03. मंगलाचरण.

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मंगलाचरण

सुकर्मभूमेः प्रथमोपदेश्टिन्

श्री नाभिराज्ञष्च सुधन्यपुत्र।
‘षट्कर्मणामाद्य प्रवत्र्तकोऽसि
                    मिथ्यान्धकारं दूरं कुरुश्व ।।1।।

श्रीशान्तिकुन्थ्वरजिनान् तीर्थेषान्नमाम्यहं भक्त्या।
             येशां कल्याणकेभ्यः ख्यातेयं हस्तिनानगरी।। ।।2।।

श्रीवर्धमानवीरं भावविषुद्ध्यै नमामि तीर्थेशं।
              अतिवीरमहावीरं सन्मतिनाथं परमचरमम्।। ।।3।।

तच्चरणाम्बुजरक्तो श्रमणप्रवणः कुन्दकुन्दोऽभूत्।
              व्यवहारनिश्चयज्ञः खलूद्धर्ता मूलसंघस्य।। ।।4।।

पाहुडग्रन्थानरचयदध्यात्मसंभरितवचनकलषान्।
          प्रणमामि तं मुनीन्द्रं निर्ग्रन्थयतिसंघशिखरसमम्।। ।।5।।

तस्य कृतिः नियमसारः विश्रुतः श्रुतबहुविदां मध्ये।
          यस्मिन्स्तु मोक्षमार्गो प्रदर्षितः नियमिनां सम्यक्।। ।।6।।


स्याद्वादचन्द्रिकेयं तस्योपरि सान्वयं मृदुमधुरटीका।
रचितार्याज्ञानमत्या प्रभवतु नियमाय भव्यानाम्।।
अस्याः गुणग्राहकेभ्य: परिशीलनमिदं मयारभते।
प्रकटीकर्तुं विषेशं टीकायाः गुणरिश्ठत्वम्।। (स्वोपज्ञ)

अर्थः-

कर्मभूमि के प्रथम उपदेष्टा तीर्थकर, राजा नाभिराय के धन्य पुत्र हे भगवान ऋषभदेव! आप असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प और वाणिज्य जीवनोपयोगी ‘षट्कर्मो के आद्य प्रवर्तक हैं, कृपा कर अज्ञान अन्धकार दूर करें। जिनके गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, चार कल्याणकों से प्रस्तुत हस्तिनागपुर प्रसिद्ध है उन श्री “शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ तीर्थंकर भगवन्तों को भक्ति से नमस्कार करता हूँ। मैं श्री वीर, महावीर, अतिवीर, सन्मति एवं वर्द्धमान नामों वाले अन्तिम तीर्थंकर भगवान को भाव विशुद्धि हेतु प्रणाम करता हूँ।

उन महावीर भगवान के चरण कमलों में अनुरक्त मुनिपुंगव आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी हुए। वे व्यवहार और निश्चयनय के ज्ञाता एवं मूल निर्ग्रन्थ जैन श्रमण संघ के उद्धार कर्ता थे। उन कुन्दकुन्द ने अध्यात्म से परिपूर्ण वचनामृत के कलशरूप चैारासी प्राभृत ग्रन्थों की रचना की थी। वे निर्ग्रन्थ दि० जैन श्रमण संघ के शिखरसम सर्वोपरि थे। उनको वन्दन करता हूँ। उनके द्धारा रचित ग्रन्थ नियमसार प्राभृत, बहुश्रुत विद्धानों में विख्यात है, जिसमें नियमधारी (रत्नत्रयधारी) मुनियों के लिए मोक्षमार्ग का उपदेश दिया गया है।

उस ग्रन्थ पर पू० आर्यिका ज्ञानमती माताजी के द्धारा रचित सान्वय कोमल एवं मधुर स्याद्वादचन्द्रिका नाम की टीका भव्यों के नियम (रत्नत्रय - सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के लिए साधन हो, सिद्धि प्रदान करें। इस टीका के गुण गौरव, गरिष्ठता को विशेष प्रकट करने के लिए इसके गुणग्राहकों हेतु मैं यह परिशीलन (शोधग्रन्थ) का लेखन प्रारम्भ करता हूँ।