042.ग्यारहवाँ अधिकार- भव्यमार्गणा में भव्य - अभव्य दो भेद है..............

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ग्यारहवाँ अधिकार - भव्यमार्गणा में भव्य - अभव्य दो भेद है

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अथ भव्यमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन त्रिसूत्रै: भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकार: कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले भव्यानां कथनमुख्यत्वेन ‘‘भविया-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनु द्वितीयस्थले अभव्यजीवप्रतिपादनत्वेन ‘‘अभव-’’ इत्यादिसूत्रमेकं इति समुदायपातनिका।
'अधुना भव्यत्वमार्गणानिरूपणाय सूत्रावतार: क्रियते-'
'भवियाणुवादेण अत्थि भवसिद्धिया अभवसिद्धिया।।१४१।। '
'सिद्धान्तचिंतामणिटीका'-भव्यानुवादेन भवसिद्धय: अभवसिद्धय: जीवा: सन्ति। भव्या भविष्यन्ती सिद्धिर्येषां ते भव्यसिद्धय: सन्ति।
तथा च भव्यसंततिच्छेद: स्यादिति चेत् ?
न, तेषामानन्त्यात्। न हि सान्तस्य आनन्त्यं, विरोधात्।
व्ययसहितस्य आयरहितस्य च राशे: कथमानन्त्यम् ?
नैतत्, अन्यथा एकस्याप्यानन्त्यप्रसंगात्। सव्ययस्यापि अनन्तस्य क्षयो नास्तीति एकांतो नास्ति, स्वसंख्येयासंख्येयभागव्ययस्य राशेरनन्तस्यापि क्षय:, द्वित्र्यादिसंख्येयराशिव्ययतो न क्षयोऽस्तीत्यभ्युपगमात्।
अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनकालस्यानन्तस्यापि क्षयदर्शनादनैकान्तिक आनन्त्यहेतुरिति चेत् ?
न, उभयोर्भिन्नकारणत: प्राप्तानन्तयो: साम्याभावतोऽर्धपुद्गलपरिवर्तनस्य वास्तवानन्त्याभावात्। तद्यथा-अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनकाल: सक्षयोऽप्यनन्त:, छद्मस्थैरनुपलब्धपर्यन्तत्वात्। अथवा केवलज्ञान-मनन्तस्तद्विषयत्वाद्वा। जीवराशिस्तु पुन: संख्येयराशिक्षयेऽपि निर्मूलप्रक्षयाभावात् अनन्त इति अथवा छद्मस्थानुपलब्ध्यपेक्षामन्तरेणानन्त्यादिति विशेषणाद्वा नानैकान्तिक इति। किं च सव्ययस्य निरवशेषक्षयेऽभ्यु-पगम्यमाने कालस्यापि निरवशेषक्षयो जायेत, सव्ययत्वं प्रत्यविशेषात्।
केचिद् जीवा: भव्या अपि मुत्तिं न गच्छन्ति पुन: कथं तेषां भव्यत्वम् ?
नैतद् वक्तव्यं, मुक्तिगमनयोग्यतापेक्षया तेषां भव्यव्यपदेशात्। न च योग्या: सर्वेऽपि निष्कलज्र: भवन्ति सुवर्णपाषाणेन व्यभिचारात्।
उक्तं च-
एयणिगोदसरीरे जीवा दव्व-प्पमाणदो दिट्ठा।
सिद्धेहि अणंतगुणा सव्वेण वितीद-कालेण।।
तद्विपरीता: अभव्या:।
उक्तं च-
भविया सिद्धी जेसिं, जीवाणं ते भवंति भवसिद्धा।
तव्विवरीदा भव्वा, संसारादो ण सिज्झंति।।
भव्या भवितुं योग्या भाविनी वा सिद्धि: अनंतचतुष्टयरूपस्वरूपोपलब्धिर्येषां ते भव्यसिद्धा:। अनेन सिद्धेर्लब्धियोग्यताभ्यां भव्यानां द्वैविध्यमुत्तंं। तद्विपरीता: उक्तलक्षणद्वयरहिता:, ते अभव्या: भवन्ति। अतएव ते अभव्या न सिद्ध्यन्ति संसारान्नि:सृत्य सिद्धिं न लभन्ते।

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अथ भव्यमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में तीन सूत्रों के द्वारा भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार प्रारंभ होता है।

उसमें प्रथम स्थल में भव्य जीवों के कथन की मुख्यता से ‘‘भविया’’ इत्यादि दो सूत्र हैं, पुन: द्वितीयस्थल में अभव्य जीवों का प्रतिपादन करने वाले ‘‘अभव’’ इत्यादि एक सूत्र कहेंगे। अध्याय के प्रारंभ में यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई। अब भव्यत्वमार्गणा के निरूपण हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणा के कथन से भवसिद्ध और अभवसिद्ध जीव होते हैं।।१४१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भव्यमार्गणा के अन्दर भवसिद्ध और अभवसिद्ध दोनों प्रकार के जीवों का कथन किया जाता है। जिन्हें आगे सिद्धि प्राप्त होगी, उन्हें भव्यसिद्ध जीव कहते हैं।

शंका-इस प्रकार तो भव्यजीवों की परम्परा का उच्छेद-नाश ही हो जायेगा ?

समाधान-नहीं, क्योंकि भव्यजीव अनन्त होते हैं। जो राशि सान्त होती है उसमें अनन्तपना नहीं बन सकता है क्योंकि सान्त को अनन्त मानने में विरोध आता है।

शंका-जिस राशि का व्यय होता है और जो आय रहित होती है उस राशि में अनन्तपना कैसे संभव है ?

समाधान-ऐसा नहीं है क्योंकि यदि व्ययसहित और आयरहित राशि में भी अनन्तपना नहीं माना जाएगा तो एक को भी अनन्त के मानने का प्रसंग आ जायेगा। व्यय होते हुए भी अनन्त का क्षय नहीं होता है यह एकान्त नियम नहीं है, इसलिए जिसके संख्यातवें और असंख्यातवें भाग का व्यय हुआ है ऐसी अनन्त राशि का क्षय भी है किन्तु दो, तीन आदि संख्येय राशि के व्ययमात्र से क्षय नहीं भी है ऐसा स्वीकार किया है।

शंका-अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनरूप काल अनन्त होते हुए भी उसका क्षय देखा जाता है इसलिए भव्यराशि के क्षय न होने में जो अनन्तरूप हेतु दिया है वह व्यभिचरित हो जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि भिन्न-भिन्न कारणों से अनन्तपने को प्राप्त भव्यराशि और अर्धपुद्गलपरिवर्तनरूप काल इन दोनों राशियों में समानता का अभाव है और इसलिए अर्धपुद्गल परिवर्तनकाल वास्तव में अनन्तरूप नहीं है।

अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल क्षयसहित होते हुए भी अनन्त है क्योंकि छद्मस्थ जीवों के द्वारा उसका अन्त नहीं पाया जाता है। अथवा केवलज्ञान अनन्त है और उसका विषय होने से वह अनन्त है। जीवराशि तो संख्यातवें भागरूप राशि के क्षय हो जाने पर भी निर्मूल नाश नहीं होने से अनन्त है। अथवा पहले जो भव्यराशि के क्षय नहीं होने में अनन्तरूप हेतु दे आए हैं उसमें छद्मस्थ जीवों के द्वारा अनन्त की उपलब्धि नहीं होती है, इस अपेक्षा के बिना ही यह विशेषण लगा देने से अनैकान्तिक दोष नहीं आता है तथा व्ययसहित अनन्त के सर्वथा क्षय मान लेने पर काल का भी सर्वथा क्षय हो जाएगा क्योंकि व्ययसहित होने के प्रति दोनों समान हैं।

शंका-कुछ जीव भव्य होते हुए भी मोक्ष नहीं प्राप्त कर पाते हैं तो उनमें भव्यता कैसे मानी जा सकती है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि मुक्तिगमन की योग्यता की अपेक्षा उनके भव्यसंज्ञा मानी जाती है। किन्तु मोक्षगमन की योग्यता वाले सभी जीव नियम से कर्मकलंक से रहित होते हैं ऐसा कोई नियम नहीं है क्योंकि सर्वथा ऐसा मान लेने पर स्वर्णपाषाण से व्यभिचार आ जायेगा। कहा भी है-

गाथार्थ-एक निगोदिया जीव के शरीर में द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा सिद्धराशि से और सम्पूर्ण अतीतकाल से अनन्तगुणे जीव होते हैं। भव्यों से विपरीत अर्थात् मोक्षगमन की योग्यता न रखने वाले अभव्य जीव होते हैं। कहा भी है-

गाथार्थ-जिन जीवों की सिद्धि होने वाली है अथवा जो उसकी प्राप्ति के योग्य हों उन्हें भव्यसिद्ध कहते हैं और इनसे विपरीत अभव्य होते हैं। ये अभव्य जीव कभी संसार से निकलकर सिद्ध नहीं होते हैं। भव्य अर्थात् होने योग्य अथवा जिनकी सिद्धि-अनन्तचतुष्टयरूप आत्मस्वरूप की उपलब्धि भाविनी-होने वाली है ये जीव भव्यसिद्ध होते हैं। इससे सिद्धि की प्राप्ति और योग्यता के भेद से भव्यों के दो भेद कहे हैं। उक्त दोनों लक्षणों से रहित जीव अभव्य होते हैं। अतएव वे अभव्य जीव संसार से निकलकर सिद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं।


भव्यजीवानां गुणस्थानव्यवस्थाकथनार्थं सूत्रमवतरति-

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भवसिद्धिया एइंदिय-प्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति।।१४२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भव्यसिद्धा: जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य अयोगिकेवलिन: इति।
एवं भव्यानां कथनमुख्यत्वेन सूत्रद्वयं प्रथमस्थले गतं।
अधुना अभव्यानां गुणस्थाननिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
अभवसिद्धिया एइंदिय-प्पहुडि जाव सण्णि-मिच्छाइट्ठि त्ति।।१४३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अभव्यसिद्धा: जीवा: एकेन्द्रिय-प्रभृति यावत् संज्ञिमिथ्यादृष्टिपर्यन्ता: इति।
एवं भव्याभव्यलक्षणं ज्ञात्वा ‘वयं भव्या:’ इति श्रद्धधाना: रत्नत्रयमादाय स्वात्मोपलब्धि: कर्तव्या भवद्भि: इति।
एवं अभव्यजीवनिरूपणत्वेन एकं सूत्र गतम्।
इति षट्खण्डागमप्रथमखण्डे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकार समाप्त:।

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अब भव्यजीवों की गुणस्थानव्यवस्था कहने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

भव्यसिद्ध जीव एकेन्द्रिय से लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं।।१४२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय से प्रारंभ करके चौदहवें गुणस्थन तक के जीव भव्य सिद्ध होते हैं।

भावार्थ-एकेन्द्रिय जीवों में भी भव्यत्व संभव है। इसी प्रकार दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय आदि सभी जीवों में अपनी-अपनी पारिणामिक शक्ति के अनुसार भव्यत्व गुण रह सकता है। ये भव्यत्व और अभव्यत्व चूँकि पारिणामिक भाव हैं, प्राकृतिक योग्यता के आधार पर जीवों में यह अनादिकाल से पाये जाते हैं, इनकी प्राप्ति में किसी बाह्य पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं है।

जैसे नित्यनिगोदिया की एकेन्द्रिय पर्याय से प्रथम बार त्रस पर्याय में मनुष्य भव प्राप्त कर भरतचक्रवर्ती के नौ सो तेईस पुत्र जन्म से गूँगे होकर भी भगवान ऋषभदेव के समवसरण में पहुँचते ही बोल पड़े और वहीं दीक्षा लेकर उन सभी ने उसी भव से मोक्ष प्राप्त कर लिया। यह उनकी भव्यत्व शक्ति ही थी, जो एकेन्द्रियपर्याय में अव्यक्त थी और जीवन में प्रथम बार मनुष्य पर्याय प्राप्त करते ही वह शक्ति जागृत हो गई और मोक्ष प्राप्त कराने में निमित्त बन गई। इसी भव्यत्व परिणाम का कथन इस सूत्र में किया गया है कि एकेन्द्रिय जीवों से लेकर चौदहों गुणस्थान तक भव्यत्व शक्ति सुलभ है। इस प्रकार भव्यजीवों के कथन की मुख्यता से प्रथमस्थल में दो सूत्र पूर्ण हुए। अब अभव्यजीवों में गुणस्थानों का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

अभव्यसिद्ध जीव एकेन्द्रिय से लेकर संज्ञीमिथ्यादृष्टि गुणस्थान तक होते हैं।।१४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय जीवों को आदि में लेकर संज्ञीमिथ्यादृष्टि जीवों में प्रथम गुणस्थान तक अभव्यसिद्धपना पाया जाता है।

विशेषार्थ-

द्वितीय आदि गुणस्थानों में अभव्य जीव नहीं होते हैं, क्योंकि उनमें सभी के एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही पाया जाता है। यहाँ तक कि द्रव्यलिंगी मुनिपदधारी पुरुष भी यदि अभव्य हैं तो बाह्यनिर्दोष चारित्र का पालन करते हुए भी वे मिथ्यादृष्टि ही रहते हैं। ऐसे अभव्य मुनियों के बारे में ही कवियों ने कहा है कि-

कोटि जन्म तप तपैं ज्ञानबिन कर्म झरैं जे।
ज्ञानी के छिन माँहि त्रिगुप्ति तें सहज टरैं ते।।

अर्थात् वहाँ ज्ञान से सम्यग्ज्ञानरूप वीतरागविज्ञानता की ही अपेक्षा कथन है कि मिथ्यात्व सहित करोड़ों जन्म में किया गया तप भी मोक्षप्राप्तिरूप कर्मनिर्जरा नहीं करवा सकता है और सम्यक्त्वसहित सम्यग्ज्ञानी जीव सुलभता से ही कर्म नष्ट करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

सम्यग्दृष्टि जीव के लिए कोटि जन्मों तक तप करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है, क्योंकि उसके तो अधिक से अधिक सात-आठ भवों की सीमा निर्धारित हो जाती है। जैसा कि गौतम स्वामी के पाक्षिकप्रतिक्रमण सूत्र से भी स्पष्ट है कि-

‘‘उक्कस्सेण दो तिण्णि भवगहणाणि जहण्णेण सत्तट्ठभवगहणाणि तदो सुमणु-सुत्तादो सुदेवत्तं सुदेवत्तादो सुमाणुसत्तं तदो साइहत्था पच्छा णिग्गंथा होऊण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं करेंति।’’

यहाँ पूर्व से सम्यग्दृष्टि देशव्रती श्रावकों के प्रकरण में उपर्युक्त पंक्तियाँ कही गई हैं। इसके हिन्दी पद्यानुवाद में गणिनी ज्ञानमती माताजी ने लिखा है-

उत्कृष्टपने से दो त्रय भव व जघन्य से सात आठ भव लें।
फिर मानव से देवपद ले सुदेवपद से सुमनुजभव लें।।
फिर सद्गृहस्थ निर्ग्रन्थ मुनी हो सिद्ध-बुद्ध हो जाते हैं।
मुक्ती पाते कृतकृत्य बने सब दु:खों का क्षय करते हैं।।

अर्थात् सम्यग्दृष्टि भव्यजीवों की ऐसी प्रवृत्ति हुआ करती है तथा इससे विपरीत अभव्य जीवों को करोड़ों जन्म के तप के बावजूद भी मोक्ष नहीं मिलता है। इसी बात को पण्डित दौलतराम जी ने अन्य प्रकार से भी कहा है-

मुनिव्रतधार अनन्तबार ग्रीवक उपजायो।
पै निज आतमज्ञान बिना सुखलेश न पायो।।

यह कथन भी अभव्यजीवों में ही घटाना चाहिए क्योंकि अभव्य मिथ्यादृष्टि मुनिराज तपस्या करके नवग्रैवेयक तक जन्म धारण करते हैं, उससे आगे न तो वे अनुदिश और अनुत्तरों में जा सकते हैं तथा न मोक्ष ही प्राप्त कर सकते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि अभव्य जीव चाहे एकेन्द्रिय हों या पंचेन्द्रिय, इन सभी के एक मिथ्यादृष्टिगुणस्थान ही होता है। इस प्रकार भव्य-अभव्य जीवों के लक्षण जानकर ‘‘हम लोग भव्य हैं’’ ऐसी श्रद्धा करते हुए रत्नत्रय को ग्रहण करके आप लोगों को अपने आत्मतत्त्व की प्राप्ति करनी चाहिए।

इस तरह अभव्य जीवों का कथन करने वाला एक सूत्र हुआ।

इस प्रकार षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त चिंतामणि नाम की टीका में भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।