030.द्वितीय महाधिकार - अनिवृतिकरण गुणस्थान.......

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उक्तं च श्रीकुन्दकुन्ददेवेन-

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अज्जवि तिरयणसुद्धा, अप्पा झाएवि लहइ इंदत्तं।

लोयंतिय देवत्तं, तत्थ चुदा णिव्वुदिं जंति।।
अस्मिन् पंचमकालेऽपि त्रिरत्नशुद्धा: महामुनय: स्वात्मानं ध्यात्वा निरतिचारमूलगुणादीन् च पालयित्वा इन्द्रपदं लभन्ते ब्रह्मचर्यशुद्ध्या लौकान्तिकदेवत्वमपि प्राप्तुं अर्हा भवन्ति। अनन्तरं तत्र स्वर्गात् च्युता पुनरपि दिगम्बरमुनयो भूत्वा सर्वकर्मक्षयं कृत्वा निर्वाणं गच्छन्ति।
 
संप्रति नवमगुणस्थानप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो विधीयते श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण-अणियट्टि-बादर-सांपराइय-पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु अत्थि उवसमा खवा।।१७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अणियट्टि-समानसमयावस्थितजीवपरिणामानां निर्भेदेन वृत्ति: निर्वृत्ति:। अथवा निवृत्तिव्र्यावृत्ति:, न विद्यते निवृत्तिर्येषां तेऽनिवृत्तय:। बादरसांपराइय-बादरा: स्थूला:, सांपराया: कषाया: बादराश्च ते सांपरायाश्च बादरसांपराया:। पविट्ठसुद्धिसंजदेषु-तेषु प्रविष्टा शुद्धिर्येषां संयतानां ते अनिवृत्तिबादर-सांपरायप्रविष्टशुद्धिसंयता: तेषु। अत्थि उवसमा खवा-सन्ति उपशमका: क्षपका:। ते सर्वे संभूय एको गुणोऽनिवृत्तिरिति।
बादरग्रहणमन्तदीपकत्वाद् गताशेषगुणस्थानानि बादरकषायाणि इति। अत: बादरकषायेषु चरमगुण-स्थानमेतत्। अस्मिन् गुणस्थाने मुनि: काश्चित्प्रकृतीरुपशमयति, काश्चिदुपरिष्टादुपशमयिष्यतीति उपशम-श्रेण्यामौपशमिको भाव:, क्षपकश्रेण्यां च मुनि: काश्चित्प्रकृती: क्षपयति, काश्चिदुपरिष्टात् क्षपयिष्यति इति क्षायिको भाव:। सम्क्त्वापेक्षया चारित्रमोहक्षपकस्य क्षायिक एव गुण:, तत्रान्यस्यासंभवात्। उपशमकस्यौपशमिक: क्षायिकश्च उभयोरपि तत्राविरोधात्।
कश्चिदाह-
क्षपकोशमकयो: पृथक्-पृथक् गुणस्थानं किं नेष्यते इति चेत् ? तस्य समाधानं क्रियते-न गुणस्थाने द्वे भवत:, किंच गुणनिबन्धनानिवृत्तिपरिणामानां साम्यप्रदर्शनार्थं तदेकत्वोपपत्ते:।
उक्तं च-
एकम्हि कालसमये, संठाणादीहि जह णिवट्टंति।
ण णिवट्टंति तह च्चिय, परिणामेहिं मिहो जे हु।।
होंति अणियट्टिणो ते, पडिसमयं जस्स एक्कपरिणामा।
विमलयर-झाण-हुयवह-सिहाहि णिद्दड्ढ-कम्मवणा।।
ये अनिवृत्तिकरणकाले एकस्मिन् समये वर्तमानस्त्रिकालगोचरा नानाजीवा यथा संस्थानवर्णवयोऽवगाहन-ज्ञानोपयोगादिभि: परस्परं भिद्यन्ते तथा विशुद्धपरिणामैर्न भिद्यन्ते खलु-स्फुटं। ते जीवा अनिवृत्तिकरणा इति सम्यग्ज्ञातव्या:। न विद्यते निवृत्ति: विशुद्धिपरिणामभेदौ येषां ते अनिवृत्तय इति निरुक्त्याश्रयणात्। ते सर्वेऽपि अनिवृत्तिकरणा: जीवा: तत्कालप्रथमसमयमादिं कृत्वा प्रतिसमयमनन्तगुणविशुद्धिवृद्ध्या वर्धमानेन हीनाधिकभावरहितेन विशुद्धिपरिणामेन प्रवर्तमाना: सन्ति यत:, तत: प्रथमसमयवर्तिजीवविशुद्धिपरिणामेभ्यो द्वितीयसमयवर्तिजीवविशुद्धिपरिणामा अनन्तगुणा भवन्ति। एवं पूर्व-पूर्वसमयवर्तिविशुद्धिपरिणामेभ्यो जीवानामुत्तरोत्तरवत्र्तिजीवविशुद्धिपरिणामा अनन्तानन्तगुणितक्रमेण वर्धमाना भूत्वा गच्छन्ति इत्ययं विशेष: प्रवचने प्रतिपादित: प्रत्येतव्य:। तदनिवृत्तिकरणपरिणामयुतजीवा: विमलतरध्यानाग्निशिखाभिर्निदग्धकर्मवना भवन्ति। अनेन चारित्रमोहस्य उपशमनं क्षपणं च अनिवृत्तिकरणपरिणामकार्यमिति सूचितम्।

इदानीं दशमगुणस्थानस्वरूपप्रतिपादनार्थमुत्तरसूत्रस्यावतार: क्रियते श्रीआचार्यदेवेन-सुहुम-सांपराइय-पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु अत्थि उवसमा खवा।।१८।।

सिद्धान्तचिंतामणि टीका-सुहुमसांपराइय-सूक्ष्मश्चासौ सांपरायश्च सूक्ष्मसांपराय:। पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु तं प्रविष्टा शुद्धिर्येषां संयतानां ते सूक्ष्मसांपरायप्रविष्टशुद्धिसंयता: तेषु। अत्थि-सन्ति। उवसमा खवा-उपशमका: क्षपकाश्च। सर्वे ते एकगुणस्थानवर्तिन:, सूक्ष्मसांपरायत्वं प्रत्यभेदात्। अपूर्व इत्यनुवर्तते अनिवृत्तिरिति च। ततस्ताभ्यां सूक्ष्मसांपरायो विशेषयितव्य:। अन्यथातीतगुणेभ्यस्तस्याधिक्यानुपपत्ते:।
अस्मिन् गुणस्थाने क्षपकश्रेण्यारोहको मुनि: प्रकृती: काश्चित् क्षपयति क्षपयिष्यति क्षपिताश्चेति अस्य क्षायिको भाव:। काश्चिदुपशमयति उपशमयिष्यति उपशमिताश्चेत्यौपशमिको भाव:। सम्यग्दर्शनापेक्षया क्षपकस्य क्षायिको भाव:, उपशमकस्य औपशमिको भाव: क्षायिको वा, द्वाभ्यामपि सम्यक्त्वाभ्यामुपशम-श्रेण्यारोहणसंभवात्। संयतग्रहणस्य पूर्ववत्साफल्यमुपदेष्टव्यम्।

श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा भी है—

गाथार्थ—आज भी त्रिरत्न-सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र से शुद्ध जीव आत्मा का ध्यान करके इंद्र पर्याय को प्राप्त करते हैं और लौकांतिक देव भी बनते हैं पुन: वहाँ से च्युत होकर निर्वाणधाम चले जाते हैं-मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

भावार्थ—लौकांतिक देव एक भवावतारी होते हैं एवं सौधर्मइंद्र भी एक भवावतारी होता है। निर्दोष चारित्र धारी साधु, अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालक साधु-साध्वी भी उन देव पर्यायों में जन्म लेकर मात्र एक भव मनुष्य का लेकर मुनि अवस्था के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी हो सकते हैं। इसलिए आजकल दीक्षा लेना, तपस्या करना व्यर्थ नहीं किन्तु पहले से भी अधिक कार्यकारी है ऐसा सार प्राप्त होता है।

अब नवमें गुणस्थान का प्रतिपादन करने के लिए आचार्य श्री पुष्पदन्तस्वामी सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

अनिवृत्ति-बादर-सांपरायिक प्रविष्ट शुद्धि संयतों में उपशमक भी होते हैं और क्षपक भी होते हैं।।१७।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—समान समयवर्ती जीवों के परिणामों की भेदरहित वृत्ति को निवृत्ति कहते हैं अथवा निवृत्ति शब्द का अर्थ व्यावृत्ति है। अतएव जिन परिणामों की निवृत्ति अर्थात् व्यावृत्ति नहीं होती है उन्हें ही अनिवृत्ति कहते हैं।

बादर का अर्थ है स्थूल और सांपराय का अर्थ कषाय है तथा बादर और सांपराय दोनों मिलकर बादरसाम्पराय कहलाते हैं। उन बादरसाम्परायरूप परिणामों में जिन संयतों की शुद्धि प्रविष्ट हो गई है उन्हें अनिवृत्तिबादरसाम्परायप्रविष्टशुद्धिसंयत कहते हैं, ऐसे संयतों में उपशमक और क्षपक दोनों प्रकार के जीव होते हैं। उन सब संयतों का मिलकर एक अनिवृत्तिकरण गुणस्थान होता है।

सूत्र में जो ‘बादर’ पद का ग्रहण किया है वह अन्त्यदीपक होने से पूर्ववर्ती समस्त गुणस्थान बादर कषाय वाले हैं यह ज्ञान होता है। अत: बादर कषायों में यह अन्तिमगुणस्थान है ऐसा अभिप्राय निकलता है अर्थात् मिथ्यादृष्टि से लेकर अनिवृत्तिकरण तक सभी नौ गुणस्थानों में बादर-स्थूल कषायें विद्यमान रहती हैं इसके पश्चात् दसवें गुणस्थान में सूक्ष्म लोभ नामकी एक कषाय रहती है उसके आगे समस्त कषायें समाप्त हो जाती हैं।

इस गुणस्थान में मुनि मोहनीय कर्म की कितनी ही प्रकृतियों का उपशमन करता है और कितनी ही प्रकृतियों का आगे उपशमन करेगा इस अपेक्षा से उपशम श्रेणी में औपशमिक भाव होता है। और क्षपक श्रेणी में मुनि कितनी ही प्रकृतियों का क्षय करता है तथा कितनी ही प्रकृतियों का आगे क्षय करेगा इस दृष्टि से क्षायिक भाव है। सम्यग्दर्शन की अपेक्षा चारित्रमोह का क्षय करने वाले के यह गुणस्थान क्षायिकभावरूप ही है क्योंकि क्षपकश्रेणी में दूसरा भाव संभव ही नहीं है। चारित्रमोह का उपशम करने वाले उपशमक जीव के यह औपशमिक और क्षायिक दोनों भाव भी हैं क्योंकि उपशम श्रेणी की अपेक्षा वहाँ बिना विरोध के दोनों भाव संभव हैं।

शंका—क्षपक और उपशमक इन दोनों के अलग-अलग गुणस्थान क्यों नहीं कहे गये हैं ?

समाधान—दो गुणस्थान अलग-अलग नहीं कहे गये हैं क्योंकि इस गुणस्थान के कारणभूत अनिवृत्तिरूप परिणामों की समानता दिखाने के लिए उन दोनों में एकता कही है। अर्थात् उपशमक और क्षपक इन दोनों में अनिवृत्तिरूप परिणामों की अपेक्षा समानता है। कहा भी है—

गाथार्थ—

अंतर्मुहूर्तमात्र अनिवृत्तिकरण के काल में से किसी एक समय में रहने वाले अनेक जीव जिस प्रकार शरीर के आकार, वर्ण आदिरूप से परस्पर में भेद को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार जिन परिणामों के द्वारा उनमें भेद नहीं पाया जाता है उनको अनिवृत्तिकरण परिणाम वाले कहते हैं। और उनके प्रत्येक समय में उत्तरोत्तर अनंतगुणी विशुद्धि से बढ़ते हुए एक समान ही परिणाम पाये जाते हैं तथा वे अत्यन्त निर्मल ध्यानरूप अग्नि की शिखाओं से कर्मवन को भस्म करने वाले होते हैं।

जो अनिवृत्तिकरण काल के एक समय में वर्तमान के त्रिकालगोचर नाना जीव जिस प्रकार के संस्थान-शरीर के आकार, वर्ण, वय-उम्र, अवगाहना और ज्ञानोपयोग आदि के द्वारा परस्पर में भेद को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार विशुद्धपरिणामों के द्वारा भेद को प्राप्त नहीं होते हैं। अत: स्पष्टरूप से वे जीव अनिवृत्तिकरण हैं ऐसा सम्यक्रूप से जानना चाहिए। क्योंकि विशुद्धि, परिणाम आदि की निवृत्ति-भेद नहीं है जिनके वे अनिवृत्तिकरण हैं ऐसा व्युत्पत्ति अर्थ है। वे समस्त अनिवृत्तिकरण जीव चूँकि उसी समय प्रथम समय को आदि में करके प्रतिसमय अनंतगुणीविशुद्धि की वृद्धि से बढ़ते हुए हीनाधिक भावों से रहित विशुद्धिरूप परिणाम से प्रवर्तमान-सहित होते हैं इसलिए जीव के प्रथमसमयवर्ती विशुद्धपरिणामों से द्वितीयसमयवर्ती जीव के विशुद्ध परिणाम (परिणामों की विशुद्धि) अनंतगुणे हो जाते हैं। इस प्रकार पूर्व-पूर्व समयवर्ती परिणामविशुद्धि वालों से उत्तरोत्तर-आगे-आगे समयवर्ती जीवों की परिणामविशुद्धि अनंत-अनंत गुणित क्रम से बढ़ती चली जाती है, अनिवृत्तिकरण गुणस्थान की यह विशेषता प्रवचन-आगम में प्रतिपादित-कही गई है ऐसा समझना चाहिए।

उन अनिवृत्तिकरण परिणामों से सहित जीव अत्यन्त विमल ध्यानरूपी अग्नि की शिखाओं द्वारा कर्मवन को दग्ध करने वाले होते हैं। इससे चारित्रमोह का उपशमन और क्षपण अनिवृत्तिकरण परिणाम ही करते हैं ऐसा सूचित हो जाता है। अब दशवें गुणस्थान का स्वरूप प्रतिपादित करने हेतु श्री आचार्यदेव अगले सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

सूक्ष्मसांपराय प्रविष्ट शुद्धि संयतों में उपशमक और क्षपक दोनों हैं।।१८।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—सूक्ष्म और सांपराय अर्थात् कषाय को सूक्ष्मसांपराय कहते हैं। उसमें जिन संयतों की शुद्धि ने प्रवेश किया है उन्हें सूक्ष्मसांपरायप्रविष्टशुद्धिसंयत कहते हैं। उनमें उपशमक और क्षपक दोनों होते हैं। और सूक्ष्मसांपराय की अपेक्षा उनमें भेद नहीं होने से उपशमक और क्षपक इन दोनों का एक ही गुणस्थान होता है। इस गुणस्थान में अपूर्व और अनिवृत्ति इन दोनों विशेषणों की अनिवृत्ति होती है। इसलिए ये दोनों विशेषण भी सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयत के साथ जोड़ लेना चाहिए अन्यथा पूर्ववर्ती गुणस्थानों से इस गुणस्थान की कोई भी विशेषता नहीं बन सकती है।

इस गुणस्थान में क्षपक श्रेणी पर आरोहण करने वाले मुनि कितनी ही प्रकृतियों का क्षय करते हैं, आगे क्षय करेंगे और पूर्व में क्षय कर चुके हैं इसलिए उनके क्षायिक भाव है तथा कोई मुनि कितनी ही प्रकृतियों का उपशम करते हैं, आगे उपशम करेंगे और पहले उपशम कर चुके हैं इसलिए उनके औपशमिक भाव है। सम्यग्दर्शन की अपेक्षा क्षपक के क्षायिक भाव है और उपशम श्रेणीवाला औपशमिक तथा क्षायिक इन दोनों भावों से युक्त है क्योंकि दोनों ही सम्यक्त्वों से उपशमश्रेणी का चढ़ना संभव है। इस सूत्र में ग्रहण किये गये संयत पद की पूर्ववत् अर्थात् अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में बतलाई गई संयत पद की सफलता के समान सफलता समझ लेना चाहिए।

उक्तं च-

पुव्वापुव्वफद्दय-अणुभागादो अणंतगुणहीणे।

लोहाणुम्हि ट्ठियओ, हंद सुहुम-संपराओ सो।
पूर्वस्पर्धक-अपूर्वस्पर्धकयोरनुभागात् अनंतगुणहीनानुभागे सूक्ष्मलोभे स्थित: य: मुनि: स: सूक्ष्मसापंरायो भवति। अयं मुनि: पुलाकवकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकेषु कुशीलसंज्ञो भवति। इदं गुणस्थानं कुशीलमुनीनामन्त्यं वर्तते। यावत् कषायानां लेशो वर्तते तावत् कुशीलसंज्ञा भवति इति कषायापेक्षया कुशीलत्वं न चान्यद् इति।
तथैवोत्तं-
धुदकोसुंभयवत्थं, होदि जहा सुहुमरायसंजुत्तं।
एवं सुहुमकसाओ, सुहुमसरागोत्ति णादव्वो।।
यथा धौतकौसुंभवस्रं सूक्ष्मरागसंयुत्तं भवति तथा सूक्ष्मकृष्टिगतलोभकषाय: सूक्ष्मसापंराय इति ज्ञातव्या:।
षष्ठगुणस्थानादारभ्य एतद्दशमगुणस्थानपर्यन्ता: मुनय: सरागसंयमिन: उच्यन्ते, संज्वलनलोभकषाय-स्यांशत्वात्। अत्रपर्यंतं कर्मणां स्थिति-अनुभागबन्धौ च भवत: इति ज्ञातव्यं।
षट्खण्डागमसूत्रे मूलाचारे च दशमगुणस्थानपर्यंतं धम्र्यध्यानमेव शुक्लध्यानं तु एकादशमगुणस्थानादेव मन्यन्ते आचार्यदेवा:। तद्यथा-
षट्खण्डागमसूत्रकारेण श्रीभूतबलिभट्टारकेण दशमगुणस्थानपर्यंतं धम्र्यध्यानं कथितं। पुनश्च एकादशगुण-स्थानादारभ्य चतुर्दशगुणस्थानवर्तिकेवलिभगवतां शुक्लध्यानं कथितं। तथाहि-
असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजद-पमत्तसंजद-अप्पमत्तसंजद-अपुव्वसंजद-अणियट्टिसंजद-सुहुम-सांपराइयखवगोवसामएसु धम्मज्झाणस्स पवुत्ती होदि त्ति जिणोवएसादो। संपहि विदियसुक्कज्झाणपरूवणं कस्सामो-

जेणेगमेव दव्वं, जोगेणेक्केण अण्णदरएण।
खीणकसाओ ज्झायइ, तेणेयत्तं तगं भणिदं।।६१।।


एदस्स भावत्थो-खीणकसाओ सुक्कलेस्सिओ ओघबलो ओघसूरो वज्जरिसहवइरणारायण-सरीरसंघडणो अण्णदरसंठाणो चोद्दसपुव्वहरो दसपुव्वहरो णवपुव्वहरो वा खइयसम्माइट्ठी खविदाशेषकसाय-वग्गो णवपयत्थेसु एगपयत्थं दव्वगुणपज्जयभेदेण ज्झायदि।१
श्रीकुन्दकुन्ददेवेनापि मूलाचारग्रन्थे एवमेव प्रोत्तं-

उवसंतो दु पुहुत्तं, झायदि झाणं विदक्कवीचारं।
खीणकसाओ झायदि, एयत्तविदक्कवीचारं।।४०४।।
सुहुमकिरियं सजोगी, झायदि झाणं च तदियसुक्कं तु।
जं केवली अजोगी, झायदि झाणं समुच्छिण्णं।।४०५।।


एवं चतुर्थस्थले उपशमक्षपकश्रेण्योरारोहणानां कथनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।

अधुना उपशमश्रेण्यन्त्यगुणस्थानप्रतिपादनार्थमुत्तरसूत्रावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदंतसूरिणा-उवसंत-कसाय-वीयराय-छदुमत्था।।१९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उवसंत-कसाय-उपशांत: कषायो येषां ते उपशान्तकषाया:। वीयराय-वीतो विनष्टो रागो येषां ते वीतरागा:। छदुमत्था-छद्म ज्ञानदृगावरणे, तत्र तिष्ठन्तीति छद्मस्था:। वीतरागाश्च ते छद्मस्था: वीतरागछद्मस्था:।
एतेन सरागछद्मस्थनिराकृतिरवगन्तव्या। उपशान्तकषायाश्च ते वीतरागछद्मस्थाश्च उपशान्तकषायवीतराग-छद्मस्था:। एतेन उपरितनगुणस्थानस्य व्युदासोऽवगन्तव्य:। एतस्योपशमिताशेषकषायत्वादौपशमिको भाव: अस्मिन् गुणस्थाने, सम्यक्त्वापेक्षया क्षायिक: औपशमिको वा भाव: जायते।

कहा भी है—

गाथार्थ—पूर्वस्पर्धक और अपूर्वस्पर्धक के अनुभाग से अनंतगुणे हीन अनुभागवाले सूक्ष्म लोभ में जो स्थित है उसे सूक्ष्मसांपराय गुणस्थानवर्ती जीव समझना चाहिए।

इस गुणस्थानवर्ती मुनि पुलाक, वकुश, कुशील, निग्र्रन्थ और स्नातक इन पाँच भेदों में से कुशील संज्ञा वाले होते हैं। कुशील मुनियों का यह अंतिम गुणस्थान है अर्थात् दशवें गुणस्थान के आगे कुशील संज्ञा वाले मुनि नहीं होते हैं। जब तक कषायों का लेश रहता है तब तक कुशील संज्ञा होती है। इससे ऐसा समझना चाहिए कि कषाय की अपेक्षा से कुशीलपना रहता है अन्य अपेक्षा से नहीं। उसी को कहते हैं—

गाथार्थ—

जैसे कुसुम्भ से रंगा हुआ वस्त्र सम्यक्रूप से धोने पर भी सूक्ष्म लाल रंग से युक्त होता है उसी प्रकार आगे के सूत्र में कहे विधान के अनुसार सूक्ष्म कृष्टि को प्राप्त लोभ कषाय से युक्त जीव को सूक्ष्मसांपराय जानना चाहिए।

छठे गुणस्थान से आरंभ करके इस दशवें गुणस्थान पर्यन्त मुनि सरागसंयमी कहलाते हैं क्योंकि यहाँ तक संज्वलनलोभकषाय का अंश विद्यमान रहता है यहाँ तक कर्मों का स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध भी होता है ऐसा जानना चाहिए।

षट्खंडागम सूत्र और मूलाचार ग्रंथ में दशवें गुणस्थान तक धर्मध्यान ही होता है और शुक्लध्यान को आचार्यदेव ग्यारहवें गुणस्थान से ही मानते हैं। षट्खण्डागम सूत्रों को रचने वाले श्री भूतबली भट्टारक-आचार्य के द्वारा दशवें गुणस्थान तक धर्मध्यान कहा गया है और ग्यारहवें गुणस्थान से चौदहवें गुणस्थान तक केवली भगवान के शुक्लध्यान कहा है।

जैसे—असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, क्षपक और उपशामक अपूर्वकरणसंयत, क्षपक और उपशामक अनिवृत्तिकरणसंयत तथा क्षपक और उपशामक सूक्ष्म सांपरायसंयत जीवों के धर्मध्यान की प्रवृत्ति होती है ऐसा जिनदेव का उपदेश है। इससे जाना जाता है कि धर्मध्यान कषायसहित जीव के होता है।

अब द्वितीय शुक्लध्यान का कथन करते हैं—

गाथार्थ

—चूँकि क्षीणकषाय जीव एक ही द्रव्य का किसी एक योग के द्वारा ध्यान करता है इसलिए उस ध्यान को एकत्व कहा है।

इसका भावार्थ यह है कि जिसके शुक्ल लेश्या है, जो निसर्ग से बलशाली है, निसर्ग से शूर है, वङ्कावृषभनाराचसंहनन का धारी है, किसी एक संस्थान वाला है, चौदह पूर्वधारी है, दस पूर्वधारी है या नौ पूर्वधारी है, क्षायिक सम्यग्दृष्टि है और जिसने समस्त कषायवर्ग का क्षय कर दिया है ऐसा क्षीणकषाय जीव नौ पदार्थों में से किसी एक पदार्थ का द्रव्य, गुण और पर्याय के भेद से ध्यान करता है।

श्रीकुन्दकुन्ददेव ने भी मूलाचार ग्रंथ में इसी प्रकार से कहा है—

गाथार्थ—उपशान्तकषाय मुनि पृथक्त्ववितर्कवीचार नामक शुक्लध्यान को ध्याते हैं।

क्षीणकषाय मुनि एकत्ववितर्कअवीचार नामक ध्यान करते हैं।।४०४।। सूक्ष्मक्रिया नामक तीसरा शुक्लध्यान सयोगी ध्याते हैं। जो अयोगीकेवली ध्याते हैं वह समुच्छिन्न ध्यान है।।४०५।।

विशेषार्थ—

उपशान्तकषाय नामक ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती मुनि पृथक्त्ववितर्कवीचार ध्यान को ध्याते हैं। जीवादि द्रव्य अनेक भेदों से सहित हैं, मुनि इनको मन, वचन और काय इन तीनों योगों के द्वारा ध्याते हैं। इसलिए इस ध्यान का पृथक्त्व यह सार्थक नाम है। श्रुत को वितर्क कहते है। वितर्क-श्रुत के साथ रहता है अर्थात् नवपूर्वधारी, दशपूर्वधारी या चतुर्दशपूर्वधरों के द्वारा प्रारम्भ किया जाता है इसलिए वह वितर्क कहलाता है। अर्थ, व्यंजन और योगों के संक्रमण का नाम वीचार है अर्थात् जो एक अर्थ-पदार्थ को छोड़कर भिन्न अर्थ का ध्यान करता है, मन से चिन्तवन करके वचन से करता है, पुन: काययोग से ध्याता है। इस तरह परम्परा से योगों का संक्रमण होता है अर्थात् द्रव्यों का संक्रमण होता है और व्यंजन अर्थात् पर्यायों का संक्रमण होता है। पर्यायों में स्थूल पर्यायें व्यंजनपर्याय हैं और जो वचन के अगोचर सूक्ष्म पर्याय हैं वे अर्थपर्यायें कहलाती हैं। इनका संक्रमण इस ध्यान में होता है इसलिए यह ध्यान वीचार सहित है। अत: इसका सार्थक नाम पृथक्त्ववितर्वâवीचार है। इस ध्यान में तीन प्रकार हो जाते हैं अर्थात् पृथक्त्व-नाना भेदरूप द्रव्य, वितर्क-श्रुत और वीचार-अर्थ, व्यंजन और योग का संक्रमण इन तीनों की अपेक्षा से यह ध्यान तीन प्रकार का है। इस ध्यान के स्वामी उपशान्तकषायी महामुनि हैं।

क्षीणकषायगुणस्थान वाले मुनि एकत्ववितर्क अवीचार ध्यान को ध्याते हैं। वे एक द्रव्य को अथवा एक अर्थपर्याय को या एक व्यंजन पर्याय को किसी एक योग के द्वारा ध्याते हैं, अत: यह ध्यान एकत्व कहलाता है। इसमें वितर्क-श्रुत पूर्वकथित ही है अर्थात् नव, दश या चतुर्दश पूर्वों के वेत्ता मुनि ही ध्याते हैं। अर्थ, व्यंजन और योगों की संक्रांति से रहित होने से यह ध्यान अवीचार है। इसमें भी एकत्व, वितर्क और अवीचार ये तीन प्रकार होते हैं। इस तीन प्रकाररूप एकत्व, वितर्क, अवीचार ध्यान को करने वाले क्षीणकषाय महामुनि ही इसके स्वामी हैं।

जो सूक्ष्मकाय क्रिया में व्यवस्थित है अर्थात् जिनमें काययोग की क्रिया भी सूक्ष्म हो चुकी है वह सूक्ष्मक्रिया ध्यान है। यह अवितर्क और अवीचार है अर्थात् श्रुत के अवलम्बन से रहित है, अत: अवितर्क है और इसमें अर्थ, व्यंजन तथा योगों का संक्रमण नहीं है अत: यह अवीचार है। ऐसे इस सूक्ष्मक्रिया नामक तृतीय शुक्ल ध्यान को सयोग केवली ध्याते हैं।

जिस ध्यान को अयोग केवली ध्याते हैं वह समुच्छिन्न है। वह अवितर्क, अवीचार, अनिवृत्तिनिरुद्ध योग, अनुत्तर, शुक्ल और अविचल है, मणिशिखा के समान है अर्थात् इस समुच्छिन्न ध्यान में श्रुत का अवलम्बन नहीं है अत: अवितर्क है। अर्थ, व्यंजन योग की संक्रांति भी नहीं है अत: अवीचार है। सम्पूर्ण योगों का-काययोग का भी निरोध हो जाने से यह अनिवृत्तिनिरोध योग है। सभी ध्यानों में अंतिम है इससे उत्कृष्ट अब और कोई ध्यान नहीं रहा है। अत: यह अनुत्तर है। परिपूर्णतया स्वच्छ-उज्ज्वल होने से शुक्लध्यान इसका नाम है। यह मणि के दीपक की शिखा के समान होने से पूर्णतया अविचल है। इस चतुर्थ ध्यान के स्वामी चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली हैं।

यद्यपि इन तेरहवें और चौदहवें गुणस्थान में मन का व्यापार नहीं है तो भी उपचार क्रिया से ध्यान का उपचार किया गया है। यह ध्यान का कथन पूर्व में होने वाले ध्यान की प्रवृत्ति की अपेक्षा करके कहा गया है, जैसे कि पहले घड़े में घी रखा था पुन: उस घड़े से घी निकाल देने के बाद भी उसे घी का घड़ा कह देते हैं अथवा पुरुषवेद का उदय नवमें गुणस्थान में समाप्त हो गया है फिर भी पूर्व की अपेक्षा पुरुषवेद से मोक्ष की प्राप्ति कह देते हैं।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में उपशम एवं क्षपक श्रेणी पर आरोहण के कथन की मुख्यता से तीन सूत्र हुए।

अब उपशमश्रेणी के अंतिम गुणस्थान को बताने हेतु श्रीपुष्पदन्त आचार्य उत्तरसूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

सामान्य से उपशान्त कषाय वीतराग छद्मस्थ जीव हैं।।१९।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—जिनकी कषाय उपशान्त हो गई है उन्हें उपशान्तकषाय कहते हैं। जिनका राग नष्ट हो गया है उन्हें वीतराग कहते हैं। छद्म ज्ञानावरण और दर्शनावरण को कहते हैं उनमें जो रहते हैं उन्हें छद्मस्थ कहते हैं। जो वीतराग होते हुए भी छद्मस्थ होते हैं उन्हें वीतरागछद्मस्थ कहते हैं।

इसमें आए हुए वीतराग विशेषण से दशवें गुणस्थान तक के सराग छद्मस्थों का निराकरण समझना चाहिए। जो उपशान्त होते हुए भी वीतराग छद्मस्थ होते हैं उन्हें उपशान्तकषायवीतराग छद्मस्थ कहते हैं। इससे आगे के गुणस्थानों का निराकरण समझना चाहिए। इस गुणस्थान में सम्पूर्ण कषायें उपशान्त हो जाती हैं इसलिए इसमें औपशमिक भाव है तथा सम्यग्दर्शन की अपेक्षा औपशमिक और क्षायिक दोनों भाव हैं।

उक्तं च-

सकयगहलं जलं वा, सरए सरवाणियं व णिम्मलए।

सयलोवसंत-मोहो, उवसंतकसायओ होई।।
यथा कतकफलचूर्णयुतं जलं प्रसन्नं अथवा अभ्रकलंकरहितशरत्काले सर:पानीयं प्रसन्नं-निर्मलं वर्तते, तथा साकल्येन उपशान्तमोहनीय: उपशान्तकषायो भवति। उपशान्ता: साकल्येन उदयायोग्या: कृता: कषायनोकषाया: येन असौ उपशान्तकषाय: इति निरुक्त्या अत्यन्तप्रसन्नचित्तता सूचिता भवति।
य: कश्चिन्मुनि: उपशमश्रेणीमारोहति तस्यान्तर्मुहूर्तकालेन नियमेन चतु:कषायाणामन्यतमकषायोदये सति अध:पतनं भवति, अथवा कदाचिदायु:क्षयं भवेत् तर्हि असौ मृत्वा सर्वार्थसिद्धौ उत्पद्यते नकुलसहदेववत्।
श्री ऋषभदेवभगवत: पुरा वङ्कानाभिभवे महामुनिवदपि ज्ञातव्यं।
उक्तं च-

द्वितीयवारमारुह्य, श्रेणीमुपशमादिकाम्।
पृथक्त्वध्यानमापूर्य, समाधिं परमं श्रित:।।११०।।
उपशान्तगुणस्थाने, कृतप्राणविसर्जन:।
सर्वार्थसिद्धिमासाद्य, संप्रापत् सोऽहमिन्द्रताम्।।१११।।


अस्मात् पूर्वस्मात् अपि उपशान्तगुणस्थानात् षष्ठपर्यन्तं आगमादयं वङ्कानाभि: मुनिरिति ज्ञातव्यं।

अधुना निर्र्ग्रन्थनामद्वादशमगुणस्थानप्रतिपादनार्थमुत्तरसूत्रावतारो भवति-खीण-कसाय-वीयराय-छदुमत्था।।२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-खीण-कसाय-क्षीण: कषायो येषां ते क्षीणकषाया:। वीयरायछदुमत्था-वीतो रागो येषां ते वीतरागा:। छद्मनि आवरणे तिष्ठन्तीति छद्मस्था:। क्षीणकषायवीतरागाश्च ते छद्मस्था: क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था:। अत्र छद्मस्थग्रहणमन्तदीपकत्वादतीताशेषगुणानां सावरणत्वस्य सूचकमित्य-वगन्तव्यम्। अस्मिन् गुणस्थाने द्रव्यभावद्वैविध्यमोहनीयस्य निरन्वयविनाशात् क्षायिकभाव एव।
उत्तं च-
णिस्सेस-खीण-मोहो, फलिहामल-भायणुदय-समचित्तो।
खीण - कसाओ भण्णइ, णिग्गंथो वीयराएहिं।।
नि:शेषक्षीणा:-प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशरहिता मोहप्रकृतयो यस्यासौ नि:शेषक्षीणमोह: इति निरवशेषमोह-प्रकृतिसत्त्वरहित: क्षीणकषाय:। तत: कारणात् स्फटिकभाजनोदकसदृशप्रसन्नचित्त: क्षीणकषाय: इति वीतरागसर्वज्ञैर्भण्यते स एव परमार्थेन निर्र्ग्रन्थो भवति। उपशान्तकषायोऽपि यथाख्यातचारित्रसाधारण्येन निर्र्गंथ इति प्रवचने प्रतिपाद्यते।
अयं क्षीणकषायो मुनि: अंतर्मुहूर्तमात्रकालेन नियमेन सर्वज्ञो भवति इति ज्ञातव्यं।
एवं यथाख्यातचारित्रधारकयो: उपशांतकषाय-क्षीणकषायमहामुन्यो: स्वरूपप्रतिपादनपरत्वेन पंचमेऽन्तरस्थले सूत्रद्वयं गतम्।
अधुना स्नातकगुणस्थानप्रतिपादनार्थं उत्तरसूत्रमवतार्यते श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण-सजोगकेवली।।२१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-केवलं केवलज्ञानं, योगेन सह वर्तन्ते इति सयोगा:। सयोगाश्च ते केवलिनश्च सयोगकेवलिन:। केवलमसहायमिन्द्रियालोकमनस्कारनिरपेक्षम्। तदेषामस्तीति केवलिन:। मनोवाक्काय-प्रवृत्तिर्योग इति। अत्र सूत्रे सयोगग्रहणमधस्तनसकलगुणानां सयोगत्वप्रतिपादकं, अन्तदीपकत्वात्। क्षपिताशेषघातिकर्मत्वान्नि:शक्तीकृतवेदनीयत्वान्नष्टाष्टकर्मावयवषष्टिकर्मत्वाद्वा क्षायिकगुण:। अत्र त्रयाणामायुषां अविवक्षितत्वात् एव षष्टिप्रकृतय: कथिता:, आयु:सहिता: त्रिषष्टय: प्रकृतय: नश्यन्तीति ज्ञातव्यं। केवलज्ञानार्कोदयेन नवकेवललब्धयश्चोद्भवन्ति।

कहा भी है—

गाथार्थ—निर्मली फल से युक्त निर्मल जल की तरह अथवा शरद ऋतु में निर्मल होने वाले सरोवर के जल की तरह सम्पूर्ण मोहनीय कर्म के उपशम से उत्पन्न होने वाले निर्मल परिणामों को उपशान्तकषाय गुणस्थान कहते हैं।

जैसे कतकफल के चूर्ण से युक्त जल निर्मल होता है अथवा मेघपटल से रहित शरदऋतु में जैसे सरोवर का जल ऊपर से निर्मल होता है वैसे ही पूर्णरीति से मोह को उपशान्त करने वाला उपशान्तकषाय होता है। जिसने कषाय-नोकषायों को उपशान्त अर्थात् पूर्णरूप से उदय के अयोग्य कर दिया है वह उपशान्तकषाय है। इस निरुक्ति से उसका अत्यन्त प्रसन्नचित्तपना सूचित किया है।

जो कोई मुनि उपशम श्रेणी में आरोहण करता है उसके अन्तर्मुहूर्त काल में नियम से चार कषायों में से किसी एक के उदय आ जाने पर अधोपतन-नीचे गिरना होता है। अथवा कदाचित् आयु समाप्त हो जाती है तो वह मरकर नकुल और सहदेव के समान सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग में उत्पन्न होता है। भगवान श्री ऋषभदेव के वङ्कानाभि नामक पूर्व भव में महामुनि के समान भी जानना चाहिए।

जैसा कि आदिपुराण में कहा भी है—

वे द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर आरूढ़ हुए और पृथक्त्ववितर्क नामक शुक्लध्यान को पूर्ण कर उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त हुए।।११०।।

अन्त में उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान में प्राण छोड़कर सर्वार्थसिद्धि पहुँचे और वहाँ अहमिन्द्र पद को प्राप्त हो गये।।१११।।

विशेषार्थ—

जैसा कि पाँच पांडवों के बारे में जैन महाभारत-पाण्डवपुराण, हरिवंशपुराण आदि ग्रंथों में वर्णन आता है कि युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन ने शत्रुञ्जय पर्वत पर ध्यान करते हुए कुर्युधर के द्वारा किए गए अग्नि उपसर्ग को सहन करके मोक्षपद प्राप्त किया और नकुल, सहदेव इन दो भाइयों ने मरण करके सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।

इस संबंध में प्रवचनकार, विद्वज्जन यह तर्क देते हैं कि उन दोनों भाइयों को अन्य भाइयों का मोह उत्पन्न हो गया था, उन्हें विकल्प हुआ कि मेरे ये सहोदर कैसे यह अग्नि का उपसर्ग सहन करेंगे ? उन्हें भीषण कष्ट हो रहा होगा ?......इत्यादि विकल्पों में ही उनका मरण हो गया इसीलिए वे मोक्ष नहीं जा सके और उन्हें सर्वार्थसिद्धि में जन्म लेना पड़ा।

किन्तु वास्तविकता यह है कि सिद्धान्तसूत्रानुसार उन पाँचों पाण्डवों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन ने उपसर्ग प्रारंभ होते ही बारह भावना का चिन्तन करते हुए क्षपक श्रेणी में आरोहण कर लिया था एवं नकुल, सहदेव ने उपशमश्रेणी पर आरोहण किया था और वहीं आयु समाप्त हो गई अत: सर्वार्थसिद्धि में जन्म ले लिया, वहाँ तेंतीस सागर तक वे स्वर्ग के अहमिन्द्र सुखों का उपभोग करके आगे मनुष्यभव में मुनिपद धारणकर निर्वाणधाम को प्राप्त करेंगे। क्षपकश्रेणी पर चढ़ने वाले भाइयों ने सीधे बारहवें गुणस्थान में मोह को नाशकर अंतकृत्केवली बनकर मोक्ष प्राप्त किया था।

आज से ८६५०० वर्ष पूर्व भगवान नेमिनाथ के तीर्थकाल में यह कथानक प्रसिद्ध हुआ जो सिद्धान्तग्रंथ का प्रत्यक्ष प्रमाण दर्शाता है।

अब निर्ग्रन्थ नाम के बारहवें गुणस्थान का प्रतिपादन करने हेतु उत्तरसूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ जीव हैं।।२०।।

'सिद्धांतचिंतामणिटीका'—जिनकी कषाय क्षीण-नष्ट हो गई हैं उन्हें क्षीणकषाय कहते हैं। जिनके राग समाप्त हो गया है वे वीतराग कहलाते हैं। जो छद्म अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरण में रहते हैं उन्हें छद्मस्थ कहते हैं। जो क्षीणकषाय वीतराग होते हुए छद्मस्थ होते हैं उन्हें क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ कहते हैं। यहाँ सूत्र में आया हुआ छद्मस्थ पद अन्तदीपक है इसलिए उसे पूर्ववर्ती समस्त गुणस्थानों के सावरणपने का सूचक समझना चाहिए। इस गुणस्थान में द्रव्य और भाव दोनों प्रकार के मोहनीय कर्म के पूर्णरूपेण नष्ट होने के कारण क्षायिकभाव ही है।

कहा भी है—

गाथार्थ—

जिसने सम्पूर्ण मोहनीय कर्म को नष्ट कर दिया है अतएव जिसका चित्त स्फटिकमणि के निर्मल पात्र में रखे हुए जल के समान प्रसन्न-स्वच्छ है उन्हें वीतरागसर्वज्ञदेव ने क्षीणकषायनिर्ग्रन्थ कहा है।

प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश से रहित हो गया है मोहकर्म जिनका वह नि:शेषक्षीणमोह है, इस प्रकार समस्त मोहप्रकृति की सत्ता से रहित क्षीणकषाय गुणस्थान होता है। इस कारण से स्फटिक भाजन में रखे हुए जल के समान निर्मल-प्रसन्नचित्त क्षीणकषायगुणस्थानवर्ती जीव होता है ऐसा सर्वज्ञदेव ने कहा है। परमार्थ-निश्चयनय से वही निर्ग्रन्थ संज्ञा से सुशोभित होता है। उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती जीव के भी साधारणरूप से (क्षीणकषाय के समान) यथाख्यातचारित्र होता है अत: प्रवचन-आगम में उनको भी निग्र्रन्थ संज्ञा से सम्बोधित किया है।

यह क्षीणकषाण गुणस्थान वाला मुनि अन्तर्मुहूर्तकाल में नियम से सर्वज्ञ बन जाता है ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार यथाख्यातचारित्र को धारण करने वाले उपशांतकषाय एवं क्षीणकषाय दोनों गुणस्थानवर्ती महामुनियों के स्वरूप के प्रतिपादन की मुख्यता से पंचम स्थल में दो सूत्र हुए।

अब स्नातक गुणस्थान का प्रतिपादन करने के लिए श्रीमान् आचार्य पुष्पदन्तदेव के द्वारा उत्तर सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से सयोगकेवली जीव हैं।।२१।।

'सिद्धांतचिंतामणिटीका'—केवल पद से यहाँ केवलज्ञान का ग्रहण किया है जो योग के साथ वर्तन करते हैं उन्हें सयोग कहते हैं। इस तरह जो सयोग होते हुए केवली हैं उन्हें सयोगकेवली कहते हैं।

जिसमें इन्द्रिय, आलोक और मन की अपेक्षा नहीं होती है उसे केवल अथवा असहाय कहते हैं, वह केवल अथवा असहाय ज्ञान जिनके होता है उन्हें केवली कहते हैं। मन, वचन और काय की प्रवृत्ति का नाम योग है। इस सूत्र में जो सयोग पद का ग्रहण किया है वह अन्तदीपक होने से नीचे के सम्पूर्ण गुणस्थानों के सयोगपने का प्रतिपादक है अर्थात् उससे पूर्व के भी सभी गुणस्थानों में मन वचन कायरूप योग का परिस्पन्दन चलता ही है। चारों घातिया कर्मों का क्षय कर देने से, वेदनीय कर्म को नि:शक्त कर देने से अथवा आठों ही कर्मों के अवयवरूप साठ उत्तर कर्म प्रकृतियों को नष्ट कर देने से इस गुणस्थान में क्षायिक भाव होता है।

यहाँ तीनों आयु की विवक्षा न होने से ही साठ प्रकृतियाँ कही हैं, वे केवली भगवान् उन तीन आयु से सहित त्रेसठ (६३) प्रकृतियों का नाश करते हैं ऐसा जानना चाहिए। केवलज्ञानरूपी सूर्य के उदय से उनके नव केवललब्धियाँ प्रगट-उत्पन्न हो जाती हैं।

उक्तं च-

केवलणाणदिवायर-किरणकलाव-प्पणासियण्णाणो।

णवकेवललद्धुग्गम-सुजणियपरमप्प-ववएसो।।
असहायणाणदंसण-सहिओ इदि केवली हु जोएण।
जुत्तोत्ति सजोगो इदि, अणाइ-णिहणारिसे उत्तो।।
केवलज्ञानदिवाकरस्य किरणकलापा:-अर्थप्रकाशनपटवो दिव्यध्वनिविशेषा: तै: प्रणाशितं विनेयजनाज्ञानान्धकारं येनासौ केवलज्ञानदिवाकरकिरणकलापप्रणाशिताज्ञान:। अनेन सयोगभट्टारकस्य भव्य लोकोपकारकत्वलक्षणपरार्थसंपत्प्रणीता। नवानां केवललब्धीनां क्षायिकसम्यक्त्व-चारित्र-ज्ञान-दर्शन-दान-लाभ-भोग-उपभोग-वीर्यलक्षणानां उदयेन प्रादुर्भावेन सुजनित:-वस्तुवृत्त्या विहित: परमात्मेतिव्यपदेशो यस्यासौ नवकेवललब्ध्युद्गमसुजनितपरमात्मव्यपदेश: इति भगवदर्हत्परमेष्ठिनोऽनन्तज्ञानादिलक्षणस्वार्थसंपत्प्रदर्शिता।
योगेन सह युक्त: इति सयोग: असहायज्ञानदर्शनसहित: इति केवली। घातिकर्मनिर्मूलको जिन:, इत्यनादिनिधनार्षे-आगमे उक्त: प्रतिपादित:।
अधुना अन्तिमगुणस्थानस्य स्वरूपनिरूपणार्थं उत्तरसूत्रावतार: क्रियते श्रीपुष्पदंतभट्टारकेण-अजोगकेवली।।२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-न विद्यते योगो यस्य स भवत्ययोग:। केवलमस्यास्तीति केवली। अयोगश्चासौ केवली च अयोगकेवली इति।
इतो विस्तर:-अस्माकं जैनानां मते आर्षसन्ततेर्विच्छेदो नास्ति, विगतदोषावरणार्हद्व्याख्यातस्यार्षस्य चतुरमलबुद्ध्यतिशयोपेतनिर्दोषगणभृदवधारितस्य ज्ञानविज्ञानसंपन्नगुरुपर्वक्रमेणायातस्य अविनष्टप्राक्तनवाच्य-वाचकभावस्य विगतदोषावरणनिष्प्रतिपक्षसत्यस्वभावपुरुषव्याख्यातत्वेन श्रद्धाप्यमानस्योपलम्भात्।
कश्चिदाह-अप्रमाणमिदानीन्तन-आगम:, आरातीयपुरुषव्याख्यातार्थत्वाद् ?
आचार्य: समाधत्ते-नैतद्वक्तव्यं, ऐदंयुगीनज्ञानविज्ञानसंपन्नतया प्राप्तप्रामाण्यैराचार्यैव्र्याख्यातार्थत्वात्।
पुनरपि कश्चिदाह-कथं छद्मस्थानां सत्यवादित्वं ?
तस्य समाधानं-यथाश्रुतव्याख्यात¸णां सत्यवादित्वं वर्तते तत्र नास्ति विरोध:।
प्रमाणीभूतगुरुपर्वक्रमेणायातोऽयमर्थ: इति कथमवसीयते ?
नैतत् कथयितविं, किंच, दृष्टविषये सर्वत्राविसंवादात्। ऐदंयुगीनज्ञानविज्ञानसंपन्नभूयसामा-चार्याणामुपदेशाद्वा तदवगते:। न च भूयांस: साधवो विसंवदन्ते। तथान्यत्रानुपलंभात्। प्रमाणपुरुषव्याख्या-तार्थत्वात् स्थितं वचनस्य-आगमस्य प्रामाण्यम्।
दृश्यताम्, श्रीवीरसेनाचार्य: आगमस्य आगमकर्तुर्विषये च कियत्श्रद्धां दर्शयति। ‘‘सांप्रतमन्त्यस्य गुणस्य स्वरूपनिरूपणार्थमर्हन्मुखोद्गतार्थं गणधरदेवग्रथितशब्दसंदर्भं प्रवाहरूपतया अनिधनतामापन्नमशेष-दोषव्यतिरिक्तत्वादकलंकमुत्तरसूत्रं पुष्पदन्तभट्टारक: प्राह-’’
पंचसु भावेषु अस्मिन् गुणस्थाने क्षीणाशेषघातिकर्मत्वान्निरस्यमानाघातिकर्मत्वाच्च क्षायिको भाव एव।
उक्तं च-
सेलेसिं संपत्तो, णिरुद्धणिस्सेस-आसवो जीवो।
कम्मरयविप्पमुक्को, गयजोगो केवली होई।।
अष्टादशसहस्रशीलाधिपत्यं संप्राप्त:, निरुद्धनि:शेषास्रवत्वात् नूतनबध्यमानकर्मरजोविप्रमुक्त:, मनोवाक्काययोगरहितत्वादयोग:, अयोगश्चासौ केवली च अयोगकेवली इति भगवत्परमेष्ठिजीव: कथित:। अत्रपर्यंतं मोक्षस्य सोपानीभूतानि चतुर्दशगुणस्थानानि प्रतिपादितानि भवन्तीति ज्ञातव्यं।
अधुना संसारातीतावस्थाप्रतिपादनार्थं त्रयोविंशतितमस्य सूत्रस्यावतारो भवति


कहा भी है—

गाथार्थ—जिसका केवलज्ञानरूपी सूर्य की किरणों के समूह से अज्ञानरूपी अंधकार सर्वथा नष्ट हो गया है और जिसने नव केवललब्धियों के प्रगट होने से ‘परमात्मा’ इस संज्ञा को प्राप्त कर लिया है वह इन्द्रिय आदि की अपेक्षा न रखने वाले ऐसे असहाय ज्ञान और दर्शन से युक्त होने के कारण केवली और तीनों योगों से युक्त होने के कारण सयोगी कहे जाते हैं ऐसा अनादिनिधन आर्ष में कहा है।

जिन्होंने केवलज्ञानरूपी सूर्य के किरण समूहरूप जो पदार्थों को प्रकाशित करने में प्रवीण दिव्यध्वनि से विशेष, उनके द्वारा शिष्यजनों का अज्ञान अंधकार नष्ट कर दिया है इससे सयोगकेवली भगवान के भव्य जीवों का उपकार करनेरूप परार्थ सम्पदा कही है तथा क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिकदान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य इन नौ केवललब्धियों के प्रकट होने से जिन्होने वास्तव में परमात्मा नाम को प्राप्त किया है इससे भगवान अर्हन्त परमेष्ठी के अनन्तज्ञानादिरूप स्वार्थ सम्पदा दिखाई है।

योग से युक्त होने से सयोग और असहाय ज्ञानदर्शन से सहित होने से केवली, इस तरह सयोग और केवली होने से सयोगकेवली हैं और घातिया कर्मों को निर्मूल करने से जिन हैं, इस तरह अनादिनिधन आगम में उन्हें सयोगकेवलीजिन कहा है।

अब अंतिम गुणस्थान के स्वरूप का निरूपण करने के लिए श्री पुष्पदन्ताचार्य उत्तरसूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

सामान्य से अयोगकेवली जीव हैं।।२२।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—जिसके योग विद्यमान नहीं है उसे अयोग कहते हैं। जिसके केवलज्ञान पाया जाता है उसे केवली कहते हैं। जो योग रहित होते हुए केवली होता है उसे अयोगकेवली कहते हैं।

उसी का विस्तार करते हैं—हम जैनधर्मावलम्बियों के मत में आर्षपरम्परा का विच्छेद नहीं है क्योंकि जिसका दोष और आवरण रहित अरिहंत परमेष्ठी ने अर्थरूप से व्याख्यान किया है, जिसको चार निर्मल बुद्धिरूप अतिशय से युक्त और निर्दोष गणधर देव ने धारण किया है, जो ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न गुरुपरम्परा से चला आ रहा है, जिसका पहले का वाच्य-वाचक भाव अभी तक नष्ट नहीं हुआ है और जो दोषावरण से रहित तथा निष्प्रतिपक्ष सत्य स्वभाव वाले पुरुष के द्वारा व्याख्यात-कहा गया होने से श्रद्धा के योग्य है ऐसे आगम की आज भी उपलब्धि होती है।

यहाँ कोई शंकाकार कहता है कि ‘‘आधुनिक आगम तो अप्रमाण हैं क्योंकि अर्वाचीन पुरुषों ने इसके अर्थ का व्याख्यान किया है ?’’

तब आचार्यदेव समाधान करते हैं कि ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि ज्ञान-विज्ञान से सहित होने के कारण प्रमाणता को प्राप्त इस युग के आचार्यों द्वारा इसके अर्थ का व्याख्यान किया गया है। इसलिए आधुनिक आगम भी प्रमाण हैं।

पुन: भी कोई प्रश्न करता है कि—

छद्मस्थों के सत्यवादीपना कैसे हो सकता है ?

उसका उत्तर देते हैं कि—

श्रुत के अनुसार व्याख्यान करने वाले आचार्यों के प्रमाणता मानने में कोई विरोध नहीं है।

शंकाआगम का यह अर्थ प्रामाणिक गुरुपरम्परा क्रम से आया हुआ है यह कैसे निश्चय किया जाय ?

समाधान—ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि प्रत्यक्षभूत विषय में तो सब जगह विसंवाद उत्पन्न नहीं होने से निश्चय किया जा सकता है। अथवा आधुनिक ज्ञानविज्ञान से युक्त इस युग के अनेक आचार्यों के उपदेश से उसकी प्रमाणता जानना चाहिए अतएव आगम के अर्थ के व्याख्याता प्रामाणिक पुरुष हैं इस बात के निश्चित हो जाने से आर्षवचन की प्रमाणता भी सिद्ध हो जाती है।

देखिए, श्रीवीरसेनाचार्य आगम और आगम के कर्ता के विषय में कितनी श्रद्धा प्रदर्शित करते हैं जैसे कि—

‘‘अब पुष्पदन्तभट्टारक अंतिम गुणस्थान के स्वरूप निरूपण करने के लिए अर्थरूप से अरहंत परमेष्ठी के मुख से निकले हुए, गणधर देव के द्वारा गूँथे गये शब्द रचना वाले, प्रवाहरूप से कभी भी नाश को नहीं प्राप्त होने वाले और सम्पूर्ण दोषों से रहित होने के कारण निर्दोष ऐसे उत्तरसूत्र को कहते हैं।’’

पाँच भावों में से इस गुणस्थान में सम्पूर्ण घातिया कर्मों के क्षीण हो जाने से और थोड़े ही समय में अघातिया कर्मों के नाश को प्राप्त होने वाले होने से इस गुणस्थान में क्षायिक भाव ही है।

कहा भी है—

गाथार्थ—

जिन्होंने अठारह हजार शील के स्वामीपने को प्राप्त कर लिया है अथवा जो मेरु के समान निष्कम्प अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण आस्रव का निरोध कर दिया है जो नूतन बंधने वाले कर्मरज से रहित हैं जो मन, वचन, काय योग से रहित होते हुए केवलज्ञान से विभूषित हैं उन्हें अयोगकेवली परमात्मा कहते हैं।

यहाँ तक मोक्ष के सोपानभूत-सीढ़ी के समान चौदहगुणस्थानों का प्रतिपादन हुआ है ऐसा जानना चाहिए।

अब संसार से अतीत अवस्था का प्रतिपादन करने के लिए तेईसवें सूत्र का अवतार होता है|

सिद्धा चेति।।२३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सिद्धा: निष्ठिता: निष्पन्ना: कृतकृत्या: सिद्धसाध्या इति यावत्। निराकृताशेषकर्माणो बाह्यार्थनिरपेक्षानन्तानुपमसहजाप्रतिपक्षसुखा: निरुपलेपा: अविचलितस्वरूपा: सकलावगुणातीता: नि:शेषगुणनिधाना: चरमदेहात्किञ्चिन्न्यूनस्वदेहा: कोशविनिर्गतसायकोपमा: लोकशिखरनिवासिन: सिद्धा:।

उक्तं च-
अट्ठविह-कम्मविजडा, सीदीभूदा णिरंजणा णिच्चा।
अट्ठगुणा किदकिच्चा, लोयग्ग-णिवासिणो सिद्धा।।
अट्ठविहकम्मवियला-अष्टविधकर्मविकला:-इत्यष्टगुणप्रतिपक्षाणां प्रक्षयेण विकला: निष्प्रतिपक्षा: मुक्ता इत्यर्थ:, अनेन संसारिजीवस्य मुक्तिर्नास्तीति याज्ञिकमतं, सर्वदा कर्ममलैरस्पृष्टत्वेन सदा मुक्त एव सदैवेश्वर इति सदाशिवमतं अपास्तं। पुन:-सीदीभूदा-शीतीभूता: सहजशरीरागन्तुकमानसादिविविधसांसारिकदु:ख-वेदनापरितापपरिक्षयेण सुनिर्वृत्ता: इत्यर्थ:, अनेन मुक्तौ आत्मन: सुखाभावं वदन् सांख्यमतमपाकृतं।
पुनश्च णिरंजणा-निरंजना:-अभिनवास्रवरूपकर्ममलरूपाञ्जनान्निष्क्रान्ता: इत्यर्थ:, अनेन मुक्तात्मन: पुन: कर्माञ्जनसंसर्गेण संसारोऽस्ति इति वदन् मस्करीदर्शनं प्रत्याख्यातं। पुनरपि णिच्चा-नित्या:-यद्यपि प्रतिसमयवत्र्यर्थपर्यायै: परिणतसिद्धा उत्पादव्ययौ स्वस्मिन् कुर्वन्तोऽपि विशुद्धचैतन्यसामान्य-रूपद्रव्याकारान्वयमाहात्म्यात् सर्वकालाश्रिताव्ययत्वात् ते नित्यतां न जहन्तीत्यर्थ:, अनेन प्रतिक्षणं विनश्वरचित्पर्याया एव एकसंतानवर्तिन: परमार्थतो नित्यद्रव्यं नेति वदन्तीति बौद्धप्रत्यवस्था प्रतिव्यूढा।

पुनश्च अट्ठगुणा-अष्टगुणा: क्षायिकसम्यक्त्वज्ञानदर्शनवीर्यसौक्ष्म्यावगाहागुरुलघुकत्वाव्याबाधत्वना-माष्टगुणयुता इत्युपलक्षणं, तेन तदनुसार्यनन्तानन्तगुणानां तेष्वेवान्तर्भाव इत्यर्थ:, अनेन ज्ञानादिगुणानां अत्यन्तोच्छित्तिरात्मनो मुक्तिरिति वदन्नैयायिकवैशेषिकाभिप्राय: प्रत्युक्त:। पुनश्च ते किदकिच्चा-कृतकृत्या: कृतं-निष्ठापितं, कृत्यं सकलकर्मक्षयतत्कारणानुष्ठानादिकं यैस्ते कृतकृत्या:, इत्यनेन ईश्वर: सदा मुक्तोऽपि जगन्निर्मापणे कृतादरत्वेनाकृतकृत्य इति वदन् ईश्वरसृष्टिवादाकूतं निराकृतं। पुनश्च लोयग्गणिवासिणो-लोकाग्रनिवासिन:-लोक्यन्ते जीवादय: पदार्था: अस्मिन्निति लोक:, एवंविधलोकत्रयसन्निवेशाग्रे तनुवातप्रान्ते निवासिन: स्थास्नव:। यद्यपि कर्मक्षयक्षेत्रादुपर्येव कर्मक्षयानन्तरं तथागमनस्वाभाव्यात् ते गच्छन्ति तथापि लोकाग्रत ऊध्र्वगमनसहकारिधर्मास्तिकायाभावान्न तदुपरि इतीदं लोकाग्रनिवासित्वमेव युत्तं तेषां, अन्यथा लोकालोकविभागाभाव: प्रसज्यते, अनेन आत्मन: ऊध्र्वगमनस्वाभाव्यात् मुक्तावस्थायां क्वचिदपि विश्रामाभावात् उपर्युपरि गमनमिति वदन्माण्डलिकमतं प्रत्यस्तं।
उक्तं च-
सदसिव संखो मक्कडि बुद्धो णइयाइयो य वैसेसी। ईसरमंडलिदंसण - विदूसणट्ठं कयं एदं।।

सदाशिव-सांख्य-मस्करि-बुद्ध-नैयायिक-वैशेषिक-ईश्वर-मण्डलिदर्शनविदूषणार्थं कृतमेतद्विशेषणम् इति।
तात्पर्यमेतत्-चतुर्दशगुणस्थानलक्षणप्रतिपादनानन्तरं सिद्धानां लक्षणं कथितमितिक्रमेण ज्ञायते यत् ‘‘अभूदपुव्वो हवदि सिद्धो’’ इति चागमाधारेणापि अवधार्यते यत् संसारपूर्वकं एव मोक्षो भवति। ये केचित् अपि भव्यजीवा: सम्यग्दर्शनं संप्राप्य देश-सकलचारित्रबलेन स्वात्मशुद्धिं कुर्वंति ते शुक्लध्यानाग्निना कर्मेन्धनं भस्मीकृत्य सिद्धपदं प्राप्नुवन्ति। अत: प्रत्येकभव्यात्मान: धर्मपुरुषार्थं कुर्वन्त: सन्त: मोक्षपुरुषार्थमपि साधयन्तु इति।
एतत्पर्यंतं अर्हत्सिद्धस्वरूपप्रतिपादनपरत्वेन अथवा स्नातकमहामुने: लक्षणनिरूपणेन गुणस्थानातीत-सिद्धपरमेष्ठिस्वरूपप्ररूपणपरत्वेन पंचमान्तराधिकारे सूत्रत्रयं गतम्।

इत्थं चतुर्दशगुणस्थानलक्षणं गुणस्थानवर्तिजीवानां च स्वरूपं प्रतिपाद्य गुणस्थानातीतसिद्धस्वरूपं चापि प्रतिपादितं भवति।
एवं षष्ठस्थले सकलनिकलपरमात्मनां स्वरूपनिरूपणपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
उपजातिछंद-
चन्द्रप्रभो वागमृतांशुभिर्यो, जनान् प्रपुष्यन्नकलंकयुक्त:।
न चापि दोषाकरतां प्रयाति, सदा स्तुवे तं भवतापशून्यम्।।१।।
िइति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिभट्टारकप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे श्रीपुष्पदन्तसूरि-
विरचितसत्प्ररूपणानाम्नि प्रथमप्रकरणे धवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां
विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ती श्रीशान्तिसागरस्तस्य प्रथम-
पट्टाधीश:श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या-जम्बूद्वीपरचनाप्रेरिकागणिनी-
ज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गुणस्थानस्वरूप-
प्ररूपक: द्वितीयो महाधिकार: समाप्त:।

सूत्रार्थ—

सामान्य से सिद्ध जीव हैं।।२३।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—सिद्ध, निष्ठित, निष्पन्न, कृतकृत्य और सिद्धसाध्य ये एकार्थवाची नाम हैं। जिन्होंने समस्त कर्मों का निराकरण कर दिया है, जिन्होंने बाह्य पदार्थों की अपेक्षा रहित, अनन्त, अनुपम, स्वाभाविक और प्रतिपक्षरहित सुख को प्राप्त कर लिया है, जो निर्लेप हैं, अचल स्वरूप को प्राप्त हैं, सम्पूर्ण अवगुणों से रहित हैं, सर्वगुणों के निधान हैं, जिनका स्वदेह अर्थात् आत्मा का आकार चरम शरीर से कुछ न्यून है, जो कोश से निकले हुए बाण के समान विनि:संग हैं और लोक के अग्रभाग में निवास करते हैं उन्हें सिद्ध कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ—जो ज्ञानावरणादि आठ कर्मों से सर्वथा मुक्त हैं, सब प्रकार के दु:खों से मुक्त होने के कारण परम शान्ति को प्राप्त हैं। जो निरंजन हैं, नित्य हैं, ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, अव्याबाध, अवगाहन, सूक्ष्मत्व और अगुरुलघु इन आठ गुणों से युक्त हैं और लोक के अग्रभाग में निवास करते हैं उन्हें सिद्ध कहते हैं।

आठ प्रकार के कर्मों से रहित-मोहनीय कर्म क्षायिक सम्यक्त्व को घातता है, ज्ञानावरण केवलज्ञान को और दर्शनावरण केवलदर्शन का घात करता है। अन्तराय कर्म अनन्तवीर्य का, नामकर्म सूक्ष्मत्व गुण का, आयुकर्म अवगाहन गुण का, गोत्रकर्म अगुरुलघुत्व गुण का और वेदनीय कर्म अव्याबाध गुण का घात करता है।

इन कर्मों के क्षय से ‘‘संसारी जीव की मुक्ति नहीं है’’ ऐसा मानने वाला याज्ञिकमत है और ‘‘सदा कर्ममल से अस्पृष्ट होने के कारण सदा ही मुक्त जीव सदा ईश्वर है’’ यह सदाशिववादियों का मत इन दोनों का अपास्त-निराकरण किया है। पुन: वे सिद्ध शीतीभूत हैं अर्थात् जन्ममरणरूप सहजदु:ख, रोगादिरूप शारीरिक दु:ख, सर्प आदि से होने वाला आगन्तुक दु:ख, आकुलतारूप मानसिक दु:ख इत्यादि अनेक सांसारिक दु:खों की वेदना के संताप का सम्पूर्णरूप से विनाश हो जाने से सुखस्वरूप हैं ऐसा अर्थ हुआ। इस अर्थ से मुक्ति में आत्मा के सुख का अभाव कहने वाले सांख्यमत का निराकरण किया है।

पुन: ‘‘वे सिद्ध निरंजन हैं अर्थात् अभिनव-नवीन आस्रवरूप कर्ममलरूप अंजन से रहित हैं’’ इससे मुक्तात्मा पुन: कर्माञ्जन के संसर्ग से संसारी हो जाते हैं ऐसा कहने वाले मस्करी मत का खण्डन किया गया है।

पुन: वे सिद्ध नित्य होते हैं-यद्यपि प्रतिसमय होने वाली अर्थपर्यायरूप परिणमन करने वाले सिद्ध अपने में उत्पाद-व्ययशील हैं फिर भी विशुद्ध चैतन्य सामान्यरूप द्रव्याकार के अन्वय के माहात्म्य से सदा अविनाशी होने से वे नित्यता को नहीं छोड़ते हैं, इससे प्रतिक्षण विनश्वर एकसन्तानवर्ती चित्तक्षण ही परमार्थ से सत् है, द्रव्य नित्य नहीं है ऐसा कहने वाले बौद्धमतावलम्बियों का निराकरण होता है।

पुन: वे सिद्धपरमेष्ठी अष्टगुण-क्षायिक सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सौक्ष्म्य, अवगाह, अगुरुलघु, अव्याबाध से सहित हैं। ये गुण तो उपलक्षण हैं, इससे उनमें तदनुरूप अनन्तानन्त गुणों का अन्तर्भाव होता है। इस कथन से ज्ञानादि विशेष गुणों का अत्यन्त नाश हो जाना आत्मा की मुक्ति है। ऐसा कहने वाले नैयायिक-वैशेषिकों के अभिप्राय का निराकरण किया है।

पुन: वे सिद्ध कृतकृत्य हैं अर्थात् उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय और उनके कारणादि का अनुष्ठानरूप सब कृत्य पूर्ण कर लिया है, इससे ईश्वर सदा मुक्त होकर भी जगत् के बनाने में लगा रहने से अकृतकृत्य है ऐसा ईश्वरसृष्टिवादियों का अभिप्राय निराकृत किया है।

वे सिद्ध लोकाग्रनिवासी हैं अर्थात् जिसमें जीवादि पदार्थ देखे जाएँ वह लोक है। इस प्रकार तीनों लोकों के अग्रभाग-तनुवातवलय के अन्त में वे निवास करते हैं। यद्यपि वे जिस स्थान में कर्मों का क्षय करते हैं, कर्मों का क्षय करने के बाद उस क्षेत्र के ऊपर ही जाने का उनका स्वभाव है फिर भी लोक के अग्रभाग से आगे ऊध्र्वगमन में सहायक धर्मास्तिकाय का अभाव होने से उससे ऊपर नहीं जाते। इसलिए उनका लोक के अग्रभाग में निवास करना ही युक्त है अन्यथा लोक और अलोक के विभाग का अभाव प्राप्त होता है। इससे ‘‘आत्मा का ऊध्र्वगमन स्वभाव होने से मुक्त होने पर कहीं भी ठहरना संभव नहीं है। अत: सर्वदा ऊपर-ऊपर ही जाता है’’ ऐसा मानने वाले माण्डलिक मत का निराकरण किया गया है। कहा भी है—

गाथार्थ—

सदाशिवमत, सांख्यमत, मस्करी, बौद्धमत, नैयायिक मत, वैशेषिक मत, ईश्वरवादी और माण्डलिक मत को दोषयुक्त बतलाने के लिए उक्त विशेषण कहे हैं।

तात्पर्य यह है कि चौदह गुणस्थानों के लक्षण बतलाने के बाद सिद्धों का लक्षण कहा है। इस क्रम से जाना जाता है कि ‘‘सिद्ध जीव अभूतपूर्व होते हैं।’’ यह आगम के आधार से भी ज्ञात होता है कि संसारपूर्वक ही मोक्ष होता है। जो कोई भी भव्य जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त करके देशचारित्र और सकलचारित्र के बल से अपनी आत्मा की शुद्धि करते हैं वे शुक्लध्यानरूपी अग्नि के द्वारा कर्मरूपी र्इंधन को भस्म करके सिद्धपद को प्राप्त करते हैं अत: प्रत्येक भव्य जीव धर्म पुरुषार्थ करते हुए मोक्षपुरुषार्थ की भी सिद्धि करें ऐसा अभिप्राय है।

विशेषार्थ

—उपर्युक्त प्रकरण में सिद्धभगवान् के अनेक विशेषण बतलाते हुए एक शीतीभूत विशेषण भी बताया है जो कि समस्त दु:खों के सन्ताप की उपशान्ति का प्रतीक है। कल्याणमंदिर स्तोत्र में श्रीकुमुदचन्द्राचार्य ने लिखा है कि—

क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथमं निरस्तो, ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचौरा:।

प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके, नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी।।१३।।

अर्थात् लोक में ऐसा देखा जाता है कि क्रोधी मनुष्य ही शत्रुओं को जीतते हैं पर भगवन्! आपने तो क्रोध को नवमें गुणस्थान में ही जीत लिया था फिर क्रोध के अभाव में चौदहवें गुणस्थान तक कर्मरूपी शत्रुओं को कैसे जीता ? आचार्य ने इस लोकविरुद्ध बात पर पहले तो आश्चर्य प्रगट किया पुन: जब बाद में उन्हें याद आता है कि ठण्डा तुषार बड़े-बड़े वनों को क्षण भर में जला देता है अर्थात् क्षमारूपी ठण्डे तुषार से कर्मरूपी वनों को दग्ध किया जा सकता है अर्थात् कर्मशत्रुओं को क्षमा जल से नष्ट किया है।

यही उदाहरण उन सिद्ध भगवन्तों में भी लागू हो जाता है कि वे अत्यन्त शान्त, शीतल हो चुके हैं इसीलिए उनके नामस्मरण से भी भक्तों का हृदय शीतल हो जाता है।

इसी प्रकार एक ‘नित्य’ पद है जो सिद्धों की शाश्वत सत्ता को सूचित करता है। इस विषय में धनञ्जय कवि ने विषापहार स्तोत्र में कहा है—

स्वर्भानुरर्कस्य हविर्भुजोऽम्भ:, कल्पान्तवातोऽम्बुनिधेर्विघात:।

संसारभोगस्य वियोगभावो, विपक्षपूर्वाभ्युदयास्त्वदन्ये।।२६।।

इसका भाव यह है कि संसार के सब पदार्थ अनित्य हैं अर्थात् राहु सूर्य का प्रतिपक्षी है, पानी अग्नि का प्रतिपक्षी है, प्रलयकाल की वायु समुद्र की प्रतिपक्षी है तथा वियोगभाव संसार के भोगों का प्रतिपक्षी-नाश करने वाला है। इस तरह आपसे भिन्न सब पदार्थ विनाश के साथ ही उदय को प्राप्त होते हैं किन्तु आप आगामी जन्म-मरण से रहित हैं और आपकी विशुद्धता, नित्यता कभी नष्ट नहीं हो सकती है इसलिए आप नित्य और शाश्वत स्वरूप को प्राप्त हुए सिद्ध भगवन्! हम सभी के अभीष्ट कार्य की सिद्धि कराते हुए आत्मसिद्धि का पथ प्रशस्त करें यही प्रार्थना है। उन अनन्तगुणों से युक्त अनन्तानन्त सिद्धों को मेरा शत-शत नमस्कार होवे।

यहाँ तक अर्हन्त और सिद्ध परमेष्ठियों का स्वरूप बतलाने की मुख्यता से अथवा स्नातक महामुनि का लक्षण निरूपित करके गुणस्थानातीत सिद्धपरमेष्ठी के स्वरूपप्ररूपण की मुख्यता से पंचम अन्तराधिकार में तीन सूत्र हुए।

इस प्रकार चौदह गुणस्थानों का लक्षण और उन-उन गुणस्थानवर्ती जीवों का स्वरूप प्रतिपादित करके गुणस्थानातीत सिद्धों का लक्षण भी बतलाया है। इस प्रकार छठे स्थल में सकल और निकल परमात्माओं के स्वरूप निरूपण की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुए।

श्लोकार्थ—जो चन्द्रप्रभ भगवान अपने वचनरूपी अमृतकिरणों से भव्यजनों को पुष्ट करते हुए कलंक से रहित हैं और दोषाकर-दोषों के स्थान को भी प्राप्त नहीं करते हैं ऐसे भवताप से रहित चन्द्रप्रभ की मैं स्तुति करता हूँ।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदन्त-भूतबली भट्टारक द्वारा रचित षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में श्रीपुष्पदन्त आचार्य द्वारा विरचित सत्प्ररूपणा नाम के प्रथम प्रकरण में धवला टीका प्रमुख अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से विरचित इस ग्रंथ में बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्रीवीरसागरमहाराज की शिष्या, जम्बूद्वीप रचना की पावन प्रेरिका गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा की गई सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में गुणस्थानों के स्वरूप का प्ररूपण करने वाला द्वितीय महाधिकार समाप्त हुआ।