040.सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी चातुर्मास-सन् १९९६

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सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी चातुर्मास-सन् १९९६

समाहित विषयवस्तु

१. चातुर्मास स्थापना के साथ कार्यक्रमों की झड़ी लगी।

२. पर्यूषण पर्व का आगमन।

३. क्षेत्र के निर्माण कार्य में तीव्रता आई।

४. कमल जिनालय का निर्माण एवं सहस्रकूट प्रतिमाओं की स्थापना, धर्मशालाओं का निर्माण।

५. कल्पद्रुुम मंडल विधान।

६. माताजी की जन्मजयंती।

७. माताजी के चातुर्मास से क्षेत्र का कायाकल्प।

८. यहीं प्रयाग तीर्थ की रूपरेखा बनी।

९. मांगीतुंगी पहाड़ पर १०८ फुट ऊँची भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा स्थापना का विचार माताजी के मन में आया।

१०. कार्य शीघ्र ही पूर्ण होगा।

११. चातुर्मास निष्ठापन और विहार।

१२. दिल्ली प्रीतविहार में कमल मंदिर की प्रतिष्ठा एवं पंचकल्याणक।

काव्य पद

सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी पर, आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी।

चातुर्मास हुआ स्थापित, पूज्य आर्यिका ज्ञानमती।।
चातुर्मास शुरू होते ही, जल वर्षा की झड़ी लगी।
और इधर माताजी सन्निधि, धार्मिक कार्य हुए सविधि।।११०२।।

गति आई निर्माण कार्य में, लगा यात्रियों का तांता।
धर्मामृत का पान करातीं, गणिनी ज्ञानमती माता।।
पर्वराज पर्यूषण आया, दशलक्षण का लेकर हार।
माताजी ने प्रवचन द्वारा, सबका किया परम उपकार।।११०३।।

जन्मजयंती माताजी की, गई मनाई यथासमय।
कल्पद्रुम मंडल विधान भी, हुआ प्रयोजित इसी समय।।
नवनिर्मित श्रीकमल जिनालय, सहस्रकूट पर प्रतिमाएँ।
हुर्इं विराजित पंखुडियों पर, अतिशय ही मन को भाएँ।।।११०४।।

माताजी के चतुर्मास से, हुआ क्षेत्र का कायाकल्प।
विद्युत-सड़क-सेतु बनने से, यात्री संख्या बढ़ी अनल्प।।
बनीं धर्मशालाएँ नूतन, क्षेत्र ख्याति हुआ विस्तार।
सच तो यह है माताजी से, हुआ क्षेत्र का अति उपकार।।११०५।।

मांगीतुंगी क्षेत्र बैठकर, प्रयागतीर्थ पाया प्रारूप।
भूमि-वृक्ष-प्रतिमा आदिक ने, यहीं पे पाया पूर्ण स्वरूप।।
इलाहाबाद से मुख्य सड़क पर, शोभित है यह तीर्थ महान।
ऋषभदेव तपस्थली नाम से, दर्शन अवश्य करें श्रीमान्।।११०६।।

मांगीतुंगी चतुर्मास की, एक अनन्य उपलब्धि रही।
माताजी के ध्यान में आयी, शिष्यों से तत्काल कही।।
मांगीतुंगी पर्वत ऊपर, आदिनाथ जिन शासन हो।
अष्टोत्तरशत फुट ऊँची इक, प्रतिमाजी स्थापन हो।।११०७।।

माताजी की शिष्य मंडली, पूर्ण समर्पित श्रीगुरू।
इधर शब्द निकले गुरुमुख से, उधर हो गया काम शुरू।।
कुछेक दिनों में हम देखेंगे, आदिनाथ जिन बिम्ब महान।
मानों गिरि पर खड़े हुए हैं, ध्यानमग्न ऋषभ भगवान।।११०८।।

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को, हुआ समापन वर्षावास।
संघ आर्यिका ने विहार कर, पावागढ़ में किया प्रवास।।
पावागढ़ जी सिद्धक्षेत्र है, लव-कुश पाई सिद्धशिला।
किया कठिन तप, अगणित मुनिवर, सबको ही सिद्धत्व मिला।।११०९।।

पावागढ़ से संघ आर्यिका, अहमदाबाद नगर आया।
आचार्य शांतिनिधि छाणी जी की, जन्मभूमि में पधराया।।
फिर केशरिया-सलुम्बर होकर, हुआ उदयपुर शुभागमन।
आचार्यश्री अभिनंदन निधि के, सकल संघ से हुआ मिलन।।१११०।।

आयड़-पारसनाथ अणिन्दा, चित्तौड़-भीलवाड़ा आया।
मालपुरा-लावा-होकर संघ, माधोराजपुर पधराया।।
सन् छप्पन में श्री क्षुल्लिका, वीरमती ने दीक्षा ली।
वीर निधि ने, ज्ञानमती को, रूप आर्यिका दीक्षा दी।।११११।।

पदमपुरा-खानिया-जयपुर, रेवाड़ी पधराया संघ।
धारूहेड़ा से गुड़गावां, दिल्ली प्रवेश का रहा प्रसंग।।
भावपूर्ण हार्दिक अभिनंदन, सकल संघ का किया गया।
संघपति द्वय महा-प्रेम को, धन्यवाद अति दिया गया।।१११२।।

प्रीतविहार कमलमंदिर की, हुई प्रतिष्ठा पंचकल्याण।
रहा सान्निध्य पूज्य माताजी, मिला सहयोग समाज-निर्माण।।
दिगम्बर जैन पंचायत दिल्ली, पदाधिकारी सब आये हैं।
शालीमार विशालसभा मेें, श्रीफल चरण चढ़ाये हैं।।१११३।।

लाल जिनालय चौक चाँदनी, लगाये बहुत दिनों से आस।
हे माताजी! कृपा कीजिये, हमें दीजिये चातुर्मास।।
पूज्य आर्यिका ज्ञानमती मन, भक्तजनों प्रति प्रीति अपार।
सन् सत्तानवे चतुर्मास का, अत: दिया दिल्ली उपहार।।१११४।।