04. तृतीय चूलिका अधिकार ( प्रथम महादण्डक )

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तृतीय चूलिका अधिकार(प्रथम महादण्डक)

अथ प्रथममहादण्डक:

तृतीयचूलिकाधिकार:
मंगलाचरणम्
बोधि: समाधि: परिणामशुद्धि:, स्वात्मोपलब्धि: शिवसौख्यसिद्धि:।
चिन्तामणिं चिंतितवस्तुदाने, त्वां वंद्यमानस्य ममास्तु देवि!
यस्य आराधनया स्वशुद्धात्मतत्त्वदर्शनं भवति, ततश्च त्रैलोक्यस्यापि ज्ञानं भवति तस्यै सरस्वतीदेव्यै नित्यं नमो नम:।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे त्रिषु महादण्डकेषु प्रथमहादण्डके प्रथमसम्यक्त्वप्राप्त्यभि-मुखस्य का: प्रकृतय: बध्नन्ति का: न बध्नन्ति तासां कथनं वर्तते, अत्र सूत्रद्वयं वक्ष्यते।
संप्रति प्रथममहादण्डककथनप्रतिज्ञासूचनाय सूत्रमवतरति-इदाणिं पढमसम्मत्ताभिमुहो जाओ पयडीओ बंधदि ताओ पयडीओ कित्तइस्सामो। तत्थ इमा पढमा महादंडआ कादव्वा भवदि।।१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृतिसमुत्कीर्तनं स्थानसमुत्कीर्तनं च भणितानंतरं तिस्र: महादण्डकप्ररूपणा: कथिता:, एता: प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखमिथ्यादृष्टिभि: बध्यमानप्रकृतयो ज्ञापनार्थमिति।
पुन: पूर्वं द्वे चूलिके किमर्थं कथिते ?
न, ताभ्यां विना उपरिमचूलिकावगमे उपायाभावात्। न च प्रकृतीनां स्वरूपमजानत: तद्विशेषो ज्ञापयितुं शक्यते, अन्यत्र तथानुपलंभात्। अथवा उपरि भण्यमानचूलिकानामाधारभूते द्वे चूलिके कथयित्वा प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखजीवे बंधस्थानविकल्पप्ररूपणार्थं त्रयो महादण्डका: आगता:, तान् इदानीं प्ररूपयाम: इति उक्तं भवति। इदं सूत्रं प्रथममहादण्डकप्रतिपादनपरत्वेनास्ति।
तत्र सम्यक्त्वाभिमुखजीवै: बध्यमानप्रकृतीनां समुत्कीर्तनायां त्रिषु महादण्डकेषु एष: प्रथमो महादण्डक: कर्तव्य:-वक्तव्य: इति।
कथमेतस्य महत्त्वं कथितम् ?
एतस्यावगमेन महापापस्य क्षयोपलंभात्, प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखत्वेन महत्त्वं संप्राप्तजीवै: बध्यमानत्वाद्वा।
प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखो जीव: का: का: प्रकृती: बध्नाति इति प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
पंचण्हं णाणावरणीयाणं णवण्हं दंसणावरणीयाणं सादावेदणीयं मिच्छत्तं सोलसण्हं कसायाणं पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय-दुगुंछा। आउगं च ण बंधदि। देवगदि-पंचिंदियजाति-वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउव्वियअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस-फासं देवगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअ-लहुुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-पसत्थविहायगदि-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिण-उच्चागोदं पंचण्हमंतराइयाणमेदाओ पयडीओ बंधदि पढमसम्मत्ताभिमुहो सण्णि-पंचिंदिय-तिरिक्खो वा मणुस्सो वा।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचज्ञानावरण-नवदर्शनावरण-सातावेदनीय-मिथ्यात्वअनन्तानुबंधिआदि-षोडशकषाय-पुरुषवेद-हास्य-रति-भय-जुगुप्साप्रकृती: बध्नाति प्रथमसम्यक्त्वाभिमुख: संज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यङ् वा मनुष्यो वा इति। आयु: कर्माणि न बध्नाति। ‘च’ शब्देन अन्याश्च प्रकृती: अपि न बध्नाति। तथा च- देवगति-पंंचेन्द्रियजाति-वैक्रियिक-तैजस-कार्मणशरीर-समचतुरस्रसंस्थान-वैक्रियिकांगोपांग-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-प्रशस्तविहायोगति-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिर-शुभ-सुभग-सुस्वर-आदेय-यश:कीर्ति-निर्माण-उच्चगोत्र-पंचांतराय-कर्मप्रकृती: इमा: बध्नाति इति ज्ञातव्यं।
  ता: का: प्रकृतय:? या: प्रथमसम्यक्त्वाभिमुख: तिर्यङ् मनुष्यो वा न बध्नाति ? उच्यते-असातावेदनीय-स्त्रीवेद-नपुंसकवेद-आयु:चतुष्क-अरति-शोक-नरकगति-तिर्यग्गति-मनुष्यगति-एकेन्द्रियादिजातिचतुष्क-औदारिकशरीर-आहारकशरीर-न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान-स्वातिसंस्थान-कुब्जकसंस्थान-वामनसंस्थान-हुंडकसंस्थान-औदारिकशरीरांगोपांग-आहारकशरीरांगोपांग-षट्संहनन-नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-मनुष्यगतिप्रायोग्यानुर्पूिव-आतप-उद्योत-अप्रशस्तविहायोगति-स्थावर-सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारणशरीर-अस्थिर-अशुभ-दुर्भग-दु:स्वर-अनादेय-अयश:र्कीित-तीर्थकर-नीचगोत्रमिति एता: प्रकृती: न बध्नाति, विशुद्धतमपरिणामत्वात्। तीर्थकरआहारकद्विकं च न बध्नाति, सम्यक्त्वसंयमाभावाद् इति।


अथ प्रथम महादण्डक(तृतीय चूलिका अधिकार)

मंगलाचरण

हे सरस्वती मात:! आप अपनी वन्दना करने वालों को चिन्तामणि के समान चिन्तित फल देने में समर्थ हैं, अत: हे मात:! आपकी कृपाप्रसाद से मुझे बोधि-रत्नत्रय की प्राप्ति, समाधि-धम्र्यध्यान की सिद्धि, परिणामों में विशुद्धि, अपनी आत्मा की उपलब्धि और मोक्षसुख-अतीन्द्रिय परमानन्द स्वरूप सर्वोत्कृष्ट सुख की सिद्धि प्राप्त होवे।।

जिनकी आराधना से अपने शुद्ध आत्मतत्त्व का दर्शन होता है और पुन: तीन लोक का भी ज्ञान हो जाता है ऐसी सरस्वती देवी को मेरा नित्य ही बारम्बार नमस्कार होवे।

अब इस षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड के छठे ग्रन्थ में तीन महादण्डकों में से प्रथम महादण्डक में प्रथम सम्यक्त्व की प्राप्ति के अभिमुख हुये जीव के कौन-कौन सी प्रकृतियां बंधती हैं और कौन-कौन सी नहीं बंधती हैं ? इनका कथन है। इस तृतीय चूलिका में दो सूत्र हैं।

<center>अब प्रथम महादण्डक के कथन की प्रतिज्ञा को सूचित करते हुए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

अब प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करने के अभिमुख हुआ जीव जिन प्रकृतियों को बांधता है, उन प्रकृतियों को कहेंगे। उन तीन महादण्डकों में यह प्रथम महादण्डक कथन करने योग्य है।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृतिसमुत्कीर्तन और स्थानसमुत्कीर्तन को कहने के बाद अब ये तीन महादण्डक कहे जा रहे हैं, ये प्रथमोपशम सम्यक्त्व के ग्रहण करने के अभिमुख हुये मिथ्यादृष्टि जीवों के द्वारा बांधने वाली प्रकृतियों को बतलाने के लिये हैं, ऐसा समझना।

शंका-तो फिर पहली दो चूलिकायें किसलिये कही गई हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उन पहली दो चूलिकाओं के ज्ञान के बिना आगे आने वाली चूलिकाओं के समझने का अन्य उपाय कोई नहीं है। प्रकृतियों के स्वरूप को नहीं जानने वाले व्यक्ति को उनका विशेष नहीं बतलाया जा सकता है क्योंकि अन्यत्र वैसा पाया नहीं जाता अथवा आगे कहे जाने वाली चूलिकाओं के आधारभूत दो चूलिकाओं को कहकर प्रथम सम्यक्त्व के अभिमुख जीव में बंध स्थानों के भेदों का कथन करने के लिये तीन महादण्डक आये हैं। उनका इस समय कथन करते हैं, यह उक्त कथन का तात्पर्य है। यहाँ यह सूत्र प्रथम महादण्डक के प्रतिपादनरूप है।

प्रकृत में सम्यक्त्व के अभिमुख जीवों के द्वारा बध्यमान प्रकृतियों की समुत्कीर्तना करने पर प्रथम महादण्डक का कथन करना चाहिए।

शंकाइसे बड़ापना किस कारण से है ?

समाधान-क्योंकि इसके ज्ञान से महापाप का क्षय पाया जाता है।

अब प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुये जीव कौन-कौन सी प्रकृतियों को बांधते हैं ? इसको प्रतिपादित करने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख हुआ संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यंच अथवा मनुष्य पाँच ज्ञानावरणीय, नव दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषायें, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा इन प्रकृतियों को बांधता है। किन्तु आयु कर्म को नहीं बांधता है। देवगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजस शरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, देवगति-प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों को बांधता है।।२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुआ संज्ञीपंचेन्द्रिय तिर्यंच अथवा मनुष्य पाँच ज्ञानावरण, नव दर्शनावरण, सातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनंतानुबंधी आदि सोलह कषायें, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा को बांधता है किन्तु आयुकर्म को नहीं बांधता है। ‘च’ शब्द से अन्य और भी प्रकृतियों को नहीं बांधता है।

उसी प्रकार जिनको बांधता है उनके नाम-देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिक, तैजस, कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँचों अन्तराय इन प्रकृतियों को बांधता है, ऐसा जानना चाहिये।

शंका-प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुआ जीव जिनको नहीं बांधता है वे कौन सी प्रकृतियां हैं ?

समाधान-उनके नाम कहते हैं-असातावेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, चारों आयु, अरति, शोक, नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, औदारिक शरीर, आहारकशरीर, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जकसंस्थान, वामनसंस्थान, हुण्डकसंस्थान, औदारिक शरीर-अंगोपांग, आहारकशरीर-अंगोपांग, छहों संहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, तीर्थंकर और नीचगोत्र इन प्रकृतियों को विशुद्धतम परिणाम होने से पूर्वोक्त जीव नहीं बांधता है। तीर्थंकर और आहारकद्विक को सम्यक्त्व और संयम का अभाव होने से नहीं बांधता है।


संप्रति बंधापसरणं कथ्यते-

अत्र विशुद्ध्या वर्धमानायां प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखमिथ्यादृष्टे: प्रकृतीनां बन्धव्युच्छेदक्रम: उच्यते-सर्व:-चतुर्गतिषु कश्चिदपि सम्यक्त्वाभिमुखमिथ्यादृष्टि: सागरोपमकोटीकोटिकालस्य अन्त: स्थितिं बध्नाति, नाधिककर्मस्थितिं। तत:-अंत:कोटीकोाqटसागरोपमस्थितिबंधात् सागरोपमशतपृथक्त्वं अध: अपसरणं कृत्वा नरकायुष: बंधव्युच्छित्तिं करोति। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा तिर्यगायुष: बंधव्युच्छेदो भवति। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा मनुष्यायुष: बंधव्युच्छेदो भवति। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा देवायुष: बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा नरकगति-नरकगति-प्रायोग्यानुपूर्विप्रकृत्यो: युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अध: अपसरणं कृत्वा सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारणशरीराणां अन्योन्यसंयुक्तानां त्रिप्रकृतीनां युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा सूक्ष्म-अपर्याप्त-प्रत्येक-शरीराणां त्रयाणामन्योन्यसंयुक्तानां युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा बादर-अपर्याप्त-साधारणशरीराणां अन्योन्यसंयुक्तानां त्रिप्रकृतीनां युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा बादर-अपर्याप्त-प्रत्येकशरीराणां त्रयाणां युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा द्वीन्द्रियापर्याप्तयो: अन्योन्यसंयुक्तयो: द्वयो: प्रकृत्यो: बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा त्रीन्द्रिय-अपर्याप्तयो: अन्योन्यसंयुक्तयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा चतुरिन्द्रिय-अपर्याप्तयो: अन्योन्यसंयुक्तयो: युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा असंज्ञिपंचेन्द्रिय-अपर्याप्तयो: अन्योन्यसंयुक्तयो: युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा संज्ञिपंचेन्द्रिय-अपर्याप्तयो: अन्योन्यसंयुक्तयो: युगपत् बंधव्युच्छेद: भवति।

तत: पूर्ववत् अपसरणं कृत्वा सूक्ष्म-पर्याप्त-साधारणशरीराणां अन्योन्यसंयुक्तानां त्रिप्रकृतीनां युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा सूक्ष्म-पर्याप्त-प्रत्येकशरीराणां अन्योन्यसंयुक्तानां त्रिप्रकृतीनां युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा बादर-पर्याप्त-साधारणशरीराणां युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीराणां एकेन्द्रिय-आताप-स्थावराणां च एतासां प्रकृतीनां षण्णां अन्योन्यसंबद्धानां युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा द्वीन्द्रिय-पर्याप्तयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा त्रीन्द्रिय-पर्याप्तयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा चतुरिन्द्रियपर्याप्तयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा असंज्ञिपंचेन्द्रिय-पर्याप्तयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा तिर्यग्गति-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-उद्योतानां त्रिप्रकृतीनां युगपद् बंधव्युच्छेद:।
तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा नीचैर्गोत्रस्य बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा अप्रशस्तविहायोगति-दुर्भग-दु:स्वर-अनादेय-प्रकृतीनां युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा हुंडसंस्थान-असंप्राप्तसृपाटिकासंहननयो: द्वयो: युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा नपुंसकवेदबंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा वामनसंस्थान-कीलितसंहननयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा कुब्जकसंस्थान-अद्र्धनाराचसंहननयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा स्त्रीवेदबंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा स्वातिसंस्थान-नाराचसंहननयो: युगपत् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान-वङ्कानाराचशरीरसंहननयो: युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: पूर्ववदपसरणं कृत्वा मनुष्यगति-औदारिकशरीर-औदारिकशरीरांगोपांग-वङ्काऋषभ वङ्कानाराचशरीरसंहनन-मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्विप्रकृतीनां पंचानां युगपद् बंधव्युच्छेद:। तत: सागरोपमशतपृथक्त्वं अपसरणं कृत्वा असातावेदनीय-अरति-शोक-अस्थिर-अशुभ-अयश:कीर्तिप्रकृतीनां षण्णां युगपद् बंधव्युच्छेदो भवति। एतानि चतुस्त्रिंशद्बंधापसरणस्थानानि कथितानि सन्ति।
कुत: एष बंधव्युच्छेदक्रम:?
अशुभ-अशुभतर-अशुभतमभेदेन प्रकृतीनामवस्थानात्। एष: प्रकृतिबंधव्युच्छेदक्रम: विशुद्ध्यमानानां भव्याभव्यमिथ्यादृष्टीनां साधारण:। विंâतु त्रीणि करणाणि भव्यमिथ्यादृष्टेरेव, अन्यत्र तेषामनुपलंभात्।
भणितं च- खयउवसमो विसोही देसण पाओग्ग करणलद्धी य।
चत्तारि वि सामण्णा करणं पुण होइ सम्मत्ते।।१।।
एतासु प्रकृतीषु बंधेन व्युच्छिन्नासु अवशेषप्रकृतय: पूर्वप्ररूपिता: तिर्यग्मिथ्यादृष्टि: मनुष्यमिथ्यादृष्टिर्वा सम्यक्त्वाभिमुखस्तावद् बध्नाति यावद् मिथ्यादृष्टिचरमसमयं प्राप्त: इति।
अत्रैतत् तात्पर्यं-अनादिसंसारे पर्यटद्भि: अस्माभि: काललब्धिबलेन पंचलब्धी: संप्राप्य सम्यग्दर्शनं संप्राप्तं। एतद्महारत्नं अस्ति, अस्याष्टौ अंगानि संरक्षणीयानि, पंचविंशतिमलदोषान् अपहाय इदं रत्नं निर्दोषीकर्तव्यं। पुनश्च ज्ञानाराधनया सज्ज्ञानं वर्धयद्भि: सम्यक्चारित्रमपि स्पर्शनीयं।
सम्यग्दर्शनस्य माहात्म्यं श्रीसमन्तभद्रस्वामिना कथितं-
न सम्यक्त्वसमं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि।
श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम्।।३४।।
अतएव मया याचते-
य: सार: सर्वसारेषु स सम्यग्दर्शनं मतं।
आ मुत्ते र्न हि मां मुञ्चेत् वृत्तं च विमलीक्रियात्।। १।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखंडे षष्ठग्रन्थे जीवस्थान-चूलिकान्तर्गततृतीयचूलिकायां गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां
प्रथम महादण्डको नाम तृतीयचूलिकाधिकार: समाप्त:।


अब बंधापसरण को कहते हैं-

अब यहाँ विशुद्धि के बढ़ने पर प्रथम सम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव के प्रकृतियों के बंध-व्युच्छेद का क्रम कहते हैं-सभी अर्थात् चारों गति सम्बन्धी कोई भी प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम के भीतर की स्थिति अर्थात् अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम की स्थिति को बांधता है। इससे बाहर अर्थात् अधिक कर्मस्थिति को नहीं बांधता। इस अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थितिबंध से सागरोपमशतपृथक्त्व नीचे अपसरण कर नारकायु का बन्ध-व्युच्छेद होता है।

विशेषार्थअन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति बंध से नारकायु की बन्ध-व्युच्छित्तिपर्यन्त क्रम इस प्रकार होता है-उक्त स्थितिबंध से पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन स्थिति को अन्तर्मुहूर्त तक समानता लिये हुए ही बांधता है। फिर उससे पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन स्थिति को अन्तर्मुहूर्त तक बांधता है। इस प्रकार पल्योपम के संख्यातवें भागरूप हानि से क्रम से एक पल्योपम हीन-अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति को अन्तर्मुहूर्त तक बांधता है। इसी पल्योपम के संख्यातवें भागरूप हानि के क्रम से ही स्थितिबन्धापसरण करता हुआ दो पल्योपम से हीन, तीन पल्योपम से हीन इत्यादि स्थिति को अन्तर्मुहूर्त तक बांधता है, पुन: इसी क्रम से आगे-आगे स्थितिबंध का ह्रास करता हुआ एक सागरोपम से हीन, दो सागरोपम से हीन, तीन सागरोपम से हीन, इत्यादि क्रम से सात-आठ सौ सागरोपमों से हीन अन्त:कोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थिति को जिस समय बांधने लगता है, उस समय एक नारकायु प्रकृतिबन्ध से व्युच्छिन्न होती है। नारकायु की बंध-व्युच्छित्ति के पश्चात् तिर्यगायु की बन्ध-व्युच्छित्ति तक पूर्वोक्त क्रम से ही स्थितिबन्ध का ह्रास होता है और जब वह ह्रास सागरोपमशतपृथक्त्व प्रमित हो जाता है तब तिर्यगायु की बन्धव्युच्छित्ति होती है। यही क्रम आगे भी जानना चाहिये। इस प्रकार से स्थिति के ह्रास होने को स्थितिबंधापसरण कहते हैं।

उससे सागरोपमशतपृथक्त्व प्रमाण स्थिति का अपसरण कर तिर्यगायु का बंधव्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर मनुष्यायु का बंधव्युच्छेद होता है। उससे सागरोपम शतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर देवायु का बंधव्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर नरकगति और नरकगत्यानुपूर्वी, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर परस्पर-संयुक्त सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण शरीर, इन तीन प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे गरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति जाकर सूक्ष्म, अपर्याप्त और प्रत्येक शरीर, इन परस्पर-संयुक्त तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे गरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर बादर, अपर्याप्त और साधारण शरीर, इन परस्पर संयुक्त तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर बादर, अपर्याप्त और प्रत्येक शरीर, इन तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर द्वीन्द्रियजाति और अपर्याप्त, इन परस्पर-संयुक्त दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर त्रीन्द्रियजाति और अपर्याप्त, इन परस्पर-संयुक्त दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर चतुरिाqन्द्रयजाति और अपर्याप्त, इन परस्पर-संयुक्त दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर असंज्ञी पंचेन्द्रियजाति और अपर्याप्त, इन परस्पर संयुक्त दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर संज्ञी पंचेन्द्रियजाति और अपर्याप्त, इन परस्पर संयुक्त दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है।

उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर सूक्ष्म, पर्याप्त और साधारण शरीर इन परस्पर-संयुक्त तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर सूक्ष्म, पर्याप्त और प्रत्येक शरीर इन परस्पर-संयुक्त तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर बादर, पर्याप्त और साधारण शरीर इन परस्पर-संयुक्त तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर बादर, पर्याप्त, और प्रत्येक शरीर तथा एकेन्द्रिय, आतप और स्थावर, इन परस्पर सम्बद्ध छहों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर द्वीन्द्रियजाति और पर्याप्त, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर त्रीन्द्रियजाति और पर्याप्त, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर चतुरिन्द्रियजाति और पर्याप्त, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर असंज्ञी पंचेन्द्रियजाति और पर्याप्त इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर तिर्यग्गति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी और उद्योत, इन तीनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है।

उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर नीच गोत्र का बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भग, दु:स्वर और अनादेय, इन चारों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर हुण्डकसंस्थान और असंप्राप्तसृपाटिका-शरीरसंहनन इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर नपुंसकवेद का बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर वामनसंस्थान और कीलितशरीरसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर कुब्जकसंस्थान और अर्धनाराचशरीर संहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर स्त्रीवेद का बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर स्वातिसंस्थान और नाराचशरीर संहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वङ्कानाराचशरीरसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। उससे सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण स्थिति उतरकर मनुष्यगति, औदारिक शरीर, औदारिक शरीर-अंगोपांग, वङ्कावृषभवङ्कानाराचशरीरसंहनन और मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी इन पाँचों प्रकृतियों का एक साथ बन्ध-व्युच्छेद होता है। इससे सागरोपम शत पृथक्त्वप्रमाण नीचे उतरकर असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ और अयशकीर्ति इन छह प्रकृतियों का एक साथ बंध व्युच्छेद हो जाता है। ये चौंतीस बंधापसरण स्थान कहे गये हैं।

शंका-यह प्रकृतियों के बन्ध-व्युच्छेद का क्रम किस कारण से है ?

समाधान-अशुभ, अशुभतर और अशुभतम के भेद से प्रकृतियों का अवस्थान माना गया है, उसी अपेक्षा से यह प्रकृतियों के बन्ध-व्युच्छेद का क्रम है।

यह प्रकृतियों के बंध-व्युच्छेद का क्रम विशुद्धि को प्राप्त होने वाले भव्य और अभव्य मिथ्यादृष्टि जीवों के साधारण अर्थात् समान है किन्तु अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण, ये तीन करण भव्य मिथ्यादृष्टि जीव के ही होते हैं क्योंकि अन्यत्र अर्थात् अभव्य जीवों में वे पाए नहीं जाते हैं। कहा भी है-

क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य और करण, ये पाँच लब्धियाँ होती हैं उनमें से प्रारम्भ की चार तो सामान्य हैं अर्थात् भव्य और अभव्य जीव, इन दोनों के होती हैं किन्तु पाँचवीं करणलब्धि सम्यक्त्व उत्पन्न होने के समय भव्यजीव के ही होती है।।१।।

इन उपर्युक्त प्रकृतियों के बंध से व्युच्छिन्न होने पर पूर्व प्ररूपित अवशिष्ट प्रकृतियों को सम्यक्त्व के अभिमुख तिर्यंच और मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव तब तक बांधता है, जब तक कि वह मिथ्यादृष्टि गुणस्थान के अंतिम समय तक रहता है।

यहाँ तात्त्पर्य यह है कि-अनादि संसार में पर्यटन करते हुये हम और आप सभी ने काललब्धि के बल से पाँचों लब्धियों को प्राप्त करके सम्यग्दर्शन प्राप्त किया है, यह सम्यग्दर्शन महारत्न है, इसके आठों अंग-नि:शंकित आदि संरक्षणीय हैं, इसके पच्चीस मल दोषों को छोड़कर यह रत्न निर्दोष करना चाहिये, पुन: ज्ञान की आराधना से समीचीन ज्ञान को वृद्धिंगत करते हुये सम्यक्चारित्र का भी स्पर्श करना चाहिये। सम्यग्दर्शन के माहात्म्य को श्री समंतभद्रस्वामी ने कहा है-

तीनों कालों में और तीनों लोक में भी संसारी प्राणियों के लिये सम्यक्त्व के समान कुछ भी श्रेयस्कर-हितकर नहीं है और मिथ्यात्व के समान कुछ भी अहितकर नहीं है।।३४।।

अतएव मेरे द्वारा याचना की जाती है-

जो सभी सारों में भी सार है वह सम्यग्दर्शन ही है, मेरा वह सम्यग्दर्शन मोक्ष प्राप्त होने पर्यन्त न छूटे और मेरे चारित्र को विमल-निर्दोष बनावे।।१।।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदन्त-भूतबलि आचार्य प्रणीत षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम खण्ड के छठे ग्रन्थ में जीवस्थान चूलिका के अन्तर्गत तीसरी चूलिका में गणिनीज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में प्रथम महादण्डक नाम का यह तीसरा महाधिकार पूर्ण हुआ।