031.- तृतीय महाधिकार - मंगलाचरण से चौदहवें गुणस्थान तक

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तृतीय महाधिकार - मंगलाचरण से चौदहवें गुणस्थान तक

अथ तृतीयो महाधिकार:


मंगलाचरणम्

महावीरो जगत्स्वामी, सातिशायीति विश्रुत:।
तस्मै नमोऽस्तु मे भक्त्या, पूर्णसंयमलब्धये।।१।।

अथ चतु:पञ्चाशदधिक-एकशतसूत्रेषु तृतीयो महाधिकार: कथ्यते- अस्मिन् चतुर्दशमार्गणाप्ररूपका: चतुर्दशाधिकारा: सन्ति। तत्र तावत् ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादिना चतुर्गतिनामसूचकत्वेन एकं सूत्रं तत: परं ‘‘णेरइया’’ इत्यादि सूत्रमादिं कृत्वा चतुर्भि: सूत्रै: गुणस्थानेषु चातुर्गतिकजीवानां मध्ये के-के जीवा: केषु-केषु गुणस्थानेषु इत्यादिकथनं क्रियते। तदनु तिर्यङ्मनुष्ययो: गुणस्थानापेक्षया क्व क्व स्थाने साम्यं इति प्रतिपादयिष्यन्ति चत्वारि सूत्राणि, एवं प्रथमाधिकारे नवसूत्राणि। तदनु ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्रमादिं कृत्वा एकेन्द्रियादिजीवानां तेषां गुणस्थानव्यवस्थानां च प्रतिपादनपरत्वेन द्वितीयाधिकारे षट्सूत्राणि। तत्पश्चात् ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्रमादिं कृत्वा षड्जीवनिकायानां स्वरूपभेदप्रभेदप्रतिपादनत्वेन तृतीयाधिकारे अष्टौ सूत्राणि, तत: परं-‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्रादिना मनोवचनकाययोगिनां स्वरूपभेदप्रभेदप्रतिपादनपरत्वेन चतुर्थाधिकारे चतु:पञ्चाशत् सूत्राणि कथ्यन्ते। तदनन्तरं-‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिना त्रिवेदानां लक्षणभाव-द्रव्यवेदकथनमुख्यत्वेन गुणस्थानापेक्षया च कथनपरत्वेन पंचमाधिकारे दशसूत्राणि सन्ति। तदनु-‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादिना जीवानां कषायव्यवस्थासूचकत्वेन षष्ठाधिकारे चत्वारि सूत्राणि प्ररूप्यन्ते। तत्पश्चात् ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमादिं कृत्वा जीवानां अज्ञानज्ञानस्वरूपगुणस्थान-व्यवस्थाकथनमुख्यत्वेन सप्तमाधिकारे अष्टसूत्राणि सन्ति। तत्पश्चात् ‘‘संजमाणुवादेण’’ संयमसंयमा-संयमासंयमप्रतिपादनपरत्वेन अष्टमाधिकारे अष्टसूत्राणि उच्यन्ते। तदनन्तरं ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादिना चतुर्विधदर्शनस्य लक्षणगुणस्थानव्यवस्थादिकथनमुख्यत्वेन नवमाधिकारे पंचसूत्राणि सन्ति। तदनन्तरं ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमादौ कृत्वा षड्लेश्याकथनपरत्वेन दशमाधिकारे पंचसूत्राणि। तत: परं ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादिना जीवानां भव्यत्वाभव्यत्वस्वरूपसूचकत्वेन एकादशाधिकारे त्रीणि सूत्राणि।

तत्पश्चात् ‘‘सम्मत्ताणुवादेण’’ इत्यादिना संसारव्युच्छेदस्य मूलकारणसम्यक्त्वलक्षणभेदप्रभेदगुणस्थान-व्यवस्थाप्रतिपादकत्वेन द्वादशाधिकारे अष्टाविंशतिसूत्राणि वक्ष्यन्ते। तत्पश्चात् ‘‘सण्णियाणुवादेण’’ इत्यादिना संज्ञ्यसंज्ञिजीवानां गुणस्थानव्यवस्थाकथनमुख्यत्वेन त्रयोदशाधिकारे त्रीणि सूत्राणि। पुनश्च ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादिना आहारकानाहारकजीवस्वरूपगुणस्थानप्रतिपादनपरत्वेन चतुर्दशाधिकारे त्रीणि सूत्राणि। इति चतुर्दशभिरधिकारै: चतु:पंचाशदुत्तरशतसूत्रै: समुदायपातनिका सूचितास्ति।

अथ तृतीय महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-तीनों लोकों के अधिपति महावीरस्वामी का अतिशय वर्तमान में खूब प्रसिद्ध है उन महावीर स्वामी को पूर्णसंयम की प्राप्ति हेतु मेरा नमस्कार है।

अब एक सौ चौव्वन (१५४) सूत्रों में तृतीय महाधिकार कहा जाता है-

इस महाधिकार में चौदह मार्गणाओं का प्ररूपण करने वाले चौदह अधिकार हैं।

उनमें से सर्वप्रथम ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादि चारों गतियों के नाम को बतलाने वाला एक सूत्र है उसके पश्चात् ‘‘णेरइया’’ इत्यादि सूत्र को आदि में करके चार सूत्रों के द्वारा किस-किस गुणस्थान में किस गति के कौन-कौन से जीव हैं इत्यादि कथन किया है। उसके बाद गुणस्थान की अपेक्षा तिर्यंच और मनुष्यों में किन-किन स्थान पर समानता है इत्यादि का कथन करने वाले चार सूत्र कहेंगे, इस प्रकार प्रथम अधिकार में नौ सूत्र हैं।

उसके पश्चात् ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र को आदि में करके एकेन्द्रियादि जीवों और उनके गुणस्थानों की व्यवस्था संबंधी कथन की मुख्यता से द्वितीय अधिकार में छह सूत्र हैं। तत्पश्चात् ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र को आदि में करके षट्काय के जीवों का स्वरूप, उनके भेद-प्रभेद के प्रतिपादन की मुख्यता से तृतीय अधिकार में आठ सूत्र हैं। पुन: ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र के द्वारा मन, वचन, काय योग वाले जीवों का स्वरूप एवं उनके भेद-प्रभेद बतलाने की मुख्यता से चतुर्थ अधिकार में चौवन सूत्र कहेंगे।

तदनन्तर ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि के द्वारा तीनों वेदों का लक्षण और द्रव्य-भाव दो रूप वेद कथन की मुख्यता से तथा गुणस्थान की अपेक्षा उनका कथन करने की मुख्यता से पाँचवें अधिकार में दश सूत्र हैं। उसके पश्चात् ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र के द्वारा जीवों की कषायव्यवस्था को सूचित करने वाले छठे अधिकार में चार सूत्र प्ररूपित किये हैं। पुन: ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र को आदि में करके जीवों के अज्ञान-ज्ञान का स्वरूप तथा उनके गुणस्थानों की व्यवस्था कथन की मुख्यता से सप्तम अधिकार में आठ सूत्र हैं। उसके बाद ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादि के द्वारा संयम, संयमासंयम और असंयम के प्रतिपादन की मुख्यता से आठवें अधिकार में आठ सूत्र हैं। तदनन्तर ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र को आदि में करके चार प्रकार के दर्शन का लक्षण, गुणस्थान की व्यवस्था आदि के कथन की मुख्यता से नवमें अधिकार में पाँच सूत्र हैं। उसके आगे ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र को प्रधानता देकर छह लेश्याओं के कथन की मुख्यता से दशवें अधिकार में पाँच सूत्र हैं। पुन: ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र के द्वारा जीवों के भव्यत्व, अभव्यत्व का कथन करने वाले तीन सूत्र ग्यारहवें अधिकार में हैं।

तत्पश्चात् ‘‘सम्मत्ताणुवादेण’’ इत्यादि के द्वारा संसार व्युच्छेद के मूल कारण सम्यक्त्व का लक्षण, उनके भेद-प्रभेद, गुणस्थान व्यवस्था के प्रतिपादन की मुख्यता से बारहवें अधिकार में अट्ठाईस सूत्र कहे हैं। तत्पश्चात् ‘‘सण्णियाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्र के द्वारा संज्ञी-असंज्ञी जीवों की गुणस्थान व्यवस्था कथन की मुख्यता से तेरहवें अधिकार में तीन सूत्र हैं। पुन: ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादि से आहारक, अनाहारक जीवों के स्वरूप, गुणस्थान प्रतिपादन की मुख्यता से चौदहवें अधिकार में तीन सूत्र हैं। इस प्रकार चौदह अधिकारों के द्वारा एक सौ चौवन (१५४) सूत्रों की यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अथ गतिमार्गणाधिकार:

अधुना स्थलपंचकेन नवभि: सूत्रै: गतिमार्गणानामप्रथमोऽधिकार: कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले पंचभेदगतिप्रतिपादनत्वेन नरकगतिषु गुणस्थानप्रतिपादनत्वेन च ‘‘आदेसेण’’ इत्यादि द्वे सूत्रे। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणत्वेन ‘‘तिरिक्खा’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत: परं तृतीयस्थले मनुष्यगतौ गुणस्थानकथनपरत्वेन ‘‘मणुस्सा चोद्दससु’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले देवगतौ गुणस्थानसूचनपरत्वेन ‘‘देवा चदुसु’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनन्तरं पंचमस्थले तिर्यङ्मनुष्ययो: शुद्धाशुद्ध-व्यवस्थाप्ररूपणत्वेन ‘‘तिरिक्खा सुद्धा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं इति समुदायपातनिका।

अधुना प्रथमगतिमार्गणाप्ररूपणार्थं चतुर्विंशतितमसूत्रस्यावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण-आदेसेण गदियाणुवादेण अत्थि णिरयगदी तिरिक्खगदी मणुस्सगदी देवगदी सिद्धिगदी चेदि।।२४।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आदेसेण-विशेषेण विस्तरेण मार्गणाकथनेन गदियाणुवादेण-गतिरुक्तलक्षणा, तस्या वदनं वाद:, प्रसिद्धस्याचार्यपरंपरागतस्यार्थस्य अनु पश्चाद् वादोऽनुवाद:। गतेरनुवादो गत्यनुवाद: तेन गत्यनुवादेन। णिरयगदी-हिंसादिष्वसदनुष्ठानेषु व्यापृता: निरतास्तेषां गतिर्निरतगति:। अथवा नरान् प्राणिन: कायति यातयति खलीकरोति इति नरक: कर्म, तस्य नरकस्यापत्यं नारकास्तेषां गतिर्नारकगति:। अथवा यस्या: उदय: सकलाशुभकर्मणामुदयस्य सहकारिकारणं भवति सा नरकगति:। अथवा द्रव्यक्षेत्रकाल-भावेष्वन्योन्येषु च विरता: न रता: तेषां गतिर्नरतगति:। उक्तं च-

ण रमंति जदो णिच्चं दव्वे खेत्ते य कालभावे य।
अण्णोण्णेहि य जम्हा तम्हा ते णारया भणिया।।
अथवा निर्गतोऽय: पुण्यं एभ्यस्ते निरया: तेषां गति: निरयगति:।
सकलतिर्यक्पर्यायोत्पत्तिनिमित्ता तिर्यग्गति:। अथवा तिर्यग्गतिकर्मोदयापादिततिर्यक्पर्याय-कलापस्तिर्यग्गति:। अथवा तिरो वकं कुटिलमित्यर्थ:, तदञ्चति त्रजन्ति इति तिर्यञ्च:। तिरश्चां गति: तिर्यग्गति:।

अब गतिमार्गणाधिकार प्रारंभ होता है।

अब पाँच स्थलों में नौ सूत्रों के द्वारा गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार कहा जाता है। उनमें से प्रथम स्थल में पाँच भेदरूप गति के प्रतिपादन की मुख्यता से नरकगति में गुणस्थान वर्णन के द्वारा ‘‘आदेसेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में तिर्यंचगति की गुणस्थानव्यवस्था का निरूपण करने वाला ‘‘तिरिक्खा’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: तृतीय स्थल में मनुष्यगति के गुणस्थानों का कथन करने वाला ‘‘मणुस्सा चोद्दससु’’ इत्यादि एक सूत्र है। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में देवगति संबंधी गुणस्थानों की सूचना देने वाला ‘‘देवा चदुसु’’ इत्यादि एक सूत्र है। तदनन्तर पंचमस्थल में तिर्यंच और मनुष्य के शुद्ध, अशुद्ध व्यवस्था के प्ररूपण की मुख्यता से ‘‘तिरिक्खा सुद्धा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। इस प्रकार यह समुदायपातनिका हुई। अब श्रीपुष्पदन्त आचार्यदेव पहली गतिमार्गणा के प्ररूपण हेतु चौबीसवें सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

आदेश प्ररूपणा की अपेक्षा गत्यनुवाद से नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति, देवगति और सिद्धगति है।।२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विशेष से विस्तार से मार्गणा कथन के क्रम में सर्वप्रथम गतिमार्गणा को कहते हैं। गति का लक्षण पहले कह आए हैं, उसके कथन करने को वाद कहते हैं। आचार्य परम्परा से आए हुए प्रसिद्ध अर्थ का तदनुसार कथन करना अनुवाद है। इस तरह आचार्य परम्परा के अनुसार गति का कथन करना गत्यनुवाद है, उससे अर्थात् गत्यनुवाद से नरकादि गतियाँ होती हैं।

नरकगति-

जो हिंसादिक असमीचीन कार्यों में व्यापृत-संलग्न हैं उन्हें निरत कहते हैं और उनकी गति को निरतगति कहते हैं। अथवा जो नर अर्थात् प्राणियों को काटता है-यातना देता है, पीसता है उसे नरक कहते हैं। नरक यह एक कर्म है इससे जिनकी उत्पत्ति होती है उनको नारक कहते हैं और उनकी गति को नारकगति कहते हैं। अथवा जिस गति का उदय सम्पूर्ण अशुभ कर्मों के उदय का सहकारी कारण है उसे नरकगति कहते हैं। अथवा जो द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव में तथा परस्पर में रत नहीं हैं अर्थात् प्रीति नहीं रखते हैं उन्हें नरत कहते हैं और उनकी गति को नरतगति कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-

जिस कारण से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव में जो स्वयं तथा परस्पर में कभी भी रमते नहीं हैं इसलिए उनको नारत कहते हैं। अथवा निकल गया है पुण्य जिनमें से, वे निरत कहलाते हैं तथा उनकी गति निरतगति कहलाती है।

समस्त जाति के तिर्यंचों में उत्पत्ति का जो कारण है उसे तिर्यग्गति कहते हैं। अथवा तिर्यग्गति कर्म के उदय से प्राप्त हुए तिर्यंच पर्यायों के समूह को तिर्यग्गति कहते हैं। अथवा तिरस्, वक्र और कुटिल ये एकार्थवाची नाम हैं इसलिए यह अर्थ हुआ कि जो कुटिलभाव को प्राप्त होते हैं उन्हें तिर्यंच कहते हैं और उनकी गति को तिर्यग्गति कहते हैं।

उक्तं च-

तिरियंति कुडिलभावं सुवियड-सण्णा णिगिट्ठमण्णाणा।

अच्चंत - पावबहुला तम्हा तेरिच्छया णाम।।
यस्मात् कारणात् ये जीवा: सुविवृतसंज्ञा: अगूढाहारादिप्रकटसंज्ञायुता:, प्रभावसुखद्युतिलेश्या-विशुद्ध्यादिभिरल्पीयस्त्वान्निकृष्टा: हेयोपादेयज्ञानादिभिर्विहीनत्वादज्ञाना:, नित्यनिगोदविवक्षया अत्यन्तपापबहुला:, तस्मात्कारणात्ते जीवा: तिरोभावं कुटिलभावं मायापरिणामं अंचंति-गच्छन्ति, इति तिर्यञ्चो भणिता भवन्ति।
अशेषमनुष्यपर्यायनिष्पादिका मनुष्यगति:। अथवा मनुष्यगतिकर्मोदयापादितमनुष्यपर्यायकलाप: कार्ये कारणोपचारान्मनुष्यगति:। अथवा मनसा निपुुणा: मनसा उत्कटा इति वा मनुष्या:, तेषां गति: मनुष्यगति:।
उक्तं च-
मण्णंति जदो णिच्चं मणेण णिउणा मणुक्कडा जम्हा।
मणुउब्भवा य सव्वे तम्हा ते माणुसा भणिया।।
यस्मात्कारणात् ये जीवा: नित्यं मन्यन्ते हेयोपादेयादिविशेषान् जानन्ति-वा मनसा निपुणा:-कलाशिल्पादिषु कुशला: वा मनसोत्कटा:-अवधानादिदृढोपयोगा: वा मनोरुद्भवा: अपत्यानि इति ते जीवा: सर्वेऽपि मानुषा इति प्रवचने भणिता:।
अणिमाद्यष्टगुणावष्टम्भबलेन दीव्यन्ति क्रीडन्ति इति देवा:। देवानां गतिर्देवगति:। अथवा देवगतिनामकर्मोदयोऽणिमादिदेवाभिधानप्रत्ययव्यवहारनिबंधनपर्यायोत्पादको देवगति:। देवगतिनामकर्मोदय-जनितपर्यायो वा देवगति: कार्ये कारणोपचारात्।
उक्तं च-
दिव्वंति जदो णिच्चं, गुणेहि अट्ठेहि य दिव्वभावेहि।
भासंत-दिव्वकाया, तम्हा ते वण्णिया देवा।।
यस्मात्कारणात् ये जीवा: नित्यं कुलगिरिमहासमुद्रादिषु दीव्यन्ति क्रीडन्ति मोदन्ते माद्यन्ति कामयन्ते अणिमादिभिरष्टभि: दिव्यकायै:-अमानुषगोचरप्रभावै: गुणैर्भासमाना:-प्रकाशमाना: दिव्यकाया:-धातुमलदोषरहितप्रभास्वरमनोहरशरीरा: ते जीवा: देवा: इति परमागमे भणिता:।
सिद्धि: स्वरूपोपलब्धि: सकलगुणै: स्वरूपनिष्ठा सा गति: सिद्धिगति:।
उक्तं च-
जाइजरामरणभया संजोयविओय-दुक्खसण्णाओ।
रोगादिया य जिस्से ण संति सा होई सिद्धिगई।।
जातिजरामरणभयानि, अनिष्टसंयोगेष्टवियोगदु:खसंज्ञा:, रोगादिविविधवेदनाश्च यस्यां न सन्ति सा कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षप्रादुर्भूतसिद्धत्वपर्यायलक्षणा सिद्धगतिरस्ति। अतएव संसारिगत्यपेक्षया गतिमार्गणायाश्चतुर्विधत्वमुत्तं। मुक्तगत्यपेक्षया तस्यास्तद्विलक्षणत्वेन गतिमार्गणायामविवक्षितत्वात्।

कहा भी है-

गाथार्थ-जो मन, वचन और काय की कुटिलता को प्राप्त हैं, जिनकी आहार आदि संज्ञाएँ सुव्यक्त हैं, जो निकृष्ट अज्ञानी हैं और जिनके अत्यधिक पाप की बहुलता पाई जावे उनको तिर्यंच कहते हैं।

जिस कारण से जो जीव स्पष्टरूप से प्रगट संज्ञा वाले हैं, अगूढ़-प्रगटरूप से आहार आदि प्रकट संज्ञायुत हैं, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्या, विशुद्धि आदि से हीन होने के कारण निकृष्ट हैं, हेयोपादेय ज्ञानादि से हीन-रहित होने से अज्ञानी हैं, नित्यनिगोद की विवक्षा से अत्यन्त पापबहुल-पापों में प्रवृत्त हैं। इस कारण से वे जीव तिरस्कारभाव, कुटिलभाव, मायापरिणाम को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तिर्यंच जीवों का कथन किया है।

जो सम्पूर्ण मनुष्य की पर्यायों में उत्पन्न कराती है उसे मनुष्यगति कहते हैं। अथवा मनुष्यगति नाम कर्म के उदय से प्राप्त हुए मनुष्यपर्यायों के समूह को कार्य में कारण के उपचार से मनुष्यगति कहते हैं। अथवा मन से उत्कट-सूक्ष्म विचार आदि सातिशय उपयोग से युक्त हैं उन्हें मनुष्य कहते हैं, उनकी गति मनुष्यगति कही जाती है। कहा भी है-

गाथार्थ-

जो नित्य ही मनन करते हैं अथवा जो मन से विचार करने में निपुण हैं, जो मनु से उत्पन्न हुए हैं, उन्हें मनुष्य कहते हैं। जिस कारण से जो जीव नित्य ही हेय-उपादेय आदि विशेष बातों को जानते हैं, अथवा निपुण-कला, शिल्प आदि में जो कुशल हैं अथवा जो मनसोत्कट-अवधानादि-दूरवर्ती पदार्थों का ज्ञान, सूक्ष्मविचार, चिरकाल धारण आदिरूप उपयोग से युक्त हैं अथवा जो मनु की सन्तान हैं वे सभी जीव ‘मानुष’ इस संज्ञा से आगम में कहे गये हैं।

जो अणिमा आदि आठ ऋद्धियों के बल से क्रीड़ा करते हैं उन्हें देव कहते हैं, उन देवों की गति देवगति कहलाती है। अथवा देवगति नामकर्म के उदय से अणिमा आदि ऋद्धियों से युक्त ‘देव’ इस प्रकार के शब्द,ज्ञान और व्यवहार में कारणभूत पर्याय का जो उत्पादक है वह देवगति है। अथवा देवगति नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई पर्याय को कार्य में कारण के उपचार से देवगति कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-

चूँकि वे दिव्यस्वरूप अणिमादि आठ गुणों के द्वारा निरन्तर क्रीड़ा करते हैं, उनका शरीर प्रकाशमान तथा दिव्य है इसीलिए उन्हें देव कहते हैं। जिस कारण से जो जीव नित्य ही कुलपर्वतों पर, महासमुद्रादिकों में भ्रमण किया करते हैं, क्रीड़ा करते हैं, खुशियाँ मनाते हैं, आनन्दमग्न होकर नृत्यादि करते हैं, इच्छानुसार रूप बना-बनाकर भगवान की भक्ति करते हैं और अणिमा आदि आठ ऋद्धियों के द्वारा दिव्य शरीर धारण करके जो मनुष्यों के अगोचर प्रभाव से-मनुष्य शरीर में जो गुण नहीं होते हैं ऐसे दिव्य गुणों से प्रकाशमान होते हुए धातु, मल आदि दोषों से रहित मनोहर शरीर वाले हैं उन्हें परमागम में ‘देव’ संज्ञा से सम्बोधित किया है।

आत्मस्वरूप की प्राप्ति और अपने सम्पूर्ण गुणों से आत्मस्वरूप में स्थित होने को सिद्धि कहते हैं। ऐसी सिद्धिस्वरूप गति को सिद्धिगति कहते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-

जिसमें जन्म, जरा, मरण, भय, संयोग, वियोग, दु:ख, आहारादि संज्ञाएँ और रोगादिक नहीं पाए जाते हैं उसे सिद्धगति कहते हैं। जन्म, जरा और मरण ये तीन भय हैं, अनिष्ट के संयोग और इष्ट के वियोग को दु:ख कहते हैं और रोगादि विविध वेदनाएँ जिनमें नहीं हैं वह समस्त कर्मों की क्षीणता से उत्पन्न सिद्धपर्याय लक्षणरूप सिद्धगति है। अतएव संसारी गति की अपेक्षा गतिमार्गणा के चार भेद कहे हैं। मुक्त गति की अपेक्षा सिद्धगति में उन गतियों से विलक्षणपना रहता है इसलिए गतिमार्गणा में उसकी विवक्षा नहीं है।

अत्थि-अस्ति सर्वत्रास्ति इत्यभिसंबंध: कर्तव्य:।

तात्पर्यमेतत्-अस्मिन् सूत्रे मार्गणासु गतिमार्गणायां चतस्रो गतय: प्ररूपिता: पुनश्च गतिमार्गणाया: परे या काचित् मुक्तिगति: पंचमगति: नाम्ना गीयते तस्या: निरूपणं कृतं,किंच अस्या: गतेरनन्तरं पुनरागतिरेव न भवतीत्यर्थ:।

श्रीकुन्दकुन्ददेवेन संसारिप्राणिनामपि सान्त्वनाप्रदानार्थं अध्यात्मभाषायां कथितं-
जारिसिया सिद्धप्पा, भवमल्लिय जीव तारिसा होंति।
जरमरणजम्ममुक्का, अट्ठगुणालंकिया जेण।।

यादृशा: सिद्धात्मान: सिद्धशिलायां राजन्ते भवं आश्रित्य संसारिणो जीवा: अपि तादृशा: भवन्ति, शक्तिरूपेण न च व्यक्तरूपेण, निश्चयनयापेक्षया वा। येन हेतुना-निश्चयनयेन ये संसारिण: जरामरणजन्ममुक्ता: सन्ति तेनैव हेतुना ते अष्टगुणालंकृताश्च भवन्ति।
शक्तिरूपेण ममात्मा सिद्धसदृश: एतद्विज्ञाय स्वशुद्धात्मानो ध्यानं कारं कारं स्वात्मा व्यक्तरूपेण सिद्धात्मा विधातव्योऽस्माभिरपि इति।

सांप्रतं मार्गणाया: एकदेशरूपगतेरस्तित्वं प्रतिपाद्य तत्र गुणस्थानान्वेषणाय सूत्रस्यावतार: क्रियते-णेरइया चदुसु ट्ठाणेसु अत्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठि त्ति।।२५।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-णेरइया चदुसु ट्ठाणेसु अत्थि-नारका: चतु:षु गुणस्थानेषु सन्ति। मिच्छाइट्ठी-मिथ्यादृष्टय: सन्ति, तत्रोत्पत्तिनिमित्तमिथ्यात्वस्य सत्त्वात्। सासणसम्माइट्ठी-सासादनसम्यग्दृष्टय: सन्ति। सासादनसम्यक्त्वेन सह मृत्वा कश्चित् अपि जीवो नरकेषु नोत्पद्यते अत: नरकेषु अपर्याप्तावस्थायां एतद्गुुणस्थानं नास्ति किंतु पर्याप्तेषु नारकजीवेषु संभवति। सम्मामिच्छाइट्ठी-सम्यग्मिथ्यादृष्टय: सन्ति। एतत्तृतीयगुणस्थानमपि तत्रापर्याप्तेषु नास्ति पर्याप्तजीवानां एव संभवति। असंजदसम्माइट्ठि त्ति-असंयतसम्यग्दृष्टय: सन्ति इति। बद्धायुषां सम्यग्दृष्टीनां तत्रोत्पत्तिरस्तीति सन्ति तत्रासंयतसम्यग्दृष्टय:। तत्रापि प्रथमपृथिव्यामेव सम्यग्दृष्टय: उत्पद्यन्ते न च द्वितीयादिपृथिवीषु। तत्र नरकभूमिषु पंचमादिगुणस्थानानामसंभव:, तेषां नारकाणां संयमासंयमसंयमपर्यायेण सह विरोधात्।

तात्पर्यमेतत्-नरकेषु नारकाणामपि बाह्यान्तरंगनिमित्तानामुपलब्धौ सत्यां प्रथमोपशमसम्यग्दर्शनमुत्पद्यते क्षायोपशमिकमपि। कदाचित् राजा श्रेणिकसदृश: कश्चित् नर: बद्धायुष्को भूत्वा पुन: क्षायिकसम्यक्त्वमुत्पाद्य प्रथमनरके जायते न चान्यत्र। एतद्विज्ञाय नरकगतिगमनकारणाणि न करणीयानि भवद्भि: कदाचिदपि इति।

एवं गतिमार्गणायां नरकगतिषु गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादके द्वे सूत्रे गते।

अधुना तिर्यग्गतौ गुणस्थानान्वेषणार्थमुत्तरसूत्रावतारो भवति-तिरिक्खा पंचसु ट्ठाणेसु अत्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मा-मिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी संजदासंजदा त्ति।।२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिरिक्खा पंचसु ट्ठाणेसु अत्थि-तिर्यञ्च: पंचषु गुणस्थानेषु सन्ति। मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी संजदासंजदा त्ति-मिथ्यादृष्टय: सासादनसम्यग्दृष्टय: सम्यग्मिथ्यादृष्टय: असंयत सम्यग्दृष्टय: संयतासंयता: चेति।
अत्र बद्धायुष्का: एव सासादनसम्यग्दृष्टय: असंयतसम्यग्दृष्टयश्चोत्पद्यन्ते अत: अपर्याप्तकाले सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संयतासंयताश्च तत्र तिर्यक्षु न सन्तीति ज्ञातव्यं। अथ तिर्यञ्च: पंचविधा:-सामान्यतिर्यञ्च:, पंचेन्द्रियतिर्यञ्च:, पंचेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्च:, पंचेन्द्रियपर्याप्ततिरश्च्य:, पंचेन्द्रियापर्याप्ततिर्यञ्च: इति।

कश्चिदाह-न ज्ञायते मया इमानि पंच गुणस्थानानि क्व-क्व सन्ति ?
आचार्यदेव: समाधत्ते-न तावदपर्याप्तपंचेन्द्रियतिर्यक्षु पंचगुणस्थानानि सन्ति। लब्ध्यपर्याप्तेषु मिथ्यादृष्टिव्यतिरिक्तशेषगुणस्थानासंभवात्। सामान्यतिर्यक्षु एकेन्द्रियादि असंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यन्ता: तिर्यञ्च: मिथ्यादृष्टय: एव भवन्ति। तिरश्चीषु अपि अपर्याप्तकाले मिथ्यात्वसासादने द्वे गुणस्थाने भवत: न च शेषानि त्रीणि।
कश्चिदाह-तिरश्चीषु अपर्याप्तावस्थायां सम्यग्दृष्टिनाम चतुर्थगुणस्थानं कथं नास्ति ?
समाधत्ते-न एतद्वक्तव्यं, तत्रासंयतसम्यग्दृष्टीनामुत्पत्तेरभावात्।
तत्कुतोऽवगम्यते इति चेत् ?
छसु हेट्ठिमासु पुढवीसु, जोइस-वण-भवण-सव्व इत्थीसु।
णेदेसु समुप्पज्जइ, सम्माइठ्ठी दु जो जीवो।।

इत्यार्षादेवावगम्यते। तात्पर्यमेतत्-
द्वितीयादिषु षट्सु अधोभूमिषु ज्योतिर्वासिदेवेषु व्यंतरदेवेषु भवनवासिदेवेषु, सर्वस्त्रीषु एतेषु सम्यग्दृष्टिर्जीवस्तु नोत्पद्यते। अतएव तिरश्चां तिरश्चीनां च पर्याप्तकाले पंचगुणस्थानानि सन्ति। तिरश्चां अपर्याप्तकाले असंयतसम्यग्दृष्टिसासादननामनी द्वे गुणस्थाने संभवत:, मिथ्यात्वं तु भवत्येव। तिरश्चीनां अपर्याप्तकाले मिथ्यात्वसासादने द्वे एव गुणस्थाने स्त: न शेषानि तत्र तन्निरूपकार्षाभावात् इति ज्ञात्वा त्वया तिर्यग्गतिगमनकारणाणि हित्वा सम्यक्त्वेन सह संयमासंयमं संयमं वा गृहीत्वा मनुष्यपर्याय: सफलीकर्तव्य:।
एवं तिर्यग्गतौ गुणस्थानकथनत्वेनैकं सूत्रं गतं।

संप्रति मनुष्यगतौ गुणस्थानान्वेषणार्थमुत्तरसूत्रावतार: क्रियते श्रीपुष्पदन्तभट्टारकेण-मणुस्सा चोद्दससु ट्ठाणेसु अत्थि मिच्छाइट्ठी, सासणसम्माइट्ठी, सम्मामिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठी, संजदासंजदा, पमत्तसंजदा, अप्पमत्तसंजदा, अपुव्वकरण-पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु अत्थि उवसमा खवा, अणियट्टि-बादर-संपराय-पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु अत्थि उवसमा खवा, सुहुम-संपराय-पविट्ठ-सुद्धि-संजदेसु अत्थि उवसमा खवा, उवसंत-कसाय-वीयराय-छदुमत्था, खीण-कसाय-वीयराय-छदुमत्था, सजोगिकेवली, अजोगिकेवली त्ति।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मणुस्सा-मनुष्या: चोद्दससु ट्ठाणेसु अत्थि-चतुर्दशसु गुणस्थानेषु सन्ति। मिच्छाइट्ठी-मिथ्यादृष्ट्यादय:। अजोगिकेवली त्ति-अयोगिकेवलिन: पर्यन्ता: इति। एतेषां चतुर्दशगुणस्थानानां लक्षणं प्रागेव प्रतिपादितमस्ति अतोऽत्र पुन: न कथ्यते। मनुष्या: चतुर्विधा: भवन्ति-सामान्यमनुष्या:, पर्याप्तमनुष्या:, योनिमतीमानुषिन्य:, लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याश्चेति। एषु अंतिमभेदवन्मनुष्येषु लब्ध्यपर्याप्तेषु केवलमेकमेव मिथ्यात्वगुणस्थानं वर्तते, शेषेषु त्रिषु भेदेषु चतुर्दशगुणस्थानानि सन्ति नपुंसकवेदेषु योनिमतीमानुषीषु स्त्रीवेदेषु च भाववेदापेक्षया चतुर्दश गुणस्थानानि, सामान्यमनुष्यपर्याप्तमनुष्ययो: द्रव्यनपुंसकवेदद्रव्यस्त्रीवेदयो: पंचैव गुणस्थानानि संयतासंयतपर्यंतानि भवन्तीति ज्ञातव्यं।
अत्र तावत् संबंधप्राप्त-उपशमक-क्षपकयो: स्वरूपज्ञापनार्थं उपशमनक्षपणविधी संक्षेपेण प्ररूप्येते-
तत्रापि प्रागुपशमनविधि: कथ्यते-

अनन्तानुबंधि-क्रोधमानमायालोभ-सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वमिथ्यात्वानि इति एता: सप्तप्रकृती: असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तादीनां मध्ये कोऽपि एक: उपशमयति। स्वस्वरूपं त्यक्त्वा अन्यप्रकृतिस्वरूपेणावस्थानमनंतानुबंधिनामुपशम:। दर्शनत्रिकस्य उदयाभाव: उपशम:, तेषां उपशान्तानां अपि त्रिप्रकृतीनां उत्कर्षणं अपकर्षणं परप्रकृतिरूपेण संक्रमणं च अस्ति। अपूर्वकरणे नैकमपि कर्म उपशाम्यति। किन्तु अपूर्वकरण: प्रतिसमयमनन्तगुणविशुद्ध्या वर्धमान: स्थितिखण्डघातस्थितिबंधापसरणादिविधिं करोति। पुन: अपूर्वकरणमतिक्रम्यानिवृत्तिकरणं प्रविश्य द्वादशानां कषायाणां नवनोकषायानां आगमकथितो-पशमनविधिना उपशमनं करोति, तत्रापि संज्वलनलोभकषायबादरकृष्टिं करोति न च सूक्ष्मकृष्टिं। अनंतरं सूक्ष्मकृष्टिरूपं लोभं अनुभवन् सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानमारोहति। तत्र सूक्ष्मकिट्टिकारूपं संज्वलनलोभमपि उपशमय्य उपशांतकषायगुणस्थानमारुह्य वीतरागछद्मस्थो भवति। एष मोहनीयोपशमनविधि:।

सभी जगह गति का संबंध जोड़ लेना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि इस सूत्र में मार्गणाओं के अन्तर्गत गतिमार्गणा में चार गतियों का वर्णन किया गया है और पुन: उस गतिमार्गणा से परे जो कोई गति है वह सिद्धगति नाम की पंचम गति कहलाती है। उसका निरूपण किया है। क्योंकि इस गति के पश्चात् पुन: आगति नहीं होती है ऐसा अर्थ हुआ।

श्री कुन्दकुन्द देव ने संसारी प्राणियों को भी सान्त्वना प्रदान करने के लिए अध्यात्म भाषा में कहा है-

गाथार्थ-

जिस प्रकार सिद्ध जीव जन्म, जरा, मरण से मुक्त और आठ गुणों से अलंकृत होते हैं उसी प्रकार से संसारी जीवों को भी शक्तिरूप में सिद्ध जानना चाहिए।

जिस प्रकार से सिद्धपरमात्मा जीव सिद्धशिला पर विराजमान हैं उसी प्रकार से भव का आश्रय लेकर संसारी जीव भी शक्तिरूप से होते हैं, व्यक्तरूप से वे सिद्ध के समान नहीं हैं। अथवा निश्चयनय की अपेक्षा ही संसारियों को भी सिद्ध कहा जाता है। जिस हेतु से-निश्चय नय से जो संसारी जरा, मरण और जन्म से मुक्त-रहित होते हैं उसी हेतु से वे आठ गुणों से अलंकृत-सहित माने जाते हैं।

शक्तिरूप से मेरी आत्मा सिद्ध के समान है ऐसा जानकर अपनी शुद्धात्मा का ध्यान कर-करके हम लोगों को भी अपनी आत्मा को व्यक्तरूप से सिद्धात्मा बनाना चाहिए ऐसा अभिप्राय हुआ।

अब मार्गणा के एकदेशरूप गति का अस्तित्व बतलाकर उनमें गुणस्थानों का अन्वेषण करने के लिए अगले सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

नारकी जीव मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयत सम्यग्दृष्टि इन चार गुणस्थानों में होते हैं।।२५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नारकी जीव चार गुणस्थानों में होते हैं। मिथ्यात्व कर्म की सत्ता के कारण नरक में जन्म लेने वाले जीव मिथ्यादृष्टि नारकी कहलाते हैं।

नरक में सासादनसम्यग्दृष्टि भी होते हैं। सो कैसे ? उसका उत्तर देते हैं- सासादन सम्यक्त्व के साथ मरण करके कोई भी जीव नरकों में जन्म नहीं लेता है अत: नरक में अपर्याप्त अवस्था में यह गुणस्थान नहीं होता है किन्तु पर्याप्तक नारकी जीवों में यह गुणस्थान हो सकता है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों की अपेक्षा से यह तृतीय गुणस्थान भी नरक में पर्याप्त जीवों के ही होता है अपर्याप्तकों के नहीं अर्थात् अपर्याप्त अवस्था में नरक में तृतीय गुणस्थान नहीं हो सकता है। नरक में असंयतसम्यग्दृष्टि जीव होते हैं इसका खुलासा इस प्रकार है-

जिन मनुष्य या तिर्यंच जीवों ने पहले नरकायु का बंध कर लिया और बाद में उन्हें सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हुई ऐसे बद्धायुष्क सम्यग्दृष्टियों की ही नरकों में उत्पत्ति होती है इसलिए वहाँ असंयतसम्यग्दृष्टि होते हैं। उसमें भी प्रथम पृथिवी में ही सम्यग्दृष्टि जीव उत्पन्न होते हैं, द्वितीय आदि पृथिवियों में सम्यग्दृष्टि जीव जन्म नहीं ले सकता है। उन नरकभूमियों में पंचम आदि गुणस्थान नहीं होते हैं। क्योंकि नारकियों का संयमासंयम और संयम के साथ विरोध है अर्थात् वहाँ देशसंयम और सकलसंयम तो कदापि संभव ही नहीं है। केवल किन्हीं नारकियों को सम्यग्दर्शन अवश्य हो जाता है इसलिए चतुर्थ गुणस्थान तक वहाँ होते हैं।

तात्पर्य यह है कि नरकों में नारकी जीवों के भी बाह्य और अन्तरंग निमित्तों की उपलब्धि होने पर प्रथमोपशम और क्षयोपशम दोनों सम्यग्दर्शन उत्पन्न होते हैं। कदाचित् राजाश्रेणिक के समान कोई मनुष्य बद्धायुष्क होकर पुन: क्षायिक सम्यक्त्व को उत्पन्न करके प्रथम नरक में चला जाता है, अन्यत्र नहीं जाता है। ऐसा जानकर नरक गति में ले जाने वाले कारण स्वरूप पापों को आप लोगों को कभी नहीं करना चाहिए ऐसा अभिप्राय हुआ।

इस प्रकार गति मार्गणा में नरकगति की गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले दो सूत्र हुए। अब तिर्यंचगति में गुणस्थानों का अन्वेषण करने हेतु उत्तर सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच जीव मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत इन पाँच गुणस्थानों में होते हैं।।२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंच जीव पाँच गुणस्थानों में होते हैं। मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत इस प्रकार ये पाँच गुणस्थान हैं।

यहाँ बद्धायुष्क जीव ही सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में उत्पन्न होते हैं अत: उन तिर्यंचों में अपर्याप्तकाल में सम्यग्मिथ्यादृष्टि और संयतासंयत जीव जन्म नहीं लेते हैं अर्थात् पर्याप्त काल में उनके ये दोनों गुणस्थान हो सकते हैं।

तिर्यंच के पाँच भेद हैं-सामान्य तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रियपर्याप्त तिर्यंच, पंचेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंचिनी और पंचेन्द्रिय अपर्याप्त तिर्यंच। यहाँ कोई शंका करता है कि मुझे यह ज्ञात नहीं है कि ये पाँच गुणस्थान कहाँ-कहाँ होते हैं ? तब आचार्यदेव समाधान देते हैं-

अपर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंचो में तो पाँच गुणस्थान होते नहीं हैं क्योंकि लब्ध्यपर्याप्तकों में एक मिथ्यादृष्टि गुणस्थान को छोड़कर शेष गुणस्थान ही असंभव हैं अर्थात् नहीं होते हैं। सामान्य तिर्यंचों में एकेन्द्रिय आदि से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त तिर्यंच जीव मिथ्यादृष्टि ही होते हैं अर्थात् इनके एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही संभव है अन्य नहीं।

तिर्यञ्चिनियों में-स्त्रीवेदी तिर्यंच जीवों के भी अपर्याप्तकाल में मिथ्यात्व और सासादन ये दो गुणस्थान होते हैं, शेष तीन गुणस्थान नहीं होते हैं।

शंका-तिर्यञ्चिनी पशुओं के अपर्याप्त अवस्था में सम्यग्दृष्टि नाम का चतुर्थ गुणस्थान क्यों नहीं होता है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि वहाँ उस अपर्याप्त अवस्था में असंयतसम्यग्दृष्टियों की उत्पत्ति का अभाव है इसलिए अपर्याप्तकाल में उनके चतुर्थ गुणस्थान नहीं पाया जाता है।

यह कैसे जाना जाता है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-

गाथार्थ-

सम्यग्दृष्टि जीव प्रथम पृथिवी के बिना नीचे की छह पृथिवियों में, ज्योतिषी, व्यन्तर और भवनवासी देवों में तथा सभी प्रकार की स्त्रियों में उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार के आर्षवचनों से जाना जाता है कि अपर्याप्त तिर्यञ्चिनियों के सम्यग्दृष्टि गुणस्थान नहीं हो सकता है।

तात्पर्य यह है कि द्वितीय आदि छह नीचे की नरकभूमियों में, ज्योतिर्वासी देवों में, व्यन्तर देवों में, सभी प्रकार की स्त्रियों में सम्यग्दृष्टि जीव जन्म नहीं लेता है। अतएव तिर्यंच और तिर्यंचिनियों के पर्याप्तकाल में पाँच गुणस्थान होते हैं। तिर्यंचों के अपर्याप्त काल में असंयत सम्यग्दृष्टि और सासादन नाम वाले दो गुणस्थान संभव हैं किन्तु अपर्याप्त काल में उनके मिथ्यात्व गुणस्थान तो होता ही है और तिर्यंचिनियों के अपर्याप्त काल में मिथ्यात्व और सासादन ये दो गुणस्थान ही रहते हैं शेष तीन नहीं हो सकते हैं क्योंकि उनका निरूपण करने वाले आर्षग्रन्थों का अभाव है। ऐसा जानकर तुम्हें तिर्यंचगति में गमन के कारणों का त्याग करके सम्यक्त्व के साथ देशसंयम अथवा सकल संयम को ग्रहण करके अपनी मनुष्य पर्याय सफल करना चाहिए।

इस प्रकार तिर्यंचगति में गुणस्थान का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ। अब मनुष्यगति में गुणस्थानों का अन्वेषण करने के लिए श्रीमान् पुष्पदन्त आचार्य भट्टारकदेव उत्तर सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमतसंयत, अपूर्वकरण प्रविष्ट शुद्धि संयतों में उपशमक और क्षपक, अनिवृत्तिकरण बादरसांपराय प्रविष्ट शुद्धि संयतों में उपशमक और क्षपक, सूक्ष्मसांपराय प्रविष्ट शुद्धिसंयतों में उपशमक और क्षपक, उपशांतकषाय वीतराग छद्मस्थ, क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ, सयोगिकेवली और अयोगिकेवली इस तरह इन चौदह गुणस्थानों में मनुष्य पाये जाते हैं।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-

मनुष्य मिथ्यादृष्टि से लेकर अयोगकेवली पर्यन्त चौदहों गुणस्थानों में होते हैं। इन चौदह गुणस्थानों का लक्षण पहले ही किया जा चुका है इसलिए यहाँ पुन: उनका वर्णन नहीं किया जा रहा है।

मनुष्य चार प्रकार के होते हैं-सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य, योनिमती मनुष्य और लब्ध्य पर्याप्त मनुष्य। इनमें अंतिम भेद वाले लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों में केवल एक मिथ्यात्व गुणस्थान होता है, शेष तीन भेद वाले मनुष्यों में चौदहों गुणस्थान होते हैं। नपुंसक वेद वाले मनुष्यों में, योनिमती मनुष्यस्त्रियों में-स्त्रीवेद वाले मनुष्यों में भाववेद की अपेक्षा चौदह गुणस्थान होते हैं। सामान्य मनुष्य और पर्याप्तक मनुष्यों में, द्रव्य नपुंसक वेदी और द्रव्य स्त्रीवेदी में पाँच गुणस्थान संयतासंयत पर्यन्त होते हैं ऐसा जानना चाहिए।

उनमें से यहाँ संबंध को प्राप्त उपशमक और क्षपक जीवों के स्वरूप को बताने के लिए उपशमन तथा क्षपण विधि को संक्षेप में कहते हैं- उसमें भी सबसे पहले उपशमन विधि कही जा रही है-

अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, सम्यक्त्व प्रकृति, सम्यग्मिथ्यात्व तथा मिथ्यात्व इन सात प्रकृतियों का असंयतसम्यग्दृष्टि से संयतासंयत, प्रमत्त, अप्रमत्त तक इन चार गुणस्थानों में रहने वालों में से कोई भी एक गुणस्थान वाला जीव उपशम करने वाला होता है।

अपने स्वरूप को छोड़कर अन्य प्रकृतिरूप से रहना अनन्तानुबंधी का उपशम है। दर्शनमोहनीय की तीन प्रकृतियों का उदय में नहीं आना उपशम है। उन उपशान्त हुई प्रकृतियों में भी तीन प्रकृतियों का उत्कर्षण, अपकर्षण और परप्रकृतिरूप से संक्रमण पाया जाता है। अपूर्वकरण गुणस्थान में एक भी कर्म का उपशम नहीं होता है किन्तु अपूर्वकरण गुणस्थान वाला जीव प्रत्येक समय में अनन्तगुणी विशुद्धि से बढ़ता हुआ एक-एक अन्तर्मुहूर्त में एक-एक स्थिति खण्ड का घात करता हुआ स्थितिबन्धापसरण आदि विधि को करता है। पुन: अपूर्वकरण गुणस्थान को उल्लंघन करके और अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में प्रवेश करके बारह कषाय और नौ नोकषायों का आगम में कही गई विधि से उपशमन करता है। उनमें भी संज्वलन लोभ कषाय का बादर कृष्टि का ही उपशमन करता है सूक्ष्मकृष्टि का नहीं। अनंतर सूक्ष्मकृष्टिरूप लोभ का अनुभव करता हुआ सूक्ष्मसांपराय नामक दशवें गुणस्थान में आरोहण करता है। उनमें सूक्ष्मकिट्टिकारूप संज्वलन लोभ का भी उपशम करके उपशान्तकषाय गुणस्थान में जाकर वीतराग छद्मस्थ होता है। यह मोहनीय कर्म की उपशमन विधि हुई।

अथ क्षपणविधिं वक्ष्ये-

अष्टकर्मणां मूलोत्तरभेदभिन्नप्रकृतिस्थितिअनुभागप्रदेशानां जीवात् य: नि:शेषविनाश: तत्क्षपणमुच्यते-

अनंतानुबन्धिचतुष्क-मिथ्यात्व सम्यङ्मिथ्यात्व-सम्यक्त्वाख्या: सप्तप्रकृतीरेता: असंयतसम्यग्दृष्टि: संयतासंयत: प्रमत्तसंयतोऽप्रमत्तो वा क्षपयति, तस्य क्षपणस्य क्रम:-पूर्वमनन्तानुबंधिचतुष्कं त्रीन् करणान् कृत्वाऽनिवृत्तिकरणचरमसमयेऽक्रमेण क्षपयति। पश्चात्पुनरपि त्रीन् करणान् कृत्वा अध:प्रवृत्तिकरणापूर्वकरणौ द्वौ अतिक्रम्यानिवृत्तिकरणकालसंख्येयभागं गत्वा मिथ्यात्वं क्षपयति ततोऽन्तर्मुहूर्तं गत्वा सम्यङ्मिथ्यात्वं क्षपयति, ततोऽन्तर्मुहूर्तं गत्वा सम्यक्त्वप्रकृतिं क्षपयति।

ततोऽध:प्रवृत्तिकरणं कृत्वान्तर्मुहूत्र्तेनापूर्वकरणो भवति स एकमपि कर्म न क्षपयति, किन्तु समयं प्रति असंख्येयगुणस्वरूपेण प्रदेशनिर्जरां करोति, अंतर्मुहूत्र्तेन एकैकस्थितिखंडकं घातयन् आत्मन: कालाभ्यंतरे संख्यातसहस्राणि स्थितिखंडकानि घातयति, तावन्मात्राणि च स्थितिबंधापसरणानि करोति, तेभ्यश्च संख्यातसहस्रगुणानुभागखंडकघातान् करोति, यत: एकानुभागखण्डकोत्कीर्णकालादेकस्य स्थितिखण्डकोत्कीर्णकाल: संख्यातगुण: इति।
एवंविधं कृत्वा अनिवृत्तिकरणं नाम नवमगुणस्थानं प्रविश्यानिवृत्तिसंख्यातभागोऽपूर्वकरणविधानेन गमयित्वा अनिवृत्तिकालसंख्येयभागे शेषे स्त्यानगृद्धित्रय-नरकगति-तिर्यग्गति-एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियजाति-नरकगति-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूव्र्यातपोद्योतस्थावरसूक्ष्म-साधारणसंज्ञका: षोडशप्रकृती: क्षपयति। ततोऽन्तर्मुहूत्र्तं गत्वा प्रत्याख्यानाप्रत्याख्यानावरणक्रोधमानमायालोभान् अक्रमेण क्षपयति। ‘‘एसो संतकम्मपाहुड-उवएसो। कसायपाहुडउवएसो पुण।’’ अष्टसु कषायेषु क्षीणेषु पश्चादंतर्मुहूर्तं गत्वा षोडशकर्माणि क्षपयति।

अत्रकश्चिदाशंकते-प्राक् षोडशकर्माणि क्षपयित्वा पश्चात् अष्टकषायान् क्षपयति इति षट्खण्डागम-स्योपदेश:, पुन: प्राक् अष्टकषायान् क्षपयित्वा अनंतरं षोडशकर्माणि क्षपयति एष कषायप्राभृतस्योपदेश:। एतत्परस्परविरोधिवाक्यं, न च जिनेन्द्रदेववचनं ‘‘नान्यथावादिनो जिना:’’ इति। एतत् वचनं तु ऐदंयुगीनाचार्याणामेव। अत: सत्कर्मप्राभृतकषायप्राभृतयो: सूत्रत्वं न घटते इति ?

अब आगे क्षपणविधि को कहेंगे-

जिनके आठ कर्म मूल और उत्तर प्रकृति के भेद से प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, अनुभागबंध और प्रदेशबंध के भेद से अनेक प्रकार के हो जाते हैं, उन कर्मों का जीव से जो अत्यन्तरूप से विनाश होता है उसे क्षपण कहते हैं।

अनन्तानुबंधी चतुष्क, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति इन सात प्रकृतियों को असंयत सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत अथवा अप्रमत्तसंयत जीव क्षय करता है। उनके क्षपण का क्रम इस प्रकार है-

तीन करण करके अनिवृत्तिकरण के चरम समय में पहले अनन्तानुबंधी चतुष्क का एक साथ क्षय करता है तत्पश्चात् फिर से तीनों करण करके अध:करण और अपूर्वकरण इन दोनों का उल्लंघन करके अनिवृत्तिकरण के संख्यात बहुभाग व्यतीत हो जाने पर मिथ्यात्व का क्षय करता है। इसके अनन्तर अन्तर्मुहूर्त व्यतीत कर सम्यग्मिथ्यात्व का क्षय करता है तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त व्यतीत कर सम्यक्त्व प्रकृति का क्षय करता है।

उसके बाद अध:करण को करके अन्तर्मुहूर्त में अपूर्वकरण गुणस्थान वाला हो जाता है। वह एक भी कर्म का क्षय नहीं करता है किन्तु प्रतिसमय में असंख्यातगुणीरूप से कर्मप्रदेशों की निर्जरा करता है। एक-एक अन्तर्मुहूर्त में एक-एक स्थितिकांडक का घात करता हुआ अपने काल के भीतर संख्यात हजार स्थितिकाण्डकों का घात करता है और उतने ही स्थितिबंधापसरण करता है तथा उनसे संख्यात हजार गुणे अनुभागकाण्डकों का घात करता है क्योंकि एक अनुभागकाण्डक के उत्कीरण काल से एक स्थितिकाण्डक का उत्कीरण काल संख्यात गुणा है ऐसा सूत्र वचन है।

इस प्रकार अपूर्वकरण गुणस्थान संबंधी क्रिया को करके अनिवृत्तिकरण नामक नवमें गुणस्थान में प्रवेश करके अनिवृत्तिकरण काल के संख्यात भाग को अपूर्वकरण के समान व्यतीत करके अनिवृत्तिकरण काल के संख्यात भाग के शेष रहने पर स्त्यानगृद्धि त्रय-स्त्यानगृद्धि, निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला, नरकगति, तिर्यंचगति, एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण संज्ञा वाली इन सोलह प्रकृतियों का क्षय करता है।

उसके पश्चात् अन्तर्मुहूर्त काल व्यतीत करके प्रत्याख्यानावरण-अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ को एक साथ नष्ट कर देता है। ऐसा सत्कर्मप्राभृत का उपदेश है। और कषायप्राभृत का ऐसा उपदेश है कि आठ कषायों के क्षीण होने के पश्चात् अन्तर्मुहूर्तकाल व्यतीत कर सोलह कर्मप्रकृतियों का नाश करता है।

यहाँ कोई आशंका करता है कि पहले सोलह कर्मों का क्षय करके बाद में आठ कषायों को नष्ट करता है ऐसा षट्खण्डागम का उपदेश है पुन: पहले आठ कषायों को क्षय करके उसके पश्चात् सोलह कर्मों को नष्ट करता है ऐसा कषायप्राभृत का उपदेश है। ये दोनों वाक्य तो परस्पर में विरोध को दर्शाने वाले हैं इसलिए ये जिनेन्द्रदेव के वचन नहीं हैं, क्योंकि ‘‘नान्यथावादिनो जिना:’’ इस आगमवचन के अनुसार जिनेन्द्रदेव के वचन अन्यथा-झूठ नहीं होते हैं। ये उपर्युक्त परस्पर विरोधी वचन तो इस युग के आचार्यों के ही हैं अत: सत्कर्मप्राभृत और कषायप्राभृत इन दोनों ग्रंथों में सूत्रपना घटित नहीं होता है।


श्रीवीरसेनाचार्य: समाधानं ददाति-

नैतद्वक्तव्यं, ‘‘तीर्थकरकथितानां गणधरदेवकृतग्रन्थरचनानां द्वादशांगानां आचार्यपरंपरया निरंतरमागतानां युगस्वभावेन-कालदोषेण उत्तरोत्तरहीनबुद्धिषु योग्यपात्राभावेन पुन: सुष्ठुबुद्धीनां क्षयं दृष्ट्वा तीर्थव्युच्छित्तिभयेन पापभीरुभि: गृहीतार्थैै: आचार्यै: पोथीषु लिखितानां ग्रन्थानां असूत्रत्वविरोधात्। अत: उभयोरपि ग्रन्थयो: सूत्रत्वं घटते एव।

यदि एवं तर्हि, द्वयोरपि आगमयो: द्वादशांगावयवत्वात् सूत्रत्वं भवेत् ?
नैतत्, द्वयोर्मध्ये एकस्य वचनस्यैव सूत्रत्वं न च द्वयोर्वचनयो:, परस्परविरोधात्।
तर्हि, उत्सूत्रं लिखन् आचार्य: पापभीरु: कथं भवेत् ?
नैष दोष:, ‘‘दोण्हं मज्झे एकस्सेव संगहे कीरमाणे वज्जभीरुत्तं फिट्टति त्ति। द्वयोर्मध्ये एकस्यैव वचनस्य संग्रहे क्रियमाणे वद्यभीरुत्वं पापभीरुत्वं निर्गच्छति इति-उच्छृंखलत्वं भवेदिति। किन्तु द्वयोरपि संग्रहं कुर्वतां आचार्याणां पापभीरुत्वाविनाशात्।
द्वयोर्वचनयोर्मध्ये किं वचनं सत्यमिति चेत् ?
‘‘सुदकेवली केवली वा जाणदि, ण अण्णो’’-तथा निर्णयाभावात्। ततो वर्तमानकालाचार्यै: पापभीरुभि: द्वयोरपि वचनयो: संग्रह: कर्तव्य:, अन्यथा पापभीरुत्वविनाशात् इति।

एतत्प्रश्नोत्तरै: विज्ञायते, पूर्वाचार्यै: लिखितशास्त्राणि प्रमाणमेव। तेषां मध्ये यत् किमपि परस्परविरोधिवाक्यं भवेत् तदा द्वयोरपि वाक्ययो: श्रद्धानं कर्तव्यं, न च एकस्य प्रामाण्यं अन्यस्य अप्रामाण्यं वक्तव्यमिति।

तदनंतरं अयं नवमगुणस्थानवर्ती मुनि: आगमोक्तविधिना नवनोकषायान् संज्वलनत्रिकं च क्षपयित्वा सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानं प्रतिपद्यते। तत: सोऽपि आत्मन: चरमसमये किट्टिकागतं सर्वंं संज्वलनलोभं क्षपयति। तत्पश्चात् क्षीणकषायगुणस्थानं प्रतिपद्य अंतर्मुहूर्तं गमयित्वा आत्मनो द्विचरमसमये निद्राप्रचलासंज्ञके द्वे प्रकृती क्षपयति, अनंतरं अस्यैव चरमसमये पंचज्ञानावरणचतुर्दर्शनावरणपंचान्तरायाख्याश्चतुर्दशप्रकृती: क्षपयति।
‘‘एदेसु सट्ठिकम्मेसु खीणेसु सजोगिजिणो होदि।’’ अत्र नरकतिर्यग्देवायुषां प्रयत्नमन्तरेण विनाशोऽभवत् अत: तेषां त्रयाणां अविवक्षया एव षष्टिकर्मणां क्षय: कथित:, किन्तु मूलाचारे टीकायां२ ‘‘एतेषु त्रिषष्टिकर्मसु क्षीणेषु सजोगिजिनो भवति’’ इति कथनं वर्तते।

सयोगकेवली भट्टारको न किंचिदपि कर्म क्षपयति, तत: क्रमेण विहृत्य योगनिरोधं कृत्वा अयोगकेवली भवति। सोऽपि आत्मनो द्विचरमसमयेऽनुदयवेदनीयदेवगति-पंचशरीर-पंचसंघात-पंचशरीरबन्धन-षट्संस्थान-त्र्यंगोपांग-षट्संहनन-पंचवर्ण-द्विगन्ध-पंचरस-अष्टस्पर्श-देवगतिप्रायोग्यानुपूव्र्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वास-द्विविहायोगति-अपर्याप्त-प्रत्येक-स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-दुर्भग-सुस्वरदु:स्वर-अनादेय-अयश:कीर्ति-निर्माण-नीचैर्गोत्राणि एता द्वासप्ततिप्रकृती: क्षपयति। ततश्चरमसमये सोदयवेदनीय-मनुष्यायुर्मनुष्यगतिपंचेन्द्रिय-जातिमनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूव्र्य-त्रसबादर-पर्याप्त-सुभग-आदेय-यश:कीर्ति-तीर्थकर-उच्चैर्गोत्राणि इति एता: त्रयोदश प्रकृती: क्षपयति। अथवा मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूव्र्या सह त्रिसप्ततिप्रकृती: द्विचरमसमये विनाश्य द्वादश प्रकृती: चरमसमये क्षपयति।१ तत: उपरिमसमये नीरजा: निर्मल: सिद्धो भवति।

तत्र ये महामुनय: कर्मक्षपणायां व्यापृतास्ते क्षपका उच्यन्ते। ये पुन: तेषां एव कर्मणां उपशामनायां व्यापृतास्ते उपशामका: कथ्यन्ते। अनयोद्र्वयोर्ये उपशामका: ते नियमेन अधोऽवतीर्य कदाचित् पुन: तस्मिन्नेव भवे अन्यभवे वा क्षपकश्रेणिमारोहन्ति तदा मोक्षं गच्छन्ति। ये पुन: क्षपकश्रेणिमारोहन्ति ते तस्मिन्नेव भवे सिद्ध्यन्ति।

मनुष्यगतौ गुणस्थानविवेचनस्य कर्मणामुपशमन-क्षपणविधिप्रतिपादनस्य च प्रयोजनमेतत् यन्मया मनुष्यपर्याय: कृच्छ्राल्लब्ध: तथा च उपचारमहाव्रतरूपेण रत्नत्रयमपि लब्धं, अतो जिनेन्द्रदेवस्य श्रीपादसन्निधौ वयं, याचामहे श्रीपद्मनन्दि-आचार्यस्य वचनेन-
इन्द्रत्वं च निगोदतां च बहुधा मध्ये तथा योनय:।
संसारे भ्रमता चिरं यदखिलं प्राप्ता मयाऽनन्तश:।।
तन्नापूर्वमिहास्ति किंचिदपि मे हित्वा विकल्पावलिं।
सम्यग्दर्शनबोधवृत्तपदवीं तां देव! पूर्णां कुरु।।
अस्य रत्नत्रयस्य पूर्णता अयोगकेवलिगुणस्थानस्यान्त्यसमये एव भवति इति कथितं श्रीआचार्यविद्यानन्द-महोदयेन। तद्यथा-‘‘निश्चयनयादयोगकेवलिचरमसमयवर्तिनो रत्नत्रयस्य मुत्तेर्हेतुत्वव्यवस्थिते:।’’


तब आचार्य श्रीवीरसेनस्वामी समाधान देते हैं-

ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि जिनका अर्थरूप से तीर्थंकरों ने प्रतिपादन किया है इत्यादि वाक्य का ऐसा अभिप्राय है कि- तीर्थंकर के द्वारा कथित, गणधर देव के द्वारा द्वादशांग ग्रंथ रचना रूप से किया गया जो आगम है वह आचार्य परम्परा से निरन्तर चला आ रहा युग-कलियुग के प्रभाव से-कालदोष से उत्तरोत्तर हीन-वृद्धि होने पर योग्यपात्र के अभाव से पुन: श्रेष्ठबुद्धि वाले मनुष्यों का ह्रास देखकर पापभीरु आचार्यों ने तीर्थव्युच्छित्ति के भय से गुरुओं के बताए हुए अर्थ को ग्रहण करके पोथियों में-गंथों में लिख दिया इसलिए उनमें असूत्रपना घटित नहीं होता है। अत: सत्कर्मप्राभृत और कषायप्राभृत इन दोनों ग्रंथों में भी सूत्रपना घटित हो ही जाता है।

यदि ऐसा है तो दोनों आगम में भी द्वादशांग का अवयवपना घटित होने से उन्हें सूत्रपना प्राप्त हो जायेगा ?

ऐसा नहीं है, दोनों में से कोई एक वचन को ही सूत्रपना सिद्ध होगा, दोनों वचन सूत्र नहीं हो सकते क्योंकि दोनों वचन परस्पर में विरोधी हैं।

शंका-तब तो उत्सूत्र-आगम विरुद्ध सूत्र लिखने वाले आचार्य पापभीरु कैसे रहे ? अर्थात् उनमें पापभीरुता नहीं थी ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है क्योंकि दोनों प्रकार के वचनों में से किसी एक ही वचन के संग्रह करने पर पापभीरुता निकल जाती है अर्थात् उच्छ्रंखलता आ जाती है किन्तु दोनों प्रकार के वचनों का संग्रह करने वाले आचार्यों के पापभीरुता नष्ट नहीं होती है अर्थात् बनी रहती है।

शंका-दोनों प्रकार के वचनों में से किस वचन को सत्य माना जाये ?

समाधान-

इस बात को केवली या श्रुतकेवली जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जानता। क्योंकि इस समय उसका निर्णय नहीं हो सकता है इसलिए पापभीरु वर्तमान काल के आचार्यों को दोनों का ही संग्रह करना चाहिए अन्यथा पापभीरुता का विनाश हो जायेगा।

इन प्रश्न-उत्तरों से ज्ञात होता है कि पूर्वाचार्यों के द्वारा लिखित शास्त्र प्रमाणरूप ही हैं। उनमें जो कुछ भी परस्परविरोधी वाक्य होवें तो दोनों ही वाक्यों पर श्रद्धान करना चाहिए, एक को प्रमाणपना और दूसरे को अप्रमाणपना नहीं कहना चाहिए।

उसके पश्चात् यह नवमगुणस्थानवर्ती मुनि आगमोक्त विधि से नव नोकषायों का और संज्वलनत्रिक-क्रोध, मान, माया को क्षय करके सूक्ष्मसांपराय नामक दसवें गुणस्थान को प्राप्त कर लेते हैं। उसके बाद वह सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानवर्ती आत्मा भी अंतिम समय में सूक्ष्मकृष्टिरूप से चला आ रहा जो समस्त संज्वलन लोभ है उसको क्षय करता है। तत्पश्चात् क्षीणकषाय गुणस्थान को प्राप्त करके वहाँ अन्तर्मुहूर्त व्यतीत करके अपने काल के द्विचरम समय में निद्रा और प्रचला इन दो प्रकृतियों का एक साथ क्षय करता है, अनन्तर अपने काल के अंतिम समय में पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदह प्रकृतियों का विनाश करता है।

इस तरह इन साठ कर्मप्रकृतियों का क्षय हो जाने पर यह जीव सयोगकेवली जिन हो जाता है। यहाँ नरक, तिर्यंच और देवायु इन तीन प्रकृतियों का तो पुरुषार्थ के बिना ही क्षय हो गया था अत: उन तीनों की विवक्षा न होने के कारण ही साठ कर्मों का क्षय कहा है किन्तु मूलाचार ग्रंथ की टीका में ऐसा कहा है कि ‘‘इन त्रेसठ कर्मों को नष्ट करके जीव सयोगकेवली जिन होते हैं। अर्थात् तेरहवें गुणस्थान में जाते हैं।’’

सयोगकेवली भट्टारक-

भगवान् किसी भी कर्म का क्षय नहीं करते हैं, इसके पश्चात् विहार करके और क्रम से योगनिरोध करके वे अयोगकेवली होते हैं। वे भी अपने काल के द्विचरम समय में वेदनीय की दोनों प्रकृतियों में से अनुदयरूप कोई एक वेदनीय कर्म, देवगति, पाँच शरीर, पाँच संघात, पाँच शरीरों के बंधन, छह संस्थान, तीन आंगोपांग, छह संहनन, पाँच वर्ण, दो गंध, पाँच रस, आठ स्पर्श, देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, अप्रशस्त विहायोगति, अपर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, सुस्वर, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, निर्माण और नीच गोत्र इन बहत्तर प्रकृतियों का क्षय करते हैं।

इसके पश्चात् इस गुणस्थान के चरम-अंतिम समय में दोनों वेदनीय में से उदयागत शेष बची एक वेदनीय, मनुष्यायु, मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशस्कीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र इन तेरह कर्मप्रकृतियों का क्षय करते हैं। अथवा मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी के साथ तिहत्तर (७३) प्रकृतियों को द्विचरम समय में क्षय करके बारह प्रकृतियों को चरम समय में नष्ट करते हैं। उसके आगे उपरिम समय में नीरज-कर्म रज से रहित, निर्मल-भावकर्मरूपी मल से रहित सिद्ध परमात्मा बन जाते हैं।

इनमें से जो महामुनि कर्मक्षपण में व्यापार करते हैं-उद्यत होते हैं उन्हें क्षपक कहते हैं और जो मुनि उन्हीं कर्मों की उपशमना में उद्यमशील होते हैं उन्हें उपशामक कहते हैं। इन दोनों में से जो उपशामक होते हैं वे नियम से नीचे उतरकर कदाचित् पुन: उसी भव में अथवा अन्य भव में क्षपक श्रेणी पर चढ़कर कर्मों का क्षय कर देते हैं तो मोक्ष चले जाते हैं और जो सीधे क्षपक श्रेणी में आरोहण कर लेते हैं वे उसी भव में सिद्ध परमात्मा बन जाते हैं।

विशेषार्थ-

यहाँ सिद्धान्तचिंतामणिटीका में सयोगकेवली तेरहवें गुणस्थानवर्ती जिनेन्द्र भगवान् के लिए ‘‘भट्टारक’’ शब्द का प्रयोग किया है जो विशेष पूज्यता का प्रतीक है। वर्तमान में ‘भट्टारक’ शब्द वस्त्रधारी पीठाधीश भट्टारकों के लिए ही प्रयुक्त होने लगा है इसलिए भगवान् या दिगम्बर मुनि, आचार्य के साथ इसका प्रयोग करने पर लोगों के मन में प्रश्नचिन्ह सा उभरने लगता है किन्तु यह विशेष ध्यान देने योग्य विषय है कि षट्खण्डागम ग्रंथ के रचयिता आचार्य पुष्पदन्त-भूतबली के लिए श्रीवीरसेनाचार्य ने धवला टीका में भट्टारक और आचार्य दोनों शब्दों का प्रयोग किया है। प्रथम पुस्तक के पृ. ७२ पर ‘‘भूदबलित्ति भडारएण णामं कयं।’’ ‘‘भूदबलि भडारओ वि दमिल विसयं गदो’’ पुन: उसी पृष्ठ पर उनको आचार्य संज्ञा से भी सम्बोधित करते हुए कहा है-‘‘भूदबलि-पुप्फयंताइरिया वि कत्तारो उच्चंति’’। इसी प्रकार धरसेन आचार्य जिन्होंने पुष्पदन्त-भूतबली को अंगपूर्व का अध्ययन कराया था उनके लिए भी पृ. ६९ पर श्रीवीरसेनस्वामी कहते हैं-‘‘धरसेण-भडारएण दिट्ठा’’ और ‘‘धरसेण-भडारओ तेहिं विण्णत्तो’’ इत्यादि।

अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर को भी उन्होंने भट्टारक संज्ञा से सम्बोधित करते हुए कहा है, देखें धवला ग्रंथ पृ. ७३ पर-‘‘तदो मूल्-तंत्-कत्ता वड्ढमाण भडारओ......’’ इत्यादि। भट्टारक शब्द भगवान् के सदृश पूज्यता का वाचक है यह बात वीरसेनाचार्य के शब्दों से ही स्पष्ट है, जैसा कि पृ. ७ पर कहा है-

‘‘धरसेण भयवदा पुणरवि ताणं परिक्खा काउमाढत्ता....’’ अर्थात् भगवान्, भट्टारक और आचार्य ये तीनोें पद आचार्य परमेष्ठी के लिए प्रयुक्त किये जा सकते हैं।

वर्तमान के भट्टारकों का भी प्राचीन इतिहास जानने से ज्ञात होता है कि दक्षिण भारत में पहले अनेक तीर्थों पर दिगम्बर मुनिराज ही भट्टारक बनकर वहाँ का उत्तरदायित्व संभालते थे। उन्हें ‘‘पीठाधीश’’ शब्द से भी सम्बोधित किया जाता था। जैसा कि आज से एक हजार वर्ष पूर्व श्रवणबेलगोला के भगवान् बाहुबली की प्रतिमा के प्रथम स्थापना काल में आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती को महामात्य चामुण्डराय ने ‘‘पीठाधीश’’ पदवी से अलंकृत किया था। इसका उल्लेख पं. नीरज जैन, सतना (म.प्र.) ने ‘‘महोत्सवदर्शन’’ ग्रंथ में किया है।

धीरे-धीरे समय परिवर्तन के साथ-साथ आज भट्टारकों का वेष आदि भी परिवर्तित हो गया है अत: यह भट्टारक पद या शब्द यहाँ प्रयुक्त नहीं होगा, यहाँ तो निग्र्रन्थ पद का ही द्योतक भट्टारक शब्द है। ऐसे भगवान् भट्टारक केवली जिनेन्द्र को मेरा कोटि-कोटि वंदन है, वे मेरे भी कर्मक्षय में निमित्त बनें ऐसी प्रार्थना है।

मनुष्यगति में गुणस्थानों के विवेचन का, कर्मों के उपशमन-क्षपण विधि के प्रतिपादन का प्रयोजन यह है कि यह जो मनुष्य पर्याय मुझे बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुई है और उपचार महाव्रतरूप से रत्नत्रय को भी प्राप्त किया है अत: जिनेन्द्रदेव के पादसान्निध्य-पादमूल में हम श्रीपद्मनंदि आचार्य के शब्दों के द्वारा याचना करते हैं-

श्लोकार्थ—

इस संसार में भ्रमण कर मैंने इन्द्रपना, निगोदपना और बीच में अन्य भी समस्त प्रकार की योनि अनंत बार प्राप्त की हैं इसलिए इन पदवियों में से कोई भी पदवी मेरे लिए अपूर्व नहीं है किन्तु मोक्षपद को देने वाली सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की पदवी अभी तक नहीं मिली है इसलिए हे भगवन्! यह प्रार्थना है कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकचारित्र की पदवी को ही पूर्ण करो।

इस रत्नत्रय की पूर्णता अयोगकेवली गुणस्थान के अन्त्य समय में ही होती है ऐसा श्री विद्यानन्दि आचार्य महोदय ने कहा है। जो इस प्रकार है- ‘‘निश्चयनय से अयोगकेवली का अंतिम समयवर्ती रत्नत्रय मुक्ति का हेतु है, यह बात व्यवस्थित है।’’

भावार्थ—इस कथन से यह निर्णीत हो जाता है कि चौदहवें गुणस्थान के अंत तक मार्ग है और उसके आगे मार्ग का फल है क्योंकि सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीनों का समुदाय ही मार्ग है, इनमें से एक या दो से मार्ग नहीं बन सकता है।

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