033. तृतीय महाधिकार - पर्यािप्तयों के लक्षण.....

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तृतीय महाधिकार - पर्याप्तकर्मोदयवतामनिष्पन्नशरीराणां कथं

पर्याप्तकर्मोदयवतामनिष्पन्नशरीराणां कथं पर्याप्तव्यपदेशो घटते इति चेत् ? न, नियमेन शरीरनिष्पाद-कानां भाविनि भूतवदुपचारतस्तदविरोधात् पर्याप्तनामकर्मोदयसहचाराद्वा।

यदि पर्याप्तशब्दो निष्पत्तिवाचक:, कैस्ते निष्पन्ना: ? इति चेत्।
पर्याप्तिभि: निष्पन्ना: ते जीवा:, ता: पर्याप्तय: सामान्येन षट् भवन्ति-आहारपर्याप्ति: शरीरपर्याप्ति: इन्द्रियपर्याप्ति: आनापानपर्याप्ति: भाषापर्याप्ति: मन:पर्याप्ति: इति।
तत्राहारपर्याप्तेरर्थ उच्यते-शरीरनामकर्मोदयात् पुद्गलविपाकिन आहारवर्गणागतपुद्गलस्कन्ध: समवेतानन्तपरमाणुनिष्पादिता आत्मावष्टब्धक्षेत्रस्था: कर्मस्कन्धसंबंधतो मूर्तीभूतमात्मानं समवेतत्वेन समाश्रयन्ति। तेषामुपगतानां पुद्गलस्कन्धानां खलरसपर्यायै: परिणमनशत्तेर्निमित्तानामाप्तिराहारपर्याप्ति:। सा च नान्तर्मुहूर्तमन्तरेण समयनैकेनैवोपजायते, आत्मनोऽक्रमेण तथाविधपरिणामाभावात्। शरीरोपादान-प्रथमसमयादारभ्यान्तर्मुहूर्तेनाहारपर्याप्तिर्निष्पद्यत इति यावत्। तं खलभागं तिलखलोपममस्थ्यादिस्थिरावय-वैस्तिलतैलसमानं रसभागं रसरुधिरवसाशुक्रादिद्रवावयवैरौदारिकादिशरीरत्रयपरिणमनशक्त्युपेतानां स्कन्धानामवाप्ति: शरीरपर्याप्ति:। साहारपर्याप्ते: पश्चादन्तर्मुहूर्तेन निष्पद्यते। योग्यदेशस्थितरूपादिविशिष्टार्थ-ग्रहणशक्त्युत्पत्तेर्निमित्तपुद्गलप्रचयावाप्तिरिन्द्रियपर्याप्ति:। सापि तत: पश्चादन्तर्मुहूर्तादुपजायते। न चेन्द्रियनिष्पत्तौ सत्यामपि तस्मिन् क्षणे बाह्यार्थविषयविज्ञानमुत्पद्यते, तदा तदुपकरणाभावात्। उच्छ्वास- निस्सारणशक्तेर्निष्पत्तिनिमित्तपुद्गलप्रचयावाप्तिरानापानपर्याप्ति:। एषापि तस्मादन्तर्मुहूर्तकाले समतीते भवेत्। भाषावर्गणाया: स्कन्धानुचतुर्विधभाषाकारेण परिणमनशक्तेर्निमित्तनोकर्मपुद्गलप्रचयावाप्तिर्भाषापर्याप्ति:। एषापि पश्चादन्तर्मुहूर्तादुपजायते। मनोवर्गणास्कन्धनिष्पन्नपुद्गलप्रचय: अनुभूतार्थस्मरणशक्तिनिमित्त: मन:पर्याप्ति:। एतासां प्रारम्भोऽक्रमेण, जन्मसमयादारभ्य तासां सत्त्वाभ्युपगमात्। निष्पत्तिस्तु पुन: क्रमेण। एतासामनिष्पत्तिरपर्याप्ति:। इति संक्षेपेण ज्ञातव्यम्।
पर्याप्तिप्राणयो: को भेद ?
अनर्योिहमवद्विंध्ययोर्भेदोपलंभात्। यत: आहारशरीरेन्द्रियानापानभाषामन:शक्तीनां निष्पत्ते: कारणं पर्याप्ति:। प्राणिति एभिरात्मेति प्राणा:, पंचेन्द्रियमनोवाक्कायानापानायूंषि इति।
भवन्तु इन्द्रियायुष्काया: प्राणव्यपदेशभाज: तेषां आजन्मन: आमरणात् भवधारणत्वेन उपलंभात्, तत्रैकस्याप्यभावतोऽसुमतां मरणसंदर्शनाच्च। अपि तच्छ्वासमनोवचसां न प्राणव्यपदेशो युज्यते, तान्यन्तरेणापि अपर्याप्तावस्थायां जीवनोपलंभादिति चेत् ?
न, तैर्विना पश्चाज्जीवतामनुपलंभतस्तेषामपि प्राणत्वाविरोधात्।

शंका—

पर्याप्त नामकर्म के उदय से युक्त होते हुए भी जब तक शरीर निष्पन्न नहीं हुआ है तब तक उनमें पर्याप्त संज्ञा कैसे घटित हो सकती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि नियम से शरीर को उत्पन्न करने वाले जीवों के होने वाले कार्य में यह कार्य हो गया, इस प्रकार उपचार कर लेने से पर्याप्त संज्ञा करने में कोई विरोध नहीं आता है अथवा पर्याप्त नामकर्म के उदय से युक्त होने के कारण पर्याप्त संज्ञा दी गई है। यदि पर्याप्त शब्द निष्पत्तिवाचक है तो यह बतलाइए कि ये पर्याप्त जीव किनसे निष्पन्न होते हैं ? वे जीव पर्याप्तियों से निष्पन्न होते हैं। वे पर्याप्तियाँ सामान्य से छह प्रकार की होती हैं-आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इंद्रिय पर्याप्ति, श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति, भाषापर्याप्ति और मन:पर्याप्ति। इनमें से सर्वप्रथम आहारपर्याप्ति का अर्थ कहते हैं—

शरीर नामकर्म के उदय से जो परस्पर अनंत परमाणुओं के संबंध से उत्पन्न हुए हैं और जो आत्मा से व्याप्त आकाश क्षेत्र में स्थित हैं ऐसे पुद्गलविपाकी आहारवर्गणासंबंधी पुद्गलस्कन्ध, कर्मस्कन्ध से संबंध से कथंचित् मूूर्तपने को प्राप्त हुए आत्मा के साथ समवायरूप से संबंध को प्राप्त होते हैं, उनके खल और रसभाग पर्यायरूप परिणमन करनेरूप शक्ति को निमित्तभूत आगत पुद्गलस्कन्धों की प्राप्ति को आहारपर्याप्ति कहते हैं। वह आहारपर्याप्ति अंतर्मुहूर्त के बिना केवल एक समय में उत्पन्न नहीं हो जाती है, क्योंकि आत्मा का एक साथ उस प्रकार का परिणाम नहीं हो सकता है। शरीर को ग्रहण करने में प्रथम समय से लेकर एक अंतर्मुहूर्त में आहारपर्याप्ति नष्पन्न होती है। यह उक्त कथन का तात्पर्य है। तिल की खली के समान उस खलभाग को हड्डी आदि कठिन अवयवरूप से और तिल के तेल के समान रसभाग को रस, रुधिर, वसा, वीर्य आदि द्रव्य अवयवरूप से परिणमन करने वाले औदारिक आदि तीन शरीरों की शक्ति से युक्त पुद्गलस्कन्धों की प्राप्ति को शरीरपर्याप्ति कहते हैं। वह शरीरपर्याप्ति आहारपर्याप्ति के पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्त में पूर्ण होती है। योग्य देश में स्थित रूपादि से युक्त पदार्थों के ग्रहण करने रूप शक्ति की उत्पत्ति के निमित्तभूत पुद्गलप्रचय की प्राप्ति को इंद्रियपर्याप्ति कहते हैं। यह इंद्रियपर्याप्ति भी शरीरपर्याप्ति के पश्चात् एक अंतर्मुहूर्त में पूर्ण होती है। परन्तु इंद्रियपर्याप्ति के पूर्ण हो जाने पर भी उसी समय बाह्य पदार्थसंबंधी ज्ञान उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि उस समय उसके उपकरणरूप द्रव्येन्द्रिय नहीं पाई जाती है। उच्छ्वास और नि:श्वासरूप शक्ति की पूर्णता के निमित्तभूत पुद्गलप्रचय की प्राप्ति को श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति कहते हैं। यह पर्याप्ति भी इंद्रियपर्याप्ति के अनंतर एक अंतर्मुहूर्त काल व्यतीत होने पर पूर्ण होती है। भाषावर्गणा के स्कन्धों के निमित्त से चार प्रकार की भाषारूप से परिणमन करने की शक्ति के निमित्तभूत नोकर्म पुद्गलप्रचय की प्राप्ति को भाषा पर्याप्ति कहते हैं। यह पर्याप्ति भी आनापान पर्याप्ति के पश्चात् एक अंतर्मुहूर्त में पूर्ण होती है। अनुभूत अर्थ के स्मरणरूप शक्ति के निमित्तभूत मनोवर्गणा के स्कन्धों से निष्पन्न पुद्गलप्रचय को मन:पर्याप्ति कहते हैं अथवा द्रव्यमन के आलम्बन से अनुभूत अर्थ के स्मरणरूप शक्ति की उत्पत्ति को मन:पर्याप्ति कहते हैं। इन छहों पर्याप्तियों का प्रारंभ युगपत् होता है क्योंकि, जन्म समय से लेकर ही इनका अस्तित्व पाया जाता है। परन्तु पूर्णता क्रम से होती है तथा इन पर्याप्तियों की अपूर्णता को अपर्याप्ति कहते हैं।

शंका—

पर्याप्ति और प्राण में क्या भेद है ?

समाधान—इन दोनों में हिमवान् और विन्ध्याचल पर्वत के समान भेद पाया जाता है क्योंकि आहार, शरीर, इंद्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन रूप शक्तियों की पूर्णता के कारण को पर्याप्ति कहते हैंं। और जिनके द्वारा आत्मा जीवन संज्ञा को प्राप्त होता है उन्हें प्राण कहते हैं। वे प्राण पाँच इंद्रिय, मन, वचन, कायबल, आनापान, आयु के भेद से दश प्रकार के हैं।

शंका—

पाँचों इंद्रियाँ, आयु और कायबल ये प्राणसंज्ञा को प्राप्त होवें, क्योंकि वे जन्म से लेकर मरण तक भव (पर्याय) को धारण करनेरूप से पाये जाते हैं और उनमें से किसी एक के अभाव होने पर मरण भी देखा जाता है परन्तु उच्छ्वास, मनोबल और वचनबल इनको प्राणसंज्ञा नहीं दी जा सकती है क्योंकि इनके बिना भी अपर्याप्त अवस्था में जीवन पाया जाता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि उच्छ्वास, मनोबल और वचनबल के बिना अपर्याप्त अवस्था के पश्चात् पर्याप्त अवस्था में जीवन नहीं पाया जाता है इसलिए उन्हें प्राण मानने में कोई विरोध नहीं आता है।


उक्तं च-

बाहिरपाणेहि जहा तहेव अब्भंतरेहि पाणेहि।

जीवंति जेहि जीवा पाणा ते होंति बोद्धव्वा।
यैरभ्यन्तरैर्भावप्राणै: जीवा: जीवन्ति-जीवद्व्यवहारयोग्या भवन्ति, बाह्यैद्र्रव्यप्राणैरिव यथाशब्दस्य इवार्थवाचकत्वात्। ते आत्मनो धर्मा: प्राणा: भवन्ति, इति निर्दिष्टा:। इति निर्वचनेनैव प्राणशब्दार्थस्य ज्ञातुं शक्यत्वात् तल्लक्षणं पृथक् नोत्तं। पौद्गलिकद्रव्येन्द्रियादिव्यापाररूपा: द्रव्यप्राणा:। तन्निमित्तभूत-ज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमादिविजृंभितचेतनव्यापाररूपा भावप्राणा: इति।
अथवा जीवनहेतुत्वं तत्स्थमनपेक्ष्य शक्तिनिष्पत्तिमात्रं पर्याप्तिरुच्यते, जीवनहेतव: पुन: प्राणा इति तयोर्भेद:।
अधुना एकेन्द्रियाणां भेदमभिधाय द्वीन्द्रियादिभेदप्रतिपादनार्थं उत्तरसूत्रावतार: क्रियते-
बीइंदिया दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। तीइंदिया दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। चउरिंदिया दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। पंंचिंदिया दुविहा-सण्णी असण्णी। सण्णी दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। असण्णी दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता चेदि।।३५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-बीइंदिया दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता-द्वीन्द्रिया: द्विविधा:-पर्याप्ता: अपर्याप्ता:। इत्यादिसूत्रस्यार्थ: सरलं वर्तते।
एतावंत्येवेन्द्रियाणि इति कथमवगम्यते इति चेत् ?
न, आर्षात्तदवगते:।
किं तदार्षमिति चेत् ?
उच्यते-
एइंदियस्स फुसणं एक्कं चिय होइ सेसजीवाणं।
होंति कम-वड्ढियाइं जिब्भा-घाणक्खि-सोत्ताइं।।
पुनश्च-पंचिंदिया दुविहा-सण्णी असण्णी। पंचेन्द्रिया: द्विविधा:-संज्ञिनोऽसंज्ञिनश्च। समनस्का: संज्ञिन: अमनस्का: असंज्ञिन: इति। मनो द्विविधं-द्रव्यमनोभावमन: इति। तत्र पुद्गलविपाकिकर्मोदयापेक्षं द्रव्यमन:। वीर्यान्तरायनोइन्द्रियावरणक्षयोपशमापेक्षात्मनो विशुद्धिर्भावमन: इति।
इमे द्वीन्द्रियादयो जीवा: पर्याप्ता: अपर्याप्ताश्च भवन्ति।
तात्पर्यमेतत्-एकेन्द्रियजीवो बादर: सूक्ष्म:, द्वीन्द्रिय:, त्रीन्द्रिय:, चतुरिन्द्रिय:, पंचेन्द्रियजीवो द्विविध: संज्ञी असंज्ञी च। इमे सर्वे पर्याप्ता अपर्याप्ताश्चेति जीवसमासा: चतुर्दश भवन्ति।
एवं प्रथमस्थले एकेन्द्रियादिजीवानां भेदप्रभेदकथनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अत्र श्रीमहावीरजीअतिशयक्षेत्रे श्रीशान्तिवीरनगरे भगवत: श्रीशान्तिनाथस्य उत्तुंगप्रतिमाया: (२५ फुटोत्तुंगप्रतिमाया:) महामस्तकाभिषेककाले मन्दारसिद्धार्थवृक्षस्य निर्माणस्य घोषणा कृता मया। तस्य सिद्धार्थवृक्षस्य मूले चतुर्दिक्षु स्थापयिष्यमाणा: सिद्धप्रतिमा: मह्यं चतुर्विधसंघस्य सर्वभाक्तिकानां च सिद्धिं प्रयच्छन्तु, सर्वत्र क्षेमं सुभिक्षं शान्तिं च कुर्वन्तु इति भावयामहे।
सिप्रति इन्द्रियेषु गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

एइंदिया बीइंदिया तीइंदिया चउरिंदिया असण्णिपंचिंदिया एक्कम्मि चेव मिच्छाइट्ठिट्ठाणे।।३६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एइंदिया इत्यादि-एकेन्द्रिया: द्वीन्द्रिया: त्रीन्द्रिया: चतुरिन्द्रिया: असंज्ञिपंचेन्द्रिया: एकस्मिन् मिथ्यादृष्टिस्थाने चैव भवन्ति।
एकेन्द्रियेषु सासादनगुणस्थानमपि श्रूयते तत्कथं घटते ?
नैतत्, अस्मिन् षट्खण्डागमसूत्रे तस्य निषेधत्वात्।
विरुद्धार्थयोद्र्वयोरपि कथं सूत्रत्वं ?
नैतत्, द्वयो: एकतरस्य सूत्रत्वात्।
द्वयोर्मध्ये इदं सूत्रमिदं च न भवतीति कथं ज्ञायते ?
उपदेशमन्तरेण तदवगमाभावात् अत: द्वयोरपि संग्रह: कर्तव्य:।
द्वयो: संंग्रहंं कुर्वन् मिथ्यादृष्टि: भवति इति ?
तन्न, सूत्रोद्दिष्टमेवास्ति श्रद्दधानस्य संदेहाभावात्।


कहा भी है—

गाथार्थ—जिस प्रकार बाह्य प्राणों से जीव जीते हैं उसी प्रकार आभ्यन्तर प्राणों से भी जिस जीव में जीवितपने का व्यवहार हो उनको प्राण कहते हैं।

जिन आभ्यन्तर प्राणों से जीव जीते हैं अर्थात् जीते हुए व्यवहार के योग्य होते हैं। बाह्य द्रव्य प्राणों के समान भाव प्राणों से जीते हैं। इसमें यथा शब्द इव-समान अर्थ का बोध कराता है जिसका तात्पर्य है कि बाह्य द्रव्य प्राणों के समान यह जीव आभ्यन्तर भाव प्राणों से जीता है। वे प्राण आत्मा के धर्म होते हैं ऐसा निर्देश किया है। इस निर्वचन के द्वारा ही ‘प्राण’ शब्द का अर्थ ज्ञात हो जाता है अत: उसका पृथक् लक्षण नहीं बतालाया है।

पौद्गलिक द्रव्येन्द्रिय व्यापाररूप द्रव्यप्राण हैं। उन द्रव्यप्राणों के निमित्तभूत ज्ञानावरणीय और वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम आदि से विजृंभित-सहित चेतन व्यापाररूप भावप्राण होते हैं।

अथवा जीवन के कारणपने की अपेक्षा न करके इंद्रियादिरूप शक्ति की पूर्णतामात्र को पर्याप्ति कहते हैं और जो जीवन के कारण हैं उन्हें प्राण कहते हैं। इस प्रकार इन दोनों में भेद समझना चाहिए।

अब एकेन्द्रियों के भेद-प्रभेदों का कथन करने के बाद दो इंद्रिय आदिक जीवों के भेदों का कथन करने के लिए उत्तर सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

द्वीन्द्रिय जीव दो प्रकार के हैं-पर्याप्तक और अपर्याप्तक। त्रीन्द्रिय जीव दो प्रकार के हैं-पर्याप्तक और अपर्याप्तक। चतुरिन्द्रिय जीव दो प्रकार के हैं-पर्याप्तक और अपर्याप्तक। पंचेन्द्रिय जीव दो प्रकार के हैं-संज्ञी और असंज्ञी। संज्ञी जीव दो प्रकार के हैं-पर्याप्तक और अपर्याप्तक। असंज्ञी जीव दो प्रकार के हैं-पर्याप्तक और अपर्याप्तक।।३५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—द्वीन्द्रिय जीव के दो भेद हैं—पर्याप्तक और अपर्याप्तक। इत्यादि इस सूत्र का अर्थ सरल है।

शंका—इस जीव के इतनी ही इंद्रियाँ होती हैं, यह कैसे जाना ?

समाधानऐसा नहीं कहना, क्योंकि आर्ष से इस बात को जाना गया है।

वह आर्ष आगम कौन-सा है ? ऐसा पूछने पर कहते हैं—

गाथार्थ—

एकेन्द्रिय जीव के एक स्पर्शन इंद्रिय ही होती है और शेष जीवों के क्रम से बढ़ती हुई जिह्वा, घ्राण, अक्षि और श्रोत्र इंद्रियाँ होती हैं। पुन: पंञ्चेन्द्रिय जीव दो प्रकार के होते हैं—संज्ञी और असंज्ञी। मन सहित जीव संज्ञी कहलाते हैं और मनरहित जीव असंज्ञी कहे जाते हैं। मन के दो भेद हैं—द्रव्यमन और भावमन। उनमें से पुद्गलविपाकी कर्मोदय की अपेक्षा द्रव्यमन होता है और वीर्यान्तराय तथा नोइंद्रियावरण कर्म के क्षयोपशम की अपेक्षा आत्मा की विशुाद्ध का नाम भावमन है ऐसा अभिप्राय हुआ।

ये द्वीन्द्रिय आदि सभी जीव पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनों प्रकार के होते हैं।

तात्पर्य यह है कि एकेन्द्रिय जीव बादर और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार के हैं पुन: द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, संज्ञीपंचेन्द्रिय और असंज्ञीपंचेन्द्रिय ये सब सात भेद हुए, इन सातों को पर्याप्तक और अपर्याप्तक से गुणा करने पर चौदह जीवसमास होते हैंं।

इस प्रकार प्रथमस्थल में एकेन्द्रियादि जीवों के भेद-प्रभेद कथन की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुए।

यहाँ श्रीमहावीरजी अतिशयक्षेत्र में श्रीशांतिवीरनगर में भगवान शांतिनाथ की पच्चीस फुट उत्तुंग प्रतिमा के महामस्तकाभिषेक के अवसर पर मैंने वहाँ मंदारसिद्धार्थवृक्ष के निर्माण की घोषणा की। उस सिद्धार्थवृक्ष के मूल के चारों दिशाओं में स्थापित होने वाली सिद्धप्रतिमाएँ मुझे, चतुर्विध संघ को तथा समस्त भाक्तिकों को सिद्धि प्रदान करें एवं सर्वत्र क्षेम, सुभिक्ष और शांति की स्थापना करें ऐसी हमारी भावना है। अब इंद्रियों में गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव मिथ्यादृष्टि नामक प्रथम गुणस्थान में ही होते हैं।।३६।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय एवं असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव एकमात्र मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में ही होते हैं।

शंका—एकेन्द्रिय जीवों में सासादनगुणस्थान भी सुना जाता है वह कैसे घटित होता है ?

समाधान—ऐसा नहीं कहना क्योंकि इस षट्खंडागम सूत्र गंथ में उसका निषेध है अर्थात् इसमें एकेन्द्रिय जीव के सासादन गुणस्थान नहीं माना है।

शंका—तब तो दो विरोधी अर्थ को कहने वाले ग्रंथों को सूत्रपना कैसे प्राप्त होगा ?

समाधान—ऐसा नहीं है, दोनों में से कोई एक में ही सूत्रपना सिद्ध होगा क्योंकि कोई एक कथन ही सत्य हो सकता है।

शंका—दो कथन में से ‘यह सूत्र है’ और ‘यह सूत्र नहीं है’ ऐसा कैसे जाना जावे ?

समाधान—सर्वज्ञदेव के उपदेश के बिना इसकी सत्यता का ज्ञान नहीं हो सकता है अत: दोनों कथनों का संग्रह करना चाहिए।

शंका—दोनों का संग्रह करके तो मिथ्यादृष्टि हो जाएंगे ?

समाधान—ऐसा नहीं है क्योंकि संग्रह करने वाले के ‘‘यह सूत्र कथित ही है’’ इस प्रकार का श्रद्धान पाया जाता है अतएव उसके संदेह नहीं हो सकता है।

उक्तं च-

सुत्तादो तं सम्मं दरिसिज्जंत्तं जदा ण सद्दहदि।

सो चेय हवदि मिच्छाइट्ठी हु तदो पहुडि जीवो।।
तथा असदर्थश्रद्धान: कश्चित् आज्ञासम्यग्दृष्टिर्जीवोऽन्यै: कैश्चित्कुशलाचार्यै: गणधरादिकथितसूत्रं दर्शयित्वा सम्यक् प्ररूप्यते तथापि यद् दुराग्रहनिमित्तेन न श्रद्दधाति तदा प्रभृति स जीवो मिथ्यादृष्टिर्भवति, सूत्राश्रद्धानेन आज्ञातिक्रमस्य सुप्रसिद्धत्वादेव कारणात्।
तात्पर्यमेतत्-कषायप्राभृतकारेण एकेन्द्रियादि असंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यंतेषु जीवेषु अपर्याप्तावस्थायां द्वितीयगुणस्थानं मन्यते न च षट्खंडागमसूत्रकाराभ्यामिति। तथापि द्वयोरपि ग्रन्थयो: सूत्रत्वं न विरुध्यते, संप्रतिकाले केवलिश्रुतकेवलिभगवतां अभावात् अत: द्वयोग्र्रन्थयोरपि श्रद्धानं कर्तव्यम् भवद्भि: भव्योत्तमैरिति।
एतस्मात् सूत्रात् अर्थापत्त्या एतज्ज्ञायते यत् संज्ञिपंचेन्द्रियेषु चतुर्दशगुणस्थानानि भवन्तीति चापि ज्ञातव्यम्।
अधुना पंचेन्द्रियजीवेषु गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

पंचिंदिया असण्णिपंचिंदिय-पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति।।३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचिंदिया असण्णिपंचिंदियपहुडि जाव-पंचेन्द्रिया जीव: असंज्ञिपंचेन्द्रियजीवान् आदौ कृत्वा यावत् अजोगिकेवलि त्ति-अयोगिकेवलिपर्यन्ता: भवन्ति इति। असंज्ञिपंचेन्द्रियादि-अयोगिकेवलिपर्यंता: सर्वे जीवा पंचेन्द्रिया: एव इति तात्पर्यम्।
अत्र केवलिभगवतां भावेन्द्रियापेक्षया एव पंचेन्द्रियत्वाभ्युपगमात्। किं च ‘‘केवलिनां निर्मूलतो विनष्टान्तरंगेन्द्रियाणां प्रहतबाह्येन्द्रियव्यापाराणां भावेंद्रियजनितद्रव्येन्द्रियसत्त्वापेक्षया पंचेंद्रियप्रतिपादनात्, भूतपूर्वगतिन्यायसमाश्रयणाद्वा।’’
कश्चिदाह-सर्वत्र निश्चयनयमाश्रित्य प्रतिपाद्य अत्र व्यवहारनय: किमित्यवलम्ब्यते इति चेत् ?
नैष दोष:, मंदमेधसामनुग्रहार्थत्वात्। अथवा एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियजातिनामकर्मोदयेभ्य: एकेन्द्रियादि-पंचेन्द्रिया जीवा भवन्ति। केवलिनामपर्याप्तजीवानां च पंचेन्द्रियनामकर्मोदयो वर्तते इति ज्ञातव्यं भवति।
एवं द्वितीयस्थले एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियजीवानां गुणस्थानकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
अधुना अतीन्द्रियजीवानामस्तित्वप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
तेण परमणिंदिया इदि।।३८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तेण परं-तेन जातिनामकर्मोदयेन परं ऊध्र्वं अणिंदिया-अनिन्द्रिया: एकेन्द्रियादिजात्यतीता: सिद्धात्मान: सन्ति सकलकर्मकलंकातीतत्वात्। सिद्धा: चरमशरीरात् किंचिदूना भवन्ति। ‘‘तत्किञ्चिदूनत्वं शरीरांगोपांगजनितनासिकादिच्छिद्राणामपूर्णत्वे सति यस्मिन्नेव क्षणे सयोगिचरमसमये त्रिंशत्प्रकृति-उदयविच्छेदमध्ये शरीरांगोपांगनामविच्छेदो जातस्तस्मिन्नेव क्षणे जातमिति ज्ञातव्यं।’’ अथवा पुरुषाकार:-निश्चयनयेनातीन्द्रियामूत्र्तपरमचिदुच्छलन-निर्भरशुद्धस्वभावेन निराकारोऽपि व्यवहारेण भूतपूर्वनयेन किञ्चिदूनचरमशरीराकारेण गतसिक्थमूषागर्भाकारवत् छायाप्रतिमावद्वा इति।’’
तात्पर्यमेतत्-मतिश्रुतयो: क्षयोपशमविशेषेण सिद्धान्तग्रन्थानभ्यस्य स्वसंवेदनज्ञानबलेन स्वशुद्धात्मानं ध्यात्वा अनिन्द्रियं केवलज्ञानं समुत्पाद्य लोकालोकौ ज्ञातव्यौ पूर्णज्ञानकिरणै: अस्माभि:, यावदेतादृशी अवस्था न भवेत् तावत् ज्ञानाभ्यासोऽभीक्ष्णं कर्तव्य: इति।
स्वकर्मक्षयत: शांतिं, लब्ध्वा शान्तिकरोऽभवत्।
शान्तिनाथ! नमस्तुभ्यं, मन:क्लेशप्रशान्तये।।।।
एवं तृतीयस्थले अतीन्द्रियाणां कथनत्वेन एकं सूत्रं गतं।
इत्थं द्रव्येन्द्रियभावेन्द्रियसहितसंसारिजीवानां अनिन्द्रियाणां सिद्धानां च स्वरूपप्रतिपादनपरत्वेन द्वितीयाधिकारे षट्सूत्राणि गतानि।
इति षट्खण्डागम-प्रथमखंडे गणिनीज्ञानमतीकृत-
सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम-
द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

कहा भी है—

गाथार्थ—सूत्रादि को दिखाने पर भी यदि कोई जीव उसका श्रद्धान नहीं करता है तो जीव उसी समय से मिथ्यादृष्टि हो जाता है।

तथा असत्—गलत अर्थ का श्रद्धान करने वाला कोई आज्ञा सम्यग्दृष्टि जीव अन्य किन्हीं कुशल—ज्ञानी आचार्यों के द्वारा, गणधरादि के द्वारा कथित सूत्र को दिखाकर उसका सम्यक् प्ररूपण किया जाता है, फिर भी जो दुराग्रह के निमित्त से उस पर श्रद्धान नहीं करता है तब वह जीव उसी समय से मिथ्यादृष्टि हो जाता है क्योंकि सूत्र पर अश्रद्धान करने से सर्वज्ञदेव की आज्ञा का उल्लंघन करने वाला वह प्रसिद्ध होता है।

तात्पर्य यह है कि कषायप्राभृत ग्रंथ के रचयिता श्री गुणधर आचार्य ने एकेन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्यन्त जीवों में अपर्याप्त अवस्था में द्वितीय सासादन गुणस्थान माना है और षट्खंडागम सूत्र ग्रंथ के रचयिता श्री पुष्पदंत-भूतबली आचार्य ने इसे नहीं माना है। फिर भी दोनों के गं्रथों में भी सूत्रपने का विरोध नहीं है। आज वर्तमान काल में केवली-श्रुतकेवली भगवान् का अभाव है अत: आप भव्योत्तमों को दोनों ही ग्रंथों का श्रद्धान करना चाहिए।

इस सूत्र से अर्थापत्ति के द्वारा यह ज्ञात होता है कि संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों में चौदह गुणस्थान होते हैं यह भी जानना चाहिए। अब पंचेन्द्रिय जीवों में गुणस्थानव्यवस्था बतलाने हेतु सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

असंज्ञी पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक पंचेन्द्रिय जीव होते हैं।।३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—पंचेन्द्रिय जीव से यहाँ पर असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों को आदि में करके अयोगिकेवली पर्यन्त जीव होते हैं, ऐसा कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि असंज्ञी पंचेन्द्रिय से लेकर अयोगिकेवली पर्यन्त सभी जीव पंचेन्द्रिय ही होते हैं।

यहाँ केवली भगवन्तों के भावेन्द्रिय की अपेक्षा से ही पंचेन्द्रियपना माना गया है क्योंकि केवलियों के यद्यपि भावेन्द्रियाँ समूल नष्ट हो गई हैं और बाह्य इन्द्रियों का व्यापार भी बंद हो गया है तो भी भावेन्द्रियों के निमित्त से उत्पन्न हुई द्रव्येन्द्रियों के सद्भाव की अपेक्षा उन्हें पंचेन्द्रिय कहा गया है अथवा भूतपूर्व का ज्ञान कराने वाले न्याय के आश्रय से उन्हें पंचेन्द्रिय कहा है। अर्थात् भावेन्द्रियों के निमित्त से ही द्रव्येन्द्रियाँ बनी हैं फिर भी घातिकर्म के अभाव से भाव इन्द्रियों का तो अभाव हो गया किन्तु द्रव्येन्द्रियों का अस्तित्व केवली भगवान् के मौजूद है ऐसा समझना।

शंका—सब जगह निश्चयनय का आश्रय लेकर वस्तु स्वरूप का प्रतिपादन करने के पश्चात् फिर यहाँ पर व्यवहारनय का आलम्बन क्यों लिया जा रहा है ?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि मंदबुद्धि शिष्यों के अनुग्रह के लिए उक्त प्रकार से कथन किया है। अथवा एकेन्द्रिय आदि पंचेन्द्रियजाति नामकर्मोदय से एकेन्द्रियादि से लेकर पंचेन्द्रिय तक जीव होते हैं। केवली और अपर्याप्त जीवों के भी पंचेन्द्रियजाति नामकर्म का उदय होता है ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में एकेन्द्रिय जीवों से लेकर पंचेन्द्रिय तक जीवों के गुणस्थान कथन की मुख्यता से दो सूत्र पूर्ण हुए। अब अतीन्द्रिय जीवों के अस्तित्व का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

उन एकेन्द्रिय आदि जीवों से परे अनिन्द्रिय जीव होते हैं।।३८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—उन एकेन्द्रिय आदि जाति नामकर्म के उदय से परे अनिन्द्रिय—इन्द्रियादि से रहित सिद्धात्मा होते हैं क्योंकि उनके सम्पूर्ण कर्मकलंक-द्रव्यकर्म और भावकर्म नहीं पाए जाते हैं। सिद्ध जीव अंतिम शरीर से किंचित् न्यून होते हैं। वह जो उनके किंचित् न्यूनपना कहा है सो शरीर आंगोपांग से उत्पन्न नासिका आदि छिद्रों के अपूर्ण (खाली स्थान) होने से जिस समय सयोगी गुणस्थान के अन्त समय में तीस प्रकृतियों के उदय का नाश हुआ उनमें शरीर आंगोपांग का भी विच्छेद हो गया अत: उसी समय किंचित् न्यूनता हुई है, ऐसा जानना चाहिए।

अथवा वे सिद्ध पुरुषाकार होते हैं—निश्चयनय की दृष्टि से इन्द्रियागोचर, अमूर्तिक, परमचैतन्य से भरे हुए शुद्ध स्वभाव की अपेक्षा आकार रहित हैं फिर भी व्यवहार से भूतपूर्व नय की अपेक्षा अंतिम शरीर से कुछ कम आकार वाले होने से मोमरहित मूस के बीच के आकार की तरह अथवा छाया के प्रतिबिम्ब के समान हैं, ऐसा जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि मति श्रुत ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशमविशेष से सिद्धान्त ग्रंथों का अभ्यास करके, स्वसंवेदनज्ञान के बल से निज शुद्धात्मा का ध्यान करके अनिन्द्रिय केवलज्ञान को उत्पन्न करके हमें भी पूर्ण ज्ञान किरणों के द्वारा लोकालोक को जानना चाहिए और जब तक ऐसी अवस्था प्राप्त नहीं होती है तब तक अभीक्ष्ण ज्ञानाभ्यास करना चाहिए।

श्लोकार्थ—

जिन्होंने अपने कर्मों के क्षय से परमशांति को प्राप्त करके जगत् में शान्ति को प्रदान किया है उन श्रीशांतिनाथ भगवान को मानसिक क्लेश की शांति हेतु मेरा नमस्कार है।

इस प्रकार तृतीयस्थल में अतीन्द्रिय जीवों के कथनरूप से एक सूत्र पूर्ण हुआ। इस तरह द्रव्येन्द्रिय-भावेन्द्रिय सहित संसारी जीवों के एवं अनिन्द्रिय सिद्धों के स्वरूप के प्रतिपादन की मुख्यता से द्वितीय अधिकार में छह सूत्र पूर्ण हुए। इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में गणिनी श्री ज्ञानमती-कृत सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।


अथ कायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन अष्टसूत्रै: कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले त्रसस्थावरकायानां प्रतिपादनत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले स्थावरत्रसेषु गुणस्थानप्रतिपादनत्वेन ‘‘पुढवि’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं इति समुदायपातनिका।


संप्रति कायमार्गणाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीपुष्पदंतभट्टारकेण-कायाणुवादेण अत्थि पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणप्फइकाइया तसकाइया अकाइया चेदि।।३९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कायाणुवादेण-कायानामनुवाद: कायानुवाद: तेन कायानुवादेन। अत्थि पुढविकाइया-पृथिवी एव काय: पृथिवीकाय:, स एषामस्तीति पृथिवीकायिका:।
कश्चिदाह-कार्मणशरीरमात्रस्थितजीवानां पृथिवीकायत्वाभाव: स्यात् ?
तस्य समाधानं उच्यते-नैतत्, भाविनि भूतवदुपचारतस्तेषामपि तद्व्यपदेशोपपत्ते:। अथवा पृथिवी-कायिकनामकर्मोदयवशीकृता: पृथिवीकायिका: जीवा: इति। एवमप्कायिकादीनामपि वाच्यम्। पृथिवीकायिकादि-जीवानां कार्यदर्शनात्तेषां अस्तित्वसिद्धे:। एते पञ्चापि स्थावरा:, स्थावरनामकर्मोदयजनितविशेषत्वात्।
कश्चिदाह-स्थानशीला: स्थावरा: भवन्तीति चेत् ?
तस्य समाधानं-नैतत् वक्तव्यं, वायुतेजोऽम्भसां देशान्तरप्राप्तिदर्शनाद् अस्थावरत्वप्रसंगात्। अत: स्थानशीला: स्थावरा इति व्युत्पत्तिमात्रमेव, नार्थ: प्राधान्येनाश्रीयते गोशब्दस्य इव।
त्रसनामकर्मोदयापादितवृत्तयस्त्रसा:, द्वीन्द्रियादयो जीवा:।
त्रसेरुद्वेजनक्रियस्य त्रस्यन्तीति त्रसा इति चेत् ?
न, गर्भाण्डजमूच्र्छितसुषुप्तेषु तदभावात् अत्रसत्वप्रसंगात्। ततो न चलनाचलनापेक्षं त्रसस्थावरत्वं।
आत्मप्रवृत्त्युपचितपुद्गलपिंड: काय:, इत्यनेनेदं व्याख्यानं विरुद्ध्यते इति चेत् ? न, जीवविपाकित्रसपृथिवी-कायिकादिकर्मोदयसहकार्यौदारिकशरीरोदयजनितशरीरस्यापि उपचारतस्तत्कायत्वव्यपदेशार्हत्वाविरोधात्।
अकायिका: के इति चेत् ?
उच्यते, अकाइया-सिद्धा:।
उक्तं च - जह कंचणमग्गिगयं मुंचइ किट्टेण कालियाए य।
तह कायबंधमुक्का अकाइया ज्झाणजोएण।।
यथा मलिनं कांचनं अग्निगतं-प्रज्वलज्ज्वलनदग्धं, अंतरंगसूतादिभावनासंस्कृतं तत् किट्टेन-बहिर्मलेन वैवण्र्यरूपान्तरंगमलेन च मुच्यते, जाज्वलत्षोडशवर्णलक्षणस्वरूपोपलब्धिं प्राप्य सर्वजनै: श्लाघ्यते। तथा ध्यानयोगेन-धम्र्यशुक्लध्यानभावनया संस्कृतबहिरंगतपोऽग्निविशेषेण आसन्नभव्यजीवा अपि औदारिकतैजसकायाभ्यां कार्मणशरीरसंश्लेषरूपबंधेन च मुक्ता भूत्वा अकायिका: अशरीरा: सिद्धपरमेष्ठिन: अनंतज्ञानादिस्वरूपोपलब्धिं प्राप्य लोकाग्रे सर्वलोकेन स्तुतिप्रणामार्चनादिभि: श्लाघ्यन्ते इति।

अथ कायमार्गणाधिकार

अब दो स्थल से आठ सूत्रों के द्वारा कायमार्गणा नामका तृतीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में त्रस-स्थावरकायिक जीवों के प्रतिपादन की मुख्यता से ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में स्थावर एवं त्रस जीवों में गुणस्थान प्रतिपादन की मुख्यता से ‘‘पुढवि’’ इत्यादि चार सूत्र हैं, ऐसी यह समुदायपातनिका हुई। अब कार्यमार्गणा का प्रतिपादन करने हेतु श्री पुष्पदन्त भट्टारक सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

कायानुवाद की अपेक्षा पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, त्रसकायिक और कायरहित जीव हैं।।३९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—कायों के अनुवाद को कायानुवाद कहते हैं, उस कायानुवाद की अपेक्षा पृथिवी ही है काया जिनकी वे पृथिवीकायिक जीव होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि— मात्र कार्मण शरीर में स्थित उन एकेन्द्रिय जीवों में पृथिवीकायपना नहीं बन सकता है ?

इसका समाधान करते हैं कि— ऐसा नहीं है क्योंकि भावी-भविष्य में होने वाले कार्य में भी भूत के समान उपचार किया जाता है अर्थात् जो कार्य अभी नहीं हुआ है उसमें यह हो चुका ऐसा उपचार कर लिया जाता है। उसी प्रकार कार्मणकाययोग में स्थित पृथिवीकायिक जीवों के भी पृथिवीकायिक यह संज्ञा बन जाती है। अथवा जो पृथिवीकायिक नामकर्म के उदय के वशवर्ती हैं उन्हें पृथिवीकायिक कहते हैं। इसी प्रकार जलकायिक आदि शब्दों की भी निरुक्ति कर लेनी चाहिए। पृथिवीकायिक आदि जीवों के कार्यों को देखकर उनके अस्तित्व की सिद्धि हो जाती है। ये पाँचों ही स्थावर कहलाते हैं क्योंकि स्थावर नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई विशेषता के कारण ये एकेन्द्रिय जीव स्थावर कहलाते हैं।

शंका—स्थानशील अर्थात् ठहरना ही जिनका स्वभाव हो उन्हें स्थावर कहते हैं ऐसी व्याख्या के अनुसार स्थावरों का स्वरूप क्यों नहीं कहा ?

समाधान—ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि वायुकायिक, अग्निकायिक और जलकायिक जीवों की एक देश से दूसरे देश में गति देखी जाने से उनमें अस्थावरपने का प्रसंग प्राप्त हो जावेगा।

अत: स्थानशील जीव स्थावर होते हैं यह निरुक्ति व्युत्पत्तिमात्र ही है, इसमें गो शब्द की व्युत्पत्ति के समान प्रधानता से अर्थ का ग्रहण नहीं है। त्रस नामकर्म के उदय से जिन्होंने त्रसपर्याय प्राप्त कर ली है वे द्वीन्द्रिय आदि जीव त्रस कहलाते हैं।

शंका—‘त्रसि उद्वेगे’ इस धातु से त्रस शब्द की सिद्धि हुई है जिसका अर्थ होता है कि जो उद्विग्न अर्थात् भयभीत होकर भागते हैं वे त्रस हैं ?

समाधान—नहीं, क्योंकि गर्भ में स्थित, अण्डे में बंद, मूच्र्छित और सोते हुए जीवों में उक्त लक्षण घटित नहीं होने से उन्हें त्रसरहितपने का प्रसंग आ जाएगा। इसलिए चलने और ठहरने की अपेक्षा त्रस और स्थावरपना नहीं समझना चाहिए।

शंका—आत्मप्रवृत्ति अर्थात् योग से संचित हुए पुद्गलपिण्ड को काय कहते हैं इस व्याख्यान से पूर्वोक्त व्याख्यान विरोध को प्राप्त होता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि जिसमें जीवविपाकी त्रसनामकर्म और पृथिवीकायिक आदि नामकर्म के उदय की सहकारिता है ऐसे औदारिक शरीर नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए शरीर को उपचार से कायपना बन जाता है, इसमें कोई विरोध नहीं है।

अकायिक जीव कौन से हैं ? ऐसा पूछने पर कहते हैं कि— सिद्ध जीव अकायिक होेते हैं। कहा भी है—

गाथार्थ—

जैसे अग्नि को प्राप्त हुआ सोना किट्ट-कालिमा से रहित हो जाता है, वैसे ही ध्यान के योग से यह जीव काय और कर्मबन्ध से मुक्त होकर अकायिक—कायरहित हो जाता है।

जिस प्रकार खान से निकला हुआ मलिन सोना अग्नि की ज्वाला में तपकर तथा अंतरंग में पारा आदि भावना से संस्कारित होने पर बाह्यमल और कालिमारूप अंतरंग मल से रहित हो जाता है और चमकते हुए सोलहतावरूप स्वरूप को प्राप्त करके सर्वजनों से प्रशंसित होता है। उसी प्रकार ध्यान योगरूप धर्म और शुक्ल भावना के द्वारा संस्कृत बहिरंग तपरूप आग्नविशेष से निकट भव्यजीव भी औदारिक और तैजस तथा कार्मण शरीर के साथ संश्लेषरूप बंध से मुक्त होकर अशरीर सिद्धपरेमष्ठी अनंतज्ञानादि स्वरूप को प्राप्त करके लोक के अग्रभाग में स्थित होकर सब लोगों के द्वारा स्तुति, प्रमाण, पूजा आदि से प्रशंसित होते हैं।

संप्रति पृथिवीकायिकादीनां भेदप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

पुढविकाइया दुविहा-बादरा सुहुमा। बादरा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। सुहुमा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। आउकाइया दुविहा-बादरा सुहुमा। बादरा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। सुहुमा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। तेउकाइया दुविहा-बादरा सुहुमा। बादरा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। सुहुमा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। वाउकाइया दुविहा-बादरा सुहुमा। बादरा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। सुहुमा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता चेदि।।४०।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतत्सूत्रं सुगमं वर्तते। बादरनामकर्मोदयोपजनितविशेषा: बादरा:, सूक्ष्मनामकर्मोदयोपजनितविशेषा: सूक्ष्मा:।
अनयो: को विशेषश्चेत् ?

सप्रतिघाताप्रतिघातरूप:। तथा च पर्याप्तनामकर्मोदयजनितशक्त्याविर्भावितवृत्तय: पर्याप्ता:। अपर्याप्तनामकर्मोदयजनितशक्त्याविर्भावितवृत्तय: अपर्याप्ता:। पृथिवीजलाग्निवायुकायिकजीवानां बादरसूक्ष्मा-पेक्षया द्वैविध्यात् इमे अष्टौ भवन्ति, पुनश्च तेषां पर्याप्तापर्याप्तभेदै: षोडशविधा भवन्तीति ज्ञातव्यम्।
के ते पृथिकाकायादय: इति चेत् ?
उच्यते-
पुढवी य सक्करा बालुअ उवले सिलादि छत्तीसा।
पुढवीमया हु जीवा णिद्दिट्ठा जिणवरिंदेहि।।
ओसो हिमो य धूमरि हरदणु सुद्धोदवो घणोदो य।
एदे दु आउकाया जीवा जिणसासणुद्दिट्ठा।।
इंगालजालअच्ची मुम्मुर-सुद्धागणी तहा अगणी।
अण्णे वि एवमाई तेउक्काया समुद्दिट्ठा।।
वाउब्भामो उक्कलि-मंडलि-गुंजा महा घणो य तणू।
एदे दु वाउकाया जीवा जिण-इंद-णिद्दिट्ठा।।

पृथिवी-मृद्रूपा, शर्करा-परुषरूपा, बालुका-रुक्षागंगाद्युद्भवा, उपलानि, शिला-बृहत्पाषाणरूपा इत्यादय: षट्त्रिंशद् भेदा: पृथिवीमया जीवा: जिनवरेन्द्रै: निर्दिष्टा: भवन्ति। इत्थं षट्त्रिंशद्भेदेषु पृथिवीविकारेषु पृथिव्यष्टकमेरु-कुलपर्वत-द्वीप-वेदिका-विमान-भवन-प्रतिमा-तोरण-स्तूप-चैत्यवृक्ष-जम्बू-शाल्मली-द्रुमेष्वाकार-मानुषोत्तर-विजयार्ध-कांचनगिरि-दधिमुखाञ्जन-रतिकर-वृषभगिरि-सामान्यपर्वत-स्वयंभूनग-वरेन्द्रवक्षार-रुचक-कुंडलवर-दंष्ट्रापर्वत-रत्नाकरादयोऽन्तर्भवन्तीति।

ओसो-अवश्यायजलं रात्रिपश्चिमप्रहरे निरभ्रावकाशात् पतितसूक्ष्मोदकं, हिमो-हिमं प्रालेयं जलबंधकारणं, धूमरि-महिका धूमाकारजलं कुहडरूपं, हरदणु-हरत् स्थूलविंदुजलं अणुरूपं सूक्ष्मविंदुजलं, सुद्धोदवो-शुद्धजलं चन्द्रकांतजलं, उदकं सामान्यजलं निर्झराद्युद्भवं, घणोदवो-घनोदकं समुद्रह्रदघनवाताद्युद्भवं घनाकारं अथवा महासमुद्राद्युद्भवं, मेघाद्युद्भवं घनाकारं एवमाद्यप्कायिका जीवा: जिनशासनोद्दिष्टा: सन्ति। तथा च सरित्सागर-ह्रद-कूप-निर्झर-घनोद्भवाकाशज-हिमरूप-धूमरूप-भूमिउद्भव-चंद्रकांतज-घनवाताद्यप्कायिका: सर्वे अत्रैवान्तर्भवन्तीति।

इंगाल-अंगाराणि ज्वलितनिर्धूमकाष्ठादीनि, जाल-ज्वाला, अच्ची-अर्चि: प्रदीपज्वालाद्यग्रं, मुम्मुर-मुर्मुरं कारीषाग्नि:, सुद्धागणी-शुद्धाग्नि: वङ्कााग्निर्विद्युत्सूर्यकांताद्युद्भव:, तहा अगणी-तथा सामान्याग्नि-र्धूमादिसहित:। वाडवाग्नि-नंदीश्वरधूमकुंडिका-मुकुटानलादयोऽत्रैवान्तर्भवन्तीति।
वाउब्भामो-वात: सामान्यरूप: उद्भ्रमो भ्रमन्नूध्र्वं गच्छति, उक्कलि-उत्कलिरूप:, मंडलि-पृथिवीं लग्नो भ्रमन् गच्छति, गुंजा-गुंजन् गच्छति, महा-महावातो वृक्षादिभंगहेतु:, घणो य तणू-घनोदधि: घननिलयस्तनुवात:, व्यजनादिकृतो वा तनुवातो लोकप्रच्छादक:। उदरस्थपंचवात-विमानाधार-भवन-स्थानादिवाता अत्रैवान्तर्भवन्तीति।

स्थावरकर्मण: किं कार्यमिति चेत् ?
एकस्थानावस्थापकत्वं।
तेजोवाय्वप्कायिकानां चलनात्मकानां तथा सति अस्थावरत्वं स्यादिति चेत् ? न, स्थास्नूनां प्रयोगतश्चलच्छिन्नपर्णानामिव गतिपर्यायपरिणतसमीरणाव्यतिरिक्तशरीरत्वतस्तेषां गमनाविरोधात्।
एतान् सर्वान् पृथिवीजलाग्निवायुकायिकजीवान् ज्ञात्वा अहिंसामहाव्रतपालनेच्छया भवद्भि: रक्षा कर्तव्या इति तात्पर्यमेतत्।


अब पृथिवीकायिक आदि जीवों के भेदों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ— पृथिवीकायिक जीव दो प्रकार के हैं—बादर और सूक्ष्म। बादर पृथिवीकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। सूक्ष्म पृथिवीकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। जलकायिक जीव दो प्रकार के हैं—बादर और सूक्ष्म। बादर जलकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। सूक्ष्म जलकायिक जीव दो प्रकार के हैं—

पर्याप्त और अपर्याप्त। अग्निकायिक जीव दो प्रकार के हैं—बादर और सूक्ष्म। बादर अग्निकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। वायुकायिक जीव दो प्रकार के हैं—बादर और सूक्ष्म। बादर वायुकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। सूक्ष्म वायुकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त।।४०।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका—

इस सूत्र का अर्थ सुगम है। जिनमें बादर नामकर्म के उदय से विशेषता उत्पन्न हो गई है उन्हें बादर कहते हैं तथा जिनमें सूक्ष्म नामकर्म के उदय से विशेषता उत्पन्न हो गई है उन्हें सूक्ष्म कहते हैं।

शंका—बादर और सूक्ष्म इन दोनों में क्या विशेषता है ?

समाधान—बादर जीव प्रतिघात सहित होते हैं और सूक्ष्म जीव प्रतिघात रहित होते हैं। यही इन दोनों में अंतर है। पर्याप्त नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई शक्ति से जिन जीवों की अपने-अपने योग्य पर्याप्तियों के पूर्ण करने रूप अवस्था विशेष प्रगट हो गई है उन्हें पर्याप्त कहते हैं तथा अपर्याप्त नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुई शक्ति से जिन जीवों की शरीर पर्याप्ति पूर्ण न करके मरनेरूप अवस्था विशेष उत्पन्न हो जाती है उन्हें अपर्याप्त कहते हैं। पृथिवी, जल, अग्नि, वायुकायिक जीवों के बादर-सूक्ष्म की अपेक्षा दो भेद होते हैं इस प्रकार ये आठ हो जाते हैं और उनके पर्याप्त-अपर्याप्त के भेद से सोलह भेद जानना चाहिए।

वे पृथिवीकायिक आदि जीव कौन से हैं ? सो कहते हैं—

गाथार्थ—

जिनेन्द्र भगवान् ने पृथिवी, शर्करा, बालुका, उपल और शिला आदि के भेद से पृथिवीरूप छत्तीस प्रकार के जीव कहे हैं। ओस, बर्फ, कुहरा, स्थूलबिन्दुरूप जल, सूक्ष्मबिन्दुरूपजल, चंद्रकांत मणि से उत्पन्न हुआ शुद्ध जल, झरना आदि से उत्पन्न हुआ जल, समुद्र, तालाब और घनवात आदि से उत्पन्न हुआ घनोदक अथवा हरदणु अर्थात् तालाब और समुद्र आदि से उत्पन्न हुआ जल तथा घनोदक अर्थात् मेघ आदि से उत्पन्न हुआ जल ये सब जिनशासन में जलकायिक जीव कहे गये हैं।

अंगार, ज्वाला, अर्चि, मुर्मुर, शुद्धाग्नि तथा सामान्य अग्नि ये सब अग्निकायिक जीव कहे गये हैं। सामान्य वायु, उद्भ्राम वायु (चक्रवात), उत्कलि वायु, मण्डलि वायु, गुंजावायु, महावायु, घनवात और तनुवात ये सब वायुकायिक जीव जिनेंद्र भगवान् ने कहे हैं।

मिट्टीरूप पृथिवी, कठोर या तीक्ष्णरूप शर्करा, गंगादि नदियों में उत्पन्न होने वाली रूक्षबालुका, पत्थर, वृहत्पाषाणरूप शिला आदि छत्तीस भेदरूप पृथिवीकायिक जीव जिनेन्द्र भगवान् ने कहे हैं। इन छत्तीस भेद वाले पृथिवी विकारों में पृथिवीअष्टक (सात नरक पृथिवी एवं एक ईषत्प्राग्भार), मेरु, कुलपर्वत, द्वीप, वेदिका, विमान, भवन, प्रतिमा, तोरण, स्तूप, चैत्यवृक्ष, जम्बू-शाल्मलि वृक्ष, इष्वाकारपर्वत, मानुषोत्तर, विजयार्ध, कांचनगिरि, दधिमुख, अञ्जन, रतिकर, वृषभगिरि, सामान्यपर्वत, स्वयंभूरमण पर्वत, वक्षार, रुचक, कुंडलवर, दंष्ट्रापर्वत (गजदंत) और रत्नाकर आदि अंतर्गर्भित हो जाते हैं।

रात्रि में पश्चिम प्रहर में मेघ रहित आकाश से जो सूक्ष्म जलकण गिरते हैं उसे ओस कहते हैं। जो पानी घन होकर नीचे ओले के रूप में हो जाता है वह हिम है, इसे ही बर्फ कहते हैं। धूमाकार जल जो कि कुहरा कहलाता है इसे ही महिका कहते हैं। स्थूल-बिन्दुरूप जल हरत् नामवाला है। सूूक्ष्म बिन्दुरूप जल अणुसंज्ञक है। चंद्रकांत से उत्पन्न हुआ जल शुद्धजल है। झरना आदि से उत्पन्न हुआ सामान्यजल उदक कहलाता है। समुद्र, सरोवर, घनवात आदि से उत्पन्न हुआ जल जो कि घनाकार है वह घनोदक कहलाता है अथवा महासरोवर, समुद्र आदि से उत्पन्न हुआ जल हरदणु है और मेघ आदि से उत्पन्न हुआ घनाकार जल घनोदक है इत्यादि प्रकार के जलकायिक जीव जिनशासन में कहे गये हैं।

तथा नदी, सागर, सरोवर, कूूप झरना, मेघ से बरसने वाला, आकाश से उत्पन्न हुआ हिम—बर्फरूप, कुहरारूप, भूमि से उत्पन्न, चंद्रकांतमणि से उत्पन्न, घनवात आदि का जल इत्यादि सभी प्रकार के जलकायिक जीवों का उपर्युक्त भेदों में ही अंतर्भाव हो जाता है।

जलते हुए धुएँ रहित काठ आदि अर्थात् धधकते कोयले अंगारे कहलाते हैंंंं। अग्नि की लपटें ज्वाला कहलाती हैं। दीपक का और ज्वाला का अग्रभाग (लौ) अर्चि है। कण्डे की अग्नि का नाम मुर्मुर है। वङ्का से उत्पन्न हुई अग्नि, बिजली की अग्नि, सूर्यकांत से उत्पन्न हुई अग्नि ये शुद्ध (प्राकृतिक) अग्नि हैं। धुएँ आदि सहित सामान्य अग्नि को अग्नि कहा है। बडवा अग्नि, नंदीश्वर के मंदिरों में रखे हुए धूपघटों की अग्नि, अग्निकुमार देव के मुकुट से उत्पन्न हुई अग्नि आदि सभी अग्नि के भेदों का उपर्युक्त भेदों में ही अन्तर्भाव हो जाता है।

वात शब्द से सामान्य वायु को कहा है। जो वायु घूमती हुई ऊपर को उठती है वह उद्भ्रम वायु है। जो लहरों के समान होती है वह उत्कलिरूप वायु है। पृथ्वी में लगकर घूमती हुई वायु मण्डलिवायु है। गूँजती हुई वायु गुंजावायु है। वृक्षादि को गिरा देने वाली वायु महावायु है। घनोदधिवातवलय, तनुवातवलय की वायु घनाकार है और पंखे आदि से की गई वायु अथवा लोक को वेष्टित करने वाली वायु तनुवात है। उदर में स्थित पाँच प्रकार की वायु होती है। अर्थात् हृदय में स्थित वायु प्राणवायु है, गुदा में अपानवायु हैं, नाभिमण्डल में समानवायु है, कण्ठ प्रदेश में उदानवायु है और सम्पूर्ण शरीर में रहने वाली वायु व्यानवायु है। ये शरीर सम्बन्धी पाँच वायु हैं। इसी प्रकार से ज्योतिष्क आदि स्वर्गों के विमान के लिए आधारभूत वायु, भवनवासियों के स्थान के लिए आधारभूत वायु इत्यादि वायु के भेद इन्हीं उपर्युक्त भेदोें में अंतर्भूत हो जाते हैं।

शंका स्थावरकर्म का क्या कार्य है ?

समाधान— एक स्थान पर अवस्थित रखना स्थावरकर्म का कार्य है।

शंका— ऐसा मानने पर गमन करने रूप स्वभाववाले अग्निकायिक, वायुकायिक और जलकायिक जीवों को अस्थावरपना प्राप्त हो जाएगा ?

समाधाननहीं, क्योंकि जिस प्रकार वृक्ष में लगे हुए पत्ते वायु के प्रयोग से हिला करते हैं और टूटने पर इधर-उधर उड़ जाते हैं उसी प्रकार अग्निकायिक और जलकायिक के गमन होने में कोई विरोध नहीं आता है। तथा वायु के गतिपर्याय से परिणत शरीर को छोड़कर कोई दूसरा शरीर नहीं पाया जाता है। इसलिए उनके गमन करने में भी कोई विरोध नहीं आता है।

इन सभी पृथिवी, जल, अग्नि और वायुकायिक जीवों को जानकर आप लोगों को अहिंसामहाव्रत पालन करने की इच्छा से उनकी रक्षा करना चाहिए ऐसा तात्पर्य हुआ।

अधुना वनस्पतिकायिकभेदप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

वणप्फदिकाइया दुविहा-पत्तेयसरीरा साधारणसरीरा। पत्तेयसरीरा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। साधारणसरीरा दुविहा-बादरा सुहुमा। बादरा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता। सुहुमा दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता चेदि।।४१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वणप्फदिकाइया दुविहा-पत्तेयसरीरा साधारणसरीरा-वनस्पतिकायिका: जीवा: द्विविधा भवन्ति-प्रत्येकशरीरा: साधारणशरीराश्च। प्रत्येकं पृथक् शरीरं येषां ते प्रत्येकशरीरा: खदिरादयो वनस्पतय: सन्ति। प्रत्येकशरीरजीवा: बादरा एव भवन्ति, सूक्ष्मा: न भवन्तीति सूत्रादेवावगम्यते। किंच-प्रत्येकवनस्पतित्रसेषु उभयविशेषणानुपादनात् न तेषु सूक्ष्मत्वं इति आर्षादेवावबुध्यते।
साधारणं सामान्यं शरीरं येषां ते साधारणशरीरा:।
भिन्नभिन्नजीवानां कथं एकं शरीरं निष्पाद्यते इति चेत् ?
नैतद् वक्तव्यं, पुद्गलानां एकदेशावस्थितानां एकदेशावस्थितमिथ:समवेतजीवसमवेतानां तत्स्थाशेष-प्राणिसंबंध्येकशरीरनिष्पादनं न विरुद्धम् साधारणकारणत: समुत्पन्नकार्यस्य साधारणत्वाविरोधात्। कारणानुरूपं कार्यमिति न निषेद्धुं पार्यते, सकलनैयायिकलोकप्रसिद्धत्वात्।
उक्तं च-
साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च।
साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं भणियं।।१९२।।
जत्थेक्कु मरइ जीवो तत्थ दु मरणं हवे अणंताणं।
वक्कमदि जत्थ एक्को वक्कमणं तत्थ णंताणं।।१९३।।
एयणिगोदसरीरे जीवा दव्वप्पमाणदो दिट्ठा।
सिद्धेहि अणंतगुणा सव्वेण वितीदकालेण।।१९६।।
अत्थि अणंता जीवा जेहिं ण पत्तो तसाण परिणामो।
भावकलंकसुपउरा णिगोदवासं ण मुंचंति।।१९७।।

यत्साधारणनामकर्मोदयवशवत्त्र्यनन्तजीवानां उत्पन्नप्रथमसमये आहारपर्याप्तिस्तत्कार्यं च आहारवर्गणा-यातपुद्गलस्कंधानां खलरसभागपरिणमनं साधारणं सदृशं समकालं च भवति। तथा शरीरपर्याप्ति: तत्कार्यं च आहारवर्गणायातपुद्गलस्कंधानां शरीराकारपरिणमनं तथा इन्द्रियपर्याप्ति: तत्कार्यं च स्पर्शनेन्द्रियाकारपरिणमनं तथा आनपानपर्याप्ति: तत्कार्यं च उच्छ्वासनिश्वासग्रहणं साधारणं सदृशं समकालं च भवति। तथा प्रथमसमयोत्पन्नानामिव तत्रैव शरीरे द्वितीयादिसमयोत्पन्नानामपि अनंतानंतजीवानां पूर्वपूर्वसमयोत्पन्नानंतानंतजीवै: सह आहारपर्याप्त्यादिकं सर्वं सदृशं समकालं भवति। तदिदं साधारणलक्षणं पूर्वसूरिभिर्भणितं ज्ञातव्यं। अत्र गाथायां च शब्देन शरीरेन्द्रियपर्याप्तिद्वयं समुच्चयीकृतं।

यन्निगोदशरीरे यदा एको जीव: स्वस्थितिक्षयवशेन म्रियते तदा तन्निगोदशरीरे समस्थितिका: अनंतानंता: जीवा: सहैव म्रियन्ते। यन्निगोदशरीरे यदा एक: जीव: प्रक्रामति-उत्पद्यते तदा तन्निगोदशरीरे समस्थितिका: अनंतानंता: जीवा: सहैव प्रक्रामन्ति। एवमुत्पत्तिमरणयो: समकालत्वमपि साधारणलक्षणं प्रदर्शितं।

एकस्मिन् निगोदशरीरे वर्तमाना जीवा: द्रव्यप्रमाणत: द्रव्याश्रयप्रमाणसंख्यया अनंतानंता: सर्वजीवराश्य-नन्तभागमात्रसंसारिजीवराश्यसंख्येयभागप्रमिता: सर्वदा विद्यमाना: ते अक्षयानंता इति परमागमे भण्यन्ते। ते च सर्वजीवराश्यनंतैकभागमात्रेभ्योऽनादिकालसिद्धजीवेभ्योऽनन्तगुणा:। तथैव सर्वातीतकालतोऽप्यनन्तगुणा:।

अनेन कालमाश्रित्यैकशरीरनिगोदजीवसंख्या कथिता। क्षेत्रभावावाश्रित्य तत्संख्या आगमानुसारेण योज्यते। सर्वाकाशप्रदेशेभ्य: केवलज्ञानाविभागप्रतिच्छेदेभ्यश्चानन्तगुणहीना:, तथा लोकाकाशप्रदेशेभ्य: सर्वावधिज्ञानविषयभावेभ्यश्चानन्तगुणिता: सन्ति। तत्संख्याया: परमागमे जिनदृष्टत्वप्रसिद्धेर्विरोधो नास्ति।

ननु अष्टसमयाधिकषण्मासाभ्यन्तरे अष्टोत्तरषट्शतजीवेषु कर्मक्षयं कृत्वा सिद्धेषु सत्सु सिद्धरा-शेर्वृद्धिदर्शनात् संसारिजीवराशेश्च हानिदर्शनात् कथं सर्वदा सिद्धेभ्योऽनन्तगुणत्वं एकशरीरनिगोदजीवानां सर्वजीवराश्यनन्तगुणकालसमयसमूहस्य तद्योग्यानन्तभागे गते सति संसारिजीवराशिक्षयस्य सिद्धराशिबहुत्वस्य च सुघटत्वात् ?

इति चेत्तन्न, केवलज्ञानदृष्ट्या केवलिभि:, श्रुतज्ञानदृष्ट्या श्रुतकेवलिभिश्च सदा दृष्टस्य भव्यसंसारि-जीवराश्यक्षयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तर्कविषयत्वाभावात्। प्रत्यक्षागमबाधितस्य च तर्कस्याप्रमाणत्वात्। अनुष्णोऽग्निद्र्रव्यत्वात् यद्यद्द्रव्यं तत्तदनुष्णं यथा जलम्। प्रेत्यासुखप्रदो धर्म: पुरुषाश्रितत्वात् यो य: पुरुषाश्रित: स सोऽसुखप्रदो यथाऽधर्म: इत्यादितर्कवत्।
तर्हि तर्कबाधितस्य आगमस्य कथं प्रामाण्यं ?

इति चेत्तन्न प्रत्यक्षप्रमाणतर्कान्तरसंभावितस्यागमस्याविसंवादित्वेन प्रामाण्यसुनिश्चयात्। तद्द्वय-विरोधिनस्तव तर्वâस्याप्रमाणत्वाच्च।
तर्हि किमिदं तर्कान्तरमिति चेत् ? उच्यते, सर्वो भव्यसंसारिराशिरनन्तेनापि कालेन न क्षीयते अक्षयानन्तत्वात् यो योऽक्षयानन्त: स सोऽनन्तेनापि कालेन न क्षीयते यथा इयत्तया परिच्छिन्न: कालसमयौघ:, सर्वद्रव्याणां पर्यायोऽविभागप्रतिच्छेदसमूहो वा इत्यनुमानाङ्गस्य तर्कस्य प्रामाण्यसुनिश्चयात्।

तर्हि हेतो: साध्यसमत्वमिति चेत् ? न भव्यराश्यक्षयानन्तत्वस्याप्तागमसिद्धस्य साध्यसमत्वाभावात्। किं बहुना सर्वतत्त्वानां प्रवक्तरि पुरुषे आप्ते सिद्धे सति तद्वाक्यस्यागमस्य सूक्ष्मान्तरितदूरार्थेषु प्रमाण्यसुप्रसिद्धे:। तदागमपदार्थेषु निश्शंकं मम चित्तं किन्नु वावदूकतया। आप्तसिद्धिस्तु विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुख: इत्यादिवेदवाक्येन। प्रणम्य शम्भुमित्यादिनैयायिकवाक्येन। बुद्धो भवेयमित्यादिबौद्धवाक्येन। मोक्षमार्गस्य नेतारमित्यार्हतवाक्येन अपरैस्तत्तद्दर्शनदेवतास्तवनरूपवाक्यैश्च सामान्यतोऽङ्गीकृता। विशेषेण सर्वज्ञवीतरागस्याद्वाद्याप्तस्यैव युत्त्यापि साधनात्। विस्तरत: स्याद्वादतर्कशास्त्रेषु तत्सिद्धज्र्ञातव्या इत्येवं सुनिश्चितासंभव-द्बाधकप्रमाणत्वात् आप्तस्य तदागमस्य च सिद्धत्वात् तत्प्रणीतं मोक्षतत्त्वं बंधतत्त्वं वावश्यमभ्युपगमनीयमिति सिद्धं सिद्धेभ्योऽनन्तगुणत्वमेकशरीरनिगोदजीवानाम्।

नित्यनिगोदलक्षणमनेन ज्ञातव्यम्। तत्कथम् ? यैर्निगोदजीवै: त्रसानां द्वीन्द्रियादीनां परिणाम:-पर्याय: कदाचिदपि-प्रायेण न प्राप्त: ते जीवा अनन्तानन्त-अनादिसंसारे निगोदभवमेवानुभवन्तो नित्यनिगोदसंज्ञा: सर्वदा सन्ति। किं विशिष्टा: ? भावकलंकसुप्रचुरा:-भावस्य-निगोदपर्यायस्य कलंकेन तद्योग्यकषायोदया-विर्भावितदुर्लेश्यालक्षणसंक्लेशेन प्रचुरा:-अत्यन्तं संघटिता:। एवंविधनित्यनिगोदजीवा: निगोदवासं निगोदभवस्थितिं कदाचिदपि न मुञ्चन्ति। तेन कारणेन निगोदभवस्य आद्यन्तरहितत्वादनन्तानन्तजीवानां नित्यनिगोदत्वं समर्थितं जातम्। नित्यविशेषणेन पुनरनित्यनिगोदा: चतुर्गतिनिगोदरूपसादिसान्तनिगोदभवयुता केचन जीवा: सन्तीति सूचितं ज्ञातव्यम्। णिच्चचतुुग्गदिणिगोदेत्यादौ परमागमे निगोदजीवानां द्वैविध्यस्य सुप्रसिद्धत्वात्। एकदेशाभावविशिष्टसकलार्थवाचिना प्रचुरशब्देन कदाचिदष्टसमयाधिकषण्मासाभ्यन्तरे चतुर्गतिजीवराशितो निर्गतेषु अष्टोत्तरषट्शतजीवेषु मुत्तिंगतेषु तावन्तो जीवा नित्यनिगोदभवं त्यक्त्वा चतुर्गतिभवं प्राप्नुवन्तीत्ययमर्थ: प्रतिपादितो बोद्धव्य:।


अब वनस्पतिकायिक जीवों के भेद प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं—प्रत्येक शरीर और साधारण शरीर। प्रत्येक शरीर वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। साधारण शरीर वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं—बादर और सूक्ष्म। बादर दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त। सूक्ष्म दो प्रकार के हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त।।४१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं—प्रत्येक शरीर और साधारण शरीर। जिनका प्रत्येक अर्थात् पृथक्-पृथक् शरीर होता है उन्हें प्रत्येकशरीर जीव कहते हैं। जैसे—खैर आदि वनस्पति। प्रत्येकशरीर जीव बादर ही होते हैं सूक्ष्म नहीं होते हैं यह बात सूत्र से ही ज्ञात हो जाती है क्योंकि प्रत्येक वनस्पति और त्रसों में बादर और सूक्ष्म ये दोनों विशेषण नहीं पाये जाते हैं इसलिए उनसे सूक्ष्मत्व नहीं हो सकता है ऐसा आर्षग्रंथ से ही जाना जाता है। साधारण-सामान्य शरीर जिनके होते है वे साधारणशरीर जीव कहलाते हैं।

'शंका'—भिन्न-भिन्न जीवोें के एक शरीर कैसे उत्पन्न हो सकता है ?

समाधान—ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि जो एक देश में अवस्थित हैं और जो एक देश में अवस्थित तथा परस्पर सम्बद्ध जीवों के साथ समवेत एकमेक हैं, ऐसे पुद्गल वहाँ पर स्थित सम्पूर्ण जीवसम्बन्धी एक शरीर को उत्पन्न करते हैं इसमें कोई विरोध नहीं आता है क्योंकि साधारण कारण से उत्पन्न हुआ कार्य भी साधारण ही होता है। कारण के अनुरूप ही कार्य होता है इसका निषेध भी तो नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह बात सम्पूर्ण नैयायिक लोगों में प्रसिद्ध है। कहा भी है—


गाथार्थ—

साधारण जीवों का साधारण ही शरीर होता है और साधारण ही श्वासोच्छ्वास का ग्रहण होता है। इस प्रकार परमागम में साधारण जीवों का साधारण लक्षण कहा है।।१९२।।

साधारण जीवों में जहाँ पर एक जीव मरण करता है वहाँ पर अनंत जीवों का मरण होता है और जहाँ एक जीव उत्पन्न होता है वहाँ पर अनंत जीवों का उत्पाद होता है।।१९३।।

द्रव्य प्रमाण की अपेक्षा सिद्धराशि से अनंतगुणे और सम्पूर्ण अतीत काल से अनंतगुणे जीव एक निगोद शरीर में देखे गये हैं।।१९६।।

नित्य निगोद में ऐसे अनंतानंत जीव हैं जिन्होंने अभी तक त्रस जीवों की पर्याय नहीं पाई है और जो भाव अर्थात् निगोद पर्याय के योग्य कषाय के उदय से उत्पन्न हुए दुर्लेश्यारूप परिणामों से अत्यंत अभिभूत रहते हैं इसलिए निगोदवास को कभी नहीं छोड़ते।।१९७।।

साधारण नामकर्म के उदय के वशीभूत अनंत जीवों का उत्पन्न होने के प्रथम समय में आहारपर्याप्ति और उसका कार्य आहारवर्गणा में आये हुए पुद्गल स्कन्धों का खल और रसभागरूप में परिणमन साधारण अर्थात् एक समान तथा एक ही काल में होता है। तथा शरीर पर्याप्ति और उसका कार्य आहारवर्गणा के आए पुद्गलस्कन्धों का शरीर के आकाररूप से परिणमन साधारण होता है। इंद्रियपर्याप्ति और उसका कार्य स्पर्शन इंद्रिय के आकाररूप से परिणमन तथा श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति और उसका कार्य उच्छ्वास-निश्वास का ग्रहण समान और एक काल में होता है। तथा प्रथम समय में उत्पन्न होने वालों की ही तरह उसी शरीर में द्वितीय-तृतीय आदि समयों में उत्पन्न अनंतानंत जीवों का पूर्व-पूर्व समयों में उत्पन्न अनंतानंत जीवों के साथ आहारपर्याप्ति वगैरह सब समान और एक काल में होती है। यह साधारण जीवों का लक्षण पूर्वाचार्यों ने कहा है। यहाँ ‘च’ शब्द से शरीरपर्याप्ति और इंद्रियपर्याप्ति का ग्रहण किया है।

जिस निगोदशरीर में जब एक जीव अपनी आयु के क्षय होने से मरता है तभी उस निगोदशरीर में समान आयु वाले अनंतानंत जीव एक साथ ही मरते हैं। जिस निगोद शरीर में जब एक जीव उत्पन्न होता है तब उस निगोद शरीर में समान आयु वाले अनंतानंत जीव एक साथ ही उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार उत्पत्ति और मरण का समकाल में होना भी साधारण का लक्षण कहा है।

एक निगोद शरीर में वर्तमान जीव द्रव्यप्रमाण से अर्थात् द्रव्य की अपेक्षा संख्या से अनंतानंत हैं। अर्थात् सर्वजीवराशि के अनंत बहुभाग मात्र संसारी जीवों की राशि है। उसके असंख्यातवें भाग प्रमाण जीव एक निगोद शरीर में सदा विद्यमान रहते हैं, वे अक्षय अनंत हैं ऐसा परमागम में कहा है। तथा वे सर्वजीवराशि के अनंतवें भागमात्र जो अनादिकाल से हुए सिद्ध जीव हैं उनसे अनंतगुणे हैं। तथा समस्त अतीतकाल के समयों से भी अनंतगुणे हैं।

इस कथन के द्वारा काल की अपेक्षा एक शरीर में निगोद जीवों की संख्या कही। क्षेत्र और भाव की अपेक्षा उनकी संख्या आगम के अनुसार कहते हैं। समस्त आकाश के प्रदेशों से और केवलज्ञान के अविभाग प्रतिच्छेदों से अनंतगुणा हीन हैं। तथा लोकाकाश के प्रदेशों से और सर्वावधिज्ञान के विषयभूत भावों से अनंत गुणित हैं। परमागम में उनकी संख्या को जिन भगवान् के द्वारा—दृष्ट देखी गई है ऐसा कहा है इसलिए कोई विरोध नहीं है।

शंका—आठ समय और छह मास में छह सौ आठ जीवों के द्वारा कर्मोें का क्षय करके सिद्ध होने पर सिद्ध राशि की वृद्धि देखी जाती है और संसारी जीवराशि की हानि देखी जाती है। तब कैसे सर्वदा एक शरीर में रहने वाले निगोद जीव सिद्धों से अनंतगुणे हो सकते हैं ? तथा काल के समयों का समूह सर्व जीवराशि से अनंतगुणा है। अत: अपने योग्य अनंत भाग काल बीतने पर संसारी जीवराशि का क्षय और सिद्धराशि की वृद्धि सुघटित है।

समाधान—उक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि केवलज्ञानरूप दृष्टि से केवलियों के द्वारा और श्रुतज्ञानरूप दृष्टि से श्रुतकेवलियों के द्वारा सदा देखा गया भव्य संसारी जीव राशि का अक्षयपना अतिसूक्ष्म होने से तर्क का विषय नहीं है तथा जो तर्क प्रत्यक्ष और आगम से बाधित है वह प्रमाण नहीं है जैसे अग्नि शीतल होती है क्योंकि द्रव्य है। जो-जो द्रव्य होता है वह शीतल होता है जैसे जल। धर्म मरने पर दु:ख देता है पुरुष के आश्रित होने से। जो-जो पुरुष के आश्रित होता है वह-वह दु:खदायी होता है, जैसे अधर्म। ये तर्क प्रत्यक्ष और आगम से बाधित हैं।

शंका—तब तर्क से बाधित आगम को कैसे प्रमाण माना जा सकता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण और अन्य तर्कों से सम्भावित आगम के अविसंवादि होने से उसका प्रामाण्य सुनिश्चित है तथा आपका तर्क प्रत्यक्ष और आगम का विरोधी होने से अप्रमाण है।

शंका—तब वह तर्क कौन सा है, जिससे आगम का प्रामाण्य निश्चत है ?

समाधान—समस्त भव्य संसारी जीवराशि अनंतकाल बीतने पर भी क्षय को प्राप्त नहीं होती क्योंकि वह अक्षय अनंत प्रमाण है। जो-जो अक्षयानन्त होता है वह-वह अनंतकाल में भी क्षय को प्राप्त नहीं होता है। जैसे ‘‘इतने हैं’’ इस रूप से परिमित होने पर भी तीन काल के समय कभी समाप्त नहीं होते। या सब द्रव्यों की पर्याय अथवा अविभाग प्रतिच्छेदों का समूह कभी समाप्त नहीं होता। इस प्रकार अनुमान का अंग जो तर्क है उसका प्रामाण्य सुनिश्चित है।

शंका—तब आपका हेतु भी साध्य के समान हुआ क्योंकि साध्य भी अक्षयानन्त है, और हेतु भी वही है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि भव्यराशि का अक्षयानन्तपना आप्तप्रणीत आगम से सिद्ध है अत: साध्यसम नहीं है। अधिक कहने से क्या, सब तत्त्वों के प्रवक्ता पुरुष के आप्तसिद्ध होने पर उसके वचनरूप आगम का प्रमाण सूक्ष्म, अंतरित और दूरवर्ती पदार्थों में सुप्रसिद्ध है। इसलिए उनके द्वारा उपदिष्ट आगम में कहे हुए पदार्थों के संबंध में मेरा चित्त शंका रहित है। वृथा बकवाद करने से क्या लाभ है ? आप्त की सिद्धि तो ‘‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुख:’’ इत्यादि वेदवाक्य से ‘‘प्रणम्य शम्भुं’’ इत्यादि नैयायिकों के वाक्य से ‘‘बुद्धो भवेयम्’’ इत्यादि बौद्धवाक्य से और ‘‘मोक्षमार्गस्य नेतारम्’’ इत्यादि जैन वाक्य से तथा दूसरे वादियों के अपने-अपने मत के देवता के स्तवनरूप वाक्यों से सामान्य से स्वीकृत ही है। विशेष रूप से सर्वज्ञ वीतराग स्याद्वादी आप्त को ही युक्ति से भी सिद्ध किया है। विस्तार से उसकी सिद्धि स्याद्वाद के तर्वकशास्त्रोें से जाननी चाहिए। इस प्रकार बाधक प्रमाण के सुनिश्चितरूप से असम्भव होने से आप्त और उसके द्वारा उपदिष्ट आगम सिद्ध है। अत: उसमें कहे मोक्ष तत्त्व और बन्ध तत्त्व को स्वीकार करना चाहिए। इस एक-एक शरीर में निगोद जीव सिद्धों से अनंतगुणे होते हैं यह सिद्ध है।

जिन निगोद जीवों ने दोइन्द्रिय आदि त्रसों के परिणाम अर्थात् पर्याय को कभी भी प्राय: करके प्राप्त नहीं किया वे अनंतानंत जीव अनादिकाल से निगोद भव को ही भोगते हुए सर्वदा नित्यनिगोद संज्ञा वाले होेते हैं। वे भाव अर्थात् निगोद पर्याय के कलंंक अर्थात् उसके योग्य कषाय के योग से प्रकट हुई अशुभ लेश्यारूप संक्लेश से प्रचुर अर्थात् अत्यंत सम्बद्ध होते हैं। इस प्रकार के नित्यनिगोद जीव निगोदवास अर्थात् निगोद की भवस्थिति को कभी भी नहीं छोड़ते। इस कारण से निगोद भव के आदि और अंत से रहित होने से अनंतानंत जीवों के नित्यनिगोदपने का समर्थन होता है। नित्य विशेषण से यह सूचित होता है कि चतुर्गति निगोद रूप सादि सान्त निगोद भव वाले कुछ लोग अनित्यनिगोद होते हैं।

‘‘णिच्चचदुग्गतिणिगोद’’ इत्यादि परमागम में निगोद जीवों के दो प्रकार सुप्रसिद्ध हैं। एकदेश के अभाव से विशिष्ट सकल अर्थ के वाचक प्रचुर शब्द से यह अर्थ प्रतिपादित हुआ जानना कि कदाचित् छह महीना आठ समय के भीतर चतुर्गति राशि से निकलकर छह सौ आठ जीवों के मुक्ति जाने पर उतने ही जीव नित्यनिगोद भव को छोड़कर चतुर्गति भव में आते हैं।


कश्चिदाह-

ते साधारणशरीरजीवा: तादृक्षा:, पूर्वोक्तलक्षणा: सन्तीति कथमवगम्यते इति चेत् ? न,‘‘आगमस्यातर्क-गोचरत्वात्। न हि प्रमाणप्रकाशितार्थावगति: प्रमाणान्तरप्रकाशमपेक्षते, स्वरूपविलोपप्रसंगात्।’’

बादरनिगोदप्रतिष्ठिताश्चार्षान्तरेषु श्रूयन्ते, क्व तेषामन्तर्भावश्चेत् ?
प्रत्येकशरीरवनस्पतिष्विति ब्रूम:। के ते ? स्नुगाद्र्रकमूलकादय:।’’
अत्र प्रत्येकशरीरजीवस्य द्वौ भेदौ स्त: सप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितभेदात्।
उक्तं च-
उदये दु वणप्फदिकम्मस्स य जीवा वणप्फदी होंति।
पत्तेयं सामण्णं पदिट्ठिदिदरंति पत्तेयं।।१८५।।

तत्र प्रत्येकशरीरा: प्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितभेदात् द्विविधा:। बादरनिगोदैराश्रिता: प्रतिष्ठिता:, तैरनाश्रिता: अप्रतिष्ठिता: इति।
उक्तं च
मूलग्गपोरबीजा कंदा तह खंधबीजबीजरुहा।
सम्मुच्छिमा य भणिया पत्तेयाणंतकाया य।।१८६।।

मूलं बीजं येषां ते मूलबीजा:-आद्र्रकहरिद्रादय:। अग्रं बीजं येषां ते अग्रबीजा:-आर्यकोदीच्यादय:। पर्वबीजं येषां ते पर्वबीजा:-इक्षुवेत्रादय:। कंदो बीजं येषां ते कंदबीजा:-पिंडालुसूरणादय:। स्कंधो बीजं येषां ते स्कन्धबीजा:-सल्लकीकण्टकीपलाशादय:। बीजात् रोहंति इति बीजरुहा:-शालिगोधूमादय:। सम्मूच्र्छे समंतात् प्रसृतपुद्गलस्कंधे भवा: सम्मूच्र्छिमा:-मूलादिनियतबीजनिरपेक्षा: ते च ये प्रत्येकशरीरा: जीवा: परमागमे भणितास्ते अनंतकाया: अनंतानां निगोदजीवानां काया: शरीराणि एष्विति अनंतकाया: प्रतिष्ठितप्रत्येका: इत्यर्थ:।
प्रतिष्ठितं-साधारणशरीरैराश्रितं प्रत्येकशरीरं येषां ते प्रतिष्ठितप्रत्येकशरीरा: तैरनाश्रितशरीरा अप्रतिष्ठित-प्रत्येकशरीरा: स्यु:। एते मूलबीजादिसम्मूच्र्छिमपर्यंता: प्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितप्रत्येकशरीरजीवास्तेऽपि सम्मूच्र्छिमा: एव भवन्ति।


यहाँ कोई शंका करता है—

वे साधारण शरीर धारण करने वाले जीव उसी प्रकार के पूर्वोक्त लक्षण वाले हैं ऐसा कैसे जाना जाता है ?

इसका समाधान देते हुए कहते हैं कि—

ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि आगम में ऐसा ही कहा है और आगम तर्क का गोचर नहीं है। एक प्रमाण से प्रकाशित अर्थज्ञान दूसरे प्रमाण के प्रकाश की अपेक्षा नहीं करता है अन्यथा प्रमाण के स्वरूप का अभाव प्राप्त हो जायेगा।

शंका—बादर निगोदों से प्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति दूसरे आगमों से सुनी जाती हैं उसका अंतर्भाव वनस्पति के किस भेद में होगा ?

समाधान—प्रत्येक शरीर वनस्पति में उसका अन्तर्भाव होगा, ऐसा हम कहते हैं।

शंका—बादर निगोद से प्रतिष्ठित वे कौन सी वनस्पतियाँ हैंं ?

समाधान—थूहर, अदरख और मूली आदिक वनस्पति बादर निगोद से प्रतिष्ठित हैं। यहाँ प्रत्येक शरीरधारी जीव के सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित के भेद से दो प्रकार हैं। कहा भी है—


गाथार्थ—

वनस्पति स्थावर नामकर्म के उदय से जीव वनस्पतिकायिक होते हैं। वे दो प्रकार के हैं—प्रत्येक और सामान्य। उनमें से प्रत्येक शरीर प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित के भेद से दो प्रकार के हैं।

उनमें से सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित के भेद से प्रत्येक शरीर के दो भेद हैं। जो प्रत्येकशरीर वनस्पति बादर निगोद जीवों के द्वारा आश्रयरूप से स्वीकार किये गये हैं वे सप्रतिष्ठित हैं और जो उनसे आश्रित नहीं हैं वे अप्रतिष्ठित हैं ऐसा जानना चाहिए। कहा भी है—


गाथार्थ—

जिन वनस्पतियों का बीज उनका मूल होता है वे मूलबीज हैं, जिनका बीज पर्व होता है वे पर्वबीज हैं, जिनका बीज उनका अग्रभाग होता है वे अग्रबीज हैं, जिनका बीज कन्द होता है वे कन्दबीज हैं, जिनका बीज स्कन्ध होता है वे स्कन्धबीज हैं। बीज से पैदा होने वाले बीजरूह और सम्मूर्छिम वनस्पति ये सभी प्रत्येकवनस्पतिकायिक जीव अनंतकाय होते हैं।

उनमें अदरख, हल्दी आदि मूलबीज हैं, आर्यक, उदीचि आदि अग्रबीज हैं, र्इंख, बेंत आदि पर्वबीज हैं, पिंडालु, सूूरण वगैरह कन्दबीज हैं, पलास, सल्लकी आदि स्कंधबीज हैं, धान, गेहूँ आदि बीजरूह हैं, सम्मूर्छ अर्थात् चारों ओर से आये पुद्गलस्कंधों से होने वाली वनस्पति सम्मूर्छिम है। उनके लिए मूल आदि नियत बीज की अपेक्षा नहीं होती। इस प्रकार परमागम में जो ये प्रत्येक शरीर वनस्पतिकायिक जीव कहे हैं वे अनंतकाय होते हैं। जिसमें अनंतानंत निगोद जीवों के शरीर रहते हैं उन्हें अनंतकाय अर्थात् प्रतिष्ठितप्रत्येक कहते हैं ऐसा अर्थ है।

जिनका प्रत्येक शरीर प्रतिष्ठित अर्थात् साधारण शरीरोें से आश्रित होता है वे प्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर हैं और जिनका प्रत्येक शरीर साधारण शरीरों से आश्रित नहीं होता वे अप्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर होते हैं। ये मूलबीज से लेकर सम्मूर्छिम पर्यन्त जो प्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर और अप्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर जीव कहे हैं वे भी सम्मूर्छन जन्म वाले ही होते हैं।

तथा च प्रोत्तं-

गूढसिरसंधिपव्वं समभंगमहीरुहं च छिण्णरुहं।

साहारणं सरीरं तव्विवरीयं च पत्तेयं।।१८७।।
अत्र प्रतिष्ठितशरीरमेव साधारणमित्युपचर्यते, साधारणजीवाश्रितत्वेन। तद्विपरीतं तालनालिकेरति-न्तिणीकादिशरीरं अप्रतिष्ठितप्रत्येकशरीरमिति विभागं सूचयति च शब्दोऽत्र। तथा च येऽपि मूलकादय: प्रतिष्ठितप्रत्येकशरीरत्वेन प्रसिद्धा: तेऽपि खलु स्वोत्पन्नप्रथमसमये अंतर्मुहूर्तकालं साधारणजीवैरप्रतिष्ठिता एव भवंति।
पुनश्च साधारणनामकर्मोदयेन जीवा निगोदशरीरा: भवन्ति। नि-नियतां, गां-भूमिं क्षेत्रं अनंतानंतजीवानां ददाति इति निगोदं। निगोदं शरीरं येषां ते निगोदशरीरा:। त एव सामान्या:-साधारणशरीरा: जीवा:, बादरा सूक्ष्माश्चेति द्विधा विज्ञेया:।
इमे पृथिवीकायिकादय: बादरा: आधारेणैव तिष्ठंति, सूक्ष्माश्च निराधारा: सन्ति।
उक्तं च-
आधारे थूलाओ सव्वत्थ णिरंतरा सुहुमा।।१८४।।
आधारे आश्रये वर्तमानशरीरविशिष्टा: ये जीवा: ते बादरा:। सव्वत्थ-सर्वत्र सर्वलोके जले स्थले आकाशे वा निरंतरा:-आधारानपेक्षितशरीरा: जीवा: सूक्ष्मा: भवन्तीत्यर्थ:।
अत्रपर्यंतं संक्षेपेण स्थावरकायजीवानां भेदा: लक्षणानि च प्रतिपादितानि। एषां भेदप्रभेदान् ज्ञात्वा स्थावरकायजीवरक्षणं कर्तव्यम् यतो पुन: स्थावरयोनिषु भ्रमणं मा भवेदिति तात्पर्यं अवबोद्धव्यम्।
संप्रति त्रसकायानां भेदप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीपुष्पदंताचार्येण-
तसकाइया दुविहा-पज्जत्ता अपज्जत्ता।।४२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गतार्थत्वान्नास्यार्थ: उच्यते-
किं त्रसा: सूक्ष्मा: उत बादरा: इति चेत् ?
बादरा: एव न सूक्ष्मा:।
कुत: ?
तत्सौक्ष्म्यविधायकार्षाभावात्।
बादरत्वविधायकार्षाभावे कथं तदवगम्यते इति चेत् ?
न, उत्तरसूत्रतस्तेषां बादरत्वसिद्धे:।
के ते त्रसा: ? कथ्यन्ते-
बिहि तीहि चउहि पंचहि सहिया जे इंदिएहि लोयम्मि।
ते तसकाया जीवा णेया वीरोवएसेण।।
स्पर्शनरसनाभ्यां द्वाभ्यां, ताभ्यां घ्राणेन चेति त्रिभि:, तैश्चक्षुषा चेति चतुर्भि:, तै: श्रोत्रेण चेति पंचभिश्चेन्द्रियै: सहिता ये जीवा लोके सन्ति ते जीवास्रसकाया: इति वीरवर्धमानतीर्थकरपरमदेवस्य उपदेशेन अविच्छिन्नगुरुपर्वक्रमागतसंप्रदायेन श्रुतगृहीतधारितार्थेन प्रतिपादिता: ज्ञेया:।
इमे त्रसजीवा: त्रसनालिमध्ये एव निवसन्ति न च त्रसनालिबाह्ये। कदाचित् तेषां त्रसनालिबाह्येऽपि अस्तित्वं सूचितं, तदेव कथयति-
उववादमारणंतियपरिणततसमुज्झिऊण सेसतसा।
तसनालिबाहिरम्मि य णत्थित्ति जिणेहि णिद्दिट्ठं।।१९९।।

विवक्षितभवप्रथमसमयपर्यायप्राप्ति: उपपाद:। मरणं-प्राणत्याग: अन्त: अवसानं यस्य स मरणान्त: काल: वर्तमानभवस्थितिचरमान्तर्मुहूर्त:। मरणान्ते भव:मारणान्तिक: समुद्घात: उत्तरभवोत्पत्तिस्थान-पर्यन्तजीवप्रदेशप्रसर्पणलक्षण:। उपपादपरिणतं मारणान्तिकसमुद्घातपरिणतं च शब्दात् केवलिसमुद्घातम-परिणतं च त्रसं उज्झित्वा-वर्जित्वा शेषा: स्वस्थानादिपदपरिणता: सर्वे त्रसजीवा: त्रसनाडिबाह्ये लोकक्षेत्रे न सन्तीति जिनैरर्हदादिभिर्निर्दिष्टं-कथितम्। तत: कारणात् त्रसानां नालिरिव नालिस्रसनालि:। सा च एकरज्जुविष्कम्भायामा चतुर्दशरज्जूत्सेधा लोकमध्यस्थिता अन्वर्थसंज्ञया कथिता। कश्चिज्जीव: त्रसनालिबाह्ये वातवलये स्थित: त्रसे बद्धायुष्क: प्राक्तनं वायुकायिकभवं त्यक्त्वा उत्तरं त्रसकायं प्राप्य अग्रतनविग्रह-गतिप्रथमसमये त्रसनामकर्मोदयेन त्रसो जात: इत्युपपादपरिणतत्रसस्य त्रसनालिबाह्येऽस्तित्वम्। कश्चित् त्रसजीव: त्रसनालिमध्ये स्थित: तनुवातवलयस्य वायुकायिके बद्धायुष्क: स्वायुरवसानान्तर्मुहूर्तकाले तनुवातवलयपर्यन्तं त्रसनालिबाह्ये क्षेत्रे आत्मप्रदेशप्रसर्पणलक्षणमारणान्तिकसमुद्घातं करोतीति तस्य त्रसस्य त्रसनालिबाह्यक्षेत्रेऽप्यस्तित्वम्। केवलीकवाटाद्याकारेण त्रसनालिबाह्ये आत्मप्रदेशप्रसर्पणलक्षणसमुद्घातं करोतीति तस्य केवलिनोपि त्रसनालिबाह्येऽप्यस्तित्वं सिद्धमिति शास्त्रकारस्य तात्पर्यम्।
एवं प्रथमस्थले स्थावरत्रसजीवानां प्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।


गाथार्थ—

शिरा, सन्धि, पर्व, समभंग, अहीरुक तथा छिन्नरुक ये सब साधारण शरीर वनस्पति हैं और इससे विपरीत प्रत्येक शरीर वनस्पति कही गई है।।१८७।।

यहाँ सप्रतिष्ठित शरीर को ही उपचार से साधारण कहा गया है। क्योंकि साधारण जीवों के द्वारा वह आश्रित होते हैं। जो इससे विपरीत तालफल, नारियल, इमली आदि वनस्पति के शरीर हैं वे अप्रतिष्ठित प्रत्येक हैं, गाथा में आया हुआ ‘‘च’’ शब्द इस भेद को सूचित करता है। तथा जो भी मूलक आदि प्रतिष्ठित प्रत्येक शरीररूप से प्रतिबद्ध हैं वे भी अपनी उत्पत्ति के प्रथम समय में अंतर्मुहूर्त काल तक साधारण जीवों से अप्रतिष्ठित ही होते हैं।

पुन: साधारण नामकर्म के उदय से जीव निगोदशरीर वाले होते हैं। जो ‘नि’ अर्थात् नियत, ‘गां’ अर्थात् भूमि, क्षेत्र या निवास अनंतानंत जीवों को ‘‘द’ अर्थात् देता है वह निगोद है। निगोद शरीर जिनका है वे निगोद शरीरी हैं। वही सामान्य अर्थात् साधारण शरीर वाले होते हैं। उनके दो भेद हैं—बादर और सूक्ष्म।

ये पृथिवीकायिक आदि बादर जीव आधारपूर्वक ही रहते हैं और सूक्ष्म जीव निराधार रहते हैं। कहा भी है—

स्थूल शरीर आधार की अपेक्षा रखता है किन्तु सूक्ष्म शरीर बिना अंतर—व्यवधान के ही सब जगह अनंतानंत ही भरे हुए हैं, उनको आधार की अपेक्षा नहीं रहा करती है।

वर्तमान शरीर से विशिष्ट जो जीव आधार अर्थात् आश्रय से रहते हैं वे सब बादर होते हैं। सम्पूर्ण लोक में, जल में, स्थल में अथवा आकाश में जो जीव बिना किसी आधार की अपेक्षा से ही रहते हैं वे सूक्ष्म जीव कहलाते हैं ऐसा अर्थ है।

यहाँ तक संक्षेपरूप से स्थावरकायिक जीवों के भेद और लक्षण का प्रतिपादन किया गया है। इनके भेद-प्रभेदों को जानकर स्थावरकाय के जीवों की रक्षा करना चाहिए क्योंकि पुन: मेरा स्थावर योनियों में भ्रमण नहीं होने पावे, ऐसा यहाँ तात्पर्य जानना चाहिए।

विशेषार्थ—

इन पाँचों स्थावरों के चार-चार भेद जैनाचार्यों ने बताए हैं। जैसा कि तत्त्वार्थवृत्ति ग्रंथ के टीकाकार कहते हैं कि—

‘‘ते तु प्रत्येकं चतुर्विधा:—पृथिवी, पृथिवीकाय:, पृथिवीकायिक:, पृथिवीजीव:। आप:, अप्काय:, अप्कायिक: अप्जीव:। तेज:, तेज:काय:, तेज:कायिक:, तेजोजीव:। वायु:, वायुकाय:, वायुकायिक:, वायुजीव:। वनस्पति:, वनस्पतिकाय:, वनस्पतिकायिक:, वनस्पतिजीव: इति।

तत्र अध्वादिस्थिता धूलि: पृथिवी। इष्टकादि: पृथिवीकाय:। पृथिवीकायिकजीवपरिहृतत्वात् इष्टकादि:, पृथिवीकाय: कथ्यते मृतमनुष्यादिकायवत्। तत्र स्थावरकायनामकर्मोदयो नास्ति, तेन तद्विराधनायामपि दोषो न भवति पृथिवीकायो विद्यते यस्य स पृथिवीकायिक:। इन् विषये इको वाच्य:। तद्विराधनायां दोष उत्पद्यते। विग्रहगतौ प्रवृत्तो यो जीवोऽद्यापि पृथिवीमध्ये नोत्पन्न: समयेन समयद्वयेन समयत्रयेण वा यावदनाहारक: पृथिवीं कायत्वेन यो गृहीष्यति प्राप्तपृथिवीनामकर्मोदय: कार्मणकाययोगस्थ: स पृथिवीजीव: कथ्यते।’’

अर्थात् इनमें प्रत्येक के चार-चार भेद हैं। उनमें से मार्ग में पड़ी हुई धूलि आदि पृथिवी है। र्इंट आदि पृथिवीकाय हैं। जैसे—मृतक मनुष्य आदि का शरीर। पृथिवी और पृथिवीकाय के स्थावर नामकर्म का उदय न होने से वे निर्जीव हैं अत: इनकी विराधना में दोष—हिंसा नहीं है। जिस जीव के पृथिवीरूप काय विद्यमान है उसे पृथिवीकायिक कहते हैं अर्थात् यह जीव पृथिवीरूप शरीर के संबंध से युक्त है। इन् विषय में ‘इक्’ प्रत्यय वाच्य है अत: जीव सहित होने से इनकी विराधना में दोष—हिंसा उत्पन्न होती है। विग्रहगति में स्थित जीव जब तक पृथिवी के मध्य में उत्पन्न नहीं हुआ है अर्थात् जब तक इस जीव ने पृथिवी को कायरूप से ग्रहण नहीं किया है तब तक एक, दो, तीन समय तक अनाहारक है, दो तीन समय के बाद जो पृथिवी को कायरूप से ग्रहण करेगा जिसके पृथिवी नामकर्म का उदय है और जो कार्मणकाययोग में स्थित है वह जीव पृथिवीजीव कहलाता है। अष्टसहस्री के रचनाकार आचार्य श्रीविद्यानन्दि स्वामी ने भी इस विषय को चतुर्थकारिका की टीका में न्याय की भाषा में प्रतिपादित करते हुए कहा है कि—

‘‘न च लोष्ठादौ दोषावरणयो: प्रध्वंसाभाव: संभवति, तस्य भूत्वा भवनलक्षणत्वात् तयोस्तत्रात्यन्तमभावात्।’’

इसका हिन्दी अनुवाद करते हुए ‘‘स्याद्वादचिन्तामणि’’ टीका में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने लिखा है— ‘‘मिट्टी के ढेले आदि में दोष-आवरण का प्रध्वंसाभाव ही नहीं है। प्रध्वंसाभाव तो ‘‘भूत्वा भवनलक्षणत्वात्’’ घट होकर कपाल होनेरूप है। उस मिट्टी के ढेले आदि में दोष आवरण का अत्यन्त ही अभाव है। इस विषय को एक शंका-समाधान द्वारा व्यक्त करते हैं—

‘‘पृथिव्यादौ पुद्गले पृथिवीकायिकादिभिरात्मभि: शरीरत्वेन गृहीते स्वायुष: क्षयात्त्यत्ते चेतनादिगुणस्य व्यावृत्ते:.......। प्रसिद्धश्च पृथिव्यादौ चेतनादिगुणस्याभाव:, अनुपलम्भान्यथानुपपत्ते:।

शंका—पृथिवी आदि में सम्पूर्णरूप से चेतना गुणों का प्रध्वंसाभावरूप अभाव नहीं होता है अत: बुद्धि की हानि के साथ यह ‘‘अतिशायन’’ हेतु व्यभिचारी है। अर्थात् बुद्धि की हानि में ‘‘अतिशायन’’ हेतु पाया जाता है फिर भी सम्पूर्णतया पृथिवी आदि में चेतना गुणों का प्रध्वंसाभाव नहीं है अत: यह हेतु अनैकांतिक है।

समाधान—यह कथन भी अज्ञान के विलासरूप ही है, पृथिवी आदिरूप से परिणत हुई पुद्गलवर्गणाओं को पृथिवीकायिक आदि नामकर्म के उदय सहित जीवों ने अपने शरीररूप से ग्रहण किया पुन: अपने-अपने आयु कर्म के क्षय हो जाने पर उन पुद्गलमय पृथ्वी आदि को छोड़ दिया। उन पृथिवी आदिकों में चेतनादि गुणों का सम्पूर्णतया प्रध्वंसाभावरूप से अभाव हो जाता है यह बात हम स्याद्वादियों के यहाँ स्वीकार की गई है क्योंकि ‘‘इस जगत में ऐसा कोई भी पुद्गल नहीं है कि जिसको जीवों ने अनेकों बार भोग कर न छोड़ा हो’’ इस प्रकार वचन पाए जाते हैं। इसलिए पृथ्वी आदि में चेतन आदि गुणों का अभाव प्रसिद्ध ही है क्योंकि अनुपलब्धि की अन्यथानुपपत्ति है अर्थात् मिट्टी के ढेले आदि में चेतना गुण का सद्भाव नहीं पाया जाता है।

किसी व्यक्ति ने इस पर शंका प्रगट की कि जो पदार्थ दिखते नहीं हैं उनका अभाव वैâसे होेगा ? इस बात पर जैनाचार्य श्री अकलंकदेव का कहना है कि अदृश्य का भी अभाव आबाल-गोपाल मानते हैं अन्यथा दूसरे के शरीर से चैतन्य आत्मा के निकल जाने पर भी शंका बनी ही रहेगी। पुन: उसके संस्कार करने वालों को हिंसक कहने का प्रसंग आवेगा।

आचार्यश्री विद्यानन्दि महोदय भस्म, लोष्ठ आदि पृथ्वी को निर्जीव सिद्ध करते हुए कहते हैं कि मीमांसकों ने जो यह माना है कि ‘‘सम्यक् प्रकार से वैद्यक शास्त्र एवं भूत-तंत्रादि शास्त्र के अतिशयरूप—विशेषरूप अभ्यास से चैतन्य विशेष या रोगादि विशेषरूप कार्योें का विद्वान् लोग निर्णय कर लेते हैं।’’

तो इसी प्रकार से पृथ्वी आदि में भी चैतन्य आदि गुणों की सम्पूर्णरूप से व्यावृत्ति मानना समान ही है। तथाहि— इस भस्मादि या पृथ्वी आदि में पृथ्वीकायिक आदि चैतन्य गुण नहीं हैं।

‘‘तत: कार्यविशेषानुपलब्धे: सर्वात्मना........पृथिव्यादे: सिद्ध्यत्येव, मृतशरीरादे: परचैतन्यरोगादिनिवृत्तिवत् .....।

अर्थात् कार्य विशेष की उपलब्धि न होने से पृथ्वी आदि में सम्पूर्णरूप से चेतनादि गुणों का अभाव सिद्ध ही है। जैसे कि मृतक शरीर एवं नीरोगी आदि में चैतन्य या रोगादि का अभाव पाया जाता है।

यदि कोई कहे कि दो इंद्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच, मनुष्य आदि के शरीर से आत्मा निकल गई है इस बात का निर्णय करना तो सहज है किन्तु एकेन्द्रिय पृथ्वी, जल आदि में से आत्मा निकल गई है इसका निर्णय करना असंभव है क्योंकि पृथ्वी आदि में चेतना आदि के रहते हुए भी हलन, चलन आदि चेष्टाएँ, श्वासोच्छ्वास, वचनप्रयोग आदि बाह्य व्यापार असंभव है अत: इनमें से चेतना निकल चुकी है यह कहना अशक्य है। इस पर भी आचार्य कहते हैं कि एकेन्द्रिय स्थावर में भी चैतन्य के विद्यमान रहने से पृथ्वीकायिक आदि में वृद्धि व वनस्पतिकायिक के हरे-भरे रहने से जीवितपने का अनुमान किया जाता है एवं शुष्क आदि हो जाने पर निर्जीव का अनुमान स्पष्ट है तथा च आगम के द्वारा भी हम इन स्थावरकायिक जीवों के शरीर को अचेतन समझ सकते हैं।

पूर्व में पृथिवीकायिक जीव के चार भेदों में से पृथ्वी एवं पृथ्वीकाय ये दो भेद तो निर्जीव हैं एवं पृथिवीकायिक तथा पृथ्वीजीव ये दो भेद सजीव हैं। इन दोनों में भी विग्रहगति के जीव की विराधना का तो प्रसंग ही नहीं आता है केवल पृथ्वीकायिक जीवों की हिंसा का प्रसंग आता है। हाँ! विग्रहगति के जीवों की भावहिंसा का प्रसंग आ सकता है। पृथ्वी आदि से चैतन्य आदि गुणों का अभाव भी सिद्ध है अत: पत्थर आदि में भी बुद्धि आदि का भी सर्वथा अभाव हो जाने से हमारा ‘‘अतिशायन’’ हेतु व्यभिचारी नहीं है।

न्याय की इन परिभाषाओं से यह सिद्ध हो जाता है कि पृथ्वी से खोदी गई मिट्टी निर्जीव है इसलिए महाव्रती साधुगण उस मिट्टी को हाथ-पैर आदि की शुद्धि हेतु प्रयोग में लेते हैं इसमें कोई दोष नहीं है। इसी प्रकार जल, अग्नि, वायु और वनस्पति का वर्णन करते हुए तत्त्वार्थवृत्तिकार कहते हैं—

‘‘एवं विलोडितं यत्र तत्र विक्षिप्तं वस्त्रादिगालितं जलमाप उच्यते।.......। इतस्ततो विक्षिप्तं जलादिसित्तं वा प्रचुरभस्मप्राप्तं वा मनाक्तेजोमात्रं तेज:........। वायुकायिकजीवसन्मूच्र्छनोचितो वायुर्वायुमात्रं वायु:.........। साद्र्र: छिन्नो भिन्नो मर्दितो वा लतादिर्वनस्पतिरुच्यते.......।’’

इन पंक्तियों की हिन्दी टीका निम्न प्रकार है—

‘‘बिलोड़ा गया, इधर उधर फैलाया गया और वस्त्र से गालित (छाना हुआ) पानी ‘जल’ कहा जाता है। जलकायिक जीवों से छोड़ा गया पानी व उष्ण पानी जलकाय कहा जाता है। जिसमें जलजीव रहता है उसे जलकायिक कहते हैंं। जो आगे जलकायिक होगा अर्थात् जल पर्याय को ग्रहण करेगा, ऐसा विग्रह गति में रहने वाला जीव जलजीव कहलाता है।

इधर उधर फैली हुई या जिस पर जल सींच दिया गया है या जिसका बहुभाग भस्म बन चुका है ऐसी अग्नि को अग्नि कहते हैं। अग्निजीव के द्वारा छोड़ गयी भस्म आदि अग्निकाय कहलाते हैं। इनकी विराधना में दोष नहीं होता क्योंकि ये जीव रहित हैं। जिसमें अग्निजीव विद्यमान है, उसे अग्निकायिक कहते हैं। विग्रहगति को प्राप्त वह जीव अग्निजीव कहलाता है जिसके अग्नि नामकर्म का उदय है और जो आगे अग्निशरीर को ग्रहण करेगा।

जिसमें वायुकायिक जीव आ सकता है ऐसी वायु को अर्थात् केवल वायु को वायु कहते हैं। वायुकायिक जीव के द्वारा छोड़ी गई, बीजना (पंखा) आदि से चलाई गई हवा वायुकाय कहलाती है। वायुकाय जिसमें मौजूद है, ऐसी वायु वायुकायिक कही जाती है। विग्रहगति को प्राप्त वायु को शरीररूप से ग्रहण करने वाला जीव वायुजीव है।

छेदी गई, भेदी गई या मर्दित की गई गीली लता आदि वनस्पति है। सूखी वनस्पति जिसमें वनस्पतिजीव नहीं है वह वनस्पतिकाय है। सजीववृक्ष आदि वनस्पतिकायिक हैं। विग्रहगतिवर्ती वह जीव वनस्पतिजीव कहलाता है जिसके वनस्पतिनामकर्म का उदय है तथा आगे जो वनस्पति को शरीररूप से ग्रहण करेगा।

इन परिभाषाओं से यह निर्णय हो जाता है कि वृक्ष से टूटी हुई वनस्पति—सब्जी, फल, फूल आदि सभी निर्जीव हैं। इन्हें छिन्न-भिन्न करके, गरम करके, सूखा करके तथा विविध प्रयत्नों से उन्हें प्रासुक करके लोक में प्रयोग किया जाता है जिसमें किसी प्रकार के दोष का प्रसंग नहीं आता है। इन पाँचों स्थावर जीवों की हिंसा के पूर्ण त्यागी महाव्रती मुनिजन होते हैं तथा गृहस्थ श्रावक इनकी हिंसा से विरत नहीं हो सकते हैं। हाँ, व्यर्थ में उनका मर्दन आदि न करने पर वे भी किंचित् रूप से इस हिंसा के दोष से बच सकते हैं। अब त्रसकायों के भेद बतलाने हेतु श्रीपुष्पदंत आचार्य सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

त्रसकायिक जीव दो प्रकार के होते हैं—पर्याप्त और अपर्याप्त।।४२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—गतार्थ—पहले कथन किया गया होने से इस सूत्र का अर्थ नहीं कहते हैं।

शंका—त्रस जीव क्या सूक्ष्म होते हैं अथवा बादर ?

समाधान—त्रस जीव बादर ही होते हैं, सूक्ष्म नहीं होते। कैसे ? क्योंकि त्रसजीवों में सूक्ष्मता को बताने वाला कोई आगमप्रमाण नहीं पाया जाता है।

शंका—त्रस जीवों के बादरपने का प्रतिपादन करने वाले आगम प्रमाण का अभाव होने पर यह कैसे जाना जाता है कि वे बादर ही होते हैं ?

समाधान—नहीं, क्योंकि आगे आने वाले सूत्र से त्रस जीवों का बादरपना सिद्ध हो जाता है। वे त्रसजीव कौन से हैं ? सो कहते हैं—

गाथार्थ

—लोक में जो जीव दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पाँच इंद्रियों से युक्त हैं उन्हें वीर भगवान् के उपदेश से त्रसकायिक जीव जानना चाहिए।। स्पर्शन, रसना इन दो इंद्रियोें से, घ्राण के साथ तीन इंद्रियों से, चक्षु के साथ चार इंद्रियों से और श्रोत्र के साथ पाँच इंद्रियों से सहित जो जीव लोक में हैं वे जीव त्रसकाय हैं ऐसा श्रीवीरवर्धमानतीर्थंकर परमदेव के उपदेश से अविच्छिन्न गुरुपरंपराक्रम से आए हुए सम्प्रदाय के द्वारा श्रुत के ग्रहण और धारणरूप अर्थ से प्रतिपादित समझना चाहिए।

ये त्रसजीव त्रसनाली के मध्य में ही निवास करते हैं, त्रसनाली के बाहर नहीं रहते। कदाचित् त्रसनाली के बाहर भी उनका अस्तित्व सूचित है उसे कहते हैं—

गाथार्थ—

उपपाद जन्मवाले और मारणान्तिक समुद्घात वाले त्रस जीवों को छोड़कर बाकी के त्रसजीव त्रसनाली के बाहर नहीं रहते यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है।।१९९।।

विवक्षित भव से प्रथम समय में पर्याय की प्राप्ति को उपपाद कहते हैं। मरण अर्थात् प्राणत्याग और अंत अर्थात् अवसान जिसके हों वह मरणान्त काल वर्तमान भव की स्थिति का अंतिम मुहूर्त है। मरणान्त में हुआ मारणान्तिक समुद्घात है। उत्तर भव की उत्पत्ति स्थान पर्यंत जीव के प्रदेशों के विस्तार को मारणान्तिक समुद्घात कहते हैं। उपपाद से परिणत, मारणान्तिक समुद्घात से परिणत और ‘च’ शब्द से केवलि समुद्घात से परिणत त्रस को छोड़कर शेष स्वस्थान आदि पद से परिणत सब त्रसजीव त्रसनाड़ी से बाहर के लोकक्षेत्र में नहीं रहते ऐसा अर्हन्त आदि ने कहा है। इसी कारण से त्रसों की नालि के समान नालि त्रसनालि यह सार्थक नाम है, यह त्रसनालि लोक के मध्य में स्थित है और एक राजू लम्बी, एक राजू चौड़ी और चौदह राजू ऊँची है। कोई जीव त्रसनालि के बाहर वातवलय में स्थित है, उसने त्रस की आयु बाँधी है, अपने वर्तमान वायुकायिक भव को त्यागकर उत्तर त्रसकाय को प्राप्त करके आगे की विग्रहगति के प्रथम समय में त्रसनामकर्म का उदय होने से त्रस हुआ। इस प्रकार उपपाद परिणत त्रस का त्रसनालि के बाहर अस्तित्व हुआ। कोई त्रसजीव त्रसनालि के मध्य में स्थित है, उसके तनुवातवलय के वायुकायिक की स्थिति का बंध हुआ वह जीव अपनी आयु के अंतिम अंतर्मुहूर्त काल में तनुवातवलय पर्यन्त त्रसनालि के बाहर के क्षेत्र में आत्मा के प्रदेशों के विस्ताररूप मारणान्तिक समुद्घात को करता है। उस त्रस जीव का त्रसनालि के बाह्य क्षेत्र में भी अस्तित्व हुआ। जो केवली कपाट आदि के आकार रूप से त्रसनालि के बाहर आत्मा के प्रदेशों के फैलावरूप समुद्घात को करते हैं उन केवलियों का भी त्रसनाली के बाह्य क्षेत्र में अस्तित्व सिद्ध है। यह ग्रंथकार का तात्पर्य है। इस प्रकार प्रथम स्थल में स्थावर और त्रस जीवों के प्रतिपादन की मुख्यता से चार सूत्र पूर्ण हुए।


सांप्रतं पृथिवीकायादिषु गुणस्थाननिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणप्फइकाइया एक्कम्मि चेय मिच्छाइट्ठिट्ठाणे।।४३।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणप्फइकाइया चेय-पृथिवीकायिका: अप्कायिका: तेजष्कायिका: वायुकायिका: वनस्पतिकायिकाश्चैव इमे पंच स्थावरा: एक्कम्मि मिच्छाइट्ठिट्ठाणे-एकस्मिन् मिथ्यादृष्टिगुणस्थाने तिष्ठन्ति।
अत्र कश्चिदाह-आप्तागमविषयश्रद्धारहिता मिथ्यादृष्टयो भण्यन्ते। श्रद्धाभावश्चाश्रद्धेयवस्तु-परिज्ञानपूर्वक:। तथा च पृथिवीकायादीनामाप्तागमविषयपरिज्ञानोज्झितानां कथं मिथ्यादृष्टित्वमिति ?
तस्य समाधानं क्रियते-नैष दोष:, परिज्ञाननिरपेक्षमूलमिथ्यात्वसत्त्वस्य तत्राविरोधात्। अथवा ऐकांतिकसांशयिकमूढव्युद्ग्राहितवैनयिकस्वाभाविकविपरीतमिथ्यात्वानां सप्तानामपि तत्र संभव: समस्ति। अत्रतनजीवानां सप्तविधमिथ्यात्वकलज्रज्र्तिहृदयानामविनष्टमिथ्यात्वपर्यायेण सह स्थावरत्वमुपगतानां तत्सत्त्वाविरोधात्।
इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रिया विकलेन्द्रियाश्च सर्वे मिथ्यादृष्टय इत्यभाणि, ततस्तेनैव गतार्थत्वान्नारंभणीयमिदं सूत्रमिति ?
नैष दोष:, पृथिवीकायिकादीनामियन्तीन्द्रियाणि भवन्ति न भवन्तीति अनवगतस्य विस्मृतस्य वा शिष्यस्य प्रश्नवशादस्य सूत्रस्यावतारात्।
तात्पर्यमेतत्-मिथ्यात्वनिमित्तेन एकेन्द्रियादिषु जन्म भवति, तत्रापि अनंतकालपर्यंतं मिथ्यात्वमेव। अतो मिथ्यात्वपरिणामं त्यक्त्वा सम्यक्त्वमाश्रयणीयं भवद्भि: भव्योत्तमैरिति।

अधुना त्रसजीवेषु गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-
तसकाइया बीइंदिय-प्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति।।४४।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तसकाइया-त्रसकायिका: इमे बीइंदियप्पहुडि जाव-द्वीन्द्रियप्रभृति यावत् द्वीन्द्रियादारभ्य आ अयोगिकेवलिपर्यंता: भवंति। सयोग्ययोगिगुणस्थानवर्तिन: अर्हत्परमेष्ठिनोऽपि त्रसा एव उच्यन्ते, त्रसनामकर्मोदयवशवर्तित्वात् इति।

संप्रति बादरजीवेषु गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
बादरकाइया बादरेइंदियप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति।।४५।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-बादरेइंदियप्पहुडि जाव-अजोगिकेवलि त्ति-बादरैकेन्द्रियप्रभृति यावत् अयोगिकेवलिन: इति, बादरकाइया-बादरकायिका: भवन्ति। बादरपृथिवी-बादरजल-बादराग्नि-बादर-वायु-बादरसाधारणवनस्पतय:-बादरप्रत्येकशरीरवनस्पतय: द्वीन्द्रियात्पंचेन्द्रियपर्यंतत्रसा:, अयोगिकेवलिपर्यंत-मनुष्याश्च सर्वे इमे बादरा एव। पृथ्वीजलाग्निवायुसाधारणवनस्पतिषु एव सूक्ष्मा: जीवा: भवन्ति नान्यत्र इति तात्पर्यम् ज्ञातव्यम्।
कायमार्गणायां षट्कायिका: जीवा त्रसस्थावरभेदात् द्विधा सन्ति। पंच स्थावरा: एक: त्रस:, अथवा सूक्ष्मबादरभेदाद् द्विविधा: कायधारिण: संसारिण: सन्ति।

उक्तं च-

जह भारवहो पुरिसो वहइ भरं गेण्हियूण कावलियं।
एमेव वहइ जीवो कम्मभरं कायकावलियं।।२०२।।


लोके यथा भारवाहक: पुरुष: कावटिक: कावटिभृतं भारं गृहीत्वा विवक्षितस्थानं वहति नयति प्रापयति तथा संसारिजीव: औदारिकादिनोकर्मशरीरक्षिप्तज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मभारं गृहीत्वा नानायोनिस्थानानि वहति। पुनरपि स एव विप्रमुक्तकावटिकभार: एकत्र तदिष्टस्थाने तद्भाराक्रान्तिजनितदु:खविगमेन सुखी भूत्वा तिष्ठति। तथा कश्चिद्भव्यजीवोऽपि लब्धिभि: स्वीकृतसम्यग्दर्शनादिसामग्रीसंपन्न: तत्त्वज्ञानी शरीरकावटिकभृतकर्मभरं विप्रमुच्य तद्भाराक्रान्तिजनितनानाविधदु:खवेदनाविगमेन इष्टे लोकाग्रनिवासे सुखी भूत्वा तिष्ठति इति भव्यजनहितोपदेशोऽयमाचार्यस्याभिप्रायगतो लक्ष्य:।

अधुना द्विविधकायातीतजीवानां लक्षणप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-तेण परमकाइया चेदि।।४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तेण परं-तेन द्विविधकायात्मकजीवराशे: परं, अकाइया चेदि-बादर-सूक्ष्मशरीरनिबंधनकर्मातीतत्वत: अकायिका: अशरीरा: सिद्धा: भवन्ति च इति।
अत्र कश्चिदाह-जीवप्रदेशप्रचयात्मकत्वात् सिद्धा अपि सकाया इति चेत् ?
आचार्य: प्राह-नैतत्, तेषां सिद्धानां अनादिकालीनस्वाभाविकबंधनबद्धजीवप्रदेशात्मत्वात्।
अनादिकालीनात्मप्रदेशानां प्रचयोऽपि काय: किन्न स्यात् इति चेत् ?
नैतत्, मूर्तानां पुद्गलानां कर्मनोकर्मपर्यायपरिणतानां सादिसान्तप्रचयस्य कायत्वाभ्युपगमात्। अत्र सूत्रे ‘च’ शब्द: कायमार्गणपरिसमाप्तिप्रतिपादनं सूचयति।
एवं द्वितीयस्थले कायमार्गणायां त्रसस्थावरजीवानां अकायिकसिद्धानां च गुणस्थानगुणस्थानातीत-प्रतिपादनपरत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति षट्खण्डागमप्रथमखंडे गणिनीज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम-तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।


अब पृथिवीकायादि में गुणस्थान का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीव मिथ्यादृष्टि नामक प्रथम गुणस्थान में ही होते हैं।।४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक ये पाँचों स्थावर जीव एक मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में रहते हैं अर्थात् इनके एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है, शेष गुणस्थान इनमें संभव नहीं होते हैंं। यहाँ कोई शंका करता है कि—

आप्त, आगम और पदार्थों की श्रद्धा से रहित जीव मिथ्यादृष्टि कहे जाते हैं और श्रद्धान करने योग्य वस्तु में विपरीत ज्ञानपूर्वक ही अश्रद्धा अर्थात् मिथ्याभिनिवेश हो सकता है। ऐसी अवस्था में आप्त, आगम और पदार्थ के परिज्ञान से रहित पृथिवीकायिक आदि जीवों के मिथ्यादृष्टिपना कैसे संभव है ?

इसका समाधान करते है कि— यह कोई दोष नहीं है क्योंकि पृथिवीकायिक आदि जीवों में परिज्ञान की अपेक्षारहित मूल मिथ्यात्व का सद्भाव होने में कोई विरोध नहीं आता है। अथवा ऐकान्तिक, सांशयिक, मूढ़, व्युद्ग्राहित, वैनयिक, स्वाभाविक और विपरीत इन सातों प्रकार के मिथ्यात्वों का भी उन पृथिवीकायिक आदि जीवों में सद्भाव संभव है क्योंकि जिनका हृदय सात प्रकार के मिथ्यात्वरूपी कलंक से अंकित है ऐसे मनुष्यादि गतिसम्बन्धी जीव पहले ग्रहण की हुई मिथ्यात्वपर्याय को न छोड़कर जब स्थावर पर्याय को प्राप्त हो जाते हैं तो उनके सातों ही प्रकार का मिथ्यात्व पाया जाता है, इस कथन में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका—इंद्रियानुवाद से एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय ये सब जीव मिथ्यादृष्टि होते हैं, ऐसा कह आए हैं इसलिए उसी से यह ज्ञान हो जाता है कि पृथिवीकायिक आदि जीव मिथ्यादृष्टि होते हैं। अत: इस सूत्र को पृथक्रूप से बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी ?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि पृथिवीकायिक आदि जीवों के इतनी इंद्रियाँ होती हैं अथवा इतनी इंद्रियाँ नहीं होती हैं इस प्रकार जिस शिष्य को ज्ञान नहीं है अथवा जो भूल गया है उस शिष्य के अनुरोध से इस सूत्र का अवतार हुआ है।

तात्पर्य यह है कि मिथ्यात्व के निमित्त से एकेन्द्रिय आदि में जन्म होता है वहाँ भी अनंतकाल पर्यन्त मिथ्यात्व ही रहता है। अत:मिथ्यात्वपरिणाम का त्याग करके आप भव्यप्राणियों को सम्यक्त्व का आश्रय लेना चाहिए। अब त्रस जीवों में गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

द्वीन्द्रिय को आदि लेकर अयोगिकेवली तक त्रसकायिक जीव होते हैं।।४४।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका—ये त्रसकायिक जीव दो इंद्रिय से प्रारंभ होकर अयोगकेवली पर्यन्त होते हैं। सयोगी और अयोगी गुणस्थानवर्ती अर्हन्तपरमेष्ठी भी त्रस ही कहलाते हैं क्योंकि उनके त्रस नामकर्म का उदय पाया जाता है। अब बादरजीवों में गुणस्थानव्यवस्था का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

बादर एकेन्द्रिय जीवों से लेकर अयोगिकेवली पर्यन्त जीव बादरकायिक होते हैं।।४५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—बादर एकेन्द्रिय जीवों को आदि में करके अयोगकेवली पर्यन्त सभी जीव बादरकायिक होते हैं। बादर पृथ्वीकायिक, बादर जलकायिक, बादर अग्निकायिक, बादर वायुकायिक, बादर साधारण वनस्पति, बादर प्रत्येकशरीरवनस्पति, दो इंद्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यन्त त्रस जीव और अयोगकेवली पर्यन्त मनुष्य ये सभी जीव बादर ही होते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और साधारण वनस्पतियों में ही सूक्ष्म जीव होते हैं, अन्यत्र नहीं होते हैं ऐसा तात्पर्य हुआ।

कायमार्गणा में षट्कायिक जीव त्रस और स्थावर के भेद से दो प्रकार के हैं। पाँच स्थावर और एक त्रस ये छह काय हैं अथवा काय को धारण करने वाले संसारी जीव सूक्ष्म और बादर के भेद से दो प्रकार के हैं। कहा भी है—

गाथार्थ—

जिस प्रकार कोई भारवाही पुरुष कावड़ के भार को वहन करता है उसी प्रकार यह जीव कायरूप कावड़ के द्वारा कर्मभार को वहन करता है। लोक में जैसे बोझा ढोने वाला पुरुष—कावड़िया कावड़ में रखे भार को लेकर विवक्षित स्थान को ले जाता है। वैसे ही संसारी जीव औदारिक आदि नोकर्म शरीर में रखे ज्ञानावरण आदि द्रव्य कर्मों के भार को लेकर नाना योनिस्थानों में जाता है। पुन: वही मनुष्य—कावड़िया कावड़ के भार से मुक्त होकर अपने इष्ट स्थान में उस भार से होने वाले दु:ख के चले जाने से सुखी होकर बैठता है।

उसी प्रकार कोई भव्य जीव भी पाँच लब्धियों के द्वारा सम्यग्दर्शन आदि सामग्री से सम्पन्न हो, तत्त्वज्ञानी बन शरीररूपी कावड़ में भरे कर्मों के भार से मुक्त होकर उस भार से होने वाली नाना प्रकार के दु:खों की वेदना के चले जाने से इष्ट—लोक के अग्रभाग में सुखी होकर रहता है। इस प्रकार आचार्य के अभिप्राय में भव्यजीवों के लिए जो यह हितोपदेश है, उस पर दृष्टि देना चाहिए।

अब दोनों प्रकार के काय से रहित जीवों का लक्षण प्रतिपादित करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

स्थावर और त्रसकाय से परे कायरहित अकायिक जीव होते हैं।।४६।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका—जो उस त्रस और स्थावररूप दो प्रकार की कायराशि से परे हैं वे सिद्ध जीव बादर और सूक्ष्म शरीर के कारणभूत कर्म से रहित होने के कारण अशरीरी होते हैं अतएव अकायिक कहलाते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि— जीवप्रदेशों के प्रचयरूप होने के कारण सिद्ध जीव भी सकाय हैं फिर उन्हें अकाय क्यों कहा ?

इस शंका का समाधान करते हुए आचार्यदेव कहते हैं— ऐसा नहीं है क्योंकि सिद्धजीव अनादिकालीन स्वाभाविक बन्धन से बद्ध जीवप्रदेशस्वरूप हैं इसलिए उसकी अपेक्षा यहाँ कायपना नहीं लिया गया है।

शंका—अनादिकालीन आत्म-प्रदेशों के प्रचय को काय क्यों नहीं कहा ?

समाधान—ऐसा नहीं है क्योंकि यहाँ पर कर्म और नोकर्मरूप पर्याय से परिणत मूर्त पुद्गलों के सादि और सान्त प्रदेश प्रचय को ही कायरूप से स्वीकार किया है। यहाँ सूत्र में ‘च’ शब्द कायमार्गणा की परिसमाप्ति का कथन सूचित करता है। इस प्रकार द्वितीय स्थल के कायमार्गणा में त्रस-स्थावर जीवों के और अकायिक सिद्धों के गुणस्थान और गुणस्थानातीत व्यवस्था के प्रतिपादन की मुख्यता से चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खंडागम के प्रथमखंड में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कायमार्गणा नामक तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।

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