदृष्टान्तै: झटिति विराधको भवति।
अत्र क्षायिकसम्यग्दृष्टे: क्षायिकभाव:, उपशमसम्यग्दृष्टेरुपशमभाव:, वेदकसम्यग्दृष्टे: क्षायोपशमिक-भावश्चेति ज्ञातव्यो भवति।
वेदकसम्यक्त्वस्य लक्षणं विशेषेण ज्ञातव्यमत्र।
उक्तं च गोम्मटसारजीवकाण्डे-
सम्मत्तदेसघादि-स्सुदयादो वेदगं हवे सम्मं।
चलमलिणमगाढं तं, णिच्चं कम्मक्खवणहेदू।।
अनंतानुबंधिकषायाणां प्रशस्तोपशमो नास्ति इति तेषामप्रशस्तोपशमे विसंयोजने वा जाते दर्शनमोहमिथ्यात्वकर्मसम्यग्मिथ्यात्वकर्मणो: प्रशस्तोपशान्तयो: क्षपणीययोर्वा जातयो: सम्यक्त्वप्रकृतिदेश- घातिस्पर्धकानामुदये सत्येव यत्तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणं सम्यक्त्वं भवेत् तद्वेदकं नाम भवति। तत्सम्यक्त्वं तत्त्वार्थश्रद्धानविनाशनसामथ्र्यशून्यत्वात् चलं मलिनं अगाढं भवति। स्वकारितेऽर्हच्चैत्यादौ ममायं देव इति मदीयत्वेन, अन्यकारितेऽर्हच्चैत्यादौ परिकीयत्वेन च भजनाच्चलमित्युत्तं भवति। शंकादिमलदोषेण मलसंगेन मलिनं जायते। सर्वेषामर्हत्परमेष्ठिनां अनंतशक्तित्वे समाने स्थितेऽपि अस्मै शांतिकर्मणे शांतिनाथदेव: प्रभुर्भवति, अस्मै विघ्नविनाशादिकर्मणे पाश्र्वनाथदेव: प्रभुरित्यादिप्रकारेण रुचिशैथिल्यसंभवात् यथा वृद्धकरतलगतयष्टि: शिथिलसंबंधतया अगाढा तथा वेदकसम्यक्त्वमपि आप्तागमपदार्थ श्रद्धानावस्थायामेव स्थितं कंप्रमेव अगाढमिति कीत्र्यते। एवं सम्यक्त्वप्रकृत्युदयमनुभवतो जीवस्य जायमानं तत्त्वार्थश्रद्धानं वेदकसम्यक्त्वमिति कथ्यते, इदमेव क्षायोपशमिकसम्यक्त्वमपि नाम्ना उच्यते। तद्दर्शनमोहसर्वघातिस्पर्धका-नामुदयाभावलक्षणक्षये देशघातिस्पर्धकरूपसम्यक्त्वप्रकृत्युदये तस्यैवोपरितनानुदयप्राप्तस्पर्धकानां सदवस्थालक्षणोपशमे च सति समुत्पन्नत्वात्।
तत्तु सम्यक्त्वं नित्यं कर्मक्षपणहेतु, अत्र नित्यमिति विशेषणेन जघन्येनान्तर्मुहूर्तत्वेऽपि उत्कर्षेण षट्षष्टिसागरोपमकालावस्थायीत्युत्कृष्टविवक्षयोत्तं न तु सार्वकालिकं। कर्मक्षपणहेतु इत्यनेन मोक्षकारण-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपरिणामेषु सम्यक्त्वमेव मुख्यकारणमिति सूच्यते।
एवमुक्तत्रिविधसम्यक्त्वानामन्यतमेन परिणतसम्यग्दृष्टि: द्वितीयकषायाणां अप्रत्याख्यानावरणक्रोधमान-मायालोभानामन्यतमोदयेन असंयतो भवति१।
अत्रानन्तानुबंधिकषायाणां दर्शनचरणघातीत्युत्तं तत्र चरणशब्देन सम्यक्त्वाचरणं गृहीतव्यं न तु स्वरूपाचरणचारित्रं। तच्च चारित्रप्राभृतग्रन्थे श्रीवुंकुन्दकुन्ददेवेन सम्यक्त्वाचरणस्य लक्षणं प्रोक्तमस्ति।
अस्मिन् सूत्रे ‘असंजद’ इति विशेषणं तदन्तदीपकत्वात् अधस्तनत्रयाणामपि गुणस्थानानां असंयतत्वं प्ररूपयति। ‘सम्माइट्ठी’ इति विशेषणं उपरितनसर्वगुणस्थानेषु अनुवर्तते गंगानदीप्रवाह: इव।
सम्यग्दृष्टिजीवानां अन्या: अपि का का विशेषता:? इति प्रश्ने सति कथ्यते-
सम्माइट्ठी जीवो, उवइट्ठं पवयणं तु सद्दहदि।
सद्दहदि असब्भावं, अजाणमाणो गुरुणियोगा।
य: अर्हदादिउपदिष्टं प्रवचनं आप्तागमपदार्थत्रयं श्रद्दधाति-रोचते, तेषु असद्भावं-अतत्त्वमपि तस्य विशेषज्ञानशून्यत्वेन केवलगुरुनियोगात् अर्हदाद्याज्ञात: श्रद्दधाति सोऽपि सम्यग्दृष्टिरेव भवति तदाज्ञाया अनतिक्रमात्।
पुनरपि उच्यते-
सुत्तादो तं सम्मं, दरिसिज्जतं जदा ण सद्दहदि।
सो चेव हवइ मिच्छाइट्ठी जीवो तदो पहुडि।।
तथा असदर्थश्रद्धान: आज्ञासम्यग्दृष्टिर्जीवो यदा कुशलाचार्यान्तरै: प्राक्तनतद्गृहीत-असदर्थरूप-विपरीततत्त्वं गणधरादिकथितसूत्रं दर्शयित्वा सम्यक्प्ररूप्यमाणं तद् दुराग्रहादेशेन न श्रद्दधाति तदा प्रभृति स जीवो मिथ्यादृष्टिर्भवति। सूत्राश्रद्धानेन आज्ञातिक्रमस्य सुप्रसिद्धत्वादेव कारणात्।
‘‘अजाणमाणो गुरुणियोगा’’ अस्यार्थ: लब्धिसारटीकायां-
अयं वेदकसम्यग्दृष्टि: स्वयं विशेषमजानानो गुरोर्वचनाकौशल-दुष्टाभिप्रायगृहीतविस्मरणादिनिबंधनान्नि-योगादन्यथा व्याख्यानासद्भावं तत्त्वार्थेष्वसद्रूपमपि श्रद्दधाति तथापि सर्वज्ञाज्ञाश्रद्धानात् सम्यग्दृष्टिरेवासौ। पुन: कदाचित् आचार्यान्तरेण गणधरादिसूत्रं प्रदश्र्य व्याख्यायमानं सम्यग्रूपं यदा न श्रद्दधाति तत: प्रभृति स एव जीवो मिथ्यादृष्टिर्भवति, आप्तसूत्रार्थाश्रद्धानात्।
अयं सम्यग्दृष्टि: पुनरपि कीदृशोऽस्ति इति कथ्यते-
णो इंदिएसु विरदो, णो जीवे थावरे तसे चावि।
जो सद्दहदि जिणुत्तं, सम्माइट्ठी अविरदो सो।।
य: इंद्रियविषयेषु नो विरत:, तथा स्थावरत्रसजीववधेऽपि नो विरत:, जिनोत्तं प्रवचनं श्रद्दधाति स जीव: अविरतसम्यग्दृष्टिर्भवति। अनेन असंयतश्चासौ सम्यग्दृष्टिश्चेति समानाधिकरणत्वं समर्थितं जातं। ‘अपि’ शब्देन संवेगादिसम्यक्त्वगुणा: सूच्यन्ते, अनुकम्पापि स्याच्च। एतेन ज्ञायते असंयतसम्यग्दृष्टे: प्रवृत्तिरनर्गला भवितुं न शक्यते। किंच सम्यग्दृष्टि: जीव: बद्धायुष्कं अंतरेण देवायुरेव बध्नाति न च त्रीण्यायूंषि, अतोऽस्य प्रवृत्ति: हिंसादिषु पापेषु द्यूतादिदुव्र्यसनेष्वपि न जायते इति।


सिद्धांतचिंतामणिटीका

'सिद्धांतचिंतामणिटीका'—जिसकी दृष्टि अर्थात् श्रद्धा समीचीन होती है उसे सम्यग्दृष्टि कहते हैं और संयमरहित सम्यग्दृष्टि को असंयतसम्यग्दृष्टि कहते हैं। वे सम्यग्दृष्टि जीव तीन प्रकार के हैं-क्षायिक सम्यग्दृष्टि, वेदक सम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि। सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र गुण का घात करने वाली चार अनंतानुबंधी प्रकृतियाँ और मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्त्वप्रकृति ये तीन दर्शनमोहनीय की प्रकृतियाँ इन सात प्रकृतियों के सर्वथा विनाश से जीव क्षायिक सम्यग्दृष्टि कहा जाता है। इन्हीं सात प्रकृतियों के उपशम से उपशमसम्यग्दृष्टि होता है और जिसकी सम्यक्त्व संज्ञा है ऐसी दर्शनमोहनीय कर्म की भेदरूप प्रकृति के उदय से यह जीव वेदकसम्यग्दृष्टि कहलाता है।

उनमें क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव कभी भी मिथ्यात्व को प्राप्त नहीं होता है, किसी प्रकार का संदेह भी नहीं करता है और मिथ्यात्व से उत्पन्न अतिशयों को देखकर विस्मय-आश्चर्य भी नहीं करता है। उपशम सम्यग्दृष्टि जीव भी इसी प्रकार का होता है किन्तु परिणामों के निमित्त से उपशम सम्यक्त्व को छोड़कर मिथ्यात्व को प्राप्त करता है, सासादन गुणस्थान को भी प्राप्त करता है, सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में भी पहुँच जाता है और वेदक सम्यक्त्व को भी प्राप्त कर लेता है। तथा जो वेदकसम्यग्दृष्टि है वह शिथिलश्रद्धानी होता है इसलिए वृद्धपुरुष जिस प्रकार अपने हाथ में लकड़ी को शिथिलता पूर्वक पकड़ता है उसी प्रकार वह भी तत्त्वार्थ के श्रद्धान में शिथिलग्राही होता है अत: कुहेतु और कुदृष्टान्तों से वह सम्यक्त्व की विराधना करने वाला होता है। यहाँ पर यह जानना चाहिए कि क्षायिक सम्यग्दृष्टि के क्षायिक भाव, उपशम सम्यग्दृष्टि के औपशमिक भाव और वेदक सम्यग्दृष्टि के क्षायोपशमिक भाव होते हैं। अब यहाँ वेदक सम्यक्त्व का लक्षण विशेषरूप से कहते हैं— गोम्मटसार जीवकाण्ड ग्रंथ में कहा है—

गाथार्थ—सम्यक्त्व नामकी देशघाति प्रकृति के उदय होने पर वेदकसम्यक्त्व उत्पन्न होता है, जिसके निमित्त से आत्मा में चल, मलिन, अगाढरूप परिणाम होते हैं फिर यह वेदक सम्यग्दर्शन नित्य ही कर्मक्षपण कराने में हेतु रहता है। अनंतानुबंधी कषायों का प्रशस्त-शुभरूप उपशम नहीं होता है यह नियम है। अत: उनका अप्रशस्त उपशम होने पर अथवा उनका विसंयोजन हो जाने पर दर्शनमोहनीय मिथ्यात्व कर्म और सम्यग्मिथ्यात्व के प्रशस्त उपशम अथवा क्षय होने पर और सम्यक्त्व प्रकृति के देशघाति स्पर्धकों का उदय होने पर ही जो तत्त्वार्थश्रद्धान लक्षणरूप सम्यक्त्व होता है वही वेदकसम्यग्दर्शन कहलाता है। वह सम्यक्त्व तत्त्वार्थश्रद्धानविनाशन की सामथ्र्य से शून्य-रहित होने से चल, मलिन, अगाढ़रूप होता है। अपने द्वारा बनवाए गए चैत्य-जिनप्रतिमा आदि में ‘‘ये मेरे भगवान हैं’’ ऐसा अपनत्वभाव उत्पन्न हो जाता है और अन्यों के द्वारा निर्मापित चैत्य आदि में ‘‘परकीयभाव’’ उत्पन्न होता है, यह सब चल दोष कहलाता है। शंका आदि मल दोष से मलिनता उत्पन्न होती है। समस्त अर्हन्त परमेष्ठियों में समानरूप से अनंतशक्ति विद्यमान होने पर भी ‘‘शांतिनाथ भगवान मेरी शांति के लिए हैं’’ और ‘‘पाश्र्वनाथ भगवान मेरे विघ्नविनाशादि करने वाले हैं’’ इत्यादि रूप से श्रद्धा में जो शिथिलता लाता है वह अगाढ़ नाम का दोष है। जैसे किसी वृद्ध पुरुष के हाथ में पकड़ी गई लकड़ी हिलती-डुलती रहती है-कांपती रहती है उसी प्रकार वेदक सम्यग्दृष्टि भी आप्त, आगम और पदार्थ के श्रद्धान की अवस्था में स्थित हुआ भी चल-विचल हो जाता है उसे अगाढ़ कहा जाता है।

इस प्रकार सम्यक्त्व प्रकृति के उदय का अनुभव करते हुए जीव के उत्पन्न हुआ तत्त्वार्थश्रद्धान ‘‘वेदकसम्यक्त्व’’ कहलाता है, इसको ही ‘‘क्षायोपशमिक सम्यक्त्व’’ नाम से भी जाना जाता है। वह सम्यग्दर्शन दर्शनमोहनीय से सर्वघातिस्पर्धकों के उदयाभावी क्षय होने पर, देशघातिस्पर्धक रूप सम्यक्त्व प्रकृति के उदय होने पर और उसी के उपरितन अनुदयप्राप्त स्पर्धकों के सदवस्थालक्षण उपशम होने पर उत्पन्न होता है।

वह सम्यक्त्व नित्य ही कर्मक्षय कराने में कारण है। यहाँ ‘‘नित्य’’ इस विशेषण से जघन्य से अन्तर्मुहूर्त होते हुए भी उत्कृष्ट से छ्यासठ सागर काल तक रहता है यहाँ पर उत्कृष्ट काल विवक्षित है न कि सदा काल। अर्थात् जब तक वह सम्यक्त्व आत्मा में रहता है तब तक नित्य ही अशुभ कर्मों की निर्जरा होती रहती है।

कर्मक्षपणहेतु इस शब्द से यह समझना चाहिए कि मोक्ष के कारणभूत सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र परिणामों में सम्यक्त्व ही मुख्य कारण है। इस प्रकार तीन प्रकार के सम्यक्त्व में से किसी भी सम्यक्त्व से परिणत सम्यग्दृष्टि द्वितीय कषाय अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ में से किसी एक के उदय होने पर यह जीव असंयत सम्यग्दृष्टि कहलाता है।

यहाँ अनंतानुबंधी कषायों को सम्यग्दर्शन और चारित्र को घात करने वाला बताया गया है अर्थात् अनंतानुबंधी कषाय होने पर यह जीव न तो सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है और न सम्यक्चारित्र ही धारण कर सकता है। यहाँ ‘चरण’ शब्द से सम्यक्त्वाचरण चारित्र को ग्रहण करना चाहिए न कि स्वरूपाचरणचारित्र को। चारित्रप्राभृतग्रंथ में श्रीकुन्दकुन्ददेव ने उस सम्यक्त्वाचरण के लक्षण को कहा है। इस सूत्र में ‘असंजद’ यह विशेषण अन्त्यदीपक न्याय के अनुसार नीचे के तीन गुणस्थानों के असंयतपने का प्ररूपण करता है अर्थात् मिथ्यात्व, सासादन और मिश्र ये तीनों गुणस्थान असंयत ही होते हैं यह समझना चाहिए। ‘‘सम्माइट्ठी’’ यह विशेषण उपरितन सभी गुणस्थानों में गंगानदी के प्रवाह के समान लगाने के लिए है अर्थात् असंयत सम्यग्दृष्टि से लेकर ऊपर के समस्त गुणस्थान सम्यग्दृष्टि ही होते हैं। सम्यग्दृष्टि जीवों की अन्य और भी क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं—

गाथार्थ—सम्यग्दृष्टि जीव जिनेन्द्र भगवान के द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का तो श्रद्धान करता ही है किन्तु किसी तत्त्व को नहीं जानता हुआ गुरु के उपदेश से विपरीत अर्थ का भी श्रद्धान कर लेता है। जो अर्हंतादि के द्वारा उपदिष्ट प्रवचन के अनुसार आप्त, आगम और पदार्थ तीनों का श्रद्धान करता है, उनमें अतत्त्व को भी उसके ज्ञान से शून्य होने के कारण केवल गुरु के नियोग से श्रद्धान कर लेता है तो भी वह सम्यग्दृष्टि ही रहता है क्योंकि वह जिनेन्द्रदेव की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता है। पुनरपि कहते हैं—

गाथार्थ—गणधरादि कथित सूत्र के आश्रय से आचार्यादि के द्वारा भले प्रकार समझाए जाने पर भी यदि वह जीव उस पदार्थ का समीचीन श्रद्धान न करे तो वह जीव उस ही काल से मिथ्यादृष्टि हो जाता है। वह आज्ञासम्यग्दृष्टि जीव असत्-मिथ्या अर्थ का श्रद्धान करता है किन्तु जब किसी अन्य कुशल आचार्य के द्वारा पूर्व में श्रद्धा किए गए विपरीत तत्त्व को ‘‘यह गलत है’’ ऐसा गणधरादिकथित सूत्र दिखाकर सम्यक्-वास्तविकरूप में प्ररूपित किया जाता है फिर भी वह दुराग्रहवश उस सम्यक् अर्थ का श्रद्धान नहीं करता है तब उसी समय से वह जीव मिथ्यादृष्टि हो जाता है क्योंकि वह सूत्र का अश्रद्धान करता हुआ जिनेन्द्र आज्ञा का उल्लंघन करने वाला सुप्रसिद्ध है।

‘‘अजाणमाणो गुरुणियोगा’’ इसका अर्थ लब्धिसार टीका में किया है— यह वेदक सम्यग्दृष्टि जीव स्वयं विशेष नहीं जानता हुआ तथा गुरु के वचन अकौशल-अभिप्राय व्यक्त करने की अक्षमता के कारण से, दुष्ट अभिप्राय से, ग्रहण किये हुए अर्थ का विस्मरण आदि हो जाने से अथवा व्याख्यान का असद्भाव होने से तत्त्वार्थ के असत् रूप का भी श्रद्धान कर लेता है फिर भी सर्वज्ञ आज्ञा का श्रद्धान करने से वह सम्यग्दृष्टि ही रहता है। पुन: कदाचित् दूसरे आचार्य के द्वारा गणधरादि कथित सूत्र को दिखाने पर भी वह व्याख्यायमान-प्रवचनकथित सम्यक् रूप का जब श्रद्धान नहीं करता है तब उसी समय से वह जीव आप्त कथित सूत्र का अश्रद्धान करने के कारण मिथ्यादृष्टि हो जाता है। वह सम्यग्दृष्टि पुन: कैसा होता है सो कहते हैं—

गाथार्थ—जो इन्द्रियों के विषयों से तथा त्रस और स्थावर जीवों की िंहसा से विरक्त नहीं है किन्तु जिनेन्द्रदेव द्वारा कथित प्रवचन का श्रद्धान करता है वह अविरत सम्यग्दृष्टि है। इस अर्थ से असंयतपना और सम्यग्दृष्टिपना दोनों का समान रूप से समर्थन हो जाता है अर्थात् दोनों का अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि वह सम्यग्दृष्टि अविरत—व्रत-नियम आदि से रहित होता है इसीलिए उसका नाम ‘‘असंयतसम्यग्दृष्टि’’ सार्थक है। गाथा में जो ‘‘अपि’’ शब्द है उससे संवेग आदि सम्यक्त्व के गुण भी वह सम्यग्दृष्टि जीव पालन करता है ऐसा सूचित होता है तथा प्राणिमात्र पर उसका अनुकम्पा भाव भी रहता है। इससे यह ज्ञात होता है कि असंयत सम्यग्दृष्टि का आचरण अनर्गल नहीं हो सकता है। दूसरी बात यह है कि यदि उस सम्यग्दृष्टि ने सम्यक्त्व होने के पूर्व आयु का बन्ध नहीं किया है तो वह देवायु का ही बन्ध करता है, शेष तीन आयु का बन्ध नहीं कर सकता है इसलिए उसकी प्रवृत्ति हिंसा आदि पापों में और द्यूत-जुआ आदि व्यसनों में भी नहीं हो सकती है।

विशेषार्थ—सम्यग्दर्शन तीनों लोकों में सर्वोत्तम रत्न है यह प्राय: चरणानुयोग के समस्त ग्रंथों में पाया जाता है। छहढाला में पं. श्री दौलतराम जी ने उसकी महिमा का बखान करते हुए लिखा है— मोक्षमहल की परथम सीढ़ी या बिन ज्ञान चरित्रा। सम्यकता न लहे सो दर्शन धारो भव्य पवित्रा।। पुन: उसी तृतीय ढाल में कहा है— प्रथम नरक बिन षट् भू ज्योतिष वान भवन षंड नारी। थावर विकलत्रय पशु में नहिं उपजत सम्यक्धारी।। अर्थात् पूर्व में नरकायु का बंध कर लेने वाला बद्धायुष्क सम्यग्दृष्टि जीव प्रथम नरक के आगे नरकों में नहीं जा सकता है तथा भवनत्रिक में, नपुंसक वेद में, स्त्री में, स्थावर, विकलत्रय और पशुयोनि में भी वह मरकर नहीं जा सकता है। जैसे-राजा श्रेणिक के जीव ने जिनधर्म के विद्वेष से मुनिराज के गले में मरा हुआ सर्प डालते समय ही सातवें नरक की तेंतीस सागर की आयु का बन्ध कर लिया था उसके पश्चात् उन्होंने भगवान महावीर के समवसरण में क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त कर लिया तो उन्हें बद्धायुष्कपने के कारण नरक गति को तो प्राप्त करना पड़ा किन्तु आयु का अपकर्षण करके प्रथम नरक की चौरासी हजार वर्ष की आयु कर ली जो समुद्र में राई के सदृश लघु है। आज भी वे प्रथम नरक में अपनी उस आयु के क्षण वहाँ के भीषण दु:खों में व्यतीत कर रहे हैं किन्तु आगे की उत्सर्पिणी में वे ही इस भरतक्षेत्र में प्रथम तीर्थंकर ‘‘महापद्म’’ के रूप में जन्म लेकर अयोध्या नगरी को पावन करेंगे। यह सब सम्यग्दर्शन का प्रभाव है जो कि वास्तव में अकथनीय है। रत्नकरण्डश्रावकाचार में श्रीसमन्तभद्राचार्य ने कहा है— न सम्यक्त्वसमं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि। श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम्।। अर्थात् तीन लोक और तीन काल में प्राणियों के लिए सम्यक्त्व के समान कोई श्रेयस्कर-कल्याणकारी वस्तु नहीं है एवं मिथ्यात्व के समान कोई दु:खदाई नहीं है। समयसार आदि अध्यात्मग्रंथों में सम्यग्दृष्टि को वीतराग निर्विकल्परूप से परिणत होकर निश्चयभाव प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान की है। यहाँ पर श्री पुष्पदन्ताचार्य के सूत्र पर व्याख्या करते हुए टीकाकत्र्री गणिनी श्रीज्ञानमती माताजी ने असंयतसम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्थान में होने वाले तीनों सम्यग्दर्शन का संक्षिप्त वर्णन किया है। जिसे धारण कर अपने जीवन को सार्थक करना चाहिए।


अधुना देशविरतगुणस्थानप्ररूपणार्थं त्रयोदशमसूत्रस्यावतारो भवति-

संजदासंजदा।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संयताश्च ते असंयताश्च संयतासंयता:। देशसंयता: अणुव्रतिनोऽगारिण: श्रावका: अपि उच्यन्ते। कश्चिदाह-
यदि संयत:, नासौ असंयत:। अथासंयत: नासौ संयत: इति विरोधान्नायं गुणो घटते ?
आचार्यदेव: समाधत्ते-नात्र विरोध:, संयमासंयमयोरेकद्रव्यवर्तिनोस्त्रसस्थावरनिबन्धनत्वात्। अत्र गुणस्थाने क्षायोपशमिको भाव:, अप्रत्याख्यानावरणीयस्य सर्वघातिस्पर्धकानामुदयक्षयात् सतां चोपशमात् प्रत्याख्यानावरणीयोदयात् संयमासंयमरूपस्याप्रत्याख्यानचारित्रस्योत्पत्ते:। अस्मिन् देशसंयमे त्रीण्यपि सम्यक्त्वानि भवन्ति।
सम्यक्त्वमन्तरेणापि देशयतयो दृश्यन्त इति चेत् ?
नैतद् वक्तव्यं, निर्गतमुक्तिकांक्षस्यानिवृत्तविषयपिपास्याप्रत्याख्यानसंयमस्यानुपपत्ते:।
उक्तं च-
जो तसवहाउ विरओ, अविरओ तह य थावरवहाओ।
एक्कसमयम्हि जीवो, विरयाविरओ जिणेक्कमई।।
यो जीव: एककाले एव त्रसवधाद् विरत: स्थावरवधादविरत: स एव विरताविरत इति व्यपदिश्यते। अयं विषयभेदापेक्षया अविरोधेन विरताविरत इति व्यपदेशार्हो भवति। तथा च शब्देन प्रयोजनं विना स्थावरवधमपि न करोतीति व्याख्येयो भवति। जिनेषु-आप्तादिषु, एका-केवला, मति-इच्छा, रुचि:, यस्यासौ जिनैकमति:-श्रावक:। इत्यनेन देशसंयतस्य सम्यग्दृष्टित्वविशेषणं निरूपितं जातं। इदं विशेषणं आदिदीपकत्वेन उत्तरत्रापि गुणस्थानेषु विशेषणत्वेन संबंधनीयं भवति।
अस्य देशव्रतधारिण: श्रावकस्य द्वादशव्रतानि सन्ति।
उक्तं च श्रीमद्गौतमस्वामिना पाक्षिकप्रतिक्रमणसूत्रे-
‘‘पढमं ताव सुदं मे आउस्संतो! इह खलु समणेण भयवदा महदिमहावीरेण महाकस्सवेण सव्वण्ह-णाणेण सव्वलोयदरसिणा सावयाणं सावियाणं खुड्डयाणं खुड्डियाणं कारणेण पंचाणुव्वदाणि तिण्णि गुणव्वदाणि चत्तारि सिक्खा-वदाणि बारसविहं गिहत्थधम्मं सम्मं उवदेसियाणि। तत्थ इमाणि पंचाणुव्वदाणि पढमे अणुव्वदे थूलयडे पाणादिवादादो वेरमणं, विदिए अणुव्वदे थूलयडे मुसावादादो वेरमणं, तदिए अणुव्वदे थूलयडे अदत्ता-दाणादो वेरमणं, चउत्थे अणुव्वदे थूलयडे सदारसंतोसपरदारा-गमणवेरमणं कस्स य पुणु सव्वदो विरदी, पंचमे अणुव्वदे थूलयडे इच्छाकद-परिमाणं चेदि, इच्चेदाणि पंच अणुव्वदाणि।
तत्थ इमाणि तिण्णि गुणव्वदाणि, तत्थ पढमे गुणव्वदे दिसिविदिसि पच्चक्खाणं, विदिए गुणव्वदे विविध-अणत्थ-दण्डादो वेरमणं, तदिए गुणव्वदे भोगोपभोग-परिसंखाणं चेदि, इच्चेदाणि तिण्णि गुणव्वदाणि।
तत्थ इमाणि चत्तारि सिक्खावदाणि, तत्थ पढमे सामाइयं, विदिए पोसहो-वासयं, तदिए अतिथिसंविभागो, चउत्थे सिक्खावदे पच्छिम-सल्लेहणा-मरणं, तिदियं अब्भोवस्साणं चेदि।
से अभिमद-जीवाजीव-उवलद्ध-पुण्णपाव-आसव-संवर-णिज्जर-बंधमोक्ख-महिकुसले धम्माणुरायरत्तो पि माणु-रागरत्तो अट्ठि-मज्जाणुराय-रत्तो मुच्छिदट्ठे गिहिदट्ठे विहिदट्ठे पालिदट्ठे सेविदट्ठे इणमेव णिग्गंथपावयणे अणुत्तरे सेअट्ठे सेवणुट्ठे-

णिस्संकिय-णिक्कंखिय, णिव्विदिगिंछी य अमूढदिट्ठी य।
उवगूहण ट्ठिदिकरणं, वच्छल्ल पहावणा य ते अट्ठ।।१।।


सव्वेदाणि पंचाणुव्वदाणि तिण्णि गुणव्वदाणि चत्तारि सिक्खावदाणि वारसविहं गिहत्थधम्म-मणुपालइत्ता-

दंसण वय सामाइय, पोसह सचित्त राइभत्ते य।
बंभारंभ परिग्गह, अणुमण-मुद्दिट्ठ देसविरदो य।।१।।
महु-मंस-मज्ज-जूआ, वेसादि-विवज्जणासीलो।
पंचाणुव्वय-जुत्तो, सत्तेहिं सिक्खावएहिं संपुण्णो।।२।


जो एदाइं वदाइं धरेइ सावया सावियाओ वा खुड्डय खुड्डियाओ वा अट्ठदह-भवण-वासिय-वाण-विंतर-जोइसिय-सोहम्मीसाणदेवीओ वदिक्क-मित्त-उवरिम-अण्णदर-महड्ढियासु देवेसु उववज्जंति।
तं जहा-सोहम्मी-साण-सणक्कुमार-माहिंद-बंभ-बंभुत्तर-लांतवकापिट्ठ-सुक्क-महासुक्क-सतार-सहस्सार-आणत-पाणत-आरण-अच्चुत-कप्पेसु उववज्जंति।

अडयंबर सत्थधरा, कडयंगद-बद्धनउड-कयसोहा।
भासुर-वर-बोहिधरा, देवा य महड्ढिया होंति।।१।।


उक्कस्सेण दो तिण्णि-भव-गहणाणि जहण्णे (जहण्णेण) सत्तट्ठभव-गहणाणि तदो सुमणुसुत्तादो सुदेवत्तं सुदेवत्तादो सुमाणुसत्तं तदो साइहत्था पच्छा णिग्गंथा होऊण सिज्झंति बुज्झंति मुंचंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं करेंति।१
श्रीमद्भगवद्गौतमगणधरकथितसूत्राणामभिप्रायमेतत्, यत् ये केचित् श्रावका: पंचाणुव्रतादीनि व्रतानि पालयन्ति ते स्वर्गसुखमनुभूय अधिकतमान् सप्ताष्टौ वा भवान् गृहीत्वा नियमेन निर्वाणपदं प्राप्नुवन्ति, इति नात्र संदेह:।
इमे पंचमगुणस्थानवर्तिन: श्रावका: दानपूजाशीलोपवासरूपान् चतुर्विधान् श्रावकधर्मानपि पालयन्ति।
उक्तं च श्रीवीरसेनाचार्येणैव कसायपाहुडनाममहाग्रन्थस्य जयधवलाटीकायां-
‘‘चउवीस वि तित्थयरा सावज्जा, छज्जीवविराहण हेउ-सावयधम्मोवएसकारित्तादो। तं जहा-दाणं पूजा सीलमुववासो चेदि चउव्विहो सावयधम्मो। एसो चउव्विहो वि छज्जीवविराहओ, पयणपायणग्गि-संधुक्खण-जालण-सूदिसूदाणादि-वावारेहि जीवविराहणाए विणा दाणाणुववत्तीदो। तरुवरछिंदण-छिंदावणिट्टपादण-पादावण-तद्दहण-दहावणादिवावारेण छज्जीवविराहणहेउणा विणा जिणभवणकरण-करावणण्णहाणुववत्तीदो। ण्हवणोवलेवण-संमज्जण-छुहावण-फुल्लारोहण-धूवदहणादिवावारेहि जीववहाविणाभावाहि विणा पूजाकरणाणुववत्तीदो च।
कधं सीलरक्खणं सावज्जं ? ण, सदारपीडाए विणा सीलपरिवालणाणुववत्तीदो।
कधं उववासो सावज्जो ? ण, सपोट्टत्थपाणिपीडाए विणा उववासाणुववत्तीदो।
थावरजीवे मोत्तूण त्रसजीवे चेव मा मारेहु त्ति सावयाणमुवदेसदाणदो वा ण जिणा णिरवज्जा.....तम्हा ते ण वंदणिज्जा त्ति ?
एत्थ परिहारो उच्चदे। तं जहा-जइ वि एवमुवदिसंति तित्थयरा तो वि ण तेसिं कम्मबंधो अत्थि, तत्थ मिच्छत्तासंजमकसायपच्चयाभावेण वेयणीयवज्जासेसकम्माणं बंधाभावादो।
ण च जिणेसु देस-सयलधम्मोवदेसेण कम्मसंचओ वि अत्थि, उदयसरूवकम्मागमादो असंखेज्जगुणाए सेढीए पुव्वसंचियकम्मणिज्जरं पडिसमयं करेंतेसु कम्मसंचयाणुववत्तीदो। ण च तित्थयर-मण-वयण-कायवुत्तीओ इच्छापुव्वियायो जेण तेसिं बंधो होज्ज, किंतु दिणयर-कप्परुक्खाणं पउत्तिओ व्व वयिससियाओ।


अब देशविरत गुणस्थान की प्ररूपणा करने के लिए तेरहवें सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से संयतासंयत जीव हैं।।१३।।

जो संयत होते हुए भी असंयत होते हैं उन्हें संयतासंयत कहते हैं। ये अणुव्रती, अगारी, श्रावक और देशसंयत भी कहलाते हैं। यहाँ कोई शंका करता है कि— जो संयत होता है वह असंयत नहीं हो सकता है ? और जो असंयत होता है वह संयत नहीं हो सकता है क्योंकि संयमभाव और असंयमभाव का परस्पर विरोध है इसलिए यह गुणस्थान नहीं बनता है ? इस पर आचार्य देव समाधान करते हैं— इसमें कोई विरोध नहीं है क्योंकि संयमभाव और असंयमभाव इन दोनों को एक आत्मा में स्वीकार कर लेने पर भी कोई विरोध नहीं आता है। यहाँ गुणस्थान में क्षायोपशमिक भाव है क्योकि अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय के वर्तमानकालिक सर्वघाती स्पर्धकों के उदयाभावी क्षय होने से और आगामी काल में उदय में आने योग्य उन्हीं के सदवस्थारूप उपशम होने से तथा प्रत्याख्यानावरणीय कषाय के उदय से संयमासंयमरूप अप्रत्याख्यानचारित्र उत्पन्न होता है। इस देशसंयम गुणस्थान में तीनों सम्यक्त्व होते हैं। सम्यक्त्व के बिना भी देशयति-देशव्रती देखे जाते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-ऐसा नहीं कहना चाहिए, मुक्ति की आकांक्षा से रहित और विषयों की पिपासा-इच्छा से सहित जीव के अप्रत्याख्यान संयम की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। कहा भी है—

गाथार्थ—जो जीव जिनेन्द्रदेव में अद्वितीय श्रद्धा को रखता हुआ एक ही समय में त्रसजीवों की हिंसा से विरत और स्थावर जीवों की हिंसा से अविरत होता है उसको विरताविरत कहते हैं।

जो जीव एक काल में ही त्रसबध से विरत और स्थावर बध से अविरत है वही ‘‘विरताविरत’’ कहलाता है। यह विषय के भेदाभेद की अपेक्षा से अविरोधरूप से विरताविरत इस संज्ञा के योग्य होता है।

तथा गाथा में जो ‘च’ शब्द है उससे वह प्रयोजन के बिना स्थावर बध भी नहीं करता है ऐसा व्याख्येय-जानने योग्य है। जिनेषु-आप्तादि भगवन्तों में, एका-केवल, मति-इच्छा या रुचि है जिनकी वह जिनैकमति-श्रावक है। इससे देशसंयत के सम्यग्दृष्टिपना विशेषण बन जाता है। यह विशेषण आदिदीपक होने से आगे के गुणस्थानों में भी विशेषणरूप से जुड़ जाता है।

उस देशव्रतधारी श्रावक के बारह व्रत होते हैं। श्रीगौतमस्वामी ने पाक्षिकप्रतिक्रमण सूत्र में कहा भी है- (इन पंक्तियों का हिन्दी पद्यानुवाद इस टीका की रचयित्री गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने ही किया है सो मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ)—

हे आयुष्मन्तों! पहले ही यहाँ मैंने सुना वीरप्रभु से।


उन महाश्रमण भगवान् महति महावीर महाकाश्यप जिनसे।।
सर्वज्ञज्ञानयुत सर्वलोकदर्शी उनने उपदेश दिया।
श्रावक व श्राविका क्षुल्लक अरु क्षुल्लिका इन्हों के लिए कहा।।१।।
ये पाँच अणुव्रत तीन गुणव्रत चउ शिक्षाव्रत बारह विध।
हैं सम्यक् श्रावक धर्म इन्हीं में जो ये अणुव्रत पाँच कथित।।
पहला अणुव्रत स्थूलतया प्राणिवध से विरती होना।
दूजा अणुव्रत स्थूलतया असत्यवच से विरती होना।।२।।
तीजा अणुव्रत स्थूलतया बिन दी वस्तू को नहिं लेना।
चौथा अणुव्रत स्थूलतया परदारा से विरती होना।।
निजपत्नी में संतुष्टी या सब स्त्रीमात्र से रति तजना।
पंचम अणुव्रत स्थूलतया इच्छाकृत परीमाण धरना।।३।।
त्रय गुणव्रत में पहला गुणव्रत दिश विदिशा का प्रमाण करना।
दूजा गुणव्रत नाना अनर्थ दण्डों से नित विरती धरना।।
तीजा गुणव्रत भोगोपभोग वस्तू की संख्या कर लेना।।
ये तीन गुणव्रत कहे पुन: चारों शिक्षाव्रत को सुनना।।४।।
पहला शिक्षाव्रत सामायिक दूजा प्रोषध उपवास कहा।
तीजा है अतिथीसंविभाग चौथा सल्लेखनमरण कहा।।
शक्षाव्रत चार कहे पुनरपि अभ्रावकाश तृतीयव्रत है।
जघन्य श्रावक से उत्तम तक, ये बारह व्रत तरतममय हैं।।५।।
इसमें अभिमत जीव रु अजीव उपलब्ध पुण्य अरु पाप कहे।
आस्रव संवर निर्जर व बंध अरु मोक्ष कुशल नव तत्त्व रहें।।
इनमें धर्मानुराग से रत हो भी धन में अनुरागी हो।
अस्थीमज्जा के सदृश धर्म के अनुराग में रागी हो।।६।।
ममतापूर्वक गृहीत वस्तु में, गृहीत वस्तु अरु कृतवस्तू में।
अपने पालन किये पदार्थ में, अपने सेवित सुपदारथ में।।
निग्र्रन्थों के भी प्रवचन में, उत्तम अरु हितकर पदार्थ में।
सेवन की प्रवृत्ती रूप क्रिया में दोष हुये सो मिथ्या हों।।७।।
नि:शंकित नि:कांक्षित अरु निर्विचिकित्सा अमूढ़दृष्टी हैं।
उपगूहन स्थितीकरण वात्सल प्रभावना अठ अंग कहे।।
ये सभी पाँच अणुव्रत त्रयगुणव्रत चउ शिक्षाव्रत माने हैं।
बारहविध गृहस्थधर्मों का अनुपालन श्रावक करते हैं।।८।।
दर्शन व्रत सामायिक प्रोषध सचित्तत्याग निशिभुक्ति त्यजी।
ब्रह्मचर्य व आरंभ परिग्रह अनुमति उद्दिष्ट त्याग ये देशव्रती।।
मधु मांस मद्य जुआ वेश्यादिक व्यसनविवर्जनशील गृही।
पंचाणुव्रतयुत शिक्षाव्रत आदिक सातों से जो पूर्ण वही।।९।।
जो श्रावक और श्राविका या क्षुल्लक व क्षुल्लिका इन व्रत को।
धारण कर अठरहस्थान व भावन व्यंतर में नहिं जाते वो।।
ज्योतिषियों में सौधर्म ईशान देवियों में नहिं जाते हैं।
उपरिम वैमानिक देवों में वे महाऋद्धिधर होते हैं।।१०।।
वह यह सौधर्मैशान सनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्म दिव में।
इन सोलह स्वर्गों में ही ये सदृष्टि सचेलक उपजत हैं।।
वे कटक व बाजूबंद मुकुट से युत आडंबर शस्त्र धरें।
भासुरवर बोधि धरें बहु ऋद्धि सहित महद्र्धिक देव बनें।।११।।
उत्कटपने से दो त्रय भव व जघन्य से सात आठ भव लें।
फिर मानव से देवपद ले सुदेवपद से सुमनुष्य भव लें।।
फिर सद्गृहस्थ निग्र्रंथ मुनी हो सिद्ध-बुद्ध हो जाते हैं।
मुक्ती पाते कृतकृत्य बने सब दु:खों का क्षय करते हैं।।१२।।

हिन्दी में ही पद्यानुवाद होने से सबको सुगम रीति से समझ में आ जावेगा अत: गद्य में पृथक् अर्थ करने की आवश्यकता नहीं है। श्रीमान् भगवान् गौतम गणधर के द्वारा कहे गये इन सूत्रों का अभिप्राय यह है कि जो कोई श्रावक पाँच अणुव्रत आदि व्रतों का पालन करते हैं वे स्वर्गसुख का अनुभव करते हुए अधिक से अधिक सात-आठ भवों को ग्रहण करके नियम से निर्वाणपद को प्राप्त कर लेते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ये पंचमगुणस्थानवर्ती श्रावक दान, पूजा, शील और उपवासरूप चार प्रकार के श्रावकधर्म का पालन करते हैं। श्रीवीरसेनाचार्य ने ही कसायपाहुड़ नामक महाग्रंथ की जयधवला टीका में कहा है—

‘‘शंका—छह काय के जीवों की विराधना के कारणभूत श्रावक धर्म का उपदेश करने वाले होने से चौबीसों ही तीर्थंकर सावद्य अर्थात् सदोष हैं। आगे इसी विषय का स्पष्टीकरण करते हैं-दान, पूजा, शील और उपवास ये श्रावकों के चार धर्म हैं। यह चारों ही प्रकार का श्रावक धर्म छह काय के जीवों की विराधना का कारण है, क्योंकि भोजन का पकाना, दूसरे से पकवाना, अग्नि का सुलगाना, अग्नि का जलाना, अग्नि का खूतना और खुतवाना आदि व्यापारों से होने वाली जीवविराधना के बिना दान नहीं बन सकता है। उसी प्रकार वृक्ष का काटना और कटवाना, र्इंटों का गिराना और गिरवाना तथा उनको पकाना और पकवाना आदि छह काय के जीवों की विराधना के कारणभूत व्यापार के बिना जिनभवन का निर्माण करना अथवा करवाना नहीं बन सकता है। तथा अभिषेक करना, अवलेप करना, संमार्जन करना, चंदन लगाना, फूल चढ़ाना और धूप का जलाना आदि जीववध के अविनाभावी व्यापारों के बिना पूजा करना नहीं बन सकता है। प्रतिशंका—शील का रक्षण करना सावद्य कैसे है ?

शंकाकार—नहीं, क्योंकि अपनी स्त्री को पीड़ा दिये बिना शील का परिपालन नहीं हो सकता है, इसलिए शील की रक्षा करना भी सावद्य है।

प्रतिशंका—उपवास सावद्य कैसे है ?

शंकाकार—नहीं, क्योंकि अपने पेट में स्थित प्राणियों को पीड़ा दिये बिना उपवास नहीं बन सकता है इसलिए उपवास करना भी सावद्य है।

अथवा ‘‘स्थावर जीवों को छोड़ कर केवल त्रसजीवों को ही मत मारो’’ श्रावकों को इस प्रकार का उपदेश देने से जिनदेव निरवद्य नहीं हो सकते हैं ? अथवा अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन, वृक्ष के मूल मे, सूर्य के आतप में और खुले हुए स्थान में निवास करना, उत्कुटासन, पल्यंकासन, अर्धपल्यंकासन, खड्गासन, गवासन, वीरासन, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय और ध्यान आदि के निमित्त से होने वाले क्लेशों में जीवों को डालकर उन्हें ठगने के कारण भी जिन निरवद्य नहीं है और इसलिए वे वन्दनीय नहीं हैं ?

समाधान—यहाँ पर पूर्वोक्त शंका का परिहार करते हैं। वह इस प्रकार है-यद्यपि तीर्थंकर पूर्वोक्त प्रकार का उपदेश देते हैं तो भी उनके कर्मबन्ध नहीं होता है, क्योंकि जिनदेव के तेरहवें गुणस्थान में कर्मबन्ध के कारणभूत मिथ्यात्व, असंयम और कषाय का अभाव हो जाने से वेदनीय कर्म को छोड़कर शेष समस्त कर्मों का बन्ध नहीं होता है।

जिनदेव देशव्रती श्रावकों के और सकलव्रती मुनियों के धर्म का उपदेश करते हैं, इसलिए उनके अर्जित कर्मों का संचय बना रहता है, सो भी बात नहीं है, क्योंकि उनके जिन नवीन कर्मों का बन्ध होता है जो कि उदयरूप ही हैं उनसे भी असंख्यात गुणश्रेणीरूप से वे प्रतिसमय पूर्वसंचित कर्मों की निर्जरा करते हैं, इसलिए उनके कर्मों का संचय नहीं बन सकता है। और तीर्थंकर के मन, वचन तथा काय की प्रवृतियाँ इच्छापूर्वक नहीं होती हैं जिससे उनके नवीन कर्मों का बन्ध होवे। जिस प्रकार सूर्य और कल्पवृक्षों की प्रवृतियाँ स्वाभाविक होती हैं उसी प्रकार उनके भी मन, वचन और काय की प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक अर्थात् बिना इच्छा के समझना चाहिए।

उक्तं च-

पावागमदाराइं, अणाइरुवट्ठियाइं जीवम्मि।

तत्थ सुहासवदारं, उग्घादेंते कउ सदोसो।।
तात्पर्यमेतत्-कश्चिदाशंकते-तीर्थंकरदेवा: दानपूजादिश्रावकधर्मान् उपदिशन्ति तत्र त्रसस्थावरजीवानां हिंसा संभवत्वेव, अतो न ते जिनेन्द्रदेवा: निर्दोषा: ततस्ते न वंदनीया भवन्तीति।
तस्य परिहार: कथ्यते-
यद्यपि तीर्थंकरदेवा: इत्थं श्रावकधर्मान् मुनिधर्मान् च उपदिशन्ति तथापि तेषां न कर्मबंधोऽस्ति, किंच तेषां भगवतां मनोवाक्कायप्रवृत्तय: इच्छापूर्विका: न सन्ति, यथा सूर्यस्य कल्पवृक्षाणां च प्रवृत्तय: स्वभावादेव तथैव भगवतां प्रवृत्तयोऽपि स्वभावादेव।
अन्यच्च-जीवे पापास्रवद्वाराणि अनादिकालात् स्थितानि सन्ति, तेषां विद्यमाने सति य: कश्चित् शुभास्रवद्वाराणि उद्घाटयति स सदोष: कथं भवेत् ? न कथमपि इति ज्ञातव्यं।
पुनश्च-
संजदधम्मकहा वि य, उवासयाणं सदारसंतोसो।
तसवहविरईसिक्खा, थावरघादो त्ति णाणुमदो।।
संयतानां या धर्मकथा अस्ति, तस्या: श्रावकाणां स्वदारसंतोषस्य त्रसवधविरतेश्च शिक्षा एव लभ्यते न च स्थावरघातोऽनुमतो भवति, किंच जिनेन्द्रदेवस्य उपदेशो निवृत्तिरूप एव विद्यते। एतज्ज्ञात्वा संप्रतिप्रचलितपंथभेदस्य दुराग्रहं त्यक्त्वा आर्षकथनानुसारेण प्रवृत्तिर्विधातव्या भव्यजनैरिति।
मंगल प्रार्थना-
अत्र राजस्थानस्य तिजाराख्ये श्रीचन्द्रप्रभातिशयक्षेत्रेऽत्रस्थसमितिजनानामाग्रहेण मयास्मिन् क्षेत्रे सम्मेदशिखरपर्वतस्य रचनां निर्मापयितुं नूतनयोजना कथिता। ततश्च तेषां पदाधिकारिणां प्रार्थनया वीराब्दे द्वाविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे पौषशुक्लैकादश्यां तिथौ मध्याह्नकाले तत्सम्मेदशिखरनिर्माण-स्थलेऽस्मत्सान्निध्ये ब्रह्मचारिरवीन्द्रकुमारेण सह श्रावकै: सविधिना रक्षायंत्रं स्थापितम्। एषा भाविरचना अस्यां विराजयिष्यमाणतीर्थकराणां चरणचिह्नानि श्रीचन्द्रप्रभजिनमूर्तिश्च सर्वतीर्थभाक्तिकानां मम संघस्य च स्वात्मसिद्धिं सर्वमनोरथपूर्तिं च कुर्वन्त्विति याचयामहे श्रीचन्द्रप्रभभगवत्पादयोरुहसमक्षे वयमिति।
प्रभो! त्वां विलोक्य प्रहृष्टं मनो मे। ध्र्वनिर्गद्गदो मोदवाष्पस्रवन्त्यौ।।
दृशौ स्तश्च साफल्यजन्मापि मेऽभूत्। अत: कुड्मलीकृत्य हस्तौ प्रणौमि।।
अथ संयतानामादिगुणस्थाननिरूपणार्थमुत्तरसूत्रावतारो भवति-पमत्तसंजदा।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पमत्तसंजदा-प्रकर्षेण मत्ता: प्रमत्ता:, सं सम्यग् यता: विरता: संयता:। प्रमत्ताश्च ते संयता: प्रमत्तसंयता:। कश्चिदाह-
यदि प्रमत्ता: न संयता:, स्वरूपासंवेदनात्। अथ संयता: न प्रमत्ता:, संयमस्य प्रमादपरिहाररूपत्वादिति ?
आचार्यदेव: समाधानं ददाति-नैष दोष:, संयमो नाम हसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरति: गुप्तिसमित्यनुरक्षित:, नासौ प्रमादेन विनाश्यते, तत्र तस्मान्मलोत्पत्ते:।
संयमस्य मलोत्पादक एवात्र प्रमादो विवक्षितो न तद्विनाशक इति कुतोऽवसीयते इति चेत् ?
संयमाविनाशान्यथानुपपत्ते:। न हि मंदतम: प्रमाद: क्षणक्षयी संयमविनाशकोऽस्ति। सकलसंयम-स्योत्कटरूपेण प्रतिबन्धकस्य प्रत्याख्यानावरणस्याभावे संयमस्य विनाशो भवितुं न शक्यते।
अस्मिन् सूत्रे प्रमत्तवचनमन्तदीपकत्वात् शेषातीतसर्वगुणस्थानेषु प्रमादास्तित्वं सूचयति। अस्मिन् गुणस्थाने संयमापेक्षया क्षायोपशमिको भावोऽस्ति। प्रत्याख्यानावरणसर्वघातिस्पर्धकोदयक्षयात्तेषामेव सतामुदयाभावलक्षणोपशमात् संज्वलनोदयाच्च प्रत्याख्यानसमुत्पत्ते:। अस्मिन् गुणस्थाने त्रीण्यपि सम्यक्त्वानि सन्ति।
सम्यक्त्वमतरेणापि संयम: संभवति न वा ?
न संभवति, किंच, आप्तागमपदार्थेष्वनुत्पन्नश्रद्धस्य त्रिमूढालीढचेतस: संयमानुपपत्ते:।
द्रव्यसंयमस्य नात्रोपादानमिति कुतोऽवगम्यत इति चेत् ?
सम्यक् ज्ञात्वा श्रद्धाय यत: संयत: इति व्युत्पत्तितस्तदवगते:।


कहा भी है—

गाथार्थ—जीव में पापास्रव के द्वार अनादिकाल से स्थित हैं, उनके रहते हुए जो जीव शुभास्रव के द्वार का उद्घाटन करता है अर्थात् शुभास्रव के कारणभूत कार्यों को करता है वह सदोष कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि कोई शंका करता है कि तीर्थंकर देव दान, पूजा आदि श्रावक के धर्म का उपदेश देते हैं उसमें तो त्रस-स्थावर सभी जीवों की हिंसा संभव ही है अत: वे जिनेन्द्रदेव निर्दोष नहीं हैं इसलिए वे वन्दनीय भी नहीं होते हैं। उसका परिहार करते हुए आगे कहते हैं—

यद्यपि तीर्थंकर देव इस प्रकार के श्रावकधर्म और मुनिधर्म का उपदेश देते हैं फिर भी उनके कर्मबंध नहीं है। क्योंकि उन भगवन्तों के मन, वचन, काय की प्रवृत्तियाँ इच्छापूर्वक नहीं होती हैं, जैसे-सूर्य और कल्पवृक्षों की प्रवृतियाँ स्वभाव से ही होती हैं उसी प्रकार भगवन्तों की प्रवृतियाँ भी स्वाभाविक ही हैं।

अन्य और भी देखें—जीव में पापास्रव के द्वार अनादिकाल से स्थित हैंं, उनके विद्यमान रहने पर जो कोई शुभास्रव के द्वारों को उद्घाटित करता है वह सदोष कैसे हो सकता है ? अर्थात् कथमपि सदोषी नहीं हो सकता है ऐसा जानना चाहिए।

पुनश्च—

गाथार्थ—संयमी जनों की धर्मकथा भी उपासकों के स्वदारसन्तोष और त्रसबधविरति की शिक्षारूप होती है अत: उसका यह अभिप्राय नहीं है कि स्थावरघात की अनुमति दी गई है। तात्पर्य यह है कि संयमरूप किसी भी उपदेश से निवृत्ति ही इष्ट रहती है, उससे फलित होने वाली प्रवृत्ति इष्ट नहीं है।

संयतों की जो धर्मकथा है उससे श्रावकों को स्वदारसन्तोष और त्रसबधविरति की शिक्षा ही प्राप्त होती है न कि स्थावरघात की पुष्टि होती है क्योंकि जिनेन्द्रदेव का उपदेश निवृत्तिरूप ही जानना चाहिए। ऐसा जानकर वर्तमान में प्रचलित पंथभेद के दुराग्रह को छोड़कर आर्ष ग्रन्थों के कथनानुसार भव्यजनों को प्रवृत्ति करनी चाहिए।

इष्ट प्रार्थना—

राजस्थान प्रान्त के तिजारा नाम के चंद्रप्रभ अतिशयक्षेत्र में वहाँ की ट्रस्ट समिति के कार्यकर्ताओं के आग्रह से मैंने इस क्षेत्र पर सम्मेदशिखर पर्वत रचना के निमार्ण की नूतन योजना बताई। पुन: उन पदाधिकारियों की प्रार्थनानुसार वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ बाईस (२५२२) की पौषशुक्ला एकादशी तिथि को मध्याह्न काल में उस सम्मेदशिखररचनानिर्माण स्थल पर मेरे संघ सानिध्य में ब्रह्मचारी रवीन्द्रकुमार के साथ श्रावकों ने विधिपूर्वक रक्षायंत्र स्थापित किया।

भविष्य में निर्मित होने वाली यह रचना तथा इसमें विराजमान होने वाले तेईस तीर्थंकरों के चरणचिन्ह एवं श्रीचंद्रप्रभभगवान की जिनप्रतिमा समस्त तीर्थभक्तों की एवं मेरे संघ की स्वात्मसिद्धि तथा समस्त मनोरथों की पूर्ति करें यही श्री चन्द्रप्रभ भगवान् के चरणकमलों के समक्ष हमारी याचना है। पद्यार्थ—हे प्रभो! आपको देखकर मेरा मन हर्षित हो रहा है, वाणी गद्गद् हो रही है तथा नेत्रों से हर्ष के अश्रु झर रहे हैं। मैं अपने जन्म को सफल मानता हुआ आपको अंजलिबद्ध होकर नमस्कार करता हूँ।

विशेषार्थ

—यहाँ शंकाकार का कहना है कि तीर्थंकर श्रावकों को दान, पूजा, शील, उपवास और त्रसबधविरति आदि का उपदेश देते हैं तथा मुनियों को अनशन आदि बारह प्रकार के तपों के पालन करने का उपदेश देते हैं, इसलिए वे निर्दोष नहीं हो सकते, क्योंकि इन क्रियाओं में जीव-विराधना देखी जाती है। दान के लिए भोजन का पकाना-पकवाना, अग्नि का जलाना-जलवाना, बुझाना-बुझवाना, हवा का करना-करवाना आदि आरंभ करना पड़ता है। पूजन के लिए मंदिर या मूर्ति का बनाना-बनवाना, प्रक्षाल आदि का करना-करवाना आदि आरंभ करना पड़ता है। शील के पालन करने में अपनी स्त्री से संयोग का त्याग होने से उसको कष्ट होता है। तथा त्रसवध से विरति के उपदेश में स्थावरघात की सम्मति प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार जब साधु अनशन आदि को करते हैं तब एक तो उनके पेट में स्थित जीवों की विराधना होती है। दूसरे साधुओं को भी अनशनादि के करने में कष्ट होता है, अत: तीर्थंकर का उपदेश सावद्य होने से वे निर्दोष नहीं कहे जा सकते हैं और इसलिए उनकी स्तुति नहीं करनी चाहिए।

श्री वीरसेनस्वामी ने इस शंका का समाधान दो प्रकार से किया है। प्रथम तो यह बतलाया है कि मिथ्यात्वादि चार बंध के कारण हैं। इनमें से प्रारम्भ के तीन कारण तीर्थंकर भगवान के नहीं पाये जाते हैं। यद्यपि उनके योग के निमित्त से सातारूप कर्मों का आस्रव होता है पर वह उदयरूप ही होता है, अत: नवीन कर्मों में स्थिति और अनुभाग नहीं पड़ता है और स्थिति तथा अनुभाग के बिना कर्मबन्ध का कहना औपचारिक है। तथा पूर्वसंचित कर्मों की निर्जरा भी उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी होती रहती है, अत: तीर्थंकर जिन इनकी अपेक्षा तो सावद्य कहे नहीं जा सकते हैं। योग के विद्यमान रहने से यद्यपि उनके प्रवृत्तियाँ पाई अवश्य जाती हैं पर क्षायोपशमिक ज्ञान और कषाय के नहीं रहने से वे सब प्रवृत्तियाँ अनिच्छापूर्वक होती हैं, इसलिए वे प्रवृत्तियाँ भी सावद्य नहीं कही जा सकती हैं। यद्यपि एक पर्याय से दूसरी पर्याय के प्रति जीव बिना इच्छा के ही गमन करता है। तथा सुप्तादि अवस्थाओं में भी बिना इच्छा के व्यापार देखा जाता है तो भी यहाँ कषायादि अंतरंग कारणों से विद्यमान रहने से वे सावद्य ही हैं, निरवद्य नहीं, किन्तु तीर्थंकर जिन क्षीणकषायी हैं, अत: उनकी प्रवृत्तियाँ पापास्रव की कारण नहीं हैं, अत: तीर्थंकर जिन निरवद्य हैं। दूसरे सभी संसारी जीवों की प्रवृत्तियाँ सराग पाई जाती हैं, अत: तीर्थंकर जिन अपने उपदेश द्वारा उनके त्याग की ओर संसारी जीवों को लगाते हैं। जो पूरी तरह से इनका त्याग करने में असमर्थ हैं उन्हें आंशिक त्याग का उपदेश देते हैं और जो उनका पूरा त्याग कर सकते हैं उन्हें पूरे त्याग का उपदेश देते हैं। एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा तथा आरंभ करना श्रावकों का कर्तव्य है यह उनके उपदेश का सार नहीं है, किन्तु उनके उपदेश का सार यह है कि यदि श्रावक आरम्भादि का त्याग करने में असमर्थ हैं तो भी उन्हें यत्नाचारपूर्वक प्रवृत्ति करनी चाहिए। त्रस हिंसा तो कभी भी नहीं करनी चाहिए। इसी प्रकार मुनियोें के बाह्य वस्तु में जो राग और द्वेष रूप प्रवृत्ति पाई जाती है उसके त्याग के लिए ही मुनियों को अनशन आदि का उपदेश दिया जाता है। उसका उद्देश्य दूसरे जीवों का वध नहीं है, अत: तीर्थंकर जिन श्रावकधर्म और मुनिधर्म का उपदेश देते हुए भी सावद्य नहीं कहे जा सकते हैं और इसीलिये वे विबुधजनों से वंदनीय हैं यह सिद्ध होता है। अब संयतों के आदि-प्रारम्भिक-प्रथम गुणस्थान निरूपण हेतु उत्तर सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से प्रमत्तसंयत जीव हैं।।१४।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—प्रकर्ष से मत्त जीवों को प्रमत्त कहते हैं और अच्छी तरह से विरत या संयम को प्राप्त जीवों को संयत कहते हैं। जो प्रमत्त होते हुए भी संयत होते हैं उन्हें प्रमत्तसंयत कहते हैं।

शंका—यदि छठे गुणस्थानवर्ती जीव प्रमत्त हैं तो संयत नहीं हो सकते हैं क्योंकि प्रमत्त जीवों को अपने स्वरूप का संवदेन नहीं हो सकता है। यदि वे संयत हैं तो प्रमत्त नहीं हो सकते हैं क्योंकि संयमभाव प्रमाद के परिहारस्वरूप होता है।

समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि हिंसा, असत्य, स्तेय, अब्रह्म और परिग्रह इन पाँच पापों से विरतिभाव को संयम कहते हैं जो कि तीन गुप्ति और पाँच समितियों से अनुरक्षित है। वह संयम वास्तव में प्रमाद से नष्ट नहीं किया जा सकता है क्योंकि संयम में प्रमाद से केवल मल की ही उत्पत्ति होती है।

शंका—छठे गुणस्थान में संयम में मल उत्पन्न करने वाला ही प्रमाद विवक्षित है, संयम का नाश करने वाला प्रमाद विवक्षित नहीं है यह बात कैसे निश्चय की जाय ?

समाधान—इस गुणस्थान में प्रमाद के रहते हुए संयम का सद्भाव अन्यथा नहीं बन सकता है इसलिए निश्चय होता है कि यहाँ पर मल को उत्पन्न करने वाला प्रमाद ही अभीष्ट है। दूसरी बात यह है कि छठे गुणस्थान में होने वाला स्वल्पकालवर्ती मन्दतम प्रमाद संयम का नाश भी नहीं कर सकता है क्योंकि सकल संयम का उत्कटरूप से प्रतिबन्ध करने वाले प्रत्याख्यानावरण के अभाव में संयम का नाश नहीं पाया जाता है।

इस सूत्र में ‘‘प्रमत्त’’ वचन अंत दीपक होने से नीचे के-इससे पूर्व के सभी गुणस्थानों में प्रमाद का अस्तित्व सूचित हो जाता है अर्थात् मिथ्यात्व से लेकर देशविरत तक पाँचों गुणस्थान प्रमत्त ही होते हैं यह निश्चित हो जाता है। इस छठे गुणस्थान में संयम की अपेक्षा क्षायोपशमिक भाव है। प्रत्याख्यानावरण सर्वघातिस्पर्धकों के उदयाभावी क्षय से उनके होने पर ही उदयाभावलक्षण उपशम से और संज्वलन कषाय के उदय से प्रत्याख्यान की उत्पत्ति बन जाती है। इस गुणस्थान में क्षायिक, क्षायोपशमिक और औपशमिक ये तीनों ही सम्यक्त्व हो सकते हैं।

प्रश्न—सम्यक्त्व के बिना भी संयम हो सकता है या नहीं ?

'उत्तर—नहीं होता है क्योंकि आप्त, आगम और पदार्थों में जिसके श्रद्धा ही उत्पन्न नहीं हुई उस जीव के तीन मूढ़ता से सहित होने के कारण संयम की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

प्रश्न—द्रव्य संयम का यहाँ पर ग्रहण नहीं किया है यह कैसे जाना जाय ?

उत्तर—नहीं, क्योंकि सम्यक् प्रकार से जानकर और श्रद्धान करके जो यम सहित है उसे संयत कहते हैं। संयत शब्द की इस प्रकार व्युत्पत्ति करने से यह जाना जाता है कि यहाँ पर द्रव्यसंयम का ग्रहण नहीं किया है।

उक्तं च-

वत्तावत्तपमाए, जो वसइ पमत्तसंजदो होइ।

सयल-गुण-सील-कलिओ, महव्वई चित्तलायरणो।।
व्यक्तेक-स्वसंवेद्ये, अव्यत्तेक-प्रत्यक्षज्ञानिनामेव संवेद्ये च प्रमादे य: संयतो वर्तते स चारित्रमोहनीय-क्षयोपशममाहात्म्येन सकलगुणशीलकलितो महाव्रती अपि भवति। अत्र साकल्यं महत्त्वं च देशसंयतापेक्षया ज्ञातव्यं। तत: कारणादेव प्रमत्तसंयत: चित्रलाचरण इत्युक्तं। चित्रं-प्रमादमिश्रं लातीति चित्रलं, चित्रलं आचरणं यस्यासौ चित्रलाचरण:। अथवा चित्रल:-सारंग: तद्वत् शवलितं आचरणं यस्यासौ चित्रलाचरण:। अथवा चित्तं लातीति चित्तलं आचरणं यस्यासौ चित्तलाचरण: इति विशेषव्युत्पत्तिरपि ज्ञातव्या।
अथ तेषां प्रमादानां नामसंख्याप्रदर्शनार्थं गाथासूत्रं वर्तते-
विकहा तहा कसाया, इंदिय-णिद्दा तहेव पणयो य।
चदु-चदु-पण-मेगेगं, होंति पमादा य पण्णरसा।।
संयमविरुद्धा: कथा: विकथा:, कषन्ति-हिंसन्ति संयमगुणमिति कषाया:, संयमविरोधीन्द्रियव्यापारा: इन्द्रियाणि, स्त्यानगृद्ध्यादिकर्मत्रितयोदयेन निद्रा, प्रचलातीव्रोदयेन वा समुद्भूता जीवस्य स्वार्थसामान्य-ग्रहणप्रतिबन्धिका जाड्यावस्था निद्रा। बाह्यार्थेषु ममत्वरूप: प्रणय:, एते यथासंख्यं चतस्र:, चत्वार:, पंच, एका, एक: सर्वे मिलित्वा प्रमादा: पंचदश भवन्ति। अथ गाथायां प्रथमोद्दिष्टस्तथाशब्द: सर्वप्रमादसाधा-रण्यज्ञापनार्थ:, द्वितीयस्तथाशब्द: समुच्च्यार्थ:।
अत्र प्रमादालापोत्पत्तिनिमित्ताक्षसंचारहेतुविशेष: संख्या, एषां न्यास: प्रस्तार:, अक्षसंचार: परिवर्तनं, संख्यां धृत्वा अक्षानयनं नष्टं, अक्षं धृत्वा संख्यानयनं समुद्दिष्टं। एते पंचप्रकारा: प्रमादसमुत्कीर्तने ज्ञेया भवन्ति।
अस्य विस्तर:-चतस्र: विकथा: चतुर्भि: कषायै: गुणिता: षोडश, पुन: पंचेन्द्रियैर्गुणिता: अशीति: भवन्ति, तथैव एकया निद्रया गुणिते अशीतिरेव पुनश्च एकेन प्रणयेन गुणिते सति अशीतिरेव प्रमादा: भवन्ति।
एते संख्याप्रस्तारादयो गोम्मटसारजीवकाण्डे टीकायां दृष्टव्या: अत्र न प्रतन्यते-
अथवा प्रमादस्य पंचशताधिकसप्तत्रिंशत्सहस्रप्रमिता: भेदा: सन्ति-
तद्यथा-स्त्रीकथा अर्थकथा भोजनकथा राजकथा चोरकथा वैरकथा परपाखंडकथा देशकथा भाषाकथा गुणबंधकथा देवीकथा निष्ठुरकथा परपैशून्यकथा कंदर्पकथा देशकालानुचितकथा भण्डकथा मूर्खकथा आत्मप्रशंसाकथा परपरिवादकथा परजुगुप्साकथा परपीडाकथा कलहकथा परिग्रहकथा कृष्याद्यारम्भकथा संगीतवाद्यकथा चेति विकथा: पंचविंशति: (२५)। षोडशकषाय-नवनोकषायभेदेन कषाया: पंचविंशति: (२५)। स्पर्शनरसनघ्राणचक्षु:श्रोत्रमनोनामानि इन्द्रियाणि षट् (६)। स्त्यानगृद्धि: निद्रानिद्रा प्रचलाप्रचला निद्रा प्रचला चेति निद्रा पंच (५)। स्नेहो मोहश्चेति द्वौ (२)। एतेषु उपरितनभंगेषु एकैकस्मिन् अधस्तनभंगा:, अधस्तनभंगेषु एकैकस्मिन्नुपरितनभंगाश्च सर्वे मिलन्तीति परस्परं गुणितेषु पञ्चशताधिकसप्तत्रिंशत्सहस्रप्रमिता: तत्प्रमादा: भवन्ति (३७५००)। एतेऽपि मिथ्यादृष्ट्यादिप्रमत्तसंयतगुणस्थानावसानेषु यथासंभवं बन्धहेतुत्वेन संभवन्त: संख्यादिपंचप्रकारै: आगमाविरोधेन योजनीया:।
इमे षष्ठगुणस्थानवर्तिन: साधव: नग्नदिगम्बरमुनय एव, आचार्योपाध्यायसाधुभेदेन त्रिविधा भवन्ति। एतेषामष्टाविंशतिमूलगुणा२ नियमेनैव। अष्टाविंशतिकृतिकर्माण्यपि अहोरात्रचर्यायां भवन्ति।


हिन्दी अनुवाद-कहा भी है-

गाथार्थ—जो व्यक्त और अव्यक्त प्रमाद में वास करता है, जो सकल गुण और शील से युक्त है वह महाव्रती चित्रलआचरण-प्रमादमिश्रित होता है।

व्यक्त-स्वसंवेद्य-स्वयं के जानने योग्य और अव्यक्त-प्रत्यक्षज्ञानियों के ज्ञान द्वारा जानने योग्य प्रमाद में जो संयत है वह चारित्रमोहनीय कर्म के क्षयोपशम के माहात्म्य से सकल गुण और शील से सहित-सम्यक्त्व एवं ज्ञानादि सम्पूर्ण गुणों से और व्रतों के रक्षण करने में समर्थ ऐसे शीलों से युक्त महाव्रती भी होता है। यहाँ सकलपना और महाव्रतीपना देशसंयत की अपेक्षा जानना चाहिए। इसी कारण प्रमत्तसंयत जीव चित्रल-प्रमादयुक्त चितकबरे आचरण वाला होता है।

चित्र-प्रमाद से मिश्रित आचरण को लाने वाला चित्रल है, वह चित्रलआचरण है जिसका वह चित्रलाचरण जीव कहलाता है। अथवा चित्रल-हिरण, तद्वत्-हिरण के समान चितकबरा आचरण है जिसका उसको चित्रलाचरण जीव कहते हैं। अथवा चित्त को जो लाता है अर्थात् मन को चंचल करने वाला वह चित्तल आचरण है जिसका वह चित्तलाचरण है। यह विशेष व्युत्पत्ति भी जानना चाहिए। अब उन प्रमादों के नाम और संख्या को प्रदर्शित करने के लिए गाथासूत्र कहते हैं—


गाथार्थ—चार विकथा (स्त्रीकथा, भक्तकथा, राष्ट्रकथा, अवनिपालकथा), चार कषायें, पाँच इंद्रियाँ, निद्रा और प्रणय इस प्रकार प्रमाद के पंद्रह भेद होते हैं। संयम की विरोधी कथा विकथा कहलाती है, संयमगुण का घात करने वाली कषाय हैं। संयमविरोधी इंद्रियों का व्यापार इंद्रिय हैं अर्थात् पंचेन्द्रिय विषयों के व्यापार में प्रवृत्त इंद्रियाँ यहाँ ग्राह्य हैं। स्त्यानगृद्धि आदि तीनों कर्मों के उदय से निद्रा आती है अथवा प्रचलाकर्म के तीव्र उदय से उत्पन्न जीव के अपने और पर पदार्थ संबंधी सामान्य ग्रहण का प्रतिबन्ध करने वाली-रोकने वाली जड़तारूप अवस्था का नाम ‘निद्रा’ है। बाह्य पदार्थों में ममत्व भाव ‘प्रणय’ है, ये सब यथाक्रम से चार, चार, पाँच, एक, एक सब मिलकर ४±४±५±१±१·१५ भेद होते हैं अर्थात् चार विकथा, चार कषाय, पाँच इंद्रियाँ, एक निद्रा, और एक प्रणय ये पंद्रह प्रमाद हैंं। गाथा मे जो ‘तथा’ शब्द प्रथम बार आया है वह समस्त प्रमादों के साधारणपने को ज्ञापित करता है और द्वितीय ‘तथा’ शब्द समुच्चय का सूचक है।

यहाँ प्रमाद के आलापों की उत्पत्ति में निमित्त अक्ष संचार का हेतुविशेष ‘संख्या’ कहलाती है, उनका न्यास-स्थापन ‘प्रस्तार’ है, अक्षसंचार को ‘परिवर्तन’ कहते हैं, संख्या को रख करके अक्ष का लाना ‘नष्ट’ है, अक्ष को रख करके संख्या का निकालना-लाना ‘समुद्दिष्ट’ है। प्रमादसमुत्कीर्तना में ये पाँच प्रकार जाने जाते हैं।

इसका विस्तार करते हैं-चार विकथाओं को चार कषायों से गुणित करने पर सोलह (१६) भेद हुए, पुन: सोलह को पाँच इंद्रियों से गुणा करने पर १६²५·८० अस्सी भेद होते हैं। उनको एक निद्रा से गुणा करने पर अस्सी ही रहे और अस्सी को पुन: एक प्रणय के गुणा करने पर प्रमाद के अस्सी भेद ही होते हैं। ये संख्या, प्रस्तार आदि गोम्मटसार जीवकाण्ड की टीका में देखना चाहिए यहाँ उनका विस्तार नहीं किया जाता है। अथवा प्रमाद के सैंतीस हजार पाँच सौ (३७५००) भेद हैं—

वे इस प्रकार हैं—स्त्रीकथा, अर्थकथा, भोजनकथा, राजकथा, चोरकथा, वैरकथा, परपाखंड कथा, देशकथा, भाषाकथा, गुणबंधककथा, देवीकथा, निष्ठुरकथा, परपैशून्यकथा, कन्दर्पकथा, देशकालानुचितकथा, भण्डकथा, मूर्खकथा, आत्मप्रशंसाकथा, परपरिवादकथा, परजुगुप्साकथा, परपीडाकथा, कलहकथा, परिग्रहकथा, कृषि आदि आरंभ की कथा और संगीत वाद्यकथा ये पच्चीस विकथाएँ हैं। सोलह कषाय और नौ नोकषाय के भेद से पचीस कषायें हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र और मन ये छह इंद्रियों के नाम हैं। स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, निद्रा और प्रचला ये पाँच निद्राएँ हैं। स्नेह और मोह ये दो हैं। इन सब उपरितन भंगों में एक-एक में अधस्तन भंग होते हैं और अधस्तन भंगों में एक-एक में उपरितन भंग होकर सब मिल जाते हैं इस प्रकार उनको परस्पर में गुणा कर देने पर सैंतीस हजार पाँच सौ (३७५००) भंग हो जाते हैं। इन सभी को मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर प्रमत्तसंयत छठे गुणस्थान तक यथासंभव बन्धहेतुरूप से संभव होते हुए संख्या आदि पाँच प्रकार के द्वारा अविरोधीआगम से नियोजित कर लेना चाहिए।

ये छठे गुणस्थानवर्ती साधु नग्न दिगम्बर मुनि ही आचार्य, उपाध्याय, साधु के भेद से तीन प्रकार के होते हैं। उनके नियम से अट्ठाईस मूलगुण होते हैं और अट्ठाईस कृतिकर्म भी अहोरात्रि की चर्या में होते हैं।