043.बारहवाँ अधिकार - सम्यक्त्व मार्गणा के छह भेद है.......

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बारहवाँ अधिकार - सम्यक्त्व मार्गणा के छह भेद है

अथ सम्यक्त्वमार्गणाधिकार:

अथ षड्भि: स्थलै: अष्टाविंशतिसूत्रै: सम्यक्त्वमार्गणानाम द्वादशोऽधिकार: कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यसम्यक्त्व-त्रिविधसम्यक्त्वनिरूपणत्वेन ‘‘सम्मत्ताणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु द्वितीयस्थले सासादनादित्रयाणां कथनमुख्यत्वेन ‘‘सासाण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं तृतीयस्थले नरकगतिनारकेषु सम्यक्त्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘णेरइया’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले तिर्यक्षु सम्यक्त्वकथनत्वेन ‘‘तिरिक्खा’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। तदनंतरं पंचमस्थले मनुष्येषु सम्यग्दर्शननिरूपणत्वेन ‘‘मणुस्सा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तत: परं देवेषु सम्यग्दर्शनव्यवस्थामुख्यत्वेन ‘‘देवा’’ इत्यादिसूत्राणि षट्, इति समुदायपातनिका।
अथ सम्यक्त्वमार्गणानिरूपणार्थं सूत्रावतार: क्रियते-
सम्मत्ताणुवादेण अत्थि सम्माइट्ठी खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी मिच्छाइट्ठी चेदि।।१४४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यक्त्वानुवादेन सामान्यसम्यग्दृष्टि: क्षायिकसम्यग्दृष्टि: वेदकसम्यग्दृष्टि: उपशमसम्यग्दृष्टि: सासादनसम्यग्दृष्टि: सम्यग्मिथ्यादृष्टि: मिथ्यादृष्टिश्चेति।
सम्यक्त्वमार्गणायां कथं मिथ्यादृष्टे: ग्रहणम् ?
आम्रवनान्त:स्थनिम्बानां आम्रवनव्यपदेशवत् मिथ्यात्वादीनां सम्यक्त्वव्यपदेशो न्याय्य:।
अधुना सम्यग्दर्शनानां लक्षणमुच्यते-
छप्पंच-णव-विहाणं अत्थाणं जिणवरोवइट्ठाणं।
आणाए अहिगमेण व सद्दहणं होइ सम्मत्तं।।२१२।।
खीणे दंसण-मोहे जं सद्दहणं सुणिम्मलं होई।
तं खाइय-सम्मत्तं णिच्चं कम्म-क्खवण-हेऊ।।२१३।।
वयणेहि वि हेऊहि वि इंदिय-भय-आणएहि रूवेहि।
वीहच्छ-दुगुंछाहि ण सो ते-लोक्केण चालेज्ज।।२१४।।
दंसणमोहुदयादो उप्पज्जइ जं पयत्थसद्दहणं।
चल-मलिणमगाढं तं वेदग-सम्मत्तमिह मुणसु।।२१५।।
दंसणमोहुवसमदो उप्पज्जइ जं पयत्थ-सद्दहणं।
उवसंत-सम्मत्तमिणं पसण्ण-मल-पंक तोय-समं।।२१६।।
अधुना सामान्यसम्यग्दर्शन-क्षायिकसम्यग्दर्शनस्वरूपगुणस्थाननिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सम्माइट्ठी खइयसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठि-प्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति।।१४५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्येन सम्यग्दृष्टय: विशेषापेक्षया क्षायिकसम्यग्दृष्टयश्च जीवा: असंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानादारभ्य अयोगिकेवलिपर्यंता: भवन्ति।
किं तत्सम्यक्त्वगतसामान्यमिति चेत् ?
त्रिष्वपि सम्यग्दर्शनेषु य: साधारणोंऽश: तत्सामान्यम्।
क्षायिकक्षायोपशमिकौपशमिकेषु परस्परतो भिन्नेषु किं सादृश्यमिति चेत् ?
न, तत्र त्रिष्वपि यथार्थश्रद्धानं प्रति साम्योपलंभात्।

अथ सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

अब छह स्थलों में अट्ठाईस सूत्रों के द्वारा सम्यक्त्वमार्गणा नामक बारहवाँ अधिकार कहा जाता है। उसमें प्रथमस्थल में सामान्य सम्यक्त्व तथा तीन प्रकार के सम्यग्दर्शनों का निरूपण करने वाले ‘‘सम्मत्ताणुवादेण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीयस्थल में सासादन आदि तीन सम्यक्त्वों के कथन की मुख्यता से ‘‘सासण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उससे आगे तृतीयस्थल में नरकगति के नारकी जीवों में सम्यक्त्व का प्रतिपादन करने वाले ‘‘णेरइया’’ इत्यादि पाँच सूत्र कहेंगे। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में तिर्यंच जीवों में सम्यक्त्व का कथन करने वाले ‘‘तिरिक्खा’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। तदनन्तर पंचमस्थल में मनुष्यों में सम्यग्दर्शन का निरूपण करने वाले ‘‘मणुस्सा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके बाद देवों में सम्यग्दर्शन की व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले ‘‘देवा’’ इत्यादि छह सूत्र हैं, यह सम्यक्त्वमार्गणा के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई। अब सम्यक्त्वमार्गणा का कथन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणा के कथन द्वारा सामान्य सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीव होते हैं।।१४४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यक्त्वमार्गणा में सभी प्रकार के सम्यग्दृष्टि तथा मिथ्यादृष्टि जीवों का कथन किया जाता है।

शंका-सम्यक्त्वमार्गणा में मिथ्यादृष्टि जीवों का ग्रहण कैसे हो सकता है ?

समाधान-जिस प्रकार आम्रवन के भीतर रहने वाले नीम के वृक्षों को आम्रवन यह संज्ञा प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार मिथ्यात्व आदि को सम्यक्त्व यह संज्ञा देना उचित ही है। अब सम्यग्दर्शनों के लक्षण का कथन किया जाता है-

गाथार्थ-

जिनेन्द्रदेव के द्वारा उपदिष्ट छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय और नव पदार्थों का आज्ञा अथवा अधिगम से श्रद्धान करने को सम्यक्त्व कहते हैं।।२१२।।

दर्शनमोहनीय कर्म के सर्वथा क्षय हो जाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है वह क्षायिक सम्यक्त्व है, जो नित्य है और कर्मों के क्षपण का कारण है।।२१३।।
श्रद्धान को भ्रष्ट करने वाले वचन या हेतुओं से अथवा इन्द्रियों को भय उत्पन्न करने वाले आकारों से या वीभत्स अर्थात् निन्दित पदार्थों के देखने से उत्पन्न हुई ग्लानि से तथा और अधिक क्या कहा जाये तीन लोक से भी वह क्षायिक सम्यग्दर्शन चलायमान नहीं होता है।।२१४।।
सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृति के उदय से पदार्थों का जो चल, मलिन और अगाढ़रूप श्रद्धान होता है उसको वेदकसम्यग्दर्शन कहते हैं ऐसा हे शिष्य तू समझ।।२१५।।
दर्शनमोहनीय के उपशम से कीचड़ के नीचे बैठ जाने से निर्मल जल के समान पदार्थों का जो निर्मल श्रद्धान होता है वह उपशमसम्यग्दर्शन है।।२१६।।

अब सामान्यसम्यग्दर्शन एवं क्षायिकसम्यग्दर्शन का स्वरूप तथा उनके गुणस्थानों का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सामान्य से सम्यग्दृष्टि और विशेष की अपेक्षा क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं।।१४५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्थान से लेकर चौदहवें अयोगकेवली गुणस्थान तक सामान्यरूप से सम्यग्दृष्टि जीव तथा विशेष की अपेक्षा क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव होते हैं

शंका'-सम्यक्त्व में रहने वाली वह सामान्य नाम की कौन-सी वस्तु है ?

समाधान-तीनों ही सम्यग्दर्शनों में जो साधारण धर्म है वह सामान्य शब्द से यहाँ जाना जाता है।

शंका-क्षायिक, क्षायोपशमिक और औपशमिक सम्यग्दर्शनों के परस्पर भिन्न-भिन्न होने पर सदृशता क्या वस्तु हो सकती है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उन तीनों सम्यग्दर्शनों में यथार्थ श्रद्धान के प्रति समानता पाई जाती है।

संप्रति वेदकसम्यग्दर्शनगुणस्थानव्यवस्थानिरूपणार्थं सूत्रमवतरति-

वेदगसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठि-प्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदा त्ति।।१४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वेदकसम्यग्दृष्टय: असंयतसम्यग्दृष्टेरारभ्य अप्रमत्तसंयतपर्यंता: इति।
उपरितनगुणस्थानेषु एतत्सम्यग्दर्शनं कथं नास्ति ?
अगाढ-समल-श्रद्धानेन सह क्षपकोपशमश्रेण्यारोहणानुपपत्ते: नैतत् सम्यक्त्वं सप्तमगुणस्थानादुपरि इति ज्ञातव्यं।
वेदकसम्यक्त्वादौपशमिकसम्यक्त्वस्य कथमाधिक्यं ?
न, दर्शनमोहोदयजनितशैथिल्यादेस्तत्रासत्त्वतस्तदाधिक्योपलंभात्।
क्षायोपशमिकसम्यग्दर्शनस्यैव वेदकनाम। दर्शनमोहवेदको वेदक:, तस्य सम्यग्दर्शनस्य वेदक-सम्यग्दर्शनम् नाम इति।
अधुना औपशमिकसम्यग्दर्शनगुणस्थाननिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
उवसमसम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्ठि-प्पहुडि जाव उवसंतकसायवीयराय-छदुमत्था त्ति।।१४७।।'
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशमसम्यग्दृष्टय: असंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानादारभ्य एकादशगुणस्थान-नामोपशान्तकषायवीतरागछद्मस्था: इति।
एवं प्रथमस्थले सम्यक्त्वभेदनिरूपणत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
सासादनसम्यग्दृष्टिव्यवस्थाप्रतिपादनाय सूत्रावतार: क्रियते-
सासणसम्माइट्ठी एक्कम्मि चेय सासणसम्माइट्ठि-ट्ठाणे।।१४८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सासादनसम्यग्दृष्टय: एकस्मिन् चैव सासादनसम्यग्दृष्टिगुणस्थाने सन्ति नान्यत्र एवं ज्ञातव्यं। अन्यच्च एतद्गुणस्थानं चतुर्गतिष्वपि संभवति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टिव्यवस्थानिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सम्मामिच्छाइट्ठी एक्कम्मि चेय सम्मामिच्छाइट्ठि-ट्ठाणे।।१४९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टय: एकस्मिन् चैव सम्यग्मिथ्यादृष्टिगुणस्थाने सन्ति। एतद्गुणस्थानं जात्यन्तरप्रकृति-उदयेन मिश्रं वर्तते। एतदपि चतुर्गतिषु भवति।
मिथ्यादृष्टिगुणस्थानव्यवस्थानिरूपणाय सूत्रावतार: क्रियते-
मिच्छाइट्ठी एइंदिय-प्पहुडि जाव सण्णिमिच्छाइट्ठि त्ति।।१५०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टयो जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य संज्ञिमिथ्यादृष्टय: सन्तीति।
एतेषु त्रिष्वपि गुणस्थानानां लक्षणं वक्तव्यं चेत् ? तर्हि उच्यते
ण य मिच्छत्तं पत्तो सम्मत्तादो य जो दु परिवदिदो।
सो सासणो त्ति णेयो सादिय मध पारिणामिओ भावो।।२१७।।
सद्दहणासद्दहणं जस्स य जीवस्स होइ तच्चेसु।
विरदाविरदेण समो सम्माम्मिच्छो त्ति णादव्वो।।२१८।।
ण वि जायइ ण वि मरइ ण वि सुद्धो ण वि य कम्म-उम्मुक्को।
चउगइमज्झत्थे वुण रागाइ-समण्णियो जीवो।।२१९।।
तिण्णि जणा एक्केक्कं दोद्दो णेच्छंति ते तिवग्गा य।
एक्को तिण्णि ण इच्छइ सत्त वि पावंति मिच्छत्तं।।२२०।।
एवं सासादनादिषु सासादनसम्यक्त्वादिकथनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अधुना नरकगतौ सम्यक्त्वमार्गणाकथनाय सूत्रमवतरति-

णेरइया अत्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असंजद-सम्माइट्ठि त्ति।।१५१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नारका: मिथ्यादृष्टि-सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टयश्च सन्तीति।
अथ गतिनिरूपणायां अस्यां गतौ इयन्ति गुणस्थानानि इति निरूपितत्वात् अनर्थकमिदं सूत्रम् ?

नैतत्, विस्मृतपूर्वोक्तार्थस्य प्रतिपाद्यस्य शिष्यस्य तमर्थं संस्मार्य तत्र तत्र गतौ सम्यग्दर्शनभेदप्रतिपादन-प्रवणत्वात्।


अब वेदकसम्यग्दर्शन में गुणस्थान व्यवस्था का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक होते हैं।।१४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थ गुणस्थान से लेकर सातवें गुणस्थान पर्यन्त वेदकसम्यग्दृष्टि जीव पाये जाते हैं।

शंका-इससे ऊपर के गुणस्थानों में यह वेदकसम्यग्दर्शन क्यों नहीं होता है ?

समाधान-क्योंकि अगाढ़ आदि मलसहित श्रद्धान के साथ क्षपक और उपशम श्रेणी का चढ़ना नहीं बनता है अत: यह वेदकसम्यग्दर्शन सप्तम गुणस्थान से आगे नहीं हो सकता है ऐसा जानना चाहि

शंका-वेदकसम्यग्दर्शन से औपशमिक सम्यग्दर्शन की अधिकता अर्थात् विशेषता कैसे संभव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि दर्शनमोहनीय के उदय से उत्पन्न हुई शिथिलता आदि औपशमिक सम्यग्दर्शन में नहीं पाई जाती है, इसलिए वेदकसम्यग्दर्शन से औपशमिकसम्यग्दर्शन में विशेषता सिद्ध हो जाती है।

क्षायोपशमिकसम्यग्दर्शन को ही वेदकसम्यग्दर्शन कहा जाता है। दर्शनमोहनीय कर्म के उदय का वेदन करने वाले जीव को वेदक कहते हैं और उसके जो सम्यग्दर्शन होता है उसे वेदकसम्यग्दर्शन कहते हैं।

अब औपशमिक सम्यग्दर्शन में गुणस्थानों का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

उपशमसम्यग्दृष्टि जीव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर उपशान्तकषायवीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक होते हैं।।१४७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थगुणस्थान से प्रारंभ करके ग्यारहवें गुणस्थान तक उपशमसम्यग्दृष्टि जीवों की सत्ता पाई जाती है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सम्यक्त्व के भेदों का निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों की व्यवस्था का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि जीव एक सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में ही होते हैं।।१४८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकमात्र द्वितीय गुणस्थान में ही सासादनसम्यग्दृष्टि जीव रहते हैं। अन्य गुणस्थानों में उनका अस्तित्व नहीं पाया जाता है एवं चारों गतियों मेें भी यह गुणस्थान पाया जाता है। अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि की व्यवस्था बताने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव एक सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में ही होते हैं।।१४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यग्मिथ्यादृष्टि नाम वाला जो तृतीय गुणस्थान है वहीं पर सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव पाये जाते हैं। क्योंकि इस गुणस्थान में जीवों की जो श्रीखण्ड के समान मिश्रित अवस्था रहती है वह अन्य गुणस्थानवर्ती जीवों के नहीं होती है। जात्यन्तरप्रकृति के उदय से इसका नाम मिश्रगुणस्थान है, यह गुणस्थान भी चारों गतियों में होता है।

अब मिथ्यादृष्टिगुणस्थान की व्यवस्था का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

मिथ्यादृष्टि जीव एकेन्द्रिय से लेकर संज्ञीमिथ्यादृष्टि तक होते हैं।।१५०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एक इन्द्रिय से लेकर संज्ञीमिथ्यादृष्टि तक सभी जीव मिथ्यादृष्टि संज्ञा से युक्त होते हैं।

इन तीनों गुणस्थानों का लक्षण कहना चाहिए ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-


गाथार्थ-जो सम्यक्त्व से गिरकर मिथ्यात्व को नहीं प्राप्त हुआ है उसे सासादन सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए। यह गुणस्थान सादि और पारिणामिक भाव वाला है।।२१७।।


जिस जीव के जीवादिक तत्त्वों में श्रद्धान और अश्रद्धानरूप भाव है उसे विरताविरत के समान सम्यग्मिथ्यादृष्टि जानना चाहिए।।२१८।।

वह न जन्म लेता है, न मरता है, न शुद्ध होता है, और न कर्म से उन्मुक्त होता है किन्तु वह रागादि से युक्त होकर चारों गतियों में पाया जाता है।।२१९।।

ऐसे तीन व्यक्ति जो सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीनों में से किसी एक-एक को स्वीकार नहीं करते, दूसरे कोई तीन पुरुष इन तीनों में से दो-दो को स्वीकार नहीं करते तथा कोई ऐसा भी जीव हो जो तीनों को मोक्षमार्ग के लिए स्वीकार नहीं करता, ये सातों जीव मिथ्यात्वी हैं।।२२०।।

इस प्रकार सासादन आदि गुणस्थानों में सासादनसम्यक्त्व आदि का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए। अब नरकगति में सम्यक्त्वमार्गणा का कथन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

नारकी जीव मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथम गुणस्थान से लेकर चतुर्थ गुणस्थान तक नारकी जीव होते हैं। अर्थात् पंचम आदि आगे के गुणस्थान उनमें नहीं पाये जाते हैं।

'शंका-गतिमार्गणा का निरूपण करते समय ‘‘इस गति में इतने गुणस्थान होते हैं’’ यह कथन तो कर ही चुके हैं इसलिए यहाँ इस सूत्र का अलग से कथन करना व्यर्थ ही है ?

समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि जो शिष्य पूर्वोक्त अर्थ भूल गया है उसके लिए उस अर्थ का पुन: स्मरण दिलाकर उन-उन गतियों में सम्यग्दर्शन के भेदों का प्रतिपादन करने में यह सूत्र समर्थ है।


सप्तसु पृथिवीषु सम्यग्दर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-

एवं जाव सत्तसु पुढवीसु।।१५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सप्तसु पृथिवीषु इमानि चत्वार्यपि गुणस्थानानि भवन्तीति ज्ञातव्यं।
अधुना नरकेषु सम्यग्दर्शनव्यवस्थां व्यवस्थापयत्सूत्रद्वयमवतरति-
णेरइया असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी चेदि।।१५३।।
एवं पढमाए पुढवीए णेरइया।।१५४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति। पूर्वोक्त-त्रीण्यपि सम्यग्दर्शनानि प्रथमायां पृथिव्यामेव भवन्तीति।
द्वितीयादिषु पृथिवीषु सम्यग्दर्शनप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
विदियादि जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइया असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे खइयसम्माइट्ठी णत्थि, अवसेसा अत्थि।।१५५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-द्वितीयादिपृथिवीभ्य: आरभ्य सप्तमायां पृथिव्यां यावत् नारका: असंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दृष्टयो न सन्ति अवशेषा: द्विभेदा: सम्यग्दृष्टय: सन्ति।
तत्रस्था: सन्त: नारका: सप्तप्रकृती: किमिति न क्षपयन्तीति चेत् ?
न, तत्र जिनानामभावात्। केवलिश्रुतकेवलिपादमूलेषु एव सप्तप्रकृतीनां क्षपणं आगमे प्रतिपादितत्वात्।
एवं नरकगतौ सम्यक्त्वनिरूपणत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।
अधुना तिर्यग्गतौ सम्यक्त्वप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
तिरिक्खा अत्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असंजद-सम्माइट्ठी संजदासंजदा त्ति।।१५६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिपंचगुणस्थानानि सन्ति।
संन्यस्तशरीरत्वात् त्यक्ताहाराणां तिरश्चां किमिति संयमो न भवेदिति चेत् ?
न, अन्तरङ्गाया: सकलनिवृत्तेरभावात्।
किमिति तदभावश्चेत् ?
जातिविशेषात्। यस्यां जातौ ते उत्पन्नास्तत्र संयमो नास्तीति।
तिरश्चामस्तित्वं क्वपर्यंतं ? इति प्रश्ने सति सूत्रमवतरति-
एवं जाव सव्व-दीव-समुद्देसु।।१५७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एवं प्रकारेण यावत् सर्वद्वीपसमुद्रेषु तिर्यञ्च: सन्ति, तेषां गुणस्थानानि अपि पंच।
कश्चिदाह-स्वयंप्रभादारान्मानुषोत्तरात्परतो भोगभूमिसमानत्वान्न तत्र देशव्रतिन: सन्ति, तत एतत्सूत्रं न घटते ?
नेदृशं, वैरसंबंधेन देवैर्दानवैर्वा उत्क्षिप्य क्षिप्तानां देशव्रतीनां सर्वत्र सत्त्वाविरोधात्।
तत्रैव गतौ सम्यग्दर्शनविशेषप्रतिपादनार्थं सूत्रावतारो भवति-
तिरिक्खा असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी।।१५८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यञ्च: चतुर्थगुणस्थाने त्रिविधा: अपि सम्यग्दृष्टय: सन्ति। भोगभूम्यपेक्षया क्षायिकसम्यक्त्वं ज्ञातव्यमिति। कर्मभूमौ केचिन्मनुष्या: बद्धायुष्का: क्षायिकसम्यक्त्वमुत्पाद्य भोगभूमावैव जायन्ते न च कर्मभूमौ इति।
तिरश्चां कर्मभूमिषु सम्यक्त्वव्यवस्थां व्यवस्थापयत्सूत्रमवतरति-
तिरिक्खा संजदासंजद-ट्ठाणे खइयसम्माइट्ठी णत्थि अवसेसा अत्थि।।१५९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यञ्च: पंचमगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दृष्टयो न सन्ति, द्विविधा: सन्तीति। कर्मभूमिजत्वात्।
तिर्यक्षु क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संयतासंयता: किमिति न सन्ति ?
न सन्ति, क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां भोगभूमिमन्तरेणोत्पत्तेरभावात्। न च भोगभूमौ उत्पन्नानां अणुव्रतोपादानं सम्भवति तत्र तद्विरोधात्।
पंचेन्द्रियतिरश्चां सम्यक्त्वकथनाय सूत्रावतार: क्रियते-
एवं पंचिंदिय-तिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्ख-पज्जत्ता।।१६०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अनेन प्रकारेण पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्ता: पंचमगुणस्थानपर्यंता: भवन्तीति।
स्त्रीवेदधारकतिरश्चीषु सम्यक्त्वगुणस्थानव्यवस्थां व्यवस्थापयता आचार्येण सूत्रावतार: क्रियते-
पंचिंदिय-तिरिक्ख-जोणिणीसु असंजदसम्माइट्ठि-संजदासंजद-ट्ठाणे खइयसम्माइट्ठी णत्थि, अवसेसा अत्थि।।१६१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनीषु असंयतसम्यग्दृष्टिनामचतुर्थगुणस्थाने, संयतासंयतनाम-पंचमगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दृष्टयो न सन्ति अवशेषा: द्विविधा: सम्यग्दृष्टय: सन्तीति।
तत्र योनिनीतिरश्चीषु क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां उत्पत्तिर्नास्ति, दर्शनमोहनीयस्य क्षपणं चापि नास्ति इति।
एवं तिर्यग्गतौ सम्यग्दर्शनव्यवस्थाप्रतिपादनत्वेन षट् सूत्राणि गतानि।
संप्रति मनुष्यगतौ सम्यक्त्वव्यवस्थां व्यवस्थापयत्सूत्रमवतरति-
मणुसा अत्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असंजद-सम्माइट्ठी संजदासंजदा संजदा त्ति।।१६२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनुष्या: प्रथमगुणस्थानादारभ्य अयोगिकेवलिगुणस्थानपर्यंता: भवन्ति।
कियत्सु द्वीपसमुद्रेषु ? इति प्रश्ने सूत्रमवतरति-
एवमड्ढाइज्ज-दीव-समुद्देसु।।१६३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एवंविधिना सार्धद्वयद्वीपेषु द्वयसमुद्रेषु मनुष्या: चतुर्दशगुणस्थानवर्तिनो भवन्ति।
कश्चिदाह-वैरसंबंधेन क्षिप्तानां संयतानां संयतासंयतानां च सर्वद्वीपसमुद्रेषु संभवो भवतु इति चेत् ?
तस्य समाधानं ददाति-नैतादृशं, मानुषोत्तरात्परतो देवप्रयोगतोऽपि मानुषाणां गमनाभावात्।
अस्मिन् सूत्रे अर्धतृतीयशब्देन किमु द्वीपो विशेष्यते उत समुद्र उत द्वावपि इति ?
नान्त्योपान्त्यविकल्पौ मानुषोत्तरात्परतोऽपि मनुष्याणामस्तित्वप्रसंगात्। अत एव द्वीपो विशेष्यते। सार्धद्वयद्वीपेषु एव मनुष्याणामस्तित्वं नाग्रे। तत: सामथ्र्यात् द्वयो: समुद्रयो: सन्तीत्यनुक्तमप्यवगम्यते। किंच मानुषोत्तरपर्वतस्यांत: एव समुद्रयो: ग्रहणं न्याय्यं न च तस्मात् परत: इति।
संप्रति मनुष्याणां सम्यग्दर्शनभेदप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-
मणुसा असंजदसम्माइट्ठि-संजदासंजद-संजद-ट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदयसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी।।१६४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनुष्या: चतुर्थपंचमषष्ठसप्तमगुणस्थानेषु त्रिविधा: सम्यग्दृष्टय: सन्ति। तत: परं चतुर्थगुणस्थानादारभ्य उपशांतकषायगुणस्थानपर्यंतेषु द्विविधा: सम्यग्दृष्टय: ततश्च असंयतसम्यग्दृष्टेरारभ्य अयोगिकेवलिपर्यंतेषु संयतसंज्ञेषु एकं क्षायिकसम्यक्त्वमेवेति।
एतादृशी व्यवस्था अन्यत्र क्व क्व अस्ति ? इति प्रश्ने सूत्रमवतरति-
एवं मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसु।।१६५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एवमेव पूर्वोक्तव्यवस्था पर्याप्तमनुष्याणां भाववेदसहितमानुषीणां चास्ति। अत्रापि चतुर्दशगुणस्थानानि त्रिविधानि सम्यक्त्वानि च भवन्तीति।
एवं मनुष्यगतौ सम्यग्दर्शनप्रतिपादनत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
संप्रति देवगतौ सम्यक्त्वव्यवस्थां व्यवस्थापयत्सूत्रमवतरति-
देवा अत्थि मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी असंजदसम्माइट्ठि त्ति।।१६६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवा: मिथ्यादृष्टि-सासादन-मिश्र-असंयतगुणस्थानवर्तिनो भवन्तीति। देवाश्चतुर्णिकाया: भवनवासिव्यंतरज्योतिष्कवैमानिका:। अत्र सर्वेऽपि गृह्यन्ते।


अब सातों पृथिवियों में सम्यग्दर्शन का कथन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार सातों पृथिवियों में प्रारंभ के चार गुणस्थान होते हैं।।१५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथम नरक से लेकर सातवें नरक तक समस्त नरक पृथिवियों में आदि के चार गुणस्थान ही हो सकते हैं, अन्य नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि चार में से कोई भी गुणस्थान नारकियों के हो सकता है, उससे आगे वे नारकी देशसंयम अथवा सकलसंयमरूप परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते हैं इसीलिए उनके पंचम आदि गुणस्थान नहीं माने गये हैं। अब नरकों में सम्यग्दर्शन की व्यवस्था को बतलाते हुए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

नारकी जीव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१५३।।

इसी प्रकार प्रथम पृथिवी में नारकी जीव होते हैं।।१५४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सूत्रों का अर्थ सुगम है। अर्थात् नरकों में औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक ये तीनों ही सम्यग्दर्शन पाये जाते हैं। इनमें से क्षायिक सम्यग्दर्शन तो मनुष्य की पूर्व पर्याय से लेकर आने वाले नारकियों के प्रथम नरक तक ही हो सकता है एवं औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन नरक में भी विभिन्न कारणों से उत्पन्न हो सकता है।

पूर्वोक्त तीनों प्रकार के सम्यग्दर्शन प्रथम पृथिवी में ही हो सकते हैं।

द्वितीयादि पृथिवियों में सम्यग्दर्शन का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

दूसरी पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक नारकी जीव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि नहीं होते हैं, शेष बचे दो सम्यग्दर्शनों से युक्त होते हैं।।१५५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दूसरी से सातवीं पृथिवी तक समस्त नारकी जीव चतुर्थगुणस्थान में केवल दो सम्यक्त्व को प्राप्त करते हैं क्योंकि उन नरकों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि नहीं होते हैं।

शंका-वहाँ रहने वाले नारकी जीव सात प्रकृतियों का क्षय क्यों नहीं कर पाते हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वहाँ जिनेन्द्रों का अभाव पाया जाता है। उस क्षायिक सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने के लिए केवली और श्रुतकेवली के पादमूल में ही सात प्रकृतियों का क्षपण किया जाता है ऐसा आगम में कथन आया है।

इस प्रकार नरकगति में सम्यक्त्व का निरूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

अब तिर्यंचगति में सम्यक्त्व का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच जीव मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत होते हैं।।१५६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंच जीवों में मिथ्यादृष्टि आदि प्रारंभिक पाँच गुणस्थान होते हैं।

शंका-शरीर से संन्यास ग्रहण कर लेने के कारण जिन्होंने आहार का त्याग कर दिया है ऐसे तिर्यंचोें के संयम क्यों नहीं होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि तिर्यंच जीवों में अन्तरंग की सकल निवृत्ति का अभाव है। अर्थात् उनके सकलसंयम को ग्रहण करने की योग्यता का अभाव है।

शंका-उनके अन्तरंग सकलनिवृत्ति का अभाव क्यों है ?

समाधान-वे जिस जाति में उत्पन्न हुए हैं, उसमें संयम नहीं होता, यह नियम है इसलिए उनके संयम नहीं पाया जाता है।

तिर्यंच जीवों का अस्तित्व कहाँ तक है ? ऐसा प्रश्न होने पर सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार सम्पूर्ण द्वीप और समुद्रवर्ती तिर्यंचों में समझना चाहिए।।१५७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-समस्त द्वीप और समुद्रों में जो तिर्यंच होते हैं उन सभी के पाँच गुणस्थान तक पाये जाते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि- स्वयंभूरमणद्वीपवर्ती स्वयंप्रभ पर्वत के इस ओर (असंख्यात द्वीप समुद्रों में) भोगभूमि के समान रचना होने से वहाँ पर देशव्रती नहीं पाये जाते हैं, इसलिए यह सूत्र नहीं घटित होता है ? उसका समाधान करते हैं कि- ऐसा नहीं है क्योंकि बैर के संबंध से देवों अथवा दानवों के द्वारा उठाकर डाले गये देशव्रती तिर्यंचों का सब जगह सद्भाव होने में कोई विरोध नहीं आता है, इसलिए वहाँ पर तिर्यंचों के पाँचों गुणस्थान बन जाते हैं। उसी तिर्यंचगति में सम्यग्दर्शन का विशेष प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१५८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थ गुणस्थान में तिर्यंच तीनोें प्रकार के सम्यग्दर्शन से युक्त होते हैं। भोगभूमि की अपेक्षा उनके क्षायिकसम्यक्त्व जानना चाहिए। कर्मभूमि में कुछ बद्धायुष्क मनुष्य क्षायिकसम्यक्त्व को उत्पन्न करके भोगभूमि में ही उत्पन्न होते हैं, कर्मभूमि में नहीं।

अब कर्मभूमि के तिर्यंचों में सम्यक्त्व की व्यवस्था को व्यवस्थापित करते हुए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि नहीं होते हैं, शेष दो सम्यग्दर्शनों से युक्त होते हैं।।१५९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचमगुणस्थान में तिर्यंच जीवों के दो सम्यग्दर्शन होते हैं, क्षायिकसम्यग्दर्शन नहीं होता है। क्योंकि वे कर्मभूमि में उत्पन्न हुए हैं।

शंका-तिर्यंचों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव संयतासंयत क्यों नहीं होते हैं ?

समाधान-नहीं होते हैं क्योंकि तिर्यंचों में यदि क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव उत्पन्न होते हैं तो वे भोगभूमि में ही उत्पन्न होते हैं, दूसरी जगह नहीं। परन्तु भोगभूमि में उत्पन्न हुए जीवों के अणुव्रत की उत्पत्ति नहीं हो सकती है क्योंकि वहाँ पर अणुव्रत के होने में आगम से विरोध आता है। अब पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में सम्यक्त्व का कथन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार पंचेन्द्रियतिर्यंच और पंचेन्द्रियतिर्यंचपर्याप्त होते हैं।।१६०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन दोनों प्रकार के पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में प्रारंभ के पाँच गुणस्थान होते हैं।

अब स्त्रीवेदधारी तिर्यंचिनियों में सम्यक्त्व एवं गुणस्थान व्यवस्था को बताते हुए आचार्यश्री के द्वारा सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय योनिमती तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि नहीं होते हैं, शेष दो सम्यग्दर्शनों से युक्त होते हैं।।१६१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थ एवं पंचम गुणस्थानवर्ती स्त्रीवेदी तिर्यंचों में क्षायिकसम्यग्दर्शन नहीं होता है, उनके शेष दो सम्यग्दर्शन होते हैं।

उन योनिमती तिर्यंचिनियों में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों की उत्पत्ति नहीं होती है, उनके दर्शनमोहनीय का क्षपण भी नहीं होता है। इस प्रकार तिर्यंचगति में सम्यग्दर्शन की व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब मनुष्यगति में सम्यक्त्व व्यवस्था को व्यवस्थापित करते हुए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्य मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि संयतासंयत और संयत होते हैं।।१६२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनुष्य प्रथम गुणस्थान से प्रारंभ करके अयोगकेवली गुुणस्थान पर्यन्त होते हैं।

कितने द्वीप समुद्रों में मनुष्य होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार ढाई द्वीप और दो समुद्रों में जानना चाहिए।।१६३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चौदहों गुणस्थानवर्ती मनुष्य ढाई द्वीप और दो समुद्रों तक रहते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि- बैर के संबंध से डाले गये संयत और संयतासंयत आदि मनुष्यों का सम्पूर्ण द्वीप-समुद्रों में सद्भाव बना रहे, ऐसा मान लेने में क्या हानि है ? उसका समाधान देते हैं कि- ऐसा नहीं है, क्योंकि मानुषोत्तर पर्वत के उस तरफ देवों द्वारा ले जाए जाने वाले मनुष्यों के गमन का अभाव है अर्थात् देव भी नहीं ले जा सकते।

शंका-इस सूत्र में प्रयुक्त अर्धतृतीय शब्द के द्वारा केवल द्वीपों का ही ग्रहण किया जाएगा या समुद्र का अथवा द्वीप और समुद्र दोनों का ग्रहण हो जाएगा ?

समाधान-इनमें से अन्त के दो विकल्प तो बराबर नहीं हैं क्योंकि ऐसा मान लेने पर मानुषोत्तरपर्वत के उस तरफ भी मनुष्यों के अस्तित्व का प्रसंग आ जाएगा। अतएव द्वीप का विशेषण इसलिए दिया गया समझना चाहिए कि ढाई द्वीपों में ही मनुष्यों का अस्तित्व रहता है, उससे आगे नहीं। इस सामथ्र्य में दो समुद्रों में मनुष्य पाए जाते हैं, यह बात बिना कहे भी जानी जाती है क्योंकि मानुषोत्तरपर्वत के अंत तक ही दो समुद्रों का ग्रहण करना उचित है, उससे आगे के तृतीय आदि समुद्रों का ग्रहण करना उचित नहीं है। अब मनुष्यों में सम्यग्दर्शन के भेदों का कथन करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्य असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयत गुणस्थानों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१६४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थ, पंचम, छठे और सप्तम गुणस्थानवर्ती सभी मनुष्यों में तीनों प्रकार के सम्यग्दर्शन पाये जाते हैं। उसके पश्चात् गुणस्थान से प्रारंभ करके उपशांतकषाय नामक ग्यारहवें गुणस्थान तक के जीवों में दो प्रकार के सम्यग्दृष्टि होते हैं और उसके बाद असंयतसम्यग्दृष्टि से आरंभ करके अयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थान तक संयत संज्ञा वाले मनुष्यों में एक क्षायिक सम्यक्त्व ही होता है। ऐसी व्यवस्था अन्यत्र कहाँ-कहाँ है ? ऐसा प्रश्न होने पर सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार पर्याप्त मनुष्य और मनुष्यिनियों में भी जानना चाहिए।।१६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पर्याप्त मनुष्य एवं भाववेदसहित मनुष्यिनियों में इसी प्रकार की पूर्वोक्त व्यवस्था होती है। अर्थात् उनमें भी चौदह गुणस्थान एवं तीनों सम्यक्त्व होते हैं ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार मनुष्यगति में सम्यग्दर्शन की व्यवस्था का प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए। अब देवगति में सम्यक्त्व की व्यवस्था को व्यवस्थापित करते हुए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

देव मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१६६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवों में प्रारंभ के चार गुणस्थान होते हैं। भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिर्वासी और विमानवासी इन चारों प्रकार के देवों का यहाँ ग्रहण किया है। अर्थात् चारों निकाय के समस्त देव-देवियों में उपर्युक्त चारों गुणस्थान ही संभव है।


क्वपर्यंतं इयं व्यवस्था ? इति प्रश्ने सूत्रमवतरति-

एवं जाव उवरिमगेवेज्ज-विमाणवासिय-देवा त्ति।।१६७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एवं-पूर्वोक्तचतुर्गुणस्थानानि उपरिमग्रैवेयकविमानवासिदेवेषु यावदिति अत्र ग्रैवेयकेषु द्रव्यलिंगिनो मुनय: भव्या अभव्याश्च गच्छन्ति।
किं किं सम्यक्त्वं तत्र देवेषु ? इति प्रश्ने सूत्रावतारो भवति-
देवा असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदयसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठि त्ति।।१६८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवा: चतुर्थगुणस्थाने त्रिविधानि अपि सम्यक्त्वानि लभन्ते।
क्षायिकसम्यक्त्वं क्व क्व न भवितुमर्हति इति प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
भवणवासिय-वाणवेंतर-जोइसिय-देवा देवीओ च सोधम्मीसाण-कप्पवासिय-देवीओ च असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे खइयसम्माइट्ठी णत्थि अवसेसा अत्थि अवसेसियाओ अत्थि।।१६९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भवनवासि-वानव्यंतर-ज्योतिष्कदेवा: एषां देव्यश्च सौधर्मैशानकल्पवासिदेव्यश्च असंयतसम्यग्दृष्टिनामचतुर्थगुणस्थाने क्षायिकसम्यग्दर्शनं नास्ति अवशेषे द्विविधे सम्यक्त्वे स्त:, चतुर्णिकायदेवीनां अपि द्वे सम्यक्त्वे स्त: इति।
किमिति क्षायिकसम्यग्दृष्टयस्तत्र न सन्तीति चेत् ?
न, देवेषु दर्शनमोहक्षपणाभावात् क्षपितदर्शनमोहकर्मणामपि प्राणिनां भवनवास्यादिषु त्रिकेषु अधमदेवेषु सर्वदेवीषु चोत्पत्तेरभावात्।
शेषसम्यक्त्वद्वयस्य तत्र कथं संभव: इति चेत् ?
न, तत्रोत्पन्नजीवानां पश्चात्तत्पर्यायपरिणते: सत्त्वात्।
शेषदेवानां कति सम्यक्त्वनि ? इति प्रश्ने सूत्रावतार: क्रियते-
सोधम्मीसाण-प्पहुडि जाव उवरिम-उवरिम-गेवज्ज-विमाणवासियदेवा असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसम-सम्माइट्ठी।।१७०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सौधर्मस्वर्गादारभ्य यावत् उपरिमोपरिमग्रैवेयकविमानवासिनो देवा: चतुर्थगुणस्थाने त्रिविधान्यपि सम्यक्त्वानि प्राप्नुवन्ति। त्रिविधेन सम्यक्त्वेन सह तत्रोत्पत्तेर्दर्शनात्। तत्रोत्पद्य द्विविधसम्यग्दर्शनोपादानात्तत्र तेषां सत्त्वं सुघटमिति।
अनुदिशविमानादिदेवेषु सम्यग्दर्शनभेदप्रतिपादनाय सूत्रावतार: क्रियते-
अणुदिस-अणुत्तर-विजय-वइजयंत-जयंतावराजिद-सव्वट्ठसिद्धि-विमाणवासिय-देवा असंजदसम्माइट्ठि-ट्ठाणे अत्थि खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी।।१७१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नवसु अनुदिशेषु पंचानुत्तरेषु-विजयवैजयंतजयंतापराजितसर्वार्थसिद्धिविमानेषु विमानवासिनो देवा: चतुर्थगुणस्थाने त्रिविधान्यपि सम्यक्त्वानि लभन्ते।
उपशमश्रेणीमारूढा आरुह्य अवतीर्णाश्च ये केचित् उपशमसम्यग्दृष्टय:, तेषां तत्रानुदिशानुत्तरेषु उत्पत्तिर्भवति। अत एव उपशमसम्यग्दृष्टीनां तत्र सत्त्वं भवति।
उपशमश्रेण्यारूढा उपशमसम्यग्दृष्टयो न म्रियन्ते औपशमिकसम्यग्दर्शनोपलक्षितत्वात् शेषौपशमिक-सम्यग्दृष्टय इव इति चेत् ?
न, पश्चात्कृतमिथ्यात्वसम्यक्त्वाभ्यां अनुपशमितोपशमितचारित्रमोहाभ्यां च तयोर्वैधम्र्यात्।
तात्पर्यमेतत्-
सम्यक्त्वमार्गणायां वीतरागनामधेयं यत् क्षायिकसम्यक्त्वम्, तत् कथं लभेत इति भावना पुन: पुन: भावयितव्या। यावदेतत्सम्यग्दर्शनं न प्राप्नुयात्तावद् यत् क्षायोपशमिकं सम्यग्दर्शनं मयि अस्ति तदेव स्थिरीभूयादिति देवाधिदेवस्य श्रीपादमूले प्रार्थयितव्यमिति।
एवं देवगतौ सम्यक्त्वकथनेन सूत्रषट्कं गतं।
इत्थं सम्यक्त्वमार्गणायां सामान्यसम्यक्त्वसहितादिप्रकारेण सप्तविधप्रतिपादनपरत्वेन एकं सूत्रं गतं। सम्यग्दृष्ट्यादिजीवा: क्व क्व गुणस्थानेषु इति व्यवस्थाकथनमुख्यत्वेन षट् सूत्राणि गतानि। पुनश्च नरकादिगतिषु कानि कानि सम्यग्दर्शनानि इति निरूपणपरत्वेन एकविंशतिसूत्राणि गतानि। इत्थं अष्टाविंशतिसूत्रै: सम्यक्त्वमार्गणा प्ररूपिता भवतीति ज्ञातव्यम्।
इति षट्खण्डागमप्रथमखण्डे गणिनीज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वमार्गणानाम द्वादशोऽधिकार: समाप्त:।


उन देवों में कौन-कौन से सम्यक्त्व होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

देव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१६८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्थ गुणस्थान में देवगण तीनों सम्यक्त्व को प्राप्त करते हैं।

क्षायिकसम्यक्त्व कहाँ-कहाँ नहीं हो सकता है, इसका प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषीदेव तथा उनकी देवियाँ और सौधर्म तथा ईशानकल्पवासी देवियाँ असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि नहीं हैं। शेष के दो सम्यग्दर्शनों से युक्त होते हैं और होती हैं।।१६९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्र में कथित पूर्वोक्त सभी चतुर्थगुणस्थानवर्ती देव-देवियाँ क्षायिक-सम्यग्दृष्टि नहीं होते हैं, उनके शेष दो सम्यक्त्व होते हैं, चारों निकाय वाली देवियों में भी वेदक और उपशम ये दो ही सम्यक्त्व होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

शंका-क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव उक्त देवों और देवियों में क्यों नहीं होते हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि देवों में दर्शनमोह के क्षपण का अभाव देखा जाता है। दूसरी बात यह है कि जिन जीवों ने पूर्वपर्याय में दर्शनमोहनीय का क्षय कर दिया है उनकी भवनवासी आदि हीन देवों में और सभी देवियों में उत्पत्ति नहीं होती है।

शंका-तो फिर शेष दो सम्यग्दर्शनों का उनमें सद्भाव कैसे संभव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वहाँ पर उत्पन्न हुए जीवों के अनन्तर सम्यग्दर्शनरूप पर्याय हो जाती है, इसलिए शेष के दो सम्यग्दर्शनों का वहाँ सद्भाव पाया जाता है।

भावार्थ-यहाँ अधम शब्द से निंद्यपर्याय का ग्रहण नहीं करना चाहिए प्रत्युत सम्यग्दृष्टि जीव मरकर इन भवनत्रिकों में जन्म नहीं लेते हैं और वैमानिक देवों से उनका वैभव आदि हीन होता है, मात्र इसी कारण उन्हें अधम संज्ञा प्रदान की गई है।

शेष देवों में कितने सम्यक्त्व होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

सौधर्म और ईशानकल्प से लेकर उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक तक के देव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।१७०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सोलहों स्वर्ग एवं ऊपर-ऊपर के ग्रैवेयक विमानों में रहने वाले देव चतुर्थगुणस्थान में तीनों ही सम्यग्दर्शन प्राप्त करते हैं। क्योंकि तीनों ही सम्यक्त्व के साथ उन स्वर्गों में जन्म धारण किया जा सकता है किन्तु वहाँ पर उत्पन्न होने के पश्चात् वेदक और उपशम इन दो सम्यग्दर्शनों का ग्रहण होता है, इसलिए उक्त देवों में पूर्वपर्याय से साथ लेकर जाने की अपेक्षा ही तीनों सम्यग्दर्शनों का सद्भाव बन जाता है।

अब अनुदिश आदि विमानों में रहने वाले देवों में सम्यग्दर्शन के भेदों का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

नव अनुदिशों में और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि इन पाँच अनुत्तरों में रहने वाले देव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तर विमानों में रहने वाले विमानवासी देवों के चतुर्थगुणस्थानों में तीनों सम्यग्दर्शन पाये जाते हैं।

उपशमश्रेणी पर चढ़ने वाले और चढ़कर उतरने वाले जो भी उपशमसम्यग्दृष्टि मनुष्य हैं वे अनुदिश एवं अनुत्तरों में जन्म धारण करते हैं। इसलिए वहाँ पर उपशमसम्यग्दृष्टि जीवों का सद्भाव पाया जाता है।

शंका-उपशमश्रेणी पर आरूढ़ हुए उपशमसम्यग्दृष्टि जीव नहीं मरते हैं क्योंकि वे उपशमसम्यग्दर्शन से युक्त होते हैं जिस प्रकार अन्य औपशमिक सम्यग्दृष्टियों का मरण नहीं होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि पश्चात्कृत्य मिथ्यात्व और सम्यक्त्व की अपेक्षा तथा अनुपशमित और उपशमित चारित्रमोहनीय की अपेक्षा साधारण उपशमसम्यग्दृष्टियों और उपशमश्रेणी पर चढ़े हुए सम्यग्दृष्टियों में वैधम्र्य है।

तात्पर्य यह है कि-

सम्यक्त्वमार्गणा में वीतराग नाम वाला जो क्षायिकसम्यक्त्व है ‘‘वह मुझे कैसे प्राप्त हो ?’’ ऐसी भावना पुन:-पुन: भानी चाहिए। यह क्षायिकसम्यग्दर्शन जब तक प्राप्त नहीं होता है तब तक मुझे जो क्षायोपशमिकसम्यक्त्व मिला है वही स्थिर बना रहे, देवाधिदेव जिनेन्द्रभगवान के श्रीपादमूल में ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए।

इस प्रकार देवगति में सम्यक्त्व का कथन करने वाले छह सूत्र हुए। इस तरह से सम्यक्त्वमार्गणा में सामान्यसम्यक्त्व सहित आदि कथन के प्रकार से सात प्रकार के सम्यग्दर्शनों का प्रतिपादन करने की मुख्यता से एक सूत्र पूर्ण हुआ। सम्यग्दृष्टि आदि जीव किन-किन गुणस्थानों में होते हैं इस व्यवस्था का कथन करने वाले छह सूत्र हुए, पुन: नरक आदि गतियों में कौन-कौन से सम्यग्दर्शन होते हैं इसका निरूपण करने वाले इक्कीस सूत्र हुए, इन अट्ठाईस सूत्रों के द्वारा सम्यक्त्वमार्गणा का कथन किया गया है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार से षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि नाम की टीका में सम्यक्त्वमार्गणा नामका बारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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