039.सातवाँ अधिकार - अकषॉयी में उपशांत से अयोगी तक है ......

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

सातवाँ अधिकार - अकषायी में उपशांत से अयोगी तक

अथ ज्ञानमार्गणाधिकार:

Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
Jhjkk.jpg
अथ स्थलद्वयेन अष्टसूत्रै: ज्ञानमार्गणानामसप्तमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यज्ञानत्रि-विधाज्ञाननिरूपणत्वेन ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्रपंचकं। तदनु द्वितीयस्थले पंचविधज्ञाननिरूपणत्वेन ‘‘आभिणि’’ इत्यादि सूत्रत्रयं इति समुदायपातनिका।

संप्रति ज्ञानमार्गणाद्वारेण जीवपदार्थनिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-
णाणाणुवादेण अत्थि मदि-अण्णाणी सुद-अण्णाणी विभंग-णाणी आभिणिबोहियणाणी सुदणाणी ओहिणाणी मणपज्जवणाणी केवलणाणी चेदि।।११५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ज्ञानानुवादेन सन्ति मत्यज्ञानी श्रुताज्ञानी विभंगज्ञानी आभिनिबोधिकज्ञानी श्रुतज्ञानी अवधिज्ञानी मन:पर्ययज्ञानी केवलज्ञानी चेति।
अत्रापि पूर्ववत्यपर्यायपर्यायिणो: कथंचिदभेदात्पर्यायिग्रहणेऽपि पर्यायस्य ज्ञानस्यैव ग्रहणं भवति। ज्ञानिनां भेदाद् ज्ञानभेदोऽवगम्यते इति वा पर्यायिद्वारेण उपदेश:।
ज्ञानानुवादेन कथमज्ञानस्य ज्ञानप्रतिपक्षस्य संभव: इति चेत् ?
न, मिथ्यात्वसमवेतज्ञानस्यैव ज्ञानकार्याकरणादज्ञानव्यपदेशात् पुत्रस्यैव पुत्रकार्याकरणादपुत्रव्यपदेशवत्।
किं तद् ज्ञानकार्यमिति चेत् ?
तत्त्वार्थे रुचि: प्रत्यय: श्रद्धा चारित्रस्पर्शनं च ज्ञानकार्यमुच्यते। अथवा प्रधानपदमाश्रित्य अज्ञानानामपि ज्ञानव्यपदेश: आम्रवनमिति यथा।
जानातीति ज्ञानं साकारोपयोग:। अथवा जानात्यज्ञासीज्ज्ञास्यत्यनेनेति वा ज्ञानं ज्ञानावरणीयकर्मण: एकदेशप्रक्षयात् समुत्पन्नात्मपरिणाम: क्षायिको वा।
तदपि ज्ञानं द्विविधं-प्रत्यक्षं परोक्षमिति। परोक्षं द्विविधं-मति: श्रुतमिति। तत्र पंचभिरिन्द्रियैर्मनसा च यदर्थग्रहणं तन्मतिज्ञानं। तदपि चतुर्विधं-अवग्रह: ईहा अवाय धारणा चेति। विषयविषयि-सन्निपातसमनन्तरमाद्यग्रहणमवग्रह:। अवग्रहीतस्यार्थस्य विशेषाकाङ्क्षणं ईहा। ईहितस्यार्थस्य निश्चयोऽवाय:। कालान्तरेऽप्य-विस्मरणसंस्कारजनकं ज्ञानं धारणा। अथवा चतुर्विंशतिविधं मतिज्ञानं। तद्यथा-चाक्षुषं चतुर्विधं-मतिज्ञानं अवग्रह: ईहावायो धारणा चेति। एवं शेषाणामपि इन्द्रियाणां मनसश्च वाच्यं। अथवा अष्टाविंशतिविधं। तद्यथा-अवग्रहो द्विविध:-अर्थावग्रहो व्यञ्जनावग्रहश्चेति।
अप्राप्तार्थग्रहणमर्थावग्रह:। प्राप्तार्थग्रहणं व्यञ्जनावग्रह:। तत्र चक्षुर्मनसोरर्थावग्रह एव, तयो: प्राप्तार्थग्रहणानुपलंभात्। शेषाणामिंद्रियाणां द्वावप्यवग्रहौ भवत:।
शेषेन्द्रियेषु अप्राप्तार्थग्रहणं नोपलभ्यते इति चेत् ?
न, एकेन्द्रियेषु योग्यदेशस्थितनिधिषु निधिस्थितिप्रदेशे एव प्रारोहमुक्त्यन्यथानुपपत्तित: स्पर्शनस्या-प्राप्तार्थग्रहणसिद्धे:।
शेषेन्द्रियाणामप्राप्तार्थग्रहणं नोपलभ्यते इति चेत् ?
माभूदुपलम्भस्तथापि तदस्त्येव। शेषेन्द्रियाणि अप्राप्तार्थान् गृण्हन्ति, यद्यपि एतत् न वयं जानीम: तर्हि अपि तद् निषेद्धुं न पार्यते।
अतो ‘‘बहुबहुविधक्षिप्रानि:सृतानुक्तधु्रवाणां सेतराणां’’ चापेक्षया मतिज्ञानस्य षट्त्रिंशदुपरित्रिशतभेदा: भवन्तीति ज्ञातव्यं।
शब्दधूमादिभ्योऽर्थान्तरावगम: श्रुतज्ञानं। तत्र शब्दलिंगजं द्विविधमंगमंगबाह्यमिति। अंगश्रुतं द्वादशविधं। अंगबाह्यं चतुर्दशविधं।
प्रत्यक्षं त्रिविधं-अवधिज्ञानं मन:पर्ययज्ञानं केवलज्ञानमिति। साक्षान्मूर्ताशेषपदार्थपरिच्छेदकं अवधिज्ञानं। साक्षान्मन: समादाय मानसार्थानां साक्षात्करणं मन: पर्ययज्ञानं। साक्षात्त्रिकालगोचराशेषपदार्थपरिच्छेदकं केवलज्ञानं। मिथ्यात्वसमवेतमिन्द्रियजज्ञानं मत्यज्ञानं। तेनैव समवेत: शब्द: प्रत्यय: श्रुताज्ञानं। तत्समवेतमवधिज्ञानं विभंगज्ञानं।
उक्तं च-
विसजंतकूडपंजर, बंधादिसु विणुवदेसकरणेण।
जा खलु पवत्तइ मदी, मदि अण्णाणे त्ति णं वेंति।।
आभीयमासुरक्खा, भारहरामायणादि-उवएसा।
तुच्छा असाहणीया, सुद अण्णाणे त्ति तं वेंति।।
विवरीयमोहिणाणं, खइयुवसमियं च कम्मबीजं च।
वेभंगो त्ति पउच्चइ, समत्तणाणीहि समयम्हि।।
विषयन्त्रकूटपञ्जरबन्धादिषु जीवमारणबन्धनहेतुषु या मति: परोपदेशकरणेन विना प्रवर्तते तदिदं मत्यज्ञानमित्यर्हदादयो ब्रुवन्ति। तत्र परस्परसंयोगजनितमारणशक्तिविशिष्टं तैलकर्पूरादिद्रव्यं विषं, सिंहव्याघ्रादिरमृगधारणार्थमभ्यन्तरीकृतछागादिजीवं काष्ठादिरचितं तत्पादनिक्षेपमात्रकवाटसंपुटीकरणदक्षं सूत्रकीलितं यन्त्रं, मत्स्यकच्छपमूषकादिगृहणार्थमवष्टब्धं काष्ठादिमयं कूटं, तित्तिरलावकहरिणाधि-धारणार्थविरचितं ग्रन्थि विशेषकलितरज्जुमयं जालं पञ्जर:, गजोष्ट्रादिधारणार्थमवष्टब्धो गर्तमुखकीलित-ग्रन्थिविशिष्टो वारीरज्जुरचनाविशेषो बन्ध:। आदिशब्देन पक्षिपक्षलगनार्थं दीर्घदण्डाग्रम्रक्षितपिप्पल-निर्यासादिचिक्कणबन्धनगृहहरिणादिशृङ्गाग्रलग्नसूत्रग्रन्थिविशेषादिश्च गृह्यते। उपदेशपूर्वकत्वे श्रुताज्ञानत्वप्रसंगात्। उपदेशक्रियां विना यदीदृशमूहापोहविकल्पात्मकं हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहकारणं आर्तरौद्रध्यानकारणं शल्यदण्डगारवसंज्ञाद्यप्रशस्तपरिणामकारणं च इन्द्रियमनोजनितविशेषग्रहणरूपं मिथ्याज्ञानं तन्मत्यज्ञानमिति निश्चेतव्यं।
तुच्छा: परमार्थशून्या:, असाधनीया: अतएव सत्पुरुषाणामनादरणीया: परमार्थशून्यत्वात् आभीतासुरक्ष-भारतरामायणाद्युपदेशा: तत्प्रबन्धा: तेषां श्रवणादुत्पन्नं यज्ज्ञानं तदिदं श्रुताज्ञानमिति ब्रुवन्त्याचार्या:। आ समन्ताद्भीता: आभीता चोरा: तच्छास्रमप्याभीतं। असव: प्राणा: तेषां रक्षा येभ्य: ते असुरक्षा: तलवरा: तेषां शास्त्रमासुरक्षं। कौरवपाण्डवीयपञ्चभर्तृकैभार्यावृत्तान्तयुद्धव्यतिकरादिचर्चाव्याकुलं भारतं, सीताहरणरामरावणीयजातिवानरराक्षसयुद्धव्यतिकरादिस्वेच्छाकल्पनारचितं रामायणं। आदिशब्दाद्यद्यन्मिथ्या-दर्शनदूषितसर्वथैकान्तवादिस्वेच्छाकल्पितकथाप्रबन्धभुवनकोशहिंसायागादिगृहस्थकर्मत्रिदण्ड-जराधारणादितप:कर्मषोडशपदार्थ षट्पदार्थभावनाविधिनियोगभूतचतुष्टयपञ्चविंशतितत्त्वब्रह्माद्वैतचतुरार्यसत्य-विज्ञानाद्वैतसर्वशून्यत्वादिप्रतिपादकागमाभासजनितं श्रुतज्ञानाभासं तत्तत्सर्वंश्रुताज्ञानमिति निश्चेतव्यं, दृष्टेष्ट-विरुद्धार्थविषयत्वात्।

मिथ्यादर्शनकलंकितस्य जीवस्य अवधिज्ञानावरणीयवीर्यान्तरायक्षयोपशमजनितं द्रव्यक्षेत्रकाल-भावसीमाश्रितं रूपिद्रव्यविषयं आप्तागमपदार्थेषु विपरीतग्राहकं तिर्यग्मनुष्यगत्यो: तीव्रकायक्लेश-द्रव्यसंयमरूपगुणप्रत्ययं, चशब्दाद्देवनारकगत्योर्भवप्रत्ययं च मिथ्यात्वादिकर्मबंधबीजं, चशब्दात् कदाचिन्नारकादिगतौ पूर्वभवदुराचारसंचितदुष्कर्मफलतीव्रदु:खवेदनाभिभवजनितसम्यग्दर्शनज्ञानरूपधर्मबीजं वा अवधिज्ञानं विभङ्ग इति समाप्तज्ञानिनां केवलज्ञानिनां समये स्याद्वादशास्त्रे प्रोच्यते कथ्यते। नारकाणां विभङ्गज्ञानेन वेदनाभिभवतत्कारणदर्शनस्मरणानुसंधानप्रत्ययबलात् सम्यग्दर्शनोत्पत्तिप्रतीते:। विशिष्टस्य अवधिज्ञानस्य भङ्ग:-विपर्यय: विभङ्ग इति निरुक्तिसिद्धार्थस्यैव अनेन प्ररूपितत्वात्।
एतानि त्रीण्यपि ज्ञानानि मिथ्याज्ञानानि उच्यन्ते। यथा कटुकालाबुपात्रे भृतं दुग्धं कटुकं जायते तथैव मिथ्यात्वपात्रनिमित्तेन एतानि त्रीणि कुज्ञानानि भवन्ति, इति ज्ञात्वा मिथ्यात्वं परिहृत्य सम्यक्त्वमेवाराधनीयं भवति।


अथ ज्ञानमार्गणा अधिकार'

अब दो स्थलों में आठ सूत्रों के द्वारा कहा जाने वाला ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार प्रारंभ किया जा रहा है। उसमें प्रथम स्थल में सामान्य ज्ञान एवं तीन अज्ञानों का निरूपण करने वाले ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में पाँच प्रकार के सम्यग्ज्ञानों का निरूपण करने वाले ‘‘आभिणि’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इस प्रकार समुदायपातनिका हुई।

अब ज्ञानमार्गणा के द्वारा जीव पदार्थ के निरूपण करने की मुख्यता से सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणा के अनुवाद से मतिअज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिक ज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मन:पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीव होते हैं।।११५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से ज्ञानमार्गणा में आठों ज्ञान वाले जीव पाये जाते हैं। यहाँ पर भी पहले की तरह पर्याय और पर्यायी में कथंचित् अभेद होने से पर्यायी के ग्रहण करने पर भी पर्यायरूप ज्ञान का ही ग्रहण होता है। अथवा ज्ञानी कितने प्रकार के होते हैं इस बात को समझ लेने से ज्ञान के भेदों का ज्ञान हो जाता है। इसलिए पर्यायी के कथन द्वारा यहाँ पर उपदेश दिया है।

शंका'-ज्ञानमार्गणा के अनुवाद से ज्ञान के प्रतिपक्षभूत अज्ञान का कथन ज्ञान मार्गणा में कैसे संभव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि मिथ्यात्व सहित ज्ञान को ही ज्ञान का कार्य नहीं करने से अज्ञान कहा है। जैसे, पुत्रोचित कार्य को नहीं करने वाले पुत्र को ही अपुत्र कहा जाता है।

शंका-वह ज्ञान का कार्य क्या है ?

'समाधान-तत्त्वार्थ में रुचि, निश्चय, श्रद्धा और चारित्र का स्पर्श-धारण करना ज्ञान का कार्य है। अथवा प्रधान पद की अपेक्षा अज्ञान को भी ज्ञान कहा जाता है। जैसे-जिस वन में आम के वृक्षों की बहुलता होती है उसे आम्रवन कहा जाता है।

जो जानता है उसे ज्ञान कहते हैं। अर्थात् साकार उपयोग को ज्ञान कहते हैं। अथवा जिसके द्वारा यह आत्मा जानता है, जानता था अथवा जानेगा, ऐसे ज्ञानावरण कर्म के एकदेश क्षय से अथवा सम्पूर्ण ज्ञानावरण कर्म के क्षय से उत्पन्न हुए आत्मा के परिणाम को ज्ञान कहते हैं। वह ज्ञान दो प्रकार का है-प्रत्यक्ष और परोक्ष। परोक्ष के दो भेद है-मतिज्ञान और श्रुतज्ञान। उनमें पाँच इन्द्रियों और मन से जो पदार्थ का ग्रहण होता है उसे मतिज्ञान कहते हैं। वह मतिज्ञान चार प्रकार का है-अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा। विषय और विषयी के संबंध होने के अनन्तर समय में जो प्रथम ग्रहण होता है उसे अवग्रह कहते हैं। अवग्रह से ग्रहण किए गए पदार्थ के विशेष को जानने के लिए अभिलाषारूप जो ज्ञान होता है उसे ईहा कहते हैं। ईहा के द्वारा जाने गये पदार्थ के निश्चयरूप ज्ञान को अवाय कहते हैं। कालान्तर में भी विस्मरण न होने रूप संस्कार के उत्पन्न करने वाले ज्ञान को धारणा कहते हैं।

अथवा मतिज्ञान चौबीस प्रकार का है। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-चक्षु इन्द्रिय से उत्पन्न होने वाला मतिज्ञान चार प्रकार का है-अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा। इसी प्रकार शेष चार इन्द्रियों से और मन से उत्पन्न होने वाला ज्ञान भी अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा के भेद से चार-चार प्रकार का है इस प्रकार कथन करना चाहिए। इस प्रकार ये सब मिलाकर चौबीस भेद हो जाते हैं। अथवा, मतिज्ञान अट्ठाईस प्रकार का है। उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है। अवग्रह दो प्रकार का है-अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह।

अप्राप्त अर्थ के ग्रहण करने को अर्थावग्रह कहते हैं।

प्राप्त अर्थ के ग्रहण करने को व्यंजनावग्रह कहते हैं।

अप्राप्त अर्थ का ग्रहण करना अर्थावग्रह है तथा प्राप्त अर्थ का ग्रहण करना व्यञ्जनावग्रह है। उनमें से अर्थावग्रह चक्षु और मन से ही होता है क्योंकि उन दोनों के प्राप्त अर्थ के ग्रहण का अभाव पाया जाता है। शेष इन्द्रिय वाले जीवों के दोनों अवग्रह होते हैं।

शंका-शेष इन्द्रियों में अप्राप्त अर्थ का ग्रहण नहीं पाया जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि एकेन्द्रिय वृक्षों में उनके योग्य देश में स्थित निधियों के होने पर जिस प्रदेश में निधि स्थित है उस प्रदेश में ही जड़ों का फैलाव अन्यथा बन नहीं सकता है, इसलिए स्पर्शन इन्द्रिय के अप्राप्त अर्थ का ग्रहण करना सिद्ध हो जाता है।

शंका-इस प्रकार यदि स्पर्शन इन्द्रिय के अप्राप्त अर्थ का ग्रहण करना बन जाता है तो बन जावे। फिर भी शेष इन्द्रियों के अप्राप्त अर्थ का ग्रहण करना नहीं पाया जाता है ?

समाधान-यदि हमारा ज्ञान त्रिकालगोचर समस्त पदार्थों को जानने वाला होता तो अनुपलब्ध का अभाव सिद्ध हो जाता, अर्थात् हमारा ज्ञान यदि सभी पदार्थों को जानता तो कोई भी पदार्थ उसके लिए अनुपलब्ध नहीं रहता। किन्तु हमारा ज्ञान तो त्रिकालवर्ती पदार्थों को जानने वाला है नहीं, क्योंकि सर्व पदार्थों को जानने वाले ज्ञान की हमारे उपलब्धि ही नहीं होती है। इस कथन से यह सिद्ध हुआ कि शेष इन्द्रियाँ अप्राप्त पदार्थ को ग्रहण करती हैं इस बात को यदि हम न भी जान सके, तो भी उसका निषेध नहीं किया जा सकता है।

अत: '‘‘बहुबहुविधक्षिप्रानि:सृतानुक्तधु्रवाणां सेतराणाम्’’' इस तत्त्वार्थसूत्र के सूत्र की अपेक्षा मतिज्ञान के तीन सौ छत्तीस भेद होते हैं ऐसा जानना चाहिए।

शब्द, धूम आदि से भिन्न अर्थ का ज्ञान प्राप्त होना श्रुतज्ञान है। शब्द और लिंग से उत्पन्न होने वाले उस श्रुतज्ञान के दो भेद हैं-अंगश्रुत (अंगप्रविष्ट) और अंगबाह्य। उनमें से अंगश्रुत बारह भेद वाला है एवं अंगबाह्य चौदह प्रकार का है।

प्रत्यक्षज्ञान के तीन भेद हैं-अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान।

समस्त मूर्तिक पदार्थों को साक्षात् रूप से जानने वाला अवधिज्ञान है। मन का आश्रय करके दूसरों के मन में स्थित मूर्तिक पदार्थों का साक्षात् ज्ञान कराने वाला मन:पर्ययज्ञान कहलाता है। भूत, भविष्यत् और वर्तमानकाल के त्रैकालिक समस्त पदार्थों को साक्षात्रूप से ज्ञान कराने वाला केवलज्ञान होता है।

इन्द्रियोें से उत्पन्न होने वाला जो मिथ्यात्व सहित ज्ञान है उसे मत्यज्ञान-कुमतिज्ञान कहते हैं। उस कुमतिज्ञान से समन्वित जो शाब्दिक प्रत्यय हैं उन्हें कुश्रुतज्ञान कहते हैं। तथा मिथ्यात्व के साथ जो अवधिज्ञान है वह विभंगावधिज्ञान कहलाता है। कहा भी है-

गाथार्थ

जीवों को मारने और बंधन में हेतु विष, यंत्र, कूट, पंजर, बंध आदि में बिना परोपदेश के जो मति प्रवर्तित होती है वह मतिअज्ञान है ऐसा अर्हन्त भगवान् आदि ने कहा है।।

सज्जनों के द्वारा अनादरणीय आभीत, आसुरक्ष, भारत, रामायण आदि के उपदेश, उनकी रचनाएँ, उनका सुनना तथा उनके सुनने से उत्पन्न हुए ज्ञान को आचार्य श्रुताज्ञान-कुश्रुतज्ञान कहते हैं।।

मिथ्यादृष्टि जीव के अवधिज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से उत्पन्न हुआ द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की मर्यादा को लिए हुए रूपीद्रव्य को विषय करने वाला, किन्तु देव, शास्त्र और पदार्थों को विपरीतरूप से ग्रहण करने वाला अवधिज्ञान केवलज्ञानियों के द्वारा प्रतिपादित आगम में विभंग ज्ञान कहा जाता है।।

जीवों को मारने और बंधन में हेतु विष, यंत्र, कूट, पंजर, बंध आदि में बिना परोपदेश के मति प्रवर्तित होती है वह मति अज्ञान है ऐसा अर्हन्त भगवान् आदि कहते हैं। परस्पर वस्तु के संयोग से उत्पन्न हुई मारने की शक्ति से युक्त तैल, रसकर्पूर आदि द्रव्य विष हैं। सिंह, व्याघ्र आदि जीवों को पकड़ने के लिए अंदर में बकरा आदि रखकर लकड़ी आदि से बनाया गया, जिसमें पैर रखते ही द्वार बंद हो जाता हो ऐसा सूत्र से कीलित यंत्र होता है। मछली, कछुआ, चूहा आदि पकड़ने के लिए काष्ठ आदि से रचे गए को कूट कहते हैं। तीतर, लावक, हरिण आदि पकड़ने के लिए रस्सी में अमुक प्रकार की गाँठ देकर बनाये जाल को पंजर कहते हैं। हाथी, ऊँट आदि पकड़ने के लिए गड्ढा खोदकर और उसका मुख ढाँककर या रस्सी आदि का फन्दा लगाकर जो विशेष रचना की जाती है उसे बंध कहते हैं। आदि शब्द से पक्षियों के पंख चिपकाने के लिए लम्बे बाँस आदि के अग्रभाग में फंदा आदि डालना आदि लिया जाता है। इस प्रकार के कार्यों में जो बिना परोपदेश के स्वयं ही बुद्धि लगती है वह कुमतिज्ञान है। उपदेशपूर्वक होने पर उसे कुश्रुतज्ञान का प्रसंग आता है अत: उपदेश के बिना जो इस प्रकार का ऊहापोह विकल्परूप, हिंसा, असत्य, चोरी, विषय सेवन और परिग्रह का कारण, आर्त तथा रौद्र ध्यान का कारण शल्य, दण्ड, गारव, संज्ञा आदि अप्रशस्त परिणामों का कारण, जो इन्द्रिय और मन से उत्पन्न हुआ विशेष ग्रहणरूप मिथ्याज्ञान है वह कुमतिज्ञान है यह निश्चय करना चाहिए।

तुच्छ अर्थात् परमार्थ से शून्य और इसी कारण से सज्जनों के द्वारा अनादरणीय आभीत, आसुरक्ष, भारत-रामायण आदि के उपदेश, उनकी रचनाएँ, उनका सुनना तथा उनके सुनने से उत्पन्न हुआ ज्ञान, उसे आचार्य श्रुतअज्ञान कहते हैं। आभीत चोर को कहते हैं क्योंकि उसे सब ओर से भय सताता है। उनके शास्त्र को भी आभीतशास्त्र कहते हैं। असु अर्थात् प्राणों की रक्षा जिनसे होती है वे असुरक्ष अर्थात् कोतवाल आदि उनके शास्त्र को आसुरक्ष कहते हैं। कौरव-पाण्डवों के युद्ध, पंचभर्ता द्रौपदी का वृत्तान्त, युद्ध की कथा आदि की चर्चा से भरा महाभारत ग्रंथ है। सीताहरण, राम की उत्पत्ति, रावण की जाति, वानरों और राक्षसों के युद्ध की यथेच्छ कल्पना को लेकर रची गई रामायण है। आदि शब्द से जो-जो मिथ्यादर्शन से दूषित सर्वथा एकान्तवादी यथेच्छ कथाप्रबंध, भुवनकोश, हिंसामय यज्ञादि गृहस्थधर्म, त्रिदण्ड तथा जटा धारण आदि तपस्वियों का कर्म, नैयायिकों का षोडश पदार्थवाद, वैशेषिकों का षट्पदार्थवाद, मीमांसकों का भावनाविधिनियोग, चार्वाक का भूतचतुष्ट्यवाद, सांख्यों के पच्चीस तत्त्व, बौद्धों के चार आर्यसत्य, विज्ञानाद्वैत, सर्वशून्यवाद आदि के प्रतिपादक आगमाभासों से होने वाला जितना श्रुतज्ञानाभास है वह सब श्रुतअज्ञान जानना। क्योंकि वह प्रत्यक्ष अनुमान से विरुद्ध अर्थ को विषय करता है।

मिथ्यादृष्टि जीव के अवधिज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से उत्पन्न हुआ, द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की मर्यादा को लिए हुए रूपीद्रव्य को विषय करने वाला, किन्तु देव, शास्त्र और पदार्थों को विपरीतरूप से ग्रहण करने वाला अवधिज्ञान केवलज्ञानियों के द्वारा प्रतिपादित आगम में विभंग कहा जाता है। यह विभंगज्ञान तिर्यंचगति और मनुष्यगति में तीव्र कायक्लेशरूप द्रव्य संयम से उत्पन्न होता है इसलिए गुणप्रत्यय है। ‘च’ शब्द से देवगति और नरकगति में भवप्रत्यय है तथा मिथ्यात्व आदि कर्मों के बंध का बीज है। ‘च’ शब्द से कदाचित् नरकगति में पूर्व जन्म में किये गये दुराचारों में से संचित खोटे कर्मों का फल तीव्र दु:ख एवं वेदना के भोगने से होने वाले सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानरूप धर्म का बीज है। क्योंकि नारकियोें के विभंगज्ञान के द्वारा वेदनाभिभव और उसके कारणों के दर्शन, स्मरण आदिरूप ज्ञान के बल से सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति होती है। ‘वि’ अर्थात् विशिष्ट अवधिज्ञान का भंग अर्थात् विपर्यय विभंग होता है। इस निरुक्ति सिद्ध अर्थ को ही यहाँ कहा है।

ये तीनों ज्ञान मिथ्याज्ञान कहे जाते हैं। जैसे कड़वी तूमड़ी में भरा गया दूध कड़वा हो जाता है उसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी पात्र के निमित्त से ये तीनों ज्ञान कुज्ञान हो जाते हैं ऐसा जानकर मिथ्यात्व को छोड़कर सम्यक्त्व की ही आराधना करना उचित मानना चाहिए।

उक्तं च श्रीसमन्तभद्रस्वामिना-

न सम्यक्त्वसमं किञ्चित्त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि।

श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनुभृताम्।।
अधुना ज्ञानानां कथनं क्रियते-
अभिमुहणियमिय-बोहण-माभिणिबोहिय-मणिंदि-इंदियजं।
बहु-ओग्गहाइणा खलु कय-छत्तीस-ति-सय-भेयं।।
स्थूलवर्तमानयोग्यदेशावस्थितोऽर्थ: अभिमुख:, अस्येन्द्रियस्य अयमेवार्थ: इत्यवधारितो नियमित:। अभिमुखश्चासौनियमितश्च अभिमुखनियमित:। तस्यार्थस्य बोधनं ज्ञानं, आभिनिबोधिकं मतिज्ञानमित्यर्थ:। अभिनिबोध एव आभिनिबोधकं, स्वार्थिके ठण् प्रत्ययेन सिद्धं भवति। तज्ज्ञानं-अनिन्द्रियेन्द्रियजं-अनिन्द्रियं मन:, इन्द्रियाणि स्पर्शनादीनि तेभ्यो जातमुत्पन्नं। अनेन इन्द्रियमनसोर्मतिज्ञानोत्पत्तिकारणत्वं दर्शितं। एतज्ज्ञानं बहु-आदिद्वादशभेदै: अवग्रहादिभिश्च खलु षट्त्रिंशदधिकत्रिशतभेदरूपं भवतीति।
अत्थादो अत्थंतर-उवलंभो तं भणंति सुदणाणं।
आभिणिबोहिय-पुव्वं णियमेणिह सद्दजं पमुहं।।
आभिनिबोधिवंâ-मतिज्ञानं, मतिज्ञानावरणक्षयोपशमेन मतिज्ञानमेव पूर्वं उत्पद्यते। पुन: तद्गृहीतार्थम-वलम्ब्य तद्बलादर्थान्तरविषयं श्रुतज्ञानमुत्पद्यते नान्यथाप्रकारेणेति नियमशब्देन मतिज्ञानप्रवृत्यभावे श्रुतज्ञानाभाव इत्यवधार्यते। इह-अस्मिन् श्रुतज्ञानप्रकरणे अक्षरानक्षरात्मकयो: शब्दजिंलगजयो: श्रुतज्ञानभेदयो: मध्ये शब्दजं वर्णपदवाक्यात्मकशब्दजनितं श्रुतज्ञानं प्रमुखं-प्रधानं दत्तग्रहणशास्त्राध्ययनादि सकलव्यवहाराणां तन्मूलत्वात्। अनक्षरात्मकं तु लिंगजं श्रुतज्ञानं एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यंतेषु जीवेषु विद्यमानमपि व्यवहारानुपयोगित्वात् अप्रधानं भवतीति।
अवहीयदि त्ति ओही सीमाणाणे त्ति वण्णिदं समए।
भवगुणपच्चय-विहियं तमोहिणाणे त्ति णं बेंति।।
अवधीयते-द्रव्यक्षेत्रकालभावै: परिमीयते इत्यवधि:, यत्तृतीयं सीमाविषयं ज्ञानं परमागमे वर्णितं। भवगुणप्रत्ययविहितं-भव: नरकादिपर्याय:, गुण: सम्यग्दर्शनविशुद्ध्यादि:, भवगुणौ प्रत्ययौ कारणे ताभ्यां विहितं उत्तंâ, भवप्रत्ययत्वेन गुणप्रत्ययत्वेन अवधिज्ञानं द्विविधं कथितमिति। तत्र भवप्रत्ययावधिज्ञानं सुराणां नारकाणां चरमभवतीर्थकराणां च संभवति, तेषां सर्वांगोत्थं भवति। गुणप्रत्ययं पर्याप्तमनुष्याणां संज्ञिपंचेन्द्रियपर्याप्ततिरश्चां च संभवति, तच्च तेषां शंखादिचिन्हभवं भवतीति। तच्च अवधिज्ञानं त्रिविधं- देशावधिपरमावधिसर्वावधिभेदात्।

भवप्रत्ययोऽवधि: देशावधिरेव भवति देवनारकयोर्गृहस्थतीर्थकरस्य च परमावधिसर्वावध्योरसंभवात्। परमावधि: सर्वावधिश्च द्वावपि नियमेन गुणप्रत्ययावेव भवत: संयमलक्षणगुणाभावे तयोरभावात्। देशावधिरपि गुणे दर्शनविशुद्ध्यादिलक्षणे सति भवति। एवं गुणप्रत्ययास्त्रयोऽप्यवधय: संभवन्ति। भवप्रत्ययस्तु देशावधिरेवेति निश्चितं जातं। देशावधेज्र्ञानस्य जघन्यं नरतिरश्चोरेव संयतासंयतयो: भवति, न देवनारकयो:। देशावधे: सर्वोत्कृष्टं तु नियमेन मनुष्यगतिसकलसंयते एव भवति नेतरगतित्रये, तत्र महाव्रताभावात्। परमावधिसर्वावधी द्वावपि जघन्येनोत्कृष्टेन च मनुष्यगतौ एव चरमांगस्य महाव्रतिन: एव संभवत: इति। तथा गुणप्रत्ययो देशावधि: षोढा न परमावधिसर्वावधी इति। तदपि अनुगाम्यननुगाम्यवस्थितमनवस्थितं प्रवर्धमानं हीयमानं चेति षड्विधं ज्ञातव्यं।
चिंतियमचिंतियं वा अद्धं चिंतियमणेयभेयगयं।
मणपज्जवं ति उच्चइ जं जाणइ तं खु णरलोए।।
चिंतितं-चिंताविषयीकृतं, अचिंतितं-चिन्तयिष्यमाणं, अर्धचिंतितं-असंपूर्णचिंतितं वा इत्यनेकभेदगतं अर्थं परमनस्यवस्थितं यज्ज्ञानं जानाति तत्खलु मन:पर्यय इत्युच्यते। तस्योत्पत्तिप्रवृत्ती नरलोके मनुष्यक्षेत्रे एव न तद्बहि: नरलोके इति पंचचत्वारिंशल्लक्षयोजनप्रमाणं समचतुरस्रघनप्रतरं मन:पर्ययविषयोत्कृष्टक्षेत्रं समुद्दिष्टं, तत: कारणात् मानुषोत्तराद् बहिश्चतुष्कोणस्थिततिर्यगमराणां परचिंतितानां उत्कृष्टविपुलमते: परिज्ञानमिति ज्ञातव्यम्।
परकीयमनसि व्यवस्थितोऽर्थ: मन: तत् पर्येति गच्छति जानातीति मन:पर्यय:। स सामान्येनैकोऽपि भेदविवक्षया ऋजुमतिमन:पर्यय: विपुलमतिमन:पर्ययश्चेति द्विविधो भवति।
इदं चतुर्थज्ञानमपि महासंयतस्यैव न तु सर्वेषामिति ज्ञातव्यं।
संपुण्णं तु समग्गं केवलमसवत्त-सव्व-भावविदं।
लोगालोग-वितिमिरं केवलणाणं मुणेयव्वं।।
जीवद्रव्यस्य शक्तिगतसर्वज्ञानाविभागप्रतिच्छेदानां व्यक्तिगतत्वात्संपूर्णं। मोहनीयवीर्यान्तरायनिर-वशेषक्षयादप्रतिहतशक्तियुक्तत्वात् निश्चलत्वाच्च समग्रं। इन्द्रियसहायनिरपेक्षत्वात् केवलम्। घाति-चतुष्टयप्रक्षयात् क्रमकरणव्यवधानरहितत्वेन सकलपदार्थगतत्वात् असपत्नम्। लोकालोकयोर्विगततिमिरं तदिदं केवलज्ञानं मन्तव्यम्।
एतत्केवलज्ञानस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा तत्प्राप्त्यर्थमेव प्रयतितव्यं अस्माभि:।

श्री समन्तभद्र स्वामी ने कहा भी है-

श्लोकार्थ-तीन लोक और तीन काल में प्राणियों के लिए सम्यक्त्व के समान कल्याणकारी और मिथ्यात्व के समान अकल्याणकारी-दु:खकारी कोई वस्तु नहीं है।

अब ज्ञान का कथन करते हैं-

गाथार्थ-मन और इन्द्रिय की सहायता से उत्पन्न हुए अभिमुख और नियमित पदार्थ के ज्ञान को आभिनिबोधिक ज्ञान कहते हैं। उसके बहु आदिक बारह प्रकार के पदार्थ और अवग्रह आदि की अपेक्षा तीन सौ छत्तीस भेद हो जाते हैं।

स्थूल, वर्तमान और योग्यदेश में स्थित अर्थ को अभिमुख कहते हैं। इस इन्द्रिय का यही विषय है इस अवधारणा को नियमित कहते हैं। अभिमुख और नियमित को अभिमुख नियमित कहते हैं। उस अर्थ के बोधन अर्थात् ज्ञान को मतिज्ञान कहते हैं। अभिनिबोध ही आभिनिबोधिक है इस प्रकार स्वार्थ में ‘ठण्’ प्रत्यय करने से इसकी सिद्धि होती है। वह मतिज्ञान अनिन्द्रिय-मन से और स्पर्शन आदि इन्द्रियों से उत्पन्न होता है। इससे इन्द्रिय और मन को मतिज्ञान की उत्पत्ति का कारण दिखलाया है। पुन: वह मतिज्ञान बहु आदि बारह भेदों से और अवग्रह आदि के द्वारा तीन सौ छत्तीस भेद वाला हो जाता है ऐसा जानना चाहिए।

गाथार्थ

-मतिज्ञान से जाने हुए पदार्थ के अवलम्बन से तत्संबंधी दूसरे पदार्थ के ज्ञान को श्रुतज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान नियम से मतिज्ञानपूर्वक होता है। इसके अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक अथवा शब्दजन्य और लिंगजन्य इस प्रकार दो भेद हैं। उनमें शब्दजन्य श्रुतज्ञान मुख्य है।।

जो आभिनिबोधिक-मतिज्ञान है वह मतिज्ञानावरण के क्षयोपशम से पहले मतिज्ञान ही उत्पन्न होता है पुन: उससे गृहीत अर्थ का अवलम्बन लेकर उसके बल से अन्य अर्थ को विषय करने वाला श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है, अन्य प्रकार से नहीं। ‘नियम’ शब्द से यह अवधारण किया गया है कि मतिज्ञान की प्रवृत्ति के अभाव में श्रुतज्ञान नहीं होता है। इस श्रुतज्ञान के प्रकरण में श्रुतज्ञान के अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक या शब्दजन्य और लिंगजन्य भेदों में से वर्णपदवाक्यात्मक शब्द से होने वाला श्रुतज्ञान प्रमुख है-प्रधान है क्योंकि देना-लेना, शास्त्र का अध्ययन आदि समस्त व्यवहार का मूल वही है। अनक्षरात्मक अर्थात् लिंगजन्य श्रुतज्ञान एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों में विद्यमान रहते हुए भी व्यवहार में उपयोगी न होने से अप्रधान होता है।

गाथार्थ-

द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा जिस ज्ञान के विषय की सीमा हो उसे अवधिज्ञान कहते हैं। इसलिए परमागम में इसको सीमाज्ञान कहा है। इसके भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय इस प्रकार दो भेद जिनेन्द्रदेव ने कहे हैं।

‘‘अवधीयते’’ अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के द्वारा जिसका परिमाण किया जाता है वह अवधिज्ञान है। अर्थात् जैसे मति, श्रुत और केवलज्ञान का विषय द्रव्यादि की अपेक्षा अपरिमित है वैसा इसका नहीं है। परमागम में जो तीसरा सीमाविषयक ज्ञान कहा है उसे अर्हन्त आदि अवधिज्ञान कहते हैं। भव अर्थात् नरक आदि पर्याय और गुण अर्थात् सम्यग्दर्शन की विशुद्धि आदि। भव और गुण जिनके कारण हैं वे भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय नामक अवधिज्ञान हैं। इस तरह अवधिज्ञान के दो भेद हैं।

उनमें से भवप्रत्यय अवधिज्ञान देवों, नारकियों और चरमशरीरी तीर्थंकरों के होता है। तथा वह समस्त आत्मा के प्रदेशों में वर्तमान अवधिज्ञानावरण और वीर्यान्तराय नामक दो कर्मों के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है इसलिए इसे सर्वांग से उत्पन्न कहा जाता है। गुणप्रत्यय अवधिज्ञान पर्याप्त मनुष्यों के और संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंचों के होता है। वह उनके शंख आदि चिन्हों से उत्पन्न होता है अर्थात् नाभि से ऊपर शंख, वङ्का, पद्म, स्वस्तिक, मच्छ, कलश आदि शुभ चिन्हों से युक्त आत्मप्रदेशों में स्थित अवधिज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्मों के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है। भवप्रत्यय अवधिज्ञान में भी सम्यग्दर्शन, विशुद्धि आदि गुण रहते हैं फिर भी उसकी उत्पत्ति में उन गुणों की अपेक्षा नहीं होती, मात्र भवधारण करने से ही अवधिज्ञान होता है इसीलिए उसे भवप्रत्यय कहते हैं। गुणप्रत्यय अवधिज्ञान में यद्यपि मनुष्य और तिर्यंच का भव रहता है फिर भी अवधिज्ञान की उत्पत्ति में उसकी अपेक्षा नहीं होती, केवल सम्यग्दर्शन आदि गुणों के कारण ही अवधिज्ञान प्रगट होता है इसलिए यह गुणप्रत्यय कहा जाता है।

वह भवप्रत्यय अवधि नियम से देशावधि ही होता है क्योेंकि देव, नारकी और गृहस्थ अवस्था में तीर्थंकर के परमावधि एवं सर्वावधि ज्ञान नहीं होते हैं। परमावधि और सर्वावधि नियम से गुणप्रत्यय ही होते हैं क्योंकि संयम गुण के अभाव में ये दोनों नहीं होते हैं। देशावधि भी दर्शनविशुद्धि आदि गुणों के होने पर होता है। इस प्रकार गुणप्रत्यय तो तीनों भी अवधिज्ञान होते हैं किन्तु भवप्रत्यय देशावधि ही है यह निश्चित हुआ।

देशावधि का जघन्य भेद संयमासंयमी मनुष्यों और तिर्यंचों के ही होता है, देवों और नारकियों के नहीं होता है। किन्तु देशावधि का सर्वोत्कृष्ट भेद नियम से सकलसंयमी मनुष्य के ही होता है, शेष तीन गतियों में नहीं होता है क्योंकि वहाँ महाव्रत नहीं होते हैं। परमावधि सर्वावधि जघन्य भी और उत्कृष्ट भी मनुष्यगति में ही चरमशरीरी महाव्रती के ही होते हैं। तथा गुणप्रत्यय देशावधि छह प्रकार का है परमावधि सर्वावधि नहीं। वह गुणप्रत्यय देशावधिज्ञान अनुगामी, अननुगामी, अवस्थित, अनवस्थित, प्रवर्धमान और हीयमान ऐसे छह प्रकार का है।

विशेषार्थ-

गुणप्रत्यय देशावधिज्ञान के छह भेद हैं-अनुगामी, अननुगामी, अवस्थित, अनवस्थित, वर्धमान और हीयमान। उनमें से जो अवधिज्ञान अपने स्वामी जीव का अनुगमन करता है वह अनुगामी है। वह तीन प्रकार का है-क्षेत्रानुगामी, भवानुगामी और उभयानुगामी।

जो अवधिज्ञान अपने उत्पत्तिक्षेत्र से अन्य क्षेत्र में जाने वाले जीव के साथ जाता है किन्तु भवान्तर में साथ नहीं जाता वह क्षेत्रानुगामी है। जो उत्पत्ति क्षेत्र से स्वामी का मरण होने पर दूसरे भव में भी साथ जाता है वह भवानुगामी है। जो अपने उत्पत्तिक्षेत्र और भव से अन्यत्र भरत, ऐरावत, विदेह आदि क्षेत्र में देव, मनुष्य आदि के भव में जीव का अनुगमन करता है वह उभयानुगामी है।

जो अविधज्ञान अपने स्वामी जीव का अनुगमन नहीं करता है वह अननुगामी है वह भी क्षेत्राननुगामी, भवाननुगामी, उभयाननुगामी के भेद से तीन प्रकार का है।

जो हानिवृद्धि के बिना सूर्यमण्डल की तरह एकरूप ही रहता है वह अवस्थित है। जो कभी बढ़ता है, कभी घटता है, कभी उसरूप ही अवस्थित रहता है वह अनवस्थित है।

जो शुक्लपक्ष के चंद्रमण्डल की तरह अपने उत्कृष्ट पर्यन्त बढ़ता है वह वर्धमान है तथा जो कृष्णपक्ष के चंद्रमण्डल की तरह अपने क्षयपर्यन्त घटता है वह हीयमान है।

अवधिज्ञान के जघन्य भेद से लेकर उत्कृष्ट भेद पर्यन्त असंख्यात लोकप्रमाण भेद भी होते हैं। वह द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव की मर्यादा के अनुसार रूपीपुद्गलद्रव्य और उससे सम्बद्ध संसारी जीवों को प्रत्यक्षरूप से जानता है किन्तु सर्वावधिज्ञान जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट भेद से रहित है, अवस्थित है, उसमें हानि-वृाqद्ध नहीं होती है। इसका अर्थ यह है कि वह परम उत्कर्ष को प्राप्त है क्योंकि अवधिज्ञानावरण का सर्वोत्कृष्ट क्षयोपशम वहीं होता है इससे यह निश्चित होता है कि देशावधि और परमावधि के जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट भेद होेते हैं।

अवधिज्ञान का इससे अधिक विस्तृत वर्णन अन्य करणानुयोग गंथों से जानना चाहिए।

गाथार्थ-

जिसका भूतकाल में चिन्तवन किया है अथवा जिसका भविष्यकाल में चिन्तवन होगा अथवा जो अर्धचिन्तित है इत्यादि अनेक प्रकार से दूसरे के मन में स्थित पदार्थ को जो जानता है उसे मन:पर्ययज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान मनुष्यों में ही होता है।

उपर्युक्त मन:पर्ययज्ञान की प्रवृत्ति नरलोक के मनुष्यक्षेत्र में ही होती है, उसके बाहर नहीं होती है। यहाँ नरलोक का अभिप्राय है कि पैंतालिस लाख योजन प्रमाण समचतुरस्र घन प्रतर तक मन:पर्ययज्ञान का उत्कृष्ट विषयक्षेत्र माना गया है। इस कारण मानुषोत्तर पर्वत से बाहर चारों कोनों में स्थित तिर्यंच और देवों द्वारा चिंतित पदार्थों को उत्कृष्ट विपुलमतिज्ञान वाला ही जान सकता है ऐसा जानना चाहिए।

दूसरे के मन में स्थित पदार्थ को अथवा मन और पर्यय-पदार्थ दोनों को जानने वाला मन:पर्ययज्ञान कहलाता है। वह सामान्य से एक होते हुए भी भेदविवक्षा से दो प्रकार का होता है-ऋजुमतिमन:पर्ययज्ञान और विपुलमतिमन:पर्ययज्ञान।

यह मन:पर्यय नामका चतुर्थ ज्ञान महामुनियों के ही होता है, सभी के नहीं होता ऐसा जानना चाहिए।

गाथार्थ-

यह केवलज्ञान सम्पूर्ण, समग्र, केवल, प्रतिपक्षरहित, सर्वपदार्थगत और लोकालोक में अंधकाररहित होता है।

जीवद्रव्य के शक्तिरूप से जो सब ज्ञान के अविभाग प्रतिच्छेद हैं उन सबकी प्रगटता हो जाने से केवलज्ञान सम्पूर्ण है। मोहनीय और वीर्यान्तराय का सम्पूर्ण क्षय होने से केवलज्ञान की शक्ति बेरोक और निश्चल है इसलिए वह समग्र है। इंद्रियों की सहायता न लेने से केवल है। चार घातिया कर्मों का अत्यन्त क्षय हो जाने से तथा क्रम और इंद्रियों के व्यवधान से रहित होने के कारण समस्त पदार्थों को जानने से असपत्न है। लोक और अलोक में अज्ञानरूपी अंधकार से रहित होकर प्रकाशित करने वाला ऐसा यह केवलज्ञान जानना चाहिए।

इस केवलज्ञान की महिमा को जानकर उसकी प्राप्ति का हम सभी को प्रयत्न करना चाहिए।

यथा च पूर्वाचार्येणापि प्राथ्र्यते-

स्वात्माभिमुखसंवित्ति-लक्षणं श्रुतचक्षुषा।

पश्यन् पश्यामि देव! त्वां केवलज्ञानचक्षुषा।।
तात्पर्यमेतत्-श्रुतज्ञानेनैव केवलज्ञानोत्पत्तिर्जायते न चान्यज्ञानेन अतोऽस्माभिर्नित्यमेव श्रुतदेवी उपासनीया। श्रुतज्ञानस्य माहात्म्यं आचार्यदेवैरपि गीयते।
तदेवोत्तं-
सुदकेवलं च णाणं, दोण्णिवि सरिसाणि होंति बोहादो।
सुदणाणं तु परोक्खं, पच्चक्खं केवलं णाणं।।३६९।।
श्रुतज्ञानं केवलज्ञानं चेति द्वे ज्ञाने बोधात् समस्तवस्तुद्रव्यगुणपर्यायपरिज्ञानात् सदृशे भवत:। तु पुन: अयं विशेष:, परमोत्कर्षपर्यंतं प्राप्तमपि श्रुतकेवलज्ञानं सकलपदार्थेषु परोक्षं अविशदं अस्पष्टं अमूर्तेषु अर्थपर्यायेषु अन्येषु सूक्ष्मांशेषु विशदत्वेषु विशदत्वेन प्रवृत्यभावात्। मूर्तेष्वपि व्यञ्जनपर्यायेषु स्थूलांशेषु स्वविषयेषु अवधिज्ञानादिव साक्षात्करणाभावाच्च।
सकलावरणवीर्यान्तरायनिरवशेषक्षयोत्पन्नं केवलज्ञानं प्रत्यक्षं समस्तत्वेन विशदं स्पष्टं भवति। तथापि श्रुतज्ञानेनापि परोक्षमेव त्रैलोक्यस्वरूपं अवबुध्यते, अतएव-
नमस्तस्यै सरस्वत्यै विमलज्ञानमूर्तये।
विचित्रा लोकयात्रेयं यत्प्रसादात्प्रवर्तते।।
चांदखेडीति ख्यातेऽस्मिन्नादिनाथं जिनेश्वरम्।
नमाम: सर्वबिम्बानि चात्मसौख्यस्य लब्धये।।१।।

अधुना गत्यादिमार्गणायां मतिश्रुताज्ञानव्यवस्थाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-

मदि-अण्णाणी सुद-अण्णाणी एइंदिय-प्पहुडि जाव सासणसम्माइट्ठि त्ति।।११६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मत्यज्ञानिन: श्रुताज्ञानिनो जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य यावत् सासादनसम्यग्दृष्टय: इति। अथ कश्चिदाह-मिथ्यात्वोदयस्याभावात् सासादनगुणस्थाने न द्वयोरज्ञानयो: सत्त्वं संभवति ?
नैतत्, मिथ्यात्वं नाम विपरीताभिनिवेश: स च मिथ्यात्वादनन्तानुबंधिनश्चोत्पद्यते। समस्ति च सासादनस्यानंतानुबंध्युदय: इति।
कथमेकेन्द्रियाणां श्रुतज्ञानं श्रोत्राभावात् न शब्दार्थावगम: ?

नैष दोष:, यतो नायमेकान्तोऽस्ति शब्दार्थावबोध एव श्रुतमिति। अपि तु अशब्दरूपादपि लिंगात् लिंगिज्ञानमपि श्रुतमिति।
अमनसां तदपि कथमिति चेत् ?
न, मनोऽन्तरेण वनस्पतिषु हिताहितप्रवृत्तिनिवृत्त्युपलंभतोऽनेकांतात्।
तात्पर्यमेतत्-एतन्मतिश्रुताज्ञाने एकेन्द्रियादारभ्य पंचेन्द्रियपर्यंतेषु मिथ्यात्वसासादनगुणस्थानयो: भवत: इति।

अधुना विभंगज्ञाने गुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-

विभंगणाणं सण्णि-मिच्छाइट्ठीणं वा सासणसम्माइट्ठीणं वा।।११७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विभंगज्ञानं-कुअवधिज्ञानं संज्ञिमिथ्यादृष्टीनां वा सासादनसम्यग्दृष्टीनां वा भवति।

विकलेन्द्रियाणां कथं न भवेत् ?
न भवति, तत्र तन्निमित्तकक्षयोपशमाभावात्।

एतद्विभंगज्ञानं पर्याप्तेष्वेवेति प्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

पज्जत्ताणं अत्थि, अपज्जत्ताणं णत्थि।।११८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतद्विभंगज्ञानं पर्याप्तानां अस्ति, अपर्याप्तानां नास्ति। यद्यपि देवनारकाणां एतज्ज्ञानं भवप्रत्ययं वर्तते तथापि पर्याप्तावस्थायामेव इति निश्चेतव्यम्।

इदानीं तृतीयगुणस्थाने ज्ञानव्यवस्थां व्यवस्थापयति-

सम्मामिच्छाइट्ठि-ट्ठाणे तिण्णि वि णाणाणि अण्णाणेण मिस्साणि। आभिणि-बोहियणाणं मदि-अण्णाणेण मिस्सयं सुदणाणं सुद-अण्णाणेण मिस्सयं ओहिणाणं विभंगणाणेण मिस्सयं। तिण्णि वि णाणाणि अण्णाणेण मिस्साणि वा इदि।।११९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टिगुणस्थाने त्रीण्यपि ज्ञानानि मतिश्रुतावधिनामानि अज्ञानेन मिश्राणि भवन्ति। आभिनिबोधिकज्ञानं मत्यज्ञानेन मिश्रितं, श्रुतज्ञानं श्रुताज्ञानेन मिश्रितं, अवधिज्ञानं विभंगज्ञानेन मिश्रितं। त्रीण्यपि ज्ञानानि अज्ञानेन मिश्राणि वा इति।

यथार्थश्रद्धानुविद्धावगमो ज्ञानम्, अयथार्थश्रद्धानुविद्धावगमोऽज्ञानम्। एवं च सति ज्ञानाज्ञानयोर्भिन्न-जीवाधिकरणयोर्न मिश्रणं घटते इति चेत् ?
सत्यमेतत्, इष्टत्वात्, किन्त्वत्र सम्यग्मिथ्यादृष्टौ एवं मा ग्रही:, यत: सम्यग्मिथ्यात्वकर्मप्रकृति: न मिथ्यात्वरूपा न सम्यक्त्वरूपा किन्तु सा जात्यन्तरप्रकृतिरेव, ततो जात्यन्तरत्वात् एषा प्रकृति: जात्यन्तरीभूतपरिणामस्योत्पादिका। ततस्तदुदयजनितपरिणामसमन्वितबोधो न ज्ञानं यथार्थश्रद्धयाननुविद्धत्वात्। नाप्यज्ञानमयथार्थश्रद्धयाऽसंगतत्वात्। ततस्तज्ज्ञानं सम्यग्मिथ्यात्वपरिणामवज्जात्यन्तरापन्नमित्येकमपि मिश्रमित्युच्यते। तदेव मिश्रज्ञानमिति सिद्धान्तविदो व्याचक्षते।
एवं प्रथमस्थले सामान्येनाष्टविधज्ञानोपयोग-त्रिविधाज्ञानेषु गुणस्थाननिरूपणत्वेन सूत्रपंचकं गतं।

सांप्रतं ज्ञानेषु गुणस्थानव्यवस्थां व्यवस्थापयता सूत्रावतार: क्रियते आचार्यदेवेन-

आभिणिबोहियणाणं सुदणाणं ओहिणाणमसंजदसम्माइट्ठि-प्पहुडि जाव खीणकसाय-वीदराग-छदुमत्था त्ति।।१२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आभिनिबोधिकज्ञानं श्रुतज्ञानं अवधिज्ञानं असंयतसम्यग्दृष्टि-प्रभृति यावत् क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था: इति।

असंयतसम्यग्दृष्टितिर्यङ्मनुष्येषु नावधिज्ञानं संभवति, तस्योत्पत्ते: कारणस्य भवगुणप्रत्ययाभावात् ?
नैतत्, अवधिज्ञाननिबन्धनसम्यक्त्वगुणस्य तत्र सत्त्वात्। तत्रापि विशिष्टसम्यक्त्वमेवास्य ज्ञानस्योत्पत्ते: कारणं, अत: कतिपय-तिर्यङ्मनुष्याणामेवावधिज्ञानं न च सर्वेषां। अत्रापि देशावधिज्ञानं असंयतसम्यग्दृष्टेरारभ्य क्षीणकषायपर्यंतमुनीनां, परमावधि: सर्वावधिस्तु संयतानामेव। तत्रापि न सर्वसंयमिनां किन्तु असंख्यातलोकमात्रसंयमपरिणामेषु केचिद् विशिष्टा: परिणामा एव तज्ज्ञानहेतव: इति ज्ञातव्यं भवद्भि:।

जैसा कि पूर्वाचार्य के द्वारा भी कहा गया है-

श्लोकार्थ-श्रुतरूपी चक्षु के द्वारा आत्मसंवेदन के अभिमुख हुए आत्मतत्त्व के लक्षण को देख कर हे देव! मैं तुम्हें केवलज्ञानरूपी चक्षु से देखना चाहता हूँ।

इसका हिन्दी पद्यानुवाद निम्न प्रकार है-

स्वात्मरूप के अभिमुख संवेदन को श्रुतदृग से लखकर।

भगवन्! तुमको केवलज्ञान चक्षु से देखूँ झट मनहर।।

तात्पर्य यह है कि श्रुतज्ञान से ही केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है इसलिए हम सभी को नित्य ही श्रुतदेवी की उपासना करना चाहिए। श्रुतज्ञान का माहात्म्य अन्य आचार्यों ने भी कहा है- उसी को कहते हैं-

गाथार्थ-ज्ञान की अपेक्षा श्रुतज्ञान तथा केवलज्ञान दोनों ही एक सदृश हैं। परन्तु दोनों में अंतर यही है कि श्रुतज्ञान परोक्ष है और केवलज्ञान प्रत्यक्ष है।।३६९।।

श्रुतज्ञान और केवलज्ञान ये दोनों ज्ञान समस्त वस्तुओं के द्रव्य-गुण-पर्यायों को जानने की अपेक्षा समान हैं किन्तु इतना विशेष है कि परम उत्कर्ष पर्यन्त को प्राप्त भी श्रुतज्ञान समस्त पदार्थों में परोक्ष होता है, अस्पष्ट जानता है, अमूर्त अर्थ पर्यायों में तथा अन्य सूक्ष्म अंशों में स्पष्ट रूप से उसकी प्रवृत्ति नहीं होती। मूर्त भी व्यंजन पर्यायों को अपने विषयों के स्थूल अंश को अवधिज्ञान की तरह साक्षात्कार करने में असमर्थ है किन्तु समस्त ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षय से उत्पन्न केवलज्ञान पूर्णरूप से स्पष्ट होता है। फिर भी श्रुतज्ञान के द्वारा भी परोक्षरूप से ही तीनों लोकों का स्वरूप जान लेता है। अतएव निम्न कथन भी दृष्टव्य है-

श्लोकार्थ-विमलज्ञानस्वरूप उस सरस्वती माता के लिए नमस्कार है जिनकी कृपाप्रसाद से समस्त लोकालोक की विचित्र यात्रा हो जाती है।

श्लोकार्थ-‘‘चाँदखेड़ी’’ नाम से प्रसिद्ध अतिशयक्षेत्र में विराजमान श्री आदिनाथ भगवान को एवं वहाँ के समस्त जिनबिम्बों को हम आत्मसुख की प्राप्ति के लिए नमस्कार करते हैं।।१।।

अब गति आदि मार्गणा में मति श्रुतअज्ञान की व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

एकेन्द्रिय से लेकर सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीव होते हैं।।११६।।

सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-कुमति और कुश्रुतज्ञानी जीव एकेन्द्रिय से आरंभ होकर सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान पर्यन्त होते हैं।

शंका-सासादन गुणस्थान में मिथ्यात्व के उदय का तो अभाव पाया जाता है तब वहाँ कुमति, कुश्रुत इन दोनों अज्ञानों का सत्त्व कैसे रहेगा ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि विपरीत अभिनिवेश को मिथ्यात्व कहते हैं, और वह मिथ्यात्व तथा अनंतानुबंधी इन दोनों के निमित्त से उत्पन्न होता है। सासादनगुणस्थान वाले जीवों के अनंतानुबंधी का उदय तो पाया ही जाता है, इसलिए वहाँ पर भी दोनों अज्ञान होना संभव है।

शंका-एकेन्द्रिय जीवों के जब श्रोत्र इंद्रिय के अभाव में शब्द का ज्ञान नहीं होता है तब उनके श्रुतज्ञान कैसे हो सकता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है क्योंकि यह कोई एकान्त नहीं है कि शब्द के निमित्त से होने वाले पदार्थ के ज्ञान को ही श्रुतज्ञान कहते हैं। अपितु बिना शब्द के भी रूपादिक लिंग से जो लिंगी का ज्ञान होता है उसे भी श्रुतज्ञान कहते हैं।

शंका-वह श्रुतज्ञान मनरहित जीवों के भी कैसे संभव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि मन के बिना वनस्पतिकायिक जीवों के हित में प्रवृत्ति और अहित से निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए मनसहित जीवों के ही श्रुतज्ञान मानने में उनसे अनेकांत दोष आता है।

तात्पर्य यह है कि इन मति-श्रुत अज्ञानों से सहित एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों में मिथ्यात्व, सासादन ये दो गुणस्थान होते हैं। अब विभंगज्ञान में गुणस्थानव्यवस्था का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

विभंगज्ञान संज्ञी मिथ्यादृष्टि जीवों के तथा सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के होता है।।११७।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-संज्ञीमिथ्यादृष्टि अथवा सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के कुअवधिज्ञान होता है।

शंका-वह विभंगज्ञान-कुअवधिज्ञान विकलेन्द्रिय जीवों के क्यों नहीं पाया जाता है ?

समाधान-उनके कुअवधिज्ञान नहीं होता है क्योंकि वहाँ पर विभंगज्ञान का कारणभूत क्षयोपशम नहीं पाया जाता है।

पर्याप्तक जीवों में इस विभंगज्ञान के प्रतिपादन हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

विभंगज्ञान पर्याप्तकों के ही होता है, अपर्याप्तकों के नहीं होता है।।११८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यह विभंगज्ञान पर्याप्तक जीवों के ही होता है, अपर्याप्तक जीवों के नहीं होता है। यद्यपि मिथ्यादृष्टि देव-नारकियों के यह विभंगज्ञान भवप्रत्यय होता है किन्तु उनके पर्याप्त अवस्था में ही होता है ऐसा निश्चय से जानना चाहिए।

अब तृतीय गुणस्थान में ज्ञान की व्यवस्था बताने हेतु सूत्र कहते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में आदि के तीनों ही ज्ञान अज्ञान से मिश्रित होेते हैं। आभिनिबोधिकज्ञान मत्यज्ञान से मिश्रित होता है। श्रुतज्ञान श्रुतअज्ञान से मिश्रित होता है। अवधिज्ञान विभंगज्ञान से मिश्रित होता है। अथवा तीनों ही ज्ञान अज्ञान से मिश्रित होते हैं।।११९।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टि नामक तृतीय गुणस्थान में मति, श्रुत, अवधि ये तीनों ही ज्ञान अज्ञान से मिश्रित रहते हैं। आभिनिबोधिकज्ञान कुमतिज्ञान से मिश्रित होता है, श्रुतज्ञान कुश्रुतज्ञान से मिश्रित रहता है और अवधिज्ञान विभंगज्ञान से मिश्रित माना गया है। अथवा यूँ समझना चाहिए कि उपर्युक्त तीनों ही ज्ञान अज्ञान से मिश्रित होते हैं।

शंका-यथार्थ श्रद्धा से अनुविद्ध-सहित अवगम को ज्ञान कहते हैं और अयथार्थ श्रद्धा से अनुविद्ध-सहित अवगम को अज्ञान कहते हैं। पुन: ऐसी अवस्था में भिन्न-भिन्न जीवों के आधार से रहने वाले ज्ञान और अज्ञान का मिश्रण नहीं बन सकता है ?

समाधान-आपका यह कथन सत्य है क्योंकि हमें यही इष्ट है, किन्तु यहाँ सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में यह अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व कर्म की प्रकृति न तो मिथ्यात्वरूप है और न ही वह सम्यक्त्वरूप है किन्तु वह तो एक जात्यन्तर-भिन्न जाति वाली प्रकृति ही हो जाती है, इसलिए जात्यन्तररूप प्रकृति होने के कारण जात्यन्तर-भिन्न जाति वाले मिश्र परिणामों को उत्पन्न करती है। अत: उसके उदय से उत्पन्न हुए परिणामों में युक्त ज्ञान ‘‘ज्ञान’’ इस संज्ञा को प्राप्त हो नहीं सकता है क्योंकि उस ज्ञान में यथार्थ श्रद्धा का अन्वय नहीं पाया जाता है और उस ज्ञान को अज्ञान भी नहीं कह सकते हैं क्योंकि वह अयथार्थ श्रद्धा के साथ सम्पर्वâ नहीं रखता है। इसलिए वह ज्ञान सम्यग्मिथ्यात्व परिणाम की तरह जात्यन्तररूप अवस्था को प्राप्त है अत: एक होते हुए भी मिश्र कहा जाता है। सिद्धांत के जानने वाले विद्वान् पुरुष उसे ही मिश्रज्ञान कहते हैं।

इस प्रकार प्रथमस्थल में सामान्य से आठ प्रकार के ज्ञानोपयोग एवं तीन अज्ञानों में गुणस्थान व्यवस्था का निरूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए। अब ज्ञानों (सम्यग्ज्ञानों) में गुणस्थानव्यवस्था को व्यवस्थापित करते हुए आचार्यदेव सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

आभिनिबोधिकज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान ये तीनों असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ गुणस्थान तक होते हैं।।१२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयत गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान तक के जीव मति, श्रुत, अवधि इन तीन ज्ञानों से सहित हो सकते हैं।

शंका-असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान वाले तिर्यंच और मनुष्यों में अवधिज्ञान नहीं हो सकता है क्योंकि उसकी उत्पत्ति के कारण वहाँ भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय नहीं पाये जाते हैं ?

समाधान-ऐसा नहीं है क्योंकि वहाँ तिर्यंच और मनुष्यों में अवधिज्ञान की उत्पत्ति के कारणरूप सम्यग्दर्शन का सद्भाव पाया जाता है। वहाँ पर भी विशिष्ट सम्यक्त्व ही अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण बनता है, अत: कतिपय तिर्यंच और मनुष्यों के ही अवधिज्ञान होता है, सभी के नहीं हो सकता है।

उन अवधिज्ञानों में भी देशावधिज्ञान असंयतसम्यग्दृष्टि श्रावक से लेकर क्षीणकषाय नामक गुणस्थान तक के मुनियों के होता है एवं परमावधि और सर्वावधि संयतों के ही होता है। संयमियों में भी सभी संयमियों के नहीं होता है किन्तु असंख्यातलोकप्रमाण संयमरूप परिणामों में कुछ विशिष्ट परिणाम ही अवधिज्ञान की उत्पत्ति के कारण बनते हैं ऐसा जानना चाहिए।

संप्रति मन:पर्ययज्ञानस्य स्वामिप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-

मणपज्जवणाणी पमत्तसंजद-प्पहुडि जाव खीणकसाय-वीदराग-छदुमत्था त्ति।।१२१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका
-मन:पर्ययज्ञानी प्रमत्तसंयत-प्रभृति यावत् क्षीणकषायवीतरागछद्मस्था: इति। अस्मिन् सूत्रे पर्यायपर्यायिणोरभेदापेक्षया मन:पर्ययज्ञानस्यैव मन:पर्ययज्ञानिव्यपदेश:। देशविरताद्यधस्तन-गुणस्थानवर्तिनां एतज्ज्ञानं न भवति, संयमासंयमासंयमत: तस्योत्पत्तिविरोधात्। तत्रापि संयम एक: एव तदुत्पत्ते: कारणं नास्ति, अपि तु अन्येऽपि तद्धेतव: सन्ति। ते च विशिष्टद्रव्यक्षेत्रकालादय:, अतएव न सर्वसंयतानां एतच्चतुर्थज्ञानं प्रत्युत् केषांचिदेव महामुनीनां संभवति इति।
उक्तं च-
मणपज्जवं च णाणं, सत्तसु विरदेसु सत्तइड्ढीणं।
एगादिजुदेसु हवे, वड्ढंतविसिट्ठचरणेसु।।
इदानीं केवलज्ञानाधिपतिगुणस्थानप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
केवलणाणी तिसु ट्ठाणेसु सजोगिकेवली अजोगिकेवली सिद्धा चेदि।।१२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-केवलज्ञानी त्रिषु स्थानेषु सन्ति सयोगिकेवली अयोगिकेवली सिद्धाश्चेति। प्रक्षीणसमस्तावरणे भगवत्यर्हति ज्ञानावरणक्षयोपशमाभावात्, तत एव केवलिनि मनसोऽस्तित्वमपि नास्ति।
कथं पुन: सयोगी स केवली भगवान् ?
नैतत्, प्रथमचतुर्थभाषोत्पत्तिनिमित्तात्मप्रदेशपरिस्पंदस्य सत्त्वापेक्षया तस्य केवलिन: सयोगत्वाविरोधात्।
तत्र भगवति मनसोऽभावे तत्कार्यस्य वचसोऽपि न सत्त्वं संभवति ? नैतत्, तस्य वचनस्य ज्ञानकार्यत्वात्।
सयोगकेवलिनो मनोयोगाभावे ‘‘सच्चमणजोगो असच्चमोसमणजोगो.....जाव सजोगिकेवलि त्ति’’ इति सूत्रेण सह विरोध: स्यात् ?
नैतद्वक्तव्यं, मन:कार्यप्रथमचतुर्थवचसो: सत्त्वापेक्षयोपचारेण मन: सत्त्वोपदेशात्। जीवप्रदेशपरिस्पंदहेतुनोकर्मजनितशक्त्यस्तित्वापेक्षया वा सयोगिकेवलिनि मनस: सत्त्वान्न विरोध:।
तात्पर्यमेतत्-केवलिनां भगवतां नोइन्द्रियावरणक्षयोपशमजनितमनस: सत्त्वं नास्ति, केवलं द्रव्यमनोऽस्तित्वमेव तत्र वर्तते।
उक्तं च-
हिदि होदि हु दव्वमणं, वियसिय अट्ठच्छदारविंदं वा।
अंगोवंगुदयादो मणवग्गणखंददो णियमा।।४४३।।
अंगोपांगनामकर्मोदयकारणात् मनोवर्गणास्कंधैर्विकसिताष्टच्छदारविंदसदृशं द्रव्यमनो हृदये उत्पद्यते स्फुटम्। एतद्द्रव्यमन: केवलिनामपि विद्यते। तन्निमित्तेनोपचारेण सत्यानुभयमनोयोगौ केवलिनां उच्येते इति ज्ञातव्यं।
एवं ज्ञानमार्गणायां सामान्येन त्रिविधमज्ञानं पंचविधज्ञानं निरूप्य अज्ञानेषु गुणस्थाननिरूपणपरत्वेन पंचसूत्राणि गतानि, ततो द्वितीयस्थले ज्ञानेषु गुणस्थानव्यवस्थाव्यवस्थापनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति षट्खण्डागमप्रथमखण्डे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकार: समाप्त:।

अब मन:पर्ययज्ञान के स्वामी के प्रतिपादन हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मन:पर्ययज्ञानी जीव प्रमत्तसंयत से लेकर क्षीणकषायवीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक होते हैं।।१२१।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक मुनियों के मन:पर्ययज्ञान होता है। इस सूत्र में पर्याय और पर्यायी में अभेद की अपेक्षा से मन:पर्ययज्ञान का ही मन:पर्ययज्ञानीरूप से कथन कर दिया जाता है।

देशविरत आदि नीचे के गुणस्थानवर्ती जीवों में मन:पर्ययज्ञान नहीं होता है क्योंकि संयमासंयम और असंयम के साथ मन:पर्ययज्ञान की उत्पत्ति मानने में विरोध आता है। उनमें भी केवल एक संयम ही मन:पर्ययज्ञान की उत्पत्ति में कारण नहीं है, अपितु अन्य भी मन:पर्ययज्ञान की उत्पत्ति में कारण हैं। वे विशेष द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि कारण हैं अतएव समस्त संयतों के यह चतुर्थज्ञान नहीं होता है बल्कि किन्हीं-किन्हीं महामुनियों के ही यह उत्पन्न होता है ऐसा जानना चाहिए। कहा भी है-

गाथार्थ-

प्रमत्तादि क्षीणकषाय गुणस्थान पर्यन्त सात गुणस्थानों में से किसी एक गुणस्थान वाले के, उसमें भी सात ऋद्धियों में से कम से कम किसी भी एक ऋद्धि को धारण करने वाले के, ऋद्धिप्राप्त में भी वर्धमान तथा विशिष्ट चारित्र को धारण करने वाले के ही मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न होता है।

विशेषार्थ-

सामान्य की अपेक्षा मन:पर्ययज्ञान एक ही प्रकार का है और विशेष भेदों की अपेक्षा उसके दो भेद हैं-ऋजुमति और विपुलमति।

इनमें से ऋजुमति के भी तीन भेद हैं-

१. ऋजुमनोगतार्थ विषयक,

२. ऋजुवचनगतार्थ विषयक,

३. ऋजुकायगतार्थ विषयक।

परकीय मनोगत होने पर भी जो सरलतया मन वचन काय के द्वारा किया गया हो ऐसे पदार्थ को विषय करने वाले ज्ञान को ऋजुमतिमन:पर्ययज्ञान कहते हैं अतएव सरल मन वचन काय के द्वारा किये हुए पदार्थ को विषय करने की अपेक्षा ऋजुमति के उपर्युक्त तीन भेद होते हैं।

इसी प्रकार विपुलमति मन:पर्ययज्ञान के छह भेद माने हैं-ऋजु मन, वचन, काय के द्वारा किये गये परकीय मनोगत पदार्थों को विषय करने की अपेक्षा तीन भेद और कुटिल मन, वचन, काय के द्वारा किये हुए परकीय मनोगत पदार्थों को विषय करने की अपेक्षा तीन भेद ऐसे छह भेद हैं। ऋजुमति तथा विपुलमति मन:पर्ययज्ञान के विषय शब्दगत तथा अर्थगत दोनों ही प्रकार के होते हैं।

तात्पर्य यह है कि कोई आकर पूछे तो उसके मन की बात एवं तत्संबंधी विषय को मन:पर्ययज्ञानी जान सकता है, कदाचित् कोई न भी पूछे और मौन से स्थित रहे तो भी उसके मन में स्थित विषय को मन:पर्ययज्ञानी महामुनि जान लेते हैं यही इस ज्ञान की महिमा जाननी चाहिए।

इसको ऋजुमति-विपुलमति के माध्यम से इसलिए समझाया गया है कि वर्तमान में जिसका चिन्तवन किया जा रहा है ऐसे त्रिकालविषयक रूपी पदार्थ को ऋजुमतिमन:पर्ययज्ञान जानता है और विपुलमतिज्ञान भूत-भविष्यत् को भी जानता है।

शंका-मन:पर्ययज्ञान भी यदि वर्तमान, भूत, भविष्यत् तीनों कालों के पदार्थों को जानता है तो केवलज्ञान और मन:पर्ययज्ञान में क्या अंतर रहा ? अर्थात् मन:पर्यय और केवल दोनों एक सदृश ही हो जावेंगे ?

समाधान-ऐसा नहीं है क्योंकि मन:पर्ययज्ञान केवल रूपी पदार्थों को ही विषय करता है और केवलज्ञान रूपी-अरूपी समस्त पदार्थों को एक समय में जान लेता है।

शंका-फिर तो मन:पर्ययज्ञान अवधिज्ञान के समान हुआ क्योंकि अवधिज्ञान भी रूपी पदार्थ को विषय करता है ?

समाधान-ऐेसा भी नहीं कहना क्योंकि दोनों ज्ञानों में समानता नहीं पाई जाती है। अवधिज्ञान चारों गतियों में होता है जबकि मन:पर्ययज्ञान मात्र एक मनुष्यगति में ही किन्हीं-किन्हीं महामुनियों के होता है।

रूपी पदार्थों को विषय करने में भले ही दोनों में समानता पाई जाती है तथापि तत्त्वार्थसूत्र के अनुसार ये दोनों ही सूत्र ध्यान देने योग्य हैं-

‘‘रूपिष्ववधे:’’ और ‘‘तदनन्तभागे मन:पर्ययस्य’’ अर्थात् अवधिज्ञान रूपीपुद्गलद्रव्य की कुछ पर्यायों को ही जानता है और मन:पर्ययज्ञान अवधिज्ञान के विषयभूत रूपीद्रव्य के अनंतवें भाग को भी जानने की शक्ति रखता है तथा यह भी ज्ञातव्य है कि विपुलमति मन:पर्ययज्ञानी नियम से केवलज्ञान को प्राप्त करता है क्योंकि वह अप्रतिपाती माना गया है।

हाँ, इतना अवश्य है कि अवधि और मन:पर्ययज्ञान की उत्पत्ति में समानता है अर्थात् जिस प्रकार अवधिज्ञान समस्त अंग से अथवा शरीर में होने वाले शंखादि शुभ चिन्हों से उत्पन्न होता है उसी तरह मन:पर्ययज्ञान जहाँ पर द्रव्यमन होता है उन्हीं प्रदेशों से उत्पन्न होता है। क्योंकि द्रव्यमन के स्थान पर जो आत्मा के प्रदेश होते हैं उनसे ही मन:पर्ययज्ञान होता है। भवप्रत्यय अवधिज्ञान सर्वांग से होता है एवं गुणप्रत्यय अवधिज्ञान मन:पर्यय के समान शंखादिक चिन्हों के स्थान से ही होता है लेकिन इन चिन्हों का स्थान द्रव्यमन की तरह निश्चित नहीं है। यह उत्पत्तिस्थान की अपेक्षा भी अवधि और मन:पर्ययज्ञान में अंतर पाया जाता है।

इस द्रव्यमन को नोइन्द्रिय संज्ञा भी है क्योंकि दूसरी इंद्रियों की तरह यह व्यक्त नहीं है। इस द्रव्यमन के निमित्त से भावमन तथा मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न होता है।

उस मन:पर्ययज्ञान के उत्कृष्ट क्षेत्र का प्रमाण जो नरलोक प्रमाण कहा है सो उससे मनुष्यलोक का विष्कम्भ ग्रहण करना चाहिए न कि वृत्त, क्योंकि मानुषोत्तर पर्वत के बाहर चारों कोणों में स्थित तिर्यंच अथवा देवों के द्वारा चिन्तित पदार्थ को भी विपुलमति जानता है, कारण यह है कि मन:पर्ययज्ञान का उत्कृष्ट क्षेत्र ऊँचाई में कम होते हुए भी समचतुरस्र घनप्रतररूप पैंतालिस लाख योजन प्रमाण है।

वर्तमान के पंचमकाल में जितने भी दिगम्बर मुनि हैं उनमें किसी के भी अवधि या मन:पर्ययज्ञान नहीं है क्योंकि हीनसंहननधारी इन मुनिराजों के इनका अभाव है अत: हम सब उस मन:पर्ययज्ञान की आराधना आदि करके उसकी प्राप्ति की भावना ही कर सकते हैं प्राप्ति नहीं। हाँ तिलोयपण्णत्ति में (अ. ४ में) पंचमकाल में प्रत्येक कल्की के समय मुनि को अवधिज्ञान माना है।

अब केवलज्ञान के स्वामी के गुणस्थानों को बतलाने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

केवलज्ञानी जीव सयोगिकेवली, अयोगिकेवली और सिद्ध इन तीन स्थानों में होते हैं।।१२२।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-तेरहवें, चौदहवें गुणस्थानवर्ती जीव तथा गुणस्थानातीत सिद्ध परमेष्ठियों के केवलज्ञान होता है क्योंकि अर्हन्त भगवान् के समस्त आवरणकर्मों के क्षय होने पर ज्ञानावरणकर्म के क्षयोपशम का अभाव रहता है, इसीलिए केवली के मन का अस्तित्व भी नहीं रहता है।

शंका-पुन: वे केवली भगवान् सयोगी कैसे कहे जाते हैं ?

समाधान-ऐसा नहीं है क्योंकि प्रथम एवं चतुर्थ वचन अर्थात् सत्य एवं अनुभय वचनयोग के निमित्त से आत्मा के प्रदेशों में परिस्पंदन होता है अत: उनके सत्त्व की अपेक्षा उन केवली भगवान् में सयोगीपने को मानने में कोई विरोध नहीं पाया जाता है।

शंका-उन अर्हन्त भगवान् में मन का अभाव मानने पर उसके कार्यरूप वचनों का सत्त्व भी वहाँ संभव नहीं हो सकता है ?

समाधान-ऐसा नहीं है क्योंकि वचन ज्ञान के कार्य हैं, मन के नहीं।

शंका-सयोगकेवली के मनोयोग का अभाव मानने पर ‘‘सच्चमणजोगो असच्चमोसमणजोगो....... जाव सजोगिकेवलित्ति’’ इस पूर्वोक्त सूत्र के साथ विरोध आ जाएगा ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि मन के कार्यरूप प्रथम और चतुर्थ भाषा के सद्भाव की अपेक्षा उपचार से मन का सद्भाव मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है। अथवा जीवप्रदेशों के परिस्पन्द के कारणभूत मनोवर्गणारूप नोकर्म से उत्पन्न हुई शक्ति के अस्तित्व की अपेक्षा सयोगकेवली में मन का सद्भाव पाया जाता है ऐसा मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है।

तात्पर्य यह है कि केवली भगवन्तों के नोइन्द्रियावरणकर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न हुए मन का अस्तित्व नहीं पाया जाता है। वहाँ तो केवल द्रव्यमन का ही अस्तित्व पाया जाता है। कहा भी है—

गाथार्थ-आंगोपांगनामकर्म के उदय से मनोवर्गणा के स्कन्धों के द्वारा हृदयस्थान में नियम से विकसित आठ पंखुड़ी के कमल के आकार में द्रव्यमन उत्पन्न होता है।

आंगोपांगनामकर्म के उदय के कारण मनोवर्गणा के स्कन्धों के द्वारा विकसित अष्टदल कमल के सदृश द्रव्यमन हृदय में स्पष्टरूप से उत्पन्न होता है। यह द्रव्यमन केवलियों के भी होता हैै। उस द्रव्यमन के निमित्त से वहाँ उपचार से सत्यमनोयोग और अनुभयमनोयोग केवलियों के माने जाते हैं ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार ज्ञानमार्गणा में सामान्य से तीन प्रकार के अज्ञान और पाँच प्रकार के ज्ञानों का निरूपण करके अज्ञानों में गुणस्थान निरूपण की मुख्यता से पाँच सूत्र हुए पुन: द्वितीयस्थल में ज्ञानों में गुणस्थानव्यवस्था का कथन करने वाले तीन सूत्र हुए हैं।

इस प्रकार षट्खंडागम ग्रंथ के प्रथम खंड में गणिनी ज्ञानमतीकृत ‘‘सिद्धांतचिंतामणि’’ नामक टीका में ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार समाप्त हुआ।