03. स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका

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स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका

अथ स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका

द्वितीयोऽधिकार:
मंगलाचरणम्
त्रैलोक्यशीर्षगान् सिद्धान्, भववारिधिपारगान्।
प्रणुम: शिरसा भक्त्या, स्वात्मसौख्यस्य सिद्धये।।१।।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे जीवस्थानचूलिकायां द्वादशस्थलै: सप्तदशाधिकशतसूत्रै: स्थानसमुत्कीर्तननामा द्वितीयोऽधिकार: प्ररूप्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले स्थानसमुत्कीर्तनसूचनप्रतिज्ञापनार्थं स्थानसूचनार्थं च ‘‘एत्तो’’ इत्यादि त्रीणि सूत्राणि वक्ष्यन्ते। तदनु द्वितीयस्थले ज्ञानावरणीयस्य स्थानकथनाय ‘‘णाणावरणीयस्स’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं तृतीयस्थले दर्शनावरण स्थानकथनप्रमुखेन ‘‘दंसणावरणीयस्स’’ इत्यादि दशसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले वेदनीयस्य स्थाननिरूपणत्वेन ‘‘वेदणीयस्स’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं पंचमस्थले मोहनीयस्य स्थानकथनत्वेन ‘‘मोहणीयस्स’’ इत्यादि त्रिंशतसूत्राणि। तत: परं षष्ठस्थले आयुकर्मण: स्थानप्ररूपणत्वेन ‘‘आउअस्स’’ इत्यादिदशसूत्राणि। तत्पश्चात् सप्तमस्थले नामकर्मण: स्थानसमुत्कीर्तने नरकगत्यपेक्षया स्थानकथनमुख्यत्वेन ‘‘णामस्स’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु अष्टमस्थले तिर्यग्गत्यपेक्षया स्थानकथनमुख्यत्वेन ‘‘तिरिक्खगदि’’ इत्यादिएकविंशतिसूत्राणि। तत: परं नवमस्थले नामकर्मस्थाननिरूपणत्वेन ‘‘मनुष्यगत्यपेक्षया’’ मणुसगदिणामाए’’ इत्यादिएकादशसूत्राणि। अनंतरं दशमस्थले देवगत्यपेक्षया नामकर्मण: स्थानप्रतिपादनत्वेन ‘‘देवगदिणामाए’’ इत्यादिपंचदशसूत्राणि। ततश्च एकादशस्थले गोत्रकर्मण: स्थानकथनपरत्वेन ‘‘गोदस्स’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। पुनश्च द्वादशस्थले अन्तरायकर्मण: स्थानप्ररूपणत्वेन ‘‘अंतराइयस्स’’ इत्यादिसूत्रत्रयं कथ्यन्ते इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।

संप्रति स्थानसमुत्कीर्तनप्रतिज्ञापनार्थं सूत्रमवतरति

एत्तो ट्ठाणसमुक्कित्तणं वण्णइस्सामो।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रं सुगमं वर्तते। स्थानसमुत्कीर्तनस्य अर्थ: क्रियते-तिष्ठन्त्यस्यां संख्यायामस्मिन् वा अवस्थाविशेषे प्रकृतय: इति स्थानम्। स्थानं स्थिति: अवस्थानमिति एकार्थ:। समुत्कीर्तनं वर्णनं प्ररूपणमिति कथितं भवति। स्थानस्य समुत्कीर्तनं स्थानसमुत्कीर्तनं तद् वर्णयिष्याम:।
स्थानसमुत्कीर्तना किमर्थमागता ?
पूर्वं प्रकृतिसमुत्कीर्तनायां या: प्रकृतय: प्ररूपिता:, तासां बंध: किमक्रमेण भवति, किं क्रमेण इति पृष्टे एवं भवति इति ज्ञापनार्थं स्थानसमुत्कीर्तना आगता।
स्थानस्य लक्षणं अन्यत्रापि ग्रन्थे-‘‘एकस्य जीवस्यैकस्मिन् समये संभवन्तीना समूह: स्थानमिति। अस्य कथनं अस्यां चूलिकायामिति।
अधुना तत् स्थानं कथं कस्य कस्य वा इति प्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-तं जहा।।२।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजद-सम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सा स्थानसमुत्कीर्तना कथं उच्यते इति पृष्टे ‘एवं उच्यते’ इति ज्ञापयन् स्थानानां चैव स्वरूपसंख्यानां प्ररूपणार्थं उत्तरसूत्रं अकथयत् श्रीभूतबलिसूरिवर्य: इति ज्ञातव्य:। ‘‘तं जहां’’ सूत्रस्य अर्थ:।
तत्प्रकृतिस्थानं मिथ्यादृष्टे: वा सासादनसम्यग्दृष्टेर्वा सम्यग्मिथ्यादृष्टेर्वा असंयतसम्यग्दृष्टेर्वा संयतासंयतस्य वा संयतस्य वा भवति, एतेभ्य: व्यतिरिक्तबंधकानामभावात्। अत्र सूत्रे प्रथमाया: अर्थे षष्ठीविभक्तिज्र्ञातव्या, तेन मिथ्यादृष्टिस्थानमिति संबंधनीयं।
कथं तस्य स्थानव्यपदेश: ?
तिष्ठन्त्यस्मिन् बंधहेतुप्रकृतय: इति स्थानशब्दस्य व्युत्पत्ते:। अत्र ‘संयतस्य’ इत्युत्ते अष्टावपि संयतगुणस्थानानि गृहीतव्यानि, संयतभावं प्रति भेदाभावात्। नवमं अयोगिकेवलिगुणस्थानं न गृह्यते, तस्य बंधकत्वाभावात्।
एवं प्रथमस्थले प्रतिज्ञासूचन-स्थानस्वामिप्रतिपादनपरत्वेन सूत्रत्रयं गतं।

स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका नाम द्वितीय अधिकार

मंगलाचरण

जो त्रैलोक्य के मस्तक पर विराजमान हैं एवं संसार समुद्र से पार हो चुके हैं, अपने आत्मा के सौख्य को सिद्ध करने के लिये ऐसे उन सिद्धों को हम नमस्कार करते हैं।

अब यहाँ जीवस्थान चूलिका में बारह स्थलों में एक सौ सत्रह सूत्रों द्वारा यह स्थान समुत्कीर्तन नाम का दूसरा अधिकार प्ररूपित किया जा रहा है। इसमें सबसे पहले प्रथम स्थल में स्थानसमुत्कीर्तन की सूचना की प्रतिज्ञा करने के लिये और स्थान की सूचना के लिये ‘‘एत्तो’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीयस्थल में ज्ञानावरणीय के स्थान को कहने के लिये ‘णाणावरणीयस्स’’ इत्यादिरूप से तीन सूत्र कहेंगे। अनन्तर तीसरे स्थल में दर्शनावरणीय के स्थान कहने की प्रमुखता से ‘‘दंसणावरणीयस्स’’ इत्यादि दश सूत्र कहेंगे। इसके बाद चौथे स्थल में वेदनीय के स्थान का निरूपण करने के लिये ‘‘वेदणीयस्स’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके बाद पांचवें स्थल में मोहनीय कर्म के स्थान का कथन करने के लिये ‘‘मोहणीयस्स’’ इत्यादि तीस सूत्र कहेंगे। इसके बाद छठे स्थल में आयुकर्म के स्थान की प्ररूपणा करने के लिये ‘‘आउअस्स’’ इत्यादि दश सूत्र कहेंगे। इसके बाद सातवें स्थल में नामकर्म की स्थानसमुत्कीर्तना में नरकगति की अपेक्षा से स्थान कथन की मुख्यता करके ‘‘णामस्स’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके अनन्तर आठवें स्थल में तिर्यग्गति की अपेक्षा स्थान कथन की मुख्यता से ‘‘तिरिक्खगदि’’ इत्यादि इक्कीस सूत्र कहेंगे। इसके अनन्तर नवमें स्थल में नामकर्म के स्थान का निरूपण करने रूप से मनुष्यगति की अपेक्षा ‘‘मणुसगदिणामाए’’ इत्यादि ग्यारह सूत्र कहेंगे। अनन्तर दशवें स्थल में देवगति की अपेक्षा नामकर्म के स्थान प्रतिपादन रूप से ‘‘देवगदिणामाए’’ इत्यादि पन्द्रह सूत्र कहेंगे। इसके पश्चात् ग्यारहवें स्थल में गोत्रकर्म के स्थान को कहने वाले ‘गोदस्स’ इत्यादि पाँच सूत्र कहेंगे। इसके पश्चात् बारहवें स्थल में अन्तराय कर्म के स्थान की प्ररूपणा रूप से ‘‘अंतराइयस्स’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इस प्रकार समुदायपातनिका सूचित की जाती है।

अब स्थानसमुत्कीर्तन की प्रतिज्ञा के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

अब इसके आगे स्थान समुत्कीर्तन का वर्णन करेंगे।।१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्र का अर्थ सरल है। अब यहाँ स्थानसमुत्कीर्तन का अर्थ करते हैं-जिस संख्या में या जिस अवस्था विशेष में प्रकृतियां रहती हैं उसे ‘स्थान’ कहते हैं। स्थान, स्थिति और अवस्थान ये एकार्थवाची हैं। समुत्कीर्तन, वर्णन और प्ररूपण इनका अर्थ एक कहा गया है। स्थान की समुत्कीर्तना को ‘स्थानसमुत्कीर्तन’ कहते हैं, हम उसका वर्णन-व्याख्या करेंगे।

शंका-यह स्थानसमुत्कीर्तन नाम की चूलिका किसलिये आई है ?

समाधान-पहले प्रकृतिसमुत्कीर्तन नाम की चूलिका में जिन प्रकृतियों का प्ररूपण कर चुके हैं, उन प्रकृतियों का बंध क्या एक साथ होता है, अथवा क्रम से होता है ? ऐसा पूछने पर ‘इस प्रकार होता है’ इस बात को बतलाने के लिये यह ‘स्थानसमुत्कीर्तना’ आई है।

स्थान का लक्षण अन्यत्र-गोम्मटसार कर्मकाण्ड ग्रन्थ में कहा है-एक जीव के एक समय में संभवित-होने वाली प्रकृतियों के समूह का नाम ‘स्थान’ है। इस स्थान का कथन इस चूलिका में कहा गया है, ऐसा समझना।

अब वह स्थान कैसे और किस-किस के होता है ? इसका प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

वह स्थानसमुत्कीर्तन यह है।।२।।

वह प्रकृतिस्थान मिथ्यादृष्टि, सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-वह स्थानसमुत्कीर्तना किस प्रकार कही जाती है ? ऐसे पूछने पर ‘वह इस प्रकार कही जाती है’ ऐसा बतलाते हुये स्थानों के ही स्वरूपसंख्यान का निरूपण करने के लिये श्री भूतबलि आचार्यदेव आगे का सूत्र कहते हैं, ऐसा इस ‘‘तं जहा’’ सूत्र का अर्थ जानना चाहिये।

यह प्रकृतिस्थान मिथ्यादृष्टि जीव के या सासादन सम्यग्दृष्टि के या सम्यग्मिथ्यादृष्टि के या असंयतसम्यग्दृष्टि के या संयतासंयत के अथवा संयत के होता है, क्योंकि इनसे अतिरिक्त बंध करने वाले जीवों का अभाव है। यहाँ इस सूत्र में प्रथमा के अर्थ में षष्ठी विभक्ति का अर्थ जानना चाहिये, इससे मिथ्यादृष्टिस्थान, सासादनसम्यग्दृष्टिस्थान आदि का सम्बन्ध करना चाहिये।

शंका-मिथ्यादृष्टि आदि बंधकर्ताओं के ‘स्थान’ यह नाम कैसे हुआ ?

समाधान-‘बंध की कारणभूत प्रकृतियां जिस बंधकर्ता जीव में रहती हैं’ इस प्रकार स्थान शब्द की व्युत्पत्ति करने से मिथ्यादृष्टि आदि बंधकर्ता जीवों के स्थान यह नाम सार्थक हो जाता है।

यहाँ ‘संयत’ इस पद के कहने से आठों ही संयतगुणस्थान ग्रहण करने चाहिये, क्योंकि संयत भाव के प्रति उनमें भेद का अभाव है। यहाँ नवमां अर्थात् अयोगकेवली गुणस्थान नहीं ग्रहण किया गया है, क्योंकि उनमें बंधक-प्रकृतिबंध के कर्तृत्व का अभाव है-वहां बंध नहीं है।

इस प्रकार प्रथमस्थल में प्रतिज्ञा की सूचना और स्थान के स्वामी के निरूपण रूप से तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अधुना ज्ञानावरणस्य प्रकृतिनाम-स्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

णाणावरणीयस्स कम्मस्स पंच पयडीओ, आभिणिबोधियणाणा-वरणीयं सुदणाणावरणीयं ओधिणाणावरणीयं मणपज्जवणाणावरणीयं केवलणाणावरणीयं चेदि।।४।।

एदासिं पंचण्हं पयडीणं एक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।५।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजद-सम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृतिसमुत्कीर्तनचूलिकायां ज्ञानावरणीयस्य पंचभेदनामानि कथितानि सन्ति। पुनरुक्त्वात् अत्र न वक्तव्यानि सन्ति ?
नैतत्, सर्वेषां जीवानां सदृशधारणावरणीयकर्मक्षयोपशमाभावात्। यदि सर्वैर्जीवै: गृहीतार्थ: टंकोत्कीर्णाक्षरमिव न विनश्यति तर्हि पुनरुक्तदोषो भवेत्। न चैवं, जलालिखिताक्षरस्येव गृहीतार्थस्य केषुचित् विनाशोपलंभात्। तत: भृष्टसंस्कारशिष्यस्मारणार्थं वक्तव्यानि इमानि सूत्रे इति।
एतासां पूर्वोक्तपञ्चानां प्रकृतीनां बंधमानस्य जीवस्य एकस्मिन्नवस्थाविशेषे पंचसंख्योपलक्षिते स्थानमवस्थानं भवति।
अत्र एवकार: किमर्थ: ?
एकद्वित्रिचतु:संख्योपलक्षितावस्थायां अवस्थानप्रतिषेधार्थ:। सर्वेषां जीवानां दशमगुणस्थानपर्यंतं पञ्चानामेव प्रकृतीनां बंधो भवन्नास्ते।
तत्पंचसंख्योपलक्षितभावाधारबंधस्थानं प्रथमादारभ्य दशमगुणस्थानवर्तिनां यावत् भवति, नान्येषां, एतेभ्य: पृथग्भूतगुणस्थानाभावात्। सूत्रे ‘संजदस्स’ इति उत्ते सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतपर्यंतमेव संयतानां ग्रहणं, उपरिमानानां ज्ञानावरणबंधाभावात्।
एवं द्वितीयस्थले ज्ञानावरणबंधकानां स्थानादिकथनेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति दर्शनावरणीयस्य स्थान-प्रकृतिनाम-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रदशकमवतार्यते-दंसणावरणीयस्स कम्मस्स तिण्णि, ट्ठाणाणि, णवण्हं छण्हं चदुण्हं ठाणमिदि।।७।।
तत्थ इमं णवण्हं ट्ठाणं, णिद्दाणिद्दा पयलापयला थीणगिद्दी णिद्दा य पयला य चक्खुदंसणावरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं ओहिदंसणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं चेदि।।८।।
एदासिं णवण्हं पयडीणं एकम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।९।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा।।१०।।
तत्थ इमं छण्हं ट्ठाणं, णिद्दाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धीओ वज्ज णिद्दा य पयला य चक्खुदंसणावरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं ओहिदंसणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं चेदि।।११।।
एदासिं छण्हं पयडीणं एकम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।१२।।
तं सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।१३।।
तत्थ इमं चदुण्हं ट्ठाणं, णिद्दा य पयला य वज्ज चक्खुदंसणावरणीयं अचक्खुदंसणा-वरणीयं ओधिदंसणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं चेदि।।१४।।
एदासिं चदुण्हं पयडीणं एक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।१५।।
तं संजदस्स।।१६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भिन्नगुणस्थानाधारपेक्षया इमानि त्रीणि स्थानानि सन्ति। अत्र प्रकृतीनां पुन: नामनिर्देश: न पुनरुक्तदोषाय, किन्तु प्रकृतिबंधकारणस्थानस्य शक्तीनां संज्ञा: वर्तन्ते।
नवानां प्रकृतीनां बंधहेतु सम्यक्त्वाभावेन मिथ्यात्व-सासादनगुणस्थानवर्तिनौ एव अस्य प्रथमस्थानस्य स्वामिनौ स्त:।
षट्प्रकृतीनां बध्यमाना: संयता: अपूर्वकरणपर्यन्ता: सन्ति। तत्रापि अपूर्वकरणस्य सप्तभागेषु प्रथमभागस्थितसंयतानामेव ग्रहणं क्रियते।
चतसृणां प्रकृतीनां बंधस्थानस्य स्वामिन: संयता:, इत्युत्ते अपूर्वकरणस्य सप्तभागेषु द्वितीयभागादारभ्य सूक्ष्मसांपरायपर्यन्ता: महर्षय: भवन्ति इति।
एवं तृतीयस्थले दर्शनावरणीयस्य बंधस्थानस्वामिनिर्देशत्वेन सूत्राणि दश गतानि।
वेदनीयस्य स्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-वेदणीयस्स कम्मस्स दुवे पयडीओ, सादावेदणीयं चेव असादावेदणीयं चेव।।१७।।
एदासिं दोण्हं पयडीणं एक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।१८।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजद-सम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।१९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्रापि प्रथमसूत्रे विस्मरणशीलशिष्यानुग्रहार्थं एव प्रकृतिनाम कथितं। सातासातावेदनीयप्रकृत्यो: द्वयोरपि युगपत् बंधो नास्ति। तयोर्बंधकारणविशुद्धि-संक्लेशयो: अक्रमेण प्रवृत्तेरभावात्। अत्रापि ‘‘संजदस्स’’ इत्युत्ते यावत् सयोगिभगवन्त: तावत् गृहीतव्यं, न परत:, तत्रायोगि भगवतां अस्य स्थानस्य बंधाभावात्।
एषु संयतेष्वपि षष्ठगुणस्थानादुपरि केवलं साताप्रकृतिरेव बध्यते एतज्ज्ञातव्यं।
एवं चतुर्थस्थले वेदनीयस्थान-स्वामिप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति मोहनीयस्य कर्मण: स्थानसंख्याप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-मोहणीयस्स कम्मस्स दस ट्ठाणाणि, वावीसाए एक्कवीसाए सत्तारसण्हं तेरसण्हं णवण्हं पंचण्हं चदुण्हं तिण्हं दोण्हं एक्किस्से ट्ठाणं चेदि।।२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इदं द्रव्यार्थिकनयसूत्रं वर्तते, स्वान्तर्निहितसमस्तार्थानां बीजीभूतत्वात्।

अब ज्ञानावरण की प्रकृतियों के नाम, स्थान और उनके स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

ज्ञानावरणीय कर्म की पांच प्रकृतियां हैं-आभिनिबोधिक ज्ञानावरणीय, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधिज्ञानावरणीय, मन:पर्ययज्ञानावरणीय और केवलज्ञानावरणीय हैं।।४।।

इन पांचों प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।५।।

वह बंधस्थान मिथ्यादृष्टि के, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयत-सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयतमुनियों के होता है।।६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-शंका-प्रकृतिसमुत्कीर्तन चूलिका में ज्ञानावरणीय के पांच भेदों के नाम कहे जाते हैं। अत: ये पुनरुक्त होने से यहाँ इन्हें नहीं कहना चाहिये ?

समाधान-ऐसा यहाँ नहीं कहना चाहिये, क्योंकि सभी जीवों के एक सदृश धारणावरणीय कर्म के क्षयोपशम का अभाव है। यदि सभी जीवों के द्वारा ग्रहण किया गया-जाना गया अर्थ टांकी से उकेरे गये अक्षर के समान विनष्ट नहीं होता, तब तो पुनरुक्त दोष माना जाता, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि जल में लिखे गये अक्षर के समान ग्रहण किये गये अर्थ का कितने ही जीवों में विनाश पाया जाता है। अत: भ्रष्ट-विनष्ट संस्कार वाले शिष्यों के स्मरण कराने के लिये भेद और नामवाचक सूत्र कहना चाहिये।

इन पूर्व में कही गई पांचों प्रकृतियों को बांधने वाले जीव का ‘पांच’ इस संख्या से उपलक्षित एक ही अवस्था विशेष में स्थान-अवस्थान होता है।

शंका-यहाँ सूत्र में एवकार पद क्यों दिया है ?

समाधान-ज्ञानावरणीय कर्म की एक, दो, तीन और चार संख्या से उपलक्षित अवस्था में अवस्थान का निषेध करने के लिये ‘एवकार’ पद है। अत: अर्थापत्ति से यह सिद्ध हुआ कि सभी जीवों के दशवें गुणस्थानपर्यंत इन पांचों ही प्रकृतियों का बंध होता रहता है।

वह पांच संख्या से उपलक्षित भावों का आधारभूत बंधस्थान प्रथम गुणस्थान से प्रारम्भ कर दशवें गुणस्थानवर्ती जीवों तक होता है, अन्यों के-आगे के गुणस्थानवर्तियों-महामुनियों के नहीं, क्योंकि इनसे पृथग्भूत गुणस्थानों का अभाव है। यहाँ सूत्र में ‘‘संजदस्स’-‘संयत के’ ऐसा जो पद है, उससे सूक्ष्मसांपराय शुद्धिसंयत पर्यंत ही संयतों-मुनियों का ग्रहण है, क्योंकि इसके ऊपर के गुणस्थान वाले मुनियों के ज्ञानावरण प्रकृति के बंध का अभाव है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में ज्ञानावरण के बंधकत्र्ताओं के स्थानादि का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब दर्शनावरणीय कर्म के स्थान, प्रकृतियों के नाम और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दश सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

दर्शनावरणीय कर्म के नवप्रकृतिसम्बन्धी, छहप्रकृतिसम्बन्धी और चारप्रकृतिसम्बन्धी ऐसे तीन स्थान हैं।।७।।

दर्शनावरणीय कर्म के नवप्रकृतिक बंधस्थान में निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, निद्रा, प्रचला, चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय ये नवप्रकृतियां हैं।।८।।

इन नव प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।९।।

वह नवप्रकृतिरूप प्रथम बंधस्थान मिथ्यादृष्टि के और सासादन सम्यग्दृष्टि के होता है।।१०।।

दर्शनावरणीय कर्म का दूसरा छह प्रकृतिबंधस्थान है, उसमें निद्रानिद्रा, प्रचला प्रचला और स्त्यानगृद्धि को छोड़कर निद्रा और प्रचला तथा चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय ये छह प्रकृतियां हैं।।११।।

छह प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।१२।।

वह छहप्रकृतिरूप बंधस्थान सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।१३।।

दर्शनावरणीय कर्म के तृतीय चार प्रकृतिक बंधस्थान में निद्रा और प्रचला को छोड़कर चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय ये चार प्रकृतियां हैं।।१४।।

इन चार प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।१५।।

वह चार प्रकृतिरूप तृतीयबंधस्थान संयत के होता है।।१६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-भिन्न-भिन्न गुणस्थानों के आधार की अपेक्षा से ये तीन स्थान होते हैं। यहाँ प्रकृतियों का जो पुन: नाम कथन है वह पुनरुक्तदोष के लिये नहीं है, किन्तु प्रकृतिबंध के कारणभूत स्थान की शक्तियों की संज्ञायें हैं।

इन नव प्रकृतियों के बंध हेतु सम्यक्त्व के अभाव से मिथ्यात्व एवं सासादनगुणस्थानवर्ती ही इस प्रथम स्थान के स्वामी हैं।

छह प्रकृतियों को बांधने वाले संयत मुनि अपूर्वकरण गुणस्थान पर्यंत हैं। उनमें भी अपूर्वकरण के सात भागों में से प्रथम भाग में स्थित संयतों का ही ग्रहण किया जाता है।

चार प्रकृतियों के बंध स्थान के स्वामी संयत हैं, ऐसा कहने पर अपूर्वकरण के सात भागों में से दूसरे भाग से प्रारम्भ करके सूक्ष्मसांपरायपर्यंत महर्षि-महामुनि होते हैं, ऐसा जानना।

इस प्रकार तृतीयस्थल में दर्शनावरणीय के बंधस्थान और उनके स्वामी को कहने रूप से दश सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अब वेदनीय कर्म के स्थान और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदनीय कर्म की सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो ही प्रकृतियां हैं।।१७।।

इन दोनों प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।१८।।

वह वेदनीय कर्म सम्बन्धी बंधस्थान मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।१९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ प्रथम सूत्र में विस्मरणशील शिष्यों के अनुग्रह के लिये ही प्रकृतियों के नाम कहे हैं। सातावेदनीय और असातावेदनीय प्रकृतियों का इन दोनों का एक साथ बंध नहीं होता है, क्योंकि इन दोनों के बंध के कारण जो विशुद्धि और संक्लेश हैं, इन दोनों भावों की एक साथ-अक्रम से प्रवृत्ति का अभाव है। यहाँ भी ‘संजदस्स’ ऐसा कहने पर जहाँ तक सयोगिकेवली भगवान हैं तब तक-वहाँ तक के संयतों को लेना चाहिये उसके आगे के नहीं, क्योंकि वहाँ अयोगिकेवली भगवान के इस वेदनीयकर्म के स्थान के बंध का अभाव है।

इन संयतों में भी छठे गुणस्थान के ऊपर केवल साताप्रकृति ही बंधती है ऐसा जानना चाहिये।

इस प्रकार चौथे स्थल में वेदनीय स्थान और स्वामी का निरूपण करते हुये तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब मोहनीय कर्म के स्थान और संख्या का प्ररूपण करते हुये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

मोहनीय कर्म के दश बंधस्थान हैं-बाईस प्रकृतिक, इक्कीस प्रकृतिक, सत्रह प्रकृतिक, तेरह प्रकृतिक, नव प्रकृतिक, पांच प्रकृतिक, चार प्रकृतिक, तीन प्रकृतिक, दो प्रकृतिक और एक प्रकृतिक ऐसे ये दश हैं।।२०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यह द्रव्यार्थिकनय प्रधान सूत्र है, क्योंकि वह अपने अन्तर्निहित समस्त अर्थों के लिये बीजपदस्वरूप है।

प्रथमस्थानस्य प्रकृतिसंख्या-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

तत्थ इमं वावीसाए ट्ठाणं, मिच्छत्तं सोलसकसाया इत्थिवेद-पुरिसवेद-णउंसयवेद तिण्हं वेदाणमेक्कदरं हस्सरदि-अरदिसोग दोण्हं जुगलाणमेक्कदरं भयदुगुंछा। एदासिं वावीसाए पयडीणं एकम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।२१।।

तं मिच्छादिट्ठिस्स।।२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यात्व-षोडशकषाया: धु्रवबंधिन:, उदयेन इव बंधापेक्षया परस्परं विरोधाभावात्। तेन तत्र एकतरशब्द: न प्रयुक्त:। त्रिवेदानां हास्यरति-अरतिशोकयुगलानां च उदयेनेव बंधेनापि विरोधोऽस्ति इति ज्ञापनार्थं एकतरशब्दप्रयोग: कृत:। भयजुगुप्सयो: पुन: न कृत:, बंधं प्रति विरोधाभावात्। एतासां प्रकृतीनां एकस्मिन्नेवावस्थानं भवति।
कस्य ?
मिथ्यादृष्टिजीवस्य। मिथ्यात्वस्यान्यत्र बंधाभावात्।
तदपि कुत: ?
अन्यत्र मिथ्यात्वोदयाभावात्। न च कारणेन विना कार्यस्योत्पत्तिरस्ति अतिप्रसंगात्। तस्मात् मिथ्यादृष्टिश्चैव स्वामी। अत्र बंधभंगा: षट् भवन्ति।
अस्यायमर्थ:-द्वाविंशतिप्रकृतिषु आसु मिथ्यात्व-षोडशकषाय-भय-जुगुुप्साप्रकृतय: ध्रुवबंधिन्य:, आसां मिथ्यात्वगुणस्थाने बंधो निरन्तरमेव। शेषास्त्रयोवेदा: हास्य रतियुगले अरतिशोकयुगले च अध्रुवबंधिन: सप्रतिपक्षाश्च। त्रिवेदेषु एक एव वेद: बध्यते, द्वयोर्युगलयो: एकमेव युगलं च। अत: त्रिवेदानां द्वाभ्यां युगलाभ्यां गुणिते षट् भंगा: भवन्ति।
अस्य कोष्टकं दीयते-

स्थानं १ + षोडश कषाया:+ 1 + 2 + 2 = 22
1. मिथ्यात्वं षोडश कषाया: पुरुषवेद: हास्य रति युगल भयजुगुप्सायुग्मं 22
2. " " स्त्रीवेद: " " 22
3. " " नपुंसकवेद: " " 22
4. " " पुरुषवेद: अरतिशोकयुगलं " 22
5. " " स्त्रीवेद: " " 22
6. " " नपुंसकवेद: " " 22

विशेष:-षड्भंगानां उच्चारणक्रमोऽयं दर्शित:।
अधुना द्वितीयस्थानस्य प्रकृति-स्वामिकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
तत्थ इमं एक्कवीसाए ट्ठाणं मिच्छत्तं णवुंसयवेदं वज्ज।।२३।।
सोलस कसाया इत्थिवेद पुरिसवेदो दोण्हं वेदाणमेक्कदरं हस्सरदि-अरदि-सोग दोण्हं जुगलाणमेक्कदरं भय-दुगुंछा एदासिं एक्कवीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।२४।।
तं सासणसम्मादिट्ठिस्स।।२५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-व्यतिरेकपर्यायार्थिकनयानुग्रहार्थमिदं सूत्रं प्रथमं भणित्वा विधिनयानुग्रहार्थं द्वितीयसूत्रं भणितं। अत्र भंगा: चत्वार:। स्त्रीपुरुषवेदयो: हास्यरति-अरतिशोकयुगलाभ्यां गुणिते (२²२·४) भंगा: चत्वारो भवन्ति। अत्रापि उच्चारणक्रम: पूर्ववद् ज्ञातव्य:।
इदं स्थानं सासादनजीवस्य भवति, उपरि अनन्तानुबंधिचतुष्कस्य स्त्रीवेदस्य च बंधाभावात्।


अब प्रथमस्थान के प्रकृति, संख्या और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मोहनीय कर्म के उपर्युक्त दश बंधस्थानों में से मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी आदि सोलह कषाय, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद इन तीनों में से कोई एक वेद, हास्य-रति तथा अरति-शोक इन दो युगलों में से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा इन बाईस प्रकृतियों का एक बंध स्थान होता है। इन बाईस प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।२१।।

यह बाईस प्रकृतिवाला बंधस्थान मिथ्यादृष्टि के होता है।।२२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-मिथ्यात्व और अनंतानुबंधी आदि सोलह कषायें ये सत्रह प्रकृतियां ध्रुवबंधी हैं, क्योंकि उदय के समान ही बंध की अपेक्षा परस्पर में उनमें कोई विरोध नहीं है इसलिये इनके साथ में ‘एकतर’ इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद, इन तीन वेदों का तथा हास्य-रति और अरति-शोक इन दोनों युगलों का उदय के समान ही बंध के साथ भी विरोध है, इस बात को बतलाने के लिये इनके साथ में ‘एकतर’ शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु भय और जुगुप्सा इन दोनों प्रकृतियों के साथ ‘एकतर’ शब्द का प्रयोग नहीं है, क्योंकि बंध के प्रति उनका परस्पर में कोई विरोध नहीं है। इन बाईस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान होता है।

शंका-किस एक भाव में अवस्थान होता है ?

समाधान-मिथ्यादृष्टि जीव के इनका अवस्थान होता है, क्योंकि मिथ्यात्व प्रकृति का मिथ्यादृष्टि जीव के सिवाय अन्यत्र बंध नहीं होता है।

शंका-ऐसा क्यों है ?

समाधान-क्योंकि, अन्यत्र मिथ्यात्व के उदय का अभाव है, इसका भी हेतु यह है कि ‘‘कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है, अन्यथा अतिप्रसंग दोष आ जावेगा। इसलिये इन बाईस प्रकृतिक बंधस्थान के मिथ्यादृष्टि जीव ही स्वामी हैं। यहाँ बंध के छह भंग होते हैं।

इसका अर्थ यह है कि इन बाईस प्रकृतियों में मिथ्यात्व, सोलह कषाय और भय-जुगुप्सा ये उन्नीस प्रकृतियां धु्रवबंधी हैं। इनका मिथ्यात्व गुणस्थान में बंध निरन्तर ही होता है। शेष तीन वेद, हास्य-रति और अरति-शोक ये दोनों युगल अध्रुवबंधी और सप्रतिपक्षी हैं। एक साथ एक जीव में तीनों वेदों में से किसी एक वेद का और दोनों युगलों में से किसी एक युगल का ही बंध होता है। इसलिये तीनों वेदों को और दोनों युगलों को गुणित करने पर छह भंग-भेद होते हैं। इसका कोष्ठक दिया जा रहा है-

१६ २२
१. मिथ्यात्व सोलह कषाय पुरुषवेद हास्य-रति भय-जुगुप्सा Example
२. ’’ ’’ स्त्रीवेद ’’ ’’ २२
३. ’’ ’’ नपुंसकवेद ’’ ’’ २२
४. ’’ ’’ पुरुषवेद अरति-शोक ’’ २२
५. ’’ ’’ स्त्रीवेद ’’ ’’ २२
६. ’’ ’’ नपुंसकवेद ’’ ’’ २२

यह छह भंगों का उच्चारण क्रम दिखाया गया है।

अब द्वितीयस्थान के प्रकृति और स्वामी के कथन हेतु तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मोहनीय कर्म के ऊपर कथित दश बंधस्थानों में प्रथम स्थान की बाईस प्रकृतियों में से मिथ्यात्व और नपुंसकवेद को छोड़कर यह इक्कीस प्रकृतिक बंधस्थान होता है।।२३।।

अनन्तानुबंधी आदि सोलह कषाय, स्त्रीवेद और पुरुषवेद इन दोनों वेदों में से कोई एक वेद, हास्य-रति और अरति-शोक इन दोनों युगलों में से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा, इन इक्कीस प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।२४।।

वह इक्कीस प्रकृतिक बंधस्थान सासादन सम्यग्दृष्टि के होता है।।२५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-व्यतिरेक पर्यायार्थिक नय वाले जीवों के अनुग्रह के लिये यह प्रथम सूत्र कहकर विधिरूप द्रव्यार्थिक नय वाले जीवों के अनुग्रह हेतु दूसरा सूत्र कहा है। यहाँ भंग चार हैं। स्त्रीवेद, पुरुषवेद और हास्य-रति तथा अरति-शोक इन दोनों युगलों के परस्पर में गुणित करने से (२ ² २ · ४) भंग होते हैं।

यहाँ भी उच्चारण क्रम पूर्व के समान जानना चाहिये।

तृतीयस्थान-प्रकृतिस्वामिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

तत्थं इमं सत्तरसण्हं ट्ठाणं अणंताणुबंधिकोह-माण-माया-लोभं इत्थिवेदं वज्ज।।२६।।

वारस कसाय पुरिसवेदो हस्सरदि-अरदिसोग दोण्हं जुगलाणमेक्कदरं भयदुगुुंछा। एदासिं सत्तरसण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।२७।।
तं सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा।।२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकविंशतिप्रकृतिषु अनन्तानुबंधिचतुष्केऽपनीते सप्तदश प्रकृतयो भवन्ति। व्यतिरेकनयानुग्रहार्थं प्रथमं सूत्रं। पुन: ता: कतमा: इति पृच्छितमंदबुद्धिशिष्यानुग्रहार्थं द्वितीयसूत्रं प्रकृतिनामसूचकमस्ति।
‘एक्कम्हि’ पदेन सप्तदशसंख्यायां एतासां बंधयोग्यजीवपरिणामे वा इति गृहीतव्यं। अत्र द्वौ भंगौ भवत:। हास्यरति-अरतिशोकयुगलापेक्षया।
तृतीयगुणस्थानवर्तिन: चतुर्थगुणस्थानवर्तिनो वा अस्य स्थानस्य स्वामिनौ स्त:। उपरि अप्रत्याख्यान-चतुष्कस्य बंधाभावात्, उदयाभावाच्च।
संप्रति चतुर्थ-त्रयोदशप्रकृतिस्थान-स्वामिकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
तत्थ इमं तेरसण्हं ट्ठाणं अपच्चक्खाणावरणीयकोध-माण-माया-लोभं वज्ज।।२९।।
अट्ठ कसाया पुरिसवेदो हस्सरदि-अरदिसोग दोण्हं जुगलाणमेक्कदरं भयदुगुंछा। एदासिं तेरसण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।३०।।
तं संजदासंजदस्स।।३१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-‘वज्ज’ इतिपदेन ‘वज्जिय-वर्जयित्वा’ इति गृहीतव्यं। पूर्वोक्तसप्तदशप्रकृतिषु अप्रत्याख्यानचतुष्के अपनीते त्रयोदश प्रकृतयो भवन्ति। अत्र द्वौ भंगौ ज्ञातव्यौ। आसां स्वामी देशव्रती एव।
नवप्रकृतिस्थान-स्वामिनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
तत्थ इमं णवण्हं ट्ठाणं पच्चक्खाणावरणीयकोह-माण-माया-लोहं वज्ज।।३२।।
चदुसंजलणा पुरिसवेदो हस्सरदि-अरदिसोग दोण्हं जुगलाणमेक्कदरं भयदुगुंछा। एदासिं णवण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।३३।।
तं संजदस्स।।३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगम:। अत्रापि द्वौ भंगौ। ‘संजदस्स’ इत्युत्ते प्रमत्ताद्यपूर्वान्तानां संयतानां ग्रहणं, उपरि षण्णोकषायाणां बंधाभावात् नवानां स्थानस्य संभवाभावात्।
अधुना पंचचतु: त्रि-द्वि-एकबंधस्थानानां स्वामिनां च कथनाय सूत्रपंचदशकमवतार्यते-
तत्थ इमं पंचण्हं ट्ठाणं हस्सरदि-अरदिसोग-भयदुगुंछं वज्ज।।३५।।
चदु संजलणं पुरिसवेदो। एदासिं पंचण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।३६।
तं संजदस्स।।३७।।
तत्थ इमं चदुण्हं ट्ठाणं पुरिसवेदं वज्ज।।३८।।
चदु संजलणं, एदासिं चदुण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंध-माणस्स।।३९।।
तं संजदस्स।।४०।।
तत्थ इमं तिण्हं ट्ठाणं कोधसंजलणं वज्ज।।४१।।
माणसंजलणं मायासंजलणं लोभसंजलणं, एदासिं तिण्हं पयडीण-मेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।४२।।
तं संजदस्स।।४३।।
तत्थ इमं दोण्हं ट्ठाणं माणसंजलणं वज्ज।।४४।।
मायासंजलणं लोभसंजलणं, एदासिं दोण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।४५।।
तं संजदस्स।।४६।।
तत्थ इमं एक्किस्से ट्ठाणं मायासंजलणं वज्ज।।४७।।
लोभसंजलणं, एदिस्से एक्किस्से पयडीए एक्कम्हि चेव ट्ठाणं बंधमाणस्स।।४८।।
तं संजदस्स।।४९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। यद्यपि प्रमाणानुसारिशिष्यै: एतासां नामानि अवगतानि सन्ति, तथापि शब्दानुसारिशिष्यानां अनुग्रहार्थं एव पुन: पुन: प्रकृतीनां नामानि कथितानि, अत: न पुनरुक्तदोषो मन्तव्य:।
तात्पर्यमत्र-अनिवृत्तिकरणनामनवमगुणस्थाने पञ्जभागा: सन्ति, तत्र प्रथमभागे पंचप्रकृतिबंधस्थानं, द्वितीयस्थाने चतु:प्रकृतिबंधस्थानं, तृतीयभागे त्रिप्रकृतिबंधस्थानं, चतुर्थभागे द्विप्रकृतिबंधस्थानं, पंचमभागे एकप्रकृतिबंधस्थानं। एतद्बंधस्थानानि पठित्वा कदास्माकं त्रयोदशादिएकप्रकृतिपर्यंतबंधस्थानानि भविष्यन्तीति भावनां भावयद्भि: मोहनीयकर्मनिर्मूलनार्थं जिनेन्द्रदेवचरणकमलयो: प्रार्थना कर्तव्या इति।
एवं पंचमस्थले मोहनीयस्थान-प्रकृति-स्वामिकथनत्वेन त्रिंशत्सूत्राणि गतानि।

अब तृतीय स्थान के प्रकृति और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वितीय बंधस्थान की इक्कीस प्रकृतियों में से अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ और स्त्रीवेद को छोड़कर यह सत्तरह प्रकृतिक तृतीय बंधस्थान होता है।।२६।।

अप्रत्याख्यानावरणीय आदि बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य-रति और अरति-शोक इन दोनों युगलों में कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा, इन सत्रह प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।२७।।

वह सत्रह प्रकृतिक तृतीय बंधस्थान सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि के होता है।।२८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इक्कीस प्रकृतियों में से अनंतानुबंधी चतुष्क प्रकृतियों को निकाल देने पर सत्रह प्रकृतियां होती हैं। यहाँ प्रथम सूत्र व्यतिरेक नय वाले जीवों के अनुग्रह के लिये कहा गया है।

पुन: वे प्रकृतियां कौन-कौन हैं ? ऐसा पूछने वाले मंदबुद्धि शिष्यों के अनुग्रहार्थ प्रकृतियों के नाम को सूचित करने वाला दूसरा सूत्र है। सूत्र में जो ‘एकम्हि’ पद है उससे सत्रह संख्या वाले एक-एक स्थान में अथवा इनके बंधयोग्य जीव के परिणाम में उनका अवस्थान होता है ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिये। यहाँ दो भंग होते हैं-हास्य-रति और अरति-शोक युगलों की अपेक्षा से ऐसा समझना।

तृतीयगुणस्थानवर्ती अथवा चतुर्थगुणस्थानवर्ती इस स्थान के स्वामी हैं, क्योंकि ऊपर में अप्रत्याख्यानचतुष्क के बंध का अभाव है और उदय का भी अभाव है।

अब चौथे तेरह प्रकृतिक स्थान और स्वामी को कहने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मोहनीय कर्म सम्बन्धी उपर्युक्त दश बंधस्थानों में तृतीय बंधस्थान की सत्रह प्रकृतियों में से अप्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया और लोभ को छोड़कर यह तेरह प्रकृतिक चतुर्थ बंधस्थान होता है।।२९।।

उनके नाम-प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया, लोभ और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ, पुरुषवेद, हास्य-रति तथा अरति-शोक इन दोनों युगलों में से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा, इन तेरह प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।३०।।

यह तेरह प्रकृतिक चतुर्थ बंधस्थान संयतासंयत के होता है।।३१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका- सूत्र में जो ‘वज्ज’ पद है उसे ‘वज्जिय’ अर्थात् छोड़ करके ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिये। पूर्वोक्त सत्रह प्रकृतियों में से अप्रत्याख्यान चतुष्क को निकाल देने पर तेरह प्रकृतियां रहती हैं। यहाँ दो भंग जानना चाहिये। इनके स्वामी देशव्रती ही हैं।

अब नव प्रकृतियों के स्थान और स्वामी का निरूपण करने के लिये तीन सूत्र कहते हैं-

सूत्रार्थ-

मोहनीय कर्म के उक्त दश स्थानों में चतुर्थ स्थान तेरह प्रकृतिक है-उनमें से प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय को निकाल देने पर यह नौ प्रकृतिक पांचवां बंध स्थान होता है।।३२।।

चारों संज्वलन कषाय, पुरुषवेद, हास्य-रति और अरति-शोक इन दोनों युगलों में से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा इन नव प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।३३।।

वह नौ प्रकृतिक पंचम बंधस्थान संयत मुनियों के होता है।।३४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका- सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ भी दो भंग होते हैं। सूत्र में ‘संजदस्स’ ऐसा कहने पर प्रमत्त मुनि से लेकर अपूर्वकरणपर्यंत के मुनियों का ग्रहण है क्योंकि ऊपर में छह नोकषायों का बंध नहीं होता है अत: आगे नव प्रकृतिरूप स्थान का होना संभव नहीं है।

अब पांच, चार, तीन, दो और एक बंध स्थानों के स्वामी का कथन करने के लिये पन्द्रह सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मोहनीयकर्म सम्बन्धी उक्त दश बन्धस्थानों में पंचमस्थान की नौ प्रकृतियों में से हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा को छोड़कर यह पाँच प्रकृतिक छठा बंधस्थान है।।३५।।

क्रोध आदि चारों संज्वलन कषाय और पुरुषवेद, इन पांचों प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।३६।।

वह पांच प्रकृतिक छठा बंधस्थान संयत के होता है।।३७।।

मोहनीय कर्म सम्बन्धी उक्त दश बंधस्थानों में छठे बंधस्थान की पांच प्रकृतियों में से पुरुषवेद को छोड़कर यह चार प्रकृतिक सातवां बंधस्थान होता है।।३८।।

क्रोध संज्वलन, मान संज्वलन, माया संज्वलन और लोभ संज्वलन इन चारों प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।३९।।

वह चार प्रकृतिक सातवां बंधस्थान संयत के होता है।।४०।।

मोहनीय कर्म सम्बन्धी उक्त दश बन्धस्थानों में सप्तम बन्धस्थान की चार प्रकृतियों में से क्रोध संज्वलन को छोड़कर यह तीन प्रकृतिक आठवां बन्धस्थान होता है।।४१।।

मान संज्वलन, माया संज्वलन और लोभ संज्वलन इन तीनों प्रकृतियों के बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।४२।।

वह तीन प्रकृतिक अष्टम बंधस्थान संयत के होता है।।४३।।

मोहनीय कर्म सम्बन्धी उक्त दश बन्धस्थानों में अष्टम बंधस्थान की तीन प्रकृतियों में से मान संज्वलन को छोड़कर यह दो प्रकृतिक नौवां बंधस्थान होता है।।४४।।

माया संज्वलन और लोभ संज्वलन, इन दोनों प्रकृतियों के बन्ध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।४५।।

वह दो प्रकृतिरूप नवम बंधस्थान संयत के होता है।।४६।।

मोहनीय कर्म सम्बन्धी उक्त दश बन्धस्थानों में नवम बन्धस्थान की दो प्रकृतियों में से मायासंज्वलन को छोड़कर यह एक प्रकृतिक दसवाँ बंधस्थान होता है।।४७।।

लोभ संज्वलन, इस एक प्रकृति के बन्ध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।४८।।

वह एक प्रकृतिक दशवाँ बंधस्थान संयत के होता है।।४९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ सूत्रों का अर्थ सुगम है। यद्यपि प्रमाणानुसारी शिष्यों के द्वारा इन प्रकृतियों के नाम जान लिये गये हैं तथापि शब्दानुसारी शिष्यों के अनुग्रह हेतु ही पुन:-पुन: प्रकृतियों के नाम कहे गये हैं, इसलिये पुनरुक्त दोष नहीं मानना चाहिये।

यहाँ तात्पर्य यह है कि अनिवृत्तिकरण नाम के नवमें गुणस्थान में पाँच भाग हैं। उनमें से प्रथम भाग में पंचप्रकृतिक बंधस्थान हैं, द्वितीय भाग में चार प्रकृतिक बंधस्थान हैं, तृतीय भाग में तीन प्रकृतिक बंधस्थान हैं, चतुर्थ भाग में दो प्रकृतिक बंधस्थान हैं एवं पाँचवें भाग में एक प्रकृतिक बंधस्थान है। इन सभी बन्धस्थानों को पढ़कर कब हमारे ये तेरह प्रकृतिक बंधस्थान से लेकर एक प्रकृतिक बंधस्थान होवेंगे ऐसी भावना भाते हुये मोहनीय कर्म को निर्मूल नष्ट करने के लिये श्री जिनेन्द्रदेव के चरणकमलों में प्रार्थना करना चाहिये अर्थात् ये तेरह प्रकृतिक बंधस्थान देशव्रती-संयतासंयत के होता है, आगे के सभी नव प्रकृतिक आदि बंधस्थान मुनियों के ही होते हैं तथा मुनि हुये बिना श्रेण्यारोहण एवं मोहनीय कर्म का नाश संभव ही नहीं है ऐसा जानकर मोहनीय कर्म के नाश करने हेतु भावना भाते रहना चाहिये।

इस प्रकार पांचवें स्थल में मोहनीय कर्म के स्थान, प्रकृतियां एवं उनके स्वामी का कथन करने रूप से तीस सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अधुना आयुकर्मण: स्थानसंख्या-प्रकृति-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रदशकमवतार्यते-

आउअस्स कम्मस्स चत्तारिपयडीओ।।५०।।

णिरआउअं तिरिक्खाउअं मणुसाउअं देवाउअं चेदि।।५१।।
जं तं णिरयाउअं कम्मं बंधमाणस्स।।५२।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स।।५३।।
जं तं तिरिक्खाउअं कम्मं बंधमाणस्स।।५४।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा।।५५।
जं तं मणुसाउअं कम्मं बंधमाणस्स।।५६।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा।।५७।।
जं तं देवाउअं कम्मं बंधमाणस्स।।५८।।
तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।५९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यत् सूत्रयो: आयुकर्मण: संख्या-नामानि कथितानि, तत् केवलं विस्मरणशीलशिष्यसंभालनार्थं एव। नरकायु: बंधस्थानं मिथ्यादृष्टेरेव, मिथ्यात्वोदयेन विना नरकायुष: बंधाभावात्। तथैव संयतासंयतादिउपरिमगुणस्थानेषु मनुष्यायु:बंधपरिणामाभावात् तस्य बंध: चतुर्थगुणस्थानपर्यन्तमेव। तृतीयगुणस्थाने चत्वार्यपि आयूंषि बंधस्वरूपेण न सन्ति इति ज्ञातव्यं। तत्र एकस्यापि आयुष: स्वामित्वप्ररूपणाभावात्। देवायुष: बंधोऽपि संयतेषु संयतासंयतेषु च भवतीति ज्ञातव्यं। किंच-‘अणुवदमहव्वदाइं ण लहइ देवाउगं मोत्तुं।’’ इति ज्ञात्वा अणुव्रती महाव्रती वा भूत्वा मनुष्यजन्म सफलीकर्तव्यमिति।
एवं षष्ठस्थले आयु: कर्मण: स्थान-स्वामिकथनमुख्यत्वेन दश सूत्राणि गतानि।
अधुना नामकर्मण: स्थानसंख्या-नरकगतिस्थानप्ररूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-णामस्स कम्मस्स अट्ठ ट्ठाणाणि, एक्कत्तीसाए तीसाए एगूणतीसाए अट्ठवीसाए छव्वीrसाए पणुवीसाए तेवीसाए एक्किस्से ट्ठाणं चेदि।।६०।।
तत्थ इमं अट्ठावीसाए ट्ठाणं, णिरयगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं वेउव्वियसरीरअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस-फासं णिरयगइपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअ-लहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं अप्पसत्थविहायगई तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-अथिर-असुह-दुहव-दुस्सर-अणादेज्ज-अजसकित्ति-णिमिणणामं। एदासिं अट्ठावीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।६१।।
णिरयगइं पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।६२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र प्रथमसूत्रं संग्रहनयाश्रितमस्ति, बीजपदस्वरूपत्वात्, द्वितीयसूत्रे नरकगति संयुक्ताष्टाविंशति प्रकृतिस्थानं कथ्यते। नरकगत्या सह एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियजातिप्रकृतयो न बध्यन्ते, विरोधात्।
एतासां सत्त्वानामक्रमेण एकजीवे वृत्तिदर्शनात् बंधोऽपि भवेत् ?
न, सत्त्वं प्रतिविरोधाभावात्। न बंधेन अविरोध:, तथोपदेशाभावात्। न च सत्तायां विरोधाभावं दृष्ट्वा बंधेऽपि तदभावो वक्तुं शक्यते, बंधसत्त्वयोरेकत्वाभावात्। एतत् अष्टाविंशतिनामकर्मप्रकृतिबंधस्थानं पंचेन्द्रियजाति-पर्याप्तनामकर्मसंयुक्तनरकगतिं बध्यमानस्य मिथ्यादृष्टे: भवति। उपरिमगुणस्थानेषु नरकगते: बंधाभावात्।
एवं सप्तमस्थले नामकर्मण: स्थानानां नरकगतिबंधस्थानप्रकृतीनां कथनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति नामकर्मण: स्थानानां तिर्यग्गत्यपेक्षया त्रिंशत्प्रकृतिस्थानस्य च प्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-तिरिक्खगदिणामाए पंच ट्ठाणाणि, तीसाए एगूणतीसाए छव्वीसाए पणुवीसाए तेवीसाए ट्ठाणं चेदि।।६३।।
तत्थ इमं पढमत्तीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा कम्मइय सरीरं छण्हं संट्ठाणाणमेक्कदरं ओरालियसरीरअंगोवंगं छण्हं संघडणणाणमेक्कदरं वण्णगंधरसफासं तिरिक्खगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुवलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-उज्जोवं दोण्हं विहायगदीणमेक्कदरं तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुभासुभाण-मेक्कदरं सुहव-दुहवाणमेक्कदरं सुस्सरदुस्सराणमेक्कदरं आदेज्ज-अणादेज्जाण-मेक्कदरं जसकित्ति-अजसकित्तीणमेक्कदरं णिमिणणामं च। एसासिं पढमत्तीसाए पयडीणं एक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।६४।।
तिरिक्खगदिं पंचिंदियपज्जत्तउज्जोवसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छा-दिट्ठिस्स।।६५।।
तत्थ इमं विदियत्तीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं वज्ज पंचण्हं संठाणाणमेक्कदरं ओरालिय-सरीरअंगोवंगं असंपत्तसेवट्टसंघडणं वज्ज पंचण्हं संघडणाणमेक्कदरं वण्णगंधरसफासं तिरिक्खगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुव-लहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-उज्जोवं दोण्हं विहायगदीणमेक्कदरं तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुहासुहाणमेक्कदरं सुहव-दुहवाणमेक्कदरं सुस्सर-दुस्सराणमेक्कदरं आदेज्ज-अणादेज्जाणमेक्कदरं जसकित्ति-अजसकित्तीणमेक्कदरं णिमिणणामं। एदासिं विदियत्तीसाए पयडीणं एक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।६६।।
तिरिक्खगदिं पंचिंदियपज्जत्तउज्जोवसंजुत्तं बंधमाणस्स तं सासणसम्मा-दिट्ठिस्स।।६७।।
तत्थ इमं तदियत्तीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी वीइंदिय-तीइंदिय-चदुिंरदिय तिण्हं जादीणमेक्कदरं ओरालिय-तेया-कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं ओरालिय-सरीरअंगोवंगं असंपत्तसेवट्टसरीरसंघडणं वण्णगंधरसफासं तिरिक्खगदिपा-ओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुव-उवघाद-परघाद-उस्सास-उज्जोवं अप्पसत्थ-विहायगदी तसबादरपज्जत्तपत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुभासुभाण-मेक्कदरं दुभग-दुस्सर-अणादेज्जं जसकित्ति-अजस-कित्तीणमेक्कदरं णिमिणणामं। एदासिं तदियतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।६८।।
तिरिक्खगदिं विगलिंदिय-पज्जत्त-उज्जोवसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।६९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र प्रथमसूत्रं संग्रहनयाश्रियं, एतस्मिन् उपरि उच्यमानसर्वार्थ संभवात्। प्रथमत्रिंशत्स्थाने एतासां अक्रमेण बंधयोग्यपरिणामे वा स्थानं भवति अत्र भंगप्रमाणं चतु:सहस्र-षट्शत-अष्टसंख्या भवति।
तत्कथं ?
उच्यते-षट्संस्थानानां षट्संहननानां विहायोगति-स्थिर-शुभ-सुभग-सुस्वर-आदेय-यश:कीर्तियुगलानां सप्तानां परस्परं गुणिते इयं संख्या भवति । (६²६²२²२²२²२²२²२²२·४६०८)
उक्तं च- संठाणे संघडणे विहायजुम्मे य चरिमछज्जुम्मे।
अविरुद्धेक्कदरादो बंधट्ठाणेसु भंगा हु।।
अस्य स्थानस्य बंधक: पंचेन्द्रियपर्याप्त: उद्योतसंयुक्त: तिर्यग्गतिं बध्यमान: मिथ्यादृष्टिरेव भवति।
द्वितीय त्रिंशत्प्रकृतिबंधस्थाने भंगा: द्वात्रिंशत्शतानि। अत्र पंचसंस्थान-पंचसंहनन-विहायोगत्यादि-सप्तयुगलानि, एतेषां परस्परे गुणिते त्रिसहस्राणि-द्विशतानि भवन्ति।
अंतिमसंस्थान-अन्तिमसंहनने सासादनस्य किं न बंधं आगच्छत: ?
न, तत्र तद्बन्धयोग्यतीव्रसंक्लेशाभावात्। अत्रापि तिर्यग्गतिं बध्यमानस्य पंचेन्द्रिय-पर्याप्त-उद्योतसंयुक्तां सासादनसम्यग्दृष्टे: जीवस्य इदं स्थानं भवति।
तृतीयं त्रिंशत्प्रकृतिबंधस्थानं विकलेन्द्रियाणामेव।
कश्चिदाह-विकलेन्द्रियाणां बंध: उदयोऽपि हुंडसंस्थानमेवेति सूत्रे प्रोउक्तं, नेदं घटते, तेषां षट्संस्थानोपलंभात् ?
नैष दोष:, सर्वावयवेषु नियतस्वरूपपंचसंस्थानेषु द्वि-त्रि-चतु:-पंचसंस्थानानां संयोगेन हुंडसंस्थानमनेक-भेदभिन्नमुत्पद्यते। तानि च पंचसंस्थानानि प्रत्येकमवयवं प्रति ईदृशानि इति न ज्ञायन्ते, संप्रति तथाविधोप-देशाभावात्। न च तेषु अविज्ञातेषु एतेषामेष: संयोग: इति ज्ञातुं शक्यते। तत: सर्वेऽपि विकलेन्द्रिया: हुंडसंस्थाना अपि भवन्त: न ज्ञायन्ते इति सिद्धम्।
विकलेन्द्रियाणां बंध: उदयोऽपि दु:स्वरं चैव भवति इति सूत्रेउक्तं, किन्तु भ्रमरादय: सुस्वरा अपि दृश्यन्ते, तत: कथमेतत् घटते ?
न, भ्रमरादिषु कोकिलासु इव मधुरस्वरानुपलंभात्।
भिन्नरुच्या: केषामपि जीवानाममधुरोऽपि स्वर: मधुर इव रुच्यते, इति तस्य स्वरस्य मधुरत्वं किं न इष्यते ?
नैष दोष:, पुरुषेच्छात: वस्तुपरिणामानुपलंभात्। न च निम्ब: केषामपि रुच्यते इति मधुरत्वं प्रतिपद्यते, अव्यवस्थापत्ते:। अत्र भंगा: चतुर्विंशति:। त्रिजाति-स्थिर-शुभ-यश:कीर्तियुगलानां परस्परे गुणिते इमे भंगा: भवन्ति। (३²२²२²२·२४)। ये केचित् विकलेन्द्रिय-पर्याप्त-उद्योतसंयुक्तां तिर्यग्गतिं बध्नन्त: मिथ्यादृष्टय:, तेषामेव इदं तृतीयस्थानं भवति।

अब आयु कर्म की स्थानसंख्या, प्रकृतियां और स्वामी को प्रतिपादित करने हेतु दश सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

आयु कर्म की चार प्रकृतियाँ हैं।।५०।।

नारकायु, तिर्यगायु, मनुष्यायु और देवायु, ये आयु कर्म की चार प्रकृतियाँ हैं।।५१।।

आयु कर्म की चार प्रकृतियों में जो नारकायु कर्म है उसके बंध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।५२।।

वह बन्धस्थान मिथ्यादृष्टि के होता है।।५३।।

जो तिर्यगायु कर्म है, उसका बन्ध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।५४।।

वह तिर्यगायु का बन्धरूप एक प्रकृतिक स्थान मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि के होता है।।५५।।

जो मनुष्यायु कर्म है, उसका बन्ध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान है।।५६।।

वह मनुष्यायु के बन्धरूप एक प्रकृतिक स्थान मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि के होता है।।५७।।

जो देवायु कर्म है, उसे बन्ध करने वाले जीव का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।५८।।

वह देवायु का बन्ध रूप एक प्रकृतिक स्थान मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।५९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जो दो सूत्रों में प्रारम्भ में आयु कर्म के भेद और नाम कहे हैं वे केवल विस्मरणशील शिष्यों को समझाने के लिये ही कहे हैं।

इनमें से नरक आयु का बंधस्थान मिथ्यादृष्टि के ही होता है, क्योंकि मिथ्यात्व के उदय के बिना नरकायु का बंध नहीं हो सकता। उसी प्रकार से संयतासंयत आदि ऊपर के गुणस्थानों में मनुष्यायु के बंध के परिणामों का अभाव है, क्योंकि मनुष्यायु का बंध चौथे गुणस्थान पर्यन्त ही है। तीसरे गुणस्थान में चारों भी आयु बंधस्वरूप से नहीं हैं ऐसा जानना चाहिये, वहाँ एक भी आयु के स्वामी की प्ररूपणा नहीं है। देवायु का बंध भी संयतों में-मुनियों के होता है क्योंकि मुनियों के तथा देशव्रती-संयतासंयतों के मनुष्यायु के सिवाय अन्य आयु का बंध होता ही नहीं है ऐसा नियम है। गोम्मटसार में कहा भी है-देवायु को छोड़कर अणुव्रत और महाव्रत को नहीं प्राप्त करते हैं।

ऐसा जानकर अणुव्रती अथवा महाव्रती बनकर मनुष्य पर्याय को सफल करना चाहिये।

इस प्रकार छठे स्थल में आयु कर्म के स्थान और स्वामी के कथनरूप से दश सूत्र पूर्ण हुये।

अब नामकर्म के स्थान, संख्या तथा नरकगति के स्थान की प्ररूपणा करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के आठ बन्धस्थान हैं-इकतीस प्रकृतिक, तीस प्रकृतिक, उनतीस प्रकृतिक, अट्ठाईस प्रकृतिक, छब्बीस प्रकृतिक, पच्चीस प्रकृतिक, तेईस प्रकृतिक और एक प्रकृतिक बन्धस्थान।।६०।।

नामकर्म के उक्त आठ बन्धस्थानों में से यह अट्ठाईस प्रकृतिक बन्धस्थान है-नरकगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, अप्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति और निर्माणनाम। इन अट्ठाईस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।६१।।

वह अट्ठाईस प्रकृतिक बन्धस्थान, पंचेन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त नरकगति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि के होता है।।६२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ प्रथम सूत्र संग्रहनयाश्रित है, क्योंकि यह बीजपदस्वरूप है। अगले सूत्र में नरकगति के साथ बंधने योग्य अट्ठाईस प्रकृतियां बतायी हैं।

नरकगति के साथ एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जाति प्रकृतियां नहीं बंधती हैं, क्योंकि विरोध है।

शंका-इन प्रकृतियों के सत्त्व की एक साथ एक जीव में वृत्ति देखी जाती है, इसलिये बंध भी हो सकता है ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि सत्त्व के प्रति विरोध का अभाव है, किन्तु उन प्रकृतियों का बंध के साथ विरोध है, क्योंकि वैसा उपदेश नहीं पाया जाता है। सत्ता में विरोध के अभाव को देखकर बंध में भी उन प्रकृतियों का अभाव कहना शक्य नहीं है, क्योंकि बंध और सत्त्व में एकत्त्व का अभाव है।

यह अट्ठाईस प्रकृति वाला बंधस्थान जो नामकर्म का है वह पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्म सहित नरकगति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है क्योंकि ऊपर के गुणस्थानों में नरकगति के बंध का अभाव है।

इस प्रकार सातवें स्थल में नामकर्म के स्थानों का एवं नरकगति के बंधस्थान और प्रकृतियों के कथनरूप से तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब नामकर्म के स्थानों का और तिर्यंचगति की अपेक्षा से कथन करते हुये तीस प्रकृतिक स्थान का प्रतिपादन करने हेतु सात सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यग्गतिनामकर्म के पाँच बन्धस्थान हैं-तीस प्रकृतिक, उनतीस प्रकृतिक, छब्बीस प्रकृतिक, पच्चीस प्रकृतिक और तेवीस प्रकृतिक सम्बन्धी बन्धस्थान।।६३।।

नामकर्म के तिर्यग्गतिसम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह प्रथम तीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, छहों संस्थानों में से कोई एक६, औदारिक शरीरअंगोपांग७, छहों संहननों में से कोई एक८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, परघात१६, उच्छ्वास१७, उद्योत१८, दोनों विहायोगतियों में से कोई एक१९, त्रस२०, बादर२१, पर्याप्त२२, प्रत्येक शरीर२३, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२४, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२५, सुभग और दुर्भग इन दोनों में से कोई एक२६, सुस्वर और दु:स्वर इन दोनों में से कोई एक२७, आदेय और अनादेय इन दोनों में से कोई एक२८, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२९ और निर्माण नामकर्म३०। इन प्रथम तीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।६४।।

वह प्रथम तीस प्रकृतिक बन्धस्थान, पंचेन्द्रिय जाति, पर्याप्त और उद्योत नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि के होता है।।६५।।

नामकर्म के तिर्यग्गतिसम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह द्वितीय तीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान को छोड़कर शेष पाँचों संस्थानों में से कोई एक६, औदारिक शरीर अंगोपांग७, असंप्राप्तसृपाटिका संहनन को छोड़कर शेष पांचों संहननों में से कोई एक८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, परघात१६, उच्छ्वास१७, उद्योत१८, दोनों विहायोगतियों में से कोई एक१९, त्रस२०, बादर२१, पर्याप्त२२, प्रत्येक शरीर२३, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२४, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२५, सुभग और दुर्भग इन दोनों में से कोई एक२६, सुस्वर और दु:स्वर इन दोनों में से कोई एक२७, आदेय और अनादेय इन दोनों में से कोई एक२८, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२९ तथा निर्माण नामकर्म३०। इन द्वितीय तीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।६६।।

वह द्वितीय तीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति, पर्याप्त और उद्योत नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले सासादनसम्यग्दृष्टि के होता है।।६७।।

नामकर्म के तिर्यग्गतिसम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह तृतीय तीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति और चतुरिन्द्रिय जाति इन तीन जातियों में से कोई एक२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान६, औदारिक शरीर अंगोपांग७, असंप्राप्तासृपाटिका संहनन८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, परघात१६, उच्छ्वास१७, उद्योत१८, अप्रशस्त विहायोगति१९, त्रस२०, बादर२१, पर्याप्त२२, प्रत्येक शरीर२३, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२४, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२५, दुर्भग२६, दु:स्वर२७, अनादेय२८, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२९ तथा निर्माण नामकर्म३०। इन तृतीय तीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।६८।।

वह तृतीय तीस प्रकृतिरूप बंधस्थान विकलेन्द्रिय, पर्याप्त और उद्योत नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।६९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इनमें से प्रथम सूत्र संग्रहनयाश्रित है, क्योंकि, आगे कहे जाने वाले सभी अर्थ इसमें संभव हैं।

इनमें से प्रथम तीस प्रकृतिक स्थान में अथवा इन प्रकृतियों के अक्रम से बंध योग्य परिणाम में स्थान होता है। यहाँ भंग के प्रमाण की संख्या चार हजार छह सौ आठ है।

शंका-वह कैसे है ?

समाधान-उसे कहते हैं-छह संस्थानों को, छह संहननों को, विहायोगति, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय और यशस्कीर्ति इन सात युगलों को परस्पर में गुणित करने पर ६ ² ६ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ · ४६०८ अर्थात् छ्यालीस सौ आठ भंग होते हैं।

गोम्मटसार कर्मकाण्ड में कहा भी है-

संस्थान, संहनन, विहायोगति युगल और अंतिम छह युगल, इन सभी में से एक-एक प्रकृति का बंध पाया जाता है अत: इन सभी का (६ ² ६ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ · ४६०८) परस्पर में गुणा करने पर ४६०८ भंग होते हैं।

इस स्थान के बंध करने वाले पंचेन्द्रिय, पर्याप्त, उद्योत प्रकृति से संयुक्त, तिर्यंचगति को बांधते हुए मिथ्यादृष्टि ही होते हैं।

द्वितीय-दूसरे प्रकार से तीस प्रकृतिक बंधस्थान में बत्तीस सौ भंग होते हैं। इसमें पांच संस्थान, पांच संहनन, विहायोगति आदि सात युगल, इनको परस्पर में गुणित करने पर तीन हजार दौ सौ भंग होते हैं। यह द्वितीय बंधस्थान सासादनगुणस्थान में होता है।

शंका-अंतिम हुण्डकसंस्थान और अंतिम असंप्राप्तसृपाटिका संहनन सासादन सम्यग्दृष्टि के क्यों नहीं बंध को प्राप्त होते हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि सासादन में उन दोनों प्रकृतियों के बंध योग्य तीव्र संक्लेश परिणामों का अभाव है। यहाँ पर भी पंचेन्द्रिय, पर्याप्त और उद्योत प्रकृति से संयुक्त तिर्यंचगति को बांधने वाले सासादन सम्यग्दृष्टि जीव के यह स्थान होता है।

तीसरा तीस प्रकृतिक बंधस्थान विकलेन्द्रिय जीवों के ही होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-

विकलेन्द्रिय जीवों में बंध और उदय भी हुण्डकसंस्थान का ही है ऐसा सूत्र में कहा है, अत: यह कथन आपका घटित नहीं होता है, क्योंकि, उनके छहों ही संस्थानों की उपलब्धि होती है ?

आचार्यदेव कहते हैं-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, सर्व अवयवों में नियतस्वरूप वाले पांच संस्थानों के होने पर दो, तीन, चार और पांच संस्थानों के संयोग से हुण्डकसंस्थान अनेक भेद वाला उत्पन्न होता है और वे पांच संस्थान प्रत्येक अवयव के प्रति ‘इस प्रकार के आकार वाले होते हैं’ यह नहीं जाना जाता है, क्योंकि इस काल में उस प्रकार के उपदेश का अभाव है और उन संयोगी भेदों के नहीं ज्ञात होने पर इन जीवों के ‘अमुक संस्थानों के संयोगात्मक यह भंग है’ यह नहीं जाना जा सकता है। अतएव सभी विकलेन्द्रिय जीव हुण्डकसंस्थान वाले होते हुए भी नहीं जाने जाते हैं, यह बात सिद्ध हुई।

शंका-विकलेन्द्रियों के बंध और उदय दोनों में भी दु:स्वर ही है, ऐसा सूत्र में कहा है, किन्तु भ्रमर आदि कुछ विकलेन्द्रिय जीव सुस्वर भी देखे जाते हैं, अत: यह बात कैसे घटित होगी कि उनके सुस्वर प्रकृति का बंध या उदय नहीं है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि भ्रमर आदि में कोकिलाओं के समान मधुर स्वर नहीं पाया जाता है।

शंका-भिन्न रुचि होने से कितने ही जीवों को अमधुर स्वर भी मधुर स्वर के समान रुचता है, इसलिये उस-भ्रमर के स्वर की मधुरता क्यों नहीं मान ली जाती है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि पुरुषों की इच्छा से वस्तु का परिणमन नहीं पाया जाता है। नीम कितने ही जीवों को रुचता है तो भी वह मधुरता को प्राप्त नहीं हो जाता है अन्यथा अव्यवस्था हो जावेगी। यहाँ भंग चौबीस होते हैं। तीन जाति, स्थिर, शुभ और यशस्कीर्ति ये तीन युगल इनको परस्पर में गुणित करने पर (३ ² २ ² २ ² २ · २४) चौबीस भंग हो जाते हैं। जो कोई विकलेन्द्रिय, पर्याप्त और उद्योत से संयुक्त तिर्यंच गति को बांधते हुये मिथ्यादृष्टि जीव हैं, उनके ही यह तीसरा स्थान होता है।

अधुना एकोनत्रिंशत्प्रकृतिनामकर्मण: त्रिविधस्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-

तत्थ इमं पढमऊणतीसाए ट्ठाणं। जधा, पढमतीसाए भंगो। णवरि उज्जोवं वज्ज। एदासिं पढमऊणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।७०।।

तिरिक्खगदिं पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादि-ट्ठिस्स।।७१।।
तत्थ इमं विदियएगूणतीसाए ट्ठाणं। जधा, विदियत्तीसाए भंगो। णवरि उज्जोवं वज्ज। एदासिं विदीए ऊणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।७२।।
तिरिक्खगदिं पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं सासणसम्मादि-ट्ठिस्स।।७३।।
तत्थ इमं तदियऊणतीसाए ट्ठाणं। जधा, तदियतीसाए भंगो। णवरि उज्जोवं वज्ज। एदासिं तदियऊणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।७४।।
तिरिक्खगदिं विगलिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादि-ट्ठिस्स।।७५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकोनत्रिंशन्नामकर्मप्रकृतिस्थानानि इमानि त्रीण्यपि पूर्ववद् ज्ञातव्यानि केवलं उद्योतप्रकृतिरहितानि इति। प्रथमस्थानं पंचेन्द्रियपर्याप्तसहिततिर्यग्गतिं बध्नन्त: मिथ्यादृष्टय: प्राप्नुवन्ति। द्वितीयस्थानं तथैव सासादना:, तृतीयस्थानं विकलत्रय-पर्याप्तसंयुक्ततिर्यग्गतिं बध्नन्त: मिथ्यादृष्टिजीवा: एव बध्नन्ति।
अधुना षड्विंशतिप्रकृतिस्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
तत्थ इमं छब्बीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी एइंदियजादी ओरालिय-तेजा कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं वण्ण-गंध-रस-फासं तिरिक्खगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअ-लहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं आदावुज्जोवाणमेक्कदरं थावर-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराण-मेक्कदरं सुहासुहाणमेक्कदरं दुहव-अणादेज्जं जसकित्ति-अजसकित्तीणमेक्कदरं णिमिणणामं। एदासिं छव्वीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।७६।।
तिरिक्खगदिं एइंदिय-बादर-पज्जत्त-आदाउज्जोवाणमेक्कदरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।७७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रियाणां अंगोपांगनामकर्मोदय: नास्ति, तेषां नलक-बाहु-नितंब-पृष्ठ-शीर्ष-उरसां अभावात्।
एकेन्द्रियाणां षट्संस्थानानि किन्न प्ररूपितानि ?
न, प्रत्येकमवयवेषु प्ररूपितलक्षणपंचसंस्थानां समूहस्वरूपेण धारकाणां षट्संस्थानास्तित्वविरोधात्। अत्र भंगा: षोडश। आतप-स्थिर-शुभ-यश:कीर्तियुगलानां परस्परे गुणिते (२²२²२²२·१६) भंगा: षोडश भवन्ति। तिर्यग्गतिं बध्नन्त: एकेन्द्रिय-बादर-पर्याप्त-आतपसंयुक्तां उद्योतसंयुक्तां वा मिथ्यादृष्टय: बध्नन्ति, इति ज्ञातव्यं, अन्येषामेकेन्द्रियजातेर्बन्धाभावात्।
संप्रति पंचविंशतिप्रकृतिस्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
तत्थ इमं पढमपणुवीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी एइंदियजादी ओरालिय-तेजा-कम्मइय-सरीरं हुंडसंठाणं वण्ण-गंध-रस-फासं तिरिक्खगदिपा-ओग्गाणुपुव्वी अगुरुअ-लहुअ-उवघाद-परघाद-उस्साद-थावरं-बादर-सुहुमाणमेक्कदरं पज्जत्तं पत्तेग-साधारणसरीराण-मेक्कदरं थिराथिराण-मेक्कदरं सुहासुहाणमेक्कदरं दुहव-अणादेज्जं जसकित्ति-अजसकित्तीण-मेक्कदरं णिमिणणामं। एदासिं पढमपणुवीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।७८।।
तिरिक्खगदिं एइंदिय-पज्जत्त-बादर-सुहुमाणमेक्कदरं संजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।७९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र बादर-प्रत्येकशरीर-स्थिर-शुभ-यश:कीर्तियुगलानां विकल्पेन द्वात्रिंशद् भंगा भवन्ति। (२²२²२²२²२·३२)
अगुरुकलघुकत्वं नाम सर्वजीवानां पारिणामिकमस्ति, सिद्धेषु क्षीणाशेषकर्मषु अपि तस्योपलंभात्। तत: अगुरुलघुकर्मण: फलाभावात् तस्याभाव: इति ? अत्र परिहार:-भवेत् एष दोष:, यदि अगुरुकलघुकं जीवविपाकी भवति।
किन्तु इदं कर्म पुद्गलविपाकी, अनन्तानन्तपुद्गलै: गुरुकस्पर्शै: आरब्धस्य शरीरस्य अगुरुकलघुकत्वोत्पादनात्। अन्यथा गुरुकशरीरेण अवष्टब्ध: जीव: उत्थातुमपि न शक्येत। न चैवं, शरीरस्य अगुरु-अलघुकत्वानामनुपलंभात्। एतत् स्थानं एकेन्द्रियजातिबंधकानां मिथ्यादृष्टीनामेव, उपरिमाणां एकेन्द्रियबादर-सूक्ष्म प्रकृतीनां बंधाभावात्।
द्वितीयपंचविंशतिप्रकृतिस्थान-स्वामिनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
तत्थ इमं विदियपणुवीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी वेइंदिय-तीइंदिय-चउिंरदिय-पंचिंदिय चदुण्हं जादीणमेक्कदरं ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं ओरालियसरीरअंगोवंगं असंपत्तसेवट्टसरीरसंघडणं वण्ण-गंध-रस-फासं तिरिक्खगदीपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअ-लहुअ-उवघाद-तस-बादर-अपज्जत्त-पत्तेयसरीर-अथिर-असुभ-दुहव-अणादेज्ज-अजसकित्ति-णिमिणं। एदासिं विदियपणुवीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।८०।।
तिरिक्खगदिं तस अपज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।८१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-परघात-उच्छ्वास-विहायोगति-स्वरनामकर्मणामत्र बंधो नास्ति, अपर्याप्तबंधेन सह विरोधात्, अपर्याप्तकाले एतेषामुदयाभावाच्च।
येषामत्र उदयोऽस्ति तेषां चैव तत्र बंध:। अनेन कथनेन न च स्थिर-शुभाभ्यामनेकान्त: शुभाशुभप्रकृत्यो: अध्रुवबन्धिनोरक्रमेण बंधाभावात्। अत्र भंगा: चत्वार: द्वीन्द्रियादिचतु:जातिविकल्पेन इति ज्ञातव्यं।
अधुना त्रयोविंशतिप्रकृतिस्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
तत्थ इमं तेवीसाए ट्ठाणं, तिरिक्खगदी एइंदियजादी ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं वण्ण-गंध-रस-फासं तिरिक्खगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-थावरं बादरसुहुमाणमेक्कदरं अपज्जत्तं पत्तेय-साधारणसरीराणमेक्कदरं अथिर-असुह-दुहव-अणादेज्ज-अजसकित्ति-णिमिणं। एदासिं तेवीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।८२।।
तिरिक्खगदिं एइंदिय-अपज्जत्त-बादर-सुहुमाणमेक्कदरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।८३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र संहननस्य बंधो नोक्त:, एकेन्द्रियेषु संहननस्योदयाभावात्। बादर-प्रत्येकशरीरयुगलाभ्यां भंगा: चत्वार:। (२²२·४)। इदं स्थानं एकेन्द्रियापर्याप्तानामेवेति ज्ञातव्यं।
एवं अष्टमस्थले तिर्यग्गतिबंधकानां स्थानकथनमुख्यत्वेन एकविंशतिसूत्राणि गतानि।
संप्रति मनुष्यगतिस्थानसंख्याप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
मणुसगदिणामाए तिण्णि ट्ठाणाणि, तीसाए एगूणतीसाए पणुवीसाए ट्ठाणं चेदि।।८४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इदं संग्रहनयसूत्रं, उपरि उच्यमानसर्वार्थस्य आधारभावेनावस्थानात्। अत्र त्रिंशत्प्रकृतिस्थानमेकं, एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानानि त्रीणि, पंचविंशतिप्रकृतिस्थानमेकमेवेति।

अब उनतीस प्रकृतिक नामकर्म के तीन प्रकार के स्थान और उनके स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये छह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के तिर्यग्गति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में से यह प्रथम उनतीस प्रकृतिरूप बंधस्थान है। वह किस प्रकार है ? वह प्रथम तीस प्रकृति सम्बन्धी बंधस्थान के समान प्रकृति भंग वाला है। विशेषता यह है कि यहाँ उद्योत प्रकृति को छोड़ देना चाहिये। इन प्रथम उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।७०।।

वह प्रथम उनतीस प्रकृतिरूप बंधस्थान पंचेन्द्रिय और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।७१।।

नामकर्म के तिर्यग्गतिसम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह द्वितीय उनतीस प्रकृतिसम्बन्धी बन्धस्थान है। वह किस प्रकार है ? वह द्वितीय तीस प्रकृतिसम्बन्धी बंधस्थान के समान प्रकृति भंग वाला है। विशेषता यह है कि यहाँ उद्योत प्रकृति को छोड़ देना चाहिये। इन द्वितीय उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।७२।।

वह द्वितीय उनतीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान पंचेन्द्रिय और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले सासादन सम्यग्दृष्टि जीव के होता है।।७३।।

नामकर्म के तिर्यग्गति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह तृतीय उनतीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान है। वह किस प्रकार है ? वह तृतीय तीस प्रकृति सम्बन्धी बन्धस्थान के समान प्रकृति भंग वाला है। विशेषता यह है कि यहाँ उद्योत प्रकृति को छोड़ देना चाहिये। इन तृतीय उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।७४।।

वह तृतीय उनतीस प्रकृतिरूप बंधस्थान विकलेन्द्रिय और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उन्नीस प्रकृतिक नामकर्म प्रकृति के स्थान तीन भी पूर्व के समान जानने योग्य हैं, ये केवल उद्योत प्रकृति से रहित हैं। इनमें से प्रथम स्थान पंचेन्द्रिय, पर्याप्त सहित तिर्यंचगति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टियों के होता है। द्वितीय स्थान उसी प्रकार के जीव सासादन गुणस्थान वाले प्राप्त करते हैं और तीसरा स्थान विकलत्रय और पर्याप्त से संयुक्त तिर्यंचगति को बांधते हुये मिथ्यादृष्टि जीव ही बांधते हैं।

अब छब्बीस प्रकृतिक बंधस्थान और उनके स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के तिर्यग्गति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह छब्बीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, एकेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान६, वर्ण७, गन्ध८, रस९, स्पर्श१०, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी११, अगुरुलघु१२, उपघात१३, परघात१४, उच्छ्वास१५, आतप और उद्योत इन दोनों में से कोई एक१६, स्थावर१७, बादर१८, पर्याप्त१९, प्रत्येक शरीर२०, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२१, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२२, दुर्भग२३, अनादेय२४, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२५ तथा निर्माण नामकर्म२६, इन छब्बीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।७६।।

वह छब्बीस प्रकृतिक बन्धस्थान एकेन्द्रिय जाति, बादर, पर्याप्त, आतप और उद्योत, इन दोनों में से किसी एक से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।७७।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-एकेन्द्रिय जीवों के अंगोपांग नामकर्म का उदय नहीं है, क्योंकि, उनके पैर-हाथ, नितम्ब, पीठ, शिर और उर-हृदय अभाव होने से अंगोपांग नहीं होते हैं।

शंका-एकेन्द्रिय जीवों के छहों संस्थान क्यों नहीं बतलाये ?

समाधान-नहीं, क्योंकि प्रत्येक अवयवों में प्ररूपित लक्षण वाले पांच संस्थानों को समूहरूप से धारण करने वाले एकेन्द्रियों के पृथक-पृथक संस्थानों के अस्तित्व का विरोध है। यहाँ पर १६ भंग हैं। आतप, स्थिर, शुभ और यशस्कीर्ति इन चार युगलों को परस्पर में गुणित करने पर (२ ² २ ² २ ² २ · १६) सोलह भंग होते हैं।

एकेन्द्रिय, बादर, पर्याप्त और आतप से संयुक्त अथवा उद्योत से संयुक्त तिर्यंचगति को मिथ्यादृष्टि ही बांधते हैं, ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि मिथ्यादृष्टि जीवों के सिवाय एकेन्द्रिय जाति के बंध का अभाव है।

अब पच्चीस प्रकृतियों के स्थान और स्वामी का निरूपण करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के तिर्यग्गति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह प्रथम पच्चीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, एकेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान६, वर्ण७, गन्ध८, रस९, स्पर्श१०, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी११, अगुरुलघु१२, उपघात१३, परघात१४, उच्छ्वास१५, स्थावर१६, बादर और सूक्ष्म इन दोनों में से कोई एक१७, पर्याप्त१८, प्रत्येक शरीर और साधारण शरीर इन दोनों में से कोई एक१९, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२०, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२१, दुर्भग२२, अनादेय२३, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२४ तथा निर्माण नामकर्म२५। इन प्रथम पच्चीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।७८।।

वह प्रथम पच्चीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान एकेन्द्रिय जाति, पर्याप्त, बादर और सूक्ष्म इन दोनों में से किसी एक से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।७९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ बादर, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ और यशस्कीर्ति इन पांच युगलों के भेद से (२ ² २ ² २ ² २ ² २ · ३२) बत्तीस भंग हो जाते हैं।

शंका-अगुरुलघु नाम का गुण सभी जीवों के पारिणामिक है, क्योंकि, सम्पूर्ण कर्मों से रहित सिद्धों में भी वह पाया जाता है, इसलिये अगुरुलघु नामकर्म का कोई फल न होने से उसका अभाव मानना चाहिये?

समाधान-आचार्यदेव इसका परिहार करते हुये कहते हैं-यह आपका दिया गया दोष तब प्राप्त होता, जबकि अगुरुलघु गुण जीवविपाकी होता, किन्तु यह कर्म पुद्गलविपाकी है, क्योंकि, गुरुस्पर्श वाले अनन्तानन्त पुद्गल वर्गणाओं के द्वारा आरब्ध शरीर के अगुरुलघुत्व की उत्पत्ति होती है। यदि ऐसा न माना जाये तो गुरुभार वाले शरीर से संयुक्त यह जीव उठने के लिये समर्थ नहीं होगा, किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि शरीर के केवल हल्कापन और केवल भारीपन पाया नहीं जाता।

यह स्थान एकेन्द्रिय जाति नामकर्म को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीवों के ही होता है, क्योंकि ऊपर के गुणस्थानवर्ती जीवों में एकेन्द्रिय जाति, बादर और सूक्ष्म इन प्रकृतियों का बंध नहीं होता है।

अब द्वितीय प्रकार से पच्चीस प्रकृतियों के स्थान और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के तिर्यग्गति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह द्वितीय पच्चीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति और पंचेन्द्रिय जाति इन चारों जातियों में से कोई एक२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान६, औदारिक शरीर-अंगोपांग७, असंप्राप्तासृपाटिका शरीर संहनन८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, त्रस१६, बादर१७, अपर्याप्त१८, प्रत्येक शरीर१९, अस्थिर२०, अशुभ२१, दुर्भग२२, अनादेय२३, अयश:कीर्ति२४ और निर्माण नामकर्म२५। इन द्वितीय पच्चीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।८०।।

वह द्वितीय पच्चीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान त्रस और अपर्याप्त नामकर्म से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।८१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ पर परघात, उच्छ्वास, विहायोगति और स्वर नामकर्मों का बंध नहीं है, क्योंकि, इनका अपर्याप्त प्रकृति के साथ बंध का विरोध है और अपर्याप्त काल में इन परघात आदि प्रकृतियों के उदय का भी अभाव है। जिन प्रकृतियों का जहाँ पर उदय होता है, उन प्रकृतियों का ही वहाँ पर बंध होता है। उक्त कथन से स्थिर और शुभ प्रकृतियों से अनेकांत दोष नहीं आता है, क्योंकि अध्रुवबंधी शुभ और अशुभ प्रकृतियों का एक साथ बंध नहीं होता है। यहाँ द्वीन्द्रिय आदि चार जातिकर्म के भेद से (२ ² २ · ४) चार भंग होते हैं।

अब तेईस प्रकृतिक बंधस्थान और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के तिर्यग्गतिसम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह तेवीस प्रकृति संंबंधी बन्धस्थान है-तिर्यग्गति१, एकेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान६, वर्ण७, गन्ध८, रस९, स्पर्श१०, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी११, अगुरुलघु१२, उपघात१३, स्थावर१४, बादर और सूक्ष्म इन दोनों में से कोई एक१५, अपर्याप्त१६, प्रत्येक शरीर और साधारण शरीर इन दोनों में से कोई एक१७, अस्थिर१८, अशुभ१९, दुर्भग२०, अनादेय२१, अयश:कीर्ति२२ तथा निर्माण नामकर्म२३। इन तेवीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।८२।।

वह तेवीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान एकेन्द्रिय जाति, अपर्याप्त तथा बादर और सूक्ष्म इन दोनों में से किसी एक से संयुक्त तिर्यग्गति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।८३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ पर-तेईस प्रकृतिरूप बंधस्थान में संहननकर्म का बंध नहीं कहा है, क्योंकि एकेन्द्रिय जीवों में संहनन कर्म का उदय नहीं होता है। यहाँ बादर और प्रत्येक शरीर इन दो युगलों के विकल्प से चार (२ ² २ · ४) भंग होते हैं। यह स्थान एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों के ही होता है, ऐसा जानना चाहिये।

इस प्रकार आठवें स्थल में तिर्यंचगति के बंधकत्र्ताओं के स्थान के कथन की मुख्यता से इक्कीस सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अब मनुष्यगति के स्थान और संख्या का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति नामकर्म के तीन बन्धस्थान हैं-तीस प्रकृतिसम्बन्धी, उनतीस प्रकृतिसम्बन्धी और पच्चीस प्रकृति सम्बन्धी बन्धस्थान।।८४।।

सिद्धान्तचिंतामणि टीका-यह सूत्र संग्रहनयाश्रित है, क्योंकि ऊपर कहे जाने वाले सर्व अर्थ के आधाररूप से इसका अवस्थान है।

यहाँ तीसप्रकृतिक बंधस्थान एक है, उनतीसप्रकृतिक बंधस्थान तीन हैं और पच्चीसप्रकृतिक बंधस्थान एक ही है।


अधुना त्रिंशत्प्रकृतिस्थानप्रकृतिनाम-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

तत्थ इमं तीसाए ट्ठाणं, मणुसगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं ओरालियसरीर अंगोवंगं वज्जरिसहसंघउणं वण्ण-गंध-रस-फासं मणुसगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-पसत्थविहायगदी तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराण-मेक्कदरं सुहासुहाणमेक्कदरं सुभग-सुस्सर-आदेज्जं जसकित्ति-अजसकि-त्तीणमेक्कदरं णिमिणं तित्थयरं। एदासिं तीसाए पयडीण-मेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।८५।।

मणुसगदिं पंचिंदियपज्जत्ततित्थयरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं असंजद सम्मादिट्ठिस्स।।८६।।
सिद्धान्तचिंताणिटीका-अप्रशस्तायश:कीर्तिप्रकृति: तीर्थंकरेण सह बंधं प्राप्नोति न उदयं आगच्छति। तथैव दुर्भग-दु:स्वर-अनादेयानां ध्रुवबंधिनां संक्लेशकालेऽपि बध्यमानेन तीर्थकरेण सह बंधो न भवति, तेषां बंधानां तीर्थकरबंधेन सम्यक्त्वेन च सह विरोधात्। संंक्लेशकालेऽपि सुभग-सुस्वर-आदेयानां चैव बंधोपलंभात्। अत्र स्थिर-शुभ-यश:कीर्तियुगलै: त्रिभि: विकल्पै: अष्टौ भंगा: भवन्ति (२²२²२·८)।
मनुष्यगतिं पंचेन्द्रियपर्याप्त-तीर्थकरसंयुत्तं बध्यमानस्य तत् त्रिंशत्प्रकृतिबंधस्थानं असंयत-सम्यग्दृष्टेर्भवति।
संप्रति एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानत्रिविधत्वप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-तत्थ इमं पढमएगूणतीसाए ट्ठाणं। जधा, तीसाए भंगो। णवरि विसेसो तित्थयरं वज्ज। एदासिं पढमएगूणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।८७।।
मणुसगदिं पंचिंदियपज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजद-सम्मादिट्ठिस्स वा।।८८।।
तत्थ इमं विदियाए एगूणतीसाए ट्ठाणं, मणुसगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं वज्ज पंचण्हं संठाणाणमेक्कदरं ओरालियसरीरअंगोवंगं असंपत्तसेवट्टसंघडणं वज्ज पंचण्हं संघडणाण-मेक्कदरं वण्णगंधरसफासं मणुसगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं दोण्हं विहायगदीणमेक्कदरं तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुभासुभाणमेक्कदरं सुहवदुहवाणमेक्कदरं सुस्सरदुस्सराणमेक्कदरं आदेज्ज-अणादेज्जाणमेक्कदरं जसकित्ति-अजसकित्तीणमेक्कदरं णिमिणं। एदासिं विदियएगूणतीसाए पयडीण-मेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।८९।।
मणुसगदिं पंचिंदियपज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं सासणसम्मा-दिट्ठिस्स।।९०।।
तत्थ इमं तदियएगूणतीसाए ट्ठाणं, मणुसगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं छण्हं संठाणाणमेक्कदरं ओरालियसरीरअंगोवंगं छण्हं संघडणाणमेक्कदरं वण्ण-गंध-रस-फासं मणुसगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं दोण्हं विहायगदीणमेक्कदरं तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुहासुहाणमेक्कदरं सुभगदुभगाणमेक्कदरं सुस्सरदुस्सराणमेक्कदरं आदेज्ज-अणादेज्जाण-मेक्कदरं जसकित्ति-जसकित्तीणमेक्कदरं णिमिणणामं। एदासिं तदियएगूणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।९१।।
मणुसगदिं पंचिंदियपज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स।।९२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ये तीर्थंकरप्रकृतिमन्तरेण एकोनत्रिंशत्प्रकृतिनामकर्मण: स्थानं बध्नन्ति ते सम्यग्मिथ्यादृष्ट्य: असंयतसम्यग्दृष्टयो वा अस्य स्वामिनो भवन्ति। द्वितीयैकोनत्रिंशत्स्थानस्वामिन: सासादना: भवन्ति। तेषां भंगा द्वात्रिंशत्शतानि। पंचसंस्थान-पंचसंहनन-विहायोगत्यादिसप्तयुगलानां परस्परे गुणितेन -(५²५²२²२²२²२²२²२²२·३२००) एषा संख्या भवति।
तृतीयस्थानं मिथ्यादृष्टेर्जीवस्य एकोनत्रिंशत्संख्यायां एकोनत्रिंशत्प्रकृतिबंधप्रायोग्यपरिणामे वा भवति। अस्य भंगा: अष्टोत्तरषट्चत्वािंरशत्शतानि। तद्यथा-षट्संस्थान-षट्संहनन-विहायोगत्यादिसप्तयुगलानां गुणितेन (६²६²२²२²२²२²२²२²२·४६०८) भवन्ति।
संप्रति पंचविंशतिप्रकृतिस्थान-अपर्याप्तमनुष्यस्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-तत्थ इमं पणुवीसाए ट्ठाणं, मणुसगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं ओरालियसरीरअंगोवंगं असंपत्तसेवट्टसंघडणं वण्ण-गंध-रस-फासं मणुसगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-तस-बादर-अपज्जत्त-पत्तेयसरीर-अथिर-असुभ-दुभग-अणादेज्ज-अजसकित्ति-णिमिणं। एदासिं पणुवीसाए पयडीण-मेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।९३।।
मणुसगदिं पंचिंदियजादि-अपज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छा-दिट्ठिस्स।।९४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अपर्याप्तेन मनुष्यगत्या च सह स्थिरादीनि न बध्यन्ते, संक्लेशकाले बध्यमानापर्याप्तेन सह स्थिरादीनां विशुद्धिप्रकृतीनां बंधविरोधात्।
अहो आश्चर्यं! ये केचित् जीवा: मनुष्यगतिमपि प्राप्य लब्ध्यपर्याप्ता: भवन्ति, तेषां मनुष्यजन्मनां क: सार:। केवलं नाम्ना ते मनुष्या:, किंतु तेषां अतीव हीना गतिरेव, एतज्ज्ञात्वा दुर्लभं मनुष्यपर्याप्तशरीरं लब्ध्वा भेदाभेदरत्नत्रयप्राप्तये एव प्रयत्नो विधेय:।
एवं नवमस्थले मनुष्यगतिस्थान-स्वामि-भंगसंख्याप्रतिपादनत्वेन एकादशसूत्राणि गतानि।
संप्रति देवगतिस्थानसंख्याकथनाय सूत्रमवतरति-देवगदिणामाए पंच ट्ठाणाणि, एक्कत्तीसाए तीसाए एगुणतीसाए अट्ठवीसाए एक्किस्से ट्ठाणं चेदि।।९५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इदं संग्रहनयसूत्रं उवरि उच्यमाणमशेषमर्थवगाह्य अवस्थितत्वात्।
संप्रति देवगत्या सह एकत्रिंशत्प्रकृतिस्थाननाम-स्वामि-भंगसंख्याप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-तत्थ इमं एक्कत्तीसाए ट्ठाणं, देवगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय-आहार-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरस्ससंठाणं वेउव्विय-आहारअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस-फासं देवगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं पसत्थविहायगदी तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुह-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिण-तित्थयरं। एदासिं एक्कत्तीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव।।९६।।
देवगदिं पंचिंदिय-पज्जत्त-आहार-तित्थयरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं अप्पमत्तसंजदस्स वा अपुव्वकरणस्स वा।।९७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवगत्या सह षडपि संहननानि न बध्यन्ते, देवेषु संहननानामुदयाभावात्। इदं एकत्रिंशत्प्रकृतिबंधस्थानं सप्तमाष्टमगुणस्थानवर्तिनो: महामुन्योरेव नान्येषां।
अधुना त्रिंशत्प्रकृतिबंधस्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-तत्थ इमं तीसाए ट्ठाणं। जधा, एक्कत्तीसाए भंगो। णवरि विसेसो तित्थयरं वज्ज। एदासिं तीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।९८।।
देवगदिं पंचिंदिय-पज्जत्त-आहारसंजुत्तं बंधमाणस्स तं अप्पमत्तसंजदस्स वा अपुव्वकरणस्स वा।।९९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीर्थंकरप्रकृतिबंधं वर्जयित्वा तत् एकत्रिंशत्प्रकृतिस्थानमेव त्रिंशत्प्रकृतिस्थानं भवति। अत्र अस्थिरादीनां बंधो नास्ति, एतासां अशुभप्रकृतीनां विशुद्ध्या सह बंधविरोधात्। एतदपि अप्रमत्तसंयतअपूर्वकरणयोर्भवति।

अब तीसप्रकृतिक बंध स्थान के प्रकृतियों के नाम और स्वामी का कथन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानों में यह तीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान है-मनुष्यगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, समचतुरस्र संस्थान६, औदारिक शरीर-अंगोपांग७, वङ्कावृषभनाराच संहनन८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, परघात१६, उच्छ्वास१७, प्रशस्तविहायोगति१८, त्रस१९, बादर२०, पर्याप्त२१, प्रत्येक शरीर२२, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२३, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२४, सुभग२५, सुस्वर२६, आदेय२७, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२८ तथा निर्माण२९ और तीर्थंकर नामकर्म३०। इन तीस प्रकृतियों के बन्धस्थान का एक ही भाव में अवस्थान है।।८५।।

वह तीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति पर्याप्त और तीर्थंकर प्रकृति से संयुक्त मनुष्यगति को बांधने वाले असंयत सम्यग्दृष्टि जीव के होता है।।८६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-अप्रशस्त अयश:कीर्ति प्रकृति भी तीर्थंकर प्रकृति के साथ बंध को प्राप्त होती है, किन्तु उदय में नहीं आती है, उसी प्रकार से दुर्भग-दु:स्वर और अनादेय ये ध्रुवबंधी प्रकृतियां, संक्लेश काल में भी बंधने वाली तीर्थंकर प्रकृति के साथ नहीं बंधती हैं, क्योंकि इनका बंध तीर्थंकर प्रकृति और सम्यक्त्व के साथ विरुद्ध है। संक्लेश काल में भी सुभग, सुस्वर और आदेय प्रकृतियों का ही बंध होता है। यहाँ पर स्थिर, शुभ और यश:कीर्ति इन तीन युगलों के विकल्प से (२ ² २ ² २ · ८) आठ भंग होते हैं।

यह तीस प्रकृतिक बंधस्थान पंचेन्द्रिय पर्याप्त और तीर्थंकर प्रकृति से संयुक्त मनुष्यगति को बांधने वाले असंयतसम्यग्दृष्टि के होता है।

अब उनतीस प्रकृतिक स्थान के तीन भेद का प्रतिपादन करने के लिये छह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानों में यह प्रथम उनतीस प्रकृति सम्बन्धी बन्धस्थान है। यह किस प्रकार है ? वह तीस प्रकृति सम्बन्धी बंधस्थान के समान प्रकृति भंग वाला है। विशेषता यह है कि यहाँ तीर्थंकर प्रकृति को छोड़ देना चाहिये। इन प्रथम उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।८७।।

वह प्रथम उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त मनुष्यगति को बांधने वाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि के होता है।।८८।।

नामकर्म के मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानों में यह द्वितीय उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-मनुष्यगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान को छोड़कर शेष पाँच संस्थानों में से कोई एक६, औदारिक शरीर-अंगोपांग७, असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन को छोड़कर पाँच संहननों में से कोई एक८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, परघात१६, उच्छ्वास१७, दोनों विहायोगतियों में से कोई एक१८, त्रस१९, बादर२०, पर्याप्त२१, प्रत्येक शरीर२२, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२३, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२४, सुभग और दुर्भग इन दोनों में से कोई एक२५, सुस्वर और दु:स्वर इन दोनों में से कोई एक२६, आदेय और अनादेय इन दोनों में से कोई एक२७, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२८ और निर्माण नामकर्म२९। इन द्वितीय उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।८९।।

वह द्वितीय उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त मनुष्यगति को बांधने वाले सासादन सम्यग्दृष्टि जीव के होता है।।९०।।

नामकर्म के मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानों में यह तृतीय उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान हैं-मनुष्यगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, छहों संस्थानों में से कोई एक६, औदारिक शरीर-अंगोपांग७, छहों संहननों में से कोई एक८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, परघात१६, उच्छ्वास१७, दोनों विहायोगतियों में से कोई एक१८, त्रस१९, बादर२०, पर्याप्त२१, प्रत्येक शरीर२२, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२३, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२४, सुभग और दुर्भग इन दोनों में से कोई एक२५, सुस्वर और दु:स्वर इन दोनों में से कोई एक२६, आदेय और अनादेय इन दोनों में से कोई एक२७, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२८ और निर्माण नामकर्म२९। इन तृतीय उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।९१।।

वह तृतीय उनतीस प्रकृतिरूप बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त मनुष्यगति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।९२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जो तीर्थंकर प्रकृति के बिना इस प्रथम उनतीसप्रकृतिक नामकर्म के स्थान को बांधते हैं वे सम्यग्मिथ्यादृष्टि अथवा असंयतसम्यग्दृष्टि इस स्थान के स्वामी होते हैं। जो द्वितीय उनतीसप्रकृतिक स्थान को बांधते हैं वे सासादन गुणस्थानवर्ती इसके स्वामी हैं। इस द्वितीय बंधस्थान के बत्तीस सौ भंग होते हैं। पांच संस्थान, पांच संहनन और विहायोगति आदि सात युगलों को परस्पर में गुणा करने से (५ ² ५ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ · ३२००) यह बत्तीस सौ की संख्या होती है।

तीसरा उनतीस प्रकृतिक स्थान मिथ्यादृष्टि जीव के उनतीस की संख्या में अथवा उनतीस प्रकृतिक बंध के योग्य परिणाम में होता है। इसके भंग छ्यालीस सौ आठ होते हैं। जैसे कि छह संस्थान, छह संहनन और विहायोगति आदि सात युगलों को परस्पर से गुणित करने पर (६ ² ६ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ · ६४०८) चार हजार छह सौ आठ भंग होते हैं।

अब पच्चीस प्रकृतिक स्थान के अपर्याप्त मनुष्य स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के मनुष्यगतिसम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानों में यह पच्चीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-मनुष्यगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, औदारिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, हुण्डकसंस्थान६, औदारिक शरीर-अंगोपांग७, असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन८, वर्ण९, गन्ध१०, रस११, स्पर्श१२, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१३, अगुरुलघु१४, उपघात१५, त्रस१६, बादर१७, अपर्याप्त१८, प्रत्येक शरीर१९, अस्थिर२०, अशुभ२१, दुर्भग२२, अनादेय२३, अयश:कीर्ति२४ और निर्माण नामकर्म२५। इन पच्चीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।९३।।

वह पच्चीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और अपर्याप्त नामकर्म से संयुक्त मनुष्यगति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।९४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-अपर्याप्त मनुष्यगति के साथ स्थिर आदि प्रकृतियां नहीं बंधती हैं, क्योंकि संक्लेश काल में बंधने वाले अपर्याप्त नामकर्म के साथ स्थिर आदि विशुद्धकाल में बंधने वाली शुभ प्रकृतियों के बंध का विरोध है।

अहो आश्चर्य है! जो कोई भी जीव मनुष्यगति को भी प्राप्त करके लब्ध्यपर्याप्तक होते हैं, उनके मनुष्य जन्म को प्राप्त करने का क्या सार है ? केवल नाम से वे मनुष्य हैं, किन्तु उनके अतीव ही हीन गति है, ऐसा जानकर दुर्लभ ऐसे पर्याप्त मनुष्य शरीर को प्राप्त करके भेद-अभेद रत्नत्रय की प्राप्ति के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये।

इस प्रकार नवमें स्थल में मनुष्यगति के स्थान, स्वामी और भंगों की संख्या के प्रतिपादन रूप से ग्यारह सूत्र पूर्ण हुये।

अब देवगति के स्थान की संख्या कहने के लिये सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

देवगति नामकर्म के पाँच बंधस्थान हैं-इकतीस प्रकृतिक, तीस प्रकृतिक, उनतीस प्रकृतिक, अट्ठाईस प्रकृतिक और एक प्रकृतिक बन्धस्थान।।९५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यह संग्रहनयाश्रित सूत्र है, क्योंकि आगे कहे जाने वाले सम्पूर्ण अर्थ का अवगाहन करके अवस्थित है।

अब देवगति के साथ इकतीस प्रकृतिक स्थान के नाम, स्वामी और भंगों का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के देवगति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह इकतीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-देवगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, वैक्रियिक शरीर३, आहारकशरीर४, तैजस शरीर५, कार्मण शरीर६, समचतुरस्र संस्थान७, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग८, आहारकशरीर-अंगोपांग९, वर्ण१०, गन्ध११, रस१२, स्पर्श१३, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१४, अगुरुलघु१५, उपघात१६, परघात१७, उच्छ्वास१८, प्रशस्तविहायोगति१९, त्रस२०, बादर२१, पर्याप्त२२, प्रत्येक शरीर२३, स्थिर२४, शुभ२५, सुभग२६, सुस्वर२७, आदेय२८, यश:कीर्ति२९, निर्माण३० और तीर्थंकर नामकर्म३१। इन इकतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।९६।।

वह इकतीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति, पर्याप्त, आहारकशरीर और तीर्थंकर नामकर्म से संयुक्त देवगति को बांधने वाले अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरण संयत जीव के होता है।।९७।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-देवगति के साथ छहों भी संहनन नहीं बंधते हैं, क्योंकि देवों में संहननों के उदय का अभाव है। यह इकतीस प्रकृति वाला बंधस्थान सातवें, आठवें गुणस्थानवर्ती महामुनियों के ही होता है, अन्यों के नहीं।

अब तीस प्रकृतिक बंधस्थान और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के देवगतिसम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह तीस प्रकृतिसम्बन्धी बंधस्थान है। वह किस प्रकार है ? वह इकतीस प्रकृतिक बन्धस्थान के समान प्रकृति-भंग वाला है। विशेषता केवल यह है कि यहाँ तीर्थंकर प्रकृति को छोड़ देना चाहिये। इन तीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।९८।।

वह तीसप्रकृतिक बंधस्थान पंचेन्द्रिय जाति, पर्याप्त और आहारकशरीर से संयुक्त देवगति को बांधने वाले अप्रमत्तसंयत के अथवा अपूर्वकरणसंयत के होता है।।९९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-तीर्थंकर प्रकृति के बंध को छोड़कर वह इकतीस प्रकृति वाला बंधस्थान ही तीस प्रकृतिक बंधस्थान होता है। यहाँ अस्थिर आदि प्रकृतियों का बंध नहीं है, क्योंकि इन अशुभ प्रकृतियों का विशुद्धि के साथ बंध विरुद्ध है। यह स्थान भी अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणवर्ती मुनियों के होता है।

संप्रति एकोनत्रिंशत्प्रकृतिस्थानस्वामिप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-

तत्थ इमं पढमएगूणतीसाए ट्ठाणं। जधा, एक्कत्तीए भंगो। णवरि विसेसो, आहारसरीरं वज्ज। एदासिं पढमएगूणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।१००।।

देवगदिं पंचिंदियपज्जत्त-तित्थयरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं अप्पमत्तसंजदस्स वा अपुव्वकरणस्स वा।।१०१।।
तत्थ इमं विदियएगुणतीसाए ट्ठाणं, देवगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउव्वियसरीरअंगोवंगं वण्णगंधरसफासं देवगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं पसत्थ-विहायगदी तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुभासुभाण-मेक्कदरं सुभग-सुस्सर-आदेज्जं जसकित्ति-अजस-कित्तीणमेक्कदरं णिमिण-तित्थयरं। एदासिं एगुणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।१०२।।
देवगदिं पंचिंदिय-पज्जत्त-तित्थयरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं असंजद-सम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।१०३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र एकोनत्रिंशत्प्रकृतिकं प्रथमस्थानं अप्रमत्तसंयतापूर्वकरणमुन्यो: भवति। यथा पूर्वं एकत्रिंशत्प्रकृतिकं स्थानं, तत्र आहारशरीराहारांगोपांगौ वज्र्यं एवेदं स्थानं भवति।
द्वितीयं एकोनत्रिंशत्प्रकृतिकं स्थानं अपि तीर्थंकरप्रकृतिबंधसहितमेव। एतत् तु असंयतसम्यग्दृष्टे: संयतासंयतस्य प्रमत्तसंयतस्य वा देवगत्या सह बध्यमानस्य भवति। अत्र भंगा अष्टौ। स्थिर-शुभ-यश:कीर्तियुगलानां त्रयाणां परस्परं गुणिते सति भवन्ति (२²२²२·८)।
अत्र देवगत्या सह उद्योतस्य बंध: किन्न भवति ?
न, देवगत्या सह तस्य उदयाभावात्। तिर्यग्गतिं मुक्त्वा अन्यगतिभि: सह तस्य बंधविरोधाच्च।
देवेषु उद्योतस्योदयाभावे देवानां देहदीप्ति: कुत: भवति ?
वर्णनामकर्मोदयात्। उद्योतोदयजातदेहदीप्ति: सुष्ठु स्तोका, प्रायेण स्तोकावयवप्रतिनियता, तिर्यग्गतिउदयसंबद्धा च। तेन उद्योतस्योदय: तिर्यक्षु एव, न देवेषु, विरोधात्।
सूर्या: चन्द्रमस: ग्रहनक्षत्रतारकाश्च ये विभासमाना: दृश्यन्ते, ते च न देवा:, तेषां ज्योतिर्वासिनां विमानानि। तत्र विमानेषु उद्योतनामकर्मोदयसहिता: एकेन्द्रियजीवानां देहा: एव दीप्यन्ते। सूर्यविमानेषु आतपनामकर्मोदयसहिता: एकेन्द्रियजीवानां देहा: एव विमानानि द्योतयन्ते, प्रकाशयन्ति इति ज्ञातव्यं।
संप्रति अष्टाविंशतिप्रकृतिकस्थानविधायिनां प्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-तत्थ इमं पढमअट्ठावीसाए ट्ठाणं, देवगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउव्वियअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस-फासं देवगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं पसत्थविहायगदी तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिणणामं। एदासिं पढमअट्ठवीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।१०४।।
देवगदिं पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं अप्पमत्तसंजदस्स वा अपुव्वकरणस्स वा।।१०५।।
तत्थ इमं विदियअट्ठावीसाए ट्ठाणं, देवगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउव्वियसरीरअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस-फासं देवगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं पसत्थविहायगदी-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुभासुभाणमेक्कदरं सुभग-सुस्सर-आदेज्जं-जसकित्ति-अजस-कित्तीण-मेक्कदरं णिमिणं। एदासिं विदियअट्ठावीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।१०६।।
देवगदिं पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा सम्मामिच्छादिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।१०७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमाष्टािंवशतिप्रकृतिस्थाने अयश:कीत्र्ते: बंधोनास्ति, प्रमत्तगुणस्थाने तस्या: बंधविनाशात्। इदं स्थानं अप्रमत्तसंयतस्यापूर्वकरणस्य वा भवति।
द्वितीयं अष्टाविंशतिकं स्थानं मिथ्यादृष्टेरारभ्य संयतपर्यंतजीवानां। संयतेनात्र प्रमत्तसंयतस्यैव ग्रहणं कर्तव्यं। अत्र भंगा: अष्टौ-स्थिर-शुभ-यश:कीर्तियुगलानां परस्परं गुणिते सति भवन्ति। (२²२²२·८)। प्रमत्तसंयतस्योपरि अस्थिर-अशुभ-अयश:कीर्तिप्रकृतीनां बंधाभावात्।
संप्रति देवगत्या सह एकप्रकृतिबंधस्थानस्वामिनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-तत्थ इमं एक्किस्से ट्ठाणं जसकित्तिणाम। एदिस्से पयडीए एक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।१०८।।
बंधमाणस्स तं संजदस्स।।१०९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थ: सुगम:। अत्रापि संयतस्य पदेन अपूर्वकरणगुणस्थानस्य सप्तमभागादारभ्य सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानवर्तिसंयतपर्यन्तानां ग्रहणं कर्तव्यं। केवलं यश:कीर्तिनामकर्म मुक्त्वा शेषनामकर्मप्रकृतय: अपूर्वकरणस्य षष्ठे भागे बंधात् व्युच्छिन्ना: भवन्ति, किन्तु यश:कीर्तिप्रकृति: दशमगुणस्थानं यावत् बध्यते।
कश्चिदाशंकते-एकत्रिंशत्-त्रिंशत्-एकोनत्रिंशत्-अष्टाविंशतिप्रकृतिस्थानानि चत्वारि कथितानि, तेषां देवगत्या सह बंध: भवतु नाम, किन्तु न एकप्रकृतिकस्थानं बंध: देवगत्या सह संभवति ? किंच, देवगतिबंधस्य पंचेन्द्रियजात्यादि-अष्टाविंशतिप्रकृतिबंधाविनाभावित्वेन एकत्वविरोधात् प्रवचनविरोधाच्च ?
अस्य परिहार: उच्यते-उपर्युक्तकथनं इष्टत्वात् न सूत्रविरोधो भवति, तस्य गुणस्थाननिबंधनत्वेन भूतपूर्वनयं प्रतीत्य संयुक्तरूपेण प्रतिपादने व्यापृतस्य देवगतिबंधाभावेऽपि अनिवृत्तिकरण गुणस्थाने सार्थक्यं भवति।
इतो विशेष:-
नामकर्मणां स्थानानि ज्ञात्वाधुना एषां शुभाशुभभेदद्वयं विभज्य तयो: कारणाणि अवश्यमेव ज्ञातव्यानि भवन्ति। तद्यथा-योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्न:।।२२।।
स्वगता योगवक्रता। परगतं विसंवादनं। सम्यगभ्युदयनि:श्रेयसार्थासु क्रियासु प्रवर्तमानमन्यं तद्विपरीतकायवाङ्मनोभिर्विसंवादयति मैवं कार्षीरेवं कुर्वीत। एतदुभयमशुभनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यं। ‘च’ शब्देन मिथ्यादर्शनपैशून्यास्थिरचित्तताकूटमानतुलाकरणपरनिंदात्मप्रसंशादि: समुच्चीयते।
अथ शुभनामकर्मण: क आस्रव इत्यत्रोच्यते-तद्विपरीतं शुभस्य।।२३।।
कायवाङ्मनसामृजुत्वमविसंवादनं च तद्विपरीतम्। ‘च’ शब्देन समुच्चितस्य च विपरीतं ग्राह्यं। धार्मिकदर्शन-संभ्रम-सद्भावोपनयनसंसरणभीरुताप्रमादवर्जनादि:। तदेतच्छुभनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यं।
नामकर्मणोऽन्तर्गततीर्थकरनामकर्मप्रकृति: विद्यते।
उक्तं च-‘यदिदं तीर्थकरनामकर्मानन्तानुपमप्रभावमचिन्त्यविभूतिविशेषकारणं त्रैलोक्यविजयकरं तस्यास्रवविधिविशेषोऽस्तीति।
दर्शनविशुद्धिर्विनयसंपन्नता शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी
साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य।।२४।।

जिनेन भगवतार्हत्परमेष्ठिनोपविष्टे निर्ग्रन्थलक्षणे मोक्षवत्र्मनि रुचिर्दर्शनविशुद्धि:। तस्या नि:शंकितत्वादिअष्टौ अंगानि। सम्यग्ज्ञानादिषु मोक्षमार्गेषु तत्साधनेषु च गुर्वादिषु स्वयोग्यवृत्त्या सत्कार: आदरो विनयस्तेन संपन्नता विनयसंपन्नता। अहिंसादिषु व्रतेषु तत्प्रतिपादनार्थेषु च क्रोधवर्जनादिषु शीलेषु निरवद्या वृत्ति: शीलव्रतेष्वनतिचार:। जीवादिपदार्थ-स्वतत्त्वविषये सम्यग्ज्ञाने नित्यं युक्तता अभीक्ष्णज्ञानोपयोग:। संततं जिनागमस्याध्ययनशीलत्वं इति। संसारदु:खान्नित्यभीरुता संवेग:। त्यागो दानं तत्त्रिविधं-आहारदान-मभयदानं ज्ञानदानं चेति। अन्यत्र ग्रंथे औषधिदानमपि गृहीत्वा चर्तुिवधं दानं कथितं। तच्छक्तितो यथाविधि प्रयुज्यमानं त्याग इत्युच्यते। अनिगूहितवीर्यस्य मार्गाविरोधि कायक्लेशस्तप:। यथा भाण्डागारे दहने समुत्थिते तत्प्रशमनमनुष्ठीयते बहूपकारत्वात्तथानेकव्रतसमृद्धस्य मुनेस्तपस: कुतश्चित् प्रत्यूहे समुपस्थिते तत्संधारणं समाधि:। गुणवद्दु:खोपनिपाते निरवद्येन विधिना तदपहरणं वैयावृत्यं। अर्हदाचार्येषु बहुश्रुतेषु प्रवचने च भावविशुद्धियुक्तोऽनुरागो भक्ति:। षष्णामावश्यकक्रियाणां यथाकालं प्रवर्तमानमावश्यकापरिहाणि:। ज्ञानतपोदानजिनपूजाविधिना धर्मप्रकाशनं मार्गप्रभावना। वत्से धेनुवत्सधर्मणि स्नेह: प्रवचनवत्सलत्वं। तानि एतानि षोडशकारणानि सम्यग्भाव्यमानानि व्यस्तानि च तीर्थकरनामकर्मास्रवकारणानि प्रत्येतव्यानि।
यद्यपि इमानि तीर्थकरप्रकृतिप्रमुखनामकर्माणि सर्वाणि व्यवहारनयेन जीवस्य सन्ति अनादिबद्ध-बंधनवशात् तथापि निश्चयनयेन सदा कर्मकलंकमलैरस्पृष्टत्वात् शुद्धात्मन: सकाशात् भिन्नान्येव।

अब उनतीस प्रकृतिक स्थान और उसके स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये चार सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

यहाँ नामकर्म के देवगति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह प्रथम उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान है। वह किस प्रकार है ? वह इकतीस प्रकृतिक बंधस्थान के समान प्रकृति भंग वाला है। विशेषता केवल यह है कि यहाँ आहारकशरीर और आहारक-अंगोपांग को छोड़ देना चाहिये। इन प्रथम उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।१००।।

वह प्रथम उतनीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति, पर्याप्त और तीर्थंकर प्रकृति से संयुक्त देवगति को बांधने वाले अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयत के होता है।।१०१।।

नामकर्म के देवगति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह द्वितीय उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान है-देवगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, वैक्रियिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, समचतुरस्रसंस्थान६, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग७, वर्ण८, गन्ध९, रस१०, स्पर्श११, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१२, अगुरुलघु१३, उपघात१४, परघात१५, उच्छ्वास१६, प्रशस्तविहायोगति१७, त्रस१८, बादर१९, पर्याप्त२०, प्रत्येक शरीर२१, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२२, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२३, सुभग२४, सुस्वर२५, आदेय२६, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२७, निर्माण२८ और तीर्थंकर नामकर्म२९, इन द्वितीय उनतीस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।१०२।।

वह द्वितीय उनतीस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति, पर्याप्त और तीर्थंकर प्रकृति से संयुक्त देवगति को बांधने वाले असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और प्रमत्तसंयत के होता है।।१०३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ उनतीस प्रकृति वाला प्रथम स्थान अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणवर्ती मुनियों के होता है। जैसा पूर्व में इकतीस प्रकृति वाला बंधस्थान कहा है उसमें से आहारकशरीर और आहारक अंगोपांग को छोड़कर ही यह स्थान होता है।

दूसरा उनतीस प्रकृति वाला बन्धस्थान भी तीर्थंकर प्रकृति के बंध सहित ही होता है। यह असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत या प्रमत्तसंयत मुनि के देवगति को बांधने वाले के होता है। यहाँ भंग आठ हैं। स्थिर, शुभ और यश:कीर्ति इन तीन युगलों को परस्पर में गुणा करने पर (२ ² २ ² २ · ८) आठ भंग होते हैं।

शंका-यहाँ देवगति के साथ उद्योत प्रकृति का बंध क्यों नहीं होता है ?

समाधान-नहीं होता है, क्योंकि देवगति के साथ उद्योत प्रकृति के उदय का अभाव है। तिर्यंचगति को छोड़कर अन्य गति के साथ इसके बंध का भी विरोध है।

शंका-देवों में उद्योत प्रकृति का उदय नहीं होने पर उनके शरीर में दीप्ति कहाँ से होती है ?

समाधान-देवों के शरीर में दीप्ति वर्ण नामकर्म के उदय से होती है। उद्योत प्रकृति के उदय से उत्पन्न होने वाली देह दीप्ति अत्यन्त होती है, प्रत्य: स्तोक-थोड़े अवयवों में प्रतिनियत होती है और तिर्यंचगति नामकर्म के उदय से सम्बद्ध होती है। इसलिये उद्योत प्रकृति का उदय तिर्यंचों में ही होता है, देवों में नहीं, क्योंकि ऐसा मानने में विरोध आता है।

जो सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और तारागण चमकते हुये दिखते हैं, वे देव नहीं हैं, वे तो ज्योतिर्वासी देवों के-सूर्य आदि देवों के विमान हैं। उन विमानों में उद्योत नामकर्म के उदय से सहित एकेन्द्रिय जीवों के शरीर ही चमकते हैं। सूर्य के विमानों में आतप नामकर्म के उदय से सहित एकेन्द्रिय जीवों के शरीर ही विमान रूप से चमकते हैं-प्रकाश फैलाते हैं, ऐसा जानना चाहिये।

अब अट्ठाईस प्रकृतिक स्थान वालों का प्रतिपादन करने के लिये चार सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के देवगति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह प्रथम अट्ठाईस प्रकृतिक बन्धस्थान है-देवगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, वैक्रियिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, समचतुरस्र संस्थान६, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग७, वर्ण८, गन्ध९, रस१०, स्पर्श११, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१२, अगुरुलघु१३, उपघात१४, परघात१५, उच्छ्वास१६, प्रशस्तविहायोगति१७, त्रस१८, बादर१९, पर्याप्त२०, प्रत्येक शरीर२१, स्थिर२२, शुभ२३, सुभग२४, सुस्वर२५, आदेय२६, यश:कीर्ति२७ और निर्माण नामकर्म२८। इन प्रथम अट्ठाईस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।१०४।।

वह प्रथम अट्ठाईस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त देवगति को बांधने वाले अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयत के होता है।।१०५।।

नामकर्म के देवगति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यह द्वितीय अट्ठाईस प्रकृतिक बन्धस्थान है-देवगति१, पंचेन्द्रिय जाति२, वैक्रियिक शरीर३, तैजस शरीर४, कार्मण शरीर५, समचतुरस्रसंस्थान६, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग७, वर्ण८, गन्ध९, रस१०, स्पर्श११, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी१२, अगुरुलघु१३, उपघात१४, परघात१५, उच्छ्वास१६, प्रशस्तविहायोगति१७, त्रस१८, बादर१९, पर्याप्त२०, प्रत्येक शरीर२१, स्थिर और अस्थिर इन दोनों में से कोई एक२२, शुभ और अशुभ इन दोनों में से कोई एक२३, सुभग२४, सुस्वर२५, आदेय२६, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक२७ और निर्माण नामकर्म२८। इन द्वितीय अट्ठाईस प्रकृतियों का एक ही भाव में अवस्थान है।।१०६।।

वह द्वितीय अट्ठाईस प्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्म से संयुक्त देवगति को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि, सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।१०७।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथम अट्ठाईस प्रकृति वाले स्थान में अयश:कीर्ति प्रकृति का बंध नहीं है, क्योंकि प्रमत्तगुणस्थानवर्ती मुनि के उस प्रकृति के बंध का विनाश हो जाता है। यह स्थान अप्रमत्तसंयतों के अथवा अपूर्वकरणवर्ती मुनियों के होता है।दूसरा अट्ठाईस प्रकृति वाला स्थान मिथ्यादृष्टि जीवों से प्रारम्भ करके संयतपर्यंत जीवों के होता है, यहाँ ‘संयतपद’ से प्रमत्तसंयत-छठे गुणस्थानवर्ती को ही ग्रहण करना चाहिये। यहाँ भंग आठ हैं-स्थिर, शुभ और यश:कीर्ति इन तीन युगलों को परस्पर गुणित करने पर (२ ² २ ² २ · ८) आठ भंग होते हैं। आगे प्रमत्तसंयत से ऊपर के गुणस्थानों में अस्थिर, अशुभ और अयश:कीर्ति इन तीन प्रकृतियों का बंध नहीं होता है।

अब देवगति के साथ एक प्रकृतिक बन्धस्थान के स्वामी का निरूपण करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नामकर्म के देवगति सम्बन्धी उक्त पाँच बन्धस्थानों में यश:कीर्ति नामकर्मसम्बन्धी यह एक प्रकृतिक बन्धस्थान है। इस एक प्रकृतिक बन्धस्थान का एक ही भाव में अवस्थान है।।१०८।।

वह एक प्रकृति रूप बन्धस्थान उसी एक यश:कीर्ति प्रकृति का बन्ध करने वाले संयत के होता है।।१०९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ पर भी संयत पद से अपूर्वकरण गुणस्थान के सातवें भाग से प्रारम्भ करके सूक्ष्मसांपराय गुणस्थानवर्ती संयतपर्यंत के मुनियों को ग्रहण करना चाहिये। केवल यश:कीर्ति नामकर्म को छोड़कर शेष नामकर्म की प्रकृतियां अपूर्वकरण के छठे भाग में बंध से व्युच्छिन्न हो जाती हैं, किन्तु यश:कीर्ति प्रकृति दशवें गुणस्थान तक बंधती है।

शंका-इकतीस, तीस, उनतीस और अट्ठाईस प्रकृति वाले जो चार स्थान कहे हैं, उनका देवगति के साथ बंध होवे ठीक है, किन्तु एक प्रकृति वाला स्थान देवगति के साथ बंधे यह संभव नहीं है ? क्योंकि देवगति के बंध का पंचेन्द्रिय जाति आदि अट्ठाईस प्रकृतियों के बंध के साथ अविनाभावी होने से एक प्रकृतिक बंध का उसके साथ विरोध है और आगम से भी विरोध आता है ?

समाधान-आचार्यदेव इसका परिहार करते हुये कहते हैं-उपर्युक्त कथन हमें इष्ट ही है, क्योंकि वैसा मानने पर सूत्र के साथ कोई विरोध नहीं आता है, उसके गुणस्थाननिमित्तक होने से भूतपूर्व नय की अपेक्षा संयुक्त रूप से प्रतिपादन करने में व्यापार करने वाले उस सूत्र की देवगति का बंध नहीं होने पर भी अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में सार्थकता हो जाती है।

अब यहाँ कुछ विशेष कहते हैं-

अब नामकर्म के स्थानों को जानकर इनमें शुभ और अशुभ दो भेदों का विभाजन करके उन दोनों के कारणों को अवश्य ही जानना चाहिये। उसे ही दिखाते हैं-

योगवक्रता और विसंवाद ये अशुभ नामकर्म के आस्रव हैं।।२५।।

जो अपने में हो वह योगवक्रता है और जो परगत हो वह विसंवाद है।

जो स्वर्ग और मोक्ष के योग्य समीचीन क्रियाओं का आचरण कर रहा है उसे उसके विपरीत मन, वचन और काय की प्रवृत्ति द्वारा रोकना कि ऐसा मत करो, ऐसा करो, विसंवादन है। इस प्रकार ये दोनों एक नहीं हैं, किन्तु अलग-अलग हैं। ये दोनों अशुभनामकर्म के आस्रव के कारण जानने चाहियें। सूत्र में आये हुये ‘च’ पद से मिथ्यादर्शन, चुगलखोरी, चित्त का स्थिर न रहना, मापने और तौलने के बाँट घट-बढ़ रखना, दूसरों की निन्दा करना और अपनी प्रशंसा करना आदि आस्रवों का समुच्चय होता है।

अब शुभ नामकर्म का आस्रव क्या है यह बतलाने के लिये आगे का सूत्र कहते हैं-

उससे विपरीत अर्थात् योग की सरलता और अविसंवाद ये शुभनामकर्म के आस्रव हैं।।२३।।

काय, वचन और मन की सरलता तथा अविसंवाद ये उससे विपरीत हैं। उसी प्रकार पूर्व सूत्र की व्याख्या करते हुए ‘च’ शब्द से जिनका समुच्चय किया गया है उनके विपरीत आस्रवों का ग्रहण करना चाहिये। जैसे-धार्मिक पुरुषों व स्थानों का दर्शन करना, आदर-सत्कार करना, सद्भाव रखना, उपनयन, संसार से डरना और प्रमाद का त्याग करना आदि। ये सब शुभ नामकर्म के आस्रव के कारण हैं।

नामकर्म के अन्तर्गत तीर्थंकर नामकर्म की प्रकृति है। कहा भी है- जो यह अनन्त और अनुपम प्रभाव वाला, अचिन्त्य विभूति विशेष का कारण और तीन लोक की विजय करने वाला तीर्थंकर नामकर्म है उसके आस्रव में विशेषता है, अत: अगले सूत्र द्वारा उसी का कथन करते हैं-

दर्शनविशुद्धि, विनयसम्पन्नता, शील और व्रतों का अतिचार रहित पालन करना, ज्ञान में सतत उपयोग, सतत संवेग, शक्ति के अनुसार त्याग, शक्ति के अनुसार तप, साधु-समाधि, वैयावृत्य करना, अरिहंत भक्ति, आचार्य भक्ति, बहुश्रुत भक्ति, प्रवचन भक्ति, आवश्यक क्रियाओं को न छोड़ना, मोक्षमार्ग की प्रभावना और प्रवचन वात्सल्य ये तीर्थंकर नामकर्म के आस्रव हैं।।२४।।

(१) जिन भगवान अरिहंत परमेष्ठी द्वारा कहे हुये निग्र्रन्थस्वरूप मोक्षमार्ग पर रुचि रखना दर्शनविशुद्धि है। उसके आठ अंग हैं-नि:शंकितत्व, नि:कांक्षिता, निर्विचिकित्सितत्व, अमूढ़दृष्टिता, उपबृंहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना।

(२) सम्यग्ज्ञानादि मोक्षमार्ग और उनके साधन गुरु आदि के प्रति अपने योग्य आचरण द्वारा आदर-सत्कार करना विनय है और इससे युक्त होना विनयसम्पन्नता है।

(३) अहिंसादिक व्रत हैं और इनके पालन करने के लिये क्रोधादि का त्याग करना शील है। इन दोनों के पालन करने में निर्दोष प्रवृत्ति रखना शीलव्रतानतिचार है।

(४) जीवादि पदार्थरूप स्वतत्त्वविषयक सम्यग्ज्ञान में निरन्तर लगे रहना अभीक्ष्णज्ञानोपयोग है।

(५) संसार के दु:खों से निरन्तर डरते रहना संवेग है।

(६) त्याग दान है। वह तीन प्रकार का है-आहारदान, अभयदान और ज्ञानदान। अन्य ग्रन्थों में औषधिदान को भी ग्रहण करने से दान के चार भेद हो गये हैं। उसे शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक देना यथाशक्ति त्याग है।

(७) शक्ति को न छिपाकर मोक्षमार्ग के अनुकूल शरीर को क्लेश देना यथाशक्ति तप है।

(८) जैसे भण्डार में आग लग जाने पर बहुत उपकारी होने से आग को शान्त किया जाता है उसी प्रकार अनेक प्रकार के व्रत और शीलों से समृद्ध मुनि के तप करते हुये किसी कारण से विघ्न के उत्पन्न होने पर उसका संधारण करना-शान्त करना साधुसमाधि है।

(९) गुणी पुरुष के दु:ख में आ पड़ने पर निर्दोष विधि से उसका दु:ख दूर करना वैयावृत्य है।

(१०-१३) अरिहंत, आचार्य, बहुश्रुत और प्रवचन इनमें भावों की विशुद्धि के साथ अनुराग रखना अरिहंत भक्ति, आचार्य भक्ति, बहुश्रुत भक्ति और प्रवचन भक्ति है।

(१४) छह आवश्यक क्रियाओं को यथासमय करना आवश्यकापरिहाणि है।

(१५) ज्ञान, तप, दान और जिनपूजा इनके द्वारा धर्म का प्रकाश करना मार्गप्रभावना है।

(१६) जैसे गाय बछड़े पर स्नेह रखती है उसी प्रकार साधर्मियों पर स्नेह रखना प्रवचनवत्सलत्व है। यह सब सोलहकारण भावनाएँ हैं। यदि अलग-अलग इनका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर नामकर्म के आस्रव के कारण होते हैं और समुदायरूप से सबका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर नामकर्म के आस्रव के कारण जानने चाहिये।

यद्यपि ये तीर्थंकर प्रकृति को प्रमुख करके जो नामकर्म के भेद हैं वे सभी व्यवहारनय से जीव के हैं, क्योंकि ये अनादिकाल से बंधे हुये कर्मबंधन के निमित्त से हैं फिर भी निश्चयनय से सदा यह जीव कर्मकलंक मल से अस्पर्शित ही है, अतएव ये कर्म शुद्धात्मा से भिन्न ही हैं।

उक्तं च तथैव श्रीकुन्दकुन्दचार्यदेवेन समयसारप्राभृतग्रन्थे-

जीवस्स णत्थि वण्णो, णवि गंधो णवि रसो णवि य फासो।

णवि रूवं ण सरीरं, ण वि संठाणं ण संहणणं।।५०।।
जीवस्स णत्थि रागो, णवि दोसो णेव विज्जदे मोहो।
णो पच्चया ण कम्मं, णोकम्मं चावि से णत्थि।।५१।।
जीवस्स णत्थि वग्गो, ण वग्गणा णेव फड्ढया केई।
णो अज्झप्पट्ठाणा, णेव य अणुभायठाणाणि।।५२।।
जीवस्स णत्थि केई, जोयट्ठाणा य बंधठाणा वा।
णेव य उदयट्ठाणा, ण मग्गणट्ठाणया केई।।५३।।
णो ठिदिबंधट्ठाणा, जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा।
णेव विसोहिट्ठाणा, णो संजमलद्धिठाणा वा।।५४।।
णेव य जीवट्ठाणा, ण गुणट्ठाणा य अत्थि जीवस्स।
जेण दु एदे सव्वे, पुग्गलदव्वस्स परिणामा।।५५।।

आत्मख्यातिटीकायां श्रीमदमृतचन्द्रसूरि: ब्रूते-
‘य: कृष्णो हरित: पीतो रक्त: श्वेतो वर्ण: स सर्वोऽपि नास्ति जीवस्य पुद्गलद्रव्यपरिणाममयत्वे सत्यनुभूतेर्भिन्नत्वात्’ इत्यादि:।
आसां गाथानां तात्पर्यवृत्तिटीकायां श्रीमज्जयसेनाचार्येणापि कथ्यते-
‘वर्णगंधरसस्पर्शास्तु रूपशब्दवाच्या: स्पर्शरसगंधवर्णवती मूत्र्तिश्च औदारिकादिपंचशरीराणि, समचतुरस्रादिषट्संस्थानानि, वङ्कार्षभनाराचादिषट्संहननानि चेति। एते वर्णादयो धर्मिण: शुद्धनिश्चयनयेन जीवस्य न सन्तीति साध्यो धर्मश्चेति धर्मधर्मिसमुदायलक्षण: पक्ष:, आस्था, संधा, प्रतिज्ञेति यावत् पुद्गलद्रव्यपरिणाममयत्वे सति शुद्धात्मानुभूतेर्भिन्नत्वात् इति हेतु:।’’ इत्यादि:।
श्री कुन्दकुन्ददेवेन पुनश्च निश्चयव्यवहारनयद्वयसमन्वयं उच्यते-
ननु वर्णादयो यद्यमी न सन्ति जीवस्य तदा तन्त्रान्तरे कथं सन्तीति प्रज्ञाप्यन्ते इति चेत्-ववहारेण दु एदे, जीवस्स हवंति वण्णमादीया।
गुणठाणंता भावा, ण दु केई णिच्छयणयस्स।।५६।।
आत्मख्याति:-‘‘इह हि व्यवहारनय: किल पर्यायाश्रितत्वाज्जीवस्य पुद्गलसंयोगवशादनादि-प्रसिद्धबंधपर्यायस्य कुसुंभरक्तस्य कार्पासिकवासस इवौपाधिकं भावमवलम्ब्योत्प्लवमान: परभावं परस्य विदधाति। निश्चयनयस्तु द्रव्याश्रितत्वात्केवलस्य जीवस्य स्वाभाविकं भावमवलम्ब्योत्प्लवमान: परभावं परस्य सर्वमेव प्रतिषेधयति। ततो व्यवहारेण वर्णादयो गुणस्थानान्ता: भावा: जीवस्य सन्ति निश्चयेन न सन्तीति युक्ता प्रज्ञप्ति:।’’
एतन्निश्चयव्यवहारनयौ द्वावपि ज्ञात्वा निश्चयनयेन स्वशुद्धात्मस्वभावं श्रद्धधानै: भवद्भि: व्यवहारनयेन शुभनामकर्मास्रवकारणानि विधातव्यानि निरन्तरमिति।
तात्पर्यमेतत्-एकत्रिंशत्प्रकृतिस्थानं एकोनत्रिंशत्स्थानं वा तीर्थकरप्रकृतिसहितं बध्यमानै: यै: पुरुषै: पंचकल्याणपूजा संप्राप्ता, ये च संप्रति प्राप्नुवन्ति प्राप्स्यन्त्यपि तान् त्रैकालिकान् तीर्थकरान् प्रणमामो वयं भक्त्या त्रिशुद्ध्यापि याचामहे च तदेव स्वात्मपदमिति।
एवं दशमस्थले देवगतिबंधस्थानस्वामिनिरूपणपरत्वेन पंचदश सूत्राणि गतानि।
अधुना गोत्रकर्मण: स्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-गोदस्स कम्मस्स दुवे पयडीओ, उच्चागोदं चेव णीचागोदं चेव।।११०।।
जं तं णीचागोदं कम्मं।।१११।।
बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा।।११२।।
जं तं उच्चागोदं कम्मं।।११३।।
बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा सम्मामिच्छा-दिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।११४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नेदं प्रथमं सूत्रं पुनरुक्तदोषेण दूष्यते, विस्मरणशीलशिष्यानुग्रहार्थं पुन: पुन: प्ररूपणायां दोषाभावात्।
प्रथमद्वितीयगुणस्थानादुपरि नीचैर्गोत्रं न बध्यते इति ज्ञातव्यं। उच्चैर्गोत्रं प्रथमगुणस्थानादारभ्य दशमगुणस्थानपर्यंतं भवति इति निश्चेतव्यं। पुनश्च उच्चैर्गोत्रकारणभूतान्येव कार्याणि कर्तव्यानि निरन्तरम्।
एवं एकादशस्थले गोत्रकर्मण: स्थानस्वामिनिरूपणत्वेन पंचसूत्राणि गतानि।
संप्रति अन्तरायकर्मण: स्थान-स्वामिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-अंतराइयस्स कम्मस्स पंच पयडीओ, दाणंतराइयं लाहंतराइयं भोगंतराइयं परिभोगंतराइयं वीरियंतराइयं चेदि।।११५।।
एदासिं पंचण्हं पयडीणमेक्कम्हि चेव ट्ठाणं।।११६।।
बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स वा सासणसम्मादिट्ठिस्स वा सम्मामिच्छा-दिट्ठिस्स वा असंजदसम्मादिट्ठिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा।।११७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। अत्र ‘संजद’ पदेन दशमगुणस्थानवर्तिन: यावत् गृहीतव्यं। अन्तरायस्य कारणानि ‘‘विघ्नकरणमन्तरायस्य’’ इति सूत्रेण ज्ञात्वा तत्कारणाणि परिहर्तव्यानि।
एवं द्वादशस्थले अन्तरायकर्मस्थान-स्वामिनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अत्र उपसंह्रियते-
कथंपुद्गला: कर्मरूपेण परिणमन्ति इति चेत् ?
उच्यते-
अत्ता कुणदि सहावं तत्थ गदा पोग्गला सभावेहिं।
गच्छन्ति कम्मभावं अण्णोण्णागाहमवगाढा।।६५।।
ये केचित् कर्मसिद्धान्तमनभिज्ञा: ईश्वरस्य सृष्टिकर्तृत्वं मन्यन्ते तेऽपि स्वात्मज्ञानपराङ्मुखा स्वपरवञ्चका एव। अस्मिन् विषये स्वकृतचन्द्रप्रभस्तुतौ कथितमस्ति, तद्यथा-
-भुजंगप्रयातछंद-
शरीरेंद्रियाद्या: धराभूधराद्या:, कृता बुद्धिमद्हेतुका सद्मवत् स्यु:।
प्रसाध्येत कार्यत्वत: सृष्टिकर्ता, न तच्चारु, यद्विश्वमाद्यन्तशून्यम् ।।१७।।
तर्हि क: करोति इयं स्वसृष्टि: ?
इदमेवोच्यते-
-शिखरिणीछंद-
शरीरी प्रत्येकं भवति भुवि वेधा: स्वकृतित:।
विधत्ते नानाभू-पवन-जल-वन्हि-द्रुमतनुम्।।
त्रसो भूत्वा भूत्वा कथमपि विधायात्र कुशलम्।
स्वयं स्वस्मिन्नास्ते भवति कृतकृत्य: शिवमय:।।१८।।
यदि कदाचित् मन्येत ईश्वर एव सृष्टिकर्ता तर्हि को दोष: इति चेत् ?
-पृथ्वीछंद-
विचित्रभुवनत्रयं यदि कदाचिदीश: सृजेत्।
जगद्धि सकलं शुभं निखिलदोष शून्यं न किम्।।
निगोदनरकादि-दुर्गतिकृतिश्च दुष्टाय चेत् ?
कथं पुनरधर्मिणां विहितसृष्टिरन्यायिनी।।१९।।
न युज्यत इयं कृति: सकलजन्तुकारुण्यत:।
कुतूहलधियापि चेन्न महतां हि संभाव्यते।।
अट्टष्टपरिकल्पनापि जिन! नो भवेत्त्वद्द्विषाम्।
अतश्च भवतो विना क्वचिदपीश्वरत्वं कथम्।।२०।।
अतएव एतज्ज्ञायते-रागद्वेषादिभावै: जीवा: पुद्गलानादते त एव पुद्गला: द्रव्यकर्मरूपेण परिणमन्ति पुनश्च उदयागता: जीवानां सुखं दु:खं च प्रयच्छन्ति इति निश्चित्य रागद्वेषमोहादिविभावभावा: परिहर्तव्या:, यावत् तेषां अभावो न भवेत् तावत् ते कृशीकर्तव्या: इति अनेनोपायेनैव निजपरमानन्दमयं परमधाम प्राप्स्यते।
-पुनश्च-
जिनपतयस्तत्प्रतिमास्तदालयास्तन्निषद्यकास्थानानि।
ते ताश्च ते च तानि च, भवन्तु भवघातहेतवो भव्यानाम्।।३६।।
अस्मिन् आर्याछन्दसि कथितश्रीपूज्यपादाचार्याभिप्रायेण त्रैलोक्ये त्रैकाल्येऽपि च तीर्थकरभगवन्त एव सर्वोत्तमा: सर्वप्रधाना: सिद्ध्यन्ति। एतज्ज्ञात्वा मयापि सर्वानुत्तरकल्पद्रुममहायज्ञे शतेन्द्रवंद्य-सर्वश्रेष्ठतीर्थकरभगवन्त एव नायका: भवितुमर्हन्तीति निश्चित्य एषां पूजा रचिता। इयं पूजा अस्मिन् गुर्जरप्रदेशस्य राजधान्यां अहमदाबादमहानगरे संप्रति भवन्ती सती सर्वदेशे राष्ट्रे अत्रापि च मंगलं करोतु, क्षेमं सुभिक्षं च वितरतुतरां इति।
कल्पद्रुमजिनेन्द्रस्य, पादपद्मं नुमो वयम्।
यस्य पादप्रसादेन, सर्वा वाञ्छा फलिष्यति।।१।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे श्रीमद्भूतबलि-सूरिविरचित-जीवस्थानचूलिकायां श्रीवीरसेनाचार्यकृतधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां अस्मिन् विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यचारित्रचक्रवर्तिश्रीशांतिसागर-
गुरुवर्यस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्याजंबूद्वीपरचना-प्रेरिकागणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां स्थान-समुत्कीर्तनचूलिकानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

श्री कुन्दकुन्दाचार्य ने समयसार प्राभृत ग्रन्थ में इसी प्रकार से कहा है-

जीव के वर्ण नहीं हैं, गंध भी नहीं है, रस भी नहीं है और स्पर्श भी नहीं है। रूप भी नहीं है, शरीर भी नहीं है, संस्थान भी नहीं है और संहनन भी नहीं है। जीव के राग नहीं है, द्वेष भी नहीं है और न मोह ही है, उसके आस्रव भी नहीं है, न कर्म है और न नोकर्म ही हैं। जीव के वर्ग नहीं हैं, न वर्गणा हैं और न कोई स्पर्धक ही हैं। अध्यात्मस्थान भी नहीं है और न अनुभागस्थान ही हैं। जीव के कोई योगस्थान नहीं है और बन्धस्थान ही हैं न उदयस्थान ही है और न कोई मार्गणास्थान ही हैं। जीव के स्थितिबंधस्थान नहीं है और न संक्लेशस्थान ही है। विशुद्धिस्थान भी नहीं है और न संयमलब्धिस्थान ही हैं। जीव के जीवसमासस्थान नहीं हैं और न गुणस्थान ही है क्योंकि ये सब पुद्गल द्रव्य के परिणाम हैं।।५०-५५।।

इन गाथाओं की आत्मख्याति टीका में श्रीमान अमृतचंद्रसूरि कहते हैं-

जो काला, हरा अथवा नीला, पीला, लाल और श्वेत वर्ण है, वे सभी जीव के नहीं हैं, क्योंकि ये पुद्गल द्रव्य के परिणामरूप हैं, अत: अनुभूति-अपने अनुभव-स्वात्मानुभव से भिन्न हैं, इत्यादि।

इन गाथाओं की तात्पर्यवृत्तिटीका में श्रीजिनसेनाचार्य भी कहते हैं-

वर्ण, गंध, रस और स्पर्श ये रूप शब्द से कहे जाते हैं और मूर्ति स्पर्श, रस, गंध, वर्ण वाली होती है तथा औदारिक आदि पाँच शरीर, समचतुरस्र आदि छह संस्थान और वङ्कावृषभनाराच आदि छह संहनन, ये सभी वर्णादि शुद्ध निश्चयनय से जीव के नहीं हैं क्योंकि ये पुद्गल द्रव्य के परिणाममय हैं, अत: शुद्ध आत्मा की अनुभूति से भिन्न हैं। यहाँ यह दो अंग वाला अनुमान है, उसमें ‘वर्णादि’ धर्मी हैं, ‘शुद्ध निश्चयनय से जीव के नहीं हैं’ यह साध्य है-धर्म है, इस धर्मी और धर्म के समुदाय को पक्ष कहते हैं। पक्ष, आस्था, संधा और प्रतिज्ञा ये पर्यायवाची हैं। ‘पुद्गल द्रव्य के परिणाममय होने से शुद्ध आत्मा की अनुभूति से भिन्न हैं’ यह हेतु है। इस प्रकार यहाँ व्याख्यान में पक्ष और हेतु इन दो अवयव वाला अनुमान बनाया गया है।

पुन: श्री कुन्दकुन्ददेव ने निश्चय व्यवहार दोनों नय के समन्वय को करते हुये कहा है-यदि ये वर्णादि भाव जीव के नहीं हैं तो पुन: अन्य-सिद्धान्त ग्रन्थों में ‘उनके हैं’ ऐसा कैसे कहा है ? ऐसा प्रश्न होने पर आचार्यदेव कहते हैं-

व्यवहारनय से तो ये सब वर्ण आदि भाव जीव के होते हैं, किन्तु निश्चयनय की अपेक्षा गुणस्थानपर्यन्त कोई भी भाव जीव के नहीं हैं।। यहाँ पर आत्मख्याति टीका में श्री अमृतचन्द्रसूरि ने कहा है कि-व्यवहारनय पर्याय के आश्रित होने से पुद्गल के संयोग के वश से अनादिकाल से जिसकी बंध पर्याय प्रसिद्ध है ऐसे जीव के औपाधिक भाव का अवलम्बन लेकर प्रवृत्त होता हुआ पर भावों को पर के-जीव के कहता है। जैसे कि कुसुंभ-टेसू के लाल रंग से रंगे हुये सूती सफेद वस्त्र रंग की उपाधि का अवलम्बन लेने से लाल कहलाता है किन्तु यह निश्चयनय तो द्रव्य के आश्रित होने से केवल जीव के स्वाभाविक भाव का अवलम्बन लेकर प्रवृत्त होता हुआ जीव में सभी ही पर के भावों का निषेध करता है इसलिये व्यवहारनय की अपेक्षा से ये वर्णादि से लेकर गुणस्थानपर्यन्त सभी भाव जीव के हैं, किन्तु निश्चयनय से नहीं है, ऐसा जिनशासन का कथन युक्त ही है।

इन निश्चय और व्यवहार दोनों नयों को भी जानकर निश्चयनय से अपनी शुद्ध आत्मा के स्वभाव का श्रद्धान करते हुये आपको निरन्तर व्यवहारनय से शुभ नामकर्म के आस्रव के कारणों को करते रहना चाहिये।

यहाँ तात्पर्य यह है कि इकतीसप्रकृतिक अथवा उनतीसप्रकृतिक स्थान जो कि तीर्थंकर प्रकृति के बंध से सहित हैं, इनको बांधते हुये पुरुषों ने पंचकल्याणक की पूजा को-महोत्सव को प्राप्त किया है और जो वर्तमान में पंचकल्याणक को प्राप्त कर रहे हैं तथा जो महापुरुष आगे पंचकल्याणक को प्राप्त करेंगे उन सभी त्रैकालिक तीर्थंकर भगवन्तों को हम मन, वचन, काय की शुद्धिपूर्वक भक्ति से नमस्कार करते हैं और उसी स्वात्मपद की याचना करते हैं।

इस प्रकार दशवें स्थल में देवगति के बंधस्थान और उनके स्वामी के निरूपणरूप से पन्द्रह सूत्र पूर्ण हुये हैं।

अब गोत्रकर्म के स्थान और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये पांच सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

गोत्रकर्म की दो ही प्रकृतियां हैं-उच्च गोत्र और नीच गोत्र।।११०।।

जो नीच गोत्रकर्म है, वह एक प्रकृतिक बन्धस्थान है।।१११।।

वह बन्धस्थान नीच गोत्रकर्म को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव के होता है।।११२।।

जो उच्च गोत्रकर्म है, वह एक प्रकृतिक बन्धस्थान है।।११३।।

वह बन्धस्थान उच्च गोत्रकर्म को बांधने वाले मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।११४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ यह प्रथम सूत्र पुनरुक्त दोष से दूषित नहीं है, क्योंकि विस्मरणशील शिष्यों के अनुग्रह के लिये पुन:-पुन: प्ररूपणा करने पर कोई दोष नहीं है। प्रथम और द्वितीय गुणस्थान के ऊपर नीच गोत्र नहीं बंधता है ऐसा जानना चाहिये और उच्च गोत्र प्रथम गुणस्थान से लेकर दसवें गुणस्थानपर्यंत होता है ऐसा निश्चय करना चाहिये। पुन: उच्चगोत्र के लिये कारणभूत ऐसे कार्यों को ही निरन्तर करते रहना चाहिये।

इस प्रकार ग्यारहवें स्थल में गोत्रकर्म के स्थान और स्वामी का निरूपण करने रूप से पांच सूत्र पूर्ण हुये।

अब अन्तराय कर्म के स्थान और स्वामी का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

अन्तराय कर्म की पाँच प्रकृतियाँ हैं-दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, परिभोगान्तराय और वीर्यान्तराय।।११५।।

इन प्रकृतियों के समुदायात्मक पाँच प्रकृतिक बन्धस्थान का एक ही भाव में अवस्थान होता है।।११६।।

वह बन्धस्थान उन पाँचों अन्तराय प्रकृतियों के बांधने वाले मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत के होता है।।११७।।

'सिद्धान्तिंचतामणिटीका-'सूत्रों का अर्थ सुगम है। यहाँ ‘संयतपद’ से दशवें गुणस्थानपर्यंत महामुनियों को ग्रहण करना चाहिये। पुन: अन्तराय कर्म के आस्रव के कारण ‘विघ्न करने वाले अन्तराय कर्म का आस्रव करते हैं।’’ इस सूत्र से जानकर उन कारणों को छोड़ना चाहिये।

इस प्रकार बारहवें स्थल में अन्तराय कर्म के स्थान और स्वामी के निरूपण रूप से तीन सूत्र पूर्ण हुये हैं।

यहाँ उपसंहार करते हुये कहते हैं-

यह पुद्गल कर्मरूप से कैसे परिणत होते हैं ?

ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-

गाथार्थ-यह आत्मा अपने भावों को जैसे करता है, ये पुद्गल वर्गणायें अपने-अपने स्वभाव-भावों के अनुसार परस्पर में जीव के प्रदेश और पुद्गल कर्मवर्गणायें एक-दूसरे में प्रवेश करके कर्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं।।६५।।

जो कोई कर्मसिद्धान्त से अनभिज्ञजन ईश्वर को सृष्टि का कत्र्ता मानते हैं वे अपनी आत्मा के ज्ञान से पराङ्मुख-विमुख हुये अपने और पर के वञ्चक ही हैं। इस विषय में मैंने श्री चन्द्रप्रभस्तुति में लिखा है। वह इस प्रकार है-

काव्यार्थ-शरीर, इंद्रिय आदि एवं पृथिवी, पर्वत आदि सब किसी न किसी बुद्धिमान के द्वारा बनाये गये हैं जैसे कि मकान आदि रचनायें। इस कार्यत्व हेतु को देखकर ‘सृष्टिकर्ता भगवान’ को सिद्ध किया जाता है। ऐसा जो कहते हैं, उनका कहना ठीक नहीं है, क्योंकि यह सारा संसार आदि-अंत से शून्य-अनादि-अनन्त है।।१७।।

पुन: प्रश्न यह होता है कि यह ‘सृष्टि’ कौन बनाता है ?

इसी बात को दिखाते हैं-

काव्यार्थ-इस संसार में प्रत्येक शरीरी-शरीरधारी संसारी प्राणी इस भूमण्डल पर अपने-अपने कार्यों से अपनी-अपनी सृष्टि का वेधा-ब्रह्मा-विधाता-कत्र्ता है। वह स्वयं अनेक प्रकार के पृथिवी, वायु, जल, अग्नि और वनस्पति के शरीरों को धारण करता है। पुन: जैसे-तैसे कभी इस संसार में त्रस हो-होकर कदाचित् पुण्य कार्य करके जब स्वयं अपनी आत्मा में स्थित हो जाता है तब मोक्षस्वरूप होकर कृतकृत्य हो जाता है।।१८।।

यदि कदाचित् मान लिया जाये कि ईश्वर ही सृष्टि का कर्ता है तो क्या दोष होता है ? सो दिखाते हैं-

काव्यार्थ-यदि कदाचित् इस चित्र-विचित्र तीन लोक को-सम्पूर्ण विश्व को कोई ईश्वर बनाता है तो यह सारा जगत सम्पूर्ण दोषों से शून्य-रहित क्यों नहीं बनाता है ? यदि कहो कि यह निगोद, नरक, तिर्यंच आदि दुर्गतियों की रचना दुष्टों के लिये बनायी गयी है तो पुन: अधर्मियों की यह अन्यायरूप सृष्टि क्यों बनायी ?।।१९।।

काव्यार्थ-भगवान-ईश्वर-परमात्मा तो सम्पूर्ण प्राणीमात्र पर करुणा बुद्धि रखता है तो पुन: यह दुष्टों की सृष्टि और नरक, तिर्यंच आदि की सृष्टि का बनाना उनके लिये युक्त नहीं है। यदि कहो कि भगवान कौतूहल की बुद्धि से यह सब बनाता है तो पुन: महापुरुषों के लिये ऐसा कौतूहल करना संभव ही नहीं है।

हे जिनेन्द्रदेव! आपके विद्वेषी-जैनधर्म के विद्वेषीजनों के यहाँ अदृष्ट परिकल्पना भी संभव नहीं है, इसलिये हे नाथ! आपने बिना कहीं भी किन्हीं में ‘ईश्वरत्व’-परमात्मपना कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता है।।२०।।

इसीलिये यह जाना जाता है कि ये संसारी प्राणी राग-द्वेष आदि भावों से पुद्गल वर्गणाओं को ग्रहण करते हैं तब वे ही पुद्गल द्रव्यकर्मरूप से परिणमन कर जाते हैं पुन: वे ही कर्म उदय में आकर जीवों को सुख-दु:ख देते हैं। ऐसा निश्चय करके हमें और आपको राग, द्वेष, मोह आदि विभाव भावों को छोड़ना चाहिये और जब तक उन राग-द्वेष आदि का अभाव न हो जावे तब तक उन्हें कृश करना चाहिये, क्योंकि इस उपाय से ही निज परमानंदमयी परमधाम मोक्ष को प्राप्त किया जावेगा।

पुन: भावना करते हैं-

श्लोकार्थ-जिनपति-तीर्थंकर भगवान, उनकी प्रतिमायें, उनके मंदिर, उनके निषीधिकास्थान-पंचकल्याणक तीर्थस्थान ये चार हैं। ये तीर्थंकर देव और सभी अर्हंत भगवान, उनकी प्रतिमायें आदि सभी भव्य जीवों के भव-संसार के घात में हेतु होवें।।३६।।

इस आर्याछंद में कहे गये श्री पूज्यपादाचार्य के अभिप्राय से तीनों लोकों में और तीनों कालों में भी तीर्थंकर भगवान ही सर्वोत्तम-सभी में प्रधान सिद्ध होते हैं। ऐसा जानकर मैंने भी ‘‘सभी विधानों में श्रेष्ठ ऐसे कल्पद्रुम महायज्ञ पूजा विधान में सौ इन्द्रों से वंदित सर्वश्रेष्ठ-सर्वोत्तम तीर्थंकर भगवान ही ‘‘नायक-प्रमुख होने योग्य हैं’’, ऐसा निश्चय करके इन तीर्थंकर भगवन्तों की पूजा रची है। यह पूजा-कल्पद्रुम मण्डल विधान यज्ञ गुजरात प्रदेश की राजधानी अहमदाबाद नगर में इस समय हो रहा है। यह अनुष्ठानरूप महापूजा सभी देश में, राष्ट्र में और यहाँ भी मंगलकारी होवे तथा अतिशय रूप से सर्वत्र क्षेत्र और सुभिक्ष को करे, ऐसी भावना है।

कल्पद्रुम-कल्पवृक्षस्वरूप-कल्पवृक्ष जैसा मुंहमांगा फल देने वाले ऐसे जिनेन्द्रदेव के चरणकमलों को हम नमस्कार करते हैं कि जिनके चरणकमल के प्रसाद से सम्पूर्ण मनोकामनायें फलीभूत हो जावेंगी-सफल हो जावेंगी।।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदंत-भूतबलि प्रणीत षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में श्रीमद् भूतबलिसूरि विरचित जीवस्थान की चूलिका में श्री वीरसेनाचार्य कृत धवला-टीकाप्रमुख नाना ग्रन्थों के आधार से इस बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्र-चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी गुरुवर्य के प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसाागराचार्य हुये हैं, उनकी शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका मुझ गणिनीज्ञानमती आर्यिकाकृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका नाम से यह दूसरा महाधिकार पूर्ण हुआ।