03. बिम्ब ( मूर्ति ) परीक्षा प्रकरण

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बिम्ब परीक्षा प्रकरण

द्वार गाथा—

इअ गिहलक्खण भावं भणिय भणामित्थ बिंबपरिमाणं।
गुणदोसलक्खणाइं सुहासुहं जेण जाणिज्जा१।।१।।

प्रथम गृहलक्षण भाव को मैंने कहा। अब बिम्ब (प्रतिमा) के परिमाण को तथा इसके गुणदोष आदि लक्षणों को मैं (पेâरु) कहता हूँ कि जिससे शुभाशुभ जाना जाय।।१।।

मूर्ति के स्वरूप में वस्तु स्थिति—

छत्तत्तयउत्तारं भावकवोलाओ सवणनासाओ।

सुहयं जिणचरणग्गे नवग्गहा जक्खजक्खिणिया।।२।।

जिनमूर्ति के मस्तक, कपाल, कान और नाक के ऊपर बाहर निकले हुए तीन छत्र का विस्तार होता है, तथा चरण के आगे नवग्रह और यक्ष यक्षिणी होना सुखदायक है।।२।।

मूर्ति के पत्थर में दाग और ऊँचाई का फल—

बिंबपरिवारमज्जे सलस्स य वण्णसंकरं न सुहं।

समअंगुलप्पमाणं न सुंदरं हवइ लहहयासि....।।३।।

प्रतिमा का और इसके परिकर का पाषाण वर्णासंकर क्रमवाला होवे तो अच्छा नहीं। इसलियेद पाषाण की परीक्षा करके बिना दाग का पत्थर मूर्ति बनाने के लिए लाना चाहिए। प्रतिमा यदि सम अंगुल—दो चार छ: आठ दस बारह इत्यादि बेकी अंगुल ऊँचाई की बनवावें तो कभी भी अच्छी नहीं होती, इसलिये प्रतिमा विषम अंगुल—एक तीन पाँच सात नव ग्यारह इत्यादि एकी अंगुल ऊँचाई की बनाना चाहिये।।३।। मूर्ति के किस किस स्थान पर रेखा (दाग) न होने चाहिये, उसको वसुनंदिकृत प्रतिष्ठासार में कहा है-

‘‘हृदये मस्तके भाले अंशयो: कर्णयोर्मुखे।

उदरे पृष्ठसंलग्ने हस्तयो: पदयोरपि।।
एतेष्वङ्गेषु सर्वेषु रेखा लाञ्छननीलिका।
बिम्बानां यत्र दृश्यन्ते त्यजेत्तानि विचक्षण:।।
अन्यस्थानेषु मध्यस्था त्रासफाटविवर्जिता।
निर्मलस्निग्घशांता च वर्णसारूप्यशालिनी:।।

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हृदय, मस्तक, कपाल, दोनों स्वंध, दोनों कान, मुख, पेट, पृष्ठ भाग, दोनों हाथ और दोनों पग इत्यादिक प्रतिमा के किसी अंग पर अथवा सब अंगों में नीले आदि रंगवाली रेखा होवे तो उस प्रतिमा को पंडित लोग अवश्य छोड़ दें। उक्त अंगों के सिवा दूसरे अंगो पर होवे तो मध्यम है। परन्तु खराब, चीरा आदि दूषणों से रहित, स्वच्छ, चिकनी और ठंडी ऐसी अपने वर्ण सदृश रेखा होवे तो दोषवाली नहीं है।

पद्मासन में बैठी मूर्ति के अंग विभाग—

भालं नासा वयण गीव हियय नाहि गुज्झ जाणू अ।

आसीण बिंबमानं पुव्वविही अंकसंखाई।।८।।

कपाल, नासिका, मुख, गर्दन, हृदय, नाभि, गुह्या और जानु ये आठ अंग बैठी प्रतिमा के हैं, इनका मान पहले कहा है उसी तरह समझना। अर्थात् कपाल, चार, नासिका पाँच, मुख चार, गला तीन, गले से हृदय तक बारह, हृदय से नाभि तक बारह, नाभि से गुह्या (इंद्रिय) तक बारह और जानु (घुटना) भाग चार अंगुल, इस प्रकार छप्पन अंगुल बैठी प्रतिमा का मान है।।८।। दिगम्बराचार्य श्री वसुनंदि कृत प्रतिष्ठासार में दिगम्बर जिनमूर्ति का स्वरूप इस प्रकार है-

‘‘तालमात्रं मुखं तत्र ग्रीवाधश्चतुरंगुलम्।

कण्ठतो हृदयं यावद् अंतरं द्वादशांगुलम्।।
तालमात्रं ततो नाभि-र्नाभिर्मेढ्रान्तरं मुखम्।
मेढ्रजान्वंतरं तज्ज्ञै-र्हस्तमात्रं प्रकीत्र्तितम्।।
वेदागुलं भवेज्जानु-र्जानुगुल्फान्तरंकर:।
वेदांगुलं समाख्यातं गुल्फपादतलान्तरम्।।

मुख की ऊँचाई बारह अंगुल, गला की ऊँचाई चार अंगुल, गले से हृदय तक का अंतर बारह अंगुल, हृदय से नाभी तक का अंतर बारह अंगुल, नाभि से लिंग तक अंतर बारह अंगुल, लिंग से जानु तक अंतर चौबीस अंगुल, जानु (घुटना) की ऊँचाई चार अंगुल,

जानु से गुल्फ (पैर की गांठ) तक अंतर चौबीस अंगुल और गुल्फ से पैर से तल तक अंतर चार अंगुल, इस प्रकार कायोत्सर्ग खड़ी प्रतिमा की ऊँचाई कुल एक सौ आठ (१०८) अंगुल है।

‘‘रादशांगुलविस्तीर्ण—मायतं द्वादशांगुलम्।

मुखं कुर्यात् स्वकेशांतं त्रिधा तच्च यथाक्रमम्।।
वेदांगुलमायतं कुर्याद् ललाटं नासिकां मुखम्।

बारह अंगुल विस्तार में और बारह अंगुल लंबाई में केशांत भाग तक मुख करना चाहिए। उसमें चार अंगुल लंबा ललाट, चार अंगुल लंबी नासिका और चार अंगुल मुख दाढी तक बनाना।

‘‘केशस्थानं जिनेन्द्रस्य प्रोत्तं पंचांगुलायतम्।

उष्णीषं च ततो ज्ञेय-मंगुलद्वयमुन्नतम्।।

जिनेश्वर का केश स्थान पाँच अंगुल लंबा करना। उसमें उष्णीष (शिखा) दो अंगुल ऊँची और तीन अंगुल केश स्थान उन्नत बनाना चाहिए।

पद्मासन से बैठी प्रतिमा का स्वरूप—

‘‘ऊध्र्वस्थितस्य मानाद्र्ध-मुत्सेधं परिकल्पयेत्।

पर्यज्र्मपि तावत्तु तिर्यगायामसंस्थितम्।।

कार्योत्सर्ग खड़ी प्रतिमा के मान से पद्मासन से बैठी प्रतिमा का मान आधा अर्थात् चौवन (५४) अंगुल जानना। पद्मासन से बैठी प्रतिमा के दोनों घुटने तक सूत्र का मान, दाहिने घुटने से बांये कंधे तक और बांये घुटने से दाहिने कंधे तक इन दोनों तिरछे सूत्रों का मान, तथा गद्दी के ऊपर से केशांत भाग तक लंबे सूत्र का मान, इन चारों सूत्रों का मान बरावर-बरावर होना चाहिये ऐसी पद्मासन बैठी मूर्ति बनाना।

मूर्ति के प्रत्येक अंग विभाग का मान—

मुहक्तमलु चउदसंगुलु कन्नंतरि वित्थरे दहग्गीवा।

छत्तीस-उरपएसो सोलहकडि सोलतणु पिडं।।९।।

दोनों कानों के अंतराल में मुख कमल का विस्तार चौदह अंगुल है। गले का विस्तार दस अंगुल, छाती प्रदेश छत्तीस अंगुल, कमर का विस्तार सोलह अंगुल और तनुपिंड (शरीर की मोटाई) सोलह अंगुल है।।९।।

कन्नु दह तिन्नि वित्थरि हिट्ठि इक्कु आधारे।

केसंतवड्ढु समुसिरु सोयं पुण नयणरेहसमं।।१०।।

कान का उदय दश भाग और विस्तार तीन भाग, कान की लोलक अढाई भाग नीची और एक भाग कान का आधार है। केशांत भाग तक मस्तक के बराबर अर्थात् नयन क रेखा के समानान्तर तक ऊँचा कान बनाना चाहिये।।१०।।

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नक्कसिहागब्भाओ एगंतरि चक्खु चउरदीहत्ते।

दिवड्ढुदइ इक्कु डोलइ दुभाइ भउ हट्ठु छद्दीहे।।११।।

नासिका की शिखा के मध्य गर्भसूत्र के एक एक भाग दूर आँख रखना चाहिये। आँख चार भाग लंबी और डेढ़ भाग चौड़ी, आँख की काली कीकी एक भाग, दो भाग की भृकुटी और आँख के नीचे का (कपोल) भाग छ: अंगुल लंबा रखना चाहिए।।११।।

नक्कु तिवित्थरि दुदए पिंडे नासग्गि इक्कु अद्धु सिहा।

पण भाय अहर दीहे वित्थरि एगंगुलं जाण।।१२।।

नासिका विस्तार में तीन भाग, दो भाग उदय में, नासिका का अग्र भाग एक भाग मोटा और अद्र्धभाग की नाक की शिखा रखना चाहिए। होंठ की लंबाई पाँच भाग और विस्तार एक अंगुल का जानना चाहिए।।१२।।

पण-उदइ चउ-वित्थरि सिरिवच्छं बंभसुत्तमज्झम्मि।

दिवड्ढंगुलु थणवट्टं वित्थरं उंडत्ति नाहेगं।।१३।।

ब्रह्मसूत्र के मध्य भाग में छाती में पाँच भाग के उदयवाला और चार भाग के विस्तारवाला श्रीवत्स करना। डेढ़ अंगुल के विस्तार वाला गोल स्तन बनाना और एक एक भाग विस्तार में गहरी नाभि करना चाहिए।।१३।।

सिरिवच्छ सिहिणकक्खंतरम्मि तह मुसल छपण अट्ठ कमे।

मुणि-चउ-रवि-वसु-वेया कुहिणी मणिबंधु जंघ जाणु पयं।।१४।।

श्रीवत्स और स्तन का अंतर छ: भाग, स्तन और काँख का अंतर पाँच भाग, मुसल (स्वंध) आठ भाग, कुहनी सात अंगुल, मणिबंध चार अंगुल, जंघा बारह भाग, जानु आठ भाग और पैर की एडी चार भाग इस प्रकार सब का विस्तार जानना।।१४।।

थणसुत्तअहोभाए भुयबारसअंस उवरि छहि कंधं।

नाहीउ किरइ वट्टं वंधाओ केसअंताओ।।१५।।

स्तनसूत्र से नीचे के भाग में भुजा का प्रमाण बारह भाग और स्तनसूत्र के ऊपर स्वंध छ: भाग समझना। नाभि स्वंध और केशांत भाग गोल बनाना चाहिये।।१५।।

कर-उयर-अंतरेगं चउ-हिवत्थरि नंददीहि उच्छंगं।

जलवहु दुदय तिवित्थरि कुहुणी कुच्ंिदतरे तिन्नि।।१६।।

हाथ और पेट का अंतर एक अंगुल, चार अंगुल के विस्तारवाला और नव अंगुल लंबा ऐसा उत्संग (गोद) बनाना। पलांठी से जल निकलने के मार्ग का उदय दो अंगुल और विस्तार तीन अंगुल करना चाहिये। कुहनी और कुक्षी का अंतर तीन अंगुल रखना चाहिये।।१६।।

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बंभसुत्ताउ पिंडिय छ-गीव दह-कन्नु दु-सिहण दु-भालं।

दुचिबुक सत्त भुजोवरि भुयसंघी अट्ठपयसारा।।१७।।

ब्रह्मसूत्र (मध्यगर्भसूत्र) से पिंडी तक अवयवों के अद्र्ध भाग-छ: भाग गला, दश भाग कान, दो भाग शिखा, दो भाग कपाल, दो भाग दाढ़ी, सात भाग भुजा के ऊपर की भुजसंधि और आठ भाग पैर जानना।।१७।।

जाणुअमुहसुत्ताओ चउदस सोलस अढारपइसारं।

समसुत-जाव-नाही पयकंकण-जाव छब्भायं।।१८।।

दोनों घुटनों के बीच में एक तिरछा सूत्र रखना और नाभि से पैर के वंकण के छ:भाग तक एक सीधा समसूत्र तिरछे सूत्र तक रखना। इस समसूत्र का प्रमाण पैरों के कंकण तक चौदह, पिंडी तक सोलह और जानु तक अठारह भाग होता है। अर्थात् दोनों परस्पर घुटने तक एक तिरछा सूत्र रखा जाय तो यह नाभि से सीधे अठारह भाग दूर रहता है।।१८।

पइसारगब्भरेहा पनरसभाएहिं चरणअंगुट्ठं।

दीहंगुलीय सोलस चउदसि भाए कणिट्ठिया।।१९।।

चरण के मध्य भाग की रेखा पंद्रह भाग अर्थात् एड़ी से मध्य अंगुली तक पंद्रह अंगुल लंबा, अंगूठे तक सोलह अंगुल और कनिष्ठ (छोटी) अंगुली तक चौदह अंगुल इस प्रकार चरण बनाना चाहिए।।१९।।

करयलगब्भाउ कमे दीहंगुलि नंदे अट्ठ पक्खिमिया।

छच्च कणिट्ठिय भणिया गीवुदए तिन्नि नायव्वा।।२०।।

करतल (हथेली) के मध्य भाग से मध्य की लंबी अंगुली तक नव अंगुल, मध्य अंगुली के दोनों तरफ की तर्जनी और अनामिका अंगुली तक आठ आठ अंगुल और कनिष्ठ अंगुली तक छ: अंगुल, यह हथेली का प्रमाण जानना। गले का उदय तीन भाग जानना।।२०।।

मज्झि महत्थंगुलिया पणदीहे पक्खिमी अ चउ चउरो।

लहु-अंगुलि-भयतियं नह-इक्किक्वं ति-अंगुट्ठं।।२१।।

मध्य की बड़ी अंगुली पाँच भाग लंबी, बगल की दोनों (तर्जनी और अनामिका) अंगुली चार चार भाग लंबी, छोटी अंगुली तीन भाग लंबी और अंगूठा तीन भाग लंबा करना चाहिए। सब अंगुलियों के नख एक एक भाग करना चाहिये।।२१।।

अंगुट्ठसहियकरयलवट्टं सत्तंगुलस्स वित्थारो।

चरणं सोलसदीहे तयद्धि वित्थिन्न चउरुदए।।२२।।

अंगूठे के साथ करतलपट का विस्तार सात अंगुल करना। चरण सोलह अंगुल लंबा, आठ अंगुल चौड़ा और चार अंगुल ऊँचा (एड़ी से पैर की गांठ तक) करना।।२२।।

गीव तह कन्न अंतरि खणे य वित्थरि दिवड्ढु उदइ तिगं।

अंचलिय अट्ठ वित्थरि गद्दिय मुह जाव दीहेण।।२३।।

गला तथा कान के अंतराल भाग का विस्तार डेड़ अंगुल और उदय तीन अंगुल करना। अंचलिका (लंगोट) आठ भाग विस्तार में और लंबाई में गादी के मुख तक लंबा करना।।२३।।

केसंतसिहा गद्दिय पंचट्ठ कमेण अंगुलं जाण।

पउमुड्ढरेहचक्वं करचरण-विहूसियं निच्चं।।२४।।

केशांत भाग के शिखा से उदय तक पांच भाग और गादी का उदय आठ भाग जानना। पद्म (कमल) ऊध्र्व रेखा और चक्र इत्यादि शुभ चिन्हों से हाथ और पैर दोनों सुशोभित बनाना चाहिए।।२४।।

ब्रह्मसूत्र का स्वरूप—

नक्क सिरिवच्छ नाही समगब्भे बंभसुतु जाणेह।

तत्तो अ सलयमाणं परिगरबिंबस्स नायव्वं।।२५।।

जो सूत्र प्रतिमा के मध्य-गर्भ भाग से लिया जाय, यह शिखा, नाक, श्रीवत्स और नाभि के बराबर मध्य में आता है, इसको ब्रह्मसूत्र कहते हैं। अब इसके बाद परिकरवाले बिंब का समस्त प्रमाण जानना।।२५।।

परिकर का स्वरूप—

सिंहासणु बिंबाओ दिवड्ढओं दीहि वित्थरे अद्धो।

पिंडेण पाउ घडियो रूवग नव अहव सत्त जुओ।।२६।।

सिंहासन लंबाई में मूर्ति से डेढ़ा, विस्तार में आधा और मोटाई में पाव भाग होना चाहिये। तथा गज सिंह आदि रूपक नव अथवा सात युक्त बनाना चाहिये।।२६।।

उभयदिसि जक्खजक्खिणि केसरिगय चमर मज्झि-चक्कधरी।

चउदस बारस दस तिय छ भाय कमि इअ भवे दीहं।।२७।।

सिंहासन में दो तरफ यक्ष और यक्षिणी अर्थात् प्रतिमा के दाहिनी और यक्ष और बाँयी और यक्षिणी, दो सिंह, दो हाथी, दो चामर धारण करने वाले और मध्य में चक्र को धारणा करने वाली चव्रेश्वरी देवी बनाना। इनमें प्रत्येक का नाप इस प्रकार है—चौदह चौदह भाग के प्रत्येक यक्ष और यक्षिणी, बारह बारह भाग के दो सिंह, दश दश भाग के दो हाथी, तीन २ भाग के दो चाँवर करने वाले, और छ: भाग की मध्य में चव्रेश्वरी देवी, एवं कुल ८४ भाग लम्बा सिंहासन हुआ।।२७।।

चक्कधरी गरुडंका तस्साहे धम्मचक्क-उभयदिसं।

हरिणजुअं रमणीयं गद्दियमज्झम्मि जिणचिण्हं।।२८।।

सिंहासन के मध्य में जो चव्रेश्वरी देवी है वह गरुड की सवारी करने वाली है, उसकी चार भुजाओं के ऊपर की दोनों भुजाओं में चक्र तथा नीचे की दाहिनी भुजा में वरदान और बांयी भुजा में विजोरा रखना चाहिए। इस चव्रेश्वरी देवी के नीचे एक धर्मचक्र बनाना, इस धर्मचक्र के दोनों तरफ सुन्दर एक एक हीरण बनाना और गादी के मध्य भाग में जिनेश्वर भगवान का चिन्ह करना चाहिए।।२८।।

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चउ कणइ दुन्नि छज्जइ बारस हत्थिहिं दुन्नि अह कणए।

अड अक्खरवट्टीए एयं सीहासणस्सुदयं।।२९।।

चार भाग का कणपीठ (कणी) दो भाग का छज्जा, बारह भाग का हाथी आदि रूपक, दो भाग की कणी और आठ भाग अक्षर पट्टी एवं कुल २८ भाग सिंहासन का उदय जानना चाहिए।।२९।।

परिकर के पखवाडे (बगल के भाग) का स्वरूप—

गद्दियसम-वसु-भाया तत्तो इगतीस-चमरधारी य।

तोरणसिरं दुवालस इअ उदयं पक्खवायाण।।३०।।

प्रतिमा की गद्दी के बराबर आठ भाग ऊँचाई में चँवरधारी काउस्सग्गीये की गादी करना, इसके ऊपर इकतीस भाग के चामर धारण करने वाले देव अथवा काउस्सग ध्यान में खड़ी प्रतिमा करना और इसके ऊपर तोरण के शिर तक बारह भाग रखना, एवं कुल इक्कावन भाग पखवाड़े का उदयमान समझना।।३०।।

सोलसभाए रूवं थुंभुलिय-समेय छहि वरालीय।

इअ बितरि बावीसं सोलसपिंडेण पखवायं।।३१।।

सोलह भाग थंभली समेत रूप का अर्थात् दो दो भाग की दो थंभली और बारह भाग का रूप, तथा छह भाग की वरालिका (वरालक के मुख आदि की आकृति) एवं कुल पखवाड़े का विस्तार बाईस भाग और मोटाई सोलह भाग है। यह पखवाड़े का मान हुआ।।३१।।

परिकर के ऊपर के डउला (छत्रवटा) का स्वरूप—

छत्तद्धं दसभायं पंकयनालेग तेरमालधरा।

दो भाए थंथुलिए तहट्ठ वंसधर-वीणधरा।।३२।।
तिलयमज्झम्मि घंटा दुभाय थंभुलिय छच्चि मगरमुहा।
इअ उभयदिसे चुलसी-दीहं डउलस्स जाणेह।।३३।।

आधे छत्र का भाग दश, कमलनाल एक भाग, माला धारण करने वाले भाग तेरह, थंभली दो भाग, बंसी और वीणा को धारण करनेवाले अथवा बैठी प्रतिमा का भाग आठ, तिलक के मध्य में घंटा (घूमटी) दो भाग थंमली और छ; भाग मगरमुख एवं एक तरफ के ४२ भाग और दूसरी तरफ के ४२ भाग, ये दोनों मिलकर कुल चौरासी भाग डउला का विस्तार जानना।।३२-३३।।

चउवीसि भाइ छत्तो बारस तस्सुदइ अट्ठि संखधरो।

छहि वेणु पत्तवल्ली एवं डउलुदये पन्नासं।।३४।।

चौबीस भाग के ऊपर छत्रत्रय का उदय बारह भाग, इसके ऊपर आठ भाग का शंख धारणा करने वाला और इसके ऊपर छ: भाग के वंशपत्र और लता, एवं कुल पचास भाग डउला का उदय जानना।।३४।।

छत्तत्तयवित्थारं वीसंगुल निग्गमेण दह-भायं।

भामंडलवित्थारं बावीसं अट्ठ पइसारं।।३५।।

प्रतिमा के मस्तक पर के छत्रत्रय का विस्तार बीस अंगुल (भाग) और निर्गम दस भाग करना। भामंडल का विस्तार बाईस भाग और मोटाई आठ भाग करना।।३।।

मालधर सोलसंसे गइंद अट्ठारसम्मि ताणुवरे।

हरिणिंदा उभयदिसं तओ अ दुदुहि असंखीय।।३६।।

दोनों तरफ माला धारण करने वाले इंद्र सोलह सोलह भाग के और उनके ऊपर दोनों तरफ अठारह-अठारह भाग के एक एक हाथी, उन हाथियों के ऊपर बैठे हुए हरिण गमेषीदेव बनाना, उनके सामने दुंदुभी बजाने वाले और मध्य में छत्र के ऊपर शंख बजाने वाला बनाना चाहिए।।३६।।

बिंबद्धि डउलपिंडं छत्तसमेयं हवइ नायव्वं।

थणसुत्तसमादिट्ठी चामरधारीण कायव्वा।।३७।।

छत्रत्रय समेत डउला की मोटाई प्रतिमा से आधी जानना। पखवाड़े में चामर धारण करने वाले की अथवा काउस्सग ध्यानस्थ प्रतिमा की दृष्टि मूलनायक प्रतिमा के स्तन सूत्र के बराबर रखना चाहिए।।३७।।

जइ हुंति पंच तित्था इमेिह भाएहिं तेवि पुण कुज्जा।

उस्सग्गियस्स जुअलं िबबजुगं मूलबिंवेगं।।३८।।

पखवाडे में जहाँ दो चामर धारण करने वाले हैं, उस ही स्थान पर दो काउस्सग ध्यानस्थ प्रतिमा तथा डउला में जहाँ वंश और वीणा धारण करने वाले हैं, वहीं पर पद्मासनस्थ बैठी हुई दो प्रतिमा और एक मूलनायक, इसी प्रकार पंचतीर्थों यदि परिकर में करना होवे तो पूर्वोक्त जो भाग चामर वंश और वीणा धारण करने वाले के कहें हैं, उसी भाग प्रमाण से पंचतीर्थों भी बनाना चाहिए।।३८।।

एक सौ वर्ष से अधिक की प्रतिमा के शुभाशुभ फल—

वरिससयाओं उड्ढं जं बिंबं उत्तमेहिं संठवियं।

विअलंगु वि पूइज्जइ तं बिंबं निप्फलं न जओ।।३९।।

जो प्रतिमा एक सौ वर्ष के पहले उत्तम पुरुषों ने स्थापित की हुई होवे वह यदि विकलांग (बेड़ोल) होवे अथवा खंडित होवे तो भी उस प्रतिमा को पूजना चाहिए। पूजन का फल निष्फल नहीं जाता।।३९।।

मुह-नक्क-नयण-नाणी-कडिभंगे मूलनायगं चयह।

आहरण-वत्थ-परिगर-चिण्हायुहभंगि पूइज्जा।।४०।।

मुख, नाक, नयन, नाभि और कमर इन अंगों में से कोई अंग खंडित हो जाय तो मूलनायक रूप में स्थापित की हुई प्रतिमा का त्याग करना चाहिये। किन्तु आभरण, वस्त्र, परिकर, चिन्ह और आयुध इनमें से किसी का भंग हो जाय तो पूजन कर सकते हैं।।४०।।

धाउलेवाइबिंबं विअलंगं पुण वि कीरए सज्जं।

कट्ठरयणसेलमयं न पुणो सज्जं च कईयावि।।४१।।

धातु (सोना, चांदी, पित्तल आदि) और लेप (चूना, र्इंट, माटी आदि) की प्रतिमा यदि अंग हीन हो जाय तो उसी को दूसरी बार बना सकते हैं। किन्तु काष्ठ, रत्न और पत्थर की प्रतिमा यदि खंडित हो जाय तो उसी ही को कभी भी दूसरी बार नहीं बनाना चाहिए।।४१।। आचारदिनकर में कहा है कि—

‘‘धातुलेप्यमयं सर्व व्यङ्गं सस्कारमर्हति।

काष्ठपाषाणनिष्पन्नं संस्कारार्ह पुनर्नहिं।।
प्रतिष्ठिते पुनर्बिम्बे संसकार: स्यान् कर्हिचित्।
संस्कारे च कृते कार्या प्रतिष्ठा ताद्दशी पुन:।
संस्कृते तुलिते चैव दुष्टस्पृष्टे परीक्षिते।
हृते बिम्बे च तिङ्गे च प्रतिष्ठा पुनरेव हि।।’’

धातु की प्रतिमा और र्इंट, चूना, भट्टी आदि की लेपमय प्रतिमा यदि विकलांग हो जाय अर्थात् खंडित हो जाय तो वह फिर संस्कार करने योग्य है। अर्थात् उस ही को फिर बनवा सकते हैं। परन्तु लकड़ी अथवा पत्थर की प्रतिमा खंडित हो जाय तो फिर संस्कार के योग्य नहीं है। एवं प्रतिष्ठा होने के बाद कोई भी प्रतिमा का कभी संस्कार नहीं होता है, यदि कारणवश कुछ संस्कार करना पड़ा तो फिर पूर्ववत् ही प्रतिष्ठा करानी चाहिये। कहा है कि—प्रतिष्ठा होने के बाद जिस मूर्ति का संस्कार करना पड़े, तोलना पड़े, दुष्ट मनुष्य का स्पर्श हो जाय, परीक्षा करनी पड़े अथवा चोर चोरी कर ले जाये तो फिर उसी मूर्ति की पूर्ववत् ही प्रतिष्ठा करानी चाहिए।

घर मंदिर में पूजन लायक मूर्ति का स्वरूप—

पाहाणलेवकट्ठा दंतमया चित्तलिहिय जा पडिमा।

अप्परिगरमाणाहिय न सुंदरा पूयमाणगिहे।।४२।।

पाषाण, लेप, काष्ठ, दांत और चित्राम की जो प्रतिमा है, वह यदि परिकर से रहित होवे और ग्यारह अंगुल के मान से अधिक होवे तो पूजन करने वाले के घर में अच्छा नहीं।।४२।। परिकरवाली प्रतिमा अरिहंत की और बिना परिकर की प्रतिमा सिद्ध अवस्था की है। सिद्ध अवस्था की प्रतिमा घर मंदिर में धातु के सिवाय पत्थर, लेप, लकड़ी, दांत या चित्राम की बनी हुई होवे तो नहीं रखना चाहिये। अरिहंत की मूर्र्ति के लिए भी श्रीसकलचन्द्रोपाध्यायकृत प्रतिष्ठाकल्प में कहा है कि—

‘‘मल्ली नेमी वीरो गिहभवणो सावए ण पूइज्जइ।

इगवीसं तित्थयरा संतगरा पूइया वंदे।।’’

मल्लीनाथ, नेमीनाथ और महावीर स्वामी ये तीन तीर्थंकरों की प्रतिमा श्रावक को घरमंदिर में नहीं पूजना चाहिए। किन्तु इक्कीस तीर्थंकरों की प्रतिमा घरमंदिर में शांतिकारक पूजनीय और वंदनीय हैं। कहा है कि—

‘‘नेमिनाथो वीरमल्ली-नाथौ वैराग्यकारका:।

त्रयो वै भवने स्थाप्या न गृहे शुभदायका:।।’’

नोमिनाथ स्वामी, महावीर स्वामी और मल्लीनाथ स्वामी ये तीनों तीर्थंकर वैराग्य कारक है, इसलिये इन तीनों को प्रसाद (मंदिर) में स्थापित करना शुभ कारक है, किन्तु घरमंदिर में स्थापित करना शुभकारक नहीं है।

इक्वंगुलाइ पडिमा इक्कारस जाव गेहि पूइज्जा।

उड्ढं पासाइ पुण इअ भणियं पुव्वसूरीहिं।।४३।।

घर मंदिर में एक अंगुल से ग्यारह अंगुल के नाप तक की प्रतिमा पूजना चाहिये, इससे अर्थात् ग्यारह अंगुल से अधिक बड़ी प्रतिमा प्रासाद में (मंदिर में) पूजना चाहिये ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है।।४३।।

नह-अंगुलीअ-बाहा-नासा-पय-भंगिणु क्कमेण फलं।

सत्तुभयं देसभंगे बंधण-कुलनास-दव्वक्खयं।।४४।।

प्रतिमा के नख, अंगुली, बाहु, नासिका और चरण इनमें से कोई अंग खंडित हो जाय तो शत्रु का भय, देश का विनाश, बंधनकारक, कुल का नाश और द्रव्य का क्षय, ये क्रमश: फल होता है।।४४।।

पयपीढचिण्हपरिगर-भंगे जनजाणभिच्चहाणिकमे।

छत्तसिरिवच्छसवणे लच्छी-सुह-बंधवाण खयं।।४५।।

पादपीठ चिन्ह और परिकर इनमें से किसी का भंग हो जाय तो क्रमश: स्वजन, वाहन और सेवक की हानि होवे। छत्र, श्रीवत्स और कान इनमें से किसी का खंडन हो जाय तो लक्ष्मी, सुख और बंधु का क्षय होवे।।४५।।

बहुदुक्ख वक्कनासा हस्संगा खयंकरी य नायव्वा।

नयणनासा कुनयणा अप्पमुहा भोगहाणिकरा।।४६।।

यदि प्रतिमा वक्र (टेढी) नाकवाली होवे तो बहुत दु:खकारी है। ह्रस्व (छोटे) अवयववाली होवे तो क्षय करने वाली जानना। खराब नेत्रवाली होवे तो नेत्र का विनाश कारक जानना और छोटे मुखवाली होवे तो भोग की हानिकारक जानना।।४६।।

कडिहीणायरियहया सुयबंधवं हणइ हीणजंघा य।

हीणासणरिद्धिहया धणक्खया हीणकरचरगा।।४७।।

प्रतिमा यदि कटि हीन होवे तो आचार्य का नाशकारक है। हीन जंघावाली होवे तो पुत्र और मित्र का क्षय करें। हीन आसनवाली होवे तो रिद्धि का विनाश कारक है। हाथ और चरण से हीन होवे तो धन का क्षय करने वाली जानना।।४७।।

उत्ताणा अत्थहरा वंकग्गीवा सदेसभंगकरा।

अहोमुहा य सचिंता विदेसगा हवइ नीचुच्चा।।४८।।

प्रतिमा यदि ऊध्र्व मुखवाली होवे तो धन का नाशकारक है, टेढी गरदनवाली होवे तो स्वदेश का विनाश करने वाली है। अधोमुखवाली होवे तो चिन्ता उत्पन्न करनेवाली और ऊँचे नीचे मुखवाली होवे तो विदेशगमन करानेवाली जानना।।४८।।

विसमासणा-वाहिकरा रोरकरऽण्णायदव्वनिप्पन्ना।

हीणाहियंगपडिमा सपक्खपरपक्खकट्ठकरा।।४९।।

प्रतिमा यदि विषम आसनवाली होेवे तो व्याधि करनेवाली है। अन्याय से पैदा किये हुए धन बनवाई गई होवे तो वह प्रतिमा दुष्काल करने वाली जानना। न्यूनाधिक अंगवाली होवे तो स्वपक्ष को और परपक्ष को कष्ट देने वाली है।।४९।।

पडिमा रउद्द जा सा कारावयं हंति सिप्पि अहियंगा।

दुब्बलदव्वविणासा किसोअरा कुणइ दुब्भिक्खं।।५०।।

प्रतिमा यदि रौद्र (भयानक) होवे तो कराने वाले का और अधिक अंग वाली होवे तो शिल्पी का विनाश करें। दुर्बल अंगवाली होवे तो द्रव्य का विनाश करें और पतले उदरवाली होवे तो दुर्भिक्ष करें।।५०।।

उड्ढमुही धणनासा अप्पूया तिरिअदिट्ठि विन्नेया।

अइघट्टदिट्ठि असुहा हवइ आहेदिाट्ठ विग्घकरा।।५१।।

प्रतिमा यदि ऊध्र्व मुखवाली होवे तो धन का नाश करने वाली है। तिरछी दृष्टिवाली होवे तो अपूजनीय रहे। अतत गाढ दृष्टिवाली होवे तो अशुभ करने वाली है और अधोदृष्टि होवे तो विघ्नकारक जानना।।५१।।

चउभवसुराण आयुह हवंति केसंत उप्परे जइ ता।

करणकरावणथप्पणहाराण प्पाणदेसहया।।५२।।

चार निकाय के (भुवनपति, व्यंतर, ज्योतिषि और वैमानिक ये चार योनि में उत्पन्न होने वाले) देवों की मूर्ति के शस्त्र यदि केश के ऊपर तक चले गये हों तो ऐसी मूर्ति करने वाले, कराने वाले और स्थापन करने वाले के प्राण का और देश का विनाशकारक होती है।।५२।।