035.फतेहपुर में संघ द्वारा धर्म प्रभावना

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फतेहपुर में संघ द्वारा धर्म प्रभावना

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फतेहपुर में धर्मप्रभावना- वहाँ पर प्रतिदिन चौके बढ़ने लगे और लोगों में गुरु भक्ति बढ़ने लगी। फाल्गुन की आष्टान्हिका के अवसर पर सिद्धचक्र विधान का निर्णय हुआ। तब वहाँ के लोगों में दो पार्टी बन गई, एक बीसपंथ के पक्ष में और दूसरी तेरहपंथ के पक्ष में। चर्चा बढ़ती गई, मुनिश्री श्रुतसागर जी के पास कई एक महानुभाव आये। महाराज जी ने जयधवला ग्रंथ का प्रमाण दिखा दिया, जो निम्नप्रकार है- ‘‘ण्हवणोवलेवण संमज्जण छुहावण फुल्लारोहणधूवदहणादिवावारेहि जीववहाविणाभावीहि विणा पूजकरणाणुववत्तीदो च।’’ अभिषेक करना, अवलेप करना, संमार्जन करना, चंदन लगाना, फूल चढ़ाना और धूप का जलाना आदि जीववध के अविनाभावी व्यापारों के बिना पूजा करना बन नहीं सकता।१ इसके बाद महाराज जी ने मुझे बुलाया और कहा- ‘‘ज्ञानमतीजी! आप कितने प्रमाण दिखा सकती हैं?’’ मैंने कहा- ‘‘पचास से अधिक प्रमाण मैं दिखा सकती हूँ।’’ ग्रंथों को निकलवाया गया, वसुनंदिश्रावकाचार, उमास्वामी श्रावकाचार, श्री पूज्यपादकृत पंचामृत अभिषेकपाठ आदि। इन सभी में सर्वोपरि प्रमाण तो जयधवला का ही है, अस्तु, सदासुख के द्वारा हिन्दी वचनिका लिखी गई ऐसे रत्नकरण्ड श्रावकाचार में लिखा है। उन्हीं के वाक्य देखिए-‘‘दोनों ही पंथ आगम में पाइये......अब यहाँ जिनपूजन सचित्त द्रव्यनितैं हू अर अचित्त द्रव्यनितैं हू आगम में कह्या है जे सचित्त के दोषतैं भयभीत हैं यत्नाचारी हैं ते तो प्रासुक जल गंध अक्षत चन्दन कुंकुमादिकतैं लिप्त करि सुगन्ध रंगीन में पुष्पनिका संकल्पकरि पुष्पनितैं पूजैं हैं तथा आगम में कहे सुवर्ण के पुष्प वा रुपा के पुष्प तथा रत्नजटित सुवर्ण के पुष्प तथा लवंगादिक अनेक मनोहर पुष्पनिकरि पूजन करै हैं अरु प्रासुक ही बहु आरम्भादिकरहित प्रमाणीक नैवेद्यकरि पूजन करै हैं। बहुरि रत्ननि के दीपक वा सुवर्ण रूपामय दीपकनि करि पूजन करै हैं तथा सचिक्कण द्रव्यनिके केसरके रंगादितैं दीप का संकल्पकरि पूजन करें हैं तथा चंदन अगरादिककु चढ़ावै हैं तथा बादाम जायफल पूंगीफलादिकअवधि शुद्ध प्रासुक फलनितै पूजन करै हैं ऐसे तो अचित्त द्रव्यनिकरि पूजन करै हैं।

बहुरि जे सचित्त द्रव्यनितैं पूजन करें हैं ते जल गन्ध अक्षतादि उज्ज्वल द्रव्यनिकरि पूजन करें हैं अर चमेली चंपक कमल सोनजाई इत्यादिक सचित्त पुष्पनितैं पूजन करैं हैं,घृतका दीपक तथा कपूरादिक दीपकनि करि आरती उतारै हैं अर सचित्त आम्र केला दाडिमादिक फल करि पूजन करैं हैं धूपायनि में धूप दहन करें हैं ऐसैं सचित्त द्रव्यनिकरि हूँपूजन करिये हैं दोऊ प्रकार आगम की आज्ञा-प्रमाण सनातन मार्ग है। अपने भावनि के अधीन पुण्यबन्ध के कारण है।१’’ इस प्रमाण को दिखाकर मुनिश्री श्रुतसागर जी ने कहा- ‘‘एक पंथ के प्रमाण तो हम दे रहे हैं। दूसरे-तेरहपंथ के प्रमाण आगम से आप दे दीजिये, वे हों प्राचीन आचार्यों के न कि आधुनिक पंडितों के। इसके लिए हम आपको छह माह का समय देते हैं।’’ आश्चर्य है कि आज तक वे लोग कोई प्रमाण लेकर सामने नहीं आये। अस्तु- उस समय मुनिश्री श्रुतसागर जी के द्वारा व मेरे द्वारा समझाने के बाद दोनों पंथ के लोगों ने एक ही मंडल पर एकसाथ विधान किया। तेरहपंथ वाले खड़े-खड़े अपनी सामग्री से कर रहे थे और बीसपंथ वाले बैठकर फल-फूल चढ़ाकर आगम आम्नाय से विधान कर रहे थे। वहाँ पर इस प्रकार विधान व वेदी प्रतिष्ठा कार्य निर्विघ्न संपन्न हुए।

होली में दुर्घटना-

इसी आष्टान्हिक पर्व में होली त्यौहार के दो-तीन दिन पूर्व कुछ अज्ञानी लोगों ने एक दिन मध्यान्ह में एक बालक को नंगा कर उसके हाथ में एक लोटा और एक झाडू देकर मुनिमहाराज की जय करते हुए, ढोल बजाते हुए, जुलूस निकाला। जुलूस मंदिर के पास से निकला। यह आश्चर्य देखकर हम लोगों को दुःख हुआ। श्रावक भी बहुत ही दुःखी हुए और इन मूर्खों को रोकने का प्रयास करने लगे। वे लोग तो सर्वथा मूढ़ थे, वे तो दिगम्बर मुनियों की हंसी उड़ा रहे थे अतः नहीं माने और पुनरपि रात्रि में एक स्थान पर बैठकर विचार-विमर्श करने लगे कि- ‘‘अगले दिन दो-तीन नंगे साधु बनाकर, दो तीन महिलाओं को सपेâद साड़ी पहनाकर आर्यिका बनाकर जुलूस निकालना है।’’ तभी वहाँ आकस्मिक दुर्घटना हो गई, ऊपर से छत गिर गई और शायद एक-दो मर गये, कुछ घायल हो गये। प्रातः होते ही उस समुदाय के कुछ लोग आचार्यश्री के पास आये और क्षमा याचना करने लगे, तब मैंने उपदेश दिया और समझाया कि- ‘‘जैन साधु कभी किसी को शाप नहीं देते हैं, न किसी का बुरा ही सोचते हैं किन्तु उनकी निंदा, अवहेलना, हंसी आदि से लोग स्वयं ही पाप कमा लेते हैं और इनकी प्रशंसा, भक्ति, सेवा आदि से लोग स्वयं ही पुण्य बांध लेते हैं।’’ वास्तव में दिगंबर मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका का वेष नाटक में, खेल में या हंसी में भी नहीं बनाना चाहिए। इससे बहुत बड़ी हानि होती है। इस विषय में ब्रह्मगुलाल की कथा प्रसिद्ध है-उसने लीला मात्र में मुनि का वेष धारण किया था पुनः मुनि ही बन गये, वापस गृहस्थी में नहीं रहे। पुनः संघ सीकर वापस आ गया।

शास्त्रार्थ का आह्वान-

आचार्यश्री सीकर में आकर कुछ दिन के लिए रानोली चले गये और मुझे चार आर्यिकाओं के साथ यहीं सीकर कुछ दिन रुकने के लिए कह गये। यहाँ पर उन दिनों ब्र. मूलशंकर देशाई ठहरे हुए थे, वे मेरे पास नहीं आते थे। उधर दूसरे मंदिर मेंं मुनियों के विरोध में कुछ न कुछ उपदेश दिया करते थे। प्रातः काल कुछ प्रबुद्ध श्रावक आकर मेरे पास शंका रखते और समाधान मांगते। एक बार शंका आयी- ‘‘मुनियों को घास या पाटा नहीं लेना चाहिए चूँकि भूमिशयन मूलगुण है।’’ मैंने मूलाचार दिखाकर समाधान दिया- मूलाचार में लिखा है-‘‘तृणमये काष्ठमये शिलामये भूमिप्रदेशे च संस्तरे गृहस्थयोग्यप्रच्छादनविरहिते१।’’ संस्तर के चार भेद हैं-तृणमय-घास चटाई, काष्ठमय-पाटा, तखत आदि, शिलामय-पत्थर की चट्टान आदि और भूमिप्रदेश-जमीन इन पर साधु शयन करे। पुनश्च-‘‘संथारवासयाणं-संस्तारश्चतुर्धा भूमिशिलाफलकतृणभेदात्२।’’ इसी प्रकार अनगारधर्मामृत, भगवती आराधना आदि ग्रंथों में भी अनेक प्रमाण विद्यमान हैं। इस तरह दूसरे श्रावकों द्वारा ही अनेक प्रश्नोत्तर चलते रहे पुनः एक दिन ब्र. मूलशंकरजी ने कहलाया- ‘‘मैं माताजी से शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ।’’ मैंने उसी दिन एक श्रावक को रानोली आचार्यश्री के पास भेज दिया आज्ञा लेने हेतु, आचार्यश्री ने भी एक श्रावक से पत्र लिखा दिया- ‘‘आर्यिका ज्ञानमतीजी को मैं पूर्ण अधिकार देता हूँ, वे कल से ही मूलशंकर जी के साथ शास्त्रार्थ प्रारंभ कर दें।’’ यह सूचना प्राप्त करते ही ब्रह्मचारी महोदय उसी दिन रात्रि में ही चले गये। ‘वे किधर गये हैं’? प्रातः यह जानकारी तक न हो पाई पुनः कुछ दिनों बाद आचार्यश्री का ससंघ चातुर्मास सीकर की भक्त समाज के आग्रह से सीकर में होना निश्चित हो गया।