04.कायमार्गणा अधिकार

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कायमार्गणा अधिकार

अथ कायमार्गणाधिकार:

अधुना कायमार्गणायां पृथिवीकायिकजीवानां स्वामित्वनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते—
कायाणुवादेण पुढविकाइओ णाम कधं भवदि ?।।१८।।
पुढविकाइयणामाए उदएण।।१९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-प्रथमं सूत्रं तावत् पृच्छारूपमस्ति। किं पृथिवीकायाद् निर्गतः भूतपूर्वनयेन पृथिवीकायिकः उच्यते ? किं वा पृथिवीकायिकानामभिमुखो जीवो नैगमनयावलम्बनेन पृथिवीकायिकः उच्यते ? किं वा पृथिवीकायिकनामकर्मोदयेनेति मनसि आशंक्य ‘कधं भवदि’’ इति सूत्रे उक्तं भवति।
तस्य समाधानं क्रियते आचार्यदेवेन—पृथिवीकायिकनामकर्मोदयेन जीवः पृथिवीकायिकः उच्यते इति अत्र ज्ञातव्यं।
कश्चिदाह-नामकर्मणां प्रकृतिषु पृथिवी-जल-अग्नि-वायु-वनस्पति-संज्ञिताः प्रकृतयो न निर्दिष्टाः तेन ‘पृथिवीकायिकनाम्नः उदयेन पृथिवीकायिकः’ इति नेदं लक्षणं घटते ?
आचार्यः प्राह-नैतद् वक्तव्यं, एकेन्द्रियजातिनामकर्मणि एतासामन्तर्भावात्। न च कारणेन विना कार्याणामुत्पत्तिरस्ति। दृश्यन्ते च पृथिव्यप्-तेजोवायु-वनस्पति-त्रसकायिकादिषु अनेकानि कार्याणि। ततः यावन्ति कार्याणि तावन्ति अपि कर्माणि संति इति निश्चयः कर्तव्यः।
यद्येवं तर्हि भ्रमर-मधुकर-शलभ-पतंग-इन्द्रगोप-शंख-मत्कुण निंब-आम्र-जंबू-जंबीर-कदम्बादिसंज्ञितैः अपि नामकर्मभिः भवितव्यम् ?
नैष दोषः, तथैव इष्यमाणत्वात्। एकैकप्रकृतीनामसंख्यभेदत्वात्।
उक्तं च गोम्मटसारे कर्मकाण्डनाम्नि ग्रन्थे—
‘‘तं पुण अट्ठविहं वा अडदालसयं असंखलोगं वा।’’
पृथिवीकायिकानां एकविंशतिः चतुर्विंशति पंचविंशतिः षड्विंशतिः सप्तविंशतिः इति पंचोदयस्थानानि संति। २१।२४।२५।२६।२७। एतेषां स्थानानां प्रकृतीः उच्चार्य गृहीतव्याः। एवमेतासु बहुषु प्रकृतिषु उदयमागम्यमानासु कथं पृथिवीकायिकनाम्नः उदयेन पृथिवीकायिकः इति युज्यते ?
न, इतरप्रकृतीनामुदयस्य साधारणत्वोपलंभात्। न च पृथिवीकायिकनामकर्मोदयस्तथा साधारणः अन्यत्रैतस्यानुपलंभात्।
संप्रति अप्कायिकादीनां स्वामित्वकथनाय सूत्राष्टकमवतार्यते—
आउकाइओ णाम कधं भवदि ?।।२०।।
आउकाइयणामाए उदएण।।२१।।
तेउकाइओ णाम कधं भवदि ?।।२२।।
तेउकाइयणामाए उदएण।।२३।।
वाउकाइओ णाम कधं भवदि ?।।२४।।
वाउकाइयणामाए उदएण।।२५।।
वणप्फइकाइओ णाम कधं भवदि ?।।२६।।
वणप्फइकाइयणामाए उदएण।।२७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—एतेषां सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। केवलं अप्कााqयकादीनां एकविंशतिः चतुर्विंशतिः पंचविंशतिः षड्विंशतिः इति चत्वारि उदयस्थानानि। सप्तविंशतिप्रकृतेः स्थानं अत्र नास्ति, आतपोद्योतयोरु-दयाभावात्। किंतु अप्कायिक-वनस्पतिकायिकयोः सप्तविंशतिप्रकृतिस्थानेन सह पंच उदयस्थानानि, आतपेन विना तत्र उद्योतस्य चित् चित् उदयदर्शनात्।
त्रसकायिकानां स्वामित्वप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते—
तसकाइओ णाम कधं भवदि ?।।२८।।
तसकाइयणामाए उदएण।।२९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—सूत्रयोरर्थः सुगमो वर्तते। विशेषेण तु त्रसकायिकजीवानां विंशतिः एकविंशतिः पंचविंशतिः षड्विंशतिः सप्तविंशतिः अष्टाविंशतिः एकोनत्रिंशत् त्रिंशत् एकत्रिंशत् नवाष्टौ इति एकादश उदयस्थानानि भवन्ति। एतानि ज्ञात्वा वक्तव्यानि।
संप्रति कायविरहितानां स्वामित्वनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते—
अकाइओ णाम कधं भवदि ?।।३०।।
खइयाए लद्धीए।।३१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—षट्कायिकनामकर्मप्रकृतीनां विनाशोऽस्ति, मिथ्यात्वाद्यास्रवाणां विनाशानुपलं-भात्। न चानादित्वेन नित्यं मिथ्यात्वं विनश्यति, नित्यस्य विनाशविरोधात्। मिथ्यात्वाद्यास्रवः सादिः नास्ति, संवरेण निर्मूलतः अपसारितास्रवस्य पुनरुत्पत्तिविरोधात्। इदं सर्वं मनसि अवधार्य ‘‘अकायिको नाम कथं भवति’’ इति प्रोक्तं प्रश्नरूपेण।
तस्य समाधानं अग्रिमसूत्रे कथितं—
न चानादित्वात् नित्यः आस्रवः कूटस्थानादिं मुक्त्वा प्रवाहानादौ नित्यत्वानुपलंभात्। उपलंभे वा न बीजादीनां विनाशः, प्रवाहस्वरूपेण तेषामनादित्वदर्शनात्। ततो नानादित्वं साधनं, अनैकांतिकदोषत्वात्। न चास्रवः कूटस्थानादिस्वभावः मिथ्यात्व-असंयम-कषायास्रवाणां प्रवाहानादिस्वरूपेण समागतानां वर्तमानकालेऽपि कस्मिंश्चिद् जीवेऽपि विनाशदर्शनात्।
तात्पर्यमेतत्—इमे षट्कायिकाः जीवाः पंचस्थावरकायान् द्वीन्द्रियादिजीवान् वा पर्यायान् अतीत्य मनुष्यो भूत्वा रत्नत्रयमाराध्य स्वयं स्वस्मिन् तिष्ठन्ति तर्हि ते अकायिकाः सिद्धाः शुद्धाः भगवन्तो भवन्ति।
उक्तं च स्वरचितचन्द्रप्रभस्तुतौ—
शरीरी प्रत्येकं भवति भुवि वेधाः स्वकृतितः।
विधत्ते नानाभू-पवन-जल-वह्नि-द्रुमतनुम्।।
त्रसो भूत्वा भूत्वा कथमपि विधायात्र कुशलम्।
स्वयं स्वस्मिन्नास्ते भवति कृतकृत्यः शिवमयः१।।
इति ज्ञात्वा अशरीरी भवितुं प्रयत्नो विधातव्य:।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथममहाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ कायमार्गणा अधिकार

अब कायमार्गणा में पृथिवीकायिक जीवों का स्वामित्व निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणानुसार जीव पृथिवीकायिक किस कारण से होते हैं ?।।१८।।

पृथिवीकायिक नामकर्म के उदय से जीव पृथिवीकायिक होते हैं।।१९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दोनों सूत्रों में से प्रथम सूत्र पृच्छारूप-प्रश्नवाचक है। क्या पृथिवीकाय से निकला हुआ जीव भूतपूर्व नय से पृथिवीकायिक कहलाता है ? या पृथिवीकायिकों के अभिमुख हुआ जीव नैगम नय के अवलम्बन से पृथिवीकायिक कहा जाता है ? या पृथिवीकायिक नामकर्म के उदय से पृथिवीकायिक कहा जाता है ? ऐसी मन में शंका करके पूछा गया है कि यह जीव पृथिवीकायिक किस कारण से होता है ?

उसका समाधान आचार्यदेव के द्वारा किया गया है कि-पृथिवीकायिक नामकर्म के उदय से जीव पृथिवीकायिक कहे जाते हैं, ऐसा यहाँ जानना चाहिए।

यहाँ कोई शंका करता है कि-नामकर्म की प्रकृतियों में पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति नाम की प्रकृतियाँ निर्दिष्ट नहीं की गई हैं, इसलिए ‘पृथिवीकायिक नाम कर्म की प्रकृति के उदय से जीव पृथिवीकायिक होते हैं’ यह बात घटित नहीं होती ?

आचार्य समाधान करते हैं-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि नामकर्म संबंधी एकेन्द्रियजाति प्रकृति में उक्त सब प्रकृतियों का अन्तर्भाव हो जाता है और कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है तथा पृथिवी, अप, तेज, वायु, वनस्पति और त्रसकायिक जीव आदि रूप से अनेक कार्य-भेद देखे जाते हैं। इसलिए जितने कार्य हैं उतने ही उनके कर्म भी हैं, ऐसा निश्चय करना चाहिए।

शंका-यदि जितने कार्य हों उतने ही कारण रूप कर्म होते हैं तो भ्रमर, मधुमक्खी, शलभ, पतंग, इन्द्रगोप, शंख, मत्कुण, निंब, आम्र, जम्बु, जम्बीर और कदम्ब आदिक नामों वाले भी नामकर्म मानना चाहिए।

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यही बात स्वीकार की गई है। क्योंकि एक-एक प्रकृतियों के असंख्य भेद होते हैं।

गोम्मटसार, कर्मकाण्ड नामकग्रंथ में कहा है-

उन कर्मों के आठ, एक सौ अड़तालिस अथवा असंख्यलोकप्रमाण भेद भी होते हैं।

शंका-पृथिवीकायिक जीवों के इक्कीस, चौबीस, पच्चीस, छब्बीस और सत्ताईस प्रकृति वाले पाँच उदयस्थान होते हैं। २१, २४, २५, २६, २७। इन पाँच उदयस्थानों की प्रकृतियों का उच्चारण करके ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार इन बहुत प्रकृतियों के (एक साथ) उदय आने पर पृथिवीकायिक नाम कर्म की प्रकृति के उदय से जीव पृथिवीकायिक होता है ? यह कैसे बन सकता है?

समाधान-नहीं, क्योंकि दूसरी प्रकृतियों का उदय साधारण पाया जाता है। किन्तु पृथिवीकायिक नामकर्म का उदय उस प्रकार साधारण नहीं है, क्योंकि अन्य पर्यायों में वह नहीं पाया जाता है।

अब जलकायिक आदि जीवों का स्वामित्व बतलाने हेतु आठ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव जलकायिक किस कारण से होता है ?।।२०।।

जलकायिक नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव जलकायिक होता है।।२१।।

जीव अग्निकायिक किस कारण से होता है ?।।२२।।

अग्निकायिक नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव अग्निकायिक होता है।।२३।।

जीव वायुकायिक किस कारण से होता है ?।।२४।।

वायुकायिक नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव वायुकायिक होता है।।२५।।

जीव वनस्पतिकायिक किस कारण से होता है ?।।२६।।

वनस्पतिकायिक नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव वनस्पतिकायिक होता है।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सूत्रों का अर्थ सुगम है। विशेषता केवल इतनी है कि जलकायिक आदि जीवों के इक्कीस, चौबीस, पच्चीस और छब्बीस प्रकृति वाले चार उदयस्थान होते हैं। उनके सत्ताईस प्रकृति वाला उदयस्थान नहीं होता है, क्योंकि उनके आतप और उद्योत इन दो प्रकृतियों के उदय का अभाव होता है। किन्तु जलकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों के सत्ताईस प्रकृति वाले उदयस्थान को मिलाकर पाँच उदयस्थान होते हैं, क्योंकि उनके आतप के बिना उद्योत का कहीं-कहीं उदय देखा जाता है।

अब त्रसकायिक जीवों का स्वामित्व बतलाने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव त्रसकायिक किस कारण से होता है ?।।२८।।

त्रसकायिक नामकर्म की प्रकृति के उदय से जीव त्रसकायिक होता है।।२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। विशेषता यह है कि त्रसकायिक जीवों के बीस, इक्कीस, पच्चीस, छब्बीस, सत्ताईस, अट्ठाईस, उनतीस, तीस, इकतीस, नौ और आठ प्रकृति वाले ग्यारह उदयस्थान होते हैं। इनको जानकर कथन करना चाहिए।

अब काय रहित जीवों का स्वामित्व निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव अकायिक किस कारण से होता है ?।।३०।।

क्षायिक लब्धि से जीव अकायिक होता है।।३१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-षट्कायिक नामकर्म की प्रकृतियों का विनाश होता है, क्योंकि मिथ्यात्वादिक आस्रवों का विनाश नहीं पाया जाता है और अनादिपने की अपेक्षा नित्य मिथ्यात्व विनष्ट नहीं होता है, क्योंकि नित्य का विनाश के साथ विरोध है। मिथ्यात्वादिक आस्रव सादि नहीं है, क्योंकि संवर के द्वारा निर्मूलत: आस्रव के दूर हो जाने पर उसकी पुन: उत्पत्ति होने में विरोध आता है। यह सब मन में धारण करके जीव अकायिक किस कारण से होता है। यह बात प्रश्नरूप से कही गई है।

उसका समाधान अगले सूत्र के माध्यम से किया है-

अनादि होने से आश्रव नित्य नहीं होता है, क्योंकि कूटस्थ अनादि को छोड़कर प्रवाह अनादि में नित्यत्व नहीं पाया जाता है। यदि पाया जाये तो बीजादिक का विनाश नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रवाहरूप से तो उनमें अनादिपना देखा जाता है। इसलिए अनादिपना आस्रव के नित्यत्व सिद्ध करने में साधन नहीं हो सकता है, क्योंकि ऐसा मानने में अनैकान्तिक दोष आता है और आस्रव वूâटस्थ अनादि स्वभाव वाला है नहीं, क्योंकि प्रवाह की अपेक्षा अनादिरूप से आये हुए मिथ्यात्व, असंयम और कषायरूप आस्रवों का वर्तमानकाल में भी किसी-किसी जीव में विनाश देखा जाता है। तात्पर्य यह है कि-ये षट्कायिक जीव पंचस्थावररूप अथवा दो इन्द्रिय आदि जीव की पर्यायों को छोड़कर मनुष्य जन्म धारण कर रत्नत्रय की आराधना करके स्वयं अपनी आत्मा में लीन होते हैं, तब वे कायरहित सिद्ध, शुद्ध भगवान की अवस्था प्राप्त कर लेते हैं।

जैसा कि मेरे द्वारा रचित चन्द्रप्रभस्तुति में कहा भी है-

श्लोकार्थ-इस संसार में प्रत्येक प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार प्रवृत्ति करता हुआ अनेक प्रकार के पृथ्वी-जल-अग्नि-वायु-वनस्पति आदि तुच्छ शरीरों को धारण करता रहता है। पुन: कदाचित् पुण्ययोग से त्रसपर्याय प्राप्त करके मनुष्य जन्म धारणकर स्वयं निजात्मा में लीन होकर कृतकृत्य शिवमय हो जाता है अर्थात् मोक्षधाम को प्राप्त कर लेता है, ऐसा जानकर अशरीरी बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।