03.रत्नत्रय धर्म प्रश्नोत्तरी

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रत्नत्रय धर्म

प्रश्न ७६—सम्यग्दर्शन किसे कहते हैं ?
उत्तर—जीवादि पदार्थ, आप्त तथा गुरुओं पर श्रद्धान रखने को सम्यग्दर्शन कहते हैं ।

प्रश्न ७७—सम्यग्ज्ञान किसे कहते हैं ?
उत्तर—जिसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं है, जो संशयरहित तथा पूर्ण है ऐसे ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं।

प्रश्न ७८—सम्यक्चारित्र किसे कहते हैं ?
उत्तर—प्रमादसहित कर्मों के आगमन के रुक जाने को चारित्र कहते हैं।

प्रश्न ७९—मुक्ति का मार्ग क्या है ?
उत्तर—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र ही मुक्ति का मार्ग है।

प्रश्न ८०—रत्नत्रय की महिमा बताइये ?
उत्तर—जिस प्रकार मार्ग मालूम होने पर धीरे—धीरे चलता हुआ भी मनुष्य गन्तव्य पर पहुंच जाता है किन्तु जिसको मार्ग नहीं मालूम है वह कितना भी जल्दी क्यों न चले, अपने अभिमत स्थान पर नहीं पहुंच सकता उसी प्रकार जो मुनि सम्यग्दर्शनादि से सहित है वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त हो जाता है किन्तु जो बहुत तप तो करता है पर रत्नत्रय का धारी नहीं है मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है।

प्रश्न ८१—क्या केवल सम्यग्दर्शन अथवा सम्यग्ज्ञान या सम्यक्चारित्र से मुक्ति सम्भव है ?
उत्तर—नहीं, केवल सम्यग्दर्शन अथवा सम्यग्ज्ञान अथवा सम्यक्चारित्र से मुक्ति सम्भव नहीं है अपितु इन तीनों के आराधन से ही मुक्ति सम्भव है।

प्रश्न ८२—वास्तविक रत्न कौन से हैं ?
उत्तर—संसार में रत्न संज्ञा बहुत से पत्थरों की है किन्तु वे प्रयोजनीभूत नहीं हैं अपितु जो समस्त अंधकार के नाश करने वाले, अमूल्य और मनोहर हैं ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र रूपी रत्न ही वास्तविक रत्न हैं।

प्रश्न ८३—निश्चय रत्नत्रय का स्वरूप क्या है ?

उत्तर—आत्मा रूपी निर्मल तेज में निश्चय (विश्वास) करना निश्चय सम्यग्दर्शन है, उसी तेज में जानपना निश्चयज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान स्वरूप में स्थिर रहना सम्यग्चारित्र है।