042.जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९९८

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जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर चातुर्मास-सन् १९९८

समाहित विषयवस्तु

१. चातुर्मास की स्थापना।

२. रक्षाबंधन पर्व सोत्साह मनाया गया।

३. माताजी के प्रवचन।

४. जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर हैं’’ इस भूल के निराकरण का सफल प्रयास-कुलपति सम्मेलन आहूत।

५. एतदर्थ माताजी ने साहित्य भी रचा-कहाँ है भूल?

६. बात शासन तक पहुँची, पाठ्य पुस्तकों में भूल का निराकरण।

७. शरद पूर्णिमा-माताजी की जन्मजयंती।

८. चातुर्मास का निष्ठापन-मेरठ को गमन।

९. कमलानगर में पंचकल्याणक।

१०. हापुड़ में प्रवचन।

११. गजपुर में ऋषभदेव संस्कार शिविर का आयोजन।

१२. चौधरी विश्वविद्यालय मेरठ में माताजी के प्रवचन।

१३. केलिफोर्निया से शोधार्थी का आगमन।

१४. भोजनशाला का शिलान्यास।

१५. अक्षय तृतीया-प्रथम बार इक्षुरस आहार का दृश्य दिखाया।

१६. सम्यग्ज्ञान की रजत जयंती मनी।

१७. माताजी का ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव हेतु दिल्ली प्रस्थान।

१८. प्रीत विहार में लघु पंचकल्याणक।

१९. चातुर्मास हेतु निवेदन।

काव्य पद

नाभिराय-मरुदेवी नंदन, आदिजिनेश्वर कर वंदन।

गणिनी प्रमुख, आर्यिका शिरोमणि, ज्ञानमती जी करूँ नमन।।
माताजी ने ऋषभदेव-सह, जैन धर्म का किया प्रकाश।
उनका जम्बूद्वीप स्थली, हुआ स्थापित चातुर्मास।।११५०।।

हस्तिनागपुर से ही होता, रक्षाबंधन पर्व शुरू।
सात शतक मुनियों की रक्षा, की थी वामन विष्णु गुरू।।
जम्बूद्वीप में गया मनाया, सोत्साह यह पर्व महान।
की सभक्ति मुनिवर की पूजन, सह-श्रेयांस लाडू निर्वाण।।११५१।।

गणिनी माता ज्ञानमती ने, प्रवचन में ये शब्द कहे।
करें धर्म-धर्मी की रक्षा, जब तक तन में प्राण रहे।।
तत्त्वार्थसूत्र-दशधर्मांगों पर, पर्वराज हुए प्रवचन।
माताजी श्री ज्ञानमती से, हुए उपकृत सब ही जन।।११५२।।

कालचक्र हो भेद रूप है, उत्सर्पिणि-अवसर्पिणि काल।
बीस-चार तीर्थंकर होते, बीस-चार दोनों ही काल।।
आदिनाथ पहले तीर्थंकर, अवसर्पिणि काल रहा वर्तमान।
जैन धर्म के वे संस्थापक, बतलाते हैं सकल पुराण।।११५३।।

अगर और गहराई जायें, हुर्इं चौबीसी अनंतानंत।
आगे भी होंगी ऐसी ही, भविष्यकाल का कोई न अंत।।
जैनधर्म जन धर्म है ऐसा, कोई नहीं समझाता है।
वस्तु तत्त्व ज्ञान में झलका, सर्वज्ञ तथा बतलाता है।।११५४।।

पर साधारण जनता इसको, अब तक जान न पाती है।
महावीर को जैनधर्म का, संस्थापक बतलाती है।।
वर्तमान में स्कूलों में, यही पढ़ाया जाता है।
जैनधर्म प्राचीन बहुत, इसको झुठलाया जाता है।।११५५।।

भूल आज की नहीं बंधु यह, समय बहुत सा बीत गया।
लेकिन इस गलती के ऊपर, नहीं किसी का ध्यान गया।।
सोती रही समाज नींद में, परवाह न की बुधवानों ने।
बालक पढ़ते रहे झूठ, कुछ सोचा नहीं जवानों ने।।११५६।।

साधू-साध्वी मौन न तोड़ा, गले में घण्टी बाँधे कौन।
नेता रहे पराङ्मुख इससे, चलता रहा सभी कुछ मौन।।
गणिनी माता ज्ञानमती ने, हमें जगाया पहली बार।
शासनकाल आवाज लगाई, कर लो जल्दी भूल-सुधार।।११५७।।

एतदर्थ पूज्याश्री माता, सम्मेलन आहूत किया।
अखिल देश के कुलपतियों को, एक छत्र एकत्र किया।।
ऋषभदेव भगवान नाम था, सम्मेलन का रखा गया।
हर संभव प्रयास माँ द्वारा, भूल मिटाने किया गया।।११५८।।

चार अक्टूबर सन् अट्ठानवै, सम्मेलन प्रारंभ हुआ।
कुलपति-प्रोफेसर-विद्वानों, महाकुम्भ प्रारंभ हुआ।।
प्रथमबार ही किया गया यह, इतना उत्तम ठोस प्रयास।
शुभाशीष लेने सब आये, माताजी के चरणों पास।।११५८।।

माताजी साहित्य रचा बहु, उत्तम ग्रंथ, जैन इतिहास।
किया समर्पित कुलपतियों को, कहाँ है भूल जताने खास।।
विदुषी माँ ने कई उद्धरण, संग्रहीत कर वेद-पुराण।
जैन धर्म के संस्थापक हैं, पुराण पुरुष ऋषभ भगवान।।११५९।।

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव हैं, तीर्थंकर अंतिम महावीर।
संस्थापक तो ऋषभदेव हैं, व्याख्याता हैं श्री महावीर।।
मान्य किया यह कुलपतियों ने, पहुँचाई शासन तक बात।
भूल सुधारी पाठ्य पुस्तकों, यह सम्मेलन की सौगात।।११६०।।

कुलपति सम्मेलन मंचन से, सत्य बात सम्मुख आई।
माताजी की सूझबूझ से, पुरानी भूल सुधर पाई।।
पूज्याश्री के श्रीचरणों में, करके बारम्बार प्रणाम।
सभी पधारे अपने गृह को, हम भी लेते अल्प विराम।।११६१।।

शरदपूर्णिमा की तिथि आई, पूरनचंद गगन आया।
माताजी का जन्म महोत्सव, सबके मन प्रमोद लाया।।
विनयांजलि में माताजी प्रति, सबने किये प्रकट उद्गार।
सौ-सौ वर्ष जियें माताजी, करती रहें स्व-पर उपकार।।११६२।।

चातुर्मास हुआ निष्ठापित, हुआ पिच्छिका परिवर्तन।
संघ सहित श्रीमाताजी ने, मेरठ को कर दिया गमन।।
चौबिस-बीस कमलों के ऊपर, हुर्इं विराजित प्रतिमाएँ।
कमलानगर पंचकल्याणक, शोभा हम किस विध गाएँ।।११६३।।

हापुड़ के पापड़ हैं प्रसिद्ध, मेरठ से हापुड़ गमन किया।
इस जीव ने न जाने कितने, पापड़ बेले, मन शमन किया।।
पद प्रक्षालनपूर्वक पुष्पवृष्टि, आरती उतारी संघ सकल।
भीषण सर्दी के बावजूद, भक्तों की भीड़ रही अविरल।।११६४।।

माता के मुख से वचन खिरे, पंच पाप को छोड़ें हम।
हम बँध कर्म के बंधन से, तप-त्याग से उनको तोड़ें हम।।
हापुड़ से लौटा संघ सकल, फिर जम्बूद्वीप में पधराया।
ऋषभदेव संस्कार शिविर के, आयोजन का अवसर आया।।११६५।।

परम पूज्य माताजी ने जब, मेरठ नगर प्रवास किया।
तब चौधरी विश्वविद्यालय में, माताजी शुभ आशीष दिया।।
पूज्याश्री की सन्निधि में, इक संगोष्ठी सम्पन्न हुई।
माताजी के उद्बोधन से, संगोष्ठी शोभावृद्धि हुई।।११६६।।

यात्रीगण की सुविधा लखकर, भोजनशाला भवन विशाल।
शिलान्यास किया माँ सन्निधि, श्रेष्ठी नेमिकुमार शुभकाल।।
जम्बूद्वीप के दर्शन करने, यात्री आते देश-विदेश।
छात्रा आई सेरीफोर मिस, केलिफोर्निया यहाँ विशेष।।११६७।।

द्वादश दिवस रही माँ चरणों, खोज लिखा यहाँ शोध विषय।
शोधपत्र में किया आपने, माँ उल्लेख सह महा विनय।।
जम्बूद्वीप में गया मनाया, अक्षय तृतिया का त्यौहार।
प्रथमबार गया दृश्य दिखाया, आदिनाथ का इक्षु आहार।।११६८।।

सम्यग्ज्ञान पत्रिका मासिक, पूर्ण हुए पच्चीस सु वर्ष।
रजत जयंती अंक विमोचित, हुआ देहली नगर सहर्ष।।
आचार्यश्री धर्मसागर जी, कर कमलों सम्पन्न हुआ।
लख सज्जा, सामग्री उत्तम, सबका हृदय प्रसन्न हुअा।।११६९।।

माताजी श्री ज्ञानमती का, इंद्रप्रस्थ को हुआ विहार।
ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव, को करने का किया विचार।।
ऋषभदेव हैं जैनधर्म के, आदि तीर्थंकर, पुरुष पुराण।
लेकिन नहीं जानती जनता, नहीं जानते हैं विद्वान्।।११७०।।

माताजी दिल्ली पधरार्इं, बनी महोत्सव समिति विशाल।
किया स्वयं के संघ सानिध्य में, ऋषभदेव मेला भी विशाल।।
प्रीतविहार कमल मंदिर में, हुए लघु-पंचकल्याणक।
सरस्वती पूजन-आराधन, विमोचन यागमंडल विधान।।११७१।।

दिल्ली के कोने-कोने से, आये प्रतिनिधि खासम खास।
सविनय किए समर्पित श्रीफल, किया निवेदन चातुर्मास।।
राजा बाजार कनाट प्लेस में, चातुर्मास किया स्वीकार।
माताजी के सन्निधान में, हुआ सर्वत्र धर्म प्रचार।।११७२।।