041.दसवाँ अधिकार - छहों लेश्याओं के नाम........

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दसवाँ अधिकार - छहों लेश्याओं के नाम

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अथ लेश्यामार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन पंचभि:सूत्रै: लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्येन लेश्यानां अशुभत्रिकलेश्यानां च कथनत्वेन ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनु द्वितीयस्थले शुभत्रिलेश्याप्रतिपादनत्वेन ‘‘तेउलेस्सिया’’ इत्यादिसूत्रत्रयमिति समुदायपातनिका।

संप्रति लेश्यामार्गणाप्रतिपादनार्थं सूत्रावतार: क्रियते-


लेस्साणुवादेण अत्थि किण्हलेस्सिया णीललेस्सिया काउलेस्सिया तेउलेस्सिया पम्मलेस्सिया सुक्कलेस्सिया अलेस्सिया चेदि।।१३६।।


सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लेश्यानुवादेन कृष्णलेश्या नीललेश्या: कापोतलेश्या: तेजोलेश्या: पद्मलेश्या: शुक्ललेश्या अलेश्याश्चेति।
कर्मस्कंधैरात्मानं लिम्पतीति लेश्या। कषायानुरञ्जिता एव योगप्रवृत्तिर्लेश्येति नात्र परिगृह्यते, सयोगकेवलिनोऽलेश्यत्वापत्ते:।
अस्तु चेत्-यदि सयोगिकेवली अलेश्यो भवेत् का हानि: ?
न, ‘शुक्ललेश्य: सयोगकेवली’ इति वचनव्याघातात्।
षड्विध: कषायोदय:। तद्यथा-तीव्रतम: तीव्रतर: तीव्र: मंद: मंदतर: मन्दतम: इति। एतेभ्य: षड्भ्य: कषायोदयेभ्य: परिपाट्या षड् लेश्या भवन्ति। कृष्णलेश्या नीललेश्या कपोतलेश्या तेजोलेश्या पद्मलेश्या शुक्ललेश्या चेति।
उक्तानि च लेश्यानां लक्षणानि-
चंडो ण मुयदि वैरं भंडणसीलो य धम्म-दय-रहियो।
दुट्ठो ण य एदि वसं लक्खणमेदं तु किण्हस्स।।२००।।

मंदो बुद्धिविहीणो णिव्विण्णाणी य विसय-लोलो य।
माणी मायी य तहा आलस्सो चेय भेज्जो य।।२०१।।

णिद्दा-वंचण-बहुलो धण-धण्णे होइ तिव्वसण्णो य।
लक्खणमेदं भणियं समासदो णीललेस्सस्स।।२०२।।

रूसदि णिंददि अण्णे दूसदि बहुसो य सोय-भय-बहुलो।
असुयदि परभवदि परं पसंसदि य अप्पयं बहुसो।।२०३।।

ण य पत्तियइ परं सो अप्पाणं पि व परं पि मण्णंतो।
तूसदि अभित्थुवंतो ण य जाणइ हाणिबड्ढीओ।।२०४।।

मरणं पत्थेइ रणे देदि सुबहुअं हि थुव्वमाणो दु।
ण गणइ अकज्ज-कज्जं लक्खणमेदं तु काउस्स।।२०५।।

जाणइ कज्जमकज्जं सेयमसेयं च सव्व-सम-पासी।
दय-दाण-रदो य मिदू लक्खणमेदं तु तेउस्स।।२०६।।

चागी भद्दो चोक्खो उज्जुव-कम्मो य खमइ बहुअं पि।
साहु-गुरु-पूजण-रदो लक्खणमेदं तु पम्मस्स।।२०७।।

ण उ कुणइ पक्खवायं ण वि य णिदाणं समो य सव्वेसु।
णत्थि य राय-द्दोसा णेहो वि य सुक्क लेस्सस्स।।२०८।।
चंडो-चंडनस्तीव्रकोपन: वैरं न मुंचति, भंडनशीलश्च युद्धशीलश्च धर्मदयारहित: दुष्ट: निर्दय: वशं नैति एतल्लक्षणं तु-पुन: कृष्णलेश्यस्य भवति। मंद:-स्वच्छन्दक्रियासु मंदो वा, बुद्धिविहीन:-वर्तमानकार्यानभिज्ञ:, निर्विज्ञानी च-विज्ञानरहितश्च, विषयलोलश्च-मानी, मायावी आलस्यश्च भेद्यश्च-परेणानवबोध्यभिप्रायश्च कृष्णलेश्यस्य लक्षणमेतत्। एवमेव नीलादिलेश्याणां विशेषलक्षणं ज्ञातव्यं। षड्लेश्यातीता: अलेश्या: भवन्तीति।
उक्तं च-
किण्हादि-लेस्स-रहिदा संसार-विणिग्गया अणंतसुहा।
सिद्धिपुरं संपत्ता अलेस्सिया ते मुणेयव्वा।।
ये जीवा: कषायोदयस्थानयोगप्रवृत्त्यभावात् कृष्णादिलेश्यारहिता: तत एव पंचविधसंसारवा-राशिविनिर्गता: अतीन्द्रियानंतसुखसंतृप्ता: स्वात्मोपलब्धिलक्षणं सिद्धिपुरं संप्राप्ता: ते अयोगिकेवलिन: सिद्धाश्च अलेश्या जीवा इति ज्ञातव्या:।
तात्पर्यमेतत्-ये महामुनय: कृष्णादि-अशुभलेश्यारहिता: पीतपद्मलेश्याया: उपरिष्टात् शुक्ल-लेश्यापरिणता: सन्त: शुक्लध्यानाग्निना कर्माणि दग्ध्वा केवलज्ञानं प्राप्नुवन्ति त एव भगवन्तोऽर्हन्त: अनंतचतुष्टयं लब्ध्वा लेश्याविरहिता: निष्कला: सिद्धपरमात्मानो भवन्तीति ज्ञात्वा अशुभलेश्याभ्य: स्वात्मा रक्षणीयोऽस्माभिरिति।

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अथ लेश्यामार्गणा अधिकार'

अब दो स्थलों में पाँच सूत्रों के द्वारा लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उसके प्रथमस्थल में सामान्य से लेश्या का कथन तथा तीन अशुभ लेश्याओें के कथन की मुख्यता से ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं उसके पश्चात् द्वितीयस्थल में तीन शुभ लेश्याओं का कथन करने वाले ‘‘तेउलेस्सिया’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में यह समुदायपातनिका हुई।

अब लेश्यामार्गणा का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है—

सूत्रार्थ—

लेश्या मार्गणा के कथन द्वारा कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या, पद्मलेश्या, शुक्ललेश्या और अलेश्या वाले जीव हैं।।१३६।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका—लेश्या मार्गणा के कथन में छहों लेश्या वाले तथा लेश्या से रहित (सिद्ध) जीवों का वर्णन आता है।

जो कर्मस्कंध से आत्मा को लिप्त करती है उसे लेश्या कहते हैं। यहाँ पर कषाय से अनुरंजित योगप्रवृत्ति रूप लेश्या का ग्रहण नहीं किया गया है क्योंकि इस अर्थ के ग्रहण करने पर सयोगकेवली को लेश्यारहितपने की आपत्ति प्राप्ति होती है।

शंका—यदि सयोगकेवली को लेश्यारहित मान लिया जावे तो क्या हानि है ?

समाधान—नहीं, क्योंकि सयोगकेवली जीवों के शुक्ललेश्या होती है इस वचन में विरोध आ जाएगा।

कषाय का उदय छह प्रकार का होता है। वह इस प्रकार है-तीव्रतम, तीव्रतर, तीव्र, मंद, मंदतर और मन्दतम। इन छह प्रकार के कषाय के उदय से उत्पन्न हुई परिपाटी क्रम से लेश्या भी छह हो जाती हैं—कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या (पीतलेश्या), पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या। लेश्याओं का लक्षण कहा भी है—

गाथार्थ—

जो तीव्र क्रोध करने वाला हो, वैर को न छोड़े, लड़ना जिसका स्वभाव हो, जो धर्म और दया से रहित हो, दुष्ट हो और जो किसी के वश को प्राप्त न हो, ये सब कृष्णलेश्या वाले के लक्षण माने गये हैं।

जो मन्द अर्थात् स्वछन्द हो अथवा काम करने में मंद हो, वर्तमान कार्य करने में विवेकरहित हो, कला-चातुर्य से रहित हो, पाँच इंद्रियों के स्पर्शादि बाह्य विषयों में लम्पट हो, मानी हो, मायावी हो, आलसी हो, भीरू-डरपोक होवे, ये सब भी कृष्णलेश्या वाले के लक्षण कहे गये हैं।

जो अतिनिद्रालु हो, दूसरों को ठगने में अतिकुशल हो और धन-धान्य के विषय में जिसकी अतितीव्र लालसा हो, ये सब नीललेश्या वाले के लक्षण संक्षेप में बताए हैंं।

जो दूसरों के ऊपर क्रोध करता है, दूसरे की निंदा करता है, अनेक प्रकार से दूसरों को दु:ख देता है अथवा दूसरों को दोष लगाता है, अत्यधिक शोक और भय से व्याप्त रहता है, दूसरों को सहन नहीं करता है, दूसरों का पराभव करता है, अपनी नाना प्रकार से प्रशंसा करता है। दूसरे के ऊपर विश्वास नहीं करता है, अपने समान दूसरे को भी मानता है, स्तुति करने वाले के ऊपर संतुष्ट हो जाता है, अपनी और दूसरे की हानि-वृद्धि को नहीं समझता है, युद्ध में मरने की प्रार्थना करता है, स्तुति करने वाले को बहुत धन दे डालता है और कार्य-अकार्य की कुछ भी गणना नहीं करता है ये सब कापोतलेश्या वाले के लक्षण हैं।

जो कार्य-अकार्य और सेव्य-असेव्य को जानता है, सबके विषय में समदर्शी रहता है, दया और दान में तत्पर रहता है और मन, वचन तथा काय से कोमल परिणामी होता है, ये सब पीत लेश्या वाले के लक्षण हैं।

जो त्यागी है, भद्र परिणामी है, निर्मल है, निरन्तर कार्य करने में उद्यत रहता है, जो अनेक प्रकार के कष्टप्रद और अनिष्ट उपसर्गों को क्षमा कर देता है और साधु तथा गुरुजनों की पूजा में रत रहता है, ये सब पद्मलेश्या वाले के लक्षण हैं। जो पक्षपात नहीं करता है, निदान नहीं बाँधता है, सबके साथ समान व्यवहार करता है, इष्ट और अनिष्ट पदार्थों के विषय में राग और द्वेष से रहित है तथा स्त्री, पुत्र और मित्र आदि में स्नेह रहित है, ये सब शुक्ल लेश्या वाले के लक्षण हैं। जो तीव्र क्रोधी हो, वैर न छोड़े, जिसका लड़ाई-झगड़ा करने का स्वभाव हो, जो दया धर्म से रहित हो, दुष्ट और निर्दय हो, किसी के वश में न आता हो, ये सभी लक्षण कृष्ण लेश्या वाले जीव के रहते हैं। स्वच्छन्द अथवा कर्म करने में मंद हो, बुद्धिहीन हो, अज्ञानी हो, स्पर्शन आदि इन्द्रियों के विषय में लम्पट हो, अभिमानी हो, कुटिल वृत्ति वाला मायाचारी हो, कर्तव्य कर्म में आलसी हो, दूसरों के द्वारा जिसका अभिप्राय न जाना जा सके, ये सब भी कृष्ण लेश्या वाले के लक्षण हैं। इसी प्रकार से नील आदि लेश्याओं के विशेष लक्षण जान लेना चाहिए। उपर्युक्त छह लेश्याओं से रहित जीव अलेश्या कहे जाते हैं। कहा भी है—

गाथार्थ—

जो कृष्णादि लेश्याओं से रहित हैं, पंचपरिवर्तनरूप संसार से पार हो गये हैं, जो अतीन्द्रिय और अनन्त सुख को प्राप्त हैं और जो आत्मोपलब्धिरूप सिद्धिपुरी को प्राप्त हो गये हैं उन्हें लेश्यारहित जानना चाहिए।

जो जीव कषाय के उदयस्थानरूप योग की प्रवृत्ति के अभाव से कृष्ण आदि लेश्याओं से रहित हो जाते हैं वे ही पंचपरिवर्तनशील संसाररूपी समुद्र से निकलकर अतीन्द्रिय और अनन्त सुख से संतृप्त होकर स्वात्मोपलब्धिलक्षण सिद्धिपुर-सिद्धशला को प्राप्त करते हैं, वे अयोगकेवली और सिद्ध जीव ही अलेश्या वाले कहलाते हैं ऐसा जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि जो महामुनि कृष्णादि अशुभ लेश्याओं से रहित होकर पीत, पद्म लेश्या के भावों से ऊपर उठकर शुक्ल लेश्या से परिणत होते हुए शुक्लध्यान की अग्नि के द्वारा कर्मों को जलाकर केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं वे अर्हन्त भगवान ही अनन्तचतुष्टय को प्राप्त कर लेश्याओं से रहित, शरीर से रहित सिद्ध परमात्मा बनते हैं, ऐसा जानकर हम लोगों को अशुभ लेश्याओं से अपनी आत्मा की रक्षा करनी चाहिए।