037.पाचवाँ अधिकार - तीन वेद वाले एवं वेद रहित भी होते है...

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पाचवाँ अधिकार - तीन वेद वाले एवं वेद रहित भी होते है

अथ वेदमार्गणाधिकार:

श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम:

मंगलाचरण
महाव्रतधरो धीर:, सुव्रतो मुनिसुव्रत:।
नमस्तुभ्यं तनुतान्मे, रत्नत्रयस्य पूर्णताम्।।१।।

अद्य केशवरायपाटन नाम अतिशयक्षेत्रे अत्रस्थातिशायि-मुनिसुव्रतनाथस्य प्रतिमाया गर्भगृहस्य विस्तारीकरणस्य निर्णयो जात:। मत्प्रेरणया संघसानिध्ये च लघुपंचशैलस्य वीरप्रभुदिव्यध्वनिस्तंभस्य च निर्माणार्थं यंत्रस्थापनापि संजाता। अत्र भाविकाले स्थापयिष्यमाणा: जिनप्रतिमा मह्यं सर्वेभ्यश्च सर्वाभीप्सितं प्रयच्छन्तु।

अथ स्थलत्रयेण दशसूत्रै: वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यवेदानां त्रिविधवेदेषु गुणस्थानप्रतिपादनत्वेन च त्रीणि सूत्राणि सन्ति, तत: परं द्वितीयस्थले अपगतवेदानां कथनत्वेन एकं सूत्रं। तदनु तृतीयस्थले नरकादिगतिषु वेदव्यवस्थागुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनत्वेन षट् सूत्राणि, इति समुदायपातनिका।

संप्रति वेदमार्गणानिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-वेदाणुवादेण अत्थि इत्थिवेदा पुरिसवेदा णवुंसयवेदा अवगदवेदा चेदि।।१०१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वेदाणुवादेण-वेदानुवादेन स्त्रीवेदा: पुरुषवेदा: नपुंसकवेदा: जीवा अपगतवेदाश्च संति इति। दोषैरात्मानं परं च स्तृणाति छादयति इति स्त्री, स्त्री चासौ वेदश्च स्त्रीवेद:, स एषामस्तीति स्त्रीवेदा:। अथवा पुरुषं स्तृणाति आकाङ्क्षतीति स्त्री पुरुषाकाङ्क्षा इत्यर्थ:। स्त्रियं विन्दतीति स्त्रीवेद:। अथवा वेदनं वेद:, स्त्रियो वेद: स्त्रीवेद:।

उक्तं च-

छादेदि सयं दोसेण यदो छादइ परं हि दोसेण।
छादणसीला जम्हा, तम्हा सा वण्णिया इत्थी।।

स्वयमात्मानं दोषै:-मिथ्यादर्शनाज्ञानासंयमक्रोधमानमायालोभै: छादयति संवृणोति, मृदुभाषितस्निग्ध-विलोकनानुकूलवर्तनादिकुशलव्यापारै: परमपि अन्यपुरुषमपि स्ववशं कृत्वा दोषेण-हिंसानृतस्तेयाब्रह्म-परिग्रहादिपातकेन छादयति आवृणोति तस्मात्कारणात् छादनशीला द्रव्यभावाभ्यां सा अंगना स्त्रीति वर्णिता-परमागमे प्रतिपादिता। यद्यपि तीर्थकरजनन्यादीनां कासांचित् सम्यग्दृष्टीनां एतदुक्तदोषाभाव:, तथापि तासां दुर्लभत्वेन सर्वत्र सुलभप्राचुर्यव्यवहारापेक्षया स्त्रीलक्षणं स्तृणाति स्वयमन्यं च दोषै: इति स्त्री निरुक्तिपूर्वकमाचार्येणोक्तम्।

सर्वासां स्त्रीणां नैतन्निरुक्तिलक्षणं घटते एतदेव श्रीशुभचन्द्राचार्येणापि प्रोत्तं ज्ञानार्णवे ग्रन्थे-

यमिभिर्जन्मनिर्विण्णैर्दूषिता यद्यपि स्त्रिय:।
तथाप्येकान्ततस्तासां विद्यते नाघसंभव:।।५६।।
ननु सन्ति जीवलोके, काश्चिच्छमशीलसंयमोपेता:।
निजवंशतिलकभूता:, श्रुतसत्यसमन्विता नार्य:।।५७।।
सतीत्वेन महत्त्वेन, वृत्तेन विनयेन च।
विवेकेन स्त्रिय: काश्चिद् भूषयन्ति धरातलम्।।५८।।

तात्पर्यमेतत्-जिनजननीमरुदेव्यादयो ब्राह्मीसुन्दरीचंदनाद्यार्यिकादय: सतीसीताञ्जनादयश्च द्रव्यवेदिस्त्रियोऽपि नैतद्दौषेर्दूष्यन्ते प्रत्युत् देवेन्द्रचक्रवत्त्र्यादिभिरपि पूज्यन्ते। अत्र तु वेदमार्गणायां भाववेदप्राधान्येन भाववेदस्त्रिय: शुक्लध्यानाग्निना कर्माणि दग्ध्वा मोक्षमपि लभन्ते इति ज्ञातव्यम्।

पुरुगुणेषु पुरुभोगेषु च शेते स्वपितीति पुरुष:। सुषुप्तपुरुषवदनवगतगुणोऽप्राप्तभोगश्च यदुदयाज्जीवो भवति स पुरुष: अंगनाभिलाष: इति यावत्।

अथ वेदमार्गणाधिकार

अब वेद मार्गणा अधिकार प्रारम्भ होता है।

‘‘श्रीमुनिसुव्रत जिनेन्द्र को मेरा नमस्कार होवे’’—

मंगलाचरण (श्लोकार्थ)—जो महाव्रतोें को धारण करने वाले धीर हैं, जिनका सुव्रत अथवा मुनिसुव्रत नाम है ऐसे हे मुनिसुव्रत भगवान्! आप मुझमें रत्नत्रय की पूर्णता करें इसलिए आपको मेरा नमस्कार हो।

आज यहाँ (केशवरायपाटन अतिशय क्षेत्र में) विराजमान अतिशयकारी भगवान मुनिसुव्रत की प्रतिमा के गर्भगृह के विस्तारीकरण का निर्णय हुआ। यहाँ मेरी पे्ररणा से तथा मेरे संघ सानिध्य में लघुपंचपहाड़ी (राजगृही) की पंचपहाड़ी का एवं महावीर स्वामी के दिव्यध्वनिस्तम्भ के निर्माण हेतु यंत्रस्थापना भी की गई। भविष्य में यहाँ स्थापित होने वाली प्रतिमाएँ मेरे एवं सभी के लिए इच्छित फल की प्राप्ति में निमित्त बनें यही मेरी कामना है।

अब तीन स्थलों के द्वारा दश सूत्रों में कहा जाने वाला वेदमार्गणा नामक पंचम अधिकार प्रारंभ किया जाता है। उसमें प्रथमस्थल में सामान्य वेद वाले जीवों के तीन प्रकार के वेदों में गुणस्थानव्यवस्था के प्रतिपादन की मुख्यता से तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में अपगतवेदियों के वर्णन की मुख्यता से एक सूत्र है। उसके पश्चात् तृतीयस्थल में नरकादि गतियों में वेदव्यवस्था और गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र हैं, ऐसी समुदाय पातनिका-सामूहिक सूत्र संख्या यहाँ प्रस्तुत की गई है। अब वेदमार्गणा का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

वेदमार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद और अपगतवेद वाले जीव होते हैं।।१०१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—वेदानुवाद की अपेक्षा स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और अपगतवेदी (वेद रहित सिद्ध जीव) जीव होते हैं।

जो दोषों से स्वयं अपने को और दूसरे को आच्छादित करती है उसे ‘स्त्री’ कहते हैं और स्त्रीरूप जो वेद है उसे स्त्रीवेद कहते हैं, वह स्त्रीवेद जिनके पाया जाता है वे स्त्रीवेदी कहलाते हैं।

अथवा जो पुरुष की आकांक्षा करती हैं उसे स्त्री कहते हैं, जिसका अर्थ है-पुरुष के साथ रमण करने की चाह। जो अपने को स्त्रीरूप अनुभव करता है उसे स्त्रीवेद कहते हैं। अथवा वेदन करने को वेद कहते हैं और स्त्री के वेद को स्त्रीवेद कहते हैं।

कहा भी है—

गाथार्थ—जो मिथ्यादर्शन, अज्ञान और असंयम आदि दोषों से अपने को आच्छादित करती है और मधुर संभाषण, कटाक्ष-विक्षेप आदि के द्वारा जो दूसरे पुरुषों को भी अब्रह्म आदि दोषों से आच्छादित करती है, उसको आच्छादनशील होने के कारण स्त्री कहा है।

जो स्वयं अपने को मिथ्यादर्शन, अज्ञान, असंयम, क्रोध, मान, माया, लोभरूप दोषों से आच्छादित करती है तथा अन्य पुरुषों को भी कोमल वचन, कटाक्ष सहित अवलोकन, अनुकूल प्रवर्तन आदि कुशल व्यापारों से अपने वश में करके हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म, परिग्रह आदि पापों से आच्छादित करती है इसलिए द्रव्य और भाव से छादनशील होने से उन्हें परमागम में स्त्री कहा है। यद्यपि तीर्थंकर की माता आदि किन्हीं सम्यग्दृष्टि स्त्रियों में इन दोषों का अभाव रहता है तथापि उनके दुर्लभ होने से तथा सर्वत्र उक्त दोषों से युक्त स्त्रियों के सुलभ होने से आधिक्य व्यवहार की अपेक्षा स्त्री का उक्त लक्षण निरुक्तिपूर्वक आचार्यों ने कहा है।

समस्त स्त्रियों में यह निरुक्ति लक्षण घटित नहीं होता है यही बात श्रीशुभचंद्राचार्य ने ‘‘ज्ञानार्णव’’ ग्रंथ में कही है—

श्लोकार्थ—यद्यपि संसार से विरक्त हुए संयमी मुनियों ने स्त्रियों को दूषित ही बताया है अर्थात् उनके दोषों का ही वर्णन किया है तथापि उनमें एकान्तता से पापों की ही संभावना नहीं है किन्तु उनमें से किसी-किसी स्त्री में गुण भी होते हैंं।।५६।।

उन गुणों को कहते हैं—

श्लोकार्थ—अहो! इस जगत् में अनेक स्त्रियाँ ऐसी भी हैं जो शमभाव (मन्दकषायरूप परिणाम) और शील संयम से भूषित हैं तथा अपने वंश में तिलकभूत हैं अर्थात् अपने वंश को शोभायमान करती हैं और श्रुत के स्वाध्याय में लीन एवं सत्य गुण से समन्वित रहती हैं।।५७।।

अनेक स्त्रियाँ ऐसी भी हैं जो अपने पातिव्रत्य धर्म से, महानता से, स्वकीय दृढ़ चारित्र से (सदाचरण से), विनय से और विवेक से इस पृथ्वीतल को सुशोभित करती हैं।।५८।।

तात्पर्य यह है कि भगवान् ऋषभदेव जिनेन्द्र की माता मरुदेवी आदि अन्य तीर्थंकरों की माताएँ, ब्राह्मी-सुन्दरी-चंदना आदि आर्यिकाएँ तथा सीता, अंजना आदि सतियाँ द्रव्य स्त्रीवेदी होते हुए भी उपर्र्युक्त अनेक दोषों से दूषित नहीं थीं, प्रत्युत ऐसी स्त्रियों की देवेन्द्र, चक्रवर्ती आदि भी पूजा करते हैं।

यहाँ वेदमार्गणा में भाववेद की प्रधानता से वर्णन है अत: ऐसा अभिप्राय समझना चाहिए कि भावस्त्रीवेदी पुरुष शुक्लध्यानरूपी अग्नि के द्वारा कर्मों को नष्ट करके मोक्षधाम को भी प्राप्त कर लेते हैं।

जो उत्कृष्ट गुणों में और उत्कृष्ट भोगों में शयन करता है उसे पुरुष कहते हैंं। अथवा जिस कर्म के उदय से जीव सोते हुए पुरुष के समान गुणों को नहीं जानता है और भोगोें को प्राप्त नहीं करता है उसे पुरुष कहते हैं। अथवा स्त्री संबंधी अभिलाषा जिसके पाई जाती है उसे पुरुष कहते हैं।

उक्तं च-

पुरुगुणभोगे सेदे करेदि लोगम्हि पुरुगुणं कम्मं।

पुरु उत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिदो पुरिसो।।

यो जीव: पुरुगुणे-सम्यग्ज्ञानाधिकगुणसमूहे शेते-स्वामित्वेन प्रवर्तते, पुरुभोगे नरेन्द्रनागेन्द्र-देवेन्द्राद्यधिकभोगचये भोत्तृâत्वे प्रवर्तते, पुरुगुणं कर्म धर्मार्थकाममोक्षलक्षणपुरुषार्थसाधनरूपदिव्यानुष्ठानं शेते-करोति च। पुरूत्तमे परमेष्ठिपदे शेते-तिष्ठति पुरूत्तम: सन् तिष्ठति। तस्मात् कारणात् स द्रव्यभावद्वयसम्पन्न: जीव: पुरुष इति वर्णित:। धातूनामनेकार्थवाचकत्वसंभवेन ‘शीङ् स्वप्ने’ इत्येतस्य धातो: प्रवृत्तिकरण-स्थानलक्षणार्थविशेषा: आचार्येणोक्ता: न विरुद्ध्यन्ते।

कथं स्त्र्याभिलाष: पुरुगुणं कर्म कुर्यात् ?

न, तथाभूतसामथ्र्यानुविद्धजीवसहचरितत्वादुपचारेण जीवस्य तस्य कर्तृत्वाभिधानात्। अथवा निरुक्तिमात्रमेतल्लक्षणं न सर्वेषु विद्यते रावणकंसकौरवादिवत्।

न स्त्री न पुमान् नपुंसक:, उभयाभिलाष इति यावत्।

उक्तं च-

णेवित्थी णेव पुमं णवुंसओ उभयलिंगवदिरित्तो।
इट्टावाग-समाणग-वेयण-गरुओ कलुसचित्तो।।

य: नैव स्त्री नैव पुमान्, उभयलिंगव्यतिरिक्त: श्मश्रुस्तनादिपुंस्त्रीद्रव्यलिंगरहित:, इष्टिकापाकाग्नि-समानतीव्रकामवेदनागुरुक: कलुषचित्त: स जीवो नपुंसकमिति कथित:। अत्रापि भावनपुंसकवेदी कश्चिद् द्रव्यपुरुषवेदी शुक्लध्यानाग्निना कर्माणि विनाश्य मोक्षमपि गच्छतीति ज्ञातव्यम्।

अपगतास्त्रयोऽपि वेदसंतापा: येषां तेऽपगतवेदा:। प्रक्षीणान्तर्दाहा: इति यावत्।

उक्तं च-

कारिस-तणिट्टवागग्गि-सरिस-परिणाम-वेयणुम्मुक्का।
अवगय-वेदा जीवा सग-संभव-णंतवर-सोक्खा।।

कारीषाग्नि-तृणाग्नि-इष्टिकापाकाग्निसदृश-स्त्रीपुरुषनपुंसकपरिणामवेदनाभि: उन्मुक्ता: अनिवृत्ति-करणादपगतवेदभागादारभ्यायोगिचरमसमयपर्यंता:, भावेन गुणस्थानातीतसिद्धपरमेष्ठिनश्च जीवा अपगतवेदा: सन्ति। ते च स्वकसंभवानन्तवरसौख्या: शुद्धज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणात्मोत्थानन्तानंतमुख्यसुखसम्पन्ना: भवन्तीति।

संप्रति वेदवतां जीवानां गुणस्थानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

इत्थिवेदा पुरिसवेदा असण्णिमिच्छाइट्ठि-प्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति।।१०२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इत्थिवेदा-स्त्रीवेदा: पुरुषवेदा: असंज्ञिमिथ्यादृष्टिप्रभृति यावत् अनिवृत्ति: इति।

केचिद् द्रव्यपुरुषवेदा: एव भावस्त्रीवेदा: महामुनय: षष्ठगुणस्थानवर्तिन: कदाचित् उपशमश्रेणिमारुह्य क्षपकश्रेणिं वारुह्य अनिवृत्तिकरणगुणस्थानं प्राप्नुवन्ति इति।

संप्रति नपुंसकवेदानां गुणस्थानप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-णवुंसयवेदा-एइंदिय-प्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति।।१०३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नपुंसकवेदा: जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य यावत् अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्तिनो भवन्ति इति। अस्मिन् द्रव्यवेदे पंचगुणस्थानान्येव भाववेदे नव गुणस्थानानि भवन्तीति।

एकेन्द्रियाद्य-संज्ञिपंचेन्द्रियपर्यन्ता: सर्वे जीवा नपुंसकवेदा एव ज्ञातव्या:।
एकेन्द्रियाणां न द्रव्यवेद उपलभ्यते, पुन: कथं तस्यास्तित्वं तत्र भवेत् ?

मा भूत्तत्र द्रव्यवेद:, तस्यात्र प्राधान्याभावात्। अथवा नानुपलब्ध्या तदभाव: सिद्ध्येत् सकलप्रमेयव्याप्युपलम्भबलेन-केवलज्ञानेन तत्सिद्धि:। न तत्केवलज्ञानं छद्मस्थेष्वस्ति।

एकेन्द्रियजीवानां स्त्रीपुरुषभावानभिज्ञानां कथं स्त्रीपुरुषविषयाभिलाषा घटते ?

नैतत्, अनभिज्ञस्त्रीवेदेन भूमिगृहान्तर्वृद्धिमुपगतेन यूना पुरुषेण अनैकान्तिकत्वात्। अतो ज्ञायते स्त्रीपुरुषसंबध्यभिलाषाकारणं स्त्रीपुरुषविषयिज्ञानं नास्ति, किन्तु वेदकर्मोदयेन साभिलाषा उत्पद्यते, तत्कर्मोदय: एकेन्द्रियाणामपि अस्ति।
एवं प्रथमस्थले वेदेषु गुणस्थानप्रतिपादनपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।

संप्रति वेदविरहितजीवानां प्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण-तेण परमवगदवेदा चेदि।।१०४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तेण परं-अनिवृत्तिकरणगुणस्थानस्य सवेदभागादुपरि अपगतवेदभागादारभ्य शेषचतुर्दशगुणस्थानपर्यन्ता: सर्वेऽपि महामुनयोऽपगतवेदा: भवन्ति। न तत्र द्रव्यवेदस्याभावोऽस्ति। अस्मिन् प्रकरणे तस्याधिकारो नास्ति। अधिकृतोऽत्र भाववेद:, ततस्तदभावादपगतवेदो नान्यथेति।
एवं द्वितीयस्थले वेदविरहितानां कथनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।

अधुना गतिमार्गणायां नरकगतौ वेदापेक्षया गुणस्थानकथनाय सूत्रमवतरति-

णेरइया चदुसु ट्ठाणेसु सुद्धा णवुंसयवेदा।।१०५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका
-नारका: चतुर्षु गुणस्थानेषु शुद्धा: नपुंसकवेदा: सन्ति। ‘‘सुद्धा णवुंसयवेदा’’ इत्यार्षात् एतन्निश्चीयते। अनवरतदु:खेषु तेषु नारकेषु स्त्रीपुरुषवेदाभावादिति।

स्त्रीपुरुषवेदौ अपि दु:खमेव इति चेत् ?

न, इष्टकापाकाग्निसमानसंतापात् न्यूनतया तार्णकारीषाग्निसमानपुरुषस्त्रीवेदयो: सुखरूपत्वात्।


कहा भी है—

गाथार्थ—जो उत्तम गुण और उत्तम भोगों में सोता है अर्थात् रहता है अथवा जो लोक में उत्तम गुणयुक्त कार्य करता है और जो उत्तम है उसे पुरुष कहते हैं।

जो जीव सम्यग्ज्ञान आदि अनेक सुंदर गुणसमूह में स्थायीरूप से वर्तन करता है अथवा जो नरेन्द्र, नागेन्द्र, देवेन्द्र आदि के प्रचुर भोगों को भोगता हुआ वर्तन करता है तथा जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष लक्षणरूप पुरुषार्थ के साधनरूप दिव्य अनुष्ठान को करता है एवं जो उत्तम परमेष्ठी पद को प्राप्त करता हुआ रहता है वह इन कारणों से द्रव्य-भाव दोनों गुणों से सम्पन्न जीव ‘‘पुरुष’’ इस संज्ञा से वर्णित है।

धातुओं में अनेक अर्थ वाचकपना संभव होने से ‘‘शीङ् स्वप्ने’’ इस धातु का आचार्य ने जो प्रवृत्ति करना, ठहरना आदि अर्थ कहा है उसमें कोई विरोध नहीं आता है।

प्रश्न—जिसके स्त्रीविषयक अभिलाषा पाई जाती है वह उत्तम गुण युक्त कर्म कैसे कर सकता है ?

उत्तर—नहीं, क्योंकि उत्तम गुणयुक्त कर्म को करनेरूप सामथ्र्य से युक्त जीव के सहचरितपने की अपेक्षा वह उत्तम कर्म को करता है ऐसा कथन उपचार से किया है। अथवा निरुक्ति मात्र का कथन करने वाला यह लक्षण सभी जीवों में घटित नहीं होता है रावण, कंस, कौरव आदि के समान।

अर्थात् रावण, कंस, कौरव आदि नरकगामी एवं बदनाम पुरुषों में ‘‘पुरुष’’ शब्द का उपर्युक्त निरुक्तिलक्षण घटित नहीं होता है फिर भी उन्हें पुरुष कहा जाता है अत: मात्र निरुक्तिलक्षण को ही सर्वव्यापक नहीं समझना चाहिए।

जो न स्त्री है और न पुरुष है उसे नपुंसक कहते हैं अर्थात् जिसके स्त्री और पुरुष विषयक दोनों प्रकार की अभिलाषा पाई जाती है उसे नपुंसक कहते हैं। कहा भी है—

गाथार्थ

—जो न स्त्री है और न पुरुष है किन्तु स्त्री-पुरुष सम्बन्धी दोनों प्रकार के लिंगों से रहित है, अवा की अग्नि के समान तीव्र वेदना से युक्त है और सर्वदा स्त्री-पुरुष विषयक मैथुन की अभिलाषा से उत्पन्न हुई वेदना से जिसका चित्त कलुषित है उसे नपुंसक कहते हैं।

जो जीव न स्त्री है और न पुरुष है तथा इन दोनों से भिन्न वेद वाला होता है, क्योंकि उसके दाढ़ी, मूँछ, स्तन आदि पुरुष और स्त्री के चिन्हों से रहित, र्इंट पकाने वाली अवे की अग्नि से समान तीव्र कामवेदना से पीड़ित होने से कलुषितचित्त उस जीव को नपुंसक कहा गया है।

यहाँ पर भी भावनपुंसकवेदी कोई द्रव्यपुरुषवेदी शुक्लध्यानरूपी अग्नि के द्वारा कर्मों को नष्ट करके मोक्ष भी प्राप्त करते हैं ऐसा जानना चाहिए।

जिनके तीनों प्रकार के वेदों से उत्पन्न होने वाला संताप (अंतरंग दाह) दूर हो गया है वे अपगतवेद जीव हैं। कहा भी है—

गाथार्थ

—जो कारीष (कंडे की) अग्नि, तृण की अग्नि और इष्टिकापाक अग्नि (अवे की अग्नि) के समान परिणामों से उत्पन्न हुई वेदना से रहित हैं और अपनी आत्मा से उत्पन्न हुए अनंत और उत्कृष्ट सुख के भोक्ता हैं उन्हें वेदरहित जीव कहते हैं।

कण्डे की अग्नि, तृण की अग्नि और इष्टिकापाक-भट्टे की अग्नि के समान क्रमश: स्त्री, पुरुष और नपुंसक जीवों के परिणाम होते हैं। उनके परिणामों की वेदना से होने वाले संक्लेश से उन्मुक्त-रहित अनिवृत्तिकरण नवमें गुणस्थान के अवेद भाग से आरंभ करके अयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थान के अंतिम समयपर्यन्त जीव तथा गुणस्थान रहित सिद्धपरमेष्ठी द्रव्य और भाववेद के उदय से होने वाली कामवेदना से उन्मुक्त होने से अपगत वेदी होते हैं और वे अपनी आत्मा में उत्पन्न अनंतसौख्य, शुद्ध ज्ञान-दर्शन उपयोग लक्षणरूप आत्मिक अनंतानंत सुख से सम्पन्न हो जाते हैं।

अब वेदों से युक्त जीवों के गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

स्त्रीवेद और पुरुषवेद वाले जीव असंज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक होते हैं।।१०२।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका'—मिथ्यात्व गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक स्त्री और पुरुष वेद वाले जीव होते हैं। कोई छठे गुणस्थानवर्ती द्रव्यपुरुषवेदी महामुनि ही भाव से स्त्रीवेदीरूप में कदाचित् उपशम श्रेणी अथवा क्षपक श्रेणी में चढ़कर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान को प्राप्त करते हैं ऐसा अभिप्राय हुआ।

चूँकि नवमें अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक ही भाववेद होते हैं उसके आगे भावभेद न होकर मात्र द्रव्यवेद (पुरुषवेद) रहता है और चौदह गुणस्थानों से ऊपर गुणस्थानातीत सिद्ध परमेष्ठियों के द्रव्य और भाव दोनों में से कोई भी वेद नहीं होता इसलिए वे अपगतवेदी कहलाते हैं।

अब नपुंसकवेदी जीवों में गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

एकेन्द्रिय से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक नपुंसकवेद वाले जीव पाये जाते हैं।।१०३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—नपुंसकवेदी जीव एकेन्द्रिय से प्रारंभ करके अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती तक भी होते हैं। यहाँ द्रव्यवेद में पाँच गुणस्थान ही होते हैं और भाववेद में नव गुणस्थान होते हैं।

यहाँ सारांश यह है कि एकेन्द्रिय जीव से लेकर चार इंद्रिय तक सम्मूच्र्छन जन्म वाले तिर्यंच जीव नपुंसक वेदी ही होेते हैं उनके मिथ्यात्व गुणस्थान के अतिरिक्त कोई गुणस्थान नहीं पाया जाता है। तथा पंचेन्द्रिय जीवों में मनुष्य, तिर्यंच, देव, नारकी सभी गर्भित होते हैं। इनमें से देव और नारकियों के तो प्रथम चार गुणस्थान होते हैं और तिर्यंचों में प्रारंभ के पाँच गुणस्थान होते हैं तथा मनुष्यों में चौदहों गुणस्थान होते हैं किन्तु नवमें गुणस्थान तक वेद का जो कथन है वह भाववेद की अपेक्षा ही है, द्रव्यनपुंसकवेद तो पाँचवें गुणस्थान के अंत तक ही रहता है।

शंका—एकेन्द्रिय जीवों के द्रव्यवेद उपलब्ध नहीं हो रहा है इसलिए एकेन्द्रिय जीवों में नपुंसकवेद का अस्तित्व कैसे बतलाया ?

समाधान—एकेन्द्रिय जीवों में द्रव्यभेद भले ही न होवे, क्योंकि उसकी वहाँ प्रधानता ही नहीं है। अथवा द्रव्यवेद की एकेन्द्रियों में उपलब्धि नहीं होती है इसलिए उसका अभाव नहीं सिद्ध किया जा सकता है क्योंकि सम्पूर्ण प्रमेयों में व्याप्त होकर रहने वाले उपलम्भ प्रमाण रूप केवलज्ञान से उसकी सिद्धि हो जाती है। परन्तु वह उपलम्भ केवलज्ञान छद्मस्थों में नहीं पाया जाता है।

शंकाजो स्त्रीभाव और पुरुषभाव दोनों से सर्वथा अनभिज्ञ हैं ऐसे एकेन्द्रियों के स्त्री और पुरुषविषयक अभिलाषा कैसे बन सकती है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि जो पुरुषवेदी जीव स्त्रीवेद से सर्वथा अनभिज्ञ है और भूगृह के भीतर वृद्धि को प्राप्त हुआ है ऐसे पुरुष के साथ उक्त कथन का अनेकान्तिकरूप से सद्भाव देखा जाता है।

इससे यह ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष से संबंधित अभिलाषा को उत्पन्न कराने वाला स्त्री-पुरुष विषयक ज्ञान नहीं है किन्तु वेदकर्म के उदय से वैसी अभिलाषा उत्पन्न होती है, उस वेदकर्म का उदय एकेन्द्रिय जीवों के भी रहता है ऐसा जानना चाहिए।

विशेषार्थ

—यदि यह मान लिया जाय कि एकेन्द्रिय जीव स्त्री और पुरुषसंंबंधी भेद से सर्वथा अपरिचित होते हैं, इसलिए उनके स्त्री और पुरुषसंबंधी अभिलाषा नहीं उत्पन्न हो सकती है तो जो पुरुष जन्म से ही एकान्त में वृद्धि को प्राप्त हुआ है और जिसने स्त्री को कभी नहीं देखा है उसके भी युवा होने पर स्त्रीविषयक अभिलाषा नहीं उत्पन्न होना चाहिए। परन्तु उसके स्त्रीविषयक अभिलाषा देखी जाती है। इससे सिद्ध है कि स्त्री और पुरुषसंबंधी अभिलाषा का कारण स्त्री और पुरुषविषयक ज्ञान नहीं है किन्तु वेदकर्म के उदय से वह अभिलाषा उत्पन्न होती है। वह एकेन्द्रियों के भी पायी जाती है, अतएव उनके स्त्री और पुरुषविषयक अभिलाषा के होने में कोई दोष नहीं आता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में वेदों में गुणस्थान व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब वेदरहित जीवों का कथन करने हेतु श्रीमान् पुष्पदंत आचार्य सूत्र का अवतार करते हैं—

सूत्रार्थ—

नवमें गुणस्थान के सवेद भाग के आगे जीव अपगत वेद होते हैं।।१०४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—अनिवृत्तिकरण नामक नवमें गुणस्थान के सवेद भाग से ऊपर और अवेद भाग से प्रारंभ होकर शेष चौदह गुणस्थान (दसवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें, चौदहवें गुणस्थान) पर्यन्त सभी महामुनि अपगतवेदी होते हैं। वहाँ द्रव्यवेद का अभाव नहीं पाया जाता है। क्योंकि इस प्रकरण में द्रव्यवेद का अधिकार-कथन नहीं है। यहाँ भाववेद का ही अधिकार चल रहा है इसलिए उसके अभाव से ही अपगतवेदी जीव होते हैं, अन्यथा-द्रव्य वेद की यहाँ विवक्षा नहीं है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में वेदरहित जीवों के कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

संप्रति तिर्यग्गतौ वेदनिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते

संप्रति तिर्यग्गतौ वेदनिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

तिरिक्खा सुद्धा णवुंसयवेदा एइंदिय-प्पहुडि जाव चउरिंदिया त्ति।।१०६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिरिक्खा सुद्धा-तिर्यञ्च: शुद्धा: नपुंसकवेदा: एकेन्द्रियप्रभृति यावत् चतुरिन्द्रिया: इति। एकेन्द्रिया: विकलेन्द्रिया: जीवा: नपुंसकवेदा: एव इति अर्थ: भवति।
पिपीलिकानां त्रीन्द्रियजीवानां अण्डदर्शनात् न ते नपुंसका: इति चेत् ?
नैतत्, अण्डानां गर्भे एवोत्पत्तिरिति नियमाभावात्। विग्रहगतौ न वेदाभाव:, तत्राप्यव्यक्तवेदस्य सत्त्वात्।

शेषतिरश्चां कियन्तो वेदा ? इत्याशंकानिराकरणार्थं सूत्रमवतरति-

तिरिक्खा तिवेदा असण्णिपंचिंदिय-प्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति।।१०७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असण्णिपंचिंदियप्पहुडि जाव संजदासंजदा-असंज्ञिपंचेन्द्रियादारभ्य संयतासंयतगुणस्थानपर्यन्ता: तिर्यञ्च: त्रिवेदा: सन्तीति।
 
त्रयाणां वेदानां क्रमेणैव प्रवृत्तिर्नाक्रमेण, पर्यायत्वात्। पर्यायत्वात् कषायवन्नान्तर्मुहूर्तस्थायिनो वेदा, आजन्मन: आमरणात्तदुदयस्य सत्त्वात्।

मनुष्यगतौ वेदनिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
मणुस्सा तिवेदा मिच्छाइट्ठि-प्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति।।१०८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिच्छाइट्ठिप्पहुडि-मिथ्यादृष्टिप्रभृति यावत् अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्तिन: मनुष्या: त्रिवेदा: सन्ति।
संयतानां कथं त्रिवेदसत्त्वं इति चेत् ?
नैतत्, अव्यक्तवेदसत्त्वापेक्षया तत्र तथोत्ते:।

संप्रति वेदत्रयातीतजीवप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-
तेण परमवगदवेदा चेदि।।१०९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तेण परं-नवमगुणस्थानस्य सवेदभागात्परं सर्वेऽपि संयता: अपगतवेदा भवन्ति। सर्वत्र सूत्रे च-शब्द: समुच्चये द्रष्टव्य:, एते च पूर्वोक्ताश्च सन्तीति। इति-शब्द: समाप्तौ परिगृहीतव्य:।

अधुना देवेषु वेदप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
'देवा चदुसु ट्ठाणेसु दुवेदा-इत्थिवेदा पुरिसवेदा।।११०।।

देवा: चतुर्षुगुणस्थानेषु द्विवेदा:-स्त्रीवेदा: पुरुषवेदा: भवन्तीति। सानत्कुमारमाहेन्द्रादारभ्य उपरिमेषु पुरुषवेदा: एव संति।

आगमप्रमाणमन्तरेण कथं एतज्ज्ञायते ?

ज्ञायते, उपरितनसामीप्यवर्तिसूत्रे च शब्दो वर्तते, अत्रतन: च शब्दो यतोऽनुक्तसमुच्चयार्थश्च, तस्मात्सानत्कुमारादीनां पुंवेदत्वमवसीयते। तिर्यङ्मनुष्यलब्ध्यपर्याप्ता:, संमूच्र्छिमपंचेन्द्रियाश्च नपुंसका एव। असंख्येयवर्षायुषस्तिर्यञ्चो मनुष्याश्च द्विवेदा एव, न नपुंसकवेदा: इत्यादयोऽनुक्तास्तत एवावसेया:।

एवं तृतीयस्थले चतुर्गतिजीवानां वेदकथनत्वेन षट् सूत्राणि गतानि।

इत्थं वेदमार्गणायां सामान्यवेदलक्षणप्रतिपादनपरत्वेन एकं सूत्रं, भाववेदापेक्षया त्रिष्वपि वेदेषु नव गुणस्थानानि इति कथनमुख्यत्वेन द्वे सूत्रे, अपगतवेदानां महासाधूनां सिद्धानां च कथनपरत्वेन एकं सूत्रं, पुनश्चतुर्गतिजीवानां वेदापेक्षया गुणस्थानव्यवस्थाव्यवस्थापनार्थं षट्सूत्राणि एवंविध पंचमेऽधिकारे दशसूत्राणि गतानि।

इति षट्खण्डागमप्रथमखण्डे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: समाप्त:।

अब गतिमार्गणा में नरकगति में वेद की अपेक्षा से गुणस्थानों का कथन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

नारकी जीव चारों ही गुणस्थानों में शुद्ध (केवल) नपुंसक वेदी होते हैं।।१०५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—आर्ष वचनों से ऐसा जाना जाता है कि नारकी शुद्धरूप से नपुंसक वेदी ही होते हैं। अनवरत-प्रतिक्षण दु:खी होने के कारण उन नारकियों में स्त्री-पुरुष वेद नहीं होते हैं।

शंका—स्त्री-पुरुष ये दोनों वेद भी तो दु:खरूप ही हैं ?

समाधान—नहीं, क्योंकि अवा की अग्नि के समान संताप से न्यून होने के कारण तृण और कण्डे की अग्नि के समान पुरुषवेद और स्त्रीवेद सुखरूप हैं।

अब तिर्यंचगति में वेद का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—'

तिर्यंच एकेन्द्रिय जीवों से लेकर चतुरिन्द्रिय तक शुद्ध (केवल) नपुंसकवेदी होते हैं।।१०६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—एक इंद्रिय से लेकर चार इंद्रिय तक के तिर्यंच जीव नपुंसकवेदी होते हैं। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि एक इंद्रिय और विकलेन्द्रिय जीव सभी नपुंसक ही होते हैं।

शंका—तीन इंद्रियों की धारक चींटियों के अण्डे देखे जाते हैं इसलिए वे नपुंसक वेदी नहीं हो सकते हैं ?

समाधान—ऐसा नहीं है, क्योंकि अण्डों की उत्पत्ति गर्भ में ही होने का कोई नियम नहीं है। विग्रहगति में भी वेद का अभाव नहीं है क्योंकि वहाँ पर भी अव्यक्तवेद पाया जाता है।

भावार्थ—माता-पिता के रजो-वीर्य से गर्भधारणा मानी गई है उसी गर्भधारणा में अण्डज जन्म भी एक भेद है। उन चींटियों के अण्डे इस प्रकार के गर्भधारणारूप नहीं होते हैंं। अत: उनके अण्डों को सम्मूच्र्छन ही जानना चाहिए।

शेष तिर्यंचों के कितने वेद होते हैं ? इस प्रकार की शंका का निराकरण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

तिर्यंच असंज्ञी पंचेन्द्रिय से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक तीनों वेदों से युक्त होते हैं।। १०७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—उपर्युक्त तीनों वेदों की प्रवृत्ति क्रम से ही होती है, अक्रम से नहीं होती है, क्योंकि वेद पर्याय है। पर्यायस्वरूप होने से जैसे विवक्षित कषाय केवल अंतर्मुहूर्त पर्यन्त रहती है, वैसे सभी वेद केवल एक अंतर्मुहूर्त तक ही नहीं रहते हैं, क्योंकि जन्म से लेकर मरण तक किसी एक वेद का उदय पाया जाता है।

अब मनुष्यगति में वेद का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

मनुष्य मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक तीनों वेद वाले होते हैं।।१०८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—मिथ्यादृष्टि नामक प्रथम गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण—नवमें गुणस्थान तक के मनुष्यों में तीनों वेद संभव हैं।

शंका—संयतों के तीनों वेदों का सत्त्व कैसे संभव है ?

समाधान—ऐसा नहीं है क्योंकि अव्यक्तरूप से वेदों के अस्तित्त्व की अपेक्षा वहाँ पर तीनों वेदों की सत्ता कही है।

अब तीनों वेदों से अतीत जीवों का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

नवमें गुणस्थान के सवेद भाग से आगे के सभी गुणस्थान वाले जीव अपगतवेदी हैं।।१०९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका—नवमें गुणस्थान के सवेद भाग से परे समस्त संयतमहामुनि अपगतवेदी होते हैं। सूत्र में सर्वत्र ‘‘च’’ शब्द समुच्चयरूप अर्थ में जानना चाहिए। अर्थात् वेदरहित और पूर्वोक्त-पहले कहे हुए वेद वाले जीव होते हैं।

‘‘इति’’ शब्द का अर्थ सर्वत्र समाप्ति अर्थ में ग्रहण करना चाहिए।

अब देवों में वेद का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है—

सूत्रार्थ—

देव चार गुणस्थानों में स्त्री और पुरुष इस प्रकार दो वेद वाले होते हैं।।११०।। आदि के चार गुणस्थानों में देवों में स्त्री और पुरुष ये दो वेद होते हैं। सानत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्ग से लेकर आगे स्वर्गों में उन देवों में एक पुरुषवेद ही होता है।

प्रश्न—आगमप्रमाण के अतिरिक्त यह बात और कैसे जानी जाती है ?

उत्तर—जानी जाती है, ऊपर कहे गए समीपवर्ती सूत्र में ‘च’ शब्द का प्रयोग है और इस सूत्र में आया हुआ च शब्द अनुक्त अर्थ के समुच्चय के लिए है। इसलिए इससे यह जाना जाता है कि सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प से लेकर ऊपर के देव एक पुरुषवेदी ही होते हैं।

उसी प्रकार लब्ध्यपर्याप्तक तिर्यंच और मनुष्य तथा सम्मूच्र्छन पंचेन्द्रिय जीव नपुंसक ही होते हैं। असंख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्य और तिर्यञ्च ये दोनों स्त्री और पुरुष ये दो वेद वाले होते हैं, नपुंसक नहीं होते हैं। इत्यादि अनुक्त-जो सूत्र में नहीं बताये गये हैं उनका अर्थ भी उसी च शब्द से जान लेना।

इस प्रकार तृतीयस्थल में चतुर्गति के जीवों के वेदकथन की मुख्यता से छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस वेद मार्गणा में सामान्यवेद का लक्षण बताने वाला एक सूत्र हुआ, भाववेद की अपेक्षा से तीनों वेदों में नौ गुणस्थानों का कथन करने वाले दो सूत्र हुए, अपगतवेदी महासाधुओं एवं सिद्धों का वर्णन करने की मुख्यता से एक सूत्र हुआ, पुन: चारों गतियों के जीवों में वेद की अपेक्षा से गुणस्थान व्यवस्था बताने वाले छह सूत्र हुए, इस प्रकार पंचम अधिकार में दश सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में गणिनी ज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पाचवाँ अधिकार समाप्त हुआ।