04.रत्नत्रय धर्म का कथन

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रत्नत्रय धर्म का कथन


(७२)
जिनदेव शास्त्र और गुरुओं पर श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है।
जो बाधा विरहित ज्ञान वही जिसमें संदेह न विभ्रम है।।
सम्यग्चारित में प्रमादयुत कर्मों का आना रुक जाता।
संसार नाश करने वाला रत्नत्रय धर्म कहा जाता।।
(७३)
जो अंत:करण रूप पृथ्वी में बोया हुआ बीज सम है।
वह नि:शंकित आदिक गुण से िंसचित जल सम्यग्दर्शन है।।
जहाँ सम्यग्ज्ञान रूप शाखा चारित्र रूप हैं पुष्प खिले।
तब वृक्षरूप में परिणत हो मुक्ती का मारग शीघ्र मिले।।
(७४)
चारित्र अलंकृत थोड़ा भी तप करे मगर रत्नत्रययुत।
रत्नत्रय रहित न मोक्ष मिले चाहे जितना तप से संयुत।।
जो पथिक मार्ग का ज्ञाता है धीमी गति भी पहुँचा देती।
पर जिसे नहीं है मार्ग पता द्रुतगति भी नहिं पहुँचा सकती।।
(७५)
अंधा नहिं देख सका अग्नी इसलिए दौड़ता हुआ मरा।
लंगड़े को जंगल की अग्नी दिख रही न चल सकता है मरा।।
पर जिसके आँख पैर दोनों वह आलसवश ही पड़ा रहा।
इसलिए ज्ञान चारित में भी सम्यग्दर्शन ही श्रेष्ठ रहा।।
(७६)
संसार में यद्यपि रत्नों की संज्ञा पत्थर में कही गयी।
लेकिन वे भार सहित केवल तन को ही खिन्न किया करती।।
इसलिए गुरूजन कहते हैं हे मुनिवर ! जो तम नाश करे।
रत्नत्रयरूपी तीन रत्न से ही तन शोभावान बने।।
(७७)
जिस सम्यग्दर्शन बिना ज्ञान मिथ्या ही ज्ञान कहाता है।
चारित्र भी गर सम्यक्त्व रहित मिथ्याचारित्र कहाता है।।
यह मनुष जनम भी प्राप्त हुआ पर बड़ा निरर्थक लगता है।
यदि सम्यग्दर्शन नहीं मिले तो मोक्ष नहीं मिल सकता है।।
(७८)
संसार सर्प को डसने में जो नाग दमनि के सदृश है।
दुख रूप महा दावानल को जो शांत करे जल निर्झर है।।
वह मोक्षरूप सुख अमृत का मानो सुख पूर्ण सरोवर है।
ऐसा रत्नत्रय इस जग में हम सबका ही मंगलकर है।।
(७९)
व्यवहार नयापेक्षा तीनों, ये जुदा-जुदा कहलाते हैं।
पर निश्चयनय से तीनों में ना भेद कोई कर पाते हैं।।
ये तीनों आत्मस्वरूप मगर भगवन इनसे भी भिन्न रहे।
क्योंकी वे आत्ममगन होकर इन सबसे सदा अभिन्न रहें।।
(८०)
जीवाजीवादिक तत्त्वों में जिनकी मति स्थिर रूप हुई।
निश्चयनय के अवलम्बन से बुद्धी तद्रूप विलीन हुई।।
वे निर्मल चित के धारक नर उत्कृष्ट ज्योति को पाते हैं।
अपनी चैतन्य आत्मा में रमकर वे भव तर जाते हैं।।
(८१)
चैतन्य पुंज जो आत्मा का है तेज उसी में श्रद्धा हो।
वो सम्यग्दर्शन ज्ञान कहा सम्यक््âश्रुत में पारंगत हो।।
इन दोनों के संग ही चारित्र भी सम्यग्चारित्र कहलाता।
सम्यक्त्व बिना व्यवहार रत्नत्रय से ना तुम रखो नाता।।

इति रत्नत्रय धर्म कथन