029.द्वितीय महाधिकार - मुनियों के २८ कृतिकर्म.....

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द्वितीय महाधिकार - मुनियों के २८ कृतिकर्म

उक्तं च मूलाचारग्रन्थे श्रीकुन्दकुन्ददेवेन-


चत्तारि पडिक्कमणे, किदियम्मा तिण्णि होंति सज्झाए।
पुव्वण्हे अवरण्हे, किदियम्मा चोद्दसा होंति।।६०२।।

टीकायां श्रीवसुनन्दिसिद्धान्तचक्रवर्तिना प्रोउक्तं-

अथवा पश्चिमरात्रौ प्रतिक्रमणे क्रियाकर्माणि चत्वारि स्वाध्याये त्रीणि वंदनायां द्वे, सवितर्युदिते स्वाध्याये त्रीणि मध्यान्हवंदनायां द्वे एवं पूर्वाण्हक्रियाकर्माणि चतुर्दश भवन्ति, तथा अपराण्हवेलायां स्वाध्याये त्रीणि क्रियाकर्माणि प्रतिक्रमणे चत्वारि वंदनायां द्वे योगभक्तिग्रहणोपसंहारकालयो: द्वे, रात्रौ प्रथमस्वाध्यायेत्रीणि। एवमपराण्हक्रियाकर्माणि चतुर्दश भवन्ति, प्रतिक्रमस्वाध्यायकालयोरुपलक्षणत्वादिति। अन्यान्यपि क्रियाकर्माण्यत्रैवान्तर्भवन्ति नाव्यापकत्वमिति संबंध:। पूर्वाण्हसमीपकाल: पूर्वाण्ह इत्युच्यतेऽपराण्हसमीप-कालोऽपराण्ह इच्युच्यते तस्मान्न दोष: इति।
उक्तं चानगारधर्मामृतेऽपि-

स्वाध्याये द्वादशेष्टा षड्, वंदनेऽष्टौ प्रतिक्रमे।
कायोत्सर्गा योगभक्तौ, द्वौ चाहोरात्रगोचरा:।।

अधुना कृतिकर्मणो लक्षणमुच्यते-दोणदं तु जधाजादं, वारसावत्तमेव च।
चदुस्सिरं तिसुद्धं च, किदियम्मं पउंजदे।।६०३।।


दोणंद-द्वे अवनती पंचनमस्कारादावेकावनतिर्भूमिसंस्पर्शस्तथा चतुर्विंशतिस्तवादौ द्वितीयावनति: शरीरनमनं द्वे अवनती, जधाजादं-यथाजातं। वारसावत्तमेव च-द्वादशावर्ता एवं च पंचनमस्कारोच्चारणादौ त्रय आवर्तास्तथा पंचनमस्कारपूर्वकसामायिकदण्डकस्य समाप्तौ त्रय आवर्ता:। तथा थोस्सामि इति चतुर्विंशतिस्तवादौ त्रय आवर्तास्तथा चतुर्विंशतिस्तवसमाप्तौ त्रय आवर्ता इति द्वादशावर्ता भवन्ति। चदुस्सिरं-चत्वारि शिरांसि पंचनमस्कारस्यादौ अंते च करमुकुलांकितशिर:करणं तथा चतुर्विंशतिस्तवस्यादावन्ते च करमुकुलांकितशिर: करणमेवं चत्वारि शिरांसि भवन्ति। तिसुद्धं-मनोवाक्कायशुद्धं, किदियम्मं पउंजदे-कृतिकर्म प्रयुंत्तेक करोतीत्यर्थ:।

इमे प्रमत्तसंयता: षडावश्यकक्रियां पंचपरमेष्ठिनमस्कारं असही-निसही इति त्रयोदशविधक्रियां कुर्वाणा: आत्मसिद्धिं साधयन्तीति ज्ञातव्यम्।
क्षायोपशमिकसंयमेषु शुद्धसंयमोपलक्षितगुणस्थाननिरूपणार्थं उत्तरसूत्रावतारो भवति-अप्पमत्तसंजदा।।१५।।

सिद्धान्तचिंतामणि टीका-प्रमत्तसंयता: पूर्वोक्तलक्षणा:, न प्रमत्तसंयता: अप्रमत्तसंयता: पञ्चदशप्रमाद-रहितसंयता: इति। अस्मिन् गुणस्थानेऽपि क्षायोपशमिको भावोऽस्ति, प्रत्याख्यानावरणीयकर्मण: सर्वघातिस्पर्ध-कोदयक्षयात्तेषामेव सतां पूर्ववदुपशमात् संज्वलनोदयाच्च प्रत्याख्याननामसंयमोत्पत्ते:, अत्रापि त्रीणि सम्यक्त्वानि भवन्ति। अत्र निर्विकल्पध्यानरूपेण शुद्धोपयोगोऽपि भवति।

मूलाचार ग्रंथ में श्रीकुन्दकुन्ददेव ने कहा है—

गाथार्थप्रतिक्रमण में चार कृतिकर्म, स्वाध्याय में तीन ये पूर्वाह्न और अपराह्न से संबंधित ऐेसे चौदह कृतिकर्म होते हैं।।६०२।।

इसकी टीका में श्रीवसुनन्दि सिद्धान्तचक्रवर्ती ने कहा है—

अथवा पश्चिमरात्रि के प्रतिक्रमण में क्रियाकर्म चार, स्वाध्याय मे तीन और वंदना में दो, सूर्य उदय होने के बाद स्वाध्याय के तीन, मध्यान्ह वंदना के दो इस प्रकार पूर्वाह्न संबंधी चौदह कृतिकर्म होते हैं तथा अपराह्न बेला में स्वाध्याय के तीन क्रियाकर्म, प्रतिक्रमण में चार, वंदना में दो, योगभक्ति ग्रहण और उपसंहार में दो एवं रात्रि में प्रथम स्वाध्याय के तीन इस तरह अपराह्न संबंधी चौदह क्रियाकर्म होते हैं। गाथा में प्रतिक्रमण और स्वाध्याय काल उपलक्षण रूप है इससे अन्य भी क्रियाकर्म इन्हीं में अंतर्भूत हो जाते हैं। अत: अव्यापक दोष नहीं आता है। चूँकि पूर्वाह्न के समीप का काल पूर्वाह्न कहलाता है और अपराह्न के समीप का काल अपराह्न कहलाता है इसलिए कोई दोष नहीं है।

अनगारधर्मामृत में भी कहा है—

गाथार्थ—स्वाध्याय के बारह, वंदना के छह, प्रतिक्रमण के आठ और योगभक्ति के दो ऐसे अहोरात्र सम्बन्धी अट्ठाईस कायोत्सर्ग होते हैं।

अब कृतिकर्म का लक्षण कहते हैं—

गाथार्थ

—जातरूप-मुनि दो अवनति, बारह आवर्त, चार शिरोनति और तीन शुद्धि सहित कृतिकर्म का प्रयोग करें।।६०३।।

दो अवनति-पंच नमस्कार की आदि में एक अवनति अर्थात् भूमिस्पर्शनात्मक नमस्कार करना तथा चतुर्विंशतिस्तव के आदि में दूसरी बार अवनति-शिर का नमाना अर्थात् भूमिस्पर्शनात्मक नमस्कार करना, ये दो अवनति हैं। यथाजात-जातरूपधारी क्रोध, मान, माया और संग-परिग्रह या लोभ आदि रहित कृतिकर्म को मुनि करते हैं। द्वादश आवर्त-पञ्च नमस्कार के उच्चारण के आदि में मन वचन काय के संयमनरूप शुभयोगों की प्रवृत्ति होना ये तीन आवर्त, पञ्चनमस्कार की समाप्ति में मन वचन काय की शुभवृत्ति होना ये तीन आवर्त तथा चतुर्विंशतिस्तव के आदि में मन वचन काय की शुभ वृत्ति होना ये तीन आवर्त एवं चतुर्विंशतिस्तव की समाप्ति में शुभ मन वचन काय की प्रवृत्ति होना ये तीन आवर्त-ऐसे मनवचनकाय की शुभ प्रवृत्तिरूप बारह आवर्त होते हैं अथवा चारों दिशाओं में चार प्रणाम एक भ्रमण में, ऐसे ही तीन बार के भ्रमण में बारह हो जाते हैं।

चतु:शिर-पञ्चनमस्कार के आदि और अंत में कर मुकुलित करके अंजलि जोड़कर माथे से लगाना तथा चतुर्विंशतिस्तव के आदि और अंत में कर मुकुलित करके माथे से लगाना ऐसे चार शिर-शिरोनति होती हैं।

त्रिशुद्धि-मन, वचन, काय की शुद्धिपूर्वक कृतिकर्म का प्रयोग किया जाता है ऐसा अर्थ हुआ। ये प्रमत्तसंयत मुनि छह आवश्यक क्रिया, पञ्चपरमेष्ठी नमस्कार और असही-निसही ये तेरह प्रकार की क्रिया को करते हुए आत्मसिाqद्ध को करते हैं ऐसा जानना चाहिए। अब क्षायोपशमिक संयमों में शुद्ध संयम से उपलक्षित गुणस्थान के निरूपण करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं—

सूत्रार्थ—

सामान्य से अप्रमत्तसंयत जीव हैं।।१५।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—प्रमत्तसंयतों का स्वरूप पहले कह आए हैं, जिनका संयम प्रमाद सहित नहीं होता है उन्हें अप्रमत्तसंयत कहते हैं अर्थात् संयत होते हुए जिन जीवों के पंद्रह प्रकार का प्रमाद नहीं पाया जाता है उन्हें अप्रमत्तसंयत समझना चाहिए।

इस गुणस्थान में क्षायोपशमिक भाव है, प्रत्याख्यानावरण कर्म के सर्वघाति स्पर्धकों के उदयक्षय से और आगामी काल में उदय में आने वाले उन्हीं के उदयाभाव लक्षण उपशम होने से तथा संज्वलन कषाय के मंद उदय से प्रत्याख्यान नामके संयम की उत्पत्ति होती है। यहाँ भी तीन सम्यक्त्व होते हैं। यहाँ निर्विकल्पध्यानरूप से शुद्धोपयोग भी होता है।


उक्तं च-

णट्ठासेस-पमाओ, वय-गुण-सीलोलि-मंडिओ णाणी।

अणुवसमओ अक्खवओ, झाणणिलीणो हु अपमत्तो।।
य: नष्टाशेषप्रमाद: व्रतगुणशीलावलीभिर्मण्डित: सम्यग्ज्ञानोपयोगयुक्त: धम्र्यध्याननिलीनमना: अप्रमत्तसंयत: यावदुपशमश्रेण्यभिमुख: क्षपकश्रेण्यभिमुखो वा चटितुं न वर्तते तावत् स खलु स्वस्थानाप्रमत्त इच्युच्यते। अत्र ज्ञानीति विशेषणं सम्यग्दर्शनचारित्रवत् सम्यग्ज्ञानस्यापि मोक्षहेतुत्वं सूचयति।

अथ तावत् विस्तर:-सप्तमगुणस्थानस्य द्वौ भेदौ स्त:-स्वस्थानाप्रमत्तसंयत: सातिशयाप्रमत्तसंयतश्च।
अद्यत्वे जंबूद्वीपस्य भरतक्षेत्रे दु:षमकाले मुनयो हीनसंहननधारिण: सन्ति, ते स्वस्थानाप्रमत्तसंयता: एव भवितुमर्हन्ति न चोपरितना:।

अथ सातिशयाप्रमत्तस्वरूपमाह-

इगबीसमोहखवणुव-समणणिमित्ताणि तिकरणाणि तहिं।
पढमं अधापमत्तं, करणं तु करेदि अपमत्तो।।

य: प्रतिसमयमनन्तगुणविशुद्धिवृद्ध्या वर्धमानो वेदकसम्यग्दृष्टि: अप्रमत्तसंयत: स: प्रथमं अनन्तानुबन्धिचतुष्टयं करणत्रयपूर्ववंâ संक्रमणविधानेन द्वादशकषायनवनोकषायस्वरूपेण विसंयोजयति-परिणामयति तदनन्तरमन्तर्मुहूर्तकालं विश्राम्य पुनरपि करणत्रयेण दर्शनमोहत्रयमुपशमय्य द्वितीयोपशम-सम्यग्दृष्टिर्भवति। अथवा तत्करणत्रयेण तद्दर्शनमोहत्रयं क्षपयित्वा क्षायिकसम्यग्दृष्टिर्भवति। तदनंतरं अंतर्मुहूर्तकालपर्यंतं प्रमत्ताप्रमत्तगुणस्थानयो: परावृत्तिसहस्राणि करोति। तदनन्तरं प्रतिसमयमनन्तगुणविशुद्धि-वृद्ध्या वर्धमान: एकविंशतिचारित्रमोहनीयप्रकृतिरुपशमयितुमुद्युक्तो भवति। अथवा ता: एव एकविंशतिचारित्रमोहप्रकृती: क्षपयितुं क्षायिकसम्यग्दृष्टिरेवोद्युक्तो भवति। स एवंविध: सातिशयाप्रमत्त एव चारित्रमोहोपशमनक्षपणनिमित्तकरणत्रयपरिणामेषु मध्ये प्रथमं अध:प्रवृत्तकरणं करोतीत्यर्थ:।
अथाध:प्रवृत्तकरणस्य निरुक्तिसिद्धमर्थं कथयति-
जम्हा उवरिमभावा, हेट्ठिमभावेहि सरिसगा होंति।
तम्हा पढमं करणं, अधापवत्तोति णिद्दिट्ठं।।
यस्मात्कारणात् यस्य जीवस्य उपरितनोपरिसमयस्थितपरिणामै: सह अन्यजीवस्य अधस्तनसमय-परिणामा: सदृशा भवन्ति तस्मात्कारणात् तत्प्रथमं करणं अध:प्रवृत्तकरणमिति निर्दिष्टं-परमागमे प्रतिपादितं भवति। अस्य गुणस्थानस्य गणितरूपेण विस्तर: गोम्मटसारजीवकाण्डटीकायां दृष्टव्यमस्ति।
एवं असंयतसम्यग्दृष्टेर्जघन्यान्तरात्मन: स्वरूपप्रतिपादनपरं एकं सूत्रं, देशसंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां मध्यमान्तरात्मनां स्वरूपप्रतिपादनपराणि त्रीणि सूत्राणि चैतद् तृतीयअन्तराधिकारे सूत्रचतुष्ट्यं गतम्।

अधुना चारित्रमोहोपशमकक्षपकेषु प्रथमगुणस्थानस्वरूपनिरूपणार्थमुत्तरसूत्रावतार: क्रियते श्रीमद् भगवत्पुष्पदन्ताचार्येण-अपुव्वकरण-पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु अत्थि उवसमा खवा।।१६।

सिद्धान्तचिंतामणि टीका-अपुव्वकरणपविट्ठसुद्धिसंजदेसु-न पूर्वा: अपूर्वा:, करणा: परिणामा:, तेषु प्रविष्टा शुद्धिर्येषां ते अपूर्वकरणप्रविष्टशुद्धय:, ते च संयता: अपूर्वकरणप्रविष्टशुद्धिसंयता:, तेषु संयतेषु, अत्थि-सन्ति। के ते ? उवसमा खवा-उपशमा: उपशमश्रेण्यारोहका मुनय:, क्षपका: क्षपकश्रेण्यारोहकाश्च। नानाजीवापेक्षया प्रतिसमयमादित: क्रमप्रवृद्धासंख्येयलोकपरिणामस्यास्य गुणस्थानस्यांतर्विवक्षितसमय-वर्तिप्राणिनो व्यतिरिच्यान्यसमयवर्तिप्राणिभिरप्राप्या अपूर्वा अत्रतनपरिणामैरसमाना इति यावत्।

एतेनापूर्वविशेषणेन अध:प्रवृत्तपरिणामव्युदास: कृत इति द्रष्टव्य:, तत्रतनपरिणामानामपूर्वत्वाभावात्। अपूर्वकरणानामन्त: प्रविष्टशुद्धय: क्षपकोपशमकसंयता:, सर्वे संभूय एको गुण: ‘अपूर्वकरण’ इति।


कहा भी है—

गाथार्थ—जिसके व्यक्त और अव्यक्त सभी प्रकार के प्रमाद नष्ट हो गए हैं, जो व्रत, गुण और शीलों से मंडित हैं, जो निरन्तर आत्मा और शरीर के भेदविज्ञान से युक्त हैं जो उपशम और क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ नहीं हुए हैं और जो ध्यान में लवलीन हैं उन्हें अप्रमत्तसंयत कहते हैं। इन्हें ‘स्वस्थानाप्रमत्त’ संज्ञा से जाना जाता है। यहाँ ‘‘ज्ञानी’’ यह विशेषण सम्यग्दर्शन और चारित्र के समान सम्यग्ज्ञान के भी मोक्षहेतुपने को सूचित करता है।

अब उसी का विस्तार करते हैं—सप्तम गुणस्थान के दो भेद हैं-स्वस्थानाप्रमत्त और सातिशयाप्रमत्त।

आज जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में दुषमकाल में हीनसंहननधारी मुनि हैं, वे स्वस्थानाप्रमत्त ही हो सकते हैं, सातिशय अप्रमत्त नहीं हैं।

अब सातिशय अप्रमत्त का स्वरूप बतलाते हैं—

गाथार्थ—चारित्रमोहनीय की इक्कीस प्रकृतियों के क्षय और उपशम के निमित्त से तीन करण होते हैं, उनमें से अध:प्रवृत्तकरण नामका प्रथम करण अप्रमत्त संयत जीव करता है।

जो प्रतिसमय अनंतगुणविशुद्धिरूप वृद्धि से वर्धमान वेदक सम्यग्दृष्टि अप्रमत्तसंयत जीव है वह पहले अनंतानुबंधी चतुष्टय को तीनकरण पूर्वक संक्रमण विधान के द्वारा बारह कषाय, नव नोकषाय स्वरूप से विसंयोजन करता है-परिणमन कराता है, पुन: अंतर्मुहूर्त काल तक विश्राम करके फिर तीन करणों के द्वारा दर्शनमोह की तीन प्रकृतियों का उपशम करके द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि हो जाता है। अथवा उन तीन करणों से दर्शनमोहनीय की तीनों प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो जाता है। उसके पश्चात् अंतर्मुहूर्त काल तक प्रमत्त और अप्रमत्त दोनों गुणस्थानों में हजारों बार आवागमन करता है। तदनन्तर प्रतिसमय अनंतगुणी विशुद्धि की वृद्धि से वर्धमान-वृद्धिंगत होता हुआ वह जीव चारित्रमोहनीय की इक्कीस प्रकृतियों का उपशम करने हेतु उद्यमशील होता है। अथवा उन्हीं इक्कीस प्रकृतियों का क्षपण करने के लिए क्षायिकसम्यग्दृष्टि ही उद्यम करता है। वह इस प्रकार सातिशय अप्रमत्त जीव ही चारित्रमोहनीय का उपशमन और क्षपण में निमित्तभूत तीन करणरूप परिणामों में से प्रथम अध:प्रवृत्तकरण को करता है यह अर्थ हुआ।

अब अध:प्रवृत्तकरण का निरुक्तिसिद्ध अर्थ कहते हैं—

गाथार्थ—

जिस कारण से ऊपर-ऊपर के समय संबंधी परिणामों के साथ अन्य जीव के नीचे के समय संबंधी परिणाम समान होते हैं उस कारण से उस प्रथम करण को परमागम में अध:करण कहा है।

जिस कारण से जिस जीव के उपरितन के ऊपरसमयस्थित परिणामों के साथ अन्य जीव के अधस्तन समयवर्ती परिणाम एक समान होते हैं इसलिए उस प्रथम करण को अध:प्रवृत्तकरण ऐसा कहा जाता है-परमागम में उसको ही अध:प्रवृत्तकरण नाम से प्रतिपादित किया है।

इस गुणस्थान का गणितरूप से विस्तार गोम्मटसारजीवकाण्ड की टीका में देखना चाहिए।

इस प्रकार असंयतसम्यग्दृष्टि जघन्य अंतरात्मा के स्वरूपप्रतिपादन की मुख्यता से एक सूत्र हुआ। देशसंयत, प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत मध्यम अंतरात्मा मुनियों के स्वरूप को बताने की मुख्यता से तीन सूत्र हुए और इस तृतीय अंतराधिकार में चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब आगे चारित्रमोहनीय का उपशम करने वाले या क्षपण करने वाले गुणस्थानों में से प्रथमगुणस्थान के निरूपण करने के लिए श्रीपुष्पदन्ताचार्य उत्तरसूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

अपूर्वकरण-प्रविष्ट-शुद्धि-संयतों में सामान्य से उपशमक और क्षपक ये दोनों प्रकार के जीव हैं।।१६।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—अपूर्वकरण प्रविष्ट शुद्धि संयतो में—जो पूर्व अर्थात् पहले नहीं हुए उन्हें अपूर्व कहते हैं, करण शब्द का अर्थ परिणाम है ऐसे अपूर्व परिणामों में जिन जीवों की शुद्धि प्रविष्ट हो गई है उन्हें अपूर्वकरण प्रविष्ट शुद्धि जीव कहते हैं और वे संयत अपूर्वकरणप्रविष्टशुद्धिसंयत कहलाते हैं। उन संयतों में दो प्रकार के मुनि हैं।

वे कौन हैं ? वे उपशम श्रेणी पर आरोहण करने वाले उपशमकमुनि और क्षपक श्रेणी पर आरोहण करने वाले क्षपक मुनि होते हैं। नाना जीवों की अपेक्षा आदि से लेकर प्रत्येक समय में क्रम से बढ़ते हुए असंख्यात लोकप्रमाण परिणाम वाले इस गुणस्थान के अंतर्गत विवक्षित समयवर्ती जीवों के द्वारा अप्राप्य परिणाम अपूर्व कहलाते हैं अर्थात् विवक्षित समयवर्ती जीवों के परिणामों से भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम असमान-विलक्षण होते हैं।

इसमें दिए गए अपूर्व विशेषण से अध:प्रवृत्त परिणामों का निराकरण किया गया है ऐसा समझना चाहिए क्योंकि जहाँ पर उपरितन समयवर्ती जीवों के परिणाम अधस्तनसमयवर्ती जीवों के परिणामों के साथ सदृश भी होते हैं और विसदृश भी होते हैं ऐसे अध:प्रवृत्त में होने वाले परिणामों में अपूर्वता नहीं पाई जाती है। जिन्होंने अपूर्वकरणरूप परिणामों में विशुद्धि को प्राप्त कर लिया है ऐसे क्षपक और उपशमक संयमी जीव होते हैं और इन सबको मिलाकर एक अपूर्वकरण गुणस्थान बनता है।

अत्र कश्चिदाह-

क्षपणोपशमननिबन्धनत्वात् भिन्नपरिणामानां कथमेकत्वमिति चेत् ?

आचार्यदेव: समाधत्ते-
नैतद्वक्तव्यं, क्षपकोपशमकपरिणामानामपूर्वं प्रति साम्यात्तदेकत्वोपपत्ते:।
अत्र गुणस्थाने क्षायिक: औपशमिको भाव:, सम्यक्त्वापेक्षया तु क्षपकस्य क्षायिको भाव:, दर्शनमोहनीयक्षयमविधाय क्षपकश्रेण्यारोहणानुपपत्ते:। उपशमकस्यौपशमिक: क्षायिको वा भाव:, दर्शनमोहोपशमक्षयाभ्यां विनोपशमश्रेण्यारोहणानुपलम्भात्।
उक्तं च-
भिण्णसमयट्ठिएहि दु, जीवेहि ण होइ सव्वदा सरिसो।
करणेहि एक्कसमय-ट्ठिएहि सरिसो विसरिसो वा।।
एदह्मि गुणट्ठाणे, विसरिस-समयट्ठिएहि जीवेहि।
पुव्वमपत्ता जम्हा, होंति अपुव्वा हु परिणामा।।
तारिसपरिणामट्ठिय-जीवा हु जिणेहि गलियतिमिरेहि।
मोहस्स पुव्वकरणा खवणुवसमणुज्जया भणिया।।

यथा अध:प्रवृत्तकरणे भिन्नसमयस्थितानां जीवानां परिणामसंख्याविशुद्धिसादृश्यं संभवति। तथास्मिन्नपूर्वकरणगुणस्थाने सर्वदा-सर्वकालेऽपि कस्यापि जीवस्य तत्सादृश्यं न संभवति। एकसमयस्थितकरणपरिणामानां मध्ये विवक्षितैकपरिणामापेक्षया सादृश्यं नानापरिणामापेक्षया वैसादृश्यं च जीवानामध:प्रवृत्तकरणवदत्रापि नियमो नास्ति इति ज्ञातव्यं।

यस्मात् कारणात् एतस्मिन्नपूर्वकरणगुणस्थाने विसदृशेषु उत्तरोत्तरेषु समयेषु स्थितैर्जीवै: पूर्वपूर्वसमयेष्व-प्राप्ता एव विशुद्धपरिणामा: प्राप्यन्ते तस्मात् कारणात् अपूर्वा: करणा: परिणामा: यस्मिन् तदपूर्वकरणगुणस्थानं इति निरुक्त्या लक्षणमुत्तं।

तादृशेषु पूर्वोत्तरसमयविलक्षणेषु अपूर्वकरणपरिणामेषु स्थिता: परिणता: जीवा अपूर्वकरणा इति गलितज्ञानावरणादिकर्मतिमिरैर्जिनैर्भणिता:। ते च अपूर्वकरणगुणस्थानवर्तिनो मुनय:, सर्वेऽपि प्रथमसमयमादिं कृत्वा चारित्रमोहनीयकर्मण: क्षपणोपशमनोद्युक्ता भवन्ति। ते मुनय: गुणश्रेणि-गुणसंक्रमण-स्थितिखण्ड-अनुभागखण्डनलक्षणानि चत्वार्यावश्यकानि कुर्वन्तीत्यर्थ:।

अत्रापूर्वकरणगुणस्थाने विद्यमानायुष्कस्य प्रथमभागे निद्राप्रचलाद्वये बन्धतो व्युच्छिन्ने सति उपशमश्रेण्यारोहकापूर्वकरणस्य प्रथमभागे मरणं नास्ति, इति आगमोऽस्ति। ते अपूर्वकरणगुणस्थानवर्तिन: महामुनय: उपशमश्रेणिमारोहन्ति तदा चारित्रमोहनीयं नियमेन उपशमयन्ति। क्षपकश्रेणिमारुह्यमाणा: क्षपका: तच्चारित्रमोहनीयं नियमेन क्षपयन्ति। क्षपकश्रेण्यां सर्वत्र मरणं नियमेन नास्ति ये च वङ्कार्षभनाराच-नाम उत्तमसंहननधारिणस्त एव क्षपकश्रेणिमारोहन्ति। ये च त्रयाणां मध्ये कतमेन संहननेन युक्ता: ते उपशमश्रेणिमारोहन्तुं क्षमा: भवन्ति।

अद्यत्वे पंच महाविदेहेषु षष्टि-उत्तरैकशतशाश्वतकर्मभूमिषु द्वयोरपि श्रेण्योरारोहका: दिगम्बरयतयो भवन्ति। पुनश्च पंच भरतेषु पंचैरावतेषु चाधुना पंचमकाले उपशामका: क्षपकाश्च साधवो न भवन्तीति ज्ञातव्यं। अत्र कश्चिदाशज्र्ते-यदि अद्यत्वे कर्मणां क्षयो नास्ति तर्हि मोक्षोऽपि नास्ति, पुन: कथं दीक्षा गृहीतव्या ?

आचार्यदेव: समाधत्ते-यद्यपि मोक्षो नास्ति तथापि मोक्षमार्गो विद्यत एव, तथा चोत्तं श्रीदेवसेनाचार्येण-
वरिससहस्सेण पुरा, जं कम्मं हणइ तेण काएण।
तं संपइ वरिसेण हु, णिज्जरयइ हीणसंहणणे।।
पुरा-चतुर्थकाले तेण काएण-उत्तमसंहननधारी मुनि: चरमोत्तमदेहेन जं कम्मं वरिससहस्सेण हणइ-यानि कर्माणि वर्षसहस्रेण हन्ति-नाशयति-क्षपयति, तं-तानि कर्माणि-तावन्ति च कर्माणि संपइ-संप्रति वर्तमानकाले-पंचमकाले हीणसंहणणे-हीनसंहननेन वरिसेण हु णिज्जरयइ-वर्षमात्रेणैव खलु निर्जरयति-विनाशयति। अत: अद्यत्वेऽपि जैनेश्वरीं दीक्षां गृहीत्वा स्वल्पकालेनैव अधिकानि कर्माणि विनाश्य समाधिना मरणं कृत्वा स्वर्गे जन्म गृहीत्वा तत्रत्यादागत्य मुनिर्भूत्वा मोक्षो गन्तव्य:।

यहाँ कोई शंका करता है कि—

क्षपणनिमित्तक परिणाम भिन्न हैं और उपशमननिमित्तक परिणाम भिन्न हैं उनमें एकत्व कैसेहो सकता है ?

तब आचार्यदेव समाधान देते हैं—

ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि क्षपक और उपशमक परिणामों में अपूर्वपने की अपेक्षा साम्य होने से एकत्व बन जाता है।

इस गुणस्थान में क्षायिक और औपशमिक भाव होते हैं, सम्यक्त्व की अपेक्षा तो क्षपक श्रेणी वाले मुनि के क्षायिक भाव होता है क्योंकि जिसने दर्शनमोहनीय का क्षय नहीं किया है वह क्षपकश्रेणी पर नहीं चढ़ सकता है और उपशमक के औपशमिक या क्षायिक भाव होता है क्योंकि जिसने दर्शनमोहनीय का उपशम अथवा क्षय नहीं किया है वह उपशमश्रेणी पर नहीं चढ़ सकता है। कहा भी है—

गाथार्थ

—अपूर्वकरण गुणस्थान में भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणामों की अपेक्षा कभी भी सदृशता नहीं पाई जाती है किन्तु एक समयवर्ती जीवों के परिणामों की अपेक्षा सदृशता और विसदृशता दोनों ही पाई जाती है।

इस गुणस्थान में विसदृश अर्थात् भिन्न-भिन्न समय वाले जीव जो पूर्व में कभी भी नहीं प्राप्त हुए थे ऐसे अपूर्व परिणामों को ही धारण करते हैं, इसलिए इस गुणस्थान का नाम अपूर्वकरण है।

पूर्वोक्त अपूर्व परिणामों को धारण करने वाले जीव मोहनीय की शेष प्रकृतियों के क्षपण अथवा उपशमन करने में उद्यत होते हैं ऐसा अज्ञानरूपी अन्धकार से सर्वथा रहित जिनेन्द्रदेव ने कहा है।

जैसे अध:प्रवृत्तकरण से भिन्न समय स्थित जीवों की परिणाम, संख्या, विशुद्धि एक सदृश संभव होती है उसी प्रकार इस अपूर्वकरण गुणस्थान में सदा-सर्वकाल में भी किसी भी जीव के परिणाम, संख्या और विशुद्धि की सदृशता संभव नहीं होती है अर्थात् सभी की परिणाम विशुद्धि अलग-अलग प्रकार की होती है। एक समय में स्थित करण-परिणामों के मध्य में विवक्षित एक परिणाम की अपेक्षा सदृशता और नाना परिणामों की अपेक्षा विसदृशता होती है क्योंकि जीवों के अध:प्रवृत्तकरण के समान यहाँ भी कोई नियम नहीं है ऐसा जानना चाहिए।

जिस कारण से इस अपूर्वकरण गुणस्थान में विसदृश उत्तरोत्तर समयों में स्थित जीवों के द्वारा पूर्व-पूर्व समयों में अप्राप्त-नहीं पाए गये विशुद्ध परिणामों को ही प्राप्त करते हैं उस कारण से अपूर्व हैं करण-परिणाम जिसमें वह अपूर्वकरण गुणस्थान इस निरुक्ति लक्षणपूर्वक कहा गया है।

उस प्रकार के पूर्वोत्तर समय में विलक्षण अपूर्वकरण परिणामों में स्थित-परिणत जीव अपूर्वकरण हैं ऐसा ज्ञानावरणादि कर्मतिमिर-अंधकार से रहित जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहा गया है। और वे अपूर्वकरणगुणस्थानवर्ती मुनि सभी प्रथम समय को आदि में करके चारित्रमोहनीय कर्म का क्षपण और उपशमन करने में उद्यमशील होते हैं। वे मुुनि गुणश्रेणी, गुणसंक्रमण, स्थितिखण्ड और अनुभागखण्डन लक्षणरूप चार आवश्यकों को करते हैं।

यहाँ अपूर्वकरण गुणस्थान में विद्यमान आयुष्क के प्रथम भाग में निद्रा, प्रचला इन दो प्रकृतियों का बंध से व्युच्छेद होने पर उपशम श्रेणी पर चढ़ने वाले जीव के अपूर्वकरण के प्रथम भाग में मरण नहीं होता है ऐसा आगम का विधान है। वे अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती महामुनि जब उपशम श्रेणी में आरोहण करते हैं तब चारित्रमोहनीय का नियम से उपशमन करते हैं। क्षपक श्रेणी में चढ़ रहे क्षपक मुनि चारित्रमोहनीय का नियम से क्षपण करते हैं। क्षपक श्रेणी में नियम से सर्वत्र मरण नहीं है। जो वङ्कावृषभनाराच नामक उत्तम संहननधारी जीव हैं वे ही क्षपक श्रेणी पर आरोहण करते हैं और जो तीन संहनन (वङ्कावृषभनाराच, वङ्कानाराच और नाराच) में से किसी संहनन से युक्त हैं वे उपशम श्रेणी पर चढ़ने में सक्षम होते हैं।

आज पाँच महाविदेहों की एक सौ साठ कर्मभूमियों में दोनों श्रेणियों पर चढ़ने वाले दिगम्बर यति होते हैं और पाँच भरत, पाँच ऐरावत क्षेत्रों में आज पंचम काल में उपशामक और क्षपक (दोनों श्रेणी वाले) दोनों प्रकार के साधु नहीं होते हैं ऐसा जानना चाहिए।

यहाँ कोई शंका करता है कि—

यदि आजकल कर्मों का क्षय नहीं होता है तो मोक्ष नहीं हो सकता है पुन: दीक्षा क्यों ग्रहण की जाती है?

इस बात का आचार्य देव समाधान करते हैं कि—

‘‘यद्यपि आज कर्मों का क्षय नहीं होता है फिर भी मोक्षमार्ग तो है ही,’’ श्री देवसेन आचार्य ने कहा भी है—

गाथार्थ—पूर्व काल में जिन कर्मों को उत्तमसंहननयुक्त शरीर के द्वारा एक हजार वर्ष में नष्ट किया जाता था आज उन कर्मों को हीन संहनन वाले साधु एक वर्ष में ही क्षय कर सकते हैं।

चतुर्थकाल में उत्तमसंहननधारी मुनि चरमोत्तम शरीर के द्वारा जिन कर्मों को सहस्र वर्षों में नाश करते थे, आज इस पंचमकाल में हीन संहनन के द्वारा वर्षमात्र में ही उन कर्मों की निर्जरा हो जाती है। अत: आज भी जैनेश्चरी दीक्षा को ग्रहण करके स्वल्प काल में ही अधिक कर्मों को नष्ट करके समाधिमरण के द्वारा स्वर्ग में जन्म लेकर वहाँ से मनुष्य भव में आकर मुनि बनकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।