035. तृतीय महाधिकार - संसार स्थितिघात के कारण.......

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तृतीय महाधिकार - संसार स्थितिघात के कारण

संसारविच्छित्ते: किं कारणम् ?

‘‘द्वादशाङ्गावगम: तत्तीव्रभक्ति: केवलिसमुद्घातोऽनिवृत्तिपरिणामाश्च।’’ न च एते सर्वेषु संभवन्ति, श्रेण्यारोहणदर्शनात्-दशपूर्व-नवपूर्वधारिणां अपि क्षपकश्रेण्यारोहणदर्शनात्।
न तत्र संसारसमानकर्मस्थितय: समुद्घातेन विना स्थितिकांडकानि अंतर्मुहूर्तेन निपतनस्वभावानि पल्योपमस्यासंख्येयभागायतानि संख्येयावलिकायतानि च निपातयन्त: आयु:समानि कर्माणि कुर्वन्ति। अपरे समुद्घातेन समानयन्ति। न चैष: संसारघात: केवलिनि प्राक् संभवति, स्थितिकांडघातवत्समानपरिणामत्वात्।
परिणामातिशयाभावे पश्चादपि मा भूत्तद्घात: इति चेत् ?
न, वीतरागपरिणामेषु समानेषु सत्सु अंतर्मुहूर्तायुरपेक्ष्य आत्मन: समुत्पन्नेभ्य: तद्घातोपपत्ते:।
अन्यैराचार्यैरव्याख्यानमिममर्थं भणन्त: कथं न सूत्रप्रत्यनीका: ?
न, वर्षपृथक्त्वान्तरसूत्रवशवर्तिनां तद्विरोधात्।
अस्मिन् विषये द्वे गाथे लभ्येते-
छम्मासाउवसेसे उप्पण्णं जस्स केवलं णाणं।
ससमुग्घाओ सिज्झइ सेसा भज्जा समुग्घाए।।
पुनश्च-
जेसिं आउसमाइं णामा गोदाणि वेयणीयं च।
ते अकयसमुग्घाया वच्चंतियरे समुग्घाए।।
कश्चिदाह-नागमस्तर्कगोचर: इति चेत् ?
न, एतयोर्गाथयोरागमत्वेन निर्णयाभावात्। भावे वास्तु गाथयोरेवोपादानम्।१
तात्पर्यमेतत्-विग्रहगतिसमापन्नानां केवलिनां समुद्घातगतानां च कार्मणकाययोगो भवतीति ज्ञातव्यम्।

अधुना काययोगेषु गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-'कायजोगो ओरालियकायजोगो ओरालियमिस्सकायजोगो एइंदियप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।६१।।'

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कायजोगो-सामान्यकाययोग:, ओरालियकायजोगो-औदारिककाययोग:, ओरालियमिस्सकायजोगो-औदारिकमिश्रकाययोग:, एइंदियप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति-एकेन्द्रियप्रभृति यावत् सयोगिकेवलिन: इति।

तर्हि देशविरतादिक्षीणकषायान्तानामपि औदारिकमिश्रकाययोग: प्राप्नोति इति चेत् ?
न, अत्र प्रभृतिशब्द: प्रकारे परिगृह्यते, ततो न तेषां ग्रहणं। व्यवस्थावाचिनोऽपि ग्रहणे न दोष:, ‘‘ओरालियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’’ इति बाधकसूत्रसंभवाद्वा। न देशविरतादिक्षीणकषायपर्यन्तानां औदारिकमिश्रकाययोग: इति निश्चीयते।


शंका

संसार के विच्छेद का क्या कारण है ?

समाधान—द्वादशांग का ज्ञान, उनमें तीव्र भक्ति, केवलिसमुद्घात और अनिवृत्तिरूप परिणाम ये सब संसार के विच्छेद के कारण हैं। परन्तु ये सब कारण समस्त जीवों मे संभव नहीं हैं, क्योंकि दशपूर्व और नौ पूर्वधारी जीवों का भी क्षपकश्रेणी पर चढ़ना देखा जाता है।

वहाँ पर संसार के समान कर्मस्थिति नहीं पाई जाती है। इस प्रकार अंतर्मुहूर्त में नियम से निपतन स्वभाव वाले ऐसे पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण या संख्यात आवलीप्रमाण स्थितिकाण्डकों का निपतन करते हुए कितने ही जीव समुद्घात के बिना ही आयु के समान शेष कर्मों को कर लेते हैं। तथा कितने ही जीव समुद्घात के द्वारा शेष कर्मों को आयुकर्म के समान करते हैं परन्तु यह संसार का घात केवली में संभव नहीं है क्योंकि पहले स्थितिकाण्डक के घात के समान सभी जीवों के समान परिणाम पाये जाते हैं।

शंका—जब परिणामों में कोई अतिशय नहीं पाया जाता है अर्थात् समस्त केवलियों के परिणाम एक जैसे होते हैं तो पीछे भी संसार का घात नहीं होना चाहिए ?

समाधान—नहीं, क्योंकि वीतरागरूप परिणामों के समान रहने पर भी अंतर्मुहूर्तप्रमाण आयुकर्म की अपेक्षा से आत्मा के उत्पन्न हुए अन्य विशिष्ट परिणामों से संसार का घात बन जाता है।

शंका—अन्य आचार्यों के द्वारा नहीं व्याख्यान किये गये इस अर्थ का इस प्रकार व्याख्यान करने वाले आचार्य सूत्र के विरुद्ध जा रहे हैं, ऐसा क्यों न माना जाय ?

समाधान—नहीं, क्योंकि वर्षपृथक्त्व के अन्तराल का प्रतिपादन करने वाले सूत्र के वशवर्ती आचार्यों का ही पूर्वोक्त कथन से विरोध आता है। इस विषयक दो गाथासूत्र देख जाते हैं।

गाथार्थ—छह माह प्रमाण आयुकर्म के शेष रहने पर जिस जीव को केवलज्ञान उत्पन्न होता है वह समुद्घात करके ही मुक्त होता है। शेष जीव समुद्घात करते भी हैं और नहीं भी करते हैं। पुन:—

गाथार्थ—जिन जीवों के नाम, गोत्र और वेदनीय कर्म की स्थिति आयुकर्म के समान होती है वे समुद्घात नहीं करके ही मुक्ति को प्राप्त होते हैं तथा इनसे अतिरिक्त दूसरे जीव समुद्घात करके ही मुक्त होते हैं। यहाँ कोई शंका करता है कि—

आगम तो तर्क का विषय नहीं है, इसलिए तर्क के बल से पूर्वोक्त गाथाओं के अभिप्राय का खण्डन करना उचित नहीं है ? इसका समाधान करते हैं कि—

ऐसा नहीं है क्योंकि इन दोनों गाथाओं का आगमरूप से निर्णय नहीं हुआ है। अथवा इन दोनों गाथाओं का आगमरूप से निर्णय हो जाने पर इनका ही ग्रहण किया जावे तो भी कोई बाधा नहीं है।

तात्पर्य यह है कि विग्रहगति को प्राप्त जीवों के तथा समुद्घात अवस्था वाले केवलियों के कार्मणकाययोग होता है ऐसा समझना चाहिए। अब काययोग में गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

'सामान्य से काययोग और की अपेक्षा औदारिककाययोग व औदारिकमिश्र-काययोग एकेन्द्रिय से लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक होते हैं।।६१।।'

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—सामान्य काययोग, औदारिककाययोग व औदारिकमिश्रकाययोग एकेन्द्रिय से लेकर सयोगकेवली तक होते हैं।

शंका—तब तो देशविरत आदि क्षीणकषायपर्यन्त गुणस्थानों में भी औदारिकमिश्रकाययोग का सद्भाव प्राप्त हो जायेगा ?

समाधान—नहीं, क्योंकि यह ‘‘प्रभृति’ शब्द व्यवस्था और प्रकाररूप अर्थ में रहता है उनमें से यहाँ पर प्रकार अर्थ में प्रभृति शब्द ग्रहण किया गया है। इसलिए औदारिकमिश्रयोग में देशविरत आदि क्षीणकषाय तक के गुणस्थानों का ग्रहण नहीं होता है। अथवा व्यवस्थावाची भी प्रभृति शब्द के ग्रहण करने पर कोई दोष नहीं आता है। अथवा ‘‘ओरालियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’’ अर्थात् औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है इस बाधक सूत्र के संभव होने के कारण भी पूर्वोक्त दोष नहीं आता है। देशविरत आदि से लेकर क्षीणकषाय नामक बारहवें गुणस्थान पर्यन्त औदारिकमिश्रकाययोग नहीं होता है ऐसा निर्णय हो जाता है।

अधुना वैक्रियिककाययोगाधिपतिसूचनार्थं उत्तरसूत्रावतार:

अधुना वैक्रियिककाययोगाधिपतिसूचनार्थं उत्तरसूत्रावतार: क्रियते-वेउव्वियकायजोगो वेउव्वियमिस्सकायजोगो सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति।।६२।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति-संज्ञिमिथ्यादृष्टिप्रभृति यावत् असंयतसम्यग्दृष्टि: इति, वेउव्वियकायजोगो वेउव्व्यिमिस्सकायजोगो-वैक्रियिककाययोग: वैक्रियिक-मिश्रकाययोग: स्त:। अत्रापि सम्यङ्मिथ्यादृष्टे: वैक्रियिकमिश्रकाययोगो नास्तीति ज्ञातव्यं। ‘सम्मामिच्छाइट्ठिट्ठाणे णियमा पज्जत्ता’, ‘वेउव्वियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’ इत्याभ्यां सूत्राभ्यां वा अवसीयते।

अधुना आहारकाययोगस्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीआचार्यदेवेन-आहारकायजोगो आहारमिस्सकायजोगो एक्कम्हि चेव पमत्तसंजदट्ठाणे।।६३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारकायजोगो आहारमिस्सकायजोगो एक्कम्हि चेव पमत्तसंजदट्ठाणे-आहारकाययोग: आहारमिश्रकाययोग: एकस्मिन् चैव प्रमत्तसंयतनामषष्ठगुणस्थाने भवत:।
अप्रमत्तसंयतानां आहारकाययोग: किं न भवति ?
न भवति, तत्र तदुत्थापने निमित्ताभावात्। प्रमत्तसंयतमुने: आज्ञाकनिष्ठताया:-आप्तवचनेषु संदेहजनितशिथिलताया: समुत्पन्नप्रमाद: असंयमबहुलोत्पन्नप्रमादश्च आहारकाययोगोत्थापने निमित्तकारणं। विंâच प्रमादनिमित्तकं यत्कार्यं तदप्रमादिनि कथं संभवति अतिप्रसंगात्। अथवा स्वभावोऽयं यदाहारकाययोग: प्रमादिनामेवोपजायते नाप्रमादिनामिति।

कार्मणकाययोगाधारजीवप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-कम्मइयकायजोगो एइंदियप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।६४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कम्मइयकायजोगो एइंदियप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति-कार्मणकाययोग: एकेन्द्रियादिसयोगिकेवलिपर्यंतं भवति। देशविरतादिक्षीणकषायान्तानां कार्मणकाययोगो नास्ति। समुद्घातादृते पर्याप्तानां न चैष योग: विग्रहगतेरभावात्।
देवविद्याधरादीनां पर्याप्तानामपि वक्रा गतिरुपलभ्यते इति चेत् ?
न, पूर्वशरीरं परित्यज्य उत्तरशरीरमादातुं व्रजतो वक्रगतेर्विवक्षितत्वात्।
एवं चतुर्थस्थले काययोगिनां भेदप्रभेदकथनपराणि नवसूत्राणि गतानि।

योगत्रयस्य स्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-मणजोगो वचिजोगो कायजोगो सण्णिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मणजोगो-चतुर्णां मनसां सामान्यं मन:, तज्जनितवीर्येण परिस्पंदलक्षणेन योगो मनोयोग:। वचिजोगो-तथैव चतुर्णां वचसां सामान्यं वचोयोग:। कायजोगो-सप्तानां कायानां सामान्यं काययोग:। एते त्रयोऽपि योगा: क्षयोपशमापेक्षया त्र्यात्मकैकरूपमापन्ना: संज्ञिमिथ्यादृष्टेरारभ्य आ सयोगकेवलिन: इति क्रमेण संभवापेक्षया वा स्वामित्वमुत्तं।

अब वैक्रियककाययोग के स्वामी को बतलाने हेतु उत्तर सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

वैक्रियककाययोग और वैक्रियकमिश्रकाययोग संज्ञीमिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक होते हैं।।६२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि पर्यन्त जितने जीव हैं उन सबके वैक्रियककाययोग और वैक्रियकमिश्रकाययोग होते हैं। यहाँ पर भी सम्यग्मिथ्यादृष्टि नाम के तृतीय गुणस्थान वाले जीवों के वैक्रियकमिश्रकाययोग नहीं होता है ऐसा जानना चाहिए। ‘‘सम्मामिच्छाइट्ठिट्ठाणे णियमा पज्जत्ता’’ ‘‘वेउव्वियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं’’ अर्थात् सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में जीव नियम से पर्याप्तक ही होते हैं और वैक्रियकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है। इन दोनों सूत्रों से भी जाना जाता है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि के वैक्रियकमिश्रकाययोग नहीं पाया जाता है। अब आहारककाययोग के स्वामी का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग एक प्रमत्तसंयत गुणस्थान में ही होते हैं।।६३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—प्रमत्तसंयत नामक एक ही गुणस्थान में आहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग ये दोनों योग होते हैं।

शंका—अप्रमत्तसंयत जीवों के आहारककाययोग क्यों नहीं होता है ?

समाधान—अप्रमत्तसंयत जीवों के आहारककाययोग उत्पन्न कराने में निमित्तकारण का अभाव है। प्रमत्तसंयत मुनि के आज्ञाकनिष्ठता अर्थात् आप्तवचनों में संदेहजनित शिथिलता के होने से उत्पन्न हुआ प्रमाद और असंयम की बहुलता से उत्पन्न प्रमाद आहारककाय की उत्पत्ति का निमित्त कारण है। जो कार्य प्रमाद के निमित्त से उत्पन्न होता है वह अप्रमादी जीवों में भला कैसे संभव हो सकता है ? क्योंकि इससे अतिप्रसंग दोष आ जाता है। अथवा यह स्वभाव ही है कि आहारककाययोग प्रमत्तगुणस्थान वालों के ही होता है, प्रमादरहित जीवों के नहीं होता है। अब कार्मणकाययोग के आधारभूत जीवों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

कार्मणकाययोग एकेन्द्रिय जीवों से लेकर सयोगिकेवली तक होता है।।६४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—एक इंद्रिय जीव से लेकर सयोगकेवली तक जीवों के कार्मणकाययोग होता है। देशविरत आदि क्षीणकषायपर्यन्त गुणस्थान वाले जीवों के कार्मण-काययोग नहीं होता है। समुद्घात को छोड़कर पर्याप्तक जीवों के कार्मणकाययोग नहीं पाया जाता है। क्योंकि वहाँ विग्रहगति का अभाव है।

शंका—देव, विद्याधर आदि पर्याप्तक जीवों के भी क्या वक्रगति पाई जाती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि पूर्व शरीर को छोड़कर आगे के शरीर को ग्रहण करने के लिए जाते हुए जीव के जो एक, दो या तीन मोड़े वाली गति होती है वही गति यहाँ पर वक्रगतिरूप से विवक्षित है। इस प्रकार चतुर्थस्थल में काययोगियों के भेद-प्रभेद के कथन की मुख्यता से नौ सूत्र पूर्ण हुए। अब तीनों योगों के स्वामी का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

मनोयोग, वचनयोग और काययोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगिकेवली तक होते हैं।।६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—चार प्रकार का मन सामान्य मन कहलाता है, उस मन से उत्पन्न हुए परिस्पन्दन लक्षण वाले वीर्य के द्वारा जो योग होता है उसे मनोयोग कहते हैं। उसी प्रकार चारों प्रकार के वचनों में जो योग होता है उसे सामान्य वचनयोग कहते हैं। सात प्रकार के कायो में जो अन्वयरूप से रहता है उसे सामान्य काययोग कहते हैं।

ये योग तीन होते हुए भी क्षयोपशम की अपेक्षा त्रयात्मक एकरूपता को प्राप्त होकर संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं। अथवा क्रम से संभव होने की अपेक्षा स्वामित्व का प्रतिपादन किया है।

संप्रति द्विसंयोगयोगप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति

संप्रति द्विसंयोगयोगप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-वचिजोगो कायजोगो बीइंदियप्पहुडि जाव असण्णिपंचिन्दिया त्ति।।६६।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वचिजोगो कायजोगो-सामान्यवाक्काययोगौ, बीइंदियप्पहुडि जाव असण्णि-पंचिंदिया त्ति-द्वीन्द्रियादिअसंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यंतमिति। अत्र विशेषे एतज्ज्ञातव्यं यत् तुरीयस्यैव वचस: सत्त्वं।
उपरिष्टात् वाक्काययोगौ विद्येते ततो नासंज्ञिन: पर्यवसानं इति चेत् ?
न, उपरि त्रयाणामपि सत्त्वात्। अतोऽत्र द्विसंयोगियोगस्यैव विवक्षितत्वात्।

अधुना एकसंयोगयोगस्य निरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-कायजोगो एइंदियाणं।।६७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रियाणां जीवानां एक: काययोग: एव भवति। द्वीन्द्रियादीनामसंज्ञिपर्यंतानां वाक्काययोगौ, शेषास्त्रियोगा: इति।
एवं पंचमस्थले योगिनां गुणस्थानापेक्षया त्रीणि सूत्राणि गतानि।

प्राक् सामान्येन योगस्य सत्त्वं निरूप्याधुना कालापेक्षया योगप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-मणजोगो वचिजोगो पज्जत्ताणं अत्थि, अपज्जत्ताणं णत्थि।।६८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पर्याप्तजीवानां मनोवाग्योगौ स्त:, न अपर्याप्तानां, इति ज्ञातव्यं।

काययोगसामान्यस्य सत्त्वप्रदेशप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-कायजोगो पज्जत्ताण वि अत्थि, अपज्जत्ताण वि अत्थि।।६९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-काययोग: पर्याप्तानामपि अस्ति अपर्याप्तकानामपि अस्ति। अत्र सूत्रे ‘अपि’ शब्द समुच्चयार्थे द्रष्टव्य:। विस्तररुचिसत्त्वानुग्रहार्थत्वात्, द्विबारं ‘अस्ति’ शब्दप्रयोगो ज्ञातव्य इति।

कास्ता: पर्याप्तय इत्याशंकायां सूत्रावतार: क्रियते-छ पज्जत्तीओ, छ अपज्जत्तीओ।।७०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-षट् पर्याप्तय: षट् अपर्याप्तयो भवन्तीति। आहारशरीरेन्द्रियोच्छ्वासनि:श्वास-भाषामनसां निष्पत्ति: पर्याप्ति:। एतासामेवानिष्पत्तिरपर्याप्ति:। इमा: षट् षट् भवन्ति। आसां लक्षणं प्रागुत्तं अतोऽत्र नोच्यते।
एवं षष्ठस्थले योगिनां पर्याप्त्यपर्याप्त्यपेक्षया त्रीणि सूत्राणि गतानि।

इदानीं तासामाधारप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-सण्णिमिच्छाइट्ठि-प्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति।।७१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इमा: षडपि पर्याप्तय: संज्ञिमिथ्यादृष्टेरारभ्य असंयतसम्यग्दृष्टिपर्यंता: भवन्ति। तृतीयगुणस्थाने अपर्याप्तकालाभावात् षट् अपर्याप्तय: तत्र न सन्ति। देशविरतादिउपरितनगुणस्थानानां षट्पर्याप्तयोऽपि न सन्ति। किंच पर्याप्तिर्नाम षण्णां पर्याप्तीनां समाप्ति:,न सा उपरितनगुणस्थानेष्वस्ति अपर्याप्तिचरमावस्थायां ऐक्यसमयिक्या उपरि सत्त्वविरोधात्।

पंचापि पर्याप्तयो भवन्तीति प्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-पंच पज्जत्तीओ पंच अपज्जत्तीओ।।७२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोवर्जा: शेषा: पंच पर्याप्तयो भवन्ति क्वचिद्जीवविशेषे, पंच अपर्याप्तयश्चेति।

ता: केषां भवन्तीति आरेकायां सूत्रावतार: क्रियते-बीइंदियप्पहुडि जाव असण्णिपंिंचदिया त्ति।।७३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वीन्द्रियादारभ्य असंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यंता: पंचैव पर्याप्तय: सन्ति। अपर्याप्तिनाम-कर्मोदयेन जीवानां एषामेव अपर्याप्तयो भवन्तीति।
विकलेन्द्रियेषु मनसोऽभाव: कथमवसीयते इति चेत् ?
आर्षात् विज्ञायते।
कथमार्षस्य प्रामाण्यं ?
स्वाभाव्यात् प्रत्यक्षस्येव आर्ष: प्रमाणं।

पुनरपि पर्याप्तिसंख्यासत्त्वभेदप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-चत्तारि पज्जत्तीओ चत्तारि अपज्जत्तीओ।।७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-केषुचित्प्राणिषु चतस्त्र एव पर्याप्तयोऽअपर्याप्तयो वा भवन्ति। ता: आहार-शरीरेन्द्रियानापानपर्याप्तय: इति।

चतुर्णां पर्याप्तीनामधिपतिजीवप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-एइंदियाणं।।७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इमा: चतस्रोऽपि पर्याप्तय एकेन्द्रियाणामेव, नान्येषां। अपर्याप्तयश्च तेषामेव।
एकेन्द्रियाणां नोच्छ्वासमुपलभ्यते ?
नैतत्, आर्षात्तदुपलम्भात्।
प्रत्यक्षेणागमो बाध्यते ?
न चेन्द्रियजं प्रत्यक्षं समस्तवस्तुविषयं येन यदविषयीकृतस्य वस्तुनोऽभावो विधीयते।
इत्थं पर्याप्तापर्याप्तजीवानां कथनं संक्षेपेण कृतं।
एवं सप्तमस्थले योगिनां इंद्रियापेक्षया कथनत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।


अब द्विसंयोगी योगों का प्रतिपादन करने के लिए अगले सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

वचनयोग और काययोग द्वीन्द्रिय जीवों से लेकर असंज्ञी जीवों तक होते हैं।।६६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—दो इंद्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों के वचनयोग और काययोग ये दोनों ही योग होते हैं। यहाँ विशेष रूप से ऐसा जानना चाहिए कि वचनयोग का चौथा भेद-अनुभयवचनयोग का ही वहाँ सत्त्व रहता है।

शंका—इन जीवोें से आगे के जीवों के भी वचन और काययोग पाये जाते हैं। इसलिए असंज्ञी तक ये योग होते हैं यह बात नहीं बनती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि आगे के जीवों के तीनों योगों का सत्त्व पाया जाता है। अत: यहाँ द्विसंयोगी योग की ही विवक्षा है।

अब एक संयोगी योग के प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

काययोग एक इंद्रिय जीवों के होता है।।६७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—एकेन्द्रिय जीवों के एक काययोग ही होता है। द्वीन्द्रिय से लेकर असंज्ञी तक जीवों के वचन और काय ये दो योग होते हैं तथा शेष जीवों के तीनों ही योग होते हैं। इस प्रकार पंचमस्थल में योगधारी जीवों के गुणस्थान की अपेक्षा तीन सूत्र पूर्ण हुए। पहले सामान्य से योग का सत्त्व निरूपण करके अब काल की अपेक्षा योग का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

मनोयोग और वचनयोग पर्याप्तकों के ही होते हैं, अपर्याप्तकों के नहीं होते हैं।।६८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—पर्याप्तक जीवोें के मन और वचन ये दो योग होते हैं, अपर्याप्तकों के नहीं होते ऐसा जानना चाहिए।

अब सामान्यकाययोग के सत्त्वप्रदेशों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

काययोग पर्याप्तकों के भी होता है और अपर्याप्तकों के भी होता है।।६९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों प्रकार के जीवों में काययोग होता है। यहाँ सूत्र में जो ‘अपि’ शब्द है वह समुच्चयार्थक जानना चाहिए। विस्तार से समझने की रुचि रखने वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिए सूत्र में दो बार ‘अस्ति’ पद का ग्रहण किया गया है।

वे पर्याप्तियों कौन-कौन-सी हैं ? ऐसी शंका होने पर सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

छह पर्याप्तियाँ और छह अपर्याप्तियाँ होती हैं।।७०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—छह प्रकार की पर्याप्ति और छह प्रकार की अपर्याप्ति होती हैं। आहार, शरीर, इंद्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन इन छहों की निष्पत्ति पर्याप्ति कहलाती है। इन छहों की अनिष्पत्ति-अपूर्णता को अपर्याप्ति कहा जाता है। इन दोनों के छह-छह भेद होते हैं। इनके लक्षण पहले कह चुके हैं अत: अब पुन: नहीं कहे जा रहे हैं।

अब इन पर्याप्तियों के आधार का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

ये सभी पर्याप्तियाँ संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक होती हैं।।७१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टिपर्यन्त ये छहों पर्याप्तियाँ होती हैं। तृतीय गुणस्थान में अपर्याप्तकाल का अभाव होने के कारण वहाँ छहों अपर्याप्तियाँ नहीं होती हैं। देशविरत आदि ऊपर के गुणस्थानों में छहों पर्र्याप्तियाँ भी नहीं होती हैं क्योंकि छह पर्याप्तियों की समाप्ति का नाम ही पर्याप्ति है और यह समाप्ति चौथे गुणस्थान से ऊपर के गुणस्थानों में नहीं पाई जाती है क्योंकि अपर्याप्ति की अंतिम अवस्थावर्ती एक समय में पूर्ण हो जाने वाली पर्याप्ति की आगे के गुणस्थानों में सत्त्व होने में विरोध आता है।

पाँच पर्र्र्याप्तियाँ भी होती हैं इस बात का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

पाँच पर्याप्तियाँ और पाँच अपर्याप्तियाँ होती हैं।।७२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—मन को छोड़कर शेष पाँच पर्याप्तियाँ किन्हीं जीवविशेष में होती हैं और पाँच अपर्याप्तियाँ भी होती हैं।

वे पाँच पर्याप्तियाँ किनके होती हैं ? ऐसी शंंका होने पर सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

वे पाँच पर्याप्तियाँ द्वीन्द्रिय जीवों से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त होती हैं।।७३।। सिद्धान्तिंचतामणिटीका—दो इंद्रिय जीवों से प्रारंभ करके असंज्ञीपंचेन्द्रिय तक सभी जीवों के पाँच पर्याप्तियाँ ही होती हैंं। अपर्याप्ति नामकर्म के उदय से इन्हीं जीवों के अपर्याप्तियाँ होती हैं।

शंका—विकलेन्द्रिय जीवों में मन का अभाव कैसे जाना जाता है ?

समाधानआर्ष-आगम ग्रंथों से जाना जाता है कि विकलेन्द्रियों में मन नहीं होता है।

शंका—आर्ष को प्रमाण कैसे माना जाय ?

समाधान—जैसे प्रत्यक्ष स्वभावत: प्रमाण है उसी प्रकार आर्ष भी स्वभावत: प्रमाण है।

फिर भी पर्याप्तियों की संख्या के अस्तित्व में भेद बताने के लिए आगे का सूत्र अवतरित किया जाता है—

सूत्रार्थ—

चार पर्र्याप्तियाँ और चार अपर्याप्तियाँ होती हैं।।७४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—किन्हीं जीवों में चार पर्याप्तियाँ अथवा किन्हीं में चार अपर्याप्तियाँ होती हैं। आहार, शरीर, इंद्रिय और श्वासोच्छ्वास ये चार पर्याप्तियाँ हैं।

चारों पर्याप्तियों के अधिकारी जीवों के प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

उक्त चारों पर्याप्तियाँ एक इंद्रिय जीवों के होती हैं।।७५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—वे चारों पर्याप्तियाँ एकेन्द्रिय जीवों के ही होती हैं, दूसरों के नहीं। और उन्हीं के चारों अपर्याप्तियाँ भी होती हैं।

शंकाएकेन्द्रिय जीवों के उच्छ्वास तो नहीं पाया जाता है ?

समाधान—ऐसा नहीं है, क्योंकि एकेन्द्रियों के श्वासोच्छ्वास होता है यह बात आगम प्रमाण से जानी जाती है।

शंका—प्रत्यक्ष से यह आगम बाधित है ?

समाधान—इंद्रियप्रत्यक्ष तो सम्पूर्ण पदार्थों को विषय ही नहीं करता है जिससे कि इंद्रियप्रत्यक्ष की विषयता को नहीं प्राप्त होेने वाले पदार्थों का अभाव किया जाए।

इस प्रकार पर्याप्त-अपर्याप्त जीवों का कथन संक्षेप से किया गया। इस तरह से सप्तम स्थल में योगियों के इंद्रियों की अपेक्षा से कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।


सांप्रतं अमुष्मिन्नयं योगो भवति अमुष्मिन् च न

सांप्रतं अमुष्मिन्नयं योगो भवति अमुष्मिन् च न, इति प्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-ओरालियकायजोगो पज्जत्ताणं ओरालियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं।।७६।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पज्जत्ताणं-षड्भि: पंचभि: चतसृभिर्वा पर्याप्तिभिर्निष्पन्ना: परिनिष्ठिता: तिर्यञ्चो मनुष्याश्च पर्याप्ता:। तेषां औदारिककाययोगो भवति। तेषामेव तिर्यञ्चानां मनुष्याणां च अपर्याप्तावस्थायां औदारिकमिश्रकाययोग:।
किमेकया पर्याप्त्या निष्पन्न: पर्याप्त: उत साकल्येन निष्पन्न इति ?
शरीरपर्याप्त्या निष्पन्नो जीव: पर्याप्त इति भण्यते।
तत्र निष्पन्नशरीरावलंबनबलेन उत्पन्नजीवप्रदेशपरिस्पंदेन योग: औदारिककाययोग:। कार्मणौदारिक-स्कंधनिमित्तकजीवप्रदेशपरिस्पंदेन योग: औदारिकमिश्रकाययोग:।
यदि परिस्पंदो बंधहेतुस्तर्हि संचरदभ्राणामपि कर्मबंध: प्रसजीति चेत् ?
न, कर्मजनितस्य चैतन्यपरिस्पंदस्यास्रवहेतुत्वेन विवक्षितत्वात्। न चाभ्रपरिस्पंद: कर्मजनितो, येन तद् हेतुतामास्कंदेत्।

अधुना वैक्रियिककाययोगस्य व्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-वेउव्वियकायजोगो पज्जत्ताणं वेउव्वियमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं।।७७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पर्याप्तानां देवनारकाणां वैक्रियिककाययोग: भवति अपर्याप्तानां चैषामेव वैक्रियिकमिश्रकाययोगो भवति।

अधुना आहारकाययोगसत्त्वप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-आहारकायजोगो पज्जत्ताणं आहारमिस्सकायजोगो अपज्जत्ताणं।।७८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारशरीरोत्थापकपर्याप्तानां संयतानां आहारकाययोग:, अपर्याप्तानां आहारमिश्रकाययोग: इति।
संयतस्य कथं अपर्याप्तता भवेत् ?

न, अनवगतसूत्राभिप्रायात्। औदारिकशरीरगतषट्पर्याप्त्यपेक्षया संयत: पर्याप्तक:, किन्तु आहारशरीर-गतपर्याप्तिनिष्पत्ति अभावापेक्षया अपर्याप्तकोऽसौ भवति।
एवं पर्याप्तिषु अपर्याप्तिषु च योगानां सत्त्वमसत्त्वं च निगदितं।
इत्थं अष्टमस्थले योगानां मध्ये पर्याप्त्यपर्याप्त्यपेक्षया त्रीणि सूत्राणि गतानि।


अब इस जीव में यह योग होता है और इस जीव में यह योग नहीं होता है, इसका प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

औदारिककाययोग पर्याप्तकों के और औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है।।७६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—छह, पाँच अथवा चार पर्याप्तियों से पूर्णता को प्राप्त हुए तिर्यंच और मनुष्य पर्याप्तक कहलाते हैं। उनके औदारिककाययोग होता है। उन्हीं तिर्यंचों और मनुष्यों के अपर्याप्त अवस्था में औदारिकमिश्रकाययोग होता है।

शंका—तो क्या उनमें से किसी एक पर्याप्ति से पूर्णता को प्राप्त हुआ पर्याप्तक कहलाता है। या सम्पूर्ण पर्याप्तियों से पूर्णता को प्राप्त हुआ पर्याप्तक कहलाता है ?

समाधान—शरीरपर्याप्ति के निष्पन्न होने पर सभी जीव पर्याप्तक कहे जाते हैं। उनमें से पहले निष्पन्न शरीर के आलंबन द्वारा उत्पन्न हुए जीवप्रदेश-परिस्पन्द से जो योग होता है वह औदारिककाययोग होता है। कार्मण और औदारिक शरीर स्कंधों के निमित्त से जीव के प्रदेशों में उत्पन्न हुए परिस्पन्द से जो योग होता है उसे औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं।

शंका—यदि परिस्पन्द बंध का हेतु है तो संचरण करते हुए मेघों के भी कर्मबंध हो जाएगा क्योंकि उनके भी परिस्पन्द पाया जाता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि कर्मजनित चैतन्यपरिस्पन्द ही आस्रव का कारण है, यह अर्थ यहाँ पर विवक्षित है। मेघों का परिस्पन्द कर्मजनित तो है नहीं जिससे वह कर्मबन्ध के आस्रव का हेतु हो सके अर्थात् नहीं हो सकता है।

अब वैक्रियककाययोग की व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

वैक्रियककाययोग पर्याप्तकों के और वैक्रियकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है।।७७।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—देव और नारकी जीवों के पर्याप्त अवस्था में वैक्रियककाययोग होता है और अपर्याप्त अवस्था में वैक्रियकमिश्रकाययोग होता है।

अब आहारककाययोग की सत्ता का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

आहारककाययोग पर्याप्तकों के और आहारकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है।।७८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका—आहारकशरीर को उत्पन्न करने वाले पर्याप्तक संयतों-साधुओं के आहारककाययोग होता है और अपर्याप्तकों के आहारकमिश्रकाययोग होता है।

शंका'—संयतों के अपर्याप्तपना कैसे होता है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि ऐसा कहने वाले ने सूत्र का अभिप्राय ही नहीं समझा है। औदारिक शरीर सम्बन्धी पर्याप्तपने की अपेक्षा संयत जीव पर्याप्तक होते हैं किन्तु आहारशरीरसम्बंधी पर्याप्तियाँ जब तक पूर्ण नहीं होती हैं उस अपेक्षा से वे संयत अपर्याप्तक होते हैं।

इस प्रकार पर्याप्त और अपर्याप्त जीवों में योगों के सत्त्व-असत्त्व का वर्णन हुआ। इस प्रकार आठवें स्थल में योगों के मध्य पर्याप्ति-अपर्याप्ति की अपेक्षा तीन सूत्र पूर्ण हुए।