03. वैदिक परंपरा और विवाह अनुष्ठान

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वैदिक परंपरा और विवाह अनुष्ठान

वैदिक संस्कृति में जीवन की पूर्णता का मूल आधार विवाह को माना गया है। इसके बिना पूर्ण पुरुष (ब्रह्म) से मिल पाने की प्रतीति को लगभग असंभव माना गया है। वैदिक मान्यताओं के अन्तर्गत विवाह एक शारीरिक ही नहीं, आध्यात्मिक व्यवस्था भी है और शारीरिक सम्बन्ध, आध्यात्मिक सम्बन्ध के बिना अपूर्ण हैं। पत्नी, वर की सहधर्मचारिणी मानी जाती है तथा पति के साथ कत्र्तव्य एवं उत्तरदायित्व के निर्वहन में सहायक होती है। पाणिग्रहण संस्कार में मन्त्रों द्वारा देवताओं की पूजा की जाती है और उनका आशीर्वाद पाने की कामना की जाती है। यह संस्कार अग्नि के समक्ष सम्पन्न होता है। अग्नि धरती की जीवन शक्ति है एवं ईश्वर का प्रतीक है। यह पावक भी है एवं है दाहक भी, इसलिए यह माना जाता है कि विवाह संस्कार, विघ्नों का नाश करते हैं एवं अभिलिषित शुभ फल भी प्रदान करते हैं।

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विवाह रस्में एवं रीतियाँ विवाह हाथ (हल्दी हाथ, नाल तनना)—सर्वप्रथम गणनायक श्री गणेश जी को लग्न पत्रिका भेंट कर उनसे मांगलिक कार्यों को सफल करने की प्रार्थना की जाती है। स्त्रियाँ मेंहदी लगाती हैं, नाल तनती हैं, वर भी वधू के शृंगार के लिए नाल तनता है।

तेलवान — वह के मन—बुद्धि एवं शरीर को शुद्ध एवं प्रपुल्लित करने के लिए, घर के बड़े लोग उस पर हल्दी आटा, तेल, गुलाब जल, दही, शहद, मेंहदी आदि मंगल द्रव्य लगाते हैं। गोद भराई—दूल्हे की बुआ तथा बहनें, दुल्हन को तिलक करके अंगूठी एवं अन्य आभूषण पहनाती हैं तथा मिष्ठान आदि से गोद भर के उसे आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इसका आशय यह है कि दुल्हन धनी बने और पुत्रों की माता बने। वह कीर्तिमान हो सके और दूल्हे के साथ खड़े होने में सक्षम भी हो सके तथा अच्छे—बुरे दिनों में साथ रहे और गलत काम करने से उसे रोक सके।

टीका — दुल्हन का पति, परिवार के सदस्यों के मध्य मंगलमूर्ति श्री गणेश जी की पूजन करता है और उसके बाद दूल्हे का तिलक करके पूजा होती है।

भात — यह विवाह का एक प्रमुख अंग है। हिन्दू संस्कृति में भाई बहन के सम्बन्ध का विशेष महत्त्व है। इस मांगलिक अवसर पर मातृपक्ष के सभी सदस्य, वर के यहाँ उपस्थित होते हैं, तथा वर की माता अपने भाईयों—भाभियों का स्वजनों सहित तिलक कर स्वागत करती है।

कोरथ घुड़चढ़ी — कन्या पक्ष के कुछ सदस्य बारात आगमन के लिए प्रार्थना करने आते हैं, वर को तिलक कर पाणिग्रहण संस्कार के लिये आमंत्रित करते हैं। वर की भाभी, वर को काजल डालती हैं तथा छोटी बहनें नून राई करके, वर को बुरी नजरों से बचाती हैं। बहनें, वर की आरती उतारती हैं। फिर वह घोड़ी पर चढ़कर, मन्दिर से भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त कर, सपरिवार मित्रों के साथ, विवाह स्थल के लिये प्रस्थान करता है।

वरमाला—

जो सुखु भा सियमातु मन देखि राम वरवेषु।

सो न सकहि कहि कल्पसत सहस सारदासेषु।।

कर सरोज जयमाल सुहाई बिस्व विजय सोभा जेहिं छाई।
गांवहि छबि अवलोकि सहेली सिय जयमाल राम उर मेली।।

वधू की माता वर के आगमन पर, उसका स्वागत करती हैं। वर माला, वर—वधू मिलन का प्रतीक है। पहले वधू वर के गले में माला पहनाती है, बाद में वर, वधू को माला पहनाता है। दर्शकगण फूलों की वर्षा करते हैं। वरमाला का अर्थ, हाथों का मिलन, दिलों और आत्माओं का मिलन है। शहनाईयाँ बजती रहती है हंसी खुशी का माहौल बना रहता है।

मंगलाष्टक — विवाह का प्रारम्भ मङ्गलाष्टक से होता है। मन्त्रों के द्वारा शुभशक्तियों का आवाहन किया जाता है, ताकि विवाह संस्कार, शुभत्व के साथ सम्पन्न हो सवेंâ। मधुपर्व विधि—वधू के माता—पिता वर को मधुपर्व प्रदान करते हैं, जो शहद, घी एवं दही से बनता है। ये तीनों शुभ द्रव्य, माता—पिता की तरफ से, वर वधू को तीन प्रकार के आशीर्वाद प्रदान करने के प्रतीक हैं, जो इंगित करते हैं कि वर—वधू का जीवन शहद जैसा मीठा हो, वे परिवार से मिलकर रहें तथा वैवाहिक जीवन दही की तरह पवित्र एवं स्वच्छ हो।

पाणिग्रहण — वधू अपने मामा के साथ विवाह मण्डप में उपस्थित होती है एवं वर के दाहिने हाथ बैठती है। वधू के माता—पिता, अपनी कन्या का हाथ वर के हाथ में देते हुये उससे कहते हैं कि वे हमेशा ईश्वर को याद रखें, सबों के साथ सद्भावना तथा सहानुभूति से व्यवहार करते हुए अपने मन को पवित्र एवं स्थिर रखें तथा सुखी जीवन जिएँ। वर, वधू का दाहिना हाथ, यह कहते हुए ग्रहण करता है—मैं सौभाग्यत्व के लिए तेरा पाणिग्रहण करता हूँ। भग, सविता आदि देवों के सम्मुख तुझे, मेरे हाथ सौंपा है, जिससे हम अपने घर पर शासन करें। मैं यह हूँ तू वह है; तू वह है, मैं यह हूं, मैं सम हूं, तूं ऋक् है; मैं आकाश हूँ तू पृथ्वी है। आओ हम दोनों विवाह करें। हम अपनी शक्ति एक करें। हम सन्तान उत्पन्न करें। हमें अनेक दीर्घायु पुत्र प्राप्त हों। सौ शरद ऋतुओं पर्यन्त हमारे मन, प्रेम पूर्ण विशुद्ध तथा प्रकाशमान रहें; सौ शरद् ऋतुओं तक हम जीवन यापन करें और सौ शरद् ऋतुओं पर्यन्त, हमारे कानों (श्रवणेन्द्रिय) में सुनने की क्षमता हो। यह विधि कन्या का दायित्व तथा घर का भार संभालने का प्रतीक है। यह उत्तरदायित्व अत्यन्त पवित्र है।

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ग्रन्थिबन्धन — दूल्हे की चादर में दुल्हन के दुपट्टे को बांध दिया जाता है। इसमें एक विशेष ग्रन्थि लगायी जाती है, जिसमें हल्दी, चावल, सुपारी, दुर्वा, पुष्प, कुशा और द्रव्य होते हैं। धर्म कार्य हेतु ग्रन्थिबन्धन का विशेष महत्त्व है।

विवाह होम एवं लाजहोम — अग्निदेव ईश्वर के प्रतीक हैं। अग्नि में मन्त्रों के द्वारा अनेक आहूतियाँ डाली जाती हैं। ये देव विवाह की साक्षी हैं। अनेक प्रकार की इच्छित वस्तु, वर वधू को प्रदान करते हैं। वधू का भाई वधू के हाथ में खोई देता है एवं वधू उसके साथ, उसे अग्नि में समर्पित करती है। खोई (चावल) वधू के जीवन का प्रतीक है; जैसे धान को पहले एक जगह लगाकर फिर दूसरी जगह लगाया जाता है; वैसे ही, कन्या पिता के घर, फिर पति के घर में प्रवेश करती है और स्थापित हो जाती है।

गठजोड़ा—

सभी देवता और शुद्ध जल, हृदय हमारे एक करें।

वायुदेव भी इन हृदयों में, ऐक्य भाव ही सदा भरें।।

श्री गणेश उस लक्ष्मी को, और सरस्वती को करके प्रणाम।
पति—पत्नी की रक्षा हेतुक, यह गठजोड़ हो सुख का धाम।।

शिलापर पांव रखना — वधू को अग्नि के उत्तर भाग में ले जाकर, वर उसके दाएं हाथ को अंगूठा सहित पकड़ कर उसे पूर्वाभिमुख करके, उत्तर दिशा में रखी हुई शिला पर दाहिना पांव रखने के लिए कहता है। वह अनुरोधपूर्वक भावना अभिव्यक्त करता है कि :

शिला के ऊपर रखो चरण तुम, शिला सदृश तुम स्थिर बन जाओ।

बुरी दृष्टि से तुम्हें जो देखे, उनको नीचा तुम दिखलाओ।
शिला सदृश व्रत पर दृढ़ रहकर अपनी लाज बचाती रहना।
दुष्टजनों की दुष्टप्रवृतियाँ, तेजस्वी बनकर, कभी न सहना।।

सप्तपदी—

कुअंरु कुअंरि कलभावंरि देही, नयनलाभ सब सादर लेही।

जादू न वरनि मनोहर जोरी, जो उपमा कछु कहौ सो थोरी।।

प्रमुदित मुनिन्ह भांवरी पेâरी, नेग सहित सब रीति निबेरी।
राम सीय सिर सेंदुर देहीं, सोभा कहि न जात विधि केहि।।

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि, हरिहि श्री सागर दई।
तिमि अंकुर स्वाति समरपी, विस्वकल कीरति नई।।

सप्तपदी के लिए वधू को उत्तर दिशा, में एक एक पग मंत्रों के साथ, निम्नलिखित क्रम से चलने के लिए कहा जाता है। कन्या दाहिना पांव उठाकर आगे रखती है और फिर बायां पांव, साथ टिकाती जाती है। अधोवर्णित भावना के साथ सप्रपदी प्रवृत्त होती है :

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ओं एकमिषे विष्णुस्त्वानयतु।।१।।


अन्नादिक धन पाने के हित, चरण उठा तू प्रथम प्रिये।
ओं द्वे उज्र्जे विष्णुस्त्वानयतु।।२।।

और दूसरा बल पाने को, जिससे जीवन सुखी जिये।।
ओं त्रीणि रायस्पोषाय विष्णुस्त्वानयतु।।३।।

धन पोषण के पाने के हित चरण तीसरा आगे धर।
ओं चत्वारि मायो भवाय विष्णुस्त्वानयतु।।४।।

चौथा चरण बढ़ा तू देवी, सुख से अपने घर को भर।
ओं प चपशुभ्यो विष्णुस्त्वानयतु।।५।।

पंचम चरण उठाने से, तू पशुओं की भी स्वामी बन।
ओं षड्ऋतुभ्यो विष्णुस्त्वानयतु।।६।।

छठा चरण ऋतुओं में प्रेरक, बनकर हर्षित करदे मन।
ओं संख्येसप्तपदा भव सा मामनुव्रताभव विष्णुस्त्वानयतु।।७।।

और सातवां चरण मित्रता के हित आज उठाओ तुम।
मेरा जीवन व्रत अपनाओ, घर को स्वर्ग बनाओ तुम।।

मङ्गलफेरा — वर—वधू अग्नि के चारों ओर चार पेâरे लेते हैं जिसमें पहले तीन फेरे में वधू वर के आगे रहती है तथा चौथे में वर, वधू के आगे आ जाता है। पहले फेरे में धर्म एवं जीवन का उद्देश्य, दूसरे में अर्थ धन—धान्य का सृजन, तीसरे में काम इच्छाओं की प्राप्ति, तथा चौथे में मुक्ति की प्राप्ति की प्रतिज्ञा करते हुए वर—वधू अग्नि के चारों तरफ परिक्रमा करते हैं। - सप्त वचन — दूल्हा, जो कि अपने रिश्तेदारों के साथ उसको ब्याहने आया है, उसको ‘‘वधू कहती’’ है :

  1. आप मेरे व्यक्तिगत कार्यों में साथ देंगे तथा उत्सवों एवं पार्टियों में मुझे साथ रखेंगे।
  2. आप मेरे जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करेंगे।
  3. आप मुझे मेरे धार्मिक कार्यों के लिये पूर्ण स्वतंत्रता देंगे।
  4. आप मुझे अपनी आर्थिक स्थिति एवं बाहर आने—जाने के विषय में सूचित करते रहेंगे।
  5. आप मेरी बातें दूसरों को नहीं कहेंगे और मेरी सहेलियों के बीच कभी अपमानित नहीं करेंगे।
  6. आप मेरे नारीत्व की रक्षा करेंगे, जिसे मैं आपको समर्पित कर रही हूँ। आप बीमारी एवं समस्याओं के समय मेरी सहायता करेंगे और मुझे अकेला नहीं छोड़ेंगे।
  7. आप मेरे साथ ही संबंध बनाए रखेंगे और अन्य स्त्रियों को माता, बहन व पुत्री के समान समझेंगे।

- वर वचन—

वर मुस्कराता है एवं शर्तों को स्वीकार करता है प्रत्युत्तर में, वह भी वधू से वचन मांगता है।

  1. आप पतिव्रत धर्म का पालन करती हुई मेरी सेवा करेंगी एवं अन्य पुरुषों को पिता, भाई व पुत्र की तरह यथा—उचित सम्मान देंगी।
  2. स्त्री स्वभाव वश जिद करके, रोते हुये, नाराज होते हुये, अनुचित लाभ नहीं उठाँएगी, ऐसी कार्य करने की जिद नहीं करेंगी जो गलत हो।
  3. मेरे परिवार को उचित सम्मान देंगी एवं मेरे धार्मिक व सामाजिक कार्यों में सहयोग करेंगी।
  4. मेरे परिवार की बातें किसी दूसरे से नहीं कहेंगी।
  5. अपना खर्च मेरी आर्थिक स्थिति के अनुरूप ही करेंगी। बिना बताये गृह कार्यों व अन्य विषयों में तथा फालतू कार्यो में खर्च नहीं करेंगी।
  6. मेरी बीमारी व अन्य समस्याओं के समय सेवा व सहयोग करेंगी।
  7. मेरे व्यक्तिगत कार्यो में, पारिवारिक उत्सवों में पूर्ण सहयोग करेंगी। दुल्हन भी इन शुभ वचनों को स्वीकार करती है एवं मुस्कराती है।

वर—वधू एक दूसरे का सुस्वागत करते हैं एवं अब वे वास्तविक रूप में पति पत्नी के अधिकारों को प्राप्त करते हैं। इसके बाद वधू को वर के सामने से निकाल कर, वर के वाम भाग में बैठाते हैं। वधू को समझाया जाता है कि इसके बाद वह कभी भी पति के आगे से नहीं निकले अर्थात् पति की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करे। वधू के वामांगी होने के उपरान्त बचे हुए फेरे पूरे कर सप्तपदी पूरी की जाती है।

वधू की मांग में सिदूंर भरण एवं आशीर्वाद—

ओं सुमंगलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत।

सौभाग्यमस्यै दत्वा यथास्तं विपरेतन।।

मंगलरूपा वधू यहां है,हितचिन्तक बन इसे देखिए।
सौभाग्यमयी यह बनी रहे शुभ आशिष इसे सभी दीजिए।

यहां से जाने पर भी इसका, प्रतिदिन करना मंगल चिन्तन।
सन्तति होने पर भी आकर, करना इसका अभिनन्दन।।

वर, वधू की मांग में सिन्दूर भरता है और बैठे हुए लोग आशीर्वाद स्वरूप कहते हैं :
सौभाग्य हो, सौभाग्य हो, सौभाग्य हो इनका सदा।
कल्याण सुख पावे सदा, इनको मिले सुख सम्पदा।।

वर के दादा या पिता, वधू को चुनरी उढ़ाकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं तथा उसकी गोद भरते हैं। विवाह के उपरान्त वर—वधू अपने श्रेष्ठजनों से आशीर्वाद लेते हैं, तथा विवाह में आये हुए समस्त व्यक्ति, वर—वधू को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

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सिरगूथी एवं जुआ — वर पक्ष की बुआ, बहनें आदि महिलाएँ नयी वधू का मांगलिक वातावरण में, पूर्णरूप से शृंगार करती हैं तथा वातावरण हास्य एवं विनोद से परिपूर्ण हो जाता है। लोकरीति जननी करहि वर दुल्हन सकुचांहि। मोद विनोद बिलोकि बड़ अंकुर स्वास्ति मन मुसुकाहिं।। थाल में दूध, जल, केशर और सुगन्धित वस्तु मिलाकर अंगूठी डाल दी जाती है तथा वर एवं वधू को अंगूठी निकालने को कहा जाता है तथा यह भी कहा जाता है कि इसमें से जो भी पहले अंगूठी निकालेगा, उसी का वैवाहिक जीवन में ज्यादा प्रभाव रहेगा।

- सजनगोठ —

भांति अनेक परे पकवाने सुधा सरिस नहिं जाहि बखाने।

परुसन लगे परिजन सुजाना बिंजन विविध नाम को जाना।
चारि भांति भोजन विधि गाई एक एक विधि बरन न जाई।
जेंवत देहि मधुर धुनिगारी, लैलैनाम पुरुष अरु नारी।।

विवाहोपरान्त वधु के माता पिता आदर के साथ वर के माता पिता, पारिवारिक विशिष्ट सदस्यों एवं मित्रों को भोजन कर आमंत्रित करते हैं तथा स्वयं बड़े प्रेम भाव से बार—बार आग्रह करके विभिन्न प्रकार के व्यजनों को परोसते हैं तथा अतिथियों को आग्रहपूर्वक भोजन कराते हैं। विदाई — अन्तत: कन्या पक्ष वाले अपनी पुत्री की विदाई करते हैं। वर पक्ष, वधू को अपने रिश्तेदारों के साथ लेकर विदा होते हैं तथा कन्य पक्ष वाले, वर पक्ष एवं वर पक्ष वाले कन्या पक्ष के प्रति, आभार प्रकट करते हैं।

उपबीत व्याह उद्दाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।

वैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्वदा सुखु पावहीं।।
सिय रघुवीर विवाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुं सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।


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