03.मुनि धर्म का कथन

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मुनिधर्म का कथन



(३८)
आचार पांच दशधर्म और बारह संयम तप भी बारह।
अरु अष्टमूलगुण उत्तरगुण चौरासी लख धारें मुनिवर।।
मिथ्यात्व मोह मद त्याग और शम दम से ध्यान प्रमाद रहित।।
वैराग्य और रत्नत्रय गुण धरते, मुनि अंत समाधि सहित।।
(३९)
मुनि अपने चित्चैतन्यरूप से रंचमात्र भी डिगें नहीं।
यदि पर पदार्थ में बुद्धि लगे तो कर्मबंध हो निश्चय ही।।
शारीरिक सभी पदार्थों को तजना ही मुनि की क्रिया कही।
जब तक है आयू कर्म शेष तब तक मुनिव्रत ही धरो सही।।
(४०)
जो यति पूजा की इच्छा से नहिं मूलगुणों को पाल रहे।
उनको आचार्य मूल छेदक प्रायश्चित दण्ड बताते हैं।।
जैसे अंगुलि का अग्रभाग शिरछेदक बाण न रोक सके।
वैसे ही मुनि के उत्तरगुण नहिं मूलगुणों के दोष ढके।।
(४१)
यदि वस्त्र संयमी रखता है तो धोने की चिंता रहती।
जब फट जाए तब वस्त्र मांगने की है आकुलता रहती।।
यदि एक लंगोटी भी रख ले तो खो जाने से दुख होगा।
इसलिए मुनीव्रत ही धारो तब दिशारूप अंबर होगा।।
(४२)
नहिं धन सम्पत्ती ये रखते जिससे बालों को कटा सकें।
कैंची आदिक नहिं अस्त्र रखें नहिं केशों की वे जटा रखें।।
जूँ आदिक जीवों की हिंसा से विरत अयाचक वृत्ति रखें।
वैराग्यवृद्धि के लिए मुनी हाथों से केश का लोंच करें।।
(४३)
मुनिगण ममत्व से रहित सदा इसलिए प्रतिज्ञा करते हैं।
जब तक पैरों में शक्ति रहे तब तक ही भोजन लेते हैं।।
क्योंकी हाथों की अंजलि में आहार खड़े होकर लेते।
वरना समाधि को धारण कर वे धर्ममार्ग को हैं चुनते।।
(४४)
केवल शरीर में यह मेरा ऐसी ममत्व बुद्धी से है।
संसार में परिभ्रमण होता फिर बाह्य वस्तु में क्या रमते।।
फिर कोइ कुल्हाड़ी से मारे अथवा चंदन का लेप करे।
दोनों में साम्यभाव रखते अपने से खुद को भिन्न रखें।।
(४५)
तृण, रत्न, शत्रु हों मित्र बन्धु सबमें वे समता रखते हैं।
सुख-दुख स्तुति अरु निंदा में निंह किंचित् क्लेश वे धरते हैं।।
शमशान भूमि और राज्यों में जीवित अरु मरणावस्था में।
समभाव रखें जो इन सबमें वे भावमुनी ही होते हैं।।

वीतरागी इस प्रकार विचार करते हैं


(४६)
जिस तरह हिरण अपने समूह से जुदा हुआ विचरण करता।
हर पल सचेष्ट रहकर पर से एकला ही आनन्दित होता।।
अपने कुटुम्बियों से हम भी कब होकर जुदा मोह त्यागें।
एकान्तवास में रह करके आत्मा का सुख हम भी भोगें।।
(४७)
ना जाने कितनी बार बने सम्राट चक्रवर्ती राजा।
ना जाने कितनी बार बने, चींटी हाथी पशु योनी पा।।
संसार में सब कुछ चंचल है सुख दुख में हर्ष विषाद न कर।
जिससे भवभ्रमण छूट जावे संसार से तर जाता है नर।।
(४८)
उपरोक्त भावना करने से होता है परमशुद्ध संवर।
जो भी प्राचीन कर्म आत्मा के गल जाते होता निर्जर।।
तब परमशांत मुद्राधारी मुनि के न नवीन कर्म बंधते।
इससे वे मुक्तिवल्लभा के अति निकट पहुँच कर दुख हरते।।
(४९)
जिन मुनि के पास छिद्रविरहित है सम्यग्ज्ञानमयी नौका।
तपरूपी पवन पास जिनके आशीर्वाद हो गुरुओं का।
उन उद्यमि मुनि के लिए नहीं है दूर मोक्ष का मार्ग सुनो।
कर लेगा झट से पार उसे कितना ही बड़ा समन्दर हो।।
(५०)
हे मुनिगण ! इस आनंदमयी शुद्धात्मा का अनुभवन करो।
मत लोक रिझाने में पड़ना कृष मोह करो, तन का न करो।।
जब तक तुम इन दो बातों का नहिं दोगे ध्यान व्यर्थ सारा।
जप तप उपवास नियम आदिक से नहीं किसी ने भव तारा।।
(५१)
जो मुनिवर दुष्ट कषायों को नहिं छोड़े मन को शुद्ध करे।
वे क्या संसार त्याग सकते सब परिषह सहना व्यर्थ रहे।।
आचार्य प्ररूपण करते हैं उनके सब कार्य कपट वाले।
ऐसे ढोंगी मुनि होते हैं संसार भ्रमण करने वाले।।
(५२)
धन को जिसने संचयन किया वह सभी पाप में रत रहता।
क्योंकी धन से आरंभ और उससे ही लोभ प्राप्त होता।।
प्राणी हिंसा से पाप कहा वह पाप आरम्भ का कारण है।
इसलिए द्रव्य जो ग्रहण करे सन्मार्ग नाश का कारण है।।
(५३)
निग्र्रंथ मुनि शय्या के कारण घास आदि यदि स्वीकारें।
दुध्र्यान कहा आचार्यों ने लज्जाकर भी इसको मानें।।
फिर यदि निर्गं्रथ यती सोना आदिक वस्तू लेकर रखे।
तो इस कलियुग का दोष कहा वरना वे अविंâचन सदा रहें।।
(५४)
क्रोधादि कषायों के द्वारा, प्राणी के कर्मबंध होते।
पर प्रतिक्षण बंध नहीं होता ये कभी कभी ही हैं होते।।
लेकिन परिग्रहधारी जीवों की किसी काल में सिद्धि न हो।
इसलिए भव्य जीवों सुन लो धन धान्य से प्रीति नहीं रखो।।
(५५)
अभिलाषा अगर मोक्ष की भी की जाए दोषस्वरूप कहा।
फिर स्त्री पुत्र जनों की क्या जब तक शरीर से मोह रहा।।
इसलिए कहा है मुनियों को अपनी आत्मा में लीन रहो।
तब मोक्ष स्वयं पा जावोगे नहिं पर पदार्थ में प्रीति रखो।।
(५६)
यदि परिग्रहधारी जीवों का भी मोक्षगमन माना जाए।
तो अग्नी को शीतल मानो इंद्रियसुख सुख माना जाए।।
विष भी अमृत कहलायेगा और तन को भी स्थिर मानो।
यदि इंद्रजाल रमणीय कहो नभ की बिजली स्थिर मानो।।
(५७)
ऐसे यतिवर जयवंत रहें जो कामदेव के योद्धा को।
निज ध्यानाग्नि से भस्म करें भय से ही भाग रहा है जो।।
फिर लौट के ना वापस आए सारा प्रभाव ही खत्म हुआ।
ऐसे ध्यानी को नमन करूँ जिन मुनि आगे वह हार गया।।
(५८)
जो रत्नत्रय रूपी संपति के धारी हैं मगर दिगम्बर हैं।
हैं परमशांत मुद्राधारी फिर भी वे युद्ध में तत्पर हैं।।
क्योंकी वे कामदेव रूपी बैरी को मार गिराते हैं।
उसकी स्त्री को विधवा कर त्रैलोक्यपूज्य बन जाते हैं।।

आचार्य परमेष्ठी की स्तुति

(५९)

जो स्वयं पंच आचार पालते सौख्य वृक्ष का बीज कहा।
ऐसे आचार्य शिष्य को भी पालन करवाते सौख्यप्रदा।।
नहिं लेशमात्र भी परिग्रह है जो ऐसी मुक्ति स्वयं पाते।
रत्नत्रयधारी ऐसे गुरु पर को भी मुक्ती दिलवाते।।
(६०)
इस जग में भ्रम के कारक जो ऐसे अनेक ही मार्ग कहे।
उनसे छुड़वाकर जो गुरुवर सच्चा सुखकारी मार्ग कहें।।
सत्पथ बतलाते ऐसे गुरु को शीश झुकाकर नमन करूँ।
मिथ्यामारग में नहिं जाऊँ ऐसा मैं सत् आचरण करूँ।।

उपाध्याय परमेष्ठी की स्तुति

(६१)

यह मोहकर्म का परदा जो है लगा अनादी कालों से।
शिष्यों को संबोधन देते वे उपाध्याय निज वचनों से।।
स्याद्वाद से अविरोधी उनके उपदेश दृष्टि निर्मल करते।
ऐसे उवझाय१ मेरी रक्षा करिए बिन हेतु व्याधि हरते।।

साधु परमेष्ठी की स्तुति

(६२)

जो साधु पांचवे परमेष्ठी गृहबंधन को ठुकराय दिया।
अपने शरीर से मोह छोड़ मोहान्धकार को नष्ट किया।।
निज सम्यग्ज्ञानमयी ज्योती की सूर्य प्रभा सम वृद्धि करें।
ऐसे वे साधू परमेष्ठी हम सबमें भी समृद्धि भरें।।

वीतरागता की महिमा

(६३)

जैसे बिजली के गिरने से सब लोग भयातुर हो जाते।
लेकिन शांतात्मा मुनि देखो नहिं ध्यान से हैं डिगने पाते।।
जिसने सज्ज्ञानरूप दीपक से मोह महातम नाश किया।
वे सम्यग्दर्शन के धारी परिषह सह सब कुछ जीत लिया।।
(६४)
ग्रीष्म ऋतु में पर्वत शिखर पर ध्यानी मुनीश्वरों की स्तुति।।
जिस ग्रीष्म ऋतू की तीक्ष्ण धूप और लू के प्रबल थपेड़ों में।
अत्यन्त ताप देने वाली भूमि रेता को जो ओढ़ें।।
जिस समय सूख जातीं नदियाँ ऐसे ऋतु में पर्वत तट पर।।
जो ध्यान अग्नि से भस्म करें ऐसे मुनि होवें क्षेमंकर।।
(६५)
वर्षा ऋतु में वृक्षों के नीचे ध्यानी मुनियों का तप।।
वर्षा ऋतु में तरु के नीचे जो ध्यान मुनीश्वर करते हैं।
वे मुनिगण रक्षा करें मेरी हम नमन चरण में करते हैं।।
जब महाभयंकर शब्द करें पृथ्वी भी नीचे धंस जाती।
बरसे ओले शोले पत्थर फिर भी कुछ विकृति नहिं आती।।

शीतकाल में मुनियों का तप

(६६)

जिस शीतकाल में सर्दी से हैं कमलपत्र कुम्हला जाते।
अत्यन्त कष्ट देने वाली दीनों के रोम है हिल जाते।।
बंदर का मद भी गल जाता वृक्षों के पत्ते जल जाते।
ऐसे क्षण महा तपस्वी के तप से सब कर्म विनश जाते।।

और भी मुनिधर्म का स्वरूप

(६७)

जो आत्मज्ञान से रहित मुनी इन तीनों ऋतु के दुख सहें।
आचार्य प्ररूपण करते हैं उनका सारा तप व्यर्थ रहे।।
जैसे कि धान कट जाने पर खेतों में बाड़ लगाये क्यों।
वैसे ही निज में ध्यान करे यह कहा गया है मुनियों को।।
(६८)
यद्यपि कलियुग में तीन लोक से पूज्य केवली प्रभू नहीं।
फिर भी जग में प्रकाश करने वाली वाणी मौजूद सही।।
उस वाणी को गुरु बतलाते इसलिए सरस्वतिसुत मानो।
उनकी पूजन वंदन कर लो ये जिनवर की पूजन जानो।।
(६९)
यह यतिवर ध्यानलीन होकर जहाँ चरण कमल रख देते हैं।
वह भूमी तीरथ बन जाती उसे इंद्र देवगण नमते हैं।।
उनके स्मरण मात्र से ही सब पाप शमन हो जाते हैं।
ऐसे यतियों को सदा ध्यान में रखकर शीश झुकाते हैं।।
(७०)
रत्नत्रयधारी ये मुनिवर दुष्टों से अपमानित होकर।
समता को धारण करते हैं आत्मा की शुद्धी में रमकर।।
जो निंदा करने वाले हैं वे निज आत्मा का घात करें।
अरु कर्मों का बंधन करके जाकर नरको में वास करें।।
(७१)
इस मानुष भव को पा करके भोगों को रोगतुल्य समझें।
ऐसे परिग्रह से रहित मुनी वन में जाकर तपरत रहते।।
उनके गुण को गाने वाला निंह वन में कोई होता है।
यदि कोई स्तुति कर सकता वो महापुरुष ही होता है।।

इति मुनिधर्म कथन