034. तृतीय महाधिकार - योगमार्गणा में तीन योग है......

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तृतीय महाधिकार - योगमार्गणा में तीन योग है

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अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ द्वादशस्थलै: चतु:पञ्चाशत्सूत्रै: योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्ययोगानां कथनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत: परं द्वितीयस्थले मनोयोगिनां निरूपणत्वेन ‘‘मणजोगो’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु तृतीयस्थले वचनयोगिकथनत्वेन ‘‘वचिजोगो’’ इत्यादिसूत्रचतुष्ट्यं। तदनंतरं चतुर्थस्थले काययोगिनिरूपणत्वेन ‘‘कायजोगो’’ इत्यादिनवसूत्राणि। तत्पश्चात् पंचमस्थले गुणस्थान-इंद्रियापेक्षया ‘‘मणजोगो’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं षष्ठस्थले योगेषु पर्याप्तापर्याप्तापेक्षया ‘‘मणजोगो’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं सप्तमस्थले इंद्रियपर्याप्ति-अपेक्षया ‘‘सण्णि’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। पुन: योगेषु पर्याप्त्यपेक्षया अष्टमस्थले ‘‘ओरालिय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततश्च नवमस्थले नारकाणां पर्याप्तिगुणस्थानादिना ‘‘णेरइया’’ इत्यादिपंचकं सूत्रं। तदनु दशमस्थले तिरश्चां गुणस्थानपर्याप्त्यादिकथनत्वेन ‘‘तिरिक्खा’’ इत्यादिना पंचसूत्राणि। तत्पश्चात् एकादशमस्थले मनुष्येषु गुणस्थानपर्याप्त्यादिप्रतिपादनत्वेन ‘‘मणुस्सा’’ इत्यादिपंचसूत्राणि। तत: परं द्वादशमस्थले देवेषु गुणस्थानपर्याप्त्यादिप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘देवा’’ इत्यादिना सप्त सूत्राणि इति समुदायपातनिका।
संप्रति योगद्वारेण जीवद्रव्यप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीपुष्पदन्ताचार्येण-
जोगाणुवादेण अत्थि मणजोगी वचिजोगी कायजोगी चेदि।।४७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जोगाणुवादेण-योगस्यानुवादेन, मणजोगी वचिजोगी कायजोगी-भावमनस: समुत्पत्त्यर्थ: प्रयत्न: मनोयोग:। वचस: समुत्पत्त्यर्थ: प्रयत्नो वाग्योग:। कायक्रियासमुत्पत्त्यर्थ: प्रयत्न: काययोग:। तदस्यास्ति अस्मिन्निति इनि सति सिद्धं मनोयोगी वाग्योगी काययोगी इति।
अस्मिन् सूत्रे ‘इति’ शब्द: सूत्रसमाप्तिप्रतिपादनफल:। ‘च’ शब्दश्च त्रय एव योगा: सन्ति नान्ये इति योगसंख्यानियमप्रतिपादनफल: समुच्चयार्थो वा।
त्रयाणां योगानां प्रवृत्तिरक्रमेण उत क्रमेण ?
न अक्रमेण, त्रिषु योगेषु अक्रमेण एकस्यात्मनो प्रवृत्तिर्नास्ति योगविरोधात्।
मनोवाक्कायप्रवृत्तयोऽक्रमेण क्वचित् दृश्यन्ते इति चेद् ?
भवतु तासां तथा प्रवृत्ति:, दृष्टत्वात्, न तत्प्रयत्नानां अक्रमेण वृत्ति: तथोपदेशाभावात्।
अथ स्यात् प्रयत्नो हि नाम बुद्धिपूर्वक:, बुद्धिश्च मनोयोगपूर्विका, तथा च सिद्धो मनोयोग: शेषयोगाविनाभावीति ?
नैतत्, कार्यकारणयो: एककाले समुत्पत्तिविरोधात्।
अस्मिन् संसारे मनोयोगिन: वाग्योगिन: काययोगिनश्च जीवा: सन्ति इति। ,

अथ योगमार्गणा अधिकार

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अब बारह स्थलों से चौव्वन सूत्रों के द्वारा योगमार्गणा नामका चतुर्थ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य योगों के कथनरूप से ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैंं, उसके आगे द्वितीय स्थल में मनोयोगी जीवों के निरूपण करने वाले ‘‘मणजोगो’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में वचनयोगियों के कथन की मुख्यता से ‘‘वचिजोगो’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में काययोगी जीवों का निरूपण करने हेतु ‘‘कायजोगो’’ इत्यादि नव सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचम स्थल में गुणस्थान और इन्द्रिय की अपेक्षा से ‘‘मणजोगो’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इसके बाद छठे स्थल में योगों में पर्याप्त-अपर्याप्त की अपेक्षा से ‘‘मणजोगो’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनन्तर सप्तम स्थल में इन्द्रिय पर्याप्ति की अपेक्षा से ‘‘सण्णि’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: योगों में पर्याप्ति की अपेक्षा से अष्टम स्थल में ‘‘ओरालिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद नवमें स्थल में नारकी जीवों की पर्याप्ति एवं गुणस्थान आदि का वर्णन करने वाले ‘‘णेरइया’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् दशवें स्थल में तिर्यंचों के गुणस्थान, पर्याप्ति आदि कथन की मुख्यता से ‘‘तिरिक्खा’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैंं। पुन: ग्यारहवें स्थल में मनुष्यों में गुणस्थान, पर्र्याप्ति आदि के प्रतिपादन की मुख्यता से ‘‘मणुस्सा’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैंं। उसके पश्चात् बारहवें स्थल में देवों में गुणस्थान, पर्याप्ति आदि का प्रतिपादन करने वाले ‘‘देवा’’ इत्यादि सात सूत्र हैं इस प्रकार समुदायपातनिका हुई। अब योगमार्गणा के द्वारा जीव द्रव्य का प्रतिपादन करने के लिए श्रीपुष्पदन्त आचार्य सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

योगमार्गणा के अनुवाद की अपेक्षा मनोयोगी, वचनयोगी और काययोगी जीव हैं।।४७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका— योगमार्गणा के अनुवाद-कथन से भावमन की उत्पत्ति के लिए जो प्रयत्न है वह मनोयोग है। वचन को उत्पन्न करने का प्रयत्न वचनयोग है और काय की क्रिया को उत्पन्न करने का प्रयत्न काययोग है। वह योग जिसमें होता है वे जीव मनोयोगी, वचनयोगी और काययोगी कहलाते हैं ऐसा कथन सिद्ध हो जाता है।

इस सूत्र में जो ‘‘इति’’ शब्द आया है उसका फल सूत्र की समाप्ति का प्रतिपादन करना है। तथा जो ‘‘च’’ शब्द आया है उसका मतलब है कि योग तीन ही होते हैं अधिक नहीं, इस प्रकार योग की संख्या के नियम का प्रतिपादन होता है। अथवा ‘च’ शब्द समुच्चयरूप अर्थ का प्रतिपादन करने वाला समझना चाहिए।

शंकातीनों योगों की प्रवृत्ति अक्रम से होती है या क्रम से ?

समाधान—अक्रम से-युगपत् नहीं होती है क्योंकि तीनों योगों में अक्रमपूर्वक एक आत्मा की प्रवृत्ति मानने में योगों में विरोध आता है।

शंका—कहीं-कहीं मन, वचन, काय की प्रवृत्ति अक्रम से-युगपत् भी देखी जाती है ?

समाधान—यदि देखी जाती है तो उनकी युगपत् वृत्ति होती रहे, परन्तु इससे मन, वचन और काय की प्रवृत्ति के लिए जो प्रयत्न होते हैं उनकी युगपत् वृत्ति सिद्ध नहीं हो सकती है क्योंकि आगम में इस प्रकार का उपदेश नहीं मिलता है।

शंका—प्रयत्न बुद्धिपूर्वक होता है और बुद्धि मनोयोगपूर्वक होती है। ऐसी परिस्थिति में मनोयोग शेष योगों का अविनाभावी है यह बात सिद्ध हो जाना चाहिए ? अर्थात् प्रयत्न एक साथ होते हैं यह बात सिद्ध हो जाएगी ?

समाधान—ऐसा नहीं है क्योंकि कार्य और कारण इन दोनों की एक काल में उत्पत्ति नहीं हो सकती है।

इस संसार में मनोयोगी, वचनयोगी और काययोगी जीव हैं ऐसा अभिप्राय है।

संप्रति योगविरहितजीवानां स्वरूपप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

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अजोगी चेदि।।४८।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-न योगी अयोगी। एतेषां पंचदशापि योगा न सन्ति त एवायोगिनश्चतुर्दशम-गुणस्थानवर्तिन इति।
उक्तं च-
जेसिं ण सन्ति जोगा सुहासुहा पुण्ण-पावसंजणया।
ते होंति अजोगिजिणा अणोवमाणंत-बलकलिया।।
येषामात्मनां पुण्यपापसंजनका:, प्रशस्ताप्रशस्तकर्मबंधहेतव: कायवाङ्मन:कर्मलक्षणा: शुभा-शुभयोगा: न सन्ति ते आत्मान: अयोगिजिना: चरमगुणस्थानवत्र्ययोगिकेवलिन: तदनंतरगुणस्थानातीतसिद्ध-पर्यायपरिणताश्च भवन्ति। अनुपमानन्तबलकलिता:-अनुपमं अस्मदाद्युपमातिक्रान्तं, अनन्तं अक्षयानन्ताविभाग-प्रतिच्छेदसमग्रं बलं-कालत्रयगोचरलोकालोकवर्तिसकलद्रव्यगुणपर्याययुगपद्ग्रहणसामथ्र्यं तेन कलिता व्याप्ता: तत्स्वभावपरिणता: सन्ति। परमात्मनो बलं केवलज्ञानादिवदात्मस्वभावत्वेन अप्रतिनियतविषयमित्य-नन्तबलकलिता भवन्ति अयोगिजिना इति ज्ञातव्या:।
एवं प्रथमस्थले सामान्ययोगिनां कथनपरत्वेन द्वे सूत्रे गते।
संप्रति मनोयोगस्य भेदप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीमदाचार्यदेवेन-
मणजोगो चउव्विहो-सच्चमणजोगो मोसमणजोगो सच्चमोसमणजोगो असच्चमोसमणजोगो।।४९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मणजोगो चउव्विहो-मनोयोग: चतुर्विध:-सच्चमणजोगो-सत्यं अवितथं अमोघं इत्यनर्थान्तरं। सत्ये मन: सत्यमन:, तेन योग: सत्यमनोयोग:। मोसमणजोगो-तद्विपरीतो मोषमनोयोग:। सच्चमोसमणजोगो-तदुभययोगात्सत्यमोषमनोयोग:। असच्चमोसमणजोगो-ताभ्यां सत्यमोषाभ्यां व्यतिरिक्तोऽसत्यमोषमनोयोग:।
समनस्केषु मन:पूर्विका वचस: प्रवृत्ति: अन्यथानुपलंभात्। तत्र सत्यवचननिमित्तकमनसा योग: सत्यमनोयोग:। तथा मोषवचननिमित्तकमनसा योगो-मोषमनोयोग:। उभयात्मकवचननिबंधनमनसा योग: सत्यमोषमनोयोग:। त्रिविधवचनव्यतिरिक्तामंत्रणादिवचननिबंधनमनसा योगोऽसत्यमोषमनोयोग:। नायमर्थो मुख्य: सकलमनसामव्यापकत्वात्।
क: पुन: निरवद्योऽर्थश्चेत् ?
यथावद् वस्तु प्रवृत्तं मन: सत्यमन:। विपरीतं असत्यमन:। द्वयात्मकमुभयमन:। संशयानध्यव-सायज्ञाननिबंधनं असत्यमोषमन: इति। अथवा तद्वचनजननयोग्यतामपेक्ष्य चिरंतनोऽप्यर्थ: समीचीन एव।

अब योग रहित जीवों के प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

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सूत्रार्थ—

अयोगी जीव हैं।।४८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—जिनके योग नहीं पाया जाता है वे अयोगी कहलाते हैं। कहा भी है—

गाथार्थ—जिन जीवों के पुण्य और पाप के उत्पादक शुभ और अशुभ योग नहीं पाये जाते हैं वे अनुपम और अनंत बल से सहित अयोगीजिन कहलाते हैं।

जिन आत्माओं के पुण्य-पापरूप प्रशस्त और अप्रशस्त कर्मबन्ध के कारण मन-वचन-काय की क्रियारूप शुभ और अशुभ योग नहीं हैं वे आत्मा चरम गुणस्थानवर्ती अयोगिकेवली और उसके अनंतर गुणस्थानों से रहित सिद्धपर्यायरूप परिणत मुक्त जीव होते हैं।

‘‘अनुपमानन्तबलकलिता:’’ अनुपम अर्थात् हम जैसे लोगों की उपमा को अतिक्रान्त करने वाले, अनंत अर्थात् अक्षयानन्त प्रतिच्छेदों से परिपूर्ण, बल अर्थात् त्रिकाल के लोक अलोकवर्ती समस्त द्रव्य गुणपर्याय को एक साथ ग्रहण करने की सामथ्र्य उससे कलित अर्थात् तत्स्वभावपरिणत अयोगी होते हैं। परमात्मा का बल केवलज्ञान की तरह आत्मा का स्वभाव होने से अप्रतिनियत विषय वाला होता है। इसी अपेक्षा से अयोगकेवली जिन अनंतबलकलिता: विशेषण से सार्थक नाम वाले होते हैं। इस प्रकार प्रथमस्थल में सामान्य योगियों के कथन की मुख्यता से दो सूत्र पूर्ण हुए। अब मनोयोग के भेदों का प्रतिपादन करने के लिए श्रीआचार्यदेव सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

मनोयोग चार प्रकार का है-सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, सत्यमृषामनोयोग और असत्यमृषामनोयोग।।४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका— मनोयोग चार प्रकार का है।

१. सत्यमनोयोग—सत्य, अवितथ और अमोघ ये एकार्थवाची शब्द हैं। सत्य के विषय में होने वाले मन को सत्यमन कहते हैं और उसके द्वारा जो योग होता है उसे सत्यमनोयोग कहते हैं।

२. मृषामनोयोग—सत्य से विपरीत योग को मृषामनोयोग कहते हैं।

३. सत्यमृषामनोयोग—जो योग सत्य और मृषा इन दोनों के संयोग से उत्पन्न होता है उसे सत्यमृषामनोयोग कहते हैं।

४. असत्यमृषामनोयोग—सत्यमनोयोग और मृषामनोयोग से व्यतिरिक्त योग को असत्यमृषामनोयोग कहते हैं।

समनस्क जीवों में वचनवृत्ति मनपूर्वक देखी जाती है क्योंकि मन के बिना उनमें वचनप्रवृत्ति नहीं पाई जाती है। इसलिए उन चारों में से सत्यवचननिमित्तक मन के निमित्त से होने वाले योग को सत्यमनोयोग कहते हैं तथा असत्यवचननिमित्तक मन से होने वाले योग को असत्य मनोयोेग कहते हैं। सत्य और मृषा इन दोनों रूप वचननिमित्तक मन से होने वाले योग को उभय मनोयोग कहते हैं। उक्त तीनों प्रकार के वचनों से भिन्न आमंत्रण आदि अनुभयरूप वचननिमित्तक मन से होने वाले योग को अनुभयमनोयोग कहते हैं। फिर भी उक्त प्रकार का कथन मुख्य नहीं है क्योंकि इसकी सम्पूर्ण मन के साथ व्याप्ति नहीं पाई जाती है। अर्थात् उक्त कथन उपचरित है क्योंकि वचन की सत्यादिकता से मन में सत्य आदि का उपचार किया गया है।

शंका—तो फिर यहाँ निर्दोष अर्थ कौन सा लेना चाहिए ?

समाधान—जहाँ जिस प्रकार की वस्तु विद्यमान हो वहाँ उसी प्रकार से प्रवृत्ति करने वाले मन को सत्यमन कहते हैंं। इससे विपरीत मन को असत्य मन कहते हैं।

सत्य और असत्य इन दोनोंरूप मन को उभयमन कहते हैं तथा जो संशय और अनध्यवसायरूप ज्ञान का कारण है उसे अनुभयमन कहते हैं। अथवा मन में सत्य, असत्य आदि वचनों को उत्पन्न करनेरूप योग्यता है उसकी अपेक्षा से चिरन्तन अर्थ भी समीचीन है।

मनसां गुणस्थानेषु अस्तित्वप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

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मणजोगो सच्चमणजोगो असच्चमोसमणजोगो सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।५०।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका - सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति-संज्ञिमिथ्यादृष्टिप्रभृति संज्ञिमिथ्यादृष्टे: आरभ्य सयोगिकेवलिपर्यंतेषु, मणजोगो सच्चमणजोगो असच्चमोसमणजोगो-मनोयोग: सत्यमनोयोग: असत्यमोषमनोयोगश्च भवन्ति।
अयं पंचमो मनोयोग क्व लब्धश्चेत् ?
नैष दोष:, चतस¸णां मनोव्यक्तीनां सामान्यस्य पंचमत्वोपपत्ते:।
भवतु केवलिनो भगवत: सत्यमनोयोगस्य सत्त्वं, तत्र वस्तुयाथात्म्यज्ञानसद्भावात्। नासत्यमोष-मनोयोगस्य सत्त्वं, तत्र केवलिनि संशयानध्यवसाययोरभावात् ?
नैतत् वक्तव्यं, संशयानध्यवसायनिमित्तकवचनहेतुमनसोऽपि असत्यमोषमनस्त्वमस्ति अत: तत्र केवलिनि तस्य योगस्य सत्त्वाविरोधात्।
किमिति केवलिनो वचनं संशयानध्यवसायजनकमिति चेत् ?
न, केवलिनो ज्ञानविषयभूतपदार्थस्यानन्त्यात् श्रोतुरावरणक्षयोपशमातिशयाभावाच्च।
तीर्थंकरवचनमनक्षरत्वात् ध्वनिरूपं, तत एव तदेकं, एकत्वात् न तस्य द्वैविध्यं घटते इति चेत् ?
न, तत्र केवलिनि भगवति ‘स्यात्’ इत्यादि असत्यमोषवचनसत्त्वतस्तस्य ध्वने: अनक्षरत्वासिद्धे:। तथा च साक्षरत्वेऽपि केवलिनो वचनमशेषभाषारूपं। क्रमविशिष्टवर्णात्मक भूय: पंक्तिकदम्बकस्य प्रतिप्राणिप्रवृत्तस्य ध्वनेरशेषभाषारूपत्वाविरोधात्।
अतीन्द्रियज्ञानत्वात् न केवलिनो मन: इति चेत् ?
न, केवलिनो द्रव्यमनस: सत्त्वात्।
केवलिनि क्षायोपशमिकमनसोऽभावात्, कथं वचनद्वितयसमुत्पत्ति: इति चेत् ? न, उपचारतो मनसा तयोरुभयवचनयो: समुत्पत्तिविधानात्। किंच केवलिनि मानसिकज्ञानसहकारिकारणक्षयोपशमाभावात्। अस्ति उपचारत एव वचनद्वितयसमुत्पत्तिरस्तीति।
संज्ञिमिथ्यादृष्टेर्जीवादारभ्य सयोगिकेवलिपर्यंतेषु सत्यमनोयोग-अनुभयमनोयोगौ स्त: इति तात्पर्यमवबोद्धव्यम्।
संप्रति शेषमनसोर्गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-

मोसमणजोगो सच्चमोसमणजोगो सण्णिमिच्छाइट्ठि-प्पहुडि जाव खीणकसायवीयराय-छदुमत्था त्ति।।५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव खीणकसायवीयरायछदुमत्था त्ति-संज्ञिमिथ्यादृष्टे: प्रभृति यावत् क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थमहामुनिपर्यंतेषु, मोसमणजोगो सच्चमोसमणजोगो-मोषमनोयोग: सत्यमोषमनोयोग: स्त:।
भवतु नाम क्षपकोपशमकानां श्रेण्यारोहकमहामुनीनां सत्यस्य असत्यमोषस्य च सत्त्वं, नेतरयो:, अप्रमादस्य प्रमादविरोधित्वात् ?
न, रजोजुषां-आवरणसहितानां विपर्ययानध्यवसायज्ञानकारणमनस: सत्त्वाविरोधात्। न च तद्योगात् प्रमादिन: ते मुनय:, प्रमादस्य मोहपर्यायत्वात्। अतो ज्ञायते शुक्लध्यानिनां विशिष्टधम्र्यध्यानिनां वा श्रेण्यारोहकमहामुनीनां अपि आवरणकर्मनिमित्तेन मृषामनोयोग-सत्यमृषामनोयोगयोरस्तित्वं अस्ति। तदपि सत्त्वापेक्षया न च कार्यापेक्षया इति।
एवं द्वितीयस्थले मनोयोगिनां कथनपरत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
अधुना वाग्योगस्य भेदप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

वचिजोगो चउव्विहो-सच्चवचिजोगो मोसवचिजोगो सच्चमोसवचि-जोगो असच्चमोसवचिजोगो चेदि।।५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वचिजोगो चउव्विहो-वचोयोग: चतुर्विध:-चतुर्विधमनोभ्य: समुत्पन्नवचनानि चतुर्विधान्यपि तत्तद्व्यपदेशं प्रतिलभन्ते तथा प्रतीयते च।
उक्तं च-
दसविह-सच्चे वयणे जो जोगो सो दु सच्चवचिजोगो।
तव्विवरीदो मोसो जाणुभयं सच्चमोसं ति।।
जो णेव सच्चमोसो तं जाण असच्चमोसवचिजोगं।
अमणाणं जा भासा सण्णीणामंतणीयादी।।
जनपदादिदशविधसत्यार्थविषयवाग्व्यापारजननसमर्थ:, स्वरनामकर्मोदयापादितभाषापर्याप्ति-जनितभाषावर्गणावलम्बनात्मप्रदेश शक्तिरूपो यो भाववचनजनितो योग: प्रयत्नविशेष: स सत्यवचोयोगो भवति। तद्विपरीतो मृषा असत्यार्थविषयवाग्व्यापारप्रयत्न: असत्यवचोयोग:। कमंडलुनि घट इत्यादिसत्य-मृषार्थवाग्व्यापारप्रयत्नत: स उभयवाग्योग इति। य: सत्यमृषार्थविषयो नैव भवति स असत्यमृषार्थविषय-वाग्व्यापारप्रयत्नविशेष: अनुभयवचनयोग:, अमनसां द्वीन्द्रियाद्यसंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यंतजीवानां या अनक्षरात्मिका भाषा: संज्ञिनां च आमंत्रण्याद्यक्षरात्मिकाभाषा: ता: सर्वा: अनुभयवचनयोग इत्युच्यते।संप्रति भेदमभिधाय गुणस्थानेषु तत्सत्त्वप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो विधीयते-

वचिजोगो असच्चमोसवचिजोगो बीइंदिय-प्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।५३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वचिजोगो-सामान्यवचोयोग:, असच्चमोसवचिजोगो-असत्यमोषवचोयोग:, बीइंदियप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति-द्वीन्द्रियादारभ्य यावत् सयोगिकेवलिन: इति।
विकलेन्द्रियाणां मनसा विना ज्ञानस्योत्पत्तिर्न संभवति ?
नैतत् एकांतेन संभवति, सप्रयत्नात्मसहकारिभ्य: इंद्रियेभ्य: अनुभयवचोयोगस्योत्पत्त्युपलंभात्।
समनस्केषु ज्ञानस्य प्रादुर्भावो मनोयोगादेवेति चेत् ?
न, केवलज्ञानेन व्यभिचारात्। किंतु समनस्कानां यत्क्षायोपशमिकज्ञानं तन्मनोयोगादुत्पद्यते, अत्र नास्ति दोष:।
तथैव विकलेन्द्रियाणां वचसोऽसत्यमोषत्वं भवति, अनध्यवसायहेतुत्वात्। अयं अनुभयवचनयोगस्त्र-योदशगुणस्थानपर्यंतेषु वर्तते इति तात्पर्यमत्र।

अब गुणस्थानों में मन के अस्तित्व का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से मनोयोग और विशेषरूप से सत्यमनोयोग तथा असत्यमृषामनोयोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगिकेवलीपर्यन्त होते हैं।।५०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका — संज्ञी मिथ्यादृष्टि जीवों से आरंभ करके सयोगकेवली पर्यन्त जीवों में सामान्य मनोयोग, सत्य मनोयोग और असत्यमृषामनोयोग होते हैं।

शंका—यह पाँचवाँ मनोयोग कहाँ से आया ?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि भेदरूप चार प्रकार के मनोयोगों में रहने वाले सामान्य योग से पाँचवीं संख्या बन ही जाती है।

शंका—केवलीजिन के सत्यमनोयोग का सद्भाव रहा आवे क्योंकि वहाँ पर वस्तु के यथार्थ ज्ञान का सद्भाव पाया जाता है परन्तु उनके असत्यमृषामनोयोग का सद्भाव नहीं हैं क्योंकि वहाँ पर संशय और अनध्यवसाय ज्ञान का अभाव है ?

समाधान—ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि संशय और अनध्यवसाय के कारणरूप वचन का कारण मन होने से उसमें भी अनुभयरूप धर्म रह सकता है। अत: सयोगीजिन में अनुभय मनोयोग का सद्भाव स्वीकार कर लेने में कोई विरोध नहीं होता है।

शंका—केवली के वचन संशय और अनध्यवसाय को पैदा करते हैं इसका क्या कारण है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि केवली के ज्ञान के विषयभूत पदार्थ अनंत होने से और श्रोता के आवरण कर्म का क्षयोपशम अतिशयरहित होने से केवली के वचनों के निमित्त से संशय और अनध्यवसाय की उत्पत्ति हो सकती है।

शंका—तीर्थंकर के वचन अनक्षररूप होने के कारण ध्वनिरूप हैं और इसलिए वे एकरूप हैं और एकरूप होने के कारण वे सत्य और अनुभय इस प्रकार दो तरह के नहीं हो सकते हैं ?

समाधान—नहीं, क्योंकि केवली भगवान् के वचन में ‘‘स्यात्’’ इत्यादि रूप से अनुभयरूप वचन का सद्भाव पाया जाता है, इसलिए केवली जिनेन्द्र की ध्वनि अनक्षरात्मक है यह बात असिद्ध है तथा केवली की ध्वनि को साक्षर मान लेने पर भी उनके वचन अशेष भाषारूप होते हैं क्योंकि क्रमविशिष्ट, वर्णात्मक अनेक पंक्तियों के समुच्चयरूप और अलग-अलग प्रत्येक श्रोता में प्रवृत्त होने वाली ऐसी केवली की ध्वनि संपूर्ण भाषारूप होती है ऐसा मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका—केवली के अतीन्द्रिय ज्ञान होता है इसलिए उनके मन नहीं पाया जाता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि उनके द्रव्यमन का सद्भाव पाया जाता है।

शंका—केवली में क्षायोपशमिक मन नहीं पाया जाता है तो उनके सत्य और अनुभय इन दो प्रकार के वचनों की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि उपचार से मन के द्वारा उन दोनों प्रकार के वचनों की उत्पत्ति का विधान किया गया है। दूसरी बात केवली के मानसिक ज्ञान के सहकारी कारणरूप क्षयोपशम का अभाव है इसलिए उपचार से ही दोनों प्रकार के वचनों की उत्पत्ति मानी जाती है।

संज्ञी मिथ्यादृष्टि जीवों से आरंभ होकर सयोगिकेवली गुणस्थान पर्यन्त जीवों में सत्यमनोयोग और अनुभयमनोयोग होते हैं ऐसा तात्पर्य जानना चाहिए।

अब शेष दो मनोयोगों के गुणस्थानों के प्रतिपादन करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं—

सूत्रार्थ—

असत्य मनोयोग और उभय मनोयोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ गुणस्थान तक पाये जाते हैं।।५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका — संज्ञी मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थ महामुनि पर्यन्त जीवों में मृषामनोयोग और सत्यमृषामनोयोग ये दो मनोयोग होते हैं।

शंका—क्षपक और उपशामक जीवों की श्रेणी पर आरोहण करने वाले महामुनियों के सत्यमनोयोग और अनुभयमनोयोग का सद्भाव होता रहे परन्तु शेष दो मनोयोगों का सद्भाव उनके नहीं हो सकता है क्योंकि इन दोनों में रहने वाला अप्रमाद असत्य और उभय मन के कारणभूत प्रमाद का विरोधी है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि आवरणकर्म से युक्त जीवों के विपर्यय ज्ञान और अनध्यवसाय ज्ञान के कारणभूत मन का सद्भाव मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है। परन्तु इसके संबंध से क्षपक या उपशामक जीव प्रमत्त नहीं माने जा सकते हैं क्योंकि प्रमाद मोह की पर्याय है।

इससे यह ज्ञात होता है कि शुक्लध्यानी महामुनिराजों के अथवा विशिष्टधर्मध्यानी श्रेणी पर आरोहण करने वाले महामुनियों के भी आवरण कर्म के निमित्त से मृषामनोयोग और सत्यमृषामनोयोग का अस्तित्व होता है। ये मनोयोग सत्ता की अपेक्षा से होते हैं, कार्य की अपेक्षा से नहीं ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में मनोयोगी जीवों के कथन की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुए। अब वचनयोग के भेदों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

वचनयोग चार प्रकार का है-सत्यवचनयोग, असत्यवचनयोग, सत्यमृषावचनयोग और असत्यमृषावचनयोग।।५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका — वचनयोग चार प्रकार का है। चार प्रकार के मन से उत्पन्न हुए चार प्रकार के वचन भी उस-उस संज्ञा को प्राप्त होते हैं और ऐसी प्रतीति भी होती है। कहा भी है-

गाथार्थ—

दश प्रकार के सत्य वचन में वचनवर्गणा के निमित्त से जो योग होता है उसे सत्यवचनयोग कहते हैं उससे विपरीत योग को मृषावचनयोग कहते हैं। सत्यमृषारूप वचनयोग को उभयवचनयोग कहते हैं।।

जो न तो सत्यरूप है न मृषारूप ही है वह असत्यमृषावचनयोग है। असंज्ञी जीवों की भाषा और संज्ञी जीवों की आमंत्रणी आदि भाषाएँ इसके उदाहरण हैं।।

वह जनपद आदि दस प्रकार के सत्य अर्थ को विषय करने वाले वचन व्यापार को उत्पन्न करने में समर्थ है। स्वर नाम कर्म के उदय से प्राप्त भाषा पर्याप्ति से उत्पन्न भाषा-वर्गणा के आलम्बन से आत्मप्रदेशों में शक्तिरूप जो भाववचन से उत्पन्न योग अर्थात् प्रयत्नविशेष है वह सत्यवचनयोग है। उससे विपरीत असत्य है अर्थात् असत्य अर्थ को विषय करने वाला वचन व्यापाररूप प्रयत्न असत्यवचनयोग है। कमण्डलु में घटव्यवहार की तरह सत्य और असत्य अर्थविषयक वचनव्यापाररूप प्रयत्न उभयवचनयोग है।

जो सत्य और असत्य अर्थ को विषय नहीं करता वह असत्यमृषा अर्थ को विषय करने वाला वचन व्यापाररूप प्रयत्नविशेष अनुभयवचनयोग है। अमनस् अर्थात् दो इंद्रिय से लेकर असंज्ञि पंचेन्द्रिय पर्यंत जीवों की जो अनक्षरात्मक भाषा है तथा संज्ञि पंचेन्द्रियों की जो आमंत्रण आदि रूप अक्षरात्मक भाषा है वह सब अनुभयवचन योग कही जाती है।

इस प्रकार वचनयोग के भेद कहने के पश्चात् अब गुणस्थानों में उसके सत्त्व का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

सामान्य से वचनयोग और विशेषरूप से अनुभयवचनयोग द्वीन्द्रिय जीवों से लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक होता है।।५३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका — सामान्यवचनयोग, असत्यमृषावचनयोग दो इंद्रिय जीवों से लेकर सयोगिकेवली पर्यन्त जीवों के होता है।

शंका—विकलेन्द्रिय जीवों के मन के बिना ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती है ?

समाधान—नहीं, ऐसा एकान्त से संभव नहीं है क्योंकि प्रयत्न सहित आत्मा के सहकार की अपेक्षा रखने वाली इंद्रियों से अनुभयवचनयोग की उत्पत्ति पाई जाती है।

शंका—मन सहित समनस्क जीवों में मनोयोग से ही ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर केवलज्ञान से व्यभिचार आता है। किन्तु समनस्क जीवोें के जो क्षायोपशमिक ज्ञान उत्पन्न होता है वह मनोयोग से होता है इसमें कोई दोष नहीं है।

इसी प्रकार से विकलेन्द्रिय जीवों के वचनों को अनुभयपना प्राप्त होता है क्योंकि विकलेन्द्रियों के वचन अनध्यवसायरूप ज्ञान के कारण हैं। यह अनुभयवचनयोग तेरह गुणस्थानों तक होता है ऐसा यहाँ तात्पर्य है।

संप्रति सत्यवचस: गुणस्थाननिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

Mata ji.jpg
सच्चवचिजोगो सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।५४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सच्चवचिजोगो-दशविधा अपि सत्यवचोयोगा:, सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति-संज्ञिमिथ्यादृष्टिप्रभृति यावत् सयोगिकेवलिन इति संज्ञिजीवेषु मिथ्यादृष्टेर्गुण-स्थानादारभ्य आ सयोगिकेवलिन: दश अपि सत्यवचनानि संभवंतीति ज्ञातव्यं।
शेषवचसो: गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
मोसवचिजोगो सच्चमोसवचिजोगो सण्णिमिच्छाइट्ठि-प्पहुडि जाव खीणकसाय-वीयराय-छदुमत्था त्ति।।५५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मोसवचिजोगो सच्चमोसवचिजोगो-मोषवचोयोग: सत्यमोषवचोयोग:, एतौ द्वौ अपि, सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव खीणकसायवीयरायछदुमत्था त्ति-संज्ञिजीवेषु मिथ्यादृष्टेर्गुण-स्थानादारभ्य यावत् क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था: महामुनयो निग्र्रंथसंज्ञका: इति।
क्षीणकषायवीतरागनिर्गंथमुनीनां वचनं कथमसत्यमिति चेत् ?
न, असत्यनिमित्तकाज्ञानस्य सत्त्वापेक्षया तत्र निग्र्रंथेष्वपि तदसत्यवचनस्य सत्त्वप्रतिपादनात्। तत एव नोभयसंयोगोऽपि विरुद्ध: इति।
वाचंयमस्य क्षीणकषायस्य कथं वाग्योगश्चेत् ?
न, तत्राप्यन्तर्जल्पस्य सत्त्वाविरोधात्। निर्विकल्पध्यानस्थस्य शुक्लध्यानिनो यते: बाह्यवचनप्रवृत्तिर्नास्ति तथापि अंतर्जल्पस्य तत्रापि संभवात्। अत: सत्त्वापेक्षया एव निर्विकल्पध्यानिनां मुनीनां इमौ योगौ स्त: इति ज्ञातव्यम्।
एवं वचनयोगिप्रतिपादनत्वेन तृतीयस्थले चतु:सूत्राणि गतानि।
अधुना काययोगसंख्याप्रतिपादनार्थं उत्तरसूत्रावतार: क्रियते-
कायजोगो सत्तविहो-ओरालियकायजोगो ओरालियमिस्सकायजोगो वेगुव्वियकायजोगो वेगुव्वियमिस्सकायजोगो आहारकायजोगो आहारमिस्स-कायजोगो कम्मइयकायजोगो त्ति।।५६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कायजोगो सत्तविहो-काययोग: सप्तविध:, ओरालियकायजोगो- औदारिककाययोग:, औदारिकमिश्रकाययोग:, वैक्रियिककाययोग:, वैक्रियिकमिश्रकाययोग:, आहारकाययोग: आहारमिश्रकाययोग:, कार्मणकाययोग: इति।
औदारिकशरीरजनितवीर्याज्जीवप्रदेशपरिस्पंदनिबंधनप्रयत्न: औदारिककाययोग:। कार्मणौदारिकस्कन्धानां जनितवीर्यात्तत्परिस्पंदनार्थ: प्रयत्न: औदारिकमिश्रकाययोग:। उदार: पुरु: महान् इत्यर्थ:, तत्र भवं शरीरमौदारिकं।
कश्चिदाशंकते-अथ स्यान्न महत्त्वमौदारिकस्य शरीरस्य ? किंच वर्गणासूत्रे कथितं वर्तते-
‘‘सव्वत्थोवा ओरालियसरीरदव्ववग्गणापदेसा, वेउव्वियसरीरदव्ववग्गणापदेसा असंखेज्जगुणा, आहारसरीरदव्ववग्गणापदेसा असंखेज्जगुणा, तेयासरीरदव्ववग्गणापदेसा अणंतगुणा’’ इत्यादि ?
तस्य समाधानं क्रियते-नैतद्वक्तव्यं, अत्र अवगाहनापेक्षया औदारिकशरीरस्य महत्त्वोपपत्ते:। यथा ‘‘सव्वत्थोवा कम्मइयसरीरदव्ववग्गणाए ओगाहणा, मणदव्ववग्गणाए ओगाहणा असंखेज्जगुणा, भासादव्ववग्गणाए ओगाहणा असंखेज्जगुणा, तेयासरीरदव्ववग्गणाए ओगाहणा असंखेज्जगुणा, आहारसरीरदव्ववग्गणाए ओगाहणा असंखेज्जगुणा, वेउव्वियसरीरदव्ववग्गणाए ओगाहणा असंखेज्जगुणा, ओरालियसरीरदव्ववग्गणाए ओगाहणा असंखेज्जगुणा त्ति।’’
अत: एतज्ज्ञायते, यत् इदं औदारिकशरीरं अवगाहनापेक्षयैव स्थूलं वर्तते न च पौद्गलिकद्रव्यवर्गणापेक्षया इति।
अणिमादिर्विक्रिया, तद्योगात्पुद्गलाश्च विक्रियेति भण्यन्ते। तत्र भवं शरीरं वैक्रियिकम्। तदवलंबनात् समुत्पन्नपरिस्पंदेन योग: वैक्रियिककाययोग:। कार्मणवैक्रियिकस्कन्धत: समुत्पन्नवीर्येण योग: वैक्रियिक-मिश्रकाययोग: इति।
आहरति आत्मसात्करोति सूक्ष्मानर्थाननेनेति आहार:, तेन आहारकायेन योग: आहारकाययोग:। इदं आहारशरीरं हस्तमात्रं, शंखवद्धवलं, शुभसंस्थानं भवति। एतच्छरीरं गच्छत्पर्वतादिना न प्रतिहन्यते, न शस्त्रैश्छिद्यते, नाग्निना दह्यते वा सूक्ष्मत्वात् वैक्रियिकशरीरवत्। आहारकार्मणस्कन्धत: समुत्पन्नवीर्येण योग: आहारमिश्रकाययोग:।

अब सत्यवचनयोग का गुणस्थानों में निरूपण करने के लिए आगे सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

सत्यवचनयोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तक होता है।।५४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका — दशों प्रकार का वचनयोग संज्ञीमिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली तक होता है। अर्थात् मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से प्रारंभ होकर सयोगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थान तक के समस्त संज्ञी जीवों में दशों प्रकार के वचनयोग संभव होते हैं ऐसा जानना चाहिए। शेष वचनयोगों की गुणस्थान व्यवस्था का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

मृषावचनयोग और सत्यमृषावचनयोग संज्ञीमिथ्यादृष्टि से लेकर क्षीणकषायवीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक पाये जाते हैं।।५५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—मृषा वचनयोग एवं सत्यमृषावचनयोग ये दोनों ही वचनयोग मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर बारहवें क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ गुणस्थान तक के निर्ग्रन्थ संज्ञाधारी महामुनियों के होते हैं।

शंका—जिनकी कषायें क्षीण हो गई हैं ऐसे वीतराग निग्र्रन्थ मुनियों के वचन असत्य कैसे हो सकते हैं ?

समाधान—ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि असत्य वचन का निमित्त जो अज्ञान है उसका सत्त्व बारहवें गुणस्थान के उन निग्र्रन्थ मुनियों में भी पाया जाता है। इस अपेक्षा से वहाँ पर असत्यवचन के सद्भाव का प्रतिपादन किया है। इसीलिए उभयसंयोगज सत्यमृषावचन भी बारहवें गुणस्थान तक होता है इस कथन में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका—वचनगुप्ति का पूरी तरह से पालन करने वाले कषायरहित जीवों के वचनयोग कैसे संभव है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि कषायरहित जीवों में भी अन्तर्जल्प के पाये जाने में कोई विरोध नहीं आता है। निर्विकल्प ध्यान में स्थित शुक्लध्यानी मुनि के यद्यपि बाह्य वचनों की प्रवृत्ति नहीं देखी जाती है फिर भी अन्तर्जल्प तो उनके भी संभव है अत: सत्त्व की अपेक्षा से ही निर्विकल्पध्यानी मुनियों के ये दोनों योग होते हैं ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार वचनयोगी जीवों के प्रतिपादन की मुख्यता से तृतीयस्थल में पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब काययोग की संख्या के प्रतिपादन करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं—

सूत्रार्थ—

काययोग सात प्रकार का है-

औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रकाययोग, वैक्रियिककाययोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग, आहारककाययोग, आहारकमिश्र-काययोग और कार्मणकाययोग।।५६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—उक्त प्रकार से काययोग के सात भेद माने गये हैं। औदारिक शरीर द्वारा (औदारिक वर्गणाओं से) उत्पन्न हुई शक्ति से जीव के प्रदेशों में परिस्पन्द का कारणभूत जो प्रयत्न होता है उसे औदारिककाययोग कहते हैं। कार्मण और औदारिक वर्गणाओं के द्वारा उत्पन्न हुए वीर्य से जीव के प्रदेशों में परिस्पन्द के लिए जो प्रयत्न होता है उसे औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं। उदार, पुरु और महान् ये एक ही अर्थ के वाचक शब्द हैं, उसमें जो शरीर उत्पन्न होता है उसे औदारिकशरीर कहते हैं।

शंका—औदारिक शरीर महान् है ऐसा तो बनता नहीं है ? क्योंकि वर्गणासूत्र से भी कथन आता है कि- औदारिक शरीर द्रव्य संबंधी वर्गणा के प्रदेश सबसे थोड़े हैं। उससे असंख्यातगुणे वैक्रियिकशरीरद्रव्यसंबंधी वर्गणा के प्रदेश हैं। उससे असंख्यात गुणे आहारक शरीरद्रव्यसम्बन्धी वर्गणा के प्रदेश हैं और उससे अनंतगुणे तैजसशरीरद्रव्यसम्बन्धी वर्गणा के प्रदेश हैं।

समाधान—ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि अवगाहना की अपेक्षा यहाँ औदारिक शरीर की स्थूलता बन जाती है। जैसा कहा भी है—

‘‘कार्मण शरीर सम्बन्धी द्रव्य वर्गणा की अवगाहना सबसे सूक्ष्म है, मनोद्रव्य वर्गणा की अवगाहना उससे असंख्यात गुणी है, भाषाद्रव्यवर्गणा की अवगाहना उससे असंख्यात गुणी है, तैजसशरीरसम्बन्धी द्रव्यवर्गणा की अवगाहना उससे असंख्यातगुणी है, आहारकशरीरसम्बन्धी द्रव्यवर्गणा की अवगाहना उससे असंख्यातगुणी है, वैक्रियिकशरीरसम्बन्धी द्रव्यवर्गणा की अवगाहना उससे असंख्यातगुणी है, औदारिक शरीर सम्बन्धी द्रव्यवर्गणा की अवगाहना उससे असंख्यातगुणी है ऐसा माना गया है।

अत: ऐसा जाना जाता है कि यह औदारिक शरीर अवगाहना की अपेक्षा ही स्थूल होता है न कि पौद्गलिक द्रव्यवर्गणा की अपेक्षा।

भावार्थ—

गोम्मटसार जीवकाण्ड में भी आचार्य श्रीनेमीचंद्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने कहा है-

पुरुमहदुदारुरालं, एयट्ठो तं विजाण तम्हि भवं। ओरालियं ति वुत्तं, ओरालियकायजोगो सो।।

ओरालियमुत्तत्थं विजाण मिस्सं च अपरिपुण्णं ति। जो तेण संपजोगो ओरालियमिस्सको जोगो।।

अर्थात् पुरु, महत्, उदार और उराल ये शब्द एकार्थवाचक हैं। उदार में जो होता है उसे औदारिक कहते हैं और उसके निमित्त से होने वाले योग को औदारिककाययोग कहते हैं।

औदारिक का जो अर्थ ऊपर कहा है, वही शरीर जब तक पूर्ण नहीं होता है तब तक मिश्र कहलाता है और उसके द्वारा होने वाले सम्प्रयोग को औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं।

इस व्युत्पत्ति के अनुसार चारों गतियों में मनुष्य एवं तिर्यंच इन दो गति के प्राणियों में औदारिककाययोग तथा औदारिकमिश्रकाययोग होते हैं शेष दो गतियो में नहीं होते हैं।

अणिमा-महिमा आदि ऋद्धियों को विक्रिया कहते हैं। उन ऋद्धियों के सम्पर्क से पुद्गल भी ‘‘विक्रिया’’ इस नाम से कहे जाते हैं। उसमें जो शरीर उत्पन्न होता है उसे वैक्रियिक शरीर कहते हैं। उस शरीर के अवलम्बन से उत्पन्न हुए परिस्पन्द द्वारा जो प्रयत्न होता है उसे वैक्रियिक काययोग कहते हैं। कार्मण और वैक्रियक वर्गणाओं के निमित्त से उत्पन्न हुई शक्ति से जो परिस्पन्द के लिए प्रयत्न होता है उसे वैक्रियकमिश्रकाययोग कहते हैं। जिसके द्वारा आत्मा सूक्ष्म पदार्थों को ग्रहण करता है अर्थात् आत्मसात् करता है उसे आहारक शरीर कहते हैं और उस आहारक शरीर से जो योग होता है उसे आहारककाययोग कहते हैं। यह आहारक शरीर एक हाथ प्रमाण आकार वाला होता है, शंख के समान धवल-श्वेत वर्ण का होता है और शुभ संस्थान अर्थात् समचतुरस्र संस्थान से सहित होता है। यह शरीर गमन करते समय पर्वतादि से बाधित नहीं होता है, न शस्त्रों से उसका छेदन होता है और न अग्नि से वह जलाया जा सकता है क्योंकि वह वैक्रियक शरीर के समान सूक्ष्म होता है। आहारक और कार्मण की वर्गणाओं से उत्पन्न हुए वीर्य के द्वारा जो योग होता है वह आहारकमिश्रकाययोग है।

उक्तं च-

आहरदि अणेण मुणी सुहुमे अट्ठे सयस्स संदेहे।

गत्ता केवलिपासं तम्हा आहारको जोगो।।
यत: कारणात् आहारकर्धियुक्त: प्रमत्तमुनीश्वर: स्वस्य प्रवचनपदार्थेषु संशये जाते तद्व्यवच्छेदार्थं अनेनाहारकशरीरेण केवलिश्रीपादपाश्र्वं गत्वा सूक्ष्मार्थान् आहरति गृह्णाति इत्याहार:, आहार एव आहारकं शरीरं।
इदं शरीरं कदा उद्भवति इति चेत् ?
कथ्यते-
आहारस्सुदयेण य पमत्तविरदस्स होदि आहारो।
असंजमपरिहरणट्ठं संदेहविणासणट्ठं च।।२३५।।
णियखेत्ते केवलिदुगविरहे णिक्कमणपहुडि कल्लाणे।
परखेत्ते संवित्ते जिण - जिणघरवंदणट्ठं च।।२३६।।
उत्तम अंगम्मि हवे धादुविहीणं सुहं असंघडणं।
सुहसंठाणं धवलं हत्थपमाणं पसत्थुदयं।।२३७।।
अव्वाघादी अंतोमुहुत्तकालट्ठिदी जहण्णिदरे।
पज्जत्ती संपुण्णे मरणं पि कदाचि संभवइ।।२३८।।
प्रमत्तविरतस्य आहारशरीरनामकर्मोदयेन आहारवर्गणायातपुद्गलस्कन्धानां आहारकशरीररूपपरिणम-नेनाहारकशरीरं भवति तत् किमर्थं ? सार्धद्वीपद्वयवर्तितीर्थयात्रादिविहारे असंयमपरिहरणार्थं ऋद्धिप्राप्तस्यापि प्रमत्तसंयतस्य श्रुतज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशममांद्ये सति यदा धम्र्यध्यानविरोधी श्रुतार्थसन्देह: स्यात्तदा तत्सन्देहविनाशार्थं च आहारकशरीरमुत्तिष्ठतीत्यर्थ:।
निजक्षेत्रे स्ववृत्त्याधारदेशे केवलियुगरहिते-केवलिश्रुतकेवलिद्वयाभावे, परक्षेत्रे औदारिकशरीरगमनागोचरे दूरक्षेत्रे केवलिश्रुतकेवलिद्वये तीर्थंकरपरिनिष्क्रमणादिकल्याणत्रये च संवृत्ते वर्तमाने सति असंयमपरिहरणार्थं सन्देहविनाशनार्थं जिनजिनगृहवन्दनार्थं च गन्तुं समुद्युक्तस्य प्रमत्तसंयतस्य आहारकशरीरं भवति।
तदाहारकशरीरं धातुविहीनं रसादिसप्तधातुरहितं, शुभं शुभनामकर्मोदयापादितप्रशस्तावयवविशिष्टं, असंहननं अस्थिबन्धनरहितं, शुभ संस्थानं-प्रशस्तसमचतुरस्रसंस्थानांगोपाङ्गविन्यासयुतं, धवलं चन्द्रकान्त-निर्मितमिवातिविशदं, हस्तप्रमाणं चतुर्विंशतिव्यवहाराङगुलप्रमितं प्रशस्तोदयं अध्रुवोदयप्रकृतिषु आहारक-शरीर-तद्बन्धनसंघाताङ्गोपाङ्गादिप्रशस्तप्रकृत्युदययुतं, एवंविधं आहारकशरीरं उत्तमांगे भवेत् जायते।
तदाहारकशरीरं परेण स्वस्य स्वेन परस्य वा व्याघातरहितं बाधावर्जितं तत: कारणादेव वैक्रियिकशरीरवत् वङ्काशिलादिनिर्भेदनसमर्थं जघन्योत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्तकालस्थितियुतं, तच्छरीरपर्याप्तिपरिपूर्णायां सत्यां कदाचिच्छरीरर्धियुक्तस्य प्रमत्तसंयतस्य आहारककाययोगकाले स्वायु:क्षयवशेन मरणमपि संभवति। इत्थं आहारशरीरस्य माहात्म्यं जिनप्रतिमादर्शनमाहात्म्यं च ज्ञातव्यं भवद्भि:।
कार्मणशरीरलक्षणमुच्यते-
कर्मैवं कार्मणं शरीरं, अष्टकर्मस्कन्ध: इति यावत्। अथवा कर्मणि भवं कार्माणं शरीरं, नामकर्मावयवस्य कर्मणो ग्रहणम्। तेन योग: कार्मणकाययोग:। केवलेन कर्मणा जनितवीर्येण सह योग: इति यावत्। अयं योग: एकसमयपर्यंतं द्विसमयपर्यंतं त्रिसमयपर्यंतं वा भवति नाधिकं इति।
अयं औदारिककाययोग: केषु भवतीतिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-
ओरालियकायजोगो ओरालियमिस्सकायजोगो तिरिक्खमणुस्साणं।।५७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ओरालियकायजोगो ओरालियमिस्सकायजोगो-औदारिककाययोग:, औदारिकमिश्रकाययोगश्च इमौ द्वौ अपि, तिरिक्खमणुस्साणं-तिर्यग्मनुष्याणां इति। न च औदारिककाययोगस्य एव नियम: तिर्यक्षु मनुष्येषु च, तत्र कार्मणकाययोगादीनामपि सद्भावात्। अत: औदारिककाययोेग-स्तिर्यङ्मनुष्याणामेव इति ज्ञातव्यम्।
वैक्रियिककाययोग: केषु भवतीतिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
वेउव्वियकायजोगो वेउव्वियमिस्सकायजोगो देवणेरइयाणं।।५८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवणेरइयाणं वेउव्वियकायजोगो वेउव्वियमिस्सकायजोगो-देवनारकाणां वैक्रियिककाययोगो वैक्रियिकमिश्रकाययोगश्चेति। तिर्यङ्मनुष्यगतिकर्मोदयेन सह वैक्रियिकोदयस्य विरोधात् स्वभावाद्वा न तयो: तिर्यङ्मनुष्ययो: वैक्रियिकयोग:।
तिर्यञ्चो मनुष्याश्च वैक्रियिकशरीरा: श्रूयन्ते तत्कथं घटते इति चेत् ?
न, औदारिकशरीरं द्विविधं विक्रियात्मकमविक्रियात्मकमिति। तयोर्यद् विक्रियात्मकं औदारिकशरीरं तद्वैक्रियिकं मनुष्येषु तिर्यक्षु च प्रोत्तं, तदत्र न परिगृह्यते, विविधगुणद्र्धयभावात्। अत्र तु विविधगुणद्र्ध्यात्मकं वैक्रियिकशरीरं गृह्यते, तच्च देवनारकाणामेव।


कहा भी है—

गाथार्थ—छट्ठे प्रमत्तगुणस्थानवर्ती मुनि को संदेह होेने पर जिस शरीर के द्वारा केवली के पास जाकर सूक्ष्म पदार्थों का आहरण-ग्रहण करता है उसे आहारक शरीर कहते हैं इसलिए उसके द्वारा होने वाले योग को आहारककाययोग कहते हैं।

जिस कारण से आहारकऋद्धि से युक्त प्रमत्त मुनीश्वर आगमिक पदार्थों में संशय होने पर उसको दूर करने के लिए इस आहारक शरीर के द्वारा केवली के चरणों के समीप जाकर सूक्ष्म अर्थों को ग्रहण करता है इसलिए आहार कहते हैं। आहार ही आहारक शरीर है।

यह शरीर कब उत्पन्न होता है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं—

गाथार्थ—

असंयम का परिहार करने के लिए तथा संदेह को दूर करने के लिए आहारक ऋद्धि के धारक छट्ठे गुणस्थानवर्ती मुनि के आहारक शरीर नामकर्म के उदय से आहारक शरीर होता है।

अपने क्षेत्र में केवली तथा श्रुतकेवली का अभाव होने पर किन्तु दूसरे क्षेत्र में जहाँ पर कि औदारिक शरीर से उस समय पहुँचा नहीं जा सकता वहाँ केवली या श्रुतकेवली के विद्यमान रहने पर अथवा तीर्थंकरों के दीक्षाकल्याणक आदि तीन कल्याणकों में से किसी के होने पर तथा जिनचैत्य एवं चैत्यालयों की वंदना के लिए भी आहारक ऋद्धि वाले छट्ठे गुणस्थानवर्ती प्रमत्त मुनि के आहारकशरीर नामकर्म के उदय से यह शरीर उत्पन्न हुआ करता है।

वह आहारकशरीर सप्त धातुओं से रहित, शुभ संहनन से रहित, शुभ संस्थान वाला, धवल, हस्तप्रमाण, प्रशस्तप्रकृतियों के उदय से युक्त होकर उत्तमांग-मस्तक से प्रगट होता है।

वह आहारक शरीर अव्याघाती होता है, उसकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अंतर्मुहूर्त है तथा आहारकशरीरपर्याप्ति पूर्ण होने पर कदाचित् उसका मरण भी हो जाता है।

प्रमत्तविरत के आहारक शरीर नामकर्म के उदय से आहारवर्गणा के आये हुए पुद्गलस्कन्धों को आहारकशरीररूप परिणमन करने से आहारक शरीर होता है। उसका प्रयोजन कहते हैं-अढ़ाई द्वीप के तीर्थों की यात्रा आदि के लिए विहार करना हो तो असंयम से बचने के लिए ऋद्धिप्राप्त प्रमत्तसंयत मुनि के आहारक शरीर होता है। अथवा श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षयोपशम की मन्दता होने पर जब धर्मध्यान के विरोधी ऐेसे शास्त्र के अर्थ में संदेह होता है तब उस संदेह को दूर करने के लिए ऋद्धिप्राप्त प्रमत्तसंयत के आहारकशरीर प्रकट होता है।

निजक्षेत्र अर्थात् मुनि के अपने रहने के देश में केवली और श्रुतकेवली दोनों का ही अभाव होने पर तथा परक्षेत्र अर्थात् औदारिक शरीर से जाना जहाँ संभव नहीं है ऐसे दूरवर्ती क्षेत्र में केवली, श्रुतकेवली के होने पर या तीर्थंकर के तप आदि तीन कल्याणक होने पर असंयम के परिहार के लिए, संदेह को नष्ट करने के लिए तथा जिनदेव और जिनालयों की वंदना के लिए जाने को उद्यत प्रमत्तसंयत के आहारकशरीर होता है।

वह आहारकशरीर रस आदि सात धातुओं से रहित होता है, शुभ अर्थात् शुभनामकर्म के उदय से प्राप्त प्रशस्त अवयवों से विशिष्ट होता है, अस्थिबंधन से रहित होता है, प्रशस्त समचतुरस्र संस्थान सहित आंगोपांग की रचना से युक्त होता है, धवल अर्थात् चंद्रकांतमणि से निर्मित की तरह अत्यन्त स्वच्छ होता है, हस्त प्रमाण अर्थात् चौबीस व्यवहारांगुल परिमाण वाला होता है। प्रशस्तोदय अर्थात् अध्रुवोदयी प्रकृतियों में आहारकशरीर, आहारकबन्धन, आहारकसंघात, आहारक आंगोपांग आदि प्रशस्त प्रकृतियों के उदय से सहित होता है। इस प्रकार का आहारक शरीर उत्तमांग-मस्तक से प्रकट होता है।

वह आहारक शरीर पर से अपनी और अपने से पर की बाधा से रहित होता है इसी कारण से वैक्रियिक शरीर की तरह वङ्काशिला आदि में से निकलने में समर्थ है। उसकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अंतर्मुहूर्त काल प्रमाण होती है। आहारक शरीर पर्याप्ति परिपूर्ण होने पर कदाचित् आहारक शरीर ऋद्धि से युक्त प्रमत्तसंयत की आहारक काययोग के काल में अपनी आयु का क्षय हो जाने से मरण भी हो जाता है।

इस प्रकार आहारकशरीर का माहात्म्य और जिनप्रतिमा के दर्शन का माहात्म्य जानना चाहिए।

अब कार्मणशरीर का लक्षण कहा जाता है—

कर्म ही कार्मणशरीर है अर्थात् आठ प्रकार के कर्मस्कन्धों को कार्मणशरीर कहते हैं। अथवा कर्म से जो शरीर उत्पन्न होता है उसे कार्मण शरीर कहते हैं। इससे नामकर्म के अवयवरूप कार्मणशरीर का ग्रहण होता है। उस शरीर के निमित्त से जो योग होता है उसे कार्मणकाययोग कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि अन्य औदारिक आदि शरीर वर्गणाओं के बिना केवल एक कर्म से उत्पन्न हुय वीर्य के निमित्त से आत्मप्रदेशपरिस्पन्दरूप जो प्रयत्न होता है उसे कार्मणकाययोग कहते हैं। यह योग एक समय, दो समय अथवा तीन समय तक होता है, इससे अधिक नहीं होता है।

यह औदारिककाययोग किन जीवों के होता है इस बात का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

तिर्यंच और मनुष्यों के औदारिककाययोग और औदारिकमिश्रकाययोग होता है।।५७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—औदारिककाययोग और औदारिकमिश्रकाययोग ये दोनों योग तिर्यंच और मनुष्यों के होते हैं। तिर्यंच और मनुष्यों के औदारिककाययोग ही होता है ऐसा नियम नहीं है क्योंकि उनके तो कार्मणकाययोग आदि का भी सद्भाव पाया जाता है। अत: निष्कर्ष ऐसा निकालना चाहिए कि औदारिककाययोग तिर्यंच और मनुष्यों के ही होता है। अर्थात् अन्य देव और नारकियों के औदारिककाययोग होता ही नहीं है। वैक्रियककाययोग किन जीवों के होता है, इसके प्रतिपादन हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ—

देव और नारकियों के वैक्रियककाययोग और वैक्रियकमिश्रकाययोग होता है।।५८।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—वैक्रियककाययोग और वैक्रियकमिश्रकाययोग ये दोनों योग देव तथा नारकी जीवों के होते हैं। तिर्यंचगति और मनुष्यगति कर्मोदय के साथ वैक्रियक नामकर्म के उदय का विरोध आता है। अथवा तिर्यंच और मनुष्यगति में वैक्रियक नामकर्म का उदय नहीं होता है यह स्वभाव ही है।

शंका—तिर्यंच और मनुष्य भी वैक्रियक शरीर वाले सुने जाते हैं, इसलिए उपर्युक्त बात कैसे घटित होगी ?

समाधान—नहीं, क्योंकि औदारिक शरीर दो प्रकार का है-विक्रियात्मक और अविक्रियात्मक। उनमें जो विक्रियात्मक औदारिक शरीर है वह मनुष्य और तिर्यंचों के वैक्रियक रूप से कहा गया है, उसका यहाँ पर ग्रहण नहीं किया है क्योंकि उसमें नाना गुण और ऋद्धियों का अभाव है। यहाँ पर नाना गुण और ऋद्धियुक्त वैक्रियक शरीर का ही ग्रहण किया है और वह देव और नारकियों के ही होता है।

अधुना आहारशरीरस्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

आहारकायजोगो आहारमिस्सकायजोगो संजदाणमिड्ढिपत्ताणं।।५९।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इड्ढिपत्ताणं संजदाणं आहारकायजोगो आहारमिस्सकायजोगो-ऋद्धिप्राप्तानां संयतानां आहारकाययोग: आहारमिश्रकाययोग: कथ्यते।
कश्चिदाह-आहारद्र्धिप्राप्ते: किमु संयता: ऋद्धिप्राप्ता: अत्र गृह्यन्ते उत वैक्रियिकद्र्धिप्राप्तेस्ते संयता: ऋद्धिप्राप्ता: गृह्यन्ते इति चेत् ?
आचार्यदेव: समाधत्ते-ऋद्धिअनुत्पत्तौ अपि ऋद्धिहेतुसंयम: ऋद्धि: उच्यते, कारणे कार्योपचारात्। ततश्च ऋद्धिहेतुसंयमप्राप्ता: यतय: ऋद्धिप्राप्ता: कथ्यन्ते, तेषामाहारद्र्धिरिति सिद्धे सति न प्राक्कथितदोष: संभवति। अथवा संयमविशेषजनिताहारशरीरोत्पादनशक्तिराहारद्र्धिरिति।
न द्वितीयविकल्पोक्तदोषोऽपि, किंच एकद्धर्या सह अनेकद्र्धय: संभवंति, गणभृत्सु सप्तानामपि ऋद्धीनामक्रमेण सत्त्वोपलंभात्।
आहारकद्र्ध्या सह मन:पर्ययज्ञानस्य विरोधात्, सर्वाभि: ऋद्धिभि: सह विरोधो वत्तुं न पार्यते इति। किन्तु विशेषेण-‘‘युगपदनेकक्रियावृत्तिप्रसंगे सति प्रमत्तविरते वैक्रियिकाहारकशरीरक्रिययो: युगपत्प्रवृत्तिप्रतिषेध: आचार्येण प्ररूपित:।’
अतो ज्ञायते वर्धमानसंयमधारिणां मुनीनामेव आहारकद्र्धिरुत्पद्यते न हीयमानसंयमिनामिति।
संप्रति कार्मणशरीरस्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
कम्मइयकायजोगो विग्गहगइ-समावण्णाणं केवलीणं वा समुग्घाद-गदाणं।।६०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विग्गहगइसमावण्णाणं-विग्रहगतिसमापन्नानां जीवानां समुग्घादगदाणं केवलीणं वा-प्रतरलोकपूरणसमुद्घातगतानां केवलिनां वा, कम्मइयकायजोगो-कार्मणकाययोगो भवति।
विग्रहो देह:, तदर्था गति: विग्रहगति:। औदारिकादिशरीरनामोदयात् स्वनिर्वर्तनसमर्थान् विविधान् पुद्गलान् गृह्णाति विगृह्यतेऽसौ संसारिणा इति वा विग्रहो देह:। विग्रहाय गति: विग्रहगति:। अथवा विरुद्धो ग्रहो विग्रह: व्याघात: पुद्गलादाननिरोध: इत्यर्थ:, विग्रहेण पुद्गलादाननिरोधेन गति: विग्रहगति:। अथवा विग्रहेण कौटिल्येन गति: विग्रहगति:। तां सम्यगापन्ना: प्राप्ता: विग्रहगतिसमापन्ना:।
शरीराणि यत: प्ररोहन्ति तद्बीजभूतं कार्मणशरीरं कार्मणकाय इति भण्यते। वाङ्मन:कायवर्गणानिमित्त: आत्मप्रदेशपरिस्पंदो योगो भवति। कार्मणकायकृतो योग: कार्मणकाययोग:, स विग्रहगतौ वक्रगतौ वर्तमानजीवानां भवति।
एतदुत्तं-गतेर्गत्यन्तरं व्रजतां प्राणिनां चतस्रो गतयो भवन्ति-इषुगति: पाणिमुक्ता लांगलिका गोमूत्रिका चेति। तत्र अविग्रहा: इषुगति: प्राथमिकी, शेषा: विग्रहवत्य:। ऋज्वी गतिरिषुगतिरेकसमयिकी, यथा पाणिना तिर्यक् प्रक्षिप्तस्य द्रव्यस्य गतिरैकविग्रहा गति: तथा संसारिणां एकविग्रहा गति: पाणिमुक्ता द्वैसमयिकी। यथा लांगलं द्विवव्रं तथा द्विविग्रहा गतिर्लांगलिका त्रैसमयिकी। यथा गोमूत्रिका बहुवक्रा तथा त्रिविग्रहा गतिर्गोमूत्रिका चातु:समयिकी। तत्र कार्मणकाययोग: स्यादिति।
स्वस्थितप्रदेशादारभ्योध्र्वाधस्तिर्यगाकाशप्रदेशानां क्रमसन्निविष्टानां पंक्ति: श्रेणिरित्युच्यते। तथैव जीवानां गमनं नोच्छ्रेणिरूपेण। ततस्रिविग्रहा गतिर्न विरुद्धा जीवस्येति।
घातनं घात: स्थित्यनुभवयोर्विनाश: इति यावत्। उपरि घात: उद्घात:, समीचीन उद्घात: समुद्घात:। समुद्घातं गता: समुद्घातगता:, तेषां समुद्घातगतानां केवलिनां कार्मणकाययोग: भवेत्। वा शब्द: समुच्चयप्रतिपादक:।
यतिवृषभोपदेशात्सर्वाघातिकर्मणां क्षीणकषायचरमसमये स्थिते: साम्याभावात्सर्वेऽपि कृतसमुद्घाता: सन्तो निर्वृतिमुपढौकन्ते-निर्वाणं गच्छन्ति। येषामाचार्याणां लोकव्यापिकेवलिषु विंशतिसंख्यानियमस्तेषां मतेन केचित् समुद्घातयन्ति, केचिन्न समुद्घातयन्ति।
के न समुद्घातयन्ति ?
येषां संसृतिव्यक्ति: कर्मस्थित्या समाना ते न समुद्घातयन्ति, शेषा: समुद्घातयन्ति।
अनिवृत्यादिपरिणामेषु समानेषु सत्सु किमिति स्थित्योर्वैषम्यम् ?
न, व्यक्तिस्थितिघातहेतुषु अनिवृत्तिपरिणामेषु समानेषु सत्सु संसृतेस्तत्समानत्वविरोधात्।


अब आहारकशरीर के स्वामी का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

'सूत्रार्थ—'

आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग ऋद्धिप्राप्त छठेगुणस्थानवर्ती संयतों के ही होते हैं।।५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—ऋद्धिप्राप्त संयत महामुनियों के आहारककाययोग और आहारक-मिश्रकाययोग होते हैं ऐसा आगम का कथन है। यहाँ पर कोई शंका करता है कि—

यहाँ पर क्या आहारकऋद्धि की प्राप्ति से संयतों को ऋद्धिप्राप्त शब्द से ग्रहण किया गया है अथवा वैक्रियकऋद्धि की प्राप्ति से भी उन्हें ऋद्धिप्राप्त संयत ग्रहण किया जा सकता है ? आचार्यदेव इस शंका का समाधान करते हैं—

दूसरी ऋद्धियों के उत्पन्न नहीं होने पर भी ऋद्धि के कारणभूत संयम को ही ऋद्धि कहा गया है क्योंकि कारण में कार्य का उपचार हो जाता है। इसलिए ऋद्धि के कारणभूत संयम को प्राप्त हुए मुनियों को ऋद्धिप्राप्तसंयत कहते हैं और उनके आहारकऋद्धि होती है यह बात सिद्ध हो जाती है अत: पूर्वकथित दोष की संभावना नहीं रहती है। अथवा संयमविशेष से उत्पन्न हुई आहारकशरीर के उत्पादनरूप शक्ति को आहारकऋद्धि कहते हैं। इसी प्रकार द्वितीय विकल्प में दिया गया दोष भी नहीं आता है क्योंकि एक ऋद्धि के साथ दूसरी अनेक ऋद्धियाँ भी हो सकती है क्योंकि गणधरों के एक साथ सातों ही ऋद्धियों का सद्भाव पाया जाता है।

आहारकऋद्धि के साथ मन:पर्ययज्ञान का विरोध है अर्थात् मन:पर्ययज्ञान और आहारकऋद्धि एक साथ नहीं हो सकते हैं किन्तु आहारकऋद्धि का दूसरी संपूर्ण ऋद्धियों के साथ विरोध नहीं कहा जा सकता है। वैक्रियक और आहारकशरीर की क्रियाओं के एक साथ होने का निषेध आचार्य ने किया है। अर्थात् ये दोनों क्रिया प्रमत्तविरत के संस्कारवश भी एक साथ नहीं होती है।

इससे यह ज्ञात होता है कि वर्धमान-वृद्धिंगत चारित्र (संयम) धारी मुनियों के ही आहारकऋद्धि उत्पन्न होती है, हीयमान-घटते हुए चारित्ररूप जघन्य संयमी मुनियों के आहारकऋद्धि नहीं होती है।

अब कार्मणशरीर के स्वामी का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

विग्रहगति को प्राप्त चारों गतियों के जीवों के तथा प्रतर और लोकपूरण समुद्घात को प्राप्त केवलीजिन के कार्मणकाययोग होता है।।६०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—विग्रहगति को प्राप्त जीवों के तथा प्रतर एवं लोकपूरण समुद्घात करने वाले केवली भगवन्तों के कार्मणकाययोग होता है। देह को विग्रह कहते हैं, उस देह-विग्रह के लिए जो गति होती है उसे विग्रहगति कहते हैं। यह जीव औदारिक आदि शरीर नामकर्म के उदय से अपने-अपने शरीर की रचना करने में समर्थ नाना प्रकार के पुद्गलों को ग्रहण करता है अथवा संसारी जीव के द्वारा शरीर का ग्रहण किया जाता है इसलिए देह को विग्रह कहते हैं। ऐसे विग्रह अर्थात् शरीर के लिए जो गति होती है उसे विग्रहगति कहते हैंं। अथवा ‘वि’ शब्द का अर्थ विरुद्ध और ‘ग्रह’ शब्द का अर्थ ग्रहण होने से विग्रह शब्द का अर्थ व्याघात है जिसका अर्थ पुद्गलों के ग्रहण करने का निरोध होता है। इसलिए विग्रह अर्थात् पुद्गलोें के ग्रहण करने के निरोध के साथ जो गति होती है उसे विग्रहगति कहते हैं। अथवा विग्रह, व्याघात और कौटिल्य ये पर्यायवाची नाम हैं इसलिए विग्रह से अर्थात् कुटिलता (मोड़ों) के साथ जो गति होती है उसे विग्रहगति कहते हैं। उसको-विग्रहगति को भली प्रकार से प्राप्त जीव विग्रहगतिसमापन्न कहलाते हैं। उन सभी विग्रहगतिसमापन्न जीवों के कार्मणकाययोग होता है।

जिससे सम्पूर्ण शरीर उत्पन्न होते हैं उस बीजभूत कार्मणशरीर को कार्मणकाय कहते हैं। वचनवर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणा के निमित्त से जो आत्मप्रदेशों को परिस्पन्दन होता है उसे योग कहते हैं। कार्मणकाय से जो योग उत्पन्न होता है उसे कार्मणकाययोग कहते हैं। वह विग्रहगति अर्थात् वक्रगति (मोड़ेवाली गति) में विद्यमान जीवों के होता है।

आगम में ऐसा कहा है कि एक गति से दूसरी गति में गमन करने वाले जीवों के चार गतियाँ होती हैं-इषुगति, पाणिमुक्तागति, लांगलिकागति और गोमूत्रिका गति। उनमें सबसे पहली जो इषुगति है वह विग्रहरहित होती है और शेष गतियाँ विग्रहसहित होती हैं। ऋजु अर्थात् सरल-धनुष से छूटे हुए बाण के समान मोड़ा रहित गति को इषुगति कहते हैं। इस गति में एक समय लगता है। जैसे हाथ से तिरछे फैके गये द्रव्य की एक मोड़े वाली गति होती है उसी प्रकार संसारी जीवों के एक मोड़ वाली गति को पाणिमुक्ता गति कहते हैं, यह दो समयवाली होती है।

जैसे हल में दो मोड़े होते हैं उसी प्रकार दो मोड़े वाली गति को लांगलिका गति कहते हैं, यह तीन समय वाली होती है। जैसे गाय का चलते समय मूत्र करना अनेक मोड़ों वाला होता है उसी प्रकार तीन मोड़े वाली गति को गोमूत्रिका गति कहते हैं, यह गति चार समय वाली होती है। इन तीनों विग्रहगतियों में प्रत्येक गति के अंतिम समय को छोड़कर कार्मणकाययोग होता है।

जो प्रदेश जहाँ स्थित हैं वहाँ से लेकर ऊपर, नीचे और तिरछे क्रम से विद्यमान आकाशप्रदेशों की पंक्ति को श्रेणी कहते हैं। इस श्रेणी के द्वारा ही जीवों का गमन होता है, श्रेणी को उलंघन करके नहीं होता है। इसलिए विग्रहगति वाले जीव के तीन मोड़े वाली गति विरोध को प्राप्त नहीं होती है। अर्थात् संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ पर पहुँचने के लिए चार मोड़े लग सके।

घातने रूप धर्म को घात कहते हैं जिसका प्रकृत में अर्थ है कर्मों की स्थिति और अनुभाग का विनाश होना। उत्तरोत्तर होने वाले घात को उद्घात कहते हैं और समीचीन उद्घात को समुद्घात कहते हैं। उन समुद्घातगत केवलियों के कार्मणकाययोग होता है। यहाँ सूत्र में आया हुआ ‘वा’ शब्द समुच्चयरूप अर्थ का प्रतिपादक है।

श्रीयतिवृषभाचार्य के उपदेशानुसार क्षीणकषाय गुणस्थान के चरम समय में सम्पूर्ण अघातिया कर्मों की स्थिति समान नहीं होने से सभी केवली समुद्घात करके ही मुाक्त को प्राप्त होते हैं। परन्तु जिन आचार्यों के मतानुसार लोकपूरण समुद्घात करने वाले केवलियों की बीस संख्या का नियम है, उनके मतानुसार कितने ही केवली समुद्घात करते हैं और कितने ही नहीं करते हैं।

शंका—कौन से केवली समुद्घात नहीं करते हैं ?

समाधान—जिनके संसार में रहने का काल वेदनीय आदि तीन कर्मों की स्थिति के समान है वे समुद्घात नहीं करते हैं, शेष केवली समुद्घात करते हैं।

शंका—अनिवृत्ति आदि परिणामों के समान रहने पर संसारव्यक्तिस्थिति-संसार में रहने का काल और शेष तीन कर्मों की स्थिति में विषमता क्यों रहती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि व्यक्तिस्थिति के घात के कारणभूत अनिवृत्तिरूप परिणामों के समान रहने पर संसार को उसके अर्थात् तीन कर्मों की स्थिति के समान मान लेने में विरोध आता है।

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