प्रमाणाभास का वर्णन

ENCYCLOPEDIA से
(03.प्रमाणाभास का वर्णन से पुनर्निर्देशित)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विषय सूची

प्रमाणाभास का वर्णन

बौद्धाभिमत प्रमाण लक्षण का विचार
‘अविसंवादिज्ञानं प्रमाण’ (प्रमाणवार्तिक—२—१)

जो ज्ञान अविसंवादी है— विसंवाद रहित है वह प्रमाण है ऐसा बौद्धों का कहना है। किन्तु यह कथन ठीक नहीं है क्योंकि इसमें असंभव दोष आता है। अर्थात् बौद्धों ने प्रत्यक्ष और अनुमान ऐसे दो प्रमाण माने हैं। न्यायबिंदु में कहा है ‘‘सम्यग्ज्ञान—प्रमाण के दो भेद हैं—प्रत्यक्ष और अनुमान।’’ उनमे प्रत्यक्ष में अविसंवादीपना संभव नहीं है क्योंकि वह निर्विकल्प होने से अपने विषय का निश्चायक नहीं है अत: संशय आदि आप रूप समारोप का निराकरण नहीं कर सकता है। तथा अनुमान में भी अविसंवादीपना असंभव है, क्योंकि बौद्धों की मान्यतानुसार वह भी श्रवास्तविक समान्य को विषय करने वाला है। इस तरह बौद्धों द्वारा मान्य वह प्रमाण का लक्षण असंभव दोष से दूषित होने से सम्यक् लक्षण नहीं है।

भाट्टों के प्रमाण लक्षण की परीक्षा

‘‘अनधिगततथाभूतार्थनिश्चायंक प्रमाणम् ।’’ (शास्त्र दी पु, १२६)

‘ पहले नहीं जाने हुये यथार्थ अर्थ का निश्चय कराने वाले ज्ञान को प्रमाण कहते हैं। ऐसी भाट्ट मीमांसकों की मान्यता है। किन्तु उनका यह लक्षण अव्याप्त दोष से दूषित है। क्योंकि उन्हीं के द्वारा प्रमाण रूप में माने गये धारावाहिक ज्ञान अपूर्वार्थग्राही नहीं है। यदि तुम यह कहो कि धारावाहिक ज्ञान अगले—अगले क्षण से सहित अर्थ को विषय करते हैं, इसलिये अपूर्वार्थ विषयक ही हैं। तो यह कथन भी ठीक नहीं है क्योंकि क्षण अत्यंत सूक्ष्म हैं। इन क्षणों का जानना संभव नहीं है। अत: धारावाहिक ज्ञानों में उक्त लक्षण की व्याप्ति निश्चित है।

प्रभाकर के प्रमाण लक्षण की समीक्षा

‘‘अनुभूति: प्रमाणं’’ (बृहती १—१—५)

प्रभाकर मतानुयायी ‘‘ अनुभूति को प्रमाण’’ कहते हैं, किन्तु उनका भी यह लक्षण युक्ति संगत नहीं है। क्योंकि ‘अनुभूति’ शब्द को भाव साधन करने पर करण रूप प्रमाण में अव्याप्त रहता है एवं अनुभूति शब्द को करण साधन करने पर भाव रूप प्रमाण में अव्याप्ति दोष आता है। चूंकि करण और भाव दोनों को ही उनके यहां प्रमाण माना गया है। जैसा कि ‘शालिकानाथ ने कहा है’—

यथाभावसाधनं तदा संविदेव प्रमाणं करणसाधनत्वे त्वात्ममन: सन्निकर्ष:’ (प्रकरणा प० प्रमाणा० वा० पृ० ६४)

जब प्रमाण शब्द को ‘प्रमिति: प्रमाणं’ इस प्रकार भाव साधन किया जाता है उस समय ‘ज्ञान’ ही प्रमाण होता है। और ‘प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणं जिसके द्वारा जाना जाय वह प्रमाण है ऐसा करण साधन करने पर ‘आत्मा और मन का सन्निकर्ष, प्रमाण होता है। अत: अनुभूति (अनुभव) को प्रमाण का लक्षण मानने में अव्याप्ति दोष स्पष्ट है। इसलिये यह लक्षण भी सुलक्षण नहीं है।

‘प्रभाकरणं प्रमाणं’ (न्याय मं. प्रमाण पृ. २५)

प्रभा के प्रति जो कारण है वह प्रमाण है। ऐसी नैयायिकों की मान्यता है किन्तु उनकी यह मान्यता भी प्रमादकृत ही है। क्योंकि उनके द्वारा प्रमाण रूप से माने गये ईश्वर में वह लक्षण अव्याप्त है। कारण, ‘महेश्वर’ प्रमाण का आश्रय है करण नहीं है। ईश्वर को प्रमाण मानने का यह कथन हम अपनी ओर से आरोपित नहीं कर रहे हैं किन्तु उनके प्रमुख ‘आचार्य उदयन’ ने स्वयं स्वीकार किया है कि—

तन्मे प्रमाणं शिव:’ (न्याय. कु.सु.४—६)

अर्थात् ‘‘ वह महेश्वर मेरे प्रमाण हैं’’ इस अव्याप्ति दोष को दूर करने के लिये कोई इस प्रकार व्याख्या करते हैं, कि जो प्रभा का साधन हो अथवा प्रमाण का आश्रय हो वह प्रमाण है।

साधनाश्रययोरन्यतरत्वे सति प्रमाव्याप्तं प्रमाणं (सर्वदर्शनसंग्रह—पं.२३५)

किन्तु उनका यह व्याख्यान भी युक्ति संगत नहीं है क्योंकि प्रभा के साधन और प्रभा के आश्रय में से किसी एक को प्रमाण मानने का लक्षण की परस्पर में अव्याप्ति होती है । जब प्रभा के साधन को प्रमाण का लक्षण किया जायेगा तब ‘प्रभा के साधन रूप’ प्रमाण लक्षय में लक्षण घटित नहीं होगा। तथा प्रमाश्रय और प्रमासाधन दोनों को सभी लक्ष्यों का लक्षण माना जाये तो कहीं भी लक्षण नहीं जायेगा। सन्निकर्ष आदि केवल प्रमा के आश्रय है प्रमा के साधन नहीं हैं क्योंकि प्रमाण लक्ष्य नहीं है अत: नैयायिकों का उक्त लक्षण सदोष है। इस प्रकार से कोई—कोई ज्ञान को अस्वसंविदित—स्व को नहीं जानने वाला कहते हैं। कोई गृहीत अर्थ के ज्ञान को प्रमाण कहते हैं, कोई निर्विकल्प दर्शन को प्रमाण कहते है कोई संशय को, कोई विपरीत को, कोई अनध्यवसाय को ही प्रमाण कह देते हैं किन्तु ये प्रमाण नहीं है प्रत्युत प्रमाणाभास ही हैं। जैनाचार्यों द्वारा मान्य ‘सम्यग्ज्ञान’ ही प्रमाण है वही हित की प्राप्ति और अहित का परिहार कराने में समर्थ है अन्य नहीं हैं।

अन्य मतावलंबियों द्वारा मान्य प्रमाण के भेदों का विचार

प्रत्यक्षमेकं चार्वाक: कारणात्सौगता: पुन:।

अनुमानं च तच्चैव संख्या: शाब्दं च ते अपि।।१।।
न्यायैकदेशिनोऽप्येवमुपमानं च केन च।
अर्थापत्त्या सहैतानि चत्वार्याहु: प्रभाकरा: ।।२।।
अभावषष्ठान्येतानि भाट्टा वेदान्तिनस्तथा।
संभवैतिह्ययुक्तानि तानि पौरानिका जगु:।।३।।

अर्थ — चार्वाक एक प्रत्यक्ष प्रमाण ही मानते हैं। सौगत प्रत्यक्ष और अनुमान ऐसे दो प्रमाण मानते हैं। वैशेषिक भी इन्हीं दो प्रमाणों को मानते हैं। सांख्य प्रत्यक्ष अनुमान और आगम ऐसे तीन प्रमाण मानते हैं। नैयायिक इन्हीं तीन में उपमान को मिलाकर चार मानते हैं । प्रभाकर इन्हीं चार में अर्थापत्ति मिलाकर पांच प्रमाण मानते हैं भाट्ट मीमांसक और वेदांती प्रत्यक्ष अनुमान उपमान आगम अर्थापत्ति और अभाव ऐसे छ: प्रमाण मानते हैं। पौराणिक इन्हीं छ: प्रमाणों में संभव और ऐतिह्य मिलाकर आठ प्रमाण मानते हैं । इनमें से चार्वाक मती एक प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ही ‘परलोकादि का निषेध और पर में बुद्धि है’ इत्यादि का विधान भी नहीं कर सकता है क्योंकि अनुमान प्रमाण को माने बिना परलोकादि का निषेध असंभव है। बौद्ध सांख्य आदि भी अनेकों प्रमाण मानकर भी तर्क प्रमाण नहीं मानते हैं अत: इन सभी की मान्य प्रमाण संख्या गलत है क्योंकि तर्वâ प्रमाण के बिना व्याप्ति का निर्णय न होने से अनुमान का भी अवतार नहीं हो सकता है। अतएव जैनाचार्यों द्वारा मान्य प्रमाण के दो भेद ही सुघटित हैं क्योंकि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप इन दो प्रमाणों में सभी प्रमाण शामिल हो जाते हैं। स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और आगम ये पांच भेद परोक्ष के अंतर्गत होने से सभी व्यवस्था व्यवस्थित हो जाती है। इस प्रकार से अन्य मतों द्वारा मान्य प्रमाण के भेदों का निराकरण कर दिया गया है। विशेष जिज्ञासुओं को विशेष न्याय ग्रन्थ देखने चाहिए। इस प्रमाण के भेदों का लक्षण भी बाधित ही हैं उस पर अब विचार करते हैं।

बौद्धों द्वारा मान्य प्रत्यक्ष का खंडन

‘‘कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्ष ’’ (न्याय बिन्दू पृ.११)

बौद्ध ‘कल्पनापोढ— निर्विकल्प और भ्रान्ति रहित ज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाण ’ कहते हैं। उनका कहना है कि ‘कल्पनाकोढ’ पद से सविकल्प ज्ञान और ‘अभ्रान्त’ पद से मिथ्याज्ञानों का निराकरण होता है। क्योंकि उनके यहां जो समीचीन निर्विकल्प ज्ञान है वही प्रत्यक्ष है। किन्तु इस पर जैनाचार्यों का यह कहना कि निर्विकल्प ज्ञान संशय, विपर्यय अन्ध्यवसाय रूप समारोप का निराकरण करने वाला नहीं है और किसी भी वस्तु का निश्चय कराने वाला भी नहीं है अत: वह प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। बौद्ध— निर्विकल्प ज्ञान अर्थ से उत्पन्न होता है और पुन: उसी अर्थ को प्रकाशित करता है अत: प्रमाण है क्योंकि स्वलक्षण जन्य है वास्तविक है । किन्तु सविकल्प ज्ञान ऐसा नहीं है।

नार्थालोकौ कारणं परिच्छेद्यत्वात्तमोवत् ।।६।। (प.मु.दि.प.)

अतज्जन्यमपि तत्प्रकाशकं प्रदीपव्त् ।।८।। (प.मु.द्वि.प.)

जैन— पदार्थ और प्रकाश ज्ञान की उत्पत्ति में कारण नहीं है क्योंकि वे विषय हैं जैसे अंधकार। ज्ञान पदार्थ से उत्पन्न न होकर भी उस पदार्थ को प्रकाशित का देता है जैसे कि दीपक अर्थ— फद, पट आदि से उत्पन्न न होकर भी प्रकाशित कर देता है। बौद्धों की यह मान्यता है कि ज्ञान अर्थ से उत्पन्न होकर उसके आकार के ही उस अर्थ को जानता है अन्यथा उस—उस पदार्थ की व्यवस्था कैसे करेगा। किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि ज्ञान न तो अर्थ से उत्पन्न होता है न अर्थ के आकार का ही होता है फिर उसे जान लेता है क्योंकि पदार्थ के साथ ज्ञान का कोई अन्वय व्यतिरेक नहीं है, कि जहां पर पदार्थ होवें, वही पर ज्ञान होवे और पदार्थ के अभाव में ज्ञान का अभाव रहे। अत: ज्ञान तो आत्मा का गुण है—

स्वावरणक्षयोपशमलक्षण्रयोग्यतया हि प्रतिनियतमर्थ व्यवस्थापयति।।९।।(प.मु.द्वि.प.)

अपने—अपने आवरण कर्म के क्षयोपशम विशेष रूप— योग्यता से ही ज्ञान ‘यह घट है, यह पट है’ इस प्रकार से पदार्थों को भिन्न—ाqभन्न व्यवस्था कर देता है। अत: योग्यता ही वस्तु की व्यवस्था करने में कारण है। जिस ज्ञान में जिस अर्थ को ग्रहण करने की योग्यता है वह ज्ञान उस ही अर्थ को विषय करता है अन्य को नहीं।ज्ञान अर्थ के आकार होकर ही अर्थ को जानता है यह भी गलत है क्योंकि दीपक घट पट के आकार को न कर भी उन्हें प्रकाशित कर देता है। अत: बौद्धों द्वारा मान्य तदुत्पत्ति तदाकार और तदध्यवसाय का खंडन हो जाता है। बौद्धों ने सविकल्प ज्ञान को अवास्तविक माना है क्योंकि यह परमार्थभूत सामान्य को विषय करता है। आचार्यों का कहना है कि यह भी गलत है चूंकि प्रमाण से बाधित न होने के कारण सविकल्प ज्ञान का विषय परमार्थ ही है। किन्तु बौद्धों द्वारा मान्य वास्तविक स्वलक्षण—एक क्षणवर्ती पर्यायभूत वस्तु दिखती ही नहीं है अत: प्रत्यक्ष प्रमाण निर्विकज्प नहीं है सविकल्प ही है।

यौगाभिमत सन्निकर्ष का खंडन

इंद्रियार्थयो: संबंध: सन्निकर्ष: इंन्द्रिय और अर्थ का संबंध होना सन्निकर्ष कहलाता है।

सन्निकर्षस्य च यौगाभ्युपगतस्याचेतनत्वात् कुत: प्रमितिकरणत्वं कुतस्तरां प्रमाणत्वं, कुतस्तमां प्रत्यक्षत्वम् ? (न्या. पृ.२९)

अर्थ — नैयायिक और वैशेषिक सन्निकर्ष (इन्द्रिय और पदार्थ के संबंध) को प्रत्यक्ष मानते हैं। पर वह ठीक नहीं है, क्योंकि सन्निकर्ष अचेतन है। वह ज्ञान के प्रति कारण कैसे हो सकता है ? और ज्ञान के प्रति जब कारण नहीं , तब प्रमाण कैसे? और जब प्रमाण ही नहीं, तो प्रत्यक्ष कैसे ?

दूसरी बात यह है कि चक्षु इन्द्रिय ओर मन ये दोनों पदार्थों का स्पर्श करके ही प्रकाशित करती है, क्योंकि वह वाह्य इन्द्रिय है, जो वहिरिद्रिय होती है वे पदार्थों का स्पर्श करके ही प्रकाशित करती हैं जैसे— स्पर्शन इन्द्रिय।’ इस अनुमान से चक्षु इन्द्रिय प्राप्यकारी है और वह प्राप्यकारिता ही सन्निकर्ष है। इसलिये सन्निकर्ष ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि यह अनुमान सम्यक् नहीं है। इन अनुमान में ‘चक्षु’ पद से कौन — सी चक्षु को पक्ष बनाया है ! लौकिक—गोलक रूप चक्षु को या अलौकिक— किरण रूप चक्षु को? पहले पक्ष को पक्ष में हेतु बाधित विषय नाम का हेत्वाभास है। क्योंकि गोलक रूप चक्षु विषय के पास जाती हुई किसी को अनुभव में नहीं आती है उसका अग्नि आदि के पास जाकर छूकर उसको जानना प्रत्यक्ष से बाधित है।

दूसरा पक्ष लेवो तो भी— किरण रूप आलौकिक चक्षु अभी तक सिद्ध ही नहीं है। यदि कहो कि चक्षु की तेजस किरणें निकल कर बाहर जाकर पदार्थों को छूती है तब ज्ञान होता है तब तो बड़ा ही अनर्थ होगा— किरणें अग्नि के पास जाकर छूकर जानना गलत है। एक ही समय में वृक्ष की शाखा और आकाश के चन्द्रमा का अवलोकन हो जाता है यदि चक्षु जाकर छूकर जानती है तो पहले निकटवर्ती शाखा का ज्ञान होना चाहिए पुन: बहुत दूरवर्ती चन्द्रमा का ज्ञान होना चाहिए था, किन्तु ऐसा है नहीं। अत: चक्षु अप्राप्तकारी सिद्ध है। एवं सन्निकर्ष प्रमाण मानने वालों के यहां सर्वज्ञ का भी प्रभाव हो जाता है क्योंकि इन्द्रिय ज्ञान से कोई भी भूत, भविष्यत् वर्तमान ऐसे त्रेकालिक पदार्थों को नहीं जान सकता है। अत: बौद्धाभिमत निर्विकल्प एवं यौगाभिमत सन्निकर्ष ज्ञान प्रमाण नहीं है।

जैनाचार्य द्वारा मान्य ‘विशदं प्रत्यक्ष’ यह प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण ही सुसंगत है ऐसा समझना चाहिए। जो ज्ञान प्रत्यक्ष आदि के सदृश मालूम पड़े या कहे जावें किन्तु प्रत्यक्ष आदि रूप न होवें वे ज्ञान ज्ञानाभास कहलाते हैं ऐसे ही सभी में आभास को लगाकार सभी को समरूा लेना।

प्रत्यक्ष प्रमाणाभास का लक्षण

अवैशद्येऽपि प्रत्यक्षं तदाभासं, बौद्धयाकस्याद्वूमदर्शनात् वन्हिविज्ञानवत् ।।६।। (परीक्षा.६)

अविशद ज्ञान को प्रत्यक्ष मानना प्रत्यक्षाभास है जैसे बौद्ध अकस्मात् धूम को देखकर अग्नि के ज्ञान को प्रत्यक्ष मानते हैं।

परोक्षाभास का स्वरूप

वैशद्येऽपिपरोक्षं तदाभासं मीमींसकस्य करणज्ञानवत् ।।७।।(परीक्षा.६)

स्पष्ट ज्ञान को परोक्ष कहना परोक्षाभास है, जैसे भीमांसक करणज्ञान को परोक्ष मानता है। वास्तव में करण ज्ञान प्रत्यक्ष है। उसको परोक्ष मानना परोक्षाभास है।

स्मरणाभास का लक्षण

अतस्ंितदिति ज्ञानं स्मरणाभासं जिनदत्ते स: देवदत्तो यथा ।।८।। (पंरी.६)

जिस पदार्थ को पहले कभी धारणारूप अनुभव नहीं हुआ था उसके अनुभव की स्मरणाभास कहते हैं। अथवा जो वस्तु ‘वह’ नहीं है उसे ‘वह’ कहकर स्मरण करना स्मरणाभास है जैसे जिनदत्त का स्मरण करके कहना कि वह देवदत्त।

प्रत्यभिज्ञानाभास का स्वरूप

सदृशे तदेवेद तस्मिन्नेव तेन सदृशं यमलकवदित्यादि प्रत्यभिज्ञानाभासम् ।।९।।(परी.६)

सदृश में ‘यह वही है’ ऐसा ज्ञान तथा उसी में यह उसके सदृश है ऐसा ज्ञान प्रत्यभिज्ञानाभास है, जैसे एक साथ जन्में दो बालकों में उल्टा ज्ञान हो जाता है।

तर्काभास का लक्षण

असम्बद्धे तज्ज्ञानं तर्काभासं ।।१०।। (परी.६)

अविनाभाव रहित ज्ञान में अविनाभाव का ज्ञान या जिन पदार्थों में परस्पर में व्याप्ति नहीं है, उनमें व्याप्ति का ज्ञान होना तर्काभास है जैसे किसी के एक पुत्र को काला देखकर व्याप्ति बनाना कि इसके जितने पुत्र होंगे वे काले ही होंगे इत्यादि ज्ञान तर्काभास है।

अनुमानाभास का लक्षण

इदमनुमानाभासं, ।।११।। तत्रानिष्टादि: पक्षाभास: ।।१२।। (परी.६)

अनुमान के अवयवों का आभास दिखलाने से अनुमानाभास सिद्ध हो जावेगा। अनिष्ट बाधित और सिद्ध को पक्षाभास कहते हैं। अर्थात् साध्य के तीन विशेषण थे इष्ट, अबाधित और असिद्ध। इनके उल्टे पक्षाभास बन जाते हैं। क्योंकि साधन से होने वाले साध्य के ज्ञान का नाम ही अनुमान है आगे क्रमश: साधनाभासों को भी स्पष्ट करेंगे। अनिष्ट—जो अपने को इष्ट नहीं है उसे साध्य की कोटि में रखना। बाधित— जो प्रत्यक्ष आदि से बाधित हो उसे साध्य की कोटि में रखना। सिद्ध— सिद्ध को सिद्ध करने का प्रयास करना। इसमें बाधित पक्षाभास के पांच भेद माने गये हैं। बाधित के भेद

बाधित: प्रत्यक्षानुमानागमलोकस्ववचनै: ।।१५।।(परी.६)

बाधित पक्षाभास के पांच भेद हैं। प्रत्यक्षबाधित, अनुमानबाधित, आगमबाधित, लोकबाधित और स्ववचनबाधित।

प्रत्यक्षबाधित का दृष्टान्त

तत्र प्रत्यक्षबाधितो यथा, अनुष्णोऽग्निद्र्रव्यत्वाज्जलवत् ।।१६।। (परी.६)

अग्नि ठंडी होती है, क्योंकि वह द्रव्य है जैसे जल। यहाँ अग्नि को ठंडी—कहना स्पर्शन इन्द्रिय के प्रत्यक्ष से बाधित है क्योंकि छूने से अग्नि गरम होती है।

अनुमान बाधित

अपरिणामी शब्द: कृतकत्वात् घटवत् ।।१७।। (परी.६)

‘‘शब्द नत्य होता है क्योंकि किया हुआ है जैसे घट’’ । यह अनुमान बाधित पक्ष है क्योंकि ऐसा भी अनुमान कहा भी जा सकता है कि ‘‘शब्द अनित्य होता है क्योंकि वह किया गया होता है जैसे घट।’’ इन अनुमान से बाधा आ जाती है।

आगम बाधित

प्रेत्यासुखप्रदो धम: पुरुषाश्रितत्वादधर्मवत् ।।१८।। (परी.६)

धर्म परलोक में दु:खदायी होता है क्योंकि वह पुरूष के आश्रित होता है । जो—जो पुरूष के आश्रित होता है वह दु:खदायी होता है जैसे अधर्म। यह पक्ष आगम से बाधित है क्योंकि आगम में धर्म को सुखदायी माना है और अर्धम को दु:खदायी कहा है। यद्यपि दोनों ही पुरूष के आश्रित हैं फिर भी भिन्न स्वभाव वाले हैं।

लोक बाधित

शुचि नरशिर: कपालं प्राष्यंगत्वाच्छंखशुक्तिवत् ।।१९।। (परी.६)

मनुष्य के शिर का कपाल पवित्र होता है क्योंकि वह प्राणी का अंग है। जो—जो प्राणी का अंग होता है वह—वह पवित्र होता है जैसे शंख और सीप। यह पक्ष लोक बाधित है क्योंकि लोक में प्राणी का अंग होते हुये भी चीजें पवित्र, और कोई अपवित्र मानी गई हैं।

स्ववचन बाधित पक्षाभास का उदाहरण'

माता से वंध्या पुरुषसंयोगेऽप्यगर्भत्वात् प्रसिद्धवंध्यावत् ।।२०।।(परी.६)

मेरी माता वंध्या है क्योंकि पुरूष का संयोग होने पर भी उसके गर्भ नहीं रहता है, जैसे कि प्रसिद वंध्या स्त्री। यह पक्ष अपने ही वचनों से बाधित है क्योंकि स्वयं पुत्र मौजूद है और माता भी कह रहा है फिर भी ‘ मेरी माता वंध्या है’ यह कथन स्ववचन बाधित है। इन पाँच प्रकार से बाधित विषयों को पक्ष की कोटि में रखना बाधित पक्षाभास दोष है। अब साधन के आभासों को कहते हैं— हेत्वाभास के भेद

हेत्ववाभासा असिद्धविरूद्धानैकान्तिकाकिञ्चित्करा: ।।२१।। (परी.६)

हेत्वाभास के चार भेद हैं। असिद्ध, विरूद्ध, अनैकांतिक और अकिंचित्कर। असिद्ध हेत्वाभास

असत्सत्तानिश्चयोऽसिद्ध: ।।२२।।(परी.६)

जिस हेतु की सत्ता का अभाव हो उसे असिद्ध हेत्वाभास कहते हैं। इसके स्वरूपासिद्ध और संदिग्धासिद्ध ऐसे दो भेद है। विशुद्ध हेत्वाभास

विपक्षेऽप्यविरूद्धवृत्तिरनैकान्तिक: ।।३०।। (परी.६)

जो पक्ष सपक्ष में रहता हुआ विपक्ष में भी चला जाता है वह अनैकान्तिक हेत्वाभास है। इसे व्यभिचारी हेतु भी कहते हैं। इसके शंकित विपक्षवृत्ति और निश्चितविपक्षवृत्ति ऐसे दो भेद हैं। शंकितविपक्षवृत्ति— ‘नास्ति सर्वज्ञो वत्तृत्वात’ सर्वज्ञ नहीं है क्योंकि वह वक्ता है। यहां ‘वक्ता है’ यह हेतु रह जावे और स्वज्ञत्व भी रह जावे इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है अत: यह हेतु शंकित व्यभिचारी है क्योंकि इसकी विपक्ष में रहने में शंका है। निश्चितविपक्षवृत्ति— ‘‘शब्द अनित्य है क्योंकि वह प्रमेय है जैसे घट’’ यहां प्रमेयत्व हेतु पक्ष शब्द में और सपक्ष घट में रहता हुआ विपक्ष रूप नित्य आकाश में भी चला जाता है अत: निश्चित व्यभिचारी हेतु है।

अकिंचित्कर हेत्वाभास

सिद्धे प्रत्यज्ञबाधिते च साध्ये हेतुरकिंचित्कर: ।।३५।।(परी.६)

साध्य के सिद्ध होने पर तथा प्रत्यक्षादि से बाधित होने पर जो हेतु कुछ नहीं कर सकता है, इस लिए वह अकिंचित्कर हेत्वाभास कहलाता है। जैसे ‘शब्द श्रवण इन्द्रिय का विषय है क्योंकि वह शब्द है’। यहां शब्दत्व हेतु सिद्ध को ही सिद्ध कर रहा है। अथवा ‘‘अग्नि ठण्डी है क्योंकि वह द्रव्य है’’ इसमें द्रव्यत्व हेतु प्रत्यक्ष से ही बाधित है। अत: ऐसे हेतु अंकिचित्कर होते हैं। ऐसे ही अन्वय, व्यतिरेक दृष्टान्तों का विपरीत प्रयोग करना दृष्टान्ताभास कहलाता है। अन्वय दृष्टान्ताभास के तीन भेद हैं। साध्य विकल, साधनविकल और उभयविकल। तीनों का उदाहरण— ‘‘ शब्द अपौरूषेय है क्योंकि अमूर्त है, जैसे इन्द्रिय सुख, परमाणु और घट’’। यहाँ दृष्टांत में इन्द्रिय सुख पुरूषकृत् है अत: अपने अपौरूषेय साध्य में न रहने से ‘साध्य विकल’ है। परमाणु मूर्तिक है, वह अमूर्तिक हेतु में नहीं रहता है अत: यह दृष्टांत ‘साधन विकल’ है। घट पुरूषकृत और मूर्तिक है।वह अपौरूषेय साध्य और अमूर्तिक हेतु में नहीं रहता है अत: यह साध्य—साधन विकल’ दृष्टांत है। व्यतिरेक दृष्टांताभास के भी तीन भेद है— ‘‘शब्द अपौरुषेय होता है क्योंकि वह अमूर्त है, जो—जो पौरूषेय होता है वह अमर्तिक नहीं होता है, जैसे परमाणु, इंद्रियसुख और आकाश।’’ यहाँ परमाणु असिद्धसाध्य व्यतिरेक है, क्योंकि वह अपौरूषेय है। इसलिये परमाणु के अपौरूषेयपना का साध्य से व्यतिरेक नहीं हुआ। ऐसे ही इन्द्रियमुख असिद्ध साधन व्यतिरेक है। एवं आकाश असिद्ध साध्य—साधन व्यतिरेक है।

बाल प्रयोगाभास का लक्षण

प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन बालकों को बोध कराने के लिये शास्त्र में अनुमान के ये पांच अवयव माने गये हैं। इनमें से कुछ कम अवयवों का प्रयोग करना गलत है। अत: बाल प्रयोगात्मक कहलाता है ।

आगमाभास का लक्षण

रागद्वेषमोहाक्रान्तपुरुषवचनाज्जातमागमाभासं ।।५१।। (परी.६)

रागी,द्वेषी, अज्ञानी, मोही पुरूषों के वचनों से होने वाले आगम—शास्त्र को आगमाभास कहते हैं।

आगमाभास के उदाहरण

यथा नद्यास्तीरे मोदकराशय: सन्ति धावध्वं माणावका:।।५२।। अंगुल्यग्रेयूथशत मास्त इति च ।।५३।। विसवादात् ।।५४।। (परी.६)

जैसे कि —हे बालकों ! दौड़ों, नदी के किनारे लड्डुओं के ढेर लगे हैं ऐसे वचन आगमाभास हैं अथवा अंगुलि के अग्रभाग पर सौ हाथी ठहरे हैं यह भी अनाप्त वचन हैं इन सब में विसंवाद देखा जाता है अत: ये सब आगमाभास हैं। उपसंहार— जो प्रमाण न होवें और प्रमाण सदृश मालूम पड़े या अन्य लोग जिन्हें प्रमाण मानने लग जावें वे सब प्रमाणाभास कहलाते हैं। यहां तक अन्य लोगों के द्वारा मान्य प्रमाणाभास, प्रत्यक्ष प्रमाणाभास, परोक्ष प्रमाणाभासों का लक्षण बतलाया है। परोक्ष प्रमाण के भेद प्रभेदों का भी गलत लक्षण होने से वे सब उन—उन नाम से प्रमाणाभास बन जाते हैं। अत: स्मरणाभास, प्रत्यभिज्ञानाभास, तर्काभास, अनुमानाभास और आगमाभास ऐसे पांच परोक्षाभास के भेद होते हैं। उसमें भी अनुमान के पक्ष और हेतु की अपेक्षा दो भेद होने से पक्षाभास, हेत्वाभास ऐसे दो भेद सिद्ध हैं। पुन: पक्षाभास के अनिष्ट बाधित, और सिद्ध ये तीन भेद करके बाधित पक्षाभास के प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, लोक और स्ववचन से पाँच भेद होते हैं। पुन: हेत्वास के असिद्ध विरूद्ध, अनैकांतिक और अकिंचित्कर ऐसे चार भेदों का वर्णन किया है। ऐसे ही चार्वाक द्वारा मान्य प्रमाण को एक संख्या, बौद्ध द्वारा मान्य प्रमाण की दो संख्या, इत्यादि सब प्रमाण संख्याभास कहलाते हैं। आगे प्रमाण का विषय और उसके फल में गलत कल्पना का नाम भी आभास है उसे बताते हैं।

प्रमाण के विषयाभास का लक्षण

विषयाभास: सामान्यं विशेषो द्वयं वा स्वतंत्र ।।६१।।(परी.६)

केवल एक सामान्य को ही ज्ञान का विषय मानना या केवल विशेष को ही मानना अथवा दोनों रूप पदार्थ को ही स्वतंत्रता से प्रमाण का विषय मानना विषयाभास है। प्रत्येक वस्तु सामान्य विशेषात्मक ही है यह बात पहले कही जा चुकी है । एवं प्रत्येक ज्ञान भी उभयात्मक वस्तु को ही जानता है तभी वह प्रमाण कहलाता है अन्यथा अप्रमाण कहलाता है। सांख्य पर्याय रहित केवल द्रव्य—सामान्य को ही ज्ञान का विषय कहता है। बौद्ध द्रव्यांशरहित केवलपर्याय विशेष को ही ज्ञान का विषय कहता है एवं नैयायिक व वैशेषिय सामान्य—विशेष स्वरूप पदार्थ को मान कर भी सामान्य और विशेष एक दूसरे की सहायता से रहित स्वतंत्रता से प्रमाण का विषय मानते हैं, इसलिये वे सब विषयाभास हैं क्योंकि प्रमाण का विषय परस्पर सापेक्ष उभयात्मक है।

प्रमाण के फलाभास का वर्णन

फलाभास: प्रमाणादभिन्नं भिन्नमेव वा।। ६६।। (परी.६)

प्रमाण से उसके अज्ञान निवृत्ति आदि फल को सर्वथा भिन्न ही मानना या सर्वथा अभिन्न ही मानना प्रमाण फलाभास है। क्योंकि कथंचित् ये फल नाम, लक्षण आदि से भिन्न भी हैं। अत: एकांत मान्यता ही आभास कहलाती है। उपसंहार— यहाँ तक प्रमाणस्वरूपाभास, प्रमाणसंख्याभास, प्रमाणविषयाभास और प्रमाणफलाभास का वर्णन हुआ है। अब आगे न्यायदीपिकाकार ने इन विषयों में कुछ विशेषतायें बताई हैं उनका स्पष्टीकरण करते हैं।

परोक्ष प्रमाण

अस्पष्ट प्रतिभास को परोक्ष प्रमाण कहते हैं। इसके पांच भेद हैं स्मृति आदि।

स्मृति का लक्षण

तदित्याकारा प्रागनुभूतवस्तुविषया स्मृति: स देवदत्तो यथा। (न्या.दी.पृ.५३)

‘वह’ इस आकार वाला, पहले अनुभव किये गये वस्तु को विषय करने वाला ज्ञान स्मृति कहलाता है, जैसे वह देवदत्त । इस ज्ञान को उत्पन्न करने वाला अनुभव धारणा रूप कारण से ही होता है , क्योंकि पदार्थ में अवग्रहादि ज्ञान हो जाने पर भी धारणा के अभाव में स्मृति उत्पन्न नहीं होती है। धारणा ज्ञान ही आत्मा में उस प्रकार का संस्कार पैदा कर देता है। जिससे वह कालान्तर में भी उस अनुभूत विषय का स्मरण करा देता है।

शंका— यदि धारणा के द्वारा ग्रहण किये गये विषय में ही स्मरण होता है तो वह गृहीत—ग्राही होने से अप्रमाण हो जावेगा ?

समाधान— नहीं । ईहा आदि की तरह स्मरण में भी विषय भेद मौजूद है जिस प्रकार अवग्रह आदि के द्वारा ग्रहण किये गये अर्थ को विषय करने वाले ईहादि ज्ञानों में विषय भेद माना गया है वैसा ही यहां समझना। देखिये! यहां धारणा का विषय ‘‘ इदंता— यह’’ शब्द के प्रयोग पूर्वक जाना जाता है एवं स्मृति का विषय ‘‘ तत्ता— वह’’ इस शब्द से निर्दिष्टं होता है। अत: स्मृति ज्ञान भी विसंवाद रहित होने से प्रमाण है।

धारावाहिक ज्ञान का लक्षण

एक ही घट में घट विषयक अज्ञान को दूर करने के लिए होने वाले घट ज्ञान से घट का ठीक से बोध हो गया है फिर ‘यह घट है, यह घट है, यह घट है’ इस प्रकार उत्पन्न हुये ज्ञान धारावाहिक ज्ञान हैं ये ज्ञान अज्ञान को दूर करने में साधकतम नहीं है क्योंकि पहले ‘यह घट है’ इस ज्ञान से ही अज्ञान दूर हो चुका है. अत: गृहीत को ही ग्रहण करने वाला होने से यह ज्ञान अप्रमाण है।

प्रत्यभिज्ञान का लक्षण

अनुभव और स्मरण पूर्वक होने वाले जोड़ रूप ज्ञान को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। (न्याय दी.पृ.५६) अन्य वैशेषिक आदि ‘एकत्व प्रत्यभिज्ञान’ को स्वीकार करके भी उसका प्रत्यक्ष में अन्तर्भाव करते हैं। उनका कहना है कि जो इन्द्रियों के होने पर होता है और नहीं होने पर नहीं होता है वह प्रत्यक्ष है, एवं इंद्रियों के साथ अन्वय व्यतिरेक रखने वाला यह प्रत्यभिज्ञान है अत: प्रत्यक्ष में ही गर्भित है। किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि इन्द्रियां वर्तमानकालीन विषय को ही ग्रहण करती हैं, वर्तमान और भूतकाल की अवस्था के एकत्व को विषय नहीं कर सकती है। उसका कहना है कि इन्द्रियां सहकारी कारणों की सहायता से वर्तमान और भूत में रहने वाले एकत्व को जान लेगी किन्तु आचार्यों का कहना है कि चाहे जितने सहकारी कारण मिल जावें, इन्द्रियाँ अविषय में प्रवृत्ति नहीं कर सकती है। अत: एकत्व प्रत्यभिज्ञान पृथक् प्रमाण सिद्ध है। नैयायिक और मीमांसक ‘सादश्य प्रत्यभिज्ञान’ को उपमान नाम से पृथक् प्रमाण सिद्ध करना चाहते हैं, किन्तु यह भी ठीक नहीं है क्योंकि स्मृति और अनुभव के जोड़ रूप ज्ञानों को सर्वत्र प्रत्यभिज्ञान ही समझना चाहिये अन्यथा विसदृश प्रत्यभिज्ञान को भी एक पृथक् प्रमाण कल्पित करना पड़ेगा।

व्याप्तिज्ञानं तर्क: । यत्र यत्र धूमत्वं तत्र तत्राग्निमत्वमिति। (न्या.६२)

व्याप्ति के ज्ञान को तर्क कहते हैं। जहां—जहां घूम होता है वहां वहां अग्नि होती है । यह तर्क ज्ञान का उदाहरण है। कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष विशेष के द्वारा ही व्याप्ति का ग्रहण हो जाता है अत: ‘तर्क प्रमाण’ को पृथक् मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि स्मृति, प्रत्यभिज्ञान और ग्रहण करने में समर्थ होता है, वही तर्क है। इस तर्क का विषय, प्रत्यक्ष अनुमान आदि के द्वारा असंभव है। बौद्धों का कहना है कि—

निर्विकल्प प्रत्यक्ष के अनन्तर जो विकल्प उत्पन्न है वह व्याप्ति को ग्रहण करता है। किन्तु यह भी गलत है हम आप बौद्धों से प्रश्न करते हैं कि वह विकल्प प्रमाण है। या अप्रमाण? यदि अप्रमाण है तो उसके द्वारा ग्रहीत व्याप्ति में प्रमाणता कैसे ? यदि प्रमाण है तो वह प्रत्यक्ष है या अनुमान ? प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह अस्पष्ट ज्ञान है । अनुमान कहो तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उसमें हेतु दर्शन आदि की अपेक्षा नहीं है। इसलिए इन दोनों से भिन्न हो कोई प्रमाण है। और वहीं तो तर्क है। आपने उसका ‘विकल्प’ यह दूसरा नाम रख दिया है।

अनुमान का लक्षण

‘साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानं।’ (न्या.पृ. ६५)

साधन से साध्य का ज्ञान होने को अनुमान कहते हैं।

नैयायिक — ‘लिंगपरामर्शोनुमानं’ (न्या.वा. १-१-५)

लिंग को देखने रूप ज्ञान अनुमान है। जैन— यह लक्षण ठीक नहीं है। क्योंकि व्याप्ति स्मरण से रहित लिंग अनुमान प्रमाण की उत्पत्ति में कारण है। अनुमान के दो भेद हैं— स्वार्थानुमान और परार्थानुमान। स्वार्थानुमान के अवयव स्वार्थानुमान के तीन अंग हैं— धर्मों, साध्य और हेतु । धर्मी— साध्य धर्म के आधार को धर्मी कहते हैं। जैसे अग्निमान् पर्वत। साध्य— हेतु के द्वारा जो जाना जाय वह साध्य है। जैसे अग्नि। हेतु —जो साध्य का ज्ञापक होता है। जैसे धूम दर्शन। ये तीनों ही अनुमान के अंग हैं। अथवा स्वार्थानुमान के दो अंग भी माने जाते हैं। पक्ष और हेतु। पक्ष— साध्य धर्म से युक्त धर्मी को पक्ष कहते हैं। जैसे ‘यह पर्वत अग्नि वाला है’ पक्ष को ही ‘प्रतिज्ञा’ कहते है। यथा—

‘‘धर्मधर्मिसमुदायरूपस्य पक्षस्य वचनं प्रतिज्ञा यथा पर्वतोऽयमग्निमान्। (न्याय.७६)

धर्म और धर्मी के समुदाय रूप पक्ष के कहने को प्रतिज्ञा कहते हैं । जैसे ‘यह पर्वत अग्नि वाला है’। जब धर्म और धर्मी में भेद कथन की विवक्षा है तब तीन अंग होते है । जब धर्म—धर्मी के समुदाय की विवक्षा है तब दो अंग माने जाते हैं। यह धर्मी प्रसिद्ध ही होता है।

परार्थानुमान

दूसरे के उपदेश की सहायता से जो साधन से साध्य का ज्ञान होता है वह परार्थानुमान है। नैयायिक कहता है कि परोपदेश वाक्य ही परार्थानुमान है किन्तु जैनाचार्य वचनों को उपचार से ही प्रमाण मानते हैं, वास्तव में नहीं । अत: मुख्य अनुमान तो ज्ञान ही है न कि ज्ञान के कारण वचन । इस परार्थानुमान के भी स्वार्थानुमान की तरह दो या तीन अंग माने गये हैं।

नैयायिक द्वारा मान्य अनुमान के पांच अवयव

‘‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवा:’’ (न्या सूत्र. १-१-३२)

प्रतिज्ञा, हेतु,उदाहरण उपनय और निगमन ये अनुमान के पांच अवयव हैं। पक्ष के प्रयोग को प्रतिज्ञा कहते हैं। पंचमी विभक्ति रूप लिंग को हेतु कहते हैं। व्याप्ति को दिखलाते हुए दृष्टांत के कहने को उदाहरण कहते हैं। दृष्टांत की अपेक्षा लेकर पक्ष में हेतु के दुहराने को उपनय कहते हैं। हेतु पुरस्सर पक्ष के कहने को निगमन कहते हैं। इनके उदाहरण— ‘यह पर्वत अग्नि वाला है’— प्रतिज्ञा ‘क्योंकि धूम वाला है।’ हेतु जैसे रसोईघर —अन्वय दृष्टाँत। जैसे तालाब — व्यतिरेक दृष्टांत। इसी लिये यह पर्वत धूम वाला है— उपनय। धूम वाला होने से यह अग्नि वाला है—निगमन।

अनुमान प्रयोग पद्धति —

‘‘ यह पर्वत अग्नि वाला है, क्योंकि धूमवाला है। जो—जो धूम वाला होता है वह —वह अग्नि वाला होता है, जैसे रसोईघर । जो—जो अग्नि वाला नहीं होता है, वह—वह धूम वाला नहीं होता है जैसे तालाब। इसीलिये यह पर्वत धूम वाला है। धूम वाला होने से यह अग्नि वाला है।’’ ये पांचों अवयव अनुमान प्रयोग के हैं इनमें से यदि एक भी न हो तो अनुमान प्रयोग गलत है। यहाँ तक नैयायिक ने कहा है। जैनाचार्य कहते हैं कि उनका यह विचार गलत है क्योंकि वीतराग कथा में शिष्यों के अभिप्राय से अधिक भी अवयव माने जाते हैं किन्तु विजिगीषु कथा में प्रतिज्ञा और हेतु ये दो ही अवयव कहे जाते हैं।

विजिगीषु कथा

गुरु तथा शिष्यों या रागद्वेष रहित विद्वानों में जो तत्त्व का निर्णय होने तक वचन प्रवृत्ति—चर्चा होती है वह वीतराग कथा कहलाती है। यह सौम्यचर्चा है। (न्याय.८०) बौद्ध—लिंग वचन रूप एक हेतु का ही वादकाल में प्रयोग करना चाहिए, प्रतिज्ञा का प्रयोग अनावश्यक है। जैन— यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि हेतु के प्रयोग से व्युत्पन्न जनों को भी साध्य के संदेह का निवारण नहीं हो सकेगा , अत: प्रतिज्ञा का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। जैन सिद्धान्तानुसार वीतराग कथा में शिष्यों के आशयानुसार प्रतिज्ञा , हेतु , उदाहरण , उपनय और निगमन इनमें से दो, तीन, चार या पांचों का भी प्रयोग कर सकते हैं। कोई बाधा नहीं है किन्तु वाद काल में मात्र प्रतिज्ञा—हेतु इन दो अवयवी अनुमान ही बोलना चाहिए, यह बात सिद्ध हुई । जैन हेतु का एक अविनाभाव लक्षण ही मानते हैं बौद्ध हेतु का त्रैरूप्य एवं नैयायिक पांच रूप वाला मानते हैं। अब उनका निराकरण करते हैं।

बौद्ध के त्रैरूप्य हेतु का निराकरण

‘‘पक्षधर्मत्वादित्रितयलक्षणाल्ंिलगादनुमोत्थानम्’’ । (न्या.पृ.८३)

पक्षधर्मत्व आदि तीन लक्षण वाले हेतु से अनुमान की उत्पत्ति होती है, ऐसा बौद्ध कहना है। उसका स्पष्टीकरण — पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्त्व और विपक्ष व्यावृत्ति ये तीन रूप हेतु के लक्षण हैं। पक्ष धर्मत्व— साध्य धर्म से विशिष्ट धर्मी को पक्ष कहते हैं जैसे अग्नि के अनुमान में पर्वत पक्ष है, उस पक्ष में व्याप्त होकर हेतु का रहना ‘पक्षधर्मत्व’ है। सपक्ष सत्त्व — साध्य के समान धर्म वाले धर्मी को सपक्ष कहते हैं जैसे अग्नि के अनुमान में ‘रसोई —घर ’ सपक्ष है। उस सपक्ष में सब जगह हेतु का रहना ‘सपक्ष सत्व’ है। विपक्षव्यावृति — साध्य से विरोधी धर्म वाले धर्मी को विपक्ष कहते हैं । जैसे—अग्नि के अनुमान में तालाब ‘विपक्ष’ है उन सभी विषयों में हेतु का न रहना ‘विपक्ष व्यावृत्ति’ है। ये तीनों रूप मिलकर हेतु का लक्षण है । यदि इन तीनों में से एक रूप भी न हो तो हेतु हेत्वाभास बन जाता है। यहाँ तक बौद्ध का पक्ष है। अब जैनाचार्य उसका निराकरण करते हैं। जैन— यह बौद्ध का कथन ठीक नहीं है क्योंकि पक्ष धर्मत्व के बिना भी कृतिकोदयाति हेतु शकटोदयादि साध्य को सिद्ध कर देते हैं। तथाहि—‘‘शंकट मुहूर्तांते उदेष्यति कृतिकोदयादिति’’ रोहिणी नक्षत्र का एक मुहुर्त के बाद उदय होगा क्योंकि अभी ‘कृत्तिका नक्षत्र का उदय’ हेतु है, किन्तु यह ‘‘कृतिकोदयात्’’ हेतु अपने पक्ष भूत ‘रोहिणी’ नक्षत्र में नहीं रहता है। इसलिए इस हेतु में ‘पक्षधर्मत्व’ नहीं है फिर भी इसमें ‘अन्यथानुपपत्ति’ मौजूद है। अत: यह हेतु अपने साध्य को सिद्ध कर देता है। इसलिए बौद्धों के द्वारा मान्य हेतु का त्रैरूप्य लक्षण अव्याप्ति दोष से दूषित है।

नैयायिक सम्मत पाँचरूप्य हेतु का कथन

नैयायिक पंचरूपता को हेतु का लक्षण कहते हैं। उसका स्पष्टीकरण—पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्ति, अबाधितविषयत्व और असत्प्रतिपक्षत्व । उनमें से प्रथम तीन रूप के लक्षण कहे जा चुके हैं। शेष दो का लक्षण अबाधितविषयत्व —साध्य के अभाव को निश्चय कराने वाले बलिष्ठ प्रमाणों का न होना ‘अबाधित विषयत्व है। असत्प्रतिक्षत्व’ है। उदाहरण द्वारा देखिये— ‘‘यह पर्वत अग्नि वाला है क्योंकि धूमवाला है, जो—जो धूम वाला होता है वह वह अग्नि वाला होता है, जैसे रसोई घर। जो जो अग्नि वाला नहीं होता है वह वह धूम वाला नहीं होता है, जैसे तालाब । चूंकि यह धूम वाला है, इसलिए अग्नि वाला जरूर ही है।’’ इन पांच अवयव रूप अनुमान प्रयोग में ‘धूमत्वात्’ हेतु हैं उसमें पक्षधर्मता हैं क्योंकि वह पक्षभूत पर्वत में रहता है।

सपक्षसत्त्व भी है , क्योंकि सपक्षभूत रसोई घर में रहता है। विपक्षव्यावृत्ति भी है, क्योंकि धूम हेतु तालाब आदि विषक्षों में नहीं है। अबाधित विषयत्व भी है, क्योंकि धूम हेतुद का जो अग्नि रूप साध्य विषय है वह प्रत्यक्ष आदि से बाधित नहीं है । असत्प्रतिपक्षत्व भी है, क्योंकि अग्नि के अभाव का साधक तुल्यबल वाला कोई प्रमाण नहीं है। इन पाँचों रूप सहित ही धूम हेतु अपने अग्नि रूप साध्य का ज्ञान कराता है। इनमें से किसी एक रूप के न होने से एक—एक दोष उपस्थित हो जाते हैं। पक्षधर्म के अभाव में असिद्ध दोष, सपक्षसत्त्व के अभाव में विरुद्ध दोष, विपक्षव्यावृत्ति के अभाव में अनैकान्तिक दोष, अबाधित विषयत्व के अभाव में कालात्ययापदिष्ट दोष एवं असत्प्रतिपक्षत्व के अभाव में प्रकरणसम दोष, ऐसे पांच रूप के अभाव में हेतु के पाँच दोष होने से पांच हेत्वाभास प्रसिद्ध हैं। पृथक् —पृथक् इनका स्पष्टीकरण— असिद्ध हेत्वाभास — पक्ष में जिसका रहना असिद्ध हो वह असिद्ध हेत्वाभास है, जैसे— ‘शब्द अनित्य है, क्योंकि चक्षु इन्द्रिय से जाना जाता है, । यहां ’चाक्षुषत्वात् ’ हेतु पक्षभूत शब्द में नहीं है, क्योंकि शब्द तो श्रोत्रेंद्रिय का विषय है।

विरुद्ध हेत्वाभास — साध्य के अभाव के साथ जो हेतु व्याप्त हो वह विरुद्ध हेत्वाभास है, जैसे— शब्द नित्य है क्योंकि वह कृतक हैं यहां कृतक हेतु अपने साध्यभूत नित्य से रहित अनित्य में व्याप्त है और सपक्ष आकाश आदि में नहीं रहता है अत: विरुद्ध हेत्वाभास है।

अनैकान्तिक हेत्वाभास — जो हेतु व्यभिचार सहित है, साध्य के अभाव में भी रहता है या विपक्ष में चला जाता है वह अनैकान्तिक है। ‘शब्द अनित्य है, क्योंकि वह प्रमेय है’ यहां प्रमेयत्व हेतु अपने साध्य अनित्य का व्यभिचारी है। क्योंकि आकाश आदि विपक्ष में नित्यत्व के साथ भी रह जाता है, अत: विपक्ष से अलग न होने से यह हेतु ‘अनैकान्तिक’ हेत्वाभास है।

कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास — जिस हेतु का विषय प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित हो वह कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास है। जैसे— ‘अग्नि ठण्डी है, क्योंकि वह पदार्थ है ‘ यहां ‘पदार्थत्व’ हेतु अपने विषय ‘ठण्डापन’ में प्रत्यक्ष से बाधित है । अत: अबाधितविषयता न होने से ‘कालात्ययापदिष्ट’ हेत्वाभास है।

प्रकरणसम हेत्वाभास—जिसका विरोधी साधन मौजूद हो वह हेतु प्रकरणसम अथवा सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास है । जैसे — ‘शब्द अनित्य है, क्योंकि वह नित्यधर्म से रहित है’। यहां नित्यधर्म रहितत्व हेतु का विरोधी साधन मौजूद है, अर्थात् ‘शब्द नित्य है क्योंकि अनित्य धर्मों से रहित है’ इस प्रकार नित्यता का साधन करना, उसका प्रतिपक्षी साधन है। अत: असत्प्राqतपक्षता के न होने से ‘नित्यधर्मरहितत्व’ हेतु प्रकरणसम हेत्वाभास है। इन पांच हेत्वाभास दोषों से रहित पांच रूपता हेतु का लक्षण है। पांचों रूपों में से किसी एक से रहित होने से हेतु अहेतु है। यहां तक नैयायिक ने कहा है।

जैनाचार्यों द्वारा पांचरूप्य हेतु का खंडन

नैयायिकों द्वारा हेतु का पांचरूप्य लक्षण भी ठीक नहीं है क्योंकि पक्षधर्मत्व से रहित भी ‘कृत्तिकोदय हेतु’ रोहिणी के उदय रूप साध्य का गायक है । अत: पंचरूपता लक्षण हेतु अव्याप्ति दोष से दूषित है। (न्या.पृ.८५—८८) दूसरी बात यह है कि आप नैयायिकों ने ही हेतु के तीन भेद माने हैं। केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी । इन तीनों में से पहले के दो हेतु में पांचरूपता नहीं है, मात्र अन्वयव्यतिरेकी हेतु में ही पांचरूपता है। केवलान्वयी हेतु

‘पक्षसपक्षवृत्तिर्विपक्षरहित: केवलान्वयी। यथा—अदृष्टादय: कस्यचित् प्रत्यक्षा अनुमोयत्वात् यद्यदनुमेयं तत्तत्कस्यचित्प्रत्यक्षं ‘यथाग्न्यादि’’।(न्या. पृ.८९)

जो पक्ष और सपक्ष में रहता है तथा विपक्ष से रहित है वह केवलान्वयी हेतु है जैसे— ‘पुण्यापादि किसी के प्रत्यक्ष है क्योंकि वे अनुमान से जाने जाते हैं। जो—जो अनुमान से जाने जाते है वे किसी के प्रत्यक्ष होते हैं जैसे— अग्नि आदि।’ यहां ‘पुण्यापादि ’ पक्ष है। ‘किसी के प्रत्यक्ष’ यह साध्य है ‘अनुमान से जाना जाता है’ यह हेतु है। ‘अग्नि आदि’ यह अन्वय दृष्टांत है। यह ‘अनुमेयत्व’ हेतु अदृष्ट आदि पक्ष में रहता है और सपक्ष अग्नि आदि में भी रहता है। अत: इस हेतु में पक्षधर्मत्व , सपक्ष सत्त्व है। किन्तु विपक्ष यहाँ कोई है ही नहीं क्योंकि सभी पदार्थ पक्ष और सपक्ष में आ गये, इसलिये विपक्ष व्यावृत्ति है ही नहीं।

केवल व्यतिरेकी का कथन

‘‘पक्षवृत्तिर्विपक्षव्यावृत्त: सपक्षरहितो हेतु: केवलव्यतिरेकी। यथा—जीवच्छरीरं सात्मकं भवितुमर्हति प्राणादिमत्वात् यद्यत्सात्मकं न भवति तत्तत्प्राणार्दिमन्न भवति यथा लोष्ठ इति’’।(न्या.पृ.८०)

जो हेतु पक्ष में रहता है, विपक्ष में नहीं रहता है और सपक्ष से रहित है वह हेतु केवल व्यतिरेकी है। जैसे जिन्दा शरीर जीवसहित होना चाहिए, क्योंकि वह प्राणादि वाला है। जो—जो जीव सहित नहीं होता है वह—वह प्राणादिमान् नहीं होता है, जैसे मिट्टी का ढेला। यहां ‘जिंदा शरीर’ पक्ष है, ‘जीवसहितत्व’ साध्य है। ‘प्राणादिमान् ’ हेतु है और ‘लोष्ठदिके’ व्यतिरेक दृष्टान्त है। प्राणादिमान् हेतु पक्षभूत जिंदा शरीर में रहता है और विपक्ष लोष्ठादिक से व्यावृत्त है। तथा सपक्ष यहां है ही नहीं, क्योंकि सभी पदार्थ पक्ष और विपक्ष के अन्तर्गत हो जाते हैं। अत: इसमें भी पंचरूपता नहीं है।

अन्वय—व्यतिरेकी हेतु का उदाहरण

‘‘तत्र पञ्चरूपोपपन्नोऽन्वयव्यतिरेकी। यथा शब्दोऽनित्यो भवितुमर्हति कृतकत्वात् , यद्यत्कृजकं तत्तदनित्यं यथा घट: यद्यदनित्यं न भवति तत्तत्कृतकं न भवति यथा आकाश: तथा चायं कृतक:, तस्मादनित्य एवेति’’। (न्या.पृ.८९)

जो हेतु पांचरूपों से सहित है वह अन्वय व्यतिरेकी है । जैसे ‘शब्द अनित्य है, क्योंकि कृतक है, जो—जो अनित्य होता है, जैसा घड़ा , जो जो अनित्य नहीं होता है वह—वह किया नहीं जाता, जैसे— आकाश और यह शब्द किया जाता है, इसलिए अनित्य ही है। यहाँ ‘शब्द’ पक्ष है उसकी ‘पक्षधर्मत्व’ है। सपक्ष घटादिकों में रहता है, अत: ‘सपक्षसत्त्व’ है। विपक्ष आकाश में नहीं रहता है अत: विपक्ष से व्यावृत्त है। हेतु का विषय— अनित्य किसी प्रमाण से बाधित नहीं है अत: ‘अबाधितविषयत्व’ है। एवं प्रतिपक्षी साधन के न होने से ‘असत्प्रतिपक्षत्व’ भी विद्यमान है। अत: ‘कृतकत्वात्’ हेतु इन पांचों रूपों से विशिष्ट होने से ‘अन्वयव्यतिरेकी’ कहलाता है। इन तीन हेतुओं के लक्षण से आप नैयायिकों द्वारा ही मान्य हेतु की पंचरूपता का निराकरण हो जाता है। क्योंकि केवलान्वयी और केवल व्यतिरेकी हेतुओं में पंचरूपता नहीं है।

जो नैयायिक का कहना है कि असिद्ध विरूद्ध आदि पांचों दोषों को दूर करने के लिये हेतु में पांच रूपता है वह गलत है। क्योंकि अन्यथानुपपत्ति लक्षण से विशिष्ट हेतु असिद्ध आदि दोषों का निराकरण कर देता है, और यदि ये पांच रूप विद्यमान हैं किन्तु अन्यथानुपपत्ति रूप अविनाभाव नहीं है तब तो वह हेतु हेत्वाभास ही कहलाता है। तथाहि— (पांचरूप्य, त्रैरूप्यहेतु हेत्वाभास क्यों है ?)

‘‘गर्भस्थो मैत्रीतनय: श्यामो भवितुमर्हति, मैत्रीतनयत्वात् , संप्रतिपन्नमैत्रीतनयवत् ।’’ (न्या.पृ.९१)

‘‘गर्भ में स्थित मैत्री का पुत्र काला होना चाहिए क्योंकि वह मैती का पुत्र है, अन्य मौजूद मैत्री के पुत्रों की तरह।’’ यहां ‘मैत्रीतनयत्वात् ’ हेतु पक्षभूत गर्भस्थ मैत्री मे रहता है अत: इस हेतु में ‘पक्ष’ धर्मत्व’ मौजूद है। सपक्षभूत मौजूद मैत्री पुत्रों में रहने से ‘सपक्षसत्त्व’ भी है विपक्षभूत गोरे चैत्र के पुत्रों से व्यावृत्त होने से विपक्ष से व्यावृत्ति रूप भी है। कोई बाधा नहीं है इसलिये ‘अबाधितविषयता’ भी है, क्योंकि गर्भस्थ मैत्रीपुत्र का कालापान किसी भी प्रमाण से बाधित नहीं है। विरोधी समान बल वाला कोई प्रमाण न होने से इस हेतु में ‘असत्प्रतिपक्षत्व’ भी है। इस प्रकार ‘मैत्रीतनयत्वात्’ हेतु में पाँचों रूप विद्यमान हैं। तीन रूप तो ‘हजार में सौ’ के न्याय से स्वयं सिद्ध हैं किन्तु अन्यथानुपपत्ति न होने से यह हेतु हेत्वाभास है क्योंकि ‘मैत्रीतनयत्वात् ’ हेतु से गर्भस्थ पुत्रों के कालेपन का अविनाभाव निश्चित नहीं है कदाचित् गर्भस्थ बालक गोरा भी हो सकता है। अत: अन्यथानुपपत्ति रूप हेतु ही सम्यक् हेतु है। यदि अन्यथानुपपत्ति से सहित ही पांचरूंपता हेतु का लक्षण है तो अन्यथानुपपत्ति हो हेतु का लक्षण सिद्ध है, पांच रूपता नहीं है। (बौद्ध के त्रैरूप्य हेतु का निराकरण)

‘‘अन्यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् । नान्यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेणा किम्’’।।१।।

अर्थ — जहां अन्यथानुपपत्ति है, वहां तीन रूपों के मानने से क्या ? तात्पर्य यह है कि अन्यथानुपपत्ति के बिना हेतु ही तीन रूपता अभिमत फल का संपादक नहीं है। बौद्धों के लिए यह उत्तर है। (नैयायिक के पांचरूप्य हेतु का खंडन)

‘‘अन्यथानुपपन्नत्वं यत्र किं तत्र पंचभि: । नान्यथानुपपन्नत्वं यत्र किं तत्र पंचभि:।।२।।’’ (प्रमाण प.पृ. ७२)

अर्थ — जहाँ हेतु में अन्यथानुपपत्ति है वहां पांच रूपों के मानने से क्या प्रयोजन है ? और जहां अन्यथानुपपत्ति नहीं है वहाँ पांच रूपों के सद्भाव से भी प्रयोजन है ? तात्पर्य यह है कि अन्यथानुपत्ति के बिना पांच रूप सर्वथा निष्फल हैं। अन्यथानुपपत्ति—जो साध्य के साथ अविनाभावी है— साध्य के होने पर ही होता है और साध्य के बिना नहीं होता है वह अन्यथानुपत्ति रूप हेतु है। हेतु के दो भेद हैं— विधि रूप और निषेध रूप। विधि रूप हेतु के भी विधि साधक और प्रतिषेध साधक ऐसे दो भेद हैं एवं निषेध रूप हेतु के भी दो भेद हैं— विधि साधक और प्रतिषेध साधक । इन सबके भेद प्रभेदों के नाम बताये जा चुके हैं। विशेष लक्षण अन्य ग्रन्थों से देख लेना चाहिये। जैना चार्यों ने हेत्वाभास के चार भेद ही माने हैं, जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है।

(आगम का लक्षण)

‘‘आप्तवाक्यनिबंधनमर्थज्ञानमागम: । ’’ (न्या. पृ. ११३)

आप्त के वचनों से होने वाले अर्थज्ञान को आगम कहते हैं।

(आप्त का लक्षण)

‘‘जो प्रत्यक्ष ज्ञाने समस्त पदार्थों का ज्ञाता— सर्वज्ञ है और परमहितोपदेशी है वह आप्त है। क्योंकि उनके द्वारा माने गये आप्त का ज्ञान स्वयं को नहीं जानता है। पुन: उसके एक ही ज्ञान है उसको जानने वाला ज्ञानांतर भी नहीं है। जब वह ईश्वर विशेषण भूत अपने ज्ञान को ही नहीं जानता है तो उस ज्ञान विशिष्ट आत्मा को कि ‘ मैं सर्वज्ञ हूँ ’ ऐसा कैसे जानेगा ? और जब अनात्मज्ञ है तब असर्वज्ञ ही है सर्वज्ञ नहीं है। एवं बुद्ध आदि भी सच्चे आप्त नहीं हैं। इसका स्पष्टीकरण आगे किया जावेगा।

(प्रमाण का विषय)

‘अनेके अन्ता धर्मा: सामान्यविशेषपर्यायगुण यस्येति सिद्धोऽनेकान्त:।।’’ (न्या.११७)

जिसमें अनेकों अंत —धर्म सामान्य विशेष पर्याय और गुण पाये जाते हैं उसे अनेकांत कहते हैं मतलब सामान्य आदि अनेक धर्म वाले पदार्थ को अनेकांत कहते हैं।

तत्र सामान्यमनुवृत्तिस्वरूपम् । तद्धि घटत्वं पृथुबुध्नोदराकार: गोत्वमिति सास्नादिमत्त्वमेव। (न्या. ११७)

अनुगत व्यवहार के विषयभूत सदृश परिणामात्मक ‘घटत्व ‘ ’घटत्व’ आदि अनुगत स्वरूप को सामान्य कहते हैं। वह घटत्व स्थूल कम्बु ग्रीवादि स्वरूप तथा ‘गोत्व’ सास्ना आदि स्वरूप ही है।

विशेषोऽपि स्थूलोऽयं घट: सूक्ष्म: इत्यादि व्यावृत्तप्रत्ययालम्बनं, घटादिस्वरूपमेव।’’ (न्या.पृ.१२०)

विशेष भी सामान्य की ही तरह ‘यह स्थूल घट है यह छोटा है।’ इत्यादि व्यावृत्त प्रतीति का विषयभूत घटादि व्यक्ति स्वरूप ही है । इसी बात को भगवान् माणिक्यनंदि भट्टारक ने भी कहा है कि ‘प्रमाण का विषय सामान्य—विशेष रूप है।’ पर्याय— परिणमन को पर्याय कहते हैं। उसके दो भेद हैं अर्थपर्यांय, व्यंजन पर्याय। उसमें भूत और भविष्य के उल्लेख रहित केवल वर्तमान कालीन वस्तु स्वरूप को अर्थपर्याय कहते हैं। आचार्यों ने इसे ऋजुसूत्र नय का विषय माना है। इसी एक देश को मानने वाले क्षणिकवादी बौद्ध हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति में कारणभूत जल के ले आने रूप अर्थक्रियाकारिता का नाम व्यक्ति—व्यंजन है, उस व्यंजन से युक्त पर्याय को व्यंजन पर्याय कहते हैं। जैसे—मिट्टी आदि को पिंड, स्थास, कोश, कुशूल, और कपाल आदि पर्यायें हैं। गुण— जो संपूर्ण द्रव्य में व्याप्त होकर रहते हैं और समस्त पर्यायों के साथ रहने वाले हैं, उन्हें गुण कहते हैं। और वे वस्तुत्व, रूप, गंध, स्पर्श आदि हैं। गुण के भी दो भेद हैं— सामान्य और विशेष। जो सभी द्रव्यों में रहें वे सामान्य गुण हैं जैसे अस्तित्व , वस्तुत्व आदि। जो उसी एक द्रव्य में रहते हैं वे विशेष गुण कहलाते हैं। जैसे— रूपरसादि। इन सामान्य विशेष रूप गुण और पर्यायों का आश्रय द्रव्य है । ऐसी अनेकान्तात्मक द्रव्य रूप वस्तु ही प्रमाण का विषय है। एवं अनेक धर्मात्मक वस्तु को विषय करने वाला प्रमाण है। वस्तु के एक धर्म को सापेक्ष ग्रहण करने वाला नय है। वस्तु के एक धर्म को निरपेक्ष रूप से ग्रहण करने वाला नय नयाभास या कुनय कहलाते हैं। यहां तक संक्षेप से प्रमाण और प्रमाणाभास को बताया है आगे कुछ विशेष समीक्षा करते हैं।

प्रमाणों के बारे में विशेष समीक्षा

प्रमाण विचार दार्शनिक परम्परा में सर्वत्र ‘प्रमीयते येन तत्प्रमाणं’ इस निरुक्ति के अनुसार जिसके द्वारा पदार्थों का ज्ञान हो उसे प्रमाण कहते हैं। नास्तिक वादि चार्वाक ने ‘मानं त्वक्षजमेव हि’ इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष को ही प्रमाण माना है।

वैशेषिक— नैयायिक'

दार्शनिक लोगों में सर्वप्रथम कणाद ने प्रमाण का सामान्य लक्षण निर्दिष्ट किया है। ‘अदुष्टं विद्या’ (वैशेषिक सूत्र ९-२-१२) निर्दोष विद्या को प्रमाण कहा है। न्याय दर्शन के प्रर्वतक गौतम के न्याय सूत्र में तो प्रमाण का सामान्य लक्षण उपलब्ध नहीं है पर उनके टीकाकार वात्स्यान ने अवश्य ही लक्षण किया है— ‘उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानि’ (न्याय भा.पृ.१८) उपलब्धियों के साधन को प्रमाण माना है। उद्योत कर ने भी ‘उपलब्धिहेतु: प्रमाणं’ (न्याय वा.पृ.५) उपलब्धि के हेतु को ही प्रमाण कहा है। जयंतभट्टने ‘प्रमाकरणं प्रमाणं’ (न्याय म.पृ.२५) प्रभा के करण को प्रमाण कहा है। उदयन ने ‘यथार्थानुभवो मानमनपेक्षतयेष्यते’ (न्या. कुसु.४,१) यथार्थ अनुभव को प्रमाण कहा है। यहाँ यह बात ध्यान में रखना कि ‘उदयन’ के पहले न्याय वैशेषिक दर्शन में ‘अनुभव पद’ दृष्टिगोचर नहीं होता है। इस प्रकार नैयायिक वैशेषिक दर्शन में प्रभा के करण को प्रमाण माना गया है। उन्होंने प्रत्यक्ष प्रभा के तीन कारण माने हैं— इन्द्रिय, इंद्रियार्थ सन्निकर्ष, और ज्ञान। किन्तु इंद्रिय और इन्द्रियार्थ सन्नि कर्ष को प्रत्यक्ष प्रभा का कारण मानना ठीक नहीं है, क्योंकि इन्द्रिय और सन्निकर्ष अज्ञान रूप हैं, अत: वे अज्ञान की निवृत्ति रूप प्रभा के करण कैसे हो सकते हैं ? अज्ञान निवृत्ति में अज्ञान का विरोधी ज्ञान ही होना चाहिए।सन्निकर्ष को प्रमाण कहने में पहले दोष दिखाया है। वृद्ध नैयायिकों ने कहा है कि —‘अव्यभिचारिणीमसंदिग्धामर्थोपलब्धिं विदधती बोधाबोधस्वभावा सामग्री प्रमाणं। (न्याय मं. पृ. १२) अव्यभिचारिणी असंदिग्ध अर्थ की उपलब्धि को कराने वाली ज्ञानात्मक तथा अज्ञानात्मक दोनों प्रकार की सामग्री ही प्रभा का करण है वही प्रमाण है। अत: वे कारक साकल्य—इंद्रिय, मन,पदार्थ प्रकाश आदि कारणों की समग्रता को प्रमाण कहते हैं। इस विषय में यहां इतना ही कहना पर्याप्त है कि अर्थ की उपलब्धि में साधकतम कारण तो ज्ञान है और कारक साकल्य की सार्थकता उस ज्ञान को उत्पन्न करने में है, क्योंकि ज्ञान को उत्पन्न किये बिना कारक साकल्य अर्थ का बोध नहीं करा सकते । अत: प्रभा का कारण रूप प्रमाण ज्ञान ही है इन्द्रिय सन्निकर्ष, साकल्य आदि नहीं है क्योंकि ये अचेतन हैं।

मीमांसक—

मीमांसा दर्शन में प्राभाकर और भाट्ट दो सम्प्रदाय हैं— उनमें से प्राभाकरों ने —‘अनुभूतिश्च न: प्रमाणम्’ (बृहती १-१-५) अनुभूति ही प्रमाण का लक्षण है ऐसा कहा है। एवं ज्ञातृ व्यापार को भी प्रमाण कहा है। किन्तु एक ही अर्थ की अनुभूति विभिन्न व्यक्तियों को अपनी—अपनी भावना के अनुसार विभिन्न प्रकार की होती है, इसलिये केवल अनुभूति को प्रमाण नहीं माना जा सकता । ज्ञाता के व्यापार को प्रमाण मानने में उनका मतलब यह है कि ‘अर्थ प्रकाशन ज्ञाता के व्यापार द्वारा होता है’ अत: ज्ञाता का व्यापार प्रमाण है। किन्तु ज्ञाता का व्यापार अर्थ प्रकाशन में या उसके जानने में प्रमाण तभी माना जा सकता है जब कि उसका व्यापार यथार्थ वस्तु के बोध में कारण हो। जहां पर यथार्थ वस्तु के ज्ञान में कारण न होकर विपरीत ही अर्थ ज्ञान करा रहा है वहां प्रमाण कैसे होगा ?

भाट्टों ने ‘अनधिगततथाभूतार्थ निश्चायकं प्रमाणम् (शा.दी.पृ.१२३)

अज्ञात यथावस्थित अर्थ के जानने वाले ज्ञान को प्रमाण कहा है, किन्तु यह लक्षण अव्याप्ति दोष से दूषित है, क्योंकि उन्होंने स्वयं गृहीतग्राही धारावाही ज्ञान को प्रमाण माना है। कुमारिल भट्ट ने प्रमाण के सामान्य लक्षण में पांच विशेषण दिये हैं—

‘‘तत्रापूवार्थ विज्ञानं निश्चितं बाधवर्जितम् ।

अदुष्टकारणरब्धं प्रमाणं लोकसम्मतम् । (प्रमाण वा.पृ.२१)

जो अपूर्व को जानने वाला हो , निश्चित हो, बाधाओं से रहित हो, निर्दोष कारणों से उत्पन्न हुआ हो और लोकसम्मत हो वह प्रमाण कहलाता है। उक्त प्रमाण लक्षण में यद्यपि कोई बात आपत्ति जनक प्रतीत नहीं होती, फिर भी अन्य दार्शनिकों ने इस लक्षण की आलोचना की ळै। विशेष दूषण यह है कि— मीमांसकों ने ज्ञान को परोक्ष माना है, किन्तु उनकी यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि जो ज्ञान स्वयं परोक्ष है वह प्रमाण कैसे हो सकता है ? बौद्ध — बौद्ध दर्शन में ‘अज्ञातार्थज्ञापकं प्रमाणम् ’ (प्रमाण स.टी.पृ.११) अज्ञात के प्रकाशक ज्ञान को प्रमाण कहा है।

दिग्नाग ने— ‘स्वसंवित्ति: फलं चात्र तद्रूपार्थनिश्चय: ।,

विषयाकार एवास्य प्रमाणं तेन मीयते।।’ (प्रमाण स.पृ.२१०)

विषयाकार को प्रमाण तथा विषयाकार अर्थनिश्चय को और स्वसंवित्ति को प्रमाण का फल माना है। धर्मकीर्ति ने प्रमाण के लक्षण में ‘अविसंवादी’ पद को जोड़कर दिग्नाग प्रतिपादित लक्षण का ही समर्थन किया है। तत्त्वसंग्रहकार शांतरक्षित ने सारूप्य और योग्यता को प्रमाण माना है। तथा विषयाधिगति और स्वसंवित्ति को फल माना है। मोक्षाकार गुप्त ने —

प्रमाणं सम्यग्ज्ञानमपूर्वगोचरम्’ (तर्क. भा.मोक्षाकार गुप्त पृ.१)

अपूर्व अर्थ को विषय करने वाले सम्यग्ज्ञान को प्रमाण कहा है। इस प्रकार बौद्धों ने अज्ञातार्थ प्रकाशक अविसंववादि ज्ञान को प्रमाण कहा है। बौद्धों के यहां प्रमाण और फल में अभेद होने से यद्यपि प्रमाण ज्ञान रूप है तथापि विषयाकारता को ही इन्होंने प्रमाण माना है। यद्यपि ज्ञान गत सारूप्य ज्ञान स्वरूप है फिर भी ज्ञान का विषयाकार होना एक जटिल समस्या है, क्योंकि अमूर्तिक ज्ञान का मूर्तिक पदार्थों के आकार होना संभव नहीं है। दूसरी बात यह है कि ज्ञान को विषयों के आकार होना ही मानने से संशय—विपर्यय ज्ञान को भी प्रमाण मानना पड़ेगा क्योंकि वे ज्ञान भी तो विषयाकार हैं।

सांख्य—

सांख्यों ने ‘इन्द्रियवृत्ति: प्रमाणम् ’ (योगद.व्या.पृ.२७)

श्रोत्रादि इन्द्रियों की वृत्ति— व्यापार को प्रमाण माना है। किन्तु इन्द्रिय व्यापार को प्रमाण मानना उचित नहीं है क्योंकि इन्द्रियों के समान उनका व्यापार भी अचेतन और अज्ञान रूप ही होगा। अत: अज्ञान रूप व्यापार जानने रूप क्रिया का साधकतम कारण नहीं हो सकता है। उपसंहार— यौग— (नैयायिक—वैशेषिक) इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और ज्ञान को प्रभा का करण मानते हैं। प्राभाकर ज्ञाता के व्यापार को , मीमांसक इन्द्रिय को, बौद्ध सारूप्य (तदाकारता) और योग्यता को जानने रूप क्रिया का कारण मानते हैं किन्तु ये सब मान्यताएं दूषित हैं। इनको विशेष समझने के लिए प्रमेयकमल मार्तंड न्यायकुमुदचन्द्र आदि ग्रन्थ देखना चाहिए। जैनाचार्य ज्ञान को ही प्रभा— जानने रूप क्रिया का कारण कहते हैं। उसी का स्पष्टीकरण— जैन— जैन दर्शन में आचार्य श्री समन्तभद्र महोदय ने ‘तत्त्वज्ञानं प्रमाणं’ तत्त्व ज्ञान को प्रमाण कहा है (अष्ट सं.) अन्यत्र स्वयंभूस्तोत्र में — ‘स्वपरावभासकं यथा प्रमाणं भुवि बुद्धिलक्षणं’ स्वपरावभासक ज्ञान को प्रमाण कहा है। आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने

‘स्वपराभासि ज्ञानं बाधविवर्जितम् ’(न्यायावतार श्लो.१)

स्वपर अवभासी तथा बाधारहित ज्ञान को प्रमाण कहा है। श्री अकलंक देव ने ‘व्यवसायात्मक ज्ञानमात्मार्थग्राहकं मतम्’ अपने और अर्थ के ग्राहक व्यवसायात्मक ज्ञान को प्रमाण कहा है। (लघीयत्रस्य का.६०) अन्यत्र श्री अकलंक देव ने ही—

‘प्रमाणमविसंवादि ज्ञानमनधिगतार्थाधिगमलक्षणत्वात्’ (अष्टशती का. ३६)

अनधिगत अर्थ को जानने वाले अविसंवादी ज्ञान को प्रमाण का लक्षण कहा है श्री विद्यानन्द महोदय ने ‘सम्यग्ज्ञानं प्रभाणम्’ (प्रमाणपरी.पृ.५१) पहले सम्यग्ज्ञान को प्रमाण का लक्षण कहकर पुन: ‘स्वार्थव्यवसायात्मकं सम्यग्ज्ञानं सम्यग्ज्ञानत्वात्’ (प्रमाण प.) सम्यग्ज्ञान स्वार्थ व्यवसायात्मक है, क्योंकि वह सम्यग्ज्ञान है। ऐसा स्पष्ट किया है। इन्होंने प्रमाण के लक्षण में अनधिगत या अपूर्व विशेषण नहीं दिया है। क्योंकि उनके अनुसार ज्ञान चाहे अपूर्व अर्थ को जाने या गृहीत अर्थ को, स्वार्थ व्यासायात्मक होने से ही प्रमाण है किन्तु माणिक्यनन्दि आचार्य महोदय ने— ‘स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्’ (परीक्षा मु.सू.१)

स्व और अपूर्व अर्थ के व्यवसायात्मक—नश्चय कराने वाले ज्ञान को प्रमाण कहा है। एवं स्वयं ग्रन्थकार ने अपूर्वांर्थ पद का लक्षण किया है —
अनिश्चितोऽपूर्वार्थ:।।४।। (प.मु.प्र.प.)

जिस पदार्थ का पहले किसी प्रमाण से निश्चय नहीं किया गया है वह अपूर्वार्थ है। अर्थात् जो वस्तु किसी यथार्थ ग्राही प्रमाण से अभी तक जानी नहीं गई है वह अपूर्वार्थ है। क्योंकि जो किसी ज्ञान से जान ली गयी है उसका जानना व्यर्थ है इस वास्ते अपूर्व विशेषण सूत्र में दिया है। इसलिए यहां पर ईहा आदि ज्ञानों का पिषय भूत पदार्थ अवग्रह आदि ज्ञानों के द्वारा ज्ञात होने पर भी पूर्वार्थ नहीं है, अपितु अपूर्वार्थ ही है क्योंकि अवग्रहादि के द्वारा ईहादि ज्ञान के विषयभूत अवान्तर विशेष का निश्चय नहीं होता है। अन्य प्रकार से भी अपूर्व का लक्षण करते हैं।

‘दृष्टोऽपि समारोपत्तादृक’।।५।। (प.मु.प्र.प.)

दृष्ट—अन्य किसी प्रमाण के द्वारा जाने गये पदार्थ में भी समारोप—संशय, विपर्यय या अनघ्सस साय आ जाता है तो वे भी अपूर्वार्थ हो जाते हैं। इस प्रकार से जैनाचार्यों द्वारा कथित सभी प्रमाण के लक्षणों में विरोध नहीं है। ये लक्षण एक दूसरे के समर्थक हैं क्योंकि वास्तव में ‘ज्ञान’ ही प्रमाण कहलाने योग्य है।उस ज्ञान से ही ‘हिताहित प्राप्तिपरिहारसमर्थ हि प्रमाणं ततो ज्ञानमेव तत् ’ हित की प्राप्ति और अहित का परिहार होता है, अन्य इन्द्रिय, सन्निकर्ष आदि अचेतन से नहीं हो सकता है। अत: स्वपर प्रकाशी सम्यक् तत्वज्ञान ही प्रमाण है। यह समझना चाहिए।

प्रमाण के भेद का विचार

चार्बाक ने एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण माना है।

बौद्ध और वैशेषिक प्रत्यक्ष अनुमान ऐसे दो प्रमाण स्वीकार करते हैं । सांख्य ने प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम ऐसे तीन भेद माने हैं। नैयायिक ने उसमें उपमान और मिला दिया है। मीमांसक इसी में अर्थापत्ति और अभाव मिलाकर छह भेद कर देते हैं।

जैनाचार्यों ने सर्वत्र प्रमाण के दो भेद किये हैं प्रत्यक्ष ओर परोक्ष । इन दो भेदों में ही उपर्युक्त प्रमाण के भेद गर्भित हो जाते हैं

सिद्धान्त ग्रन्थों में आचार्य श्री उमास्वामी आदि ने प्रत्यक्ष दो भेद किये है विकल और सकल विकल में अवधि, मन:पर्यंय एवं सकल में केवल ज्ञान है। परोक्ष प्रमाण के मति श्रुत दो भेद करके मतिज्ञान के पर्यावाची नामों में श्री उमास्वामी आचार्य ने कहा है कि—‘मति:स्मृति: संज्ञा चिंताभिनिबोध इत्यनर्थांतरम्’ ।।१३।। मति, स्मृति, प्रत्यभिमान, तर्क और अनुमान ये पाँचों मतिज्ञान के ही पर्याय वाची नाम है। (तत्वार्थसूत्र प्र.अ.) न्याय ग्रन्थों में आचार्यों ने प्रत्यक्ष के दो भेद किये हैं साँव्यवहारिक और पारमार्थिक। सांव्यवहारिक से मतिज्ञान को लिया है। और उसके अवग्रह, ईहा, अवाय, और धारणा रूप से चार भेद करके पांच इन्द्रिय और मन से गुणा करके बहु आदि पदार्थ के १२ भेदों से भी गुणित करके ३३६ भेद कर दिये हैं। जिनका स्पष्टीकरण पहले आ चुका है। पारमार्थिक के विकल सकल भेद करते हैं। तथा मति के पर्याय वाची स्मृति आदि चारों को परोक्ष में ले लेते हैं। उन चारों में श्रुतज्ञान को आगम प्रमाण से मिलाकर के परोक्ष के पांच भेद कर देते हैं यथा—स्मृति, प्रत्यभिज्ञान तर्क, अनुमान और आगम ये परोक्ष प्रमाण के पांच भेद हैं।

क्योंकि स्मृति आदि मतिज्ञान के समान इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं है। यही कारण है कि इन्हें परोक्ष में लिया गया है । इस प्रकार से प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाण में ज्ञान के पांचों भेद आ जाते हैं।

अन्य दार्शनिकों ने स्मृति प्रत्यभिज्ञान और तर्क को पृथक् से प्रमाण में नहीं लिया है। अत: सभी के द्वारा मान्य प्रमाण संख्या अपूर्ण है।

जैनाचार्यों ने अन्य जनों के द्वारा मान्य उपमान प्रमाण को सादृश्य प्रत्यभिज्ञान में अन्तर्भूत कर लिया है। अर्थापत्ति प्रमाण तो अनुमान में हो शामिल हो जाता है। एवं अभाव प्रमाण का प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में अन्तर्भाव हो जाता है ऐसा बताया है। क्योंकि —

‘गृहीत्वा वस्तुसद् भावं स्मृत्वा च प्रतियोगिनम् ।

मानसं नास्तिताज्ञानं जायतेऽक्षानपेक्षया।। (कुमारित. मीमांसा श्लोक)

यहाँ वस्तु का सद्भाव घट रहित केवल भूतल को देखकर और प्रतियोगी—घट की याद कर बाह्य इन्द्रियों की अपेक्षा से रहित नहीं है’ इस रूप जो मानस ज्ञान होता है वह अभाव प्रमाण है ऐसा मीमांसक मत में कुमारिल भट्ट का कहना है। अत: ‘भूतल को देखना’ प्रत्यक्ष में शामिल है। ‘घट का स्मरण स्मृति’ ज्ञान में अन्तर्भूत है। इत्यादि।

प्रत्यक्ष प्रमाण पर विचार

दार्शनिक जगत में प्रत्यक्ष लक्षण अनेक प्रकार का उपलब्ध होता है।

नैयायिक और वैशेषिक— ‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमव्यपदेश्मव्यभिचारी व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्’।(न्याय सू. १-१-४)

इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न होने वाला, अव्यपपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष हैं।

मतलब सामान्यता ये लोग इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष को प्रत्यक्ष कहते हैं।

सांख्य— श्रोत्रादिवृत्तिरविकल्पिका प्रत्यक्षम् । ये लोग निर्विकल्प श्रोत्र आदि इन्द्रियों के व्यापार को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते है।

मीमांसक — ‘तत्संप्रयोगे पुरूषस्यें द्रियाणं बुद्धिजन्म तत: प्रत्यक्षम् । (जैमिनि.१-१-४)

इन्द्रियों का आत्मा के साथ संयोग होने पर उत्पन्न होने वाली बुद्धि को प्रत्यक्ष कहते हैं।

बौद्ध—

बौद्धदर्शन में तीन मान्यतायें हैं— वसुबन्धु, दिग्नाग और धर्मकीर्ति । वसुबन्धु ने—‘ अर्थादिज्ञानं प्रत्यक्षम् (प्रमाण स.पृ.३२) अर्थजन्य निर्विकल्प ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा है।

दिग्नाग ने— प्रत्यक्ष’ कल्पनापोढं नामजात्याद्यसंयुतम् (प्रमाण सं.१-३)

नाम जाति आदि रूप कल्पना से रहित निर्विकल्पज्ञान को प्रत्यक्ष कहा है।

धर्मकीर्ति ने— कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् (न्यायबिन्दु पृ. ११)

निर्विकल्प तथा अभ्रान्त ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा है।

सामान्यतया सभी बौद्ध तार्विकों ने निर्विकल्प को प्रत्यक्ष स्वीकार किया है।

जैनाचार्य—

जैनाचार्यों ने ‘‘ प्रत्यक्षं विशदं ज्ञानं ’’(लघीयस्त्रय का. ३) कहकर यह स्पष्ट कर दिया है कि स्पष्ट निर्मल ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण है। सिद्धान्त ग्रन्थों में तो आत्मा से उत्पन्न हुये ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा है किन्तु न्याय में इन्द्रिय मन निमित्तक ज्ञान को साँव्यवहारिक प्रत्यक्ष कह दिया है।

अकलंक देव ने प्रत्यक्ष लक्षण में उपात्त वैशद्य का खुलासा कर दिया है यथा—

अनुमाद्यतिरेकेण विशेषप्रतिभासनम् ।

तद्वैशद्यं मतं बुद्धेरवैशद्यमत: परम् ।।(लधी.का .४)

जो अनुमान आदि की अपेक्षा से रहित ज्ञान का विशेष प्रतिभास है वह वैशद्य—वशदता है इससे भिन्न अवैशद्य है।

ज्ञान के कारण

बौध ज्ञान के प्रति अर्थ और आलोक को कारण मानते हैं उन्होंने चार प्रत्ययों —कारणों से संपूर्ण ज्ञानों (स्वसंवेदनादि) की उत्पत्ति वर्णित की है। वे प्रत्यय ये हैं—समनंतरप्रत्यय, आधिपत्य प्रत्यय, आलम्बनप्रत्यय और सहकारिप्रत्यय। पूर्वज्ञान उत्तर ज्ञान की उत्पत्ति के कारण होता है इस लिये वह ‘समनन्तर प्रत्यय’ कहलाता है।

चक्षुरादिक इन्द्रियां आधिपत्य प्रत्यय कही जाती हैं।

अर्थ — विषय ‘आलंबन प्रत्यय’ कहा जाता है। आलोक आदि ‘सहकारी प्रत्यय’ हैं।

इस तरह बौद्धों ने इन्द्रियों के अलावा अर्थ और आलोक को भी कारण स्वीकार किया है । अर्थ की कारणता पर तो यहां तक कह दिया है कि ‘नाकारणं विषय:’ जो पदार्थ ज्ञान की उत्पत्ति में कारण नहीं है वह ज्ञान का विषय भी नहीं है। इसीलिये ये बौद्ध अर्थ से ज्ञान का तदुत्पत्ति तदाकार और तदध्यवसाय रूप मानते हैं और इसी से प्रतिकर्मव्यवस्था सिद्ध करते हैं।

नैयायिक भी अर्थ को ज्ञान का कारण मानते हैं परन्तु अर्थ से ज्ञान की उत्पत्ति नहीं मानते हैं। क्योंकि ये लोग ज्ञान प्रति सीधा कारण सन्निकर्ष को मानते हैं। इसीलिए जैनों ने नैयायिक आदि के अर्थकारणतावाद पर इतना विचार नहीं किया है जितना कि बौद्धों के अर्थालोक कारणतावाद पर किया है। जैनाचार्य श्रावरण के क्षयोपशम को ही प्रत्येक ज्ञान के प्रति कारण मानते हैं । इस विषय पर श्री अकलंक देव ने संक्षेप से कह दिया है कि—

‘अयमर्थ इति ज्ञानं विद्यान्नोत्पत्तिरर्थत:।

अन्यथा न विवाद:स्यात् कुलालादिघटादिवत् ।।(लघीय. ५३)

‘यह अर्थ है’ ज्ञान तो यह जानता है, किन्तु ‘अर्थ से मैं उत्पन्न हुआ हूं’ इस बात को वह नहीं जानता है, यदि जानता तो किसी को विवाद नहीं होना चाहिए था। अत: ज्ञान अर्थ से उत्पनन नहीं होता है।

सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष

‘‘सांव्यवहारिकं इन्द्रियानिन्द्रियप्रत्यक्षम्’’ (लघीय.स्वीप. का.४)

इन्द्रिय और अनिंद्रिय—मन से जन्य ज्ञान को सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष माना है। सांव्यवहारिक उसे इसलिये कहते हैं कि लोक में दूसरे दर्शनकार इंद्रिय, मन सापेक्ष ज्ञान को प्रत्यक्ष हैं। वास्तव में तो जो ज्ञान पर निरपेक्ष एवं आत्म मात्र सापेक्ष तथा पूर्ण निर्मल है वही ज्ञान प्रत्यक्ष है। अत: लोक व्यवहार की दृष्टि से अक्षजन्य ज्ञान को भी प्रत्यक्ष कहने में कोई अनौचित्य है।सिद्धान्त की भाषा में तो उसे परोक्ष ही कहा गया है।

मुख्य प्रत्यक्ष

दार्शनिक जगत् में प्राय: सभी ने एक ऐसा प्रत्यक्ष स्वीकार किया है जो लौकिक प्रत्यक्ष से भिन्न है और जिसे अलौकिक प्रत्यक्ष योगिप्रत या योगिज्ञान के नाम से कहा गया है। यद्यपि किसी—किसी ने इस प्रत्यक्ष में मन को अपेक्षा वर्णित की है तथापि योगजधर्म की प्रमुखता होने के कारण उसे अलौकिक ही कहा है। कुछ ही हो, यह अवश्य मानना पड़ेगा कि आत्मा में एक अतीन्द्रिय ज्ञान भी सम्भव है। जैन दर्शन में ऐसे ही आत्म मात्र सापेक्ष साक्षात् स्वरूप अतीन्द्रिय ज्ञान को मुख्य प्रत्यक्ष कहते हैं।

परोक्ष प्रमाण का विचार

जैन दर्शन प्रमाण का दूसरा भेद परोक्ष है। यद्यपि बौद्धों ने परोक्ष शब्द का प्रयोग अनुमान के विषय भूत अर्थ में किया है। यथा—‘‘ द्विविधो अर्थ: प्रत्यक्ष: परोक्षश्च। तत्र प्रत्यक्षविषय: साक्षात्क्रिय माण: प्रत्यक्ष:। परोक्ष: पुनरसाक्षात्परिच्छिमानोऽनुमेयत्वादनुानविषय: ।(प्रमाण प.पृ.६५) अर्थ के दो भेद हैं— प्रत्यक्ष और परोक्ष । उसमें प्रत्यक्ष का विषयभूत साक्षात् किया गया अर्थ प्रत्यक्ष है। परोक्ष अर्थात् असाक्षात् किया गया पदार्थ परोक्ष है वह अनुमेय रूप होने से अनुमान का विषय है।

किन्तु जैनदर्शन में परोक्ष शब्द का प्रयोग परोक्षज्ञान में ही होता चला आ रहा है। दूसरे प्रत्यक्षता और परोक्षता वस्तुत: ज्ञाननिष्ठ धर्म हैं। ज्ञान को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष होने से अर्थ भी उपचार से प्रम्त्यक्ष और परोक्ष कहा जाता है । प्राय: लोक व्यवहार में इन्द्रिय व्यापार रहित ज्ञान को परोक्ष कहा गया है जबकि जैन दर्शन में इन्द्रियादि पर की अपेक्षा से होने वाले ज्ञान को परोक्ष कहा है। यथा—‘‘उपात्तानुपात्तपरप्राधान्यादवगम: परोक्षम्।।६।। उपात्त—इन्द्रिय और मन, अनुपात्त—प्रकाश उपदेश आदि ये पर हैं इनकी प्रधानता से जो ज्ञान होता है वह परोक्ष कहलाता है। (तत्त्वार्थ वा.पृ.५२)

श्री अकलंक देव ने ‘ज्ञानस्यैव विशदनिर्भासिन: प्रत्यक्षत्वम् , इतरस्य परोक्षता।’

(लघीय. स्वो. का.३)

विशद निर्भासी ज्ञान ही प्रत्यक्ष है एवं इससे भिन्न परोक्ष है ऐसा कहा है बौद्ध, सांख्य आदि किसी ने भी परोक्ष प्रमाण नहीं माना है, किन्तु अनुमान, आगम, उपमान आदि को प्रमाण मानते हैं संख्या के प्रकरण में इस बात को स्पष्ट किया है कि परोक्ष प्रमाण को माने बिना प्रमाणों की व्यवस्था पूरी नहीं होती है। बौद्ध ने अनुमान को मान लिया, किन्तु स्मृति आगम आदि को प्रमाण नहीं माना है। निष्कर्ष यही निकलता है कि स्मृति , प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और आगम में पांच प्रमाण ही परोक्ष हैं। न्याय ग्रन्थ में आचार्यों ने मतिज्ञान के अंशरूप ‘मति’— इन्द्रियजन्य ज्ञान को सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष बतलाकर शेष स्मृति आदि को परोक्ष कहा है, क्योंकि स्मृति प्रत्यभिज्ञान आदि ज्ञान अपनी उत्पत्ति में ज्ञानान्तर की अपेक्षा रखते हैं। अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये ज्ञान भी ज्ञानान्तर से व्यवहित न होने के कारण सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष ही हैं।

परोक्ष के भेद—प्रभेद पर विचार

बौद्ध—

त्रिरूप वाले हेतु से होने वाले साध्य के ज्ञान को अनुमान कहते हैं। अनुमान के दो भेद हैं— स्वार्थ, परार्थ।

वैशेषिक — नैयायिक—

‘तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं, पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च’ यह न्याय दर्शन का सूत्र है। प्रत्यक्ष—पूर्वक अनुमान होता है उसके तीन भेद हैं पूर्ववत् , शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट ।

कोई इस प्रकार से व्याख्यान करते हैं कि प्रत्यक्षपूर्वक तीन प्रकार का अनुमान होता है—केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी। इनमें से केवलान्वयी को पूर्ववत् कहते हैं क्योंकि पूर्वअन्वय। जिस अनुमान में केवल अन्वय व्याप्ति मिलती है उसे केवलान्वयी —पूर्ववत् अनुमान कहते हैं। केवलव्यतिरेकी को शेषवत् एवं अन्वय व्यतिरेकी को सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहते हैं।

उपमान— प्रसिद्ध वस्तु के साधम्र्य से अप्रसिद्ध की सिद्धि करना उपमान प्रमाण है। जैसे गौ के समान गवय होता है।

मीमांसक—

मीमांसक ने चतुर्लक्षणलिंग से उत्पन्न साध्य ज्ञान को अनुमान कहा है। नियत संबंध का एक देखना, संबंध का स्मरण करना, अबाधक होना और अबाधित विषय वाला होना इत्यादि।

(प्रकरण पं. पृ.६४, ७६)

‘ज्ञातसंबंधस्यैकउेश्सनादसंनिकृष्टऽर्थे बुद्धिरनुमानस’ साध्य और साधन के अविनाभाव का यथार्थ परिज्ञान रखने वाले पुरूष को एक साधन के देखने से साध्य अर्थ का ज्ञान होना अनुमान कहलाता है। ऐसे ही आगम, उपमान,अर्थापत्ति और अभाव ये सब परोक्ष प्रमाण हैं किन्तु इन सभी के यहां स्मृति, प्रत्यभिज्ञान और तर्क प्रमाण न होने से अनुमान आदि का लक्षण असंभव है। स्मृति और तर्क के बिना हेतु से साध्य का ज्ञान कैसे हो सकता है। किसी न कभी अग्नि से धूम निकलता हुआ देखा है तभी तो वह केवल धूम देखकर पहले के संबंध का स्मरण करके तर्कज्ञान से धूम का अग्नि के साथ अविनाभाव समझ कर धूमहेतु से अग्नि का अनुमान लगता है।

अनुमान के अवयव

नैयायिक हेतु के पांच अवयव मानते हैं यथा— ‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिनानि पञ्चावयवा:’(तर्कसंग्रह)

प्रतिज्ञा, हेतु , उदाहरण, उपनय और निगमन । न्याय सूत्र के टीकाकार वात्स्यायन ने नैयायिकों की दश अवयव मान्यता का भी उल्लेख किया है
—‘दशावयवानित्ये के नैयायिका वाक्ये संचक्षते जिज्ञासा संशय: शक्यप्राप्ति: प्रयोजनं, संशयव्युदास: इति’’ (न्यायवात्स्या. भाष्य १-१-३२)

उपर्युक्त पांच में जिज्ञासा, संशय, शक्यप्राप्ति, प्रयोजन और संशयव्युदास मिला देने से दश अवयव हो जाते हैं।

बौद्ध—

बौद्धों ने अनुमान का हेतु रूप एक ही अवयव माना है। धर्मकीर्ति ने हेतु और दृष्टांत ऐसे दो अवयवों को स्वीकार किया है। दिग्नाग ने पक्ष हेतु और दृष्टांत ऐसे तीन अवयव भी मान लिये हैं मुख्य रूप से बौद्ध के यहां केवल एक हेतु का प्रयोग ही आवश्यक माना गया है। उसका कहना है कि केवल हेतु के प्रयोग से ही गम्यमान पक्ष में साध्य का बोध हो जाता है। मीमांसक तीन अवयव मानते हैं — पक्ष, हेतु, दृष्टांत । कहीं पर चार भी मानते हैं,

नैयायिक पांच ही मानते हैं । मीमांसक चार और तीन मानते हैं एवं सांख्य तीन अवयव मानते हैं।

जैनाचार्यों ने मात्र ‘एतद्द्वयमेवानुमानाङ्गनोदाहरणम्’ (परीक्षामुख) इस सूत्र के अनुसार प्रतिज्ञा और हेतु ऐसे दो ही अवयव मानते हैं उनका कहना है कि दृष्टांत उपनय और निगमन इन तीनों की स्वीकारता शास्त्र में बालबुद्धि वालों का समझाने के लिए होती है किन्तु वाद काल में नहीं होती है । वहाँ पर विद्वान पुरूषों को दो ही अवयव प्रयुक्त करने चाहिए।

हेतु के लक्षण पर विचार

बौद्ध सांख्य और वैशेषिक हेतु का तैरूप्य लक्षण मानते हैं। यद्यपि हेतु का त्ररूप्य लक्षण अधिकांशत: बौद्धों का ही प्रसिद्ध है फिर भी त्रेरूप्य की मान्यता सांख्य और वैशेषिकों की भी है। इनकी ये परंपरा बौद्धों से प्राचीन है दिग्नाग के पहले होने वाले प्रशस्तपाद ने अपने प्रशस्तपादभाष्य में (पृ. १०० में काश्यव और (कणाद)कथित) दो पद्यों का उद्धा किया है जिनमें पक्षधर्मत्व, स्त्रपक्षसत्त्वं और विपक्ष व्यावृत्ति का स्पष्ट उल्लेख है।नैयायिक ने पाँच अवयव माने हैं यथा—

‘‘पक्षधर्मत्वम् समक्षसत्त्वं विपक्षाद् व्यावृत्तिरबाधित विषयात्वमसत्प्रतिपक्षत्वं चेति....... एतं पंचभिल क्षणौरूपन्नं लिंगमनुमापकं भवति’’(न्याय. म.स.१०१)

इन तीन रूप और पांच रूप की मान्यता अति प्रसिद्ध है, किन्तु इनके अलावा भी हेतु के द्विलक्षण चतुर्लक्षण, और षड्लक्षण एवं एक लक्षण की मान्यताओं का उल्लेख तर्क ग्रन्थों में पाया जाता है। इनमें चर्तुलक्षण की मान्यता संभवत: मीमांसकों की मालूम होती है। जिसका निर्देश प्रसिद्ध मीमांसक विद्वान् प्रभाकरानुयायी शालिकानाथ ने किया है।

इन सबका खंडन करते हुये जैनाचार्यों ने हेतु का एक ही लक्षण माना है। जिसका नाम है अन्यथानुपत्ति अर्थात् साध्य साधन का अविनाभाव। इसका भी स्पष्टीकरण किया जा चुका है।

हेत्वाभास पर विचार

नैयायिक हेतु के पांच रूप मानते हैं अत: उन्होंने एक— एक रूप के अभाव में पांच हेत्वाभास माने हैं असिद्ध , विरूद्ध, अनैकांतिक, कालात्ययापदिष्ट और प्रकरणसम। (न्यायक.पृ.१४)

वैशेषिक और बौद्ध हेतु के तीन रूप स्वीकार करते हैं इसलिये उन्होंने तीन हेत्वाभास माने हैं— असिद्ध, विरुद्ध, अनैकांतिक । सांख्य ने भी त्रैरूप्य हेतु के विपरीत ये तीन हेत्वाभास माने जाते हैं। प्रशस्तपाद ने वैशेषिक दर्शन सम्मत तीन हत्वाभासों के अलावा एक चौथे हेत्वाभास की कल्पना भी की है जिसका नाम है अनध्यवसित (प्र.भा.पृ.११६)

जैन विद्वान् हेतु का केवल एक ही अन्यथानुपपत्ति रूप मानते हैं अत: उनका हेत्वाभास भी एक ही होना चाहिये। इस संबंध में सूक्ष्मप्रज्ञ श्री अकलंक देव ने बड़ी योग्यता से उत्तर दिया ‘साधनं प्रकृता भावेऽनुपपन्नं तदोऽपरे। विरूद्धासिद्धसंदिग्धा अकिंचित्करविस्तरा:।’ (न्याय.वि.का.२६९)

वस्तुत: हेत्वाभास एक ही है और वह है अकिंचित्कर अथवा असिद्ध और संदिग्ध य उसी के विस्तार हैं। चूंकि अन्यथानुपपत्ति का अभाव अनेक प्रकार से होता है अत: हेत्वाभास के असिद्ध विशुद्ध , व्यभिचारी और अंकिचित्कर ये चार भेद भी माने गये हैं।

आगम प्रमाण का विस्तार

यद्यपि चार्वाक आगम प्रमाण नहीं मानता है फिर भी बृहस्पति गुरु को चार्वाक मत प्रवर्तक मानता है अत: उन बृहस्पति के द्वारा कहे गये वचन और तत्त्व ही आगम सिद्ध होते हैं अन्यथा अपने गुरु कथित तत्वों का वर्णन या गुरु का नामोल्लेख भी कैसे कर सकेगे ?

बौद्धों ने भी प्रत्यक्ष और अनुमान इन दो को ही प्रमाण माना है अत: ये लोग भी आगम को प्रमाण नहीं मानते हैं। फिर भी ‘आगम आदि अप्रत्यक्ष प्रमाण अनुमान में अंतर्भूत हैं क्योंकि वे अप्रत्यक्ष पदार्थ को विषय करने वाले प्रमाण है।’ ऐसा कहा है (षट् दर्शन.पृ.५७)

एवं बौद्धों ने चिपिटक ग्रन्थ को भी माना है। उनका कहना है कि ‘महात्मा बुद्ध के वचनों का संकलन उनके निकटतम शिष्यों द्वारा त्रिपिटिकों में ही हुआ है। उनके नाम— विनयपिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्मपिटक हैं। इनकी भाषा पालि है। इन ग्रन्थों में के बल प्राचीन बौद्ध धर्म का वर्णन मिलता है।’ अस्तु! बुद्ध भगवान् वक्ता ही प्रमाण नहीं है तब उनके आगम भी प्रमाण कैसे होंगे ? बुद्ध की प्रमाणता— आप्तता का निराकरण आप्तसमीक्षा में किया जावेगा।

नैयायिक—

नैयायिकों ने कहा कि ‘शाब्दमाप्तोपदेशस्तु’.......(षड्व.पृ.१०६)

आप्त के उपदेश को आगम प्रमाण कहते हैं। ‘जो एकांत से सदा सत्यवादी और हितकारी है वहीं प्राप्त के वचन को आप्तोपदेश कहते हैं।’ वैशेषिक ने प्रत्येक अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं अत: आगम को प्रमाण कहा है। रागद्वेषादि से रहित वीतराग ब्रह्म, सनत्कुमार आदि प्राप्त हैं। और श्रुति— वेद इन्हीं के वचन आगम हैं। (षड्द.)

मीमांसक ‘शादंशाब्श्वतवेदा’— नित्यवेद से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को आगम कहते हैं। (षड्द. पृ. ४४०)

वास्तव में इन नैयायिक वैशेषिक ने जो ईश्वर का लक्षण किया है उसका आप्त समीक्षा में विचार किया जावेगा। जब इनका मान्य आप्त ही सिद्ध नहीं है तब उनके वचन आगम कैसे हो सकेगें?

यही हाल सांख्यों का है उन्होंने भी कपिल को आप्त माना है, परंतु उनकी मान्यता ठीक नहीं है। अत: उनके आगम प्रमाण का लक्षण गलत सिद्ध होता है।

अपौरूषेय वेद का विचार

मीमांसक ने तो वेद को अपौरूषेंय सिद्ध करने में बड़ा पुरूषार्थ लगाया है। इनका कहना है कि ‘वेद अपौरूषेय हैं इसलिये वे प्रमाण हैं, क्योंकि उनके कत्र्ता का स्मरण नहीं है, अत: वेद वाक्यों से ही धर्म—अधर्म आदि अतींद्रिय पदार्थों का ज्ञान होता है।’ जैनाचार्य उनसे ऐसा पूछते हैं कि भाई! उन वेद वाक्यों का व्याख्यात रागी है या वीतरागी ? यदि व्याख्यात रागी है तो विपरीत अर्थ भी कर देगा। यदि वीतरागी कहो तो आप सर्वज्ञ मानते नहीं। इत्यादि रूप से वेद प्रमाणीक नहीं हैं क्योंकि उनमें परस्पर विरोधी वचन पाये जाते हैं।

यद्यपि मीमांसकों ने वेद को अपीरूपेय कहा है फिर भी उन्हीं के यहां किन्हीं—कन्हीं ने वेद के कर्ता भी मान लिये हैं। काणाद —वैशेषिक लोग अष्टक ऋषि को वेद का कर्ता कहते हैं, पौराणिक लोग ब्रह्मा को एवं जैन कालासुर का वेद का कर्ता कहते हैं यदि आप कहें कि वेद में विशेष शक्तिशाली मंत्रादि पाये जाते हैं अत: वेद प्रमाण हैं । इस पर भी हम जैनों का उत्तर है कि उन विशेष मन्त्रों की उत्पत्ति समुद्र, खान आदि से हुई है न कि भंडार से। यदि अपोरूपेय होने से ही वेद प्रमाण हैं तो म्लेच्छों के यहां मातृ विवाह, मांसाहार आदि क्रियायें भी प्रमाण हो जावेंगी, क्योंकि उनका कर्ता कोई पुरूष भी स्मृति में नहीं है वे क्रियायें भी पुरूषकृत् प्रतीत न होने से अपोरूपये ही हैं। किन्तु ऐसा है नहीं। अत: वेद प्रमाण नहीं हैं ।

जैनों द्वारा मान्य आगम का लक्षण

‘आप्त के वचन आदि निमित्त से होने वाला अर्थ ज्ञान ही आगम है’। एवं सर्वज्ञ से ही आगम सिद्ध होता है और उसके अर्थ अनुसार अनुष्ठान करने से ही सर्वज्ञ बनते हैं। इस प्रकार बीजांकुर न्याय से सर्वज्ञ और आगम की सिद्धि होती है।

अभाव का विचार

मीमांसक ने स्वतंत्र एक अभाव प्रमाण माना है।इसलिये उनका कहना है कि—
‘‘अभावश्च प्रागभावादिभेद भिन्नोवस्तुरूपोऽभ्युपगन्तव्य: अन्यथा कारणादिव्यवहारस्य लोकप्रतीतस्याभाव प्रसंगात् ’’(षड्द.पृ.४४६)

अभाव प्रमाण का विषयभूत अभाव पदार्थ वस्तुभूत है तथा वह चार प्रकार का है— प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्यायभाव और अत्यंताभाव। यदि ये चार अभाव न हों तो संसार में कारण , कार्य , घट, पट, जीव, अजीव आदि की प्रतिनितय व्यवस्था का लोप होकर समस्त व्यवहार ही नष्ट हो जावेगा।

वैशैषिकों द्वारा मान्य सात पदार्थों में एक अभाव नाम पदार्थ है उसके भी उन्होंने चार भेद किये हैं। यथा—
‘अभावश्चतुर्विध:— प्रागभाव: प्रध्वंसाभावोत्यंताभावोऽन्योन्याभावश्चेति’’।।(तर्क संग्रह)

अभाव के चार भेद हैं प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव।

नैयायिक लोग अभाव के चार भेद करके भी उन्हें सर्वथा तुच्छाभाव रूप कहते हैं।

सांख्य इन अभावों को सर्वथा भावरूप ही सिद्ध करते हैं।

किन्तु जैनाचार्यों ने इन भावैकांतवादी सांख्य का खंडन करके एवं नैयायिक के तुच्छाभाव का भी निषेध करके चारों अभावों को भावांतर रूप स्वीकार किया है। अभाव के चार भेद हैं—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव।

कारण में कार्य का न होना प्रागभाव है जैसे— मट्टी में घट नहीं है, उस प्रागभाव का अभाव होने के बाद घट बनता है।

कार्य का विनाश न होना प्रध्वंसाभाव है जैसे —घट में प्रध्वंसाभाव है उसका अभाव न होवे तो घट अनंत काल तक बना रहेगा, किन्तु उसका अभाव—प्रध्वंस होकर घट से कपाल आदि बन जाते हैं।

एक पर्याय का दूसरी पर्याय में अभाव अन्योन्याभाव है जैसे घटपर्याय में पट आदि पर्यायें नहीं हैं। यदि इसको न मानों तो सभी पर्यायें एक मेक हो जावेंगी— सभी पदार्थ सर्वात्मक हो जावेंगे।

एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य में अभाव होना अत्यंताभाव है जैसे—जीवद्रव्य में अजीव पुदगल आदि द्रव्यों का अभाव है इसको न माने तो भी सभी वस्तुयें अपने स्वभाव से रहित सर्वात्मकया नि:स्वरूप हो जावेंगी।

इन चारों ही अभावों का वर्णन अष्टसहस्री में कारिका ९-१०-११ में बहुत ही विस्तृत रूप से किया गया है।

इन अभावों को ग्रहण के लिये अभाव नामक प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये प्रत्यक्ष आदि से ही जाने जाते हैं। अत: मीमांसकों द्वारा मान्य अभाव प्रमाण व्यर्थ है।

इस प्रकार से ‘प्रमाण समीक्षा’ प्रकरण समाप्त हुआ।

प्रमेय समीक्षा

प्रमाणेन ज्ञानेन प्रमीयते ज्ञायते यत् वस्तुतत्त्वं तत् सर्वं प्रमेयं ज्ञेयमित्यर्थ:। प्रमाण— ज्ञान के द्वारा वस्तु तत्त्व जाना जाता है वह सभी तत्त्व प्रमेय—ज्ञेय कहलाता है। अर्थात् ज्ञान से जाने गये सभी पदार्थ ज्ञेय कहलाते हैं और ज्ञान को ही प्रमाण माना है अत: प्रमाण से जाने गये सभी पदार्थ ‘प्रमेय’ कोटि में आ जाते हैं। संसार में कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जो ज्ञान का विषय न हो, चाहे वह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय हो किन्तु सभी चेतन—अचेतन पदार्थ ज्ञान के विषय अवश्य हैं जो ज्ञान के विषय नहीं हैं वे पदार्थ नहीं हैं। यहां तक कि प्रमाण भी कथं—स्वयं के द्वारा जाना जाता है अत: ज्ञेय भी है । यथा—

‘ज्ञानपदेन प्रमातु: प्रमितेश्च व्यावृत्ति: । ननु ज्ञानपदेन यथा प्रमातु: प्रमितेश्च व्यावृत्ति: कृता तथा प्रमेयस्य कथं न कृता तस्यापि ज्ञानत्वाभावात् इति चेत्तस्यापि चशब्दात् ग्रहणां बोध्यं। यद्यपि स्वपरिच्छेद्यापेक्षया ज्ञानस्य प्रमेयत्वमस्त्येव तथापि घटपटा— दबहिरर्थापेक्षया नास्तीत्यतो युत्तं च शब्दात्तस्य ग्रहणं।’(न्याय दी.टि.पृ.१०)

आचार्य कहते हैं कि ‘सम्यग्ज्ञानं प्रमाणं’ सूत्र में ज्ञान शब्द से प्रमाता—आत्मा औश्र प्रमिति—ज्ञान की व्यावृत्ति हो जाती है, इस पर शंकाकार कहता है कि जैसे ज्ञानपद से प्रमाता और प्रमिति का निराकरण किया है वैसे ही प्रमेय का निराकरण क्यों नहीं किया , क्योंकि प्रमेय भी ज्ञानरूप नहीं है। इस पर जैनाचार्य कह रहे हैं कि च शब्द से प्रमेय का भी निराकरण हुआ समझना चाहिए। यद्यपि ‘स्व’ को जानने की अपेक्षा से ज्ञान ‘प्रमेय’ ही है फिर भी घट पट आदि बाह्य पदार्थों की अपेक्षा से प्रमेय नहीं भी है अत: च शब्द से प्रमेय का भी निराकरण हो जाता है। यहां इस बात को समझ लेना चाहिये कि ये प्रमाता, प्रमिति और प्रमेय तीनों ही यद्यपि ज्ञान नहीं है फिर भी इनमें सम्यक्पना सिद्ध है। इसलिये सच्चे ज्ञान के द्वारा जाने गये पदार्थ सच्चे ज्ञेय—प्रमेय कहलाते हैं। ये ही ज्ञेयभूत जीवादिपदार्थ द्रव्य, तत्व आदि सम्यक्तव के विषयभूत हैं। इसलिये यद्यपि ‘प्रमेय’ शब्द से प्रमाण को भी लिया जा सकता है फिर भी इस ग्रन्थ में प्रमाण की समीक्षा करने के बाद प्रमेय की समीक्षा की गई है क्योंकि न्याय शास्त्रों में प्रमाण का विषय मुख्यतया प्रतिपाद्य है, और ये न्याय शास्त्र भी कहलाते हैं। इस प्रमेय समीक्षा में सबसे प्रथम ‘दर्शन’ शब्द का निरूक्ति अर्थ करते हुये सभी दर्शनों की संक्षिप्त समीक्षा की जाती है।

दर्शन शब्द का महत्व और आधार

‘दृश्यते निर्णीयते वस्तुतत्त्वमनेनेति दर्शनम्’ दृश्यते निर्णीयते इदं वस्तुमत्त्वमिति दर्शनम्’ व्याकरण शास्त्र की इन दोनों व्युत्पत्तियों के अनुसार दृश् धातु से दर्शन शब्द बना है। जिसके द्वारा वस्तु का स्वरूप देखा जाय निर्णीत किया जाय, वह दर्शन है, या दूसरी व्युत्पत्ति के आधार पर दर्शन शब्द का अर्थ उल्लिखित विचारधारा के द्वारा निर्णीत तत्वों की स्वीकारमा होता है। एवं पहली व्युतपत्ति के आधार पर दर्शन शब्द तर्क—वतर्क , मन्थन या परीक्षास्वरूप उस विचार धारा का नाम है जो तत्वों के निर्णय में प्रयोजक हुआ करती है। जैसे —यह संसार नित्य है यह अनित्य ? इसकी सृष्टि करने वाला कोई है या नहीं ? आत्मा का स्वरूप क्या है? इसका पुनर्जन्म होता है या नहीं ? ईश्वर की सत्ता है या नहीं? इत्यादि प्रश्नों का समुचित उत्तर देना दर्शन शास्त्र का काम है।

‘शास्त्र’ शब्द की व्युत्पत्ति दो धातुओं से हुई है— शास—आज्ञा करना, तथा शंस— वर्णन करना। ‘‘शासनात् शंसनात् शास्त्रं शास्त्रमित्यभिधीयते’’ प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार शासन अर्थ में शास्त्र शब्द का प्रयोग धर्म शास्त्र के लिये किया जाता है। शंसक शास्त्र—बोधक शास्त्र वह है जिसके द्वारा वस्तु के यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया जाय। धर्म शास्त्र कर्तव्य और अकर्तव्य का प्रतिपादन करने के कारण पुरूष परतन्त्र है। किन्तु दर्शन शास्त्र वस्तु के स्वरूप का प्रतिपादन करने से वस्तु परतन्त्र है।

दर्शनों को दो भागों में विभक्त किया गया है—

भारतीय दर्शन औश्र पाश्चात्य दर्शन। भारतीय दर्शन में भी वैदिक दर्शन और अवैदिक दर्शन से दो भेद हो गये हैं।

वैदिक दर्शन में— मुख्यत: सांख्य, वेदांत, मीमांसा, योग न्याय तथा वैशेषिक दर्शन लिये जाते हैं।

अवैदिक दर्शन में— जैन, बौद्ध और चार्वाक माने जाते हैं। वेद परम्परा के पोषक वैदिक एवं वैदिक परंपरा से भिन्न दर्शनों को अवैदिक दर्शन कहते हैं। न्याय वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त इन छह दर्शनों को आस्तिक एवं जैन, चार्वाक तथा बौद्ध दर्शनों को नास्तिक कहा जाता है। यहां वेदों को मानने वालों को आस्तिक एवं वेदों की न मानने वालों को नास्तिक कहा है किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि प्राय: प्राणियों को जन्मान्तर रूप परलोक स्वर्ग, नरक तथा मुक्ति को न मानने वालो को नास्तिक कहा जाता है, इससे जैन और बौद्ध दोनों अवैदिक दर्शन नास्तिक न होकर आस्तिक हो जाते क्योंकि है ये दोनों दर्शन परलोक , स्वर्ग आदि को स्वीकार करते है। यदि जगत् के कर्ता अनादि निधन ईश्वर को मानने में आस्तिकता है, तब तो सांख्य मीमांसक भी ईश्वर की सृष्टि का कर्ता न मानने से नास्तिक बन जावेंगे क्योंकि ये दोनों ईश्वर को सृष्टि का कर्ता नही मानते हैं। तात्पर्य यह है कि जैन नास्तिक नहीं हैं परलोक स्वर्ग , नरक, मुक्ति आदि मानते हैं ईश्वर को सृष्टि का कर्ता न मान कर भी निरीश्वरादि नहीं है क्योंकि अनन्त ईश्वरों सर्वज्ञों को स्वीकार करते हैं।

अब यहां भारतीय दर्शनों की संक्षिप्त मान्यता दिखाकर उनकी समीक्षा करना है। इनमें सबसे पहले चार्वाक दर्शन को स्पष्ट करेंगे।

चार्वाक मत

चार्वाक— ननु अनाद्यनंतरूप इति विशेषणमात्मन: कथं योयुज्यते । कायाकारपरिणतियोग्येभ्यो भूतेभ्येश्चैतन्यं जायते। जलबुदबुदवदनित्या जीवा इत्यभिधानात् । न केषामपि मते जीवास्यानानन्द्यनन्त—त्वग्राहकं प्रमाणं जाघटयते। (विश्व त.प्र.१)

आत्मा का अनादि अनन्त विशेषण कैसे बन सकता है ? शरीर के आकार को प्राप्त हुये पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु इन भूत चतुष्टयों से ही चैतन्य उत्पन्न होता है। जीव पानी के बुदबुद् के समान अनित्य है। जीव को अनादि अनन्त कहने वाला कोई भी प्रमाण नहीं है। प्रत्यक्ष प्रमाण से केवल वर्तमान कान से संबंद्ध पदार्थों का ही ज्ञान होता है। अत: प्रत्यक्ष प्रमाण जीव को अनादि अनन्त सिद्ध नहीं कर सकता। जन्म समय के पहले माता—पिता का चैतन्य होता ही है यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है अत: उससे भिन्न अन्य चैतन्य की कल्पना करना व्यर्थ है। इत्यादि।

ये चार्वाक काम और अर्थ इन दो ही पुरुषार्थों को मानते हैं एवं स्वर्गादि पारलौकिक सुख का निराकरण कर देते हैं अतएव चार्वाक का ‘लोकायत’ यह दूसरा नाम अन्वर्थ है क्योंकि ये लोक प्रसिद्ध के अतिरिक्त अन्य कुछ भी पदार्थ नहीं मानते हैं।

‘‘अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवाय्वनिलानिला: ।

चतुम्र्य: खलु भूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ।।
किण्वादिभ्य: समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत् ।।
अहं स्थूल: कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यत: ।।१।।
देह: स्थौल्यादियोगाच्च स: एवात्मा न चापर :।
मम देहोयमित्युक्ति: संभवेदोपचारिकी ।।२।।
(सर्वद, पृ. ५)

अर्थ— चार्बाक के यहां पृथ्वी, जल, अग्नि वायु ये चार तत्व हैं। किण्वादिमादक द्रव्य के समुदाय से उत्पन्न मदशक्ति के समान इन्हीं तत्वों से चैतन्य उत्पन्न हो जाता है। मैं ‘स्थूल हूं,कृश हूं, इत्यादि से देह ओर जीव में समान अधिकरण होने से शरीर ही आत्मा है ‘मेरा देह’ इत्यादि व्यवहार उपचार मात्र से होता है। संक्षेपत: इस मत का सिद्धान्त है कि कण्टक आदि से उत्पन्न हुआ दु:ख ही नरक है, लोक प्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है , मरण ही मुक्ति है।

ये चार्वाक जड़वादी हैं, इनके यहां प्रत्यक्ष एक ही मात्र प्रमाण है, अनुमान शब्द आदि जितने अप्रत्यक्ष प्रमाण हैं वे सभी भ्रममूलक हैं। अत: जड़ जगत् चार भौतिक तत्वों से बना हुआ है इन पृथ्वी आदि तत्वों को नहीं माना जा सकता है । यह जड़ जगत् चार भौतिक तत्वों से बना हुआ है इन पृथ्वी आदि तत्वों का ज्ञान हमें इन्द्रियों से प्राप्त होता है।

‘ एक ही वस्तु की भिन्न—भिन्न अवस्थाओं में नये—नये गुणों की उत्पत्ति हो सकती है । यद्यपि लाल रंग तो पान में है, न सुपारी में, न चूने मे है, फिर भी उनको एक साथ चबाने से लाल रंग की उत्पत्ति हो जाती है। गुड़ में मादक गुण नहीं है फिर भी सड़ जाने से उसमें मादकता आ जाती है। इसी तरह भौतिक तत्वों का जब विशेष ढंग से मिश्रण होता है तब जीव और शरीर का निर्वाण होता है, और उसमें चैतन्य का संचार हो जाता है । शरीर को नष्ट हो जाने के बाद चैतन्य भी नष्ट हो जाता है। मृत्यु के बाद भी अवशिष्ट नहीं रहता है, अत: मृत्यु के बाद कर्मों के फल भोग की कोई सम्भावना नहीं है’’।

‘चारु—सुन्दर वाक्— बातों को अर्थात् लोगों को प्रिय लगने वाली बातों को कहने के कारण, अथवा आत्मा, परलोक आदि को चर्वण—भक्षण कर जाने के कारण इनका ‘चावार्क’ नाम सार्थक है। चार्वाक दर्शन के संस्थापक बृहस्पति गुरू हैं अत: इस दर्शन का नाम बार्हस्पत्य दर्शन भी है। चार्वाक का इष्ट कथन—

‘‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् नास्ति मृत्योरगोचर :।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत: ।।’’
(सर्व दर्शन संग्रह)

मृत्यु से कोई नहीं बच सकते अत: जब तक जीवो सुख से जीवो, भस्मीभूत हुये शरीर को पुन: उत्पत्ति कैसे हो सकती है।

विचित्रता यह है कि यह चार्बाक जड़ से चैतन्य की उत्पत्ति मानकर आत्मा, ईश्वर और पर लोक सबको समाप्त कर देता है।

उपसंहार — चार्बाक आत्मा को अनादि अनन्त एवं अजीव से भिन्न जीव नाम का द्रव्य नहीं मानते हैं किन्तु वास्तव में जाति स्मरण, संस्कार व्यंतर आदि के निमित्तों से पूनर्जन्म सिद्ध है। ये एक प्रत्यक्ष हो मानते हैं किन्तु अनुमान के बिना परलोकादि का निषेध ओर पर में ज्ञान आदि के अस्तित्व को कहना भी असंभव है। ये जड़ पृथ्वी आदि से चैतन्य की उत्पत्ति सिद्ध करते हैं यह तो सर्वथा असंभव है। पूर्वजन्म के मनुष्य गति आयु आदि क्रम के निमित्त से जीव माता—पिता आदि निमित्तों से जन्म लेता है। अचेतन चेतन की उत्पत्ति मानना सर्वथा गलत है अत: शुभ कार्यों से अपनी आत्मा को नरकादि से बचाकर सुखी बनाने का प्रयत्ल करो।

बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन का मौलिक सिद्धान्त है ‘सर्व क्षणिकं सत्त्वात्’ सभी पदार्थ क्षणिक हैं क्योंकि सत् रूप है।

‘‘बौद्धानां सुगतो देवो विश्वं च क्षणाभंगुरम् ।

आय्र्यसत्त्वख्यया तवचतुष्टयमिदं क्रमात्
दु:खमायतन चैव तत: समुदयो मत:।
मार्गश्चेत्यस्य च व्याख्या कमेणा श्रूयतामत:।।
दु:खं संसारिण: स्कंधास्ते च पंच प्रकीर्तिता: ।
विज्ञानं वेदना संज्ञा संस्कारोरूपमेव च ।।
पंचेन्द्रियाणि शब्दाद्या विषया: पंच मानसम् ।
धर्मायतनमेतानि द्वादशायतनानि तु।।’’
(सर्वद.पृ.४६)

अर्थ — बौद्धों के भगवान् बुद्ध हैं । संसार क्षणिक है। दु:ख समुदाय, तन्निरोध और मार्ग ये सूत्रोक्त चार ही तत्व हैं। विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार और रूप ये पांच स्कंध सांसारिक दु:ख हैं। शब्द, स्पर्श रूप, रस, और गंध ये पांच विषय हैं। ये पाँच विषय , पांचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि ये द्वारश—आयतन हैं। इत्यादि।

‘‘माध्यमिक योगाचार सौत्रान्तिकवैभाषिक संज्ञाभि: प्रतिद्धा बौद्धा: यथाक्रमं सर्वशून्यत्वबाह्य—शून्यत्वबाह्यार्थानुमेयत्वबाह्यार्थप्रत्यक्षत्ववादानातिष्ठंते।’’ (सर्वद.पृ.१६)

माध्यमिक,योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक के भेद से बौद्धों के चार भेद हैं। माध्यमिक बाह्य अभ्यन्तर समस्त वस्तु को शून्य मानते हैं ।योगाचार बाह्य वस्तु का अभाव मानते हैं। सौत्रान्तिक बाह्य वस्तु को अनुमान ज्ञान का विषय मानते हैं । एवं वैभाषिक लोग बाह्य वस्तु को प्रत्यक्ष कहते हैं।

‘‘दु:खसमुदयनिरोधमार्गणा इति चत्वार: पदार्था एव मुमुक्षुभिज्र्ञातव्या:’’।(विश्वत.प्र.पृ.३०२)

बौद्धों का कथन है कि दु:ख, समुदय, निरोध तथा मार्ग ये चार (आर्य सत्य) पदार्थ ही मोक्ष के लिये जानने योग्य हैं। शारीरिक , मानसिक, आगांतुक और सहज से उत्पन्न हुये ‘दु:ख’ कहलाते हैं। इन दु:खों के उत्पादक तथा कर्मबंध के कारण दो हैं अविद्या, तृष्णा, इन्हें ही ‘समुदय’ कहा है। अविद्या और तृष्णा के नाश से निरास्रव चित्त उत्पन्न होना, या चित्त के संतान का उच्छेद होना ‘निरोध’ है इसे ही मोक्ष कहते हैं । मोक्ष मार्ग के आठ अंग हैं । सम्यक्तव आदि जिनके नाम है।

चार आर्य सत्य—

(१) सांसारिक जीवन दु:खों से परिपूर्ण है।

(२) दु:खों का कारण है।

(३) दु:खों का अन्तसम्भव है।

(४) दु:खों के अन्त का उपाय है।

इन्हें क्रमश: दु:ख, दु:खसमुदय, दु:ख निरोध तथा दु:खनिरोध मार्ग कहते हैं। (भारतीय द.पृ.७७)

बौद्धों के यहां ‘त्रिपिटक’ ग्रन्थ हैं—

त्रपिटकों के अन्तर्गत विनयपटिक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक हैं। प्रत्येक पिटक में अनेक ग्रंथ हैं इसलिये ‘पिटक’ (पेटी) नाम पड़ा। विनयपिटक में संघ के नियमों का, सुत्त—पटक में बुद्ध के वार्तालाप और उपदेशों का , तथा अभिधम्म पिटक में दार्शनिक विचारों का संग्रह हुआ है। इन पिटकों में केवल प्राचीन बौद्ध धर्म का वर्णन मिलता है। इनकी भाषा पालि है। (भारतीय द.पृ.७५)

बौद्धों के कुछ प्रमुख सिद्धान्त ये हैं— अनात्मवाद, प्रतीत्यसमुत्पात, क्षणभंगवाद विज्ञानवाद, शून्य—वाद, अन्यापोह आदि। बौद्ध दर्शन में आत्मा का स्वतन्त्र कोई अस्तित्व नहीं है किन्तु रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पाँच स्कंधों के समुदाय को ही आत्मा माना गया है।

बौद्धों के प्रमाण के दो भेद हैं— प्रत्यक्ष और अनुमान। ये स्मृति, तर्क आदि को प्रमाण नहीं मानते हैं।

प्रत्यक्ष के चार भेद हैं— इन्द्रिय प्रत्यक्ष, मानस प्रत्यक्ष, स्वसंवेदन प्रत्यक्ष, और योगि प्रत्यक्ष।

स्पर्शन आदि पांचद इंद्रियों से उत्पन्न हुआ ज्ञान इंद्रिय प्रत्यक्ष है।

मन से उत्पन्न हुआ ज्ञान मानस प्रत्यक्ष है।

सब चित्त और चैत्तों का जो आत्म संवेदन है वह स्वसंवेदन प्रत्यक्ष है। (न्यायबिन्दु)

दु:ख , समुदय आदि चार आर्य सत्यों की भावना करते—करते एक समय ऐसा आता है जब भावना अपनी चरम सीमा तक पहुंच जाती है और तब भाव्यमान अर्थ का साक्षात्कारी ज्ञान उत्पन्न होता है, यही योगि प्रत्यक्ष है।

इनके यहां ये चारों प्रत्यक्ष निर्विकल्प (अनिश्चायक) हैं यह प्रत्यक्ष ज्ञान क्षणिक स्वलक्षण मात्र को (एक समय की पर्याय को) ही जानता है।

अनुमान प्रमाण भ्रान्त है क्योंकि वह सामान्य पदार्थ को विषय करता है।

पक्षधर्मत्व सपक्षसत्त्व और विपक्षव्यावृत्ति इन तीन रूप वाले लिंग —हेतु से होने वाला साध्य का ज्ञान अनुमान कहलाता है वह अनुमान दो प्रकार का है—स्वार्थ और परार्थ।

हेतु के तीन भेद हैं— अनुपलब्धि हेतु, स्वभाव हेतु और कार्यहेतु।

अनुपलब्धि के ४ भेद हैं— वरुद्धोपलब्धि, विरूद्धकार्योपलब्धि और स्वभावानुपलब्धि।

विरूद्धोपलब्धि— यहां शीत स्पर्श नहीं है, क्योंकि शीतस्पर्श की विरोधी अग्नि मौजूद है।

विरूद्धकार्योपलब्धि— यहां शीत स्पर्श नहीं है, क्योंकि शीतस्पर्श के विरोधी अग्नि का कार्य धूम उपलब्ध हो रहा है।

कारणानुपलब्धि— यहां धूम नहीं है, क्योंकि यहां धूम का कारण अग्नि नहीं पाई जाती ।

स्वभावानुपलब्धि— यहां धूम नहीं है क्योंकि उपलब्धि लक्षण प्राप्त होने पर भी उसकी उपलब्धि नहीं हो रही है। अन्यत्र अनुपलब्धि के सात भेद भी माने हैं। स्वभावहेतु—‘ यह वृक्ष है, क्योंकि शिंशपा है।‘

कार्यहेतु— यहां अग्नि है, क्योंकि धूम का सद्भाव है।’ (षट्दर्शन पृ. ६७)

सौत्रान्तिक और वैभाषिकों के अनुसार अर्थ दो प्रकार का है— स्वलक्षण और सामान्यलक्षण इनमें से स्वलक्षण प्रत्यक्ष का विषय है और सामान्यलक्षण अनुमान का विषय है । प्रत्येक वस्तु में दो प्रकार के तत्त्व होते हैं। एक असाधारण, दूसरा साधारण । ‘स्वमसाधारणलक्षणं तत्त्वं स्पलक्षणं’।

(न्यायबिन्दु)

प्रत्येक गो में गो स्वलक्षण है और अनेक गायों में जो गोत्व रूप एक सामान्य की प्रतीति होती है ।वह सामान्य लक्षण है।

बौद्धों के यहां विनाश को पदार्थ का स्वभाव माना गया है, वे कहते हैं कि मुद्गर की चोट से घट फूटा तो घट के विनाश में मुद्गर कारण नहीं है विनाश स्वयं स्वभाव से हुआ है। हां! कपाल की उत्पत्ति में मुद्गर कारण अवश्य है।

इनकी एक मान्यता और भी बड़ी विचित्र है कि शब्द अपने अर्थ को न कहकर ‘अन्यापोह’ को कहते हैं जैसे— आपने ‘गो’ शब्द कहा , तो इसका अर्थ होता है अश्व का अभाव , ऊंट का अभाव इत्यादि गो से भिन्न पदार्थों का अभाव ही अर्थ होता है, न कि गो शब्द का अर्थ गाय वाचक कोई पशु। ऐसे ही ये बौद्ध पदार्थों से ज्ञान की उत्पत्ति मानते हैं उनका कहना है कि गो शब्द का अर्थ गाय वाचक कोई पशु । ऐसे ही ये बौद्ध पदार्थों से ज्ञान की उत्पत्ति मानते हैं उनका कहना है कि ज्ञान पदार्थ से उत्पन्न होकर उसका आकार धारण करता है और उसे ही जानता है।

उनके यहाँ एक ‘संवृति सत्य’ भी मजेदार है जो कि हर एक बातों को कल्पित कह देता है। माध्यमिक लोग बाह्य और अभ्यन्तर चेतन सभी को अभाव कहकर जगत् को शून्य रूप सिद्ध करते हैं इसलिए ये शून्याद्वैतवादी हैं।

योगाचार—विज्ञान को ही तत्व मानते हैं अन्य कुछ भी बाह्य पदार्थ नहीं मानते हैं । अत: ये विज्ञानाद्वैतवादी हैं। ये दोनों ही अनेकों पदार्थों के सद्भाव को संवृति— कल्पना रूप कहते हैं।

अष्टसहस्री आदि ग्रन्थों में स्थल—स्थल पर इन बौद्धों की मान्यताओं का निराकरण किया गया है ।

उपसंहार— बौद्धों ने सभी पदार्थों का क्षणिक कहा है , यह कथन असंभव है। हां पदार्थों की अर्थ पर्याय प्रतिक्षण नष्ट होती है, किन्तु व्यंजन पर्याय बहुत काल तक भी स्थाई रहती है। देखो सुमेरु पर्वत ध्रौव्य की अपेक्षा हम उसे नित्य कहते हैं । ऐसे ही आत्मा आदि कथंचित् द्रव्यदृष्टि से नित्य है। इन्होंने विज्ञान आदि स्कंधों को सांसारिक दु:खरूप सिद्ध किया है, परन्तु विज्ञान कभी दु:ख नहीं होता कुज्ञान अवश्य दु:खरूप हैं। कोई विज्ञानाद्वैतवादी लोग सर्वथा ज्ञान मात्र ही जगत सिद्ध करते हैं , किन्तु प्रत्यक्ष में ज्ञान और जड़रूप दो तत्त्वगोचर हो रहे हैं। स्मृति आदि को प्रमाण माने बिना भी प्रात: घर से निकलकर वापस नहीं आना अशक्य होगा। हेतु के तीन रूप का भी पहले खण्डन किया गया है। इनके यहां शब्द का अन्यापोह अर्थ तो बहुत ही हास्यास्पद है।

विनाश को अहेतुक कहना भी प्रत्यक्ष बाधित है एवं वस्तु स्वलक्षण को इन्द्रिय प्रत्यक्ष ग्रहण नहीं कर सकता है । अत: इन्द्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय भी व्यंजन पर्याय ही हैं । सिर्फ दो प्रमाण से एवं आगम प्रमाण अप्रमाणिक होने से बौद्धों का क्षणिक सिद्धांत भी किस पर निर्भर रहेगा। अत: कथंचित् नित्य , कथंचित् अनित्य रूप अनेकान्त शासन ही जहशील होता है।

सांख्य मत

सांख्या निरीश्वरा: केचित् केचित् ईश्वरदेवता:।

सर्वेषामपि तेषां स्यात्तत्त्वानां पंचविंशति:।।(षड् द.पृ.१४५२)

कुछ सांख्य ईश्वर को नहीं मानकर केवल अध्यात्मवादी हैं। कुछ सांख्य ईश्वर को ही देवता मानते हैं । सभी सेश्वर तथा निरीश्वर सांख्य साधारण रूप पच्चीस तत्त्वों को स्वीकार करते हैं। सांख्य के मत में सत्त्व रज और तम ये तीन गुण हैं । प्रसाद, ताप तथा दीनता आदि कार्यों से क्रमश: उनका अनुमान होता है। एक दूसरे का उपकार करने वाले परस्पर सापेक्ष इन सत्त्वादि तीन गुणों से समस्त जगत् व्याप्त है। इन सत्त्वादि गुणों की समस्थिति ही प्रकृति कही जाती है। प्रकृति और आत्मा के संयोग से ही उत्पन्न होती है।

‘‘संक्षेपेण हि सांख्यशास्त्रस्य चतस्रो विद्या: संभाव्यंते। कश्चिदर्थ: प्रकृतिरेव कश्चिद् विकृतिरेव, कश्चित् विकृति: प्रकृतिश्च, कश्चिदनुभय इति’’ (सर्व द.पृ. २५६)

संक्षेप से सांख्यशास्त्र में पदार्थ के चार क्रम हैं । कोई पदार्थ केवल प्रकृति ही हैं , कोई केवल विकृति रूप हैं, कोई प्रकृति विकृति रूप एवं कोई प्रकृति विकृति से भिन्न अनुभय रूप है।

मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त।

षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरूष:।। (सांख्य का. ३)

अर्थ— इनमें प्रकृति किसी का विकार—कार्य नहीं है अत: मूल प्रकृति विकृति रहित है। महान् अहंकार और पांच तन्मात्रायें ये सात प्रकृति और विकृति दोनों रूप हैं —अर्थात् कारण—कार्य रूप हैं । षोडश गणमात्र विकृति रूप ही हैं क्योंकि वे कार्य हैं। पुरूष तो न किसी को उत्पन्न करता है, न किसी से उत्पन्न होता है अत: कारण कार्य रूप न होने से प्रकृति विकृति से रहित है।

सांख्य के २५ तत्त्व

प्रकृति से महान (बुद्धि) उत्पन्न होती है, बुद्धि से अहंकार, अहंकार से सोलहगण उत्पन्न होते हैं । षोडशगण— स्पर्शन, रसन , घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये पांच बुद्धीन्द्रियाँ, पायु, उपस्थ, वाणी, हस्त, पाद ये पांच कर्मेन्द्रिय तथा मन ये ग्यारह इन्द्रियां तथा रूप रस, गंध , स्पर्श और शब्द ये पांच तन्मात्रायें मिलकर सोलह गण कहलाते हैं। पांच तन्मात्राओं से पांच भूतों की उत्पत्ति होती है, यथा —रूप से अग्नि , रस से जल, गन्ध से पृथ्वी, शब्द से आकाश और स्पर्श से वायु उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार से सांख्य मत में प्रकृति आदि चौबीस तत्वरूप में परिणत होने वाला प्रधान तत्त्व है। स्वयं प्रकृति, महान् , अहंकार ये तीन , सोलह गण, और पांच भूत मिलकर चौबीस तत्त्व होते हैं। इनसे भिन्न पच्चीसवां पुरूषतत्व है जो अकर्ता , निर्गुण, भोक्ता, नित्य और चैतन्य स्वरूप है।

अमर्तश्चेतनो भोगी नित्य: सर्वगतोऽक्रिय: ।

अकर्ता निर्गुण: सूक्ष्म: आत्मा कापिलदर्शने।।

अर्थ—आत्मा अमूर्त, चेतना, भोक्ता, नित्य, सर्वगत, निष्क्रिय, अकर्ता, निर्गुण और सूक्ष्म है ऐसा सांख्यमत में कहा है। सांख्य के यहां मोक्ष— प्रकृति के वियोग का नाम मोक्ष है, वह प्रकृति तथा पुरूष में विज्ञान रूप तत्त्वज्ञान से होता है। सांख्यमत में प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम ये तीन प्रमाण हैं।

सांख्य के प्रमाण का लक्षण—

‘‘अर्थोपलब्धिहेतु: प्रामणं’’ अर्थोपलब्धि में जो साधकतम कारण है वह प्रमाण है। उसमें निर्विकल्प श्रोत्रादि इन्द्रियों की वृत्ति को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। पूर्ववत् , शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट के भेद से अनुमान के तीन भेद हैं। आप्त और वेदों के वचन आगम प्रमाण हैं इनके यहां ‘पतञ्जति’ सेश्वरसांख्य शास्त्र के प्रवर्तक माने गये हैं। इनके यहां छब्बीसवां तत्त्व ‘ईश्वर’ है। ‘‘प्रकृति इस संसार का आदि कारण है,यह एक नित्य तथा जड़ वस्तु है, सर्वदा परिवर्तनशील है। तत्त्व, रज, तभ ये प्रकृति के तीनगुण या उपादान हैं, सृष्टि के पहले ये तीन गुण साम्यावस्य में रहते हैं, ये संसार के विषय सुख, दु:ख या मोहजनक है, सुख दु:ख या विषाद होने के कारण हम इन तीन गुणों का अनुमान करते हैं........ पुरुष और प्रकृत्ति के संयोग से सृष्टि प्रारम्भ होता है। पुरूष न तो किसी का कारण है न कार्य है , वह निरपेक्ष तथा नित्य है।’’ (भारतीय द.पृ. २७) इनके यहां चित्त वृत्ति के निरोध को योग कहते हैं। सेश्वर सेश्वर सांख्य ने ईश्वर की सत्ता मानकर यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—योग से आठ अंगों का प्रतिपादन किया है। इनके यहां प्रधान के दो भेद हैं— अव्यक्त और व्यक्त अव्यक्त । प्रधान कारण है और व्यक्त प्रधान कार्य है । इनमें व्यक्त प्रधान हेतुमान् , अव्यापि, सक्रिय, अनेक , अश्रित, लिंग, साक्यव और परतन्त्र है। लेकिन श्रव्यक्त इनसे विपरीत अहेतुमान् एक इत्यादि रूप है। ये दोनों ही प्रधान त्रिगुणात्मक हैं— सत्त्व, रज, तम, रूप हैं। अविवेकी, विषय सामान्य, अचेतन और प्रसवधर्मी हैं। परन्तु पुरूष में त्रिगुण आदि नहीं है। प्रधान से उत्पन्न हुआ सारा जगत प्रधान रूप है। सांख्य किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति और नाश नहीं मानते हैं। किन्तु आविर्भाव और तिरोभाव मानते हैं , ये कूटस्थ, अपरिणामी नित्य एकांत को स्वीकार करते हैं। इनके यहां सत्कार्यवाद की मान्यता बड़ी ही विचित्र है । इसका कहना है कि कारण में कार्य सदैव विद्यमान रहता है कारणों से उत्पन्न नहीं होता है। कार्य कारणों से अभिव्यक्त—प्रगट होता है। मिट्टी में घट विद्यमान है कुंभार, दण्ड चक्र आदि निमित्तों से प्रगट हो गया है आदि। नित्र्यकांत की ये सब बातें प्रत्यक्षविरूद्ध है। सांख्यों के यहाँ ज्ञान पुरूष का गुण न होकर अचेतन प्रकृति का परिणाम है । मोक्ष में प्रकृति का संयोग समाप्त होते ही ज्ञान का भी अभाव हो जाता है । उपसंहार— सांख्य ने अचेतन को सृष्टि कत्र्री माना है यह सर्वथा असम्भव है। आत्मा को कूटस्थ नित्य मानने से उसमें रागादि पारिणाम न होने पर जड़कर्मों का बंध असम्भव है एवं ज्ञान और सुख आत्मा के स्वभाव हैं न कि जड़ प्रकृति के। इसलिये सांख्य के २५ तत्वों की मान्यता बिल्कुल असंगत है। आत्मा को निर्गण, निष्क्रिय, अकर्ता मानना नितांत भूल है। प्रकृति के अपराध के आत्मा संसार में दु:ख उठावे यह बात तो स्वयं उनके कूटस्थ नित्य मत का निराकरण कर लेती है। इनके द्वारा मान्य मोक्ष तत्व का भी कथन विरूद्ध है। क्योंकि ये ज्ञानमात्र से मोक्ष मानते हैं क्या आज तक कोई औषधि के जानने मात्र से स्वस्थ हुये हैं। इनका सत्कार्यवाद भी भी बड़ा विचित्र है मिट्टी में सदा घट को विद्यमान कहना और कुमार आदि से उसकी प्रकटता बिल्कुल गलत है। हां! शक्तिरूप से मिट्टी में घट को हम जैन भी मान लेते हैं। जैसे कि संसारी आत्मा में परमात्मा शक्ति रूप से है। इनके प्रमाण और प्रमेय दोनों की व्यवस्था भी अघटित है। ये सर्वथा नित्य एकांतवादी हैं यदि कथंचित् आत्मा को कर्ता, भोक्ता मान लें तो बहुत ही अच्छा हो जावे । तब तो स्याद्वाद शासन ही उन्हें श्रेयस्कार हो जावे। नैयायिक मत के प्रस्थापक गौतम मुनि है । इस न्याय दर्शन का दूसरा नाम अक्षपाद दर्शन है।

‘‘प्रमाणप्रमेयेत्यादितत्त्वज्ञानन्नि: श्रेयसाधिगम:’’ यह न्याय शास्त्र का प्रथम सूत्र है। प्रमाण प्रमेय इत्यादि तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

‘‘तच्चतुविधं प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दभेदात् । प्रमेयं द्वादशप्रकारं, आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिान: प्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदु:खापवर्गभेदात् ’’ । (सर्व दर्शन सं.पृ. २०१)

प्रमाण के चार भेद हैं— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम। प्रमेय के बारह भेद हैं— आत्मा, शरीर, इन्द्रिय,अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दु:ख और अपवर्ग। नैयायिक के मत में सोलह तत्त्व हैं— १. प्रमाण ,

२. प्रमेय,

३. संशय,

४. प्रयोजन,

५. दृष्टांत,

६. सिद्धांत,

७. अवयव,

८. तर्क,

९. निर्णय,

१०.वाद,

११. जल्प,

१२. वितण्डा,

१३. हेत्वाभास,

१४. छल,

१५. जाति,

१६. निग्रहस्थान। इन्हें पदार्थ भी कहते हैं। (षट्दर्शन पृ.८२) प्रमाण के १६ भेद, प्रमेय के १२ , संशय के ३, प्रयोजन के २, दृष्टान्त के २, सिद्धान्त के ४, अवयव के ५, तर्क के ११, निर्णय के ४, वाद का १, जल्प का १, वितण्डा का १, हेत्वाभास के , छल के ३, जाति के २४ , एवं निग्रह स्थान के २२ भेद हैं। इनके नाम और लक्षण सर्वदर्शन संग्रह और षड्दर्शन समुच्चय ग्रन्थों से देखना चाहिये। (सर्व द. पृ. २०१ से २०४)

अक्षपादमते देव: सृष्टिसंहारकृत् शिव: ।

विभुर्नित्यैकसर्वज्ञो नित्यबुद्धिसमाश्रय:।।१३।। (षड् द.पृ.७८)

नैयायिक मत में जगत् की सृष्टि तथा संहार को करने वाला,व्यापक, नित्य, एक सर्वज्ञ, नित्य ज्ञानशाली, शिव देवता हैं। अक्षपाद नाम के आदिगुरु ने नैयायिक मत के मूल सूत्रों की रचना की है इसलिये नैयायिक अक्षपाद कहलाते हैं। नैयायिक ने अनुमान के पांच अवयव माने हैं, प्रतिज्ञा, हेतु उदाहरण, उपनय और निगमन ।हेतु के पांच अवयव माने हैं —पक्षधर्मत्व आदि। अनुमान के तीन भेद माने हैं— केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी, अन्वयव्यतिरेकी। इनके यहां—‘‘ जिनके द्वारा प्रमिति— उपलब्धि या ज्ञान उत्पन्न किया जाता है उस ज्ञान के जनक कारण को ‘प्रमाण’ कहते हैं। एवं अक्षपाद ने स्वयं न्यायसूत्र में कहा है कि —‘‘ इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष से होने वाला अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी तथा व्यवसायात्मक ज्ञान ‘प्रत्यक्ष’ है।‘‘

वैशेषिक दर्शन

न्याय और वैशेषिक इन दोनों दर्शनों का ‘यौग’ नाम उल्लेख किया गया है। कुछ बातों को छोड़कर न्याय और वैशेषिक में समानता पाई जाती है। शिवादित्य (११ शताब्दी) के ‘सप्तपदार्थो’ में उक्त दोनों का समन्वय किया गया है। मालूम पड़ता है कि दोनों के योग—जोड़ी को ‘योग’ नाम दे दिया गया है। न्याय सूत्र के रचियत गौतम ऋषि हैं जैसा कि ऊपर कह आये हैं । वैशेषिक दर्शन के सूत्रकार महर्षि ‘कणाद’ हैं। विशेष नामक पदार्थ की विशिष्ट कल्पना से इस दर्शन का वैशेषिक दर्शन के सूत्रकार महर्षि ‘कणाद’ हैं। विशेष नामक पदार्थ की विशिष्ट कल्पना से इस दर्शन का वैशेषिक नाम हुआ है। ऐसा माना जाता है। वैशेषिक ने सात पदार्थ माने हैं— ‘‘ द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावा: सप्तपदार्था:’’ । द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष,समवाय और अभाव ये सात पदार्थ हैं। इनमें से द्रव्य के नव भेद हैं— पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन। गुण चौबीस हैं— रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिणाम, पृथक्क्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, और संस्कार। सामान्य के दो भेद हैं— परसामान्य,अपरसामान्य। विशेष केवल नित्य द्रव्यों में रहता है और बह अनंत है। पूर्वोक्त नव द्रव्य और परमाणु नित्य द्रव्य हैं। ‘समवायस्त्वेक एव’ समवाय एक ही है। अभाव के चार भेद हैं— प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव,और अत्यंताभाव । (तर्क सं.) आत्म द्रव्य का लक्षण और भेद— ‘ज्ञानाधिकरणमात्मा’ स द्विविध:— जीवात्मा परमात्मा चेति, तत्रेश्वर: सर्वज्ञ:, परमात्मा एक एव। जीवास्तु प्रतिशरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च । जिस द्रव्य में समवाय से ज्ञान रहता है वही आत्मा है क्योंकि आत्मा में ज्ञान समवाय सम्बन्ध से रहता है। आत्मा के दो भेद हैं— जीवात्मा,परमात्मा। परमात्मा ईश्वर, सर्वज्ञ और एक है। जीवात्मा प्रत्येक शरीर में भिन्न—भिन्न है, व्याप्क और नित्य है। (तर्वâ संग्रह) वैशेषिक के यहां द्रव्य गुण आदि परस्पर में भिन्न—भिन्न हैं। समवाय सम्बन्ध में रहते हैं। ये लोग शब्द को आकाश का गुण मानते हैं नैयायिक और वैशेषिक दोनों ही ईश्वर को सृष्टि का कर्ता मानते हैं— ‘पृथ्वी पर्वत आदि पदार्थ किसी बुद्धिमान् पुरुष के द्वारा उत्पन्न किये गये हैं, क्योंकि वे कार्य हैं।’ इस अनुमान के द्वारा ये लोग बुद्धिमान् ईश्वर को सृष्टिकर्ता सिद्ध करते हैं। इन्होंने कारण को तीन प्रकार से माना है— ‘कारणं त्रिविधं— समवाय्यसमवायिनिमित्तभेदात’ । कारण तीन प्रकार के हैं— समवायिकारण , असमवायिकारण, और निमित्तकारण। जिस द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से कार्य उत्पन्न हो वह समवायिकारण होता है। जैसे— तन्तुओं में पट समवायसम्बन्ध से उत्पन्न होता है अत: तंतु पट के समवायिकारण हैं। समवायिकारण द्रव्य ही होता है (जिसे जैन उपादान कारण कहते हैं)।तन्तु का संयोग पट का असमवायिकारण है। असमवायिकारण संयोग रूप गुण ही होता है। जो इन दोनों कारणों से भिन्न है वह निमित्तकारण है जैसे— तुरी, वेम, शलाका आदि वस्त्र के निमित्तकारण हैं। यहां ईश्वर भी पृथ्वी आदि सृष्टि को बनाने से निमित्तकारण है।

प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण

‘इंद्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षं तद् द्विविधं निर्विकल्पकं सविकल्पकं चेति’। जो ज्ञान इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष—सम्बन्ध से उत्पन्न होता है वह प्रत्यक्ष है उसके दो भेद हैं— नर्विकल्प और सविकल्प। सन्निकर्ष के ६ भेद

‘‘प्रत्यक्षज्ञानहेतुरिन्द्रियार्थसन्निकर्ष: षड्विध:— संयोग:, संयुक्तसमवाय:, संयुक्तसमवेतसमवाय:, समवाय:, समवेतसमवाय:, विशेषणविशेष्यभावश्चेति’’।

जो इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष सम्बन्ध है वही प्रत्यक्ष ज्ञान का कारण है उस सन्निकर्प के ६ भेद हैं— संयोग— नेत्र से जो घट पट आदि का प्रत्यक्ष होता है वह संयोग है। घट पट आदि के रूप का नेत्रों से ज्ञान है— वह ‘संयुक्तसमवाय’ है। घट के रूप में जो रूपत्व है उसका नत्रों से प्रत्यक्षज्ञान ‘संयुक्तसमवेतसमवाय’ है। कर्ण इंद्रिय से शब्द के प्रत्यक्ष में ‘समवाय’ सन्निकर्ष है। श्रोत्र से शब्दत्व का साक्षात्कार करने में ‘समवेतसमवाय’ सन्निकर्ष है। एवं अभाव को— घटाभाव, पटाभाव आदि को इन्द्रियों से प्रत्यक्ष करने में ‘विशेषण विशेष्सभाव’ सन्निकर्ष होता है। (तक संग्रह) वैशेषिक ने बुद्धि सुख दु:ख आदि आत्मा के नव विशेष गुणों के विनाश को मुक्ति माना है। एवं वैशेषिक, न्यायिकों ने ज्ञान को अस्वसंविदित माना है। एवं धारावाहिकज्ञान को भी प्रमाण माना है ।तथा पदार्थ और आलोक को ज्ञान का कारण माना है। समवाय की कल्पना तो इनके यहां बहुत ही विचित्र है।

‘‘य इहायुतसिद्धानामाधाराधेयभूतभावानाम् ।

संबंध इह प्रत्ययहेतु: स हि भवति समवाय:।।’’ (षड् द. पृ. ४२४)

अर्थ— अयुतसिद्ध और आधार आधेयभूत पदार्थों का ‘यह इसमें है’ इस इहेदं प्रत्यक्ष में कारणभूत सम्बन्ध समवाय कहलाता है। एवं प्रागभाव आदि अभावों को इन लोगों ने सर्वथा तुच्छाभाव रूप सिद्ध किया है। वैशेषिक ने नैयायिक के समान चार प्रमाण न मानकर प्रत्यक्ष और अनुमान ये दो ही प्रमाण माने हैं। ‘सर्वदर्शनसंग्रह’ में इस वैशेषिक दर्शन को ‘औलुक्य’ दर्शन कहा है। उपसंहार— नैयायिक और वैशेषिक का बहुत से विषयों में एक मत हैं पदार्थ गणना, प्रमाण संख्या आदि में ही अंतर है। दोनों ही ईश्वर को सृष्टि का कर्ता मानते हैं किन्तु आगे ईश्वर परीक्षा में इसका अच्छा समाधान किया जायेगा। वास्तव में कृतकृत्य ईश्वर विश्व की रचना में राग द्वेष के बिना कैसे प्रवृत्त होगा ? रागद्वेष सहित होने से सर्वज्ञ, हितोपदेशी और इष्टदेव कैसे कहलायेगा? अत: सर्वज्ञ सृष्टि के ज्ञाता द्रष्टा हैं कर्ता नहीं हैं । इनके द्वारा मान्य पदार्थ, द्रव्य, गुण आदि की व्यवस्था भी ठीक नहीं है।समवाय सम्बन्ध तो सिद्ध नहीं हो सकता, हां! यदि उसे तादात्म्य सम्बन्ध कह दो तब तो ठीक होगा। मुक्ति में सुख ज्ञान आदि गुणों का नाश मानना, ज्ञान को अपने संवेदन से रहित मानना, द्रव्य से गुणों को भिन्न मानकर समवाय से उसमें स्थापित करना सर्वथा अशक्य है। इनका सन्निकर्ष प्रमाण भी अव्याप्त है मन और चक्षु से पदार्थ को छूकर ज्ञान नहीं होता है, प्रत्युत दूर से ही हो जाता है। एवं सन्निकर्ष को प्रमाण मानने से सर्वज्ञ की सिद्धि होना शक्य नहीं है क्योंकि भूत , भविष्यत् पदार्थों का सन्निकर्ष होगा नहीं, और सन्निकर्ष से विश्व का ज्ञान हुये बिना सर्वज्ञ होगा नहीं। आत्मा को व्यापक कहना, दिशा और मन को द्रव्य कहना बिल्कुल गलत है आत्मा शरीर प्रमाण है, मन आत्मा में ज्ञानावरण की नोइन्द्रियावरण के क्षयोपशम से होता है। अत: सर्वज्ञ को वीतराग एवं निर्दोश मानना उचित है उनके तत्वों पर श्रद्ध करना ही सम्यक्त्व है।

मीमांसा दर्शन

मीमांसा शब्द का अर्थ है किसी वस्तु स्वरूप का यथार्थ विवेचन । मीमांसा करने वालों को मीमां—सक कहते हैं इसे ही जैमिनीय मत भी कहते हैं। मीमांसा के दो भेद हैं— कर्ममीमांसा, ज्ञानमीमांसा। यज्ञ—विधि कर्मकाण्ड अनुष्ठान आदि का वर्णन कर्ममीमांसा का विषय है, एवं जीव जगत् ईश्वर के स्वरूप सम्बन्ध आदि का निरुपण ज्ञानमीमांसा का विषय है। कर्ममीमांसा को पूर्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा को उत्तर मीमांसा या उत्तरमीमांसा को ‘वेदान्त’ शब्द से कहा जाता है। महर्षि जैमिनि मीमांसादर्शन से सूत्रकार हैं। मीमांसकों में कुमारिलभट्ट के शिष्य भाट्टों ने छह प्रमाण माने हैं एवं प्रभाकर मिश्र के शिष्य प्रभाकरों ने अभाव के बिना पांच प्रमाण माने है। इस प्रकार से मीमांसादर्शन में भाट्ट और प्राभाकार ये दो संप्रदाय हो जाते हैं । सूत्रकारों ने मीमांसक, प्राभाकर और जैमिनीय इन तीनों नामों से इस दर्शन का उल्लेख किया है। प्राभाकर की मान्यतानुसार पदार्थ आठ हैं— द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, परतन्त्रता, शक्ति,सादृश्य और संख्या। भाट्टों के अनुसार पदार्थ पांच हैं—द्रव्य , गुण, कर्म, सामान्य और अभाव। भाट्टों के अनुसार पदार्थ पांच हैं — द्रव्य, गुण, कर्म , सामान्य और अभाव। भाट्ट ग्यारह द्रव्य मानते हैं— वैशेषिक के नव द्रव्यों में अंधकार और शब्द ये दो द्रव्य मिलकर ग्यारह होते हैं। प्राभाकर—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम और अर्थापत्ति ये पांच प्रमाण मानते हैं एवं भाट्ट अभाव सहित छह प्रमाण मानते हैं। मीमांसकों ने ज्ञान को परोक्ष माना है। ज्ञान न तो स्वयं वेद्य है न ज्ञानान्तर से वेद्य है। अतएव वह परोक्ष है। मीमांसक कहते हैं कि कोई सर्वज्ञ या अतीन्द्रियदर्शी नहीं है।

‘‘जैमिनीया: पुन: प्राहु: सर्वज्ञादिविशेषण:।

देवो न विद्यते कोऽपि यस्य मानं बचो भवेत् ।।६८।।
तस्मादतीन्द्रियार्थानां साक्षाद् द्रष्टुरभावत:।
नित्येभ्यो वेदवाक्येभ्यो यथार्थत्वविनिश्चय: ।।६९।। (षट् द.पृ. ४३२)

जैमिनीय कहते हैं कि— सर्वज्ञत्व आदि विशेषण वाला कोई सर्वदर्शी देव नहीं है कि जिससे वचन प्रमाणीक माने जा सके। इस तरह जब अतीन्द्रिय पदार्थों का कोई साक्षात्कार करने वाला ही नहीं है तब नित्य वेद वाक्यों से ही अतीन्द्रिय पदार्थों का यथावत् ज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं। इनके यहाँ ‘नहीं जाने गये अनधिगत पदार्थ को जानने वाला ज्ञान प्रमाण है।’ ‘विद्यमान पदार्थों से इंद्रियों का सम्बन्ध होने पर जो आत्मा में बुद्धि उत्पन्न होती है वह प्रत्यक्ष, प्रमाण है।’ ‘लिंग से उत्पन्न होने वाले लैंगिक ज्ञान को अनुमान कहते हैं।’ नित्य वेद वाक्य से उत्पन्न होने वाला ज्ञान ‘आगम’ है। ‘सादृश्य ज्ञान को उपमान कहते हैं’ । ‘इष्ट पदार्थों की अनुपपत्ति के बल से किसी अदृष्ट अर्थ की कल्पना को अर्थापत्ति कहते हैं’। प्रत्यक्ष आदि छह प्रमाणों के निमित्तों से अर्थापत्ति के भी छह भेद हो जाते हैं— प्रत्यक्षपूर्विकाप्रर्थापत्ति, अनुमान—पूर्विका अर्थापत्ति, उपमानपूर्विका अर्थापत्ति, आगमपूर्विका अर्थापत्ति, अर्थापत्तिपूर्विका अर्थापत्ति, अभावपूर्विका अर्थापत्ति ।

अभाव प्रमाण का लक्षण—

‘‘ प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते।

वस्तुसत्ताबोधार्थ तत्रभावप्रमाणता’’।।७६

वस्तु के सत्ता के ग्राहक प्रत्यक्षादि पांच प्रमाण जिस वस्तु में प्रवृत्ति नहीं करते, उसमें अभाव प्रमाण की प्रवृत्ति होती है। 

प्रत्यक्ष आदि पांच प्रमाण जिस भूतल आदि आधार में घटादि रूप आधेय के ग्रहण करने के लिये प्रवृत्त नहीं होते, उस घटादि आधेय से शून्य शुद्ध भूतल के ग्रहण करने के लिये अभाव की प्रमाणता है। अभाव प्रमाण का विषय भूत अभाव पदार्थ वस्तुभूत है तथा वह चार प्रकार का है— प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव, अत्यन्ताभाव। (षड्दर्शन सं.)

मीमांसक वेद को अपौरूषेय मानते हैं। क्योंकि वेद मुख्य रूप से अतींद्रिय धर्म का प्रतिपादक है और अतींद्रिय दर्शी कोई पुरुष संभव नहीं है। इसलिये इन लोगों ने प्रत्यक्षादि पांच प्रमाणों के द्वारा सर्वज्ञ की असिद्धि बतलाकर अभाव प्रमाण के द्वारा उसके अभाव को सिद्ध कर दिया है। अत: इन मीमांसकों ने धर्म में वेद को ही प्रमाण माना है । एवं वेद के दोषों से मुक्त रखने के लिए ही अपौरुषेय माना है, और इसलिए उन्हें शब्द मात्र को नित्य मानना पड़ा, क्योंकि यदि शब्द को अनित्य मानते तो शब्दात्मक वेद को भी अनित्य और पौरूषेय मानकर शब्द को अनित्य मानते तो शब्दात्मक वेद को भी अनित्य और पौरूषेय मानना पड़ता जो कि अभीष्ट नहीं है।

उपसंहार— मीमांसक ने सर्वज्ञ का अभाव कर दिया है एवं वेद को अपौरूषेय मानकर शब्द को नित्य, एक, अमूर्त, सर्वव्यापी मानते हैं किन्तु अनुमान एवं आगम से सर्वज्ञ का स्वभाव सिद्ध है, शास्त्र कथंचिंत् अर्थ की अपेक्षा अनादि अनन्त है फिर भी रचना की अपेक्षा सादि साँत है। शब्द वर्गणायें पुद्गल द्रव्य की अपेक्षा नित्य—अनादि अनन्त होते हुये भी पर्याय की अपेक्षा अनित्य हैं, अनेक हैं मूर्तिक , अव्यापि हैं। इन मीमाँसकों द्वारा मान्य प्रमाणों के लक्षण, पदार्थों के लक्षण गलत हैं।कहीं अभाव को प्रमाण कहा जा सकता है? जैनों के मान्य प्रागभावों का लक्षण इनके द्वारा मान्य अभाव के लक्षणों को बाधित कर देता है। मीमांसकों के ज्ञान को परोक्ष कहा है, किन्तु ज्ञान स्वयं का अनुभव स्वयं कर रहा है। इसलिए ज्ञान स्वसंवेदन प्रत्यक्ष है। अत: मीमांसक दर्शन की मीमांसा करने से इनका प्रमाण प्रमेय तत्त्व बाधित हो जाने से जैनसिद्धांत ही अबाधित सिद्ध होता है।

वेदांत दर्शन

‘सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

आरामं तस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चन।।
(छांदोग्योपनिषत् ३—१४—१)

यह सारा जगत् एक ब्रह्म स्वरूप ही है, यहां अन्य कुछ भी नहीं है, सब उसके प्रभाव को देखते हैं, उसे कोई नहीं देख सकता। ‘‘ये तूत्तरमीमांसावादिन: ते वेदान्तिनो ब्रह्माद्वैतमेव मन्यंते ।’’ उत्तर मीमांसावादी वेदाँती मात्र अद्वैत ब्रह्म को मानते हैं, यह उनका मूल सिद्धान्त है कि ‘‘सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म’’ इत्यादि। इनके यहां ध्यान करने के लिये ‘‘आत्मा वा अरे द्रष्टय: श्रोत्वयो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य:’’ अरे भक्त ! तुम आत्मा को देखों, सुनो, मानो और ध्यान करो। (सर्वदर्शन. ११६) उनका यह कहना है कि एक ही ब्रह्म सभी प्राणियों के शरीर में भासमान होता है। यथा —‘‘ एक ही भ्रूतात्मा, सिद्ध, ब्रह्म प्रत्येक प्राणियों में व्यवस्थित है वही एक रूप से तथा अनेक रूप से जल में चन्द्रमा की तरह चमकता है’’। (षड् दर्शन. ४३०)

उपनिषदों के सिद्धान्तों पर प्रतिष्ठित होने के कारण इस दर्शन का नाम वेदान्त (वेद का अन्त उपनिषद्) प्रसिद्ध हुआ है। ब्रह्मसूत्र— वेदांत सूत्र के रचियता महर्षि वादरायण व्यास हैं। शंकर, रामानुज और मध्व ये ब्रह्म सूत्र के प्रसिद्ध भाष्यकार हैं। मीमांसकों की तरह वेदांती भी छह प्रमाण मानते है। इनके मतानुसार ‘ब्रह्म’ की सिद्धि करते हैं, उक्त श्रुति के समर्थन में ये लोग प्रत्यक्ष तथा अनुमान प्रमाण की दुहाई भी देते हैं। फिर इन प्रमाणों को भी अविद्या का विलास कह देते हैं। अत: उनका मान्य तत्त्व ही अविद्या का विलास प्रतीत होता है।

उपसंहार— यदि अद्वैततत्त्व को आगम से माना जाता है तो आगम और ब्रह्म दो होने से द्वैत आ जाता है, यदि प्रत्यक्ष से कहो तो बाधा आती हैं, क्योंकि एक को सुख अन्य को दु:ख आदि विचित्रतायें दृष्टिगोचर है, अनुभव गोचर हैं। यदि एक ही ब्रह्म सबमें है तो सभी को एक साथ सुख—दु:ख का अनुभव होना चाहिये, किन्तु ऐसा तो है नहीं। बड़े आश्चर्य की बात है कि चेतनस्वरूप ब्रह्म से चेतन अचेतन रूप जगत् मान लिया जावे। क्या आप स्वयं चेतन ब्रह्म अचेतन बनना अच्छा समझेगा? वास्तव में अस्तित्व रूप से सभी चेतन—अचेतन कथंचित् एक रूप है। इसी का विपर्यास करके वेदांतवादियों ने सारे जगत् को ब्रह्म रूप से एकरूप मान लिया है किन्तु यह मान्यता कथमपि शक्य नहीं है। किसी भी तरह से इस अद्वैत को सिद्ध करने में द्वैत आ ही जाता है। यदि सब द्वैत को अविद्या का विलास कहो, तब तो यह अद्वैत भी अविद्या का ही विलास सिद्ध होगा।

जैन दर्शन

यह जैन धर्म अनादि निधन धर्म है इसकी स्थापना किसी ने भी नहीं की है। स्याद्वाद, अहिंसा, अपरिग्रह, आदि इसके मौलिक सिद्धांत हैं। जैन सिद्धांत हैं। जैन सिद्धांत में— सात तत्त्व, नव पदार्थ, छह द्रव्य और पांच अस्तिकाय माने गये हैं । ‘जीवाजीवास्रववंधसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्’ इस सूत्र से जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व हैं। इन्हीं में पुण्य और पाप मिलाने से नव पदार्थ बन जाते हैं । जीव, पुद्गल , धर्म, अधर्म आकाश और काल ये छह द्रव्य हैं। इनमें काल को छोड़कर पांच अस्तिकाय कहलाते हैं। ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:’ इस सूत्र से सम्यग्दर्शन , सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की एकता ही मोक्ष की प्राप्ति का उपाय है। एवं संपूर्ण कर्मों से आत्मा का छूट जाना ही मोक्ष है। सर्वज्ञ प्रणीत आगम ही सच्चे शास्त्र हैं, एवं घातिया कर्म मल से रहित शुद्ध हुई आत्मा ही अर्हत् सर्वज्ञ वीतराग और हितोपदेश है। उन सर्वज्ञ के वचनों पर पूर्ण श्रद्धान करना ही सम्यक्तव है।

‘छप्पंचणवविहाणं अत्थाणं जिणवरोवइट्ठाणं।

आणाए अहिगमेण य सद्दहणं होइ सम्मत्तं ।।५६।। (गोम्मटसार जी.)

छह द्रव्य, पांच अस्तिकाय और नव पदार्थ इनका जिनेंद्रदेव ने जिस प्रकार वर्णन किया है, उस ही प्रकार से श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। यह दो प्रकार से होता है— एक तो केवल आज्ञा से, दूसरा अधिगम से । जिनेन्द्र देव ने जो भी वस्तु तत्त्व का वर्णन किया है वह ठीक है क्योंकि ‘जिनदेव असत्यवादी नहीं हो सकते’ ऐसा केवल आज्ञा मात्र से श्रद्धान करना आज्ञा सम्यक्त्व है। तथा इन द्रव्यादिकों का प्रत्यक्ष, परोक्ष प्रमाण, नय आदि से निर्णय करके श्रद्धान करना अधिगम सम्यक्तव है। सम्यक्त्व होने के बाद जो यथार्थ ज्ञान है वह सम्यग्ज्ञान है उसके भी प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोगवे भेद से चार भेद हो जाते हैं।

सम्यग्दर्शन और ज्ञान के बाद रागद्वेष को दूर करने के लिये जो चारित्र ग्रहण किया जाता है वह सम्यक्चारित्र है। इसके पंचमहाव्रत आदि रूप से सफल चारित्र और पंच अणुव्रत आदि रूप से विकल चारित्र ऐसे दो भेद होते हैं। इन जैन सिद्धांत में सप्तभंगी, नय पद्धति आदि विशेष बातें बहुत ही उत्तम हैं वस्तु तत्त्व को ज्यों की त्यों समझाने वाली हैं। द्रव्यार्थिक नय से आत्मा आदि पदार्थ नित्य हैं किन्तु पर्यायार्थिक नय से ये अनित्य भी हैं। इत्यादि रूप से वस्तु की व्यवस्था सुघटित सिद्ध है। यह अनेकांत शासन, आत्मा, सर्वज्ञ, परलोक, मोक्ष आदि की व्यवस्था करते हुये सदा जय शील हो रहा है।

सभी दार्शनिकों के मुख्य—मुख्य सिद्धांत

चार्वाक— भूतचैतन्यवाद , प्रत्यक्षैक—प्रमाणवाद।

बौद्ध— निर्विकल्पप्रत्यक्षवाद, साकारज्ञानवाद, क्षणभंगवाद, चित्राद्वैतवाद, विज्ञानाद्वैतवाद, शून्यवाद, त्रैरूप्यहेतुवाद, अपोहवाद। सांख्य— प्रकृतिकर्तृत्ववाद, अचेतनज्ञानवाद, इंद्रियवृत्तिवाद, सत्कार्यवाद, नित्यैेकांतवाद। नैयायिक वैशेषिक— षोड़शपदार्थवाद, सप्तपदार्थवाद, सन्निकर्षवाद, कारकसाकल्यवाद, ज्ञानान्तरवेद्यज्ञानवाद, ईश्वरकर्तृत्ववाद, पांचरूप्यहेतुवाद, समवायवाद। मीमांसक— वेद अपौरकर्तृत्ववाद, परोक्षज्ञानवाद, अभावप्रमाणवाद, शब्दनित्यत्ववाद। वैयाकरण— शब्दाद्वैतवाद, स्फोटवाद। वेदांती— ब्रह्मवाद, अविद्यावाद।

इन सबके प्रमुख गुरू एवं मतों के नाम १.चार्वाक को लौकायतिक भी कहते हैं इनके गुरू वृहस्पति हैं। २.नैयायिक— न्याय दर्शन के प्रवर्तक महर्षि गौतम हैं। इन्हीं का नाम अक्षपाद भी है अत: इसे अक्षपाद दर्शन भी कहते हैं, इनका मूलग्रन्थ ‘न्यायसूत्र’ है। नयाय भाष्य के अनेकों ग्रन्थ हैं। जैसे— वात्स्यायन का ‘न्यायभाष्य’ उद्योतकर का ‘न्यायवार्तिक’ वाचस्पति की ‘न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका,’ उदयन की ‘न्याय वार्तिक तात्पर्य परिशुद्धि’ तथा ‘कुसुमाञ्जलि’ जयन्त की ‘न्याय मंजरी’ आदि । ऐसे ही श्रीकण्ड अभय तिलकोपाध्याय विरचित न्यायालंकार वृत्ति आदि प्रमुख तर्क ग्रन्थ हैं। भासर्वज्ञ कृत न्यायसार की अठारह टीकायें हैं। इनमें न्यायभूषण नाम की टीका सर्वप्रमुख है। प्राचीना समय के न्याय को ‘प्राचीनन्याय’ एवं आधुनिक काल के न्याय को ‘नव्यन्याय’ कहते हैं। प्राचीन न्याय के अंतर्गत ‘गौतम’ का न्यायसूत्र, उसके भाष्य आदि है। नव्यन्याय का प्रारंभ गंगेश की ‘तत्त्वचिंतामणि’ से हुआ है, इसे ‘न्यायदर्शन’ या शैव दर्शन भी कहते हैं एवं ‘योग’ भी कहते हैं।

३— वैशेषिक—

वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक ‘महर्षिकणाद’ हैं। कहा जाता हैं। कहा जाता है कि ये इतने बड़े संतोषी थे कि खेतों से चुने हुये अन्नकणों के सहारे ही जीवन यापन करते थे। इसलिये इनका उपमान ‘कणाद’ पड़ा है। उनका वास्तविक नाम ‘उलूक’ था अतएव वैशेषिक दर्शन कणाद या ‘औलूक्य’ दर्शन नाम से प्रसिद्ध है। इस दर्शन में ‘विशेष’ नामक पदार्थ की विशद विवेचना है अत: इसे ‘वैशेषिक’ भी कहते हैं। अन्यत्र भी यही बाता है।

‘‘मुनिविशेषस्य कापोतीं वृत्तिमनुतिष्ठवतो रथ्यानिपतांस्तंडुलानादायादाय कृताहारस्याहार नि—मित्तात्कणादसंज्ञा अजनि। तस्य कणादस्य पुर: शिवेनोलूकरुपेण मतमेतत्प्रकाशितम् ‘तत औलूक्यं प्रोच्यते। पशुपतिभक्तत्वेन पाशुपतं चोच्यते’’।

कापोत सदृशवृत्ति का अनुसरण करने वाले मार्ग में पतित तंदुल कणों को खाने वाले होने से इन्हें कणाद संज्ञा हुई, इनके आगे शिव ने उल्लू का शरीर धारण करके इस मत को चलाया अत: ‘औलूक्य’ हैं। वैशेषिक लोग पशुपति—शिव के भक्त हैं अत: यह दर्शन ‘पाशुपात’ भी कहलाता है। वैशेषिक कणाद के शिष्य हैं अत: काणाद भी कहलाते हैं। (षड्द. ४०६)

इनके यहां कणाद कृत मूलग्रन्थ ‘षट्पदार्थी—वैशेषिक सूत्र’ नाम ये है। इस पर प्रशस्त का ‘पदार्थ धर्म संग्रह’ है, इस प्रशस्तपाद भाष्य—पदार्थ धर्मसंग्रह पर दो उत्तम टीकायें हैं, उदयन आचार्य की किरणावली, और श्रीधराचार्य की ‘न्यायकंदली’। इसके बाद का जो वैशेषिक साहित्य है वह न्याय और वैशेषिक इन दोनों का संमिश्रण है। ऐसे ग्रन्थों में शिवादित्य की ‘सप्तपदार्थी’ लौगाक्षि भास्कर की ‘तर्ककौमुदी’ वल्लभाचार्य की ‘न्यायलीलावती’ और विश्वनाथ पंचानन का भाषा परिच्छेद (सिद्धांत मुक्तावली टीका के साथ) प्रमुख है। (भारतीयद. पृ. १४६)

व्योमशिवाचार्य कृत व्योमवती टीका, श्रीवत्साचार्यकृत लीलावती तर्क, आत्रेयतन्त्र आदि।

४—मीमांसक—

मीमांसक का मूल ग्रन्थ है ‘जैमिनिसूत्र’ इस जैमिनि के सूत्र पर शबरस्वामी का विशद भाष्य है जिसे ‘शाबरभाष्य’ कहते हैं। उनके बाद बहुत से टीकाकार और स्वतंत्र ग्रन्थकार हुये, उनमें दो मुख्य हैं— कुमारिल भट्ट और प्रभाकर। इन दोनों के नाम पर मीमांसा में दो प्रधान संप्रदाय चल पड़े जिनका नाम है—भाट्ट मीमांसा और प्रभाकर मीमांसा। (भारतीयद.पृ. १९९)

मीमांसा दर्शन के दो भेद हैं— पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा। पूर्व मीमांसावादी यजन—याजन, अध्ययन—अध्यापन, दान और प्रतिग्रह इन छह ब्राह्मण कर्मों का अनुष्ठान करने वाले हैं ब्रह्म सूत्रधारी हैं, यज्ञादि क्रिया काण्ड में मुख्य रूप से प्रवृत्ति करते हैं। इनके साधु एक दण्डी, त्रिदण्डी, गेरुआ वस्त्रधारी मृगछाला, कमंडलु आदि रखते हैं, सिर मुंडाते हैं। इनका वेद ही गुरु और भगवान् है ये लोग वेद के सिवा किसी को सर्वज्ञ मानने को तैयार नहीं है। इनमें कुमारिल का मीमांसाश्लोकवार्तिक, प्रभाकर का ‘बृहती’ आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं।

५—उत्तर मीमांसकवादी वेदांती—

कहलाते हैं ये केवल अद्वैत ब्रह्म को ही मानते हैं। इनके साधु कुटीचर, बहूदक, हंस, परमहंस ऐसे चार तरह के होते हैं । जो त्रिदण्डधारी, शिखाधारी ब्रह्म सूत्रधारी हैं यजमानों के यहां भोजन करते हैं गृह त्यागी हैं कुटिया बनाकर जंगल में रहते हैं, वे ‘कुटीचर’ कहते हैं। बहुत जल वाली नदी में स्नान करने से बहूदक होते हैं । ‘हंस’ कहलाते हैं।

इन हंस साधु को तत्त्वज्ञान होने के बाद ‘परमहंस‘ कहते हैं। इसे ही वेदांत दर्शन कहते हैं। वेदांत का अर्थ है वेद का अंत। उपनिषदों को भिन्न—भिन्न अर्थों में वेद का अंत कहा जाता है। वैदिक काल में तीन तरह के साहित्य होते हैं। सबसे प्रथम वैदिक मंत्र जो भिन्न—भिन्न संहिताओं ऋग्वेद यजुर्वेद, सामवेद में संकलित हैं।

तत: पर ब्राह्मण भाग जिसमें वैदिक कर्मकाण्ड की विवेचना है, अंत में उपनिषद जिसमें दर्शनिक तथ्यों की आलोचना है। ये तीनों मिलकर श्रुति या वेद कहलाते हैं। अध्ययन के विचार में उपनिषदों की बारी अंत में आती थी। लोग संहिता से शुरु करते थे। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर गृहस्थोचित यज्ञादि कर्म करने से ब्राह्म, वानप्रस्थ या सन्यास लेकर वन में रहने पर आरण्यक नाम होता है।

उपनिषदों का विकास आरण्यक साहित्य से हुआ है। स्वयं उपनिषदों में कहा है कि वेद—वेदांग सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लेने पर जब तक ज्ञान पूर्ण न हो जावे तब तक मनुष्य उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता, उपनिषद् (उप + नि + सद ) जो ईश्वर के समीप या गुरु के समीप पहुंचावे वह उपनिषद् है। भिन्न—भिन्न उपनिषदों के विचार भेद का परिहार करने के लिये वादरायण ने ‘ब्रह्मसूत्र’ ग्रन्थ की रचना की। इसे वेदांत सूत्र, शारीरिकमीमांसा या उत्तरमीमरंसा भी कहते हैं। ब्रह्मसूत्र पर अनेकों भाष्य हैं, शंकर, रामानुज , मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, निंबार्काचार्य, आदि के भाष्यों से उनके नाम पर भिन्न भिन्न— संप्रदाय चल पड़े हैं। आजकल शंकराचार्य का ‘अद्वैतवाद’ औश्र रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद अधिक प्रसिद्ध है।

६. सांख्य—

कुछ सांख्य ईश्वर मानते हैं कुछ निरीश्वरवादी हैं, जो निरीश्वर हैं उनके नारायण ही देवता हैं। इनके आचार्य विष्णु ,प्रतिष्ठाकारक चैतन्य आदि शब्दों से कहे जाते हैं। सांख्य दर्शन के रचियता महर्षि कपिल हैं। सांख्य अत्यन्त प्राचीन मत है इसमें पच्चीस तत्त्वों की संख्या होने से इसे सांख्य मत कहते हैं। सांख्य दर्शन का मूल ग्रन्थ है कपिल का ‘तत्त्वसमास’। इसमें निरीश्वर सांख्य का दर्शन है। योगदर्शन में ईश्वर का प्रतिपादन किया गया है अत: इसे ‘सेश्वर सांख्य’ कहते हैं। इस सेश्वर सांख्य मत के प्रवर्तक पतञ्जलि ऋषि है अत: इसे ‘पातञ्जल दर्शन’ भी कहते हैं। कपिल, आसुरि, पंचशिख, भार्गव तथा उलूक आदि सांख्य मत के प्रमुख प्रवक्ता हैं। इसलिए इसे सांख्य या कपिलमत भी कहते हैं। कपिल को परमर्षि कहने से इस मत को ‘पारमर्ष’ भी कहते हैं । सांख्यों का प्राचीन ग्रन्थ है ईश्वर कृष्ण की ‘सांख्यकारिका’ गौडपाद का ‘सांख्यकारिकाभाष्य’ वाचस्पति की ‘तर्क कौमुदी’ विज्ञान भिक्षु का ‘सांख्य प्रवचन भाष्य’और सांख्यसार आदि ग्रन्थ हैं। एवं इनके षष्टितंत्र का पुन: संस्कार रूप ‘माठर भाष्य’ सांख्यसप्तति, तत्त्व कौमुदी, आत्रेयतंत्र आदि हैं।

७. बौद्ध—

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध हैं। इन्हें सुगत भी कहते हैं अत: इनके अनुयायी बौद्ध या सौगत कहलाते हैं, इनमें चार भेद हैं —सौत्रांतिक, वैभाषिक, योगाचार और माध्यमिक। बौद्धों के ज्ञान पारमिता आदि दश ग्रन्थ हैं— तर्कभाषा, हेतुबिन्दु, अर्चटकृत, हेतुविंदु की अर्चट तर्क नाम की टीका , प्रमाणवार्तिक, तत्त्वसंग्रह, न्यायबिंदु, कमलशीलकृत तत्त्वसंग्रह पंजिका, न्यायप्रवेश आदि ग्रंथ हैं। महात्मा बुद्ध के उपदेश के तीन पिटक इनके यहां माने गये हैं उनमें—विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्म पिटक ये नाम हैं। इन पिटकों में केवल प्राचीन बौद्ध धर्म का वर्णन मिलता है। धर्मकीर्ति का ‘प्रमाणवार्तिक’ उसकी टीका में प्रभाकर गुप्त का ‘प्रमाणवार्तिकांलकार है। शांतरक्षित का ’तत्त्वसंग्रह’ दिग्नाग का ‘न्यायप्रवेश’ धर्मकीर्ति का ‘न्यायबिंदु’आदि। षड्दर्शन समुच्चय में बौद्ध , नैयायिक, सांख्य, जैन, वैशेषिक और जैमिनीय इनको ‘षड्दर्शन’ कहा है। आगे चलकर नैयायिक और वैशेषिक दर्शनों को दो न कहकर एक कहने से आस्तिकवादी के पांच ही दर्शन कह देते हैं एवं उसमें नास्तिक चार्वाक की संख्या मिलाकर ‘षड्दर्शन’ कहते हैं। इस षड्दर्शन में मीमांसक और वेदांती को भी एक ही में लिया है।

८. जैनधर्म में किसी को इस जैनधर्म का प्रवर्तक नहीं माना गया है क्योंकि यह जैनधर्म अनादिनिधन धर्म है। अनादि काल से जीव कर्मों का नाशकर सर्वज्ञ होते रहे हैं और वर्तमान से लेकर अनंतानन्त काल तक सर्वज्ञ होते रहेंगे। जैन दर्शन में संसार पूर्वक—बंधपूर्वक ही मोक्ष माना गया है। अत: संसारी जीव ही आत्मा की सर्वोच्च विशुद्धि प्राप्त करके भगवान बन जाते हैं, ‘कर्मारातीन् जयतीति जिन: जिनो देवता अस्य स जैन:’ जो कर्म शत्रुओं को जीतते हैं वे जिन कहलाते हैं एवं ‘जिन’ देवता जिसके उपास्क हैं वे जैन कहलाते हैं, यह धर्म ‘अहिंसामय’ है अत: ‘‘सर्वेभ्यो हित: सार्व:’’ प्राणिमात्र का हितकारी होने से ‘सार्वधर्म’ कहलाता है। जिन भगवान के ही सार्व, सर्वज्ञ , अर्हंत, जिनेन्द्र, शिव, परमेश्वर, महेश्वर, महादेव आदि सार्थक नाम हैं। जैनधर्म में मनुष्य रत्नत्रयरूप उपाय तत्त्व से मोक्षरूप उपेयतत्त्व को प्राप्त कर लेता है जैन धर्म में — सभी वस्तुयें द्रव्यदृष्टि से नित्य हैं एवं पर्याय दृष्टि से अनित्य हैं, सत् रूप— महासत्ता से एक एवं पृथक्—पृथक् अवांतरसत्ता से अनेक हैं किन्तु इस मर्म—स्याद्वाद को न समझकर बौद्धों ने वस्तु को सर्वथा क्षणिक कह दिया है। सांख्य ने ही सर्वथा नित्य कह दिया है। वेदांती ने एक ब्रह्मरूप एवं अन्यों ने अनेक रूप कह दिया है। ऐसे ही कर्मों की विचित्रता से संसार का वैचित्र्य देखकर वैशेषिकों ने ईश्वर को सृष्टि का कर्ता कह दिया है, किन्तु जैनाचार्यों ने सृष्टि को अनादि निधन एवं जीव पुद्गल संयोग से उत्पन्न हुई सिद्ध किया है। मीमांसक ने वेद को अनादि कह दिया है किन्तु वास्तव में अर्थ की अपेक्षा आगम अनादि है एवं सर्वज्ञ की वाणी द्वारा गणधर ग्रथित होने से परम्परा कृत आचार्य प्रणीत होने से सादि भी हैं। अनेकांत शासन में कुछ भी दोष नहीं है। इसलिए इन अन्य मतावलंबियों के ग्रंथों का पठन, मनन, कुश्रुत का पठन मनन है, इससे मिथ्यात्व का आश्रव होता है, ऐसा समझना चाहिय। जैनाचार्यों ने इन ग्रन्थों का अवलोकन केवल उनके तत्त्वों की मान्यताओं का खण्डन करने के लिये ही किया है। जब बौद्ध परंपरा में दिङ्नाग के पश्चात धर्मकीर्ति जैसे प्रखरतार्विकों की तूती बोलती थी, तो ब्राह्मण परम्परा में कुमारिल जैसे उद्भट् विद्वानों की प्रतिध्वनि मंद नहीं हुई थी दोनों ही विद्वानों ने अपनी—अपनी कृतियों में जैप परम्परा के मंतव्यों की खिल्ली उड़ाई थी और समंतभद्र जैसे तार्विकों का खण्डन किया था । उस समय अकलंक देव ने आजीवन ब्रह्मचर्यव्रत लेकर बौद्धदर्शन आदि पढ़ने का संकल्प किया , उस समय श्री अकलंक देव ने न्याय प्रमाण विषयक अनेकों ग्रन्थ रचे, लघीयस्त्रयी, न्याय विनिश्चय, सिद्धि विनिश्चय, अष्टशती, प्रमाणसंग्रह आदि ग्रन्थों में दिङ्नाग, धर्मकीर्ति जैसे बौद्ध तार्विâकों की एवं उद्योतकर भर्तृहरि कुमारिल जैसे ब्राह्मण तार्विकों की उक्तियों का निरसन करते हुये जैन मन्तव्यों की स्थापना तार्विक शैली से की है। इन अकलंक देव से पूर्व श्री समंतभद्र स्वामी ने भगवान की स्तुति करते हुये न्याय का बहुत ही सुन्दर विषेचन किया है। श्री उमास्वामी आचार्य के महाशास्त्र तत्त्वार्थ सूत्र के मंगलाचरण पर आप्तमीमांसा स्तुति बनाकर तो एक अलौकिक प्रतिभाशाली कहलाये हैं। श्री विद्यानंद महोदय ने आप्तपरीक्षा, प्रमाणपरीक्षा एवं अष्टसहस्री, श्लोक वार्तिकालंकार टीका आदि ग्रंथों में न्याय का विशद वर्णन किया है। श्री माणिक्यनन्दि के परीक्षामुखसूत्र ग्रन्थ पर प्रमेयरत्नमाला, प्रमेयकमलमार्तण्ड आदि विस्तृत टीकायें हुई हैं। जैन न्याय का मतलब यही है कि ‘प्रमाणेरर्थपरीक्षणां न्याय:’ प्रमाणों के द्वारा अर्थ किया है ‘नीयतें ज्ञायते विवक्षितार्थोऽनेनेति न्याय: न्यायकु.। ‘नितरामीयंते गम्यंते गत्यर्थानां ज्ञानार्थत्वात् ज्ञायंतेऽर्था: अनित्यत्वादयोऽनेनेति न्याय: तर्कमार्ग: (न्याय प्रवेश पं.पृ. १)’

जिसके द्वारा विवक्षित अर्थ का ज्ञान हो उसे न्याय कहते हैं। अतिशयरूप से जिसके द्वारा अनित्यत्व, अस्तित्व आदि अर्थ जाने जाये वह न्याय—तर्क मार्ग हैं। न्यायविनिश्चयालंकार में जैनाचार्यों ने भी विशेष रूप से कहा है कि—

‘निश्चितं च निर्बाधं च वस्तुतत्त्वमीयतेऽनेनेति न्याय:’(न्याय विनिश्चयालंकार भा. १पृ. ३३ )

जिसके द्वारा निश्चित और निर्बाध वस्तु तत्त्व का ज्ञान होता है उसे न्याय कहते हैं। इसमें ‘निर्बाध’ पद जैन न्याय की निर्दोषता को प्रकट करता है। ऐसा ज्ञान प्रमाणों के द्वारा होता है इसी से न्याय विषयक ग्रन्थों का मुख्य विषय प्रमाण होता है। प्रमाण के ही भेद प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि माने गये हैं, किन्तु प्रत्यक्ष और आगम के द्वारा वस्तु तत्त्व को जानकर भी उसकी स्थापना और परीक्षा में हेतु और युक्तिवाद का अवलम्बन लेना पड़ता है। इसी से न्याय को तर्कमार्ग और युक्तिशास्त्र भी कहा है।जैनधर्म के बारहवें दृष्टिवाद अंग में ३६३ मिथ्यामतों का स्थापनापूर्वक खंडन किया गया है। न्यायविनिश्चय के प्रारम्भ में श्री अकलंक देव ने लिखा है।—

बालानां हितकामिनामतिमहापापै: पुरोपार्जिते:।

माहात्म्यात् तमस:स्वयं कलिबलात् प्रायो गुणद्वेषिभि:।।
न्यायोऽयं मलिनीकृत: कथमपि प्रक्षाल्य नेनीयते।
सम्यग्ज्ञानजलैर्वचोभिरमलं तत्रानुकंपापरै: ।।

कल्याण के इच्छुक अज्ञजनों के पूर्वोपार्जित पाप के उदय से एवं स्वयं कलिकाल के प्रभाव से गुण द्वेषी एकांतवादियों ने न्यायशास्त्र को मलिन कर दिया है। करुणाबुद्धि से प्रेरित हो करके हम उस मलिन किये गये न्यायशास्त्र को सम्यग्ज्ञान रूपी जल से किसी तरह प्रक्षालित करके निर्मल करते हैं। इसी भावना से ही श्री अकलंक देव ने छ: महीन तक बौद्धों की अधिष्ठात्री तारादेवी से शास्त्रार्थ करके उसे पराजित करके जैनधर्म के स्याद्वाद की विजय पताका लहराई थी। और आज भी वीरप्रभु का अनेकांत शासन जयशील हो रहा है। तीर्थंकर श्री वृषभदेव या महावीर प्रभु ने इस जैनधर्म की स्थापना नहीं की है।

प्रत्युत सभी तीर्थंकर धर्मतीर्थ के प्रकाशक , उपदर्शक मात्र होते हैं, स्याद्वादमय धर्म तो वस्तु का स्वरूप होने से किसी के द्वारा प्रस्थापित नहीं है। जैनधर्म में वर्तमान दो भेद दिख रहे हैं दिगम्बर और श्वेताम्बर। श्वेताम्बर संप्रदाय में स्त्रीमुक्ति केवली कवलाहार सवस्त्रामुक्ति आदि माने गये हैं, किन्तु दिगम्बर सम्प्रदाय में स्त्रियों को उसी भाव से मुक्ति का निषेध , केवली के कलवाहार का निषेध एवं सवस्त्रमुक्ति का निषेध किया गया है। जैनधर्म के मर्म को समझने के लिये महापुराण, पद्मपुराण, भद्रबाहुचारित्र आदि प्रथमानुयोग, तत्त्वार्थ सूत्र , गोम्मटसार, त्रिलोकसार, षट्खंडागम आदि करणानुयोग, रत्नकरण्डश्रावकाचार, वसुनंदिश्रावकाचार, पुरुषार्थसिद्ध् युपाय, मूलाचार, आचारसार आदि चरणानुयोग, एवं समाधितन्त्र, पंचास्तिकाय, परमात्मप्रकाश, समयसार आदि द्रव्यानुयोग ऐसे चारों अनुयोगों के ग्रन्थों का गुरुमुख से पठन, स्वाध्याय करना चाहिये। इस प्रकार से सर्वदर्शन के सिद्धान्त की संक्षिप्त समीक्षा की गई है।

ईश्वर सृष्टि कर्तृव्य खंण्डन

वैशेषिक कहते हैं कि —‘सदाशिव’ नाम का एक महेश्वर है जो सदा ही मुक्त है, कभी भी कर्ममल से लिप्त नहीं था अनादिकाल से ही मुक्त है और सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता है यथा—

‘‘तनुभुवनकरणादिकं विवादापन्नं बुद्धिमन्निमित्तकम् कार्यत्वात् । यत्कार्य तद् बुद्धिन्निमित्तकं दृष्टं यथा वस्त्रादि। कार्यचेदं प्रकृतं तस्माद् बुद्धिमन्निमित्तकं योऽसौ बुद्धिमास्तद्धेतु: स ईश्वर: इति।’’

‘‘शरीर जगत् इन्द्रिय आदि विवाद की कोटि में आये हुये पदार्थ बुद्धिमान् निमित्त कारण से हुये हैं, क्योंकि वे कार्य हैं। जो कार्य होता है वह बुद्धिमान् निमित्त कारण से ही होता है, जैसे वस्त्रादि। और कार्य प्रकृत शरीर आदि हैं इसलिए यह सिद्ध होता है कि अनादि सिद्ध ईश्वर ही सम्पूर्ण विश्व का बनाने वाला है।

जैनाचार्यों का कहना है कि ‘‘तनुभुवनकरणादयो न बुद्धिमन्निमित्तका: दृष्टकर्तृकप्रासादादि विलक्षणत्वात आकाशादिवत् ।’’ ‘शरीर जगत् और इन्द्रिय आदि बुद्धिमान् कारण जन्य नहीं हैं, क्योंकि जिन मकानादि के कर्ता देखे जाते हैं उसने भिन्न हैं । जैसे आकाशादि।’ दूसरी बात यह है कि वह ईश्वर सृष्टिकर्ता शरीर सहित है या रहित ? यदि रहित कहो तो अन्य मुक्त जीवों के समान वह भी सृष्टि नहीं बना सकता। यह शरीर सहित कहो, तो वह कर्मसहित होने से अज्ञानी संसारी प्राणी के समान सृष्टि नहीं कर सकेगा। इन वैशेषिकों ने एक सदाशिव ईश्वर को सृष्टिकर्ता माना है, उसमें ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न ऐसी तीन शक्तियां मानी है। पुन: प्रश्न यह भी होता है कि कर्म के बिना इच्छा शक्ति कैसे होगी ? यदि ज्ञान शक्ति से ही सम्पूर्ण कार्य करना मानो, तो भी असंभव है। यदि वैशेषिक कहे कि—

समीहामंतरेणपि यथा वक्ति जिनेश्वर:।

तथेश्वरोऽपि कार्याणि कुर्यादित्यप्यपेशलम् ।।१४।।
सति धर्मविशेषे हि तीर्थंकृत्त्वसमाहये।
ब्रूयाज्जिनेश्वरो मार्गं न ज्ञानादेव केवलात् ।।१५।।
सिद्धस्यापास्तनि:शेष—कर्मणो वागसंभवात् ।
बिना तीर्थकरत्वेन नाम्ना नार्थोपशदेशना।।१६।।

जिस प्रकार से आप जैनों का जिनेश्वर बिना इच्छा के मोक्ष मार्ग का उपदेश देता है, वैसे ही हमारा महेश्वर बिना इच्छा के सृष्टि बनावे क्या बाधा है ? आचार्य ने कहा कि भाई! हमारे जिनेश्वर की तीथ्ांकर नामा नाम कर्म विशेष से उपदेश में प्रवृत्ति होती है और वे तीर्थंकर तो कर्म सहित हैं शरीरसहित हैं। हां! मोहकर्म के नष्ट हो जाने से इच्छा रहित अवश्य हैं। पूर्णकर्म रहित सिद्धों का उपदेश हम नहीं मानते हैं।

यदि आप भी ईश्वर के योग विशेष मानों तो शरीर अवश्य मानना पड़ेगा, पुन: प्रश्न माला चलती जायेंगी। वह सृष्टि रचने के पहले अपना शरीर बना लेता है या शरीर रहित ही सृष्टि बनाकर अपना शरीर बनाता है ? यदि कहो ईश्वर स्वयं अपना शरीर नहीं बनाता है वह स्वयं बन जाता है, तब तो जैसे ईश्वर की इच्छा और प्रयत्न के बिना उसका शरीर बन गया वैसे ही सारी सृष्टि बन जावे।

यदि ईश्वर अपने पूर्व शरीर का कर्ता पूर्व पूर्वर्ती शरीर से होता है तब तो शरीर परम्परा अनादि सिद्ध होने से अनवस्था दोष आ जाता है, एवं संसारी प्राणी और ईश्वर में कोई अन्तर नहीं दिखता है। कार्मणशरीर से सहित ही संसारी प्राणी अनादि काल से शरीरों का निर्माण करता चला आ रहा है। दूसरी बात यह भी है कि उस ईश्वर का ज्ञान नित्य है या अनित्य ? यदि नित्य कहो तो सारे कार्य एक साथ हो जावेंगे, क्योंकि ज्ञान सदा काल एक नित्य है, अनित्य कहो तो भी अनेकों दूषण आते हैं। यहां ईश्वर का ज्ञान व्यापी है या अव्यापी ? स्वसंविदित है या अस्वसंविदित ? वह ज्ञान महेश्वर के ज्ञान को महेश्वर से भिन्न या अभिन्न ? इत्यादि प्रश्न चलते ही रहेंगे।

वैशेषिक महेश्वर के ज्ञान से भिन्न मानकर समवाय से महेश्वर को ज्ञानी कहता है तब आचार्य कहते हैं कि यह समवाय एक है तो समवाय महेश्वर में ही ज्ञान को जोड़े अन्यत्र आकाशादि में नहीं ऐसा क्यों ? यदि कहो आकाश अचेतन है, ईश्वर चेतन है तो भी ठीक नहीं है क्योंकि आपने ईश्वर को चेतन नहीं माना है चेतन के समवाय से ही चेतन माना है।

‘‘नेशो ज्ञाता न चाज्ञाता स्वयं ज्ञानस्य केवलं।

समवायात्सदा ज्ञाता यश्चात्मैव स किं स्वत: ।।६५।।

यदि कहो कि ईश्वर न ज्ञाता है न अज्ञाता है किन्तुउ ज्ञान समवाय से ज्ञाता है तब तो बताओ ईश्वर आत्मा है या नहीं ? तब उसने कहा, ईश्वर न आत्मा है न अनात्मा हैं। आत्मत्व के समवाय ये आत्मा है। तब तो बताओ उस आत्मत्व सम्वाय के पहले वह क्या है ? द्रव्य है ?तब वह कहता है कि नहीं। ईश्वर न द्रव्य है न अद्रव्य है, द्रव्यत्व के समवाय से द्रव्य है तब प्रश्न होता है कि द्रव्यत्व समवाय के पहले वह सत् रूप तो अवश्य होगा ? उसने कहा नहीं। ईश्वर असत् ही रहेगा। अर्थात् उस ईश्वर का कुछ भी स्वरूप समझ में नहीं आता है। समवाय की सिद्धि तो असंभव है। क्योंकि जीव में या ईश्वर में ज्ञान समवाय के पहले वे ज्ञानी हैं या अज्ञानी ? यदि ज्ञानी हैं तो समवाय ने क्या किया ? यदि अज्ञानी हैं तो पत्थर आदि अज्ञानी अचेतन में भी ज्ञान का समवाय क्यों नहीं होता है अत: समवाय सम्बन्प्ध नाम से तादात्मय सम्बन्ध मानकर स्वरूप का स्वरूपवान के साथ तादात्मय ही स्वीकार करन चाहिए अग्नि में उष्ण का जीव में ज्ञान का जो तादादत्मय सम्बन्ध है उसे ही समवाय भले ही कह दो। इस लिए उपयुक्त दोषों के निमित्त से आपका महेश्वर देहसहित, कर्मसहित, सर्वज्ञ एवं मोहरहित सिद्ध नहीं होता। दूसरी बात यह है कि वह ईश्वर सृष्टि क्यों बनाता है किसी अन्य पुरूष की प्रेरणा से या दया से, क्रीड़ा से या स्वभाव से ?

यदि अन्य से प्रेरित होकर बनाता है तब तो उसकी स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है। यदि दया से बनाता है तो उसने दु:खी प्राणी को क्यों निर्माण किये ? यदि कहो पापियों को दण्ड देना पड़ता है तब तो उसने पाप की सृष्टि क्यों की ? परम पिता परमकारुणिक ईश्वर पाप और पापीजनों की सृष्टि क बवोंन फिर उन्हें दु:ख देवें यह तो उचित नहीं है। यदि कहो क्रीड़ा से सृष्टि का निर्माण करता है तबो तो वह प्रभु महान् कैसे रहेगा, प्रत्युत क्रीड़ा प्रिय होने से बालकवत् नादान समझा जावेगा। यदि कहो स्वभाव से वह सृष्टि का निर्माण करता है तब तो ईश्वर का स्वभाव नित्य है सदा काल है अत: सदा काल एक जैसी सृष्टि बनती रहेगी, तरह—तरह की विचित्रता का अनुभव नहीं होना चाहिये।

इत्यादि अनेकों दोष आते हैं अत: ईश्वर को अनादि सिद्ध एवं सृष्टि का कर्ता मानना अनुचित्त है। यह संसारी प्राणी अनादि काल से कर्म सहित होने से स्वयं ही पुण्य पाप का कर्ता है और भोक्ता है। जब पुरुषार्थ से कर्मों का भेदन कर देता है तो ईश्वर महेश्वर, ब्रह्मा, महात्मा, परमात्मा सिद्ध शिव अक्षय, अच्युत आदि अनेकों नाम से पूज्य बन जाता है।

सांख्य कर आप्त समीक्षा

‘कपिल एव मोक्षमार्गस्योपदेशक: क्लेशकर्मविपाकाशयानां भेत्ता च रजस्तमसोस्तिरस्करणात् ।’ (आप्त प.पृ.१५६)

कपिल ही मोक्ष मार्ग का उपदेशक तथा क्लेश, कर्म, विपाक और आशयों का भेद करने वाला है, क्योंकि उसके रज और तम का सर्वथा अभाव है। यह कथन साँख्यों का है। इस पर आचार्य कहते हैं कि कपिल सर्वज्ञ नहीं है क्योंकि वह स्वयं अपने ज्ञान से सर्वथा भिन्न है, इसलिये सर्वज्ञ नहीं है। सांख्य का कहना है कि मुक्त होना, संसारी होना पुरुष का धर्म नहीं हैं। प्रधान के ही संसारीपना, मुक्तपना ज्ञान और सुख का होना संभव है।

प्रधानं ज्ञत्वतो मोक्षमार्गस्यास्तूपदेशकम् ।

तस्यैव विश्ववेदित्वात् भेदित्वात् कर्मभूभृताम् ।।८०।।
इत्यसंभाव्यमेवास्याचेतनत्वात् पटादिवत् ।
तदसंभवतो नूनमन्यथा निष्फल: पुमान् ।।८१।।
भोक्तात्मा चेत्स एवास्तु कर्ता तदविशेषत: ।
विरोधे तु तयोर्भोत्तिु: स्याद् भुजौ कर्तृता कथं।।८२।।

प्रधान ही मोक्ष मार्ग का उपदेशक है, क्योंकि वह ज्ञानी है और ज्ञानी इसलिये है कि वी विश्व —वेदी—सर्वज्ञ है, तथा सर्वज्ञ भी इसलिये है कि कर्म पर्वतों का भेत्ता है। जैनाचार्य कहते हैं कि सांख्यों का यह मत असंभव है क्योंकि वह प्रधान वस्त्रादि की तरह अचेतन हैं। इसलिये प्रधान को कर्मों का नाशक, विश्वज्ञानी, मोक्षमार्ग का उपदेशकत्व आदि मानना असम्भव हैं। यदि मानोगे तो पुरूष की कल्पना ही व्यर्थ हो जावेगी। अगर कहो कि पुरूष भोक्ता है तब तो वही कर्ता भी होवे, क्योंकि कर्तृत्व और भोत्तृत्व दोनों एक जगह संभव हैं। यदि क्रिया के कर्तापने का विरोध कहा जावे तो भोक्ता पुरुष भुज् क्रिया का कर्ता कैसे रहा? आश्चर्य तो इस बात का है कि प्रधान सर्वज्ञ है और मुमुक्षुउ जन स्तुति पुरुष की करते हैं। तात्पर्य यह है कि कपिल ने ज्ञान के आश्रय भूत प्रधान के संसर्ग से ही ज्ञान माना है, वह पुरुष स्वयं तो ज्ञान रहित है, किन्तु यह सिद्धांत सर्वथा गलत है अचेतन में ज्ञान हो और उसके संसर्ग से संसार में पुरूष ज्ञानी बनें एवं मुक्त में अज्ञानी रहें यह कल्पना गलत है अत: ज्ञानदर्शन स्वरूप पुरूष विशेष ही कर्मों का नाशक, विश्व का ज्ञाता सर्वज्ञ और मोक्षमार्ग का उपदेष्टा आप्त है किन्तु कपिल आप्त नहीं है।

बुद्ध की आप्त समीक्षा

सुगत ही सर्वज्ञ है क्योंकि वह संपूर्ण तृप्णा से रहित है एवं ‘संपूर्ण गत: सुगत:, अथवा शोभनंगत: सुगत: यदि वा सुष्ठुगत: सुगत:’ इस नियम में जो संपूर्णता को प्राप्त है या शोभन अवस्था को प्राप्त है या अच्छी गति को प्राप्त है वह सुगत है एवं उस सुगत की जगत् के लिये महती कृपा है ‘बुद्धो भवेयम् जगते हिताय’ मैं जगत् का हित करने के लिये बुद्ध होऊं’ इत्यादि भावना से ही बुद्ध भगवान् सच्चे आप्त हैं और मोक्ष मार्ग का उपदेश देते हैं । यह सौगतों का कहना है किन्तु जैनाचार्य उत्तर देते हैं कि—

सुगतोऽपि न निर्वाणमार्गस्य प्रतिपादक:।

विश्वतत्वज्ञतापायात् तत्त्वत: कपिलादिवत् ।।८४।।
संवृत्या विश्वतत्त्वज्ञ: श्रेमोयामार्गोपदेश्यपि।
बुद्धों वंद्यो नतु स्वप्नस्तादृगित्यज्ञचेष्टितं ।।८५।।

सुगत भी मोक्ष मार्ग का उपदेशक नहीं है, क्योंकि वास्तव में उसके सर्वज्ञता नहीं है, जैसे कपिल आदि में नहीं है।। यदि कहो बुद्ध संवृत्ति — कल्पना से सर्वज्ञ है और मोक्ष मार्ग का उपदेष्टा भी है। फिर भी संवृति से सर्वज्ञ होते हुये भी बुद्ध भगवान् तो वंदनीक होवें और कल्पित स्वप्न आदि वंद्य न होवें यह क्यों ? यह तो अज्ञानी का ही पक्षघात है।

आपके द्वारा मानी गई तत्त्व व्यवस्था ठीक नहीं है पुन: उसके उपदेशक बुद्ध सर्वज्ञ कैसे होंगे! आपके यहां प्रत्येक पदार्थ को प्रतिक्षण विनाशी एवं परमाणु रूप मानते हैं। जो कि प्रत्यक्षज्ञान से अनुभव में नहीं आते हैं।

इन बौद्धों में योगाचार बौद्ध केवल ‘विज्ञानमात्र’ तत्त्व को मानते हैं बाह्य पदार्थों को नहीं मानते हैं। उनकी इस मान्यता से सुगत की सिद्धि ही असंभव है क्योंकि ज्ञान से भिन्न सुगत को मानने से द्वैत आता है और संवृत्ति से सुगत की कल्पना करने से वह स्वप्न के सदृश होने से नमस्कार योग्य नहीं रहता। तथैव चित्राद्वैतवादी की मान्यता भी गलत है क्योंकि चित्र ज्ञान भी कहे और उसे एक एक अद्वैत भी कहें यह असंभव हैं। चित्रज्ञान का अर्थ ही है अनेक ज्ञान न कि एक ज्ञान । यदि आप कहें कि क्षणभंगुर वस्तु में और अद्वैत में स्थायी रहना या द्वैत रूप दिखाना है वह संवृत्ति मात्र है। तब तो आपका बुद्ध भी कल्पना से ही सर्वज्ञ होगा, पुन: वास्तव में सवंज्ञ न होने से कल्पित—असत्य मान्यता अपने आप में कल्पित असत्य ही है।

ब्रह्माद्वैतवादी के ब्रह्म की समीक्षा

ब्रह्माद्वैतवादी इस जगत् को एक परम ब्रह्म स्वरूप मानते हैं उस ब्रह्म की ही उपासना करते हैं । ये लोग प्रत्यक्ष अनुमान और आगम से ब्रह्म की सिद्धि कर रहे हैं। उनका कहना है कि ‘प्रत्यक्ष प्रमाण तो उस ब्रह्म का ग्राहक है ही क्योंकि आंख खोलने के अनंतर सर्वविकल्पों से रहित शुद्ध सत्तामात्र ब्रह्म ही झलक्ता है। अनुमान भी परम ब्रह्म को ही सिद्ध करता है।
‘ग्रामारामादय: पदार्था: प्रतिभा— सान्त:प्रविष्टा:, प्रतिभासमानत्वात् । यत्प्रतिभासते तत्प्रतिभासान्त:प्रविष्टम् ,यथा प्रतिभासस्वरूपम् ।

प्रतिभासंते च विवादापन्ना: इति’ ग्राम और उद्यान आदि सभी दिखलाई देने वाले पदार्थ प्रतिभास—परम ब्रह्म के अंत:प्रविष्ट हैं, क्योंकि वे प्रतिभासमान होते हैं। जो प्रतिभासित होता है।, वह सर्व प्रतिभास के अंत:प्रविष्ट हैं, जैसे कि प्रतिभास का स्वरूप। विवादापन्न ग्राम और उद्यान आदि प्रतिभासित होते हैं, इसलिये वे सभी परमब्रह्म के ही स्वरूप हैं। इस परमब्रह्म को सिद्ध करने के लिये श्रतिवाक्य भी अनेकों पाये जाते हैं।

‘‘सर्व वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।

आरामं तस्य पश्यंति न तं पश्यति कश्चन’’।।

सभी दृश्यमान पदार्थ ब्रह्म स्वरूप हैं इससे भिन्न जगत् में नाना पदार्थ कुछ नहीं हैं। हम सभी लोग उस ब्रह्म की पर्यायों को ही देखते हैं , किन्तु उसे कोई नहीं देखते हैं।। इत्यादि रूप से ब्रह्मवादी अपना पक्ष स्थापित करते हैं। अब आचार्य कहते हैं कि आपने जो परमब्रह्म को प्रत्यक्ष का विषय कहा है वह गलत है क्योंकि विशेष से निरपेक्ष सामान्य मात्र का प्रत्यक्षज्ञान से अनुभव होना ही अशक्य है।जो आपने अनुमान से ब्रह्म को सिद्ध किया है उसमें प्रश्न यह होता है कि ‘प्रतिभासित होने वाले धर्मी , हेतु दृष्टांत आदि प्रतिभासरूप ब्रह्म के अंत:प्रविष्ट होकर (भीतर घुसकर) प्रतिभासित होते हैं या ब्रह्म से बहिभूर्त रहकर ही प्रतिभासित होते हैं? यदि अंदर होकर प्रतिभासित होते है। तब तो अनुमान नहीं बनेगा।अनुमान में साध्य, हेतु उदाहरण अवश्य होने से द्वैत आ जावेगा। यदि बहिर्भूत होकर प्रतिभासित होते हैं कहों , तो स्पष्ट ही द्वैत हो गया। आपने अद्वैत को सिद्ध करने के लिये अनुमान बनाया, उसने द्वैत को ही सिद्ध कर दिया।

आगम आदि भी ब्रह्म से भिन्न है या अभिन्न ? इत्यादि विकल्प उठते रहने से आपका ब्रह्माद्वैत सिद्ध नहीं होगा। एवं उस ब्रह्म से सृष्टि की मान्यता कहना तो बिल्कुल ही असंभव है। एक परमब्रह्म रूप चैतन्य आत्मा से अनेकों चेतन अचेतन रूप जगत् को उत्पन्न हुआ मानना गलत है। अत: परमब्रह्म को आप्त भगवान् कहना सर्वथा गलत है।

उपसंहार— इस प्रकार महेश्वर, कपिल, सुगत और परमब्रह्म इनके सर्वज्ञत्व और आप्तपने का अभाव होने से मोक्षमार्ग का प्रणयण नहीं बनता है और जो सर्वज्ञ हैं, कर्म पर्वतों के भेत्ता हैं, मोक्ष मार्ग के प्रणेता हैं वेउ अर्हंत ही हैं वे ही सच्चे आप्त हैं।

चार्वाक— चार्वाक कहता है कि ‘कोई पुरुष सर्वज्ञ है’’ यह बात किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं हैं। आगम प्रमाण से सर्वज्ञ का अस्तित्व बतलाना योग्य नहीं है, क्योंकि जब सर्वज्ञ का अस्तित्व सिद्ध नहीं तब उसका कहा हुआ आगम कैसे होगा? एवं असर्वज्ञप्रणीत आगम से सर्वज्ञ को सिद्ध करना गलत है क्योंकि अल्पज्ञ का कहा हुआ आगम प्रमाणिक नहीं है। प्रत्यक्ष प्रमाण से भी सर्वज्ञ का ज्ञान नहीं होता है क्योंकि इस समय यहां सर्वज्ञ नहीं है यह बात प्रत्यक्ष से स्पष्ट है। अनुमान से भी सर्वज्ञ ज्ञान नहीं होता क्योंकि सर्वज्ञ के साथ जिसका अविनाभाव हो ऐसा कोई साधन नहीं है अत: कोई पुरुष तीर्थंकर आप्त सर्वज्ञ भगवान् नहीं है। न उनके द्वारा कथित आत्मा और परलोक आदि ही हैं। इस पर जैनाचार्य कहते हैं कि आज भले ही इंद्रिय प्रत्यक्ष से यहां पर सर्वज्ञ न हो फिर भी सर्वज्ञ के प्रतिपादक आगम एवं अनुमान सिद्ध हैं यथा—

‘कश्चित् पुरुष: सकलपदार्थसाक्षात्कारी, तद्गहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिबंधप्रत्ययं तत् तत् सकलपदार्थसाक्षात्कारी या अपगततिमिरं लोचनं रूपसाक्षात्कारि, तथा चायं पुरुष: तस्मात्सकलपदार्थसाक्षात्कारी इति’’ (विश्वत.प्र.पृ.४)

‘कोई पुरुष सम्पूर्ण पदार्थों का साक्षात्कार करने वाला अवश्य है, क्योंकि उसके पदार्थों का ग्रहण स्वभाव होने से ज्ञान के प्रतिबंधक कारण नष्ट हो चुके हैं। जो—जो पदार्थ के ग्रहण स्वभाव वाला होने पर प्रतिबंधक कारण से रहित है वह—वह सकल पदार्थों को साक्षात् करने वाला है जैसे तिमिर दोष से रहित नेत्र रूप का साक्षात् करने वाला है जैसे तिमिर दोष से रहित नेत्र रूप का साक्षात्कार करने वाले हैं और उसी प्रकार से यह कोई पुरूष है इसीलिये सम्पूर्ण पदार्थों को साक्षात् करने वाला है।

दूसरी बात यह है कि जब चार्बाक प्रत्यक्ष से सारे विश्व को देखकर आवे कि कोई सर्वज्ञ नहीं है तभी वह निर्णय दे सकता है कि विश्व में कहीं भी कोई पुरूष सर्वज्ञ नहीं है अन्यथा सारे विश्व को देखे बिना कैसे निर्णय देगा ? और जब सारे विश्व को देखकर आयेगा तब वही तो सर्वज्ञ बन जायेगा क्योंकि जो सारे विश्व को जाने वह सर्वज्ञ है। पुन: सर्वज्ञ का निषेध वह कैसे करेगा, अर्थात् नहीं कर सकेगा।

मीमांसक— मीमांसक भी यही कहते हैं कि अतीन्द्रियदर्शी कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, अत: नित्य वेदवाक्यों से ही अतीन्द्रिय पदार्थों का ज्ञान होता है, किन्तु जैनाचार्यों ने इन मीमांसकों के मत की भी मीमांसा करके सर्वज्ञ की सिद्धि की है।

कुमारिल भट्ट कहता है कि —‘धर्मज्ञत्वनिषेधस्तु केवलोऽत्रोपयुज्यते। सर्वमन्यद् विजानान: पुरुष: केन वार्यते’ अर्थात् हम तो मनुष्य को केवल धर्मज्ञ होने का निषेध करते हैं । धर्म को छोड़कर यदि मनुष्य सबकी भी जान ले तो कौन मना करता है? मतलब यह है कि ये मीमांसक किसी को सब कुछ जानने वाला कहकर भी धर्मज्ञ का निषेध कर देते हैं, इनको वेद के द्वारा अतीन्द्रिय पदार्थों का ज्ञान होना सिद्ध करना है क्योंकि ये क्रियाकांडी लोग वेद को अपौरूषेय कहकर उसकी प्रमाणता को सिद्ध करने में बहुत ही प्रयत्नशील हैं। खैर! ‘सूक्ष्म अन्तरित दूरवर्ती आदि पदार्थों का साक्षात्कार करने वाला, अतीद्रिंय धर्म, अधर्म आदि सभी को स्पष्ट करने वाला सर्वज्ञ अवश्य है।’

अकलंकदेव ने सर्वज्ञत्व के साधन में अनेक युक्तियों के साथ युक्ति बहुत विशेष दी है कि ‘सर्वज्ञ के सद्भाव में कोई बाधक प्रमाण नहीं हैं अत: उसका अस्तित्व होना ही चाहिए’ एवं दूसरी युक्ति यह दी है कि —‘ज्ञस्यावरणविच्छेदे ज्ञेयं किमवशिष्यते। अप्राप्यकारिणस्मात् सर्वार्थावलोकनम् ।। (न्यायविनिश्चय)

आत्मा ‘ज्ञ’— ज्ञाता है और उसके ज्ञानस्वभाव को ढकने वाले आवरण दूर होते हैं। अत: आवरणों के विछिन्न हो जाने पर ज्ञस्वभाव आत्मा के लिये फिर ज्ञेय—जानने योग्य क्या रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । अप्राप्यकारी ज्ञान से सकलार्थ परिज्ञान होना अवश्यंभावी है। इसलिये सर्वज्ञ का अस्तित्व सिद्ध है।

तात्पर्य यह है कि चार्वाक शून्यवादी और मीमांसक सर्वज्ञ का अस्तित्व ही नहीं मानते हैं एवं सांख्य बौद्ध वैशेषिक वेदांती ईश्वर का अस्तित्व मानते हैं किन्तु उनकी मान्यतायें सुघटित नहीं है इसलिए सबका निराकरण करते हुये जैनाचार्य युक्तिपूर्वक सर्वज्ञ की सिद्धि कर रहे हैं। जैन—

सोऽर्हन्नेव मुनीन्द्राणां वंद्य: समवतिष्ठते।

तत्सद्भावे प्रमाणस्य निर्बाध्यस्य विनिश्चयात् ।।८७।।
ततोऽन्तरिततत्त्वानि प्रत्क्षाण्यर्हतोऽञ्जसा ।
प्रमेयत्वाद्यथास्मादृक् प्रत्यक्षार्था : सुनिश्चिता: ।।८८।। (आप्तपरीक्षा)

जो सर्वज्ञ हैं, कर्म पर्वतों के भेत्ता हैं, मोक्षमार्ग के प्रणेता हैं, वे अर्हंत ही हैं और इसलिये वे ही मुनीश्वरों के वंदनीय प्रसिद्ध हैं , क्योंकि सर्वज्ञ का अस्तित्व सिद्ध करने के लिये अबाधित और निश्चित प्रमाण पाये जाते हैं। ‘एवं ईश्वर आदि सर्वज्ञ नहीं है, इसलिये सूक्ष्मादि, अन्तरित पदार्थ अर्हंत के परमार्थत: प्रत्यक्ष हैं क्योंकि वे प्रमेंय हैं जैसे हम लोगों के द्वारा जाने गये प्रत्यक्ष पदार्थ।’

शंका‘‘आत्मा का इन्द्रियों के साथ समीचीन सम्बन्ध होने पर जो उत्पन्न होता है। वह प्रत्यक्ष है।’’ अत: हम लोगों का प्रत्यक्ष ज्ञान उन देशकाल और स्वभाव से अन्तरित (दूरवर्ती) पदार्थों को नहीं जानता है अत: धर्मी असिद्ध होने से हेतु आश्रयासिद्ध है।

समाधान— नहीं, क्योंकि स्फटिक आदि अन्तरित कितने ही पदार्थों का स्वभाव हम लोग देखते हैं। और दीवाल आदि से ढकी हुई अग्नि आदि को भी धूमादि हेतु से निश्चित कर देते हैं। काल से अन्तरित वर्षा आदि को भी विशिष्ट मेघ आदि के द्वारा जानते हैं तथा स्वभाव से अन्तिरित इन्द्रिय शक्ति आदि कितने ही पदार्थ अर्थापत्ति से सिद्ध होने से धर्मी प्रसिद्ध है अत: हेतु आश्रयासिद्ध नहीं है।

शंका— आप अतीन्द्रि प्रत्यक्ष से अन्तरित पदार्थों को अर्हंत के सिद्ध करते हो या इंद्रिय प्रत्यक्ष से ?

समाधान— अर्हंत भगवान् इन्द्रिय प्रत्यक्ष से धर्मादिक सूक्ष्म पदार्थ एवं सुमेरु आदि दूरवर्ती पदार्थों को जानने में समर्थ नहीं हैं। अत: अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष ही जानते हैं।

शंका जो अर्हंत के प्रत्यक्ष नहीं है वह प्रमेय नहीं है जैसे प्रत्यक्ष से बहिर्भूत मिथ्या एकान्त।

समाधान— जो मिथ्या एकान्त ज्ञान हैं वे सभी परमागम और अनुमान से हम लोगों के प्रमेय हैं और अर्हंत के प्रत्यक्ष हैं अत: वे विपक्ष नहीं हैं।

शंका— धर्मादिक पदार्थ किसी के प्रत्यक्ष नहीं है क्योंकि सदैव अत्यन्त परोक्ष हैं। जो किसी के प्रत्यक्ष हैं वे सदैव अत्यन्त परोक्ष नहीं है जैसे घटादिक पदार्थ।

समाधान— ‘‘अक्ष्णोति व्यप्नोति जानाति इति अक्ष आत्मा’’ अर्थात् जो व्याप्त करे जाने उसे अक्ष कहते हैं और अक्ष नाम आत्मा का है । अत: आत्मा के आश्रय से जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे प्रत्यक्ष कहते हैं। अर्हंत का प्रत्यक्ष मुख्य प्रत्यक्ष है, वह सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायों को विषय करने वाला है। क्योंकि वह कम रहित है। और वह क्रम रहित इसीलिए है कि उसमें मन तथा इन्द्रिय की अपेक्षा नहीं है। इन्द्रिय मन की अपेक्षा भी इसलिए नहीं है कि वह इन दोषों के कारण भूत मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय इन चार कर्मों का नाश कर चुके हैं जो दोष रहित भी नहीं है जैसे हम लोगों का प्रत्यक्ष। मोहादि कर्म रहित अर्हंत का प्रत्यक्ष है इस कारण वह समस्त दोष रहित है।

शंका— अर्हंत के मोहादि का नाश कैसे सिद्ध है ?

समाधान— अर्हंत के मोहादि चार कर्मों के कारणभूत मिथ्यात्व आदि के प्रतिपक्षियों का प्रकर्ष देखा जाता है। यथा— मोहादि चार कर्म किसी बात्मा विशेष में सर्वथा नष्ट हो जाते हैं क्योंकि जहां उनके कारणों के प्रतिपक्षी का प्रकर्ष पाया जाता है वहां उसका नाश हो जाता है । जैसे आंख का तिमिरदोष । मोहादि चार कर्मों के कारणों के प्रतिपक्षियों का प्रकर्ष केवली में पाया जाता है इस कारण वहां उनका सर्वथा नाश हो जाता है।

शंका— मोहादि चार कर्मों का कारण क्या है ?

समाधान मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र ये तीनों मोहादि चार कर्मों के कारण हैं।

शंका मिथ्यादर्शनादि के प्रतिपक्ष (विरोधी) क्या हैं ?

समाधान— सम्यग्दर्शनादि तीन मिथ्यादर्शन आदि तीन के विरोधी हैं। क्योंकि उनके प्रकर्ष होने पर उन मिथ्यादर्शन आदि की हानि देखी जाती हैं। जिसके प्रकर्ष में जिसका अप्रकर्ष देखा जाता है वह उसका विरोधी है। जैसे—ठंढ का प्रतिपक्षी अग्नि है एवं सम्यग्दर्शन आदि तीनों वृद्धिंगत होने वाले हैं। जो बढ़ने वाला है वह कहीं पर प्रकर्ष के अन्त को प्राप्त होता है। जैसे परिमाण परमाणु से लेकर आकाश में चरम सीमा को प्राप्त है। अतएव सम्यग्दर्शनादि के पूर्ण प्रकर्ष को प्राप्त होने पर मिथ्यादर्शन अािद अत्यन्त नाश को प्राप्त हो जाते हैं। उनके नाश होने पर मोहादि चार कर्मों का अत्यन्त क्षय होने से अर्हंत भगवान् दोष रहित सर्वज्ञ वीतराग सिद्ध हो जाते हैं। और मिथ्या एकांतों का अभाव तो अनेकांत की सिद्धि से ही हो जाता है।

शंका अर्हंत सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है पुरुष है जैसे ब्रह्मा वगैरह।

समाधान ज्ञान के बढ़ने पर वक्तापन की हानि नहीं देखी जाती है। अत: वक्तापन सर्वज्ञता का विरोधी नहीं हैं। सर्वज्ञ का जो समस्त पदार्थों को विषय करने वाला वक्तापन है वह युक्ति एवं शास्त्र से अविरोधी सिद्ध हैं। तथा स्पष्ट है कि समस्त अज्ञानादि दोष रहित पुरुषपना परमात्मा सर्वज्ञ में सिद्ध होता हुआ समस्त ज्ञानादि गुणों के परम प्रकर्ष की प्राप्ति को ही सिद्ध करता है। अत: आपका अनुमान सर्वज्ञ का बाधक नहीं है। दूसरी बात यह है कि सर्वज्ञ के अभाव को सिद्ध करने वाला कोई व्यक्ति पहले तीनों लोकों में एवं तीनों कालों में सबको देख कर यह निर्णय करे कि कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तब तो वह स्वयं ही तीनों लोकों एवं तीनों कालों को जान लेने से सर्वज्ञ सिद्ध हो जाता है। यदि उसने तीनों लोकों एवं तीनों कालों को नहीं जाना तब वह यह निर्गय ही कैसे करेगा कि तीनों जगत में सर्वज्ञ नहीं है। अत: आप सर्वज्ञ का अभाव सिद्ध नहीं कर सकते हैं।

शंका कर्म कार्य—कारण रूप प्रवाह से प्रवर्तमान है इसलिए वे अनादि हैं । उनका विनाशक कारण न होने से कोई सर्वज्ञ भी कर्म पर्वत का भेत्ता नहीं हो सकता है ?

'समाधान— नहीं, क्योंकि अर्हंत में विरोधी सम्यग्दर्शन आदिकों की वृद्धि चरम सीमा को प्राप्त हो जाती है, तब प्रवाहरूपसेअनादि होने पर भी कर्मों का सर्वथा नाश हो जाता है। बीजांकुर की अनादि संतान की प्रतिपक्षी अग्नि से जलकर खाक हुई देखी जाती है।

शंका— कर्म पर्वतों का विपक्ष क्या है।

समाधान— आगामी कर्मों का विपक्ष संवर है और संचित कर्मों का विपक्ष तप से होने वाली निर्जरा है। अर्थात् कर्मों के आने के द्वार का रूक जाना संवर है। और कर्मों के वे द्वार पाँच हैं— (१) मिथ्यात्व

(२) अविरति

(३) प्रमाद

(४) कषाय

(५) योग । इनके होने पर कर्म आते हैं अत: ये आश्रव हैं । आश्रव का निरोध संपूर्णतया तो गुप्तियों से होता है। एक देश रूप समिति, धर्म, परीषहजय, अनुप्रेक्षा और चारित्र से होता है। और संपूर्ण रूप से योग निरोध रूप संवर तो अयोग केवली के अंतिम समय में होता है क्योंकि वही समस्त कर्मों के निरोध का कारण है। इसीलिए अयोग केवली के अंतिम समयवर्ती सम्यग्दर्शन आदि तीनों साक्षात् मोक्ष के माने जाते हैं। निर्जरा भी दो प्रकार की है :— (१) अनुपक्रमा

(२) औपक्रमिकी।

अनुपक्रमा निर्जरा तो यथा समय हर एक संसारी जीवों में पाई जाती है और औपक्रमिकी बारह प्रकार के तपों से प्राप्त (सिद्ध) होती है। अत: संवर और निर्जरा से कर्मों का अत्यन्त अभाव हो जाता है।

शंका— कर्म पर्वत क्या हैं ?

समाधान– कर्म के दो भेद हैं—द्रव्य कर्म और भाव कर्म । जीव के जो द्रव्य कर्म हैं वे पौद्गलिक हैं उनके अनेक भेद हैं । और जो भाव कर्म हैं वे आत्मा के चैतन्य परिणाम रूप हैं क्योंकि आत्मा से कथंचित् अभिन्न हैं वे क्रोधादिक हैं। ये द्रव्य—भाव कर्म ही पर्वत नाम से कहे जाते हैं। उनकों जीव से पृथ्क् करना ही उनका भेदन है।

शंका— ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, ये चार चातिया कर्म जीव के अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंतवीर्य रूप गुणों के घातक हैं । किन्तु नाम, गोत्र, वेदनीय और आयु ये चार कर्म जीव के स्वरूप के घातक न होने से अघाति कर्म, कर्म नहीं है क्योंकि ये परतंत्रता के कारण नहीं हैं।

समाधान— नहीं । नामादि अघाति कर्म भी जीव के स्वरूप—सद्धत्व रूप के प्रतिबंधक हैं अत: परतंत्रता के कारण प्रसिद्ध ही हैं।

शंका— पुन: इन्हें अघाति क्यों कहा है ?

समाधान— ये जीवन्मुक्त उत्कृष्ट आर्हत्य लक्ष्मी—अनन्त चतुष्टयादि विभूति के घातक नहीं हैं इसीलिए इन्हें हम अघाति कर्म कहते हैं।

शंका— कर्म ,धर्म —अधर्म रूप हैं और वे आत्मा के गुण हैं अत: कर्म औदयिक एवं पुद्गल रूप नहीं हैं ।

समाधान— यदि कर्म आत्मा के गुण हैं और वे आत्मा की परतंत्रता में कारण नहीं हो सकते हैं और इस तरह आत्मा के कभी भी बंध न हो सकने से मुक्ति का प्रसंग आ जावेगा, किन्तु ऐसा है नहीं।

शंका— मोक्ष का स्वरूप क्या है ?

समाधान— समस्त कर्मों की संवर और निर्जरा होकर जो अपने स्वरूप का लाभ होता है उसे ही आस्तिक पुरुषों ने मोक्ष कहा है। क्योंकि आत्मा का स्वरूप अनंत चतुष्टय आदि रूप है न कि अचेतन रूप।

शंका— मोक्ष मार्ग क्या है ?

समाधान— मोक्ष की प्राप्ति का उपाय, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र की एकता ही है। और चौदहवें गुणस्थान के अन्त में परम शुक्ल ध्यान रूप तपोविशेष जो कि चारित्र के अंतर्गत है उसकी पूर्ति होने पर ही मोक्ष होता है रत्नत्रय की पूर्णता चौदहवें गुणस्थान के अन्त में ही होती है, अत: तीनों की एकता ही मोक्ष मार्ग है। अत: मोक्ष में ज्ञानादि गुणों का उच्छेद नहीं होता है प्रत्युत अनंत ज्ञान अव्याबाध सुखादि गुणों की पूर्ण प्रगटता हो जाने से यह जीव कृतकृत्य सिद्ध हो जाता है इस प्रकार से अर्हंत में सर्वज्ञता की सिद्धि घटित होती है अन्यत्र नहीं होती है।

इस प्रकार आप्त की समीक्षा करते हुये अर्हंत को ही आप्तता सिद्ध होती है।