045.चौदहवाँ अधिकार - आहारमार्गणा में आहार - अनाहार दो भेद है...........

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चौदहवाँ अधिकार - आहारमार्गणा में आहार - अनाहार दो भेद है

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अथ आहारमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन त्रिसूत्रै: आहारमार्गणानाम चतुर्दशोऽधिकार: कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले आहारकजीव-कथनमुख्यत्वेन सूत्रद्वयं। तदनु द्वितीयस्थले अनाहारककथनत्वेन सूत्रमेकं इति समुदायपातनिका।
अधुना आहारमार्गणाप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
आहाराणुवादेण अत्थि आहारा अणाहारा।।१७५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारकमार्गणानुवादेन आहारका: अनाहारकाश्च जीवा: सन्ति। सर्वे संसारिण आहारकेषु एव, अनाहारकेषु संसारिणो मुक्ताश्च भवन्ति।
अधुना आहारकजीवानां गुणस्थानव्यवस्थां व्यवस्थापयता श्रीमत्पुष्पदन्ताचार्येण सूत्रावतार: क्रियते-
आहारा एइंदिय-प्पहुडि जाव सजोगिकेवलि त्ति।।१७६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारका: जीवा: एकेन्द्रियादारभ्य सयोगिकेवलिपर्यन्ता: भवन्तीति। अत्र षड्विधा: आहारा: उच्यन्ते-कवलाहार-लेपाहार-ऊष्माहार-मानसाहार-कर्माहार-नोकर्माहाराश्च। तेषु पंचविधाहारान् परित्यज्य नोकर्माहारोऽत्र ग्राह्य: भवति।
तात्पर्यमेतत्-एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यंता: सर्वेऽपि जीवा: संसारिण: आहारका एव। प्रथमगुण-स्थानादारभ्य सयोगिकेवलिपर्यन्ता: इति ज्ञातव्यं भवद्भि:।
के चानाहारका: ? इति प्रश्ने सूत्रावतार: क्रियते श्रीमत्पुष्पदन्तभट्टारकेण-
अणाहारा चदुसु ट्ठाणेसु विग्गहगइ-समावण्णाणं केवलीणं वा समुग्घादगदाणं अजोगिकेवली सिद्धा चेदि।।१७७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विग्रहगतिप्राप्ता जीवा: मिथ्यात्व-सासादन-अविरतिसम्यग्दृष्टिगुणस्थानेषु अनाहारका: भवन्ति। तथा समुद्घातगतसयोगिकेवलिनश्च अनाहारका भवन्ति। अयोगिकेवलिन: सिद्धाश्च अनाहारका: सन्तीति।
इमे जीवा: औदारिकादिशरीरयोग्यान् पुद्गलान् न गृण्हन्ति ततोऽनाहारका: कथ्यन्ते।
तात्पर्यमेतत्-सिद्धपरमेष्ठिन: नवमार्गणान्यूना: पञ्चमार्गणासहिताश्च भवन्ति।
उक्तं च-
सिद्धाणं सिद्धगई केवलणाणं च दंसणं खयियं।
सम्मत्तमणाहारं उवजोगाणक्कमपउत्ती।।७३१।।
गुणजीवठाणरहिया सण्णापज्जत्तिपाणपरिहीणा।।
सेसणवमग्गणूणा सिद्धा सुद्धा सदा होंति।।७३२।।
सिद्धानां भगवतां सिद्धगति: केवलज्ञानं केवलदर्शनं क्षायिकसम्यक्त्वं अनाहारश्चेति इमे पंचमार्गणा: सन्ति, शेषनवमार्गणाभ्यो इन्द्रिय-काय-योग-वेद-कषाय-संयम-लेश्या-भव्य-संज्ञिभ्यो हीना भवन्ति। तथा च चतुर्दशगुणस्थान-चतुर्दशजीवसमासरहिता: चतु:संज्ञा-षट्पर्याप्ति-दशप्राणरहिता:, ज्ञानदर्शनोपयोगयोर-क्रमप्रवृत्तिश्च[१], एषां सिद्धानां विंशतिप्ररूपणासु इति मन्तव्य:।
भव्यजीवराशि:-आसन्नभव्य: दूरभव्य: अभव्यसमभव्यश्चेति त्रेधा[२] भवन्ति। एषां मध्ये ‘वयं आसन्नभव्या:’ इति मत्वा भेदाभेदरत्नत्रयं संपाल्य सिद्धगत्युपलब्धये पुरुषार्थो विधेय:।

एवं आहारमार्गणा समाप्ता


अथ आहारमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में तीन सूत्रों के द्वारा आहारमार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उसमें प्रथम स्थल में आहारक जीवों के कथन की मुख्यता से दो सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में अनाहारक जीवों का कथन करने वाला एक सूत्र है। आहारमार्गणा के प्रारंभ में यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब आहारमार्गणा का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

आहारमार्गणा के कथन से आहारक और अनाहारक जीव होते हैं।।१७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारक और अनाहारक दोनों प्रकार के जीवों का आहारमार्गणा में कथन किया जाता है। सभी संसारी जीव आहारक में आते हैं और अनाहारक में संसारी व मुक्त दोनों प्रकार के होते हैं।

अब आहारक जीवों की गुणस्थानव्यवस्था को व्यवस्थापित करते हुए श्रीमान् पुष्पदंत आचार्य सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारक जीव एकेन्द्रिय से लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं।।१७६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय से लेकर तेरहवें गुणस्थान तक के सभी जीव आहारक कहलाते हैं। यहाँ ‘आहार’ शब्द से छह प्रकार का आहार बतलाते हैं-कवलाहार, लेपाहार, ऊष्माहार, मानसआहार, कर्माहार और नोकर्माहार। इनमें से पाँच प्रकार के आहार को छोड़कर केवल नोकर्माहार को यहाँ ग्रहण करना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक समस्त संसारी जीव आहारक ही होते हैं। वे प्रथम गुणस्थान से लेकर सयोगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थान तक किसी भी गुणस्थान को अपनी-अपनी योग्यतानुसार प्राप्त कर सकते हैं ऐसा जानना चाहिए।

कौन से जीव अनाहारक होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर श्रीमान् पुष्पदन्त भट्टारक के द्वारा सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

विग्रहगति को प्राप्त जीवों के मिथ्यात्व, सासादन और अविरतसम्यग्दृष्टि तथा समुद्घातगत केवलियों के सयोगकेवली इन चार गुणस्थानों में रहने वाले जीव और अयोगकेवली तथा सिद्ध भगवान् अनाहारक होते हैं।।१७७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विग्रहगति को प्राप्त जीव प्रथम, द्वितीय एवं चतुर्थ गुणस्थान में अनाहारक होते हैं तथा समुद्घात करने वाले सयोगकेवली भी अनाहारक होते हैं। इसी प्रकार अयोगकेवली और सिद्ध भगवान भी अनाहारक कहलाते हैं।

ये सभी जीव औदारिक आदि शरीरों के योग्य पुद्गलों को ग्रहण नहीं करते हैं इसीलिए अनाहारक कहे जाते हैं ऐसा जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि सिद्ध परमेष्ठी भगवान् नौ मार्गणाओं से रहित और पाँच मार्गणाओं से सहित होते हैं। जैसा कि कहा भी है-

गाथार्थ-सिद्धजीवों की सिद्धगति होती है, वे केवलज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक सम्यक्त्व से सहित एवं अनाहारक होते हैं तथा उनके ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग की युगपत् प्रवृत्ति पाई जाती है।।७३१।।

वे सिद्धपरमेष्ठी गुणस्थान और जीवसमास से रहित होते हैं एवं संज्ञा, पर्याप्ति, प्राण से रहित होते हैं। इस प्रकार वे नौ मार्गणाओं से न्यून-रहित सिद्ध भगवान् हमेशा परमशुद्ध अवस्था से युक्त रहते हैं।।७३२।।

सिद्ध भगवन्तों की सिद्धगति मानी जाती है। उनके केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिकसम्यक्त्व होता है, वे अनाहारक होते हैं, अत: उनके गति, ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व और आहारक ये पाँच मार्गणाएँ होती हैं और शेष नौ मार्गणाओं से-इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, संयम, लेश्या, भव्य और संज्ञी से वे रहित होते हैं और इसी प्रकार वे सिद्ध भगवान् चौदह गुणस्थान, चौदह जीवसमासों से रहित चार संज्ञा, छह पर्याप्ति, दश प्राणों से रहित हैं एवं ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग की अक्रम प्रवृत्ति से सहित हैं, ऐसे सिद्धों का यहाँ बीस प्ररूपणाओं में वर्णन पूर्ण हुआ है।

भव्यजीवराशि के आसन्नभव्य, दूरभव्य और अभव्यसमभव्य ऐसे तीन भेद होते हैं। इनके मध्य में ‘‘हम आसन्नभव्य हैं’’ ऐसा मानकर सभी को भेदाभेद रत्नत्रय का यथाशक्ति पालन करके सिद्धगति को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए।

इस प्रकार आहारमार्गणा समाप्त हुई।

हस्तिनागपुरं तीर्थं संस्तुमोऽपीह ये भवा:।

नुम: श्री शांतिनाथादी-नाहारादायकानपि।।१।।[३]
तीर्थकरजन्मभूमिहस्तिनापुरतीर्थक्षेत्रे एकविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे (२५२१) वीराब्दे शरद्पूर्णिमायां स्वजन्मदिवसे जम्बूद्वीपस्य द्वितीयमहामहोत्सवकाले सुमेरुपर्वतस्योपरि श्रीशान्तिनाथभगवतां महामस्तकाभिषेकमवलोक्य पुन: रत्नत्रयनिलयवसतिकायां आगत्य षट्खण्डागमग्रन्थेभ्य: प्रथमखण्डस्य संस्कृतटीकां चिकीर्षया ‘‘सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य’’ इत्यादिना मंगलाचरणं लिखित्वा ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नामधेया टीका मया प्रारब्धा।
ततो मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्रे महापंचकल्याणकमहोत्सवस्य श्रीमुनिसुव्रतभगवतां महामस्तकाभिषेकस्य च निर्विघ्नतया संपन्नकरणाय द्वाविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे वीराब्दे मार्गशीर्षशुक्लाषष्ठीतिथे:[४] हस्तिनागपुरक्षेत्रात् संघसहिताया मम मंगलविहार: संजात:।
अस्मिन् मार्गेऽपि मम टीकालेखनकार्यं भवदासीत्। मंगलविहारे च मार्गेषु नानाविधधर्मप्रभावनाकार्येण केषुचित् तीर्थेषु केषुचिन्महानगरेषु अपि मत्प्रेरणया कैलाशपर्वत-सम्मेदशिखर-सिद्धाचलादिनूतनरचनानां शिलान्यासा अपि कारिता: श्रद्धालुभव्यजनै:।
वीराब्दे द्वाविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे फाल्गुनशुक्लासप्तम्यां ‘‘खिष्टाब्दे षण्णवत्यधिकैकोनविंशति-शततमे पंचविंशे दिनाँके द्वितीयमासि (२५-२-१९९६) राजस्थान प्रान्ते ‘‘पिडावानामग्रामे’’ श्रीपार्श्वनाथ‎-समवसरणमंदिरशिलान्यासस्य मंगलावसरे एतत्सत्प्ररूपणाग्रन्थस्य ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ टीकां पूरयन्त्या मया महान् हर्षोऽनुभूयते। टीकासहितोऽयं ग्रन्थो मम श्रुतज्ञानस्य पूत्त्र्यै भूयात्।
केवलज्ञानबीजं स्यात्, श्रुतज्ञानं जिनोद्गतम्।
तस्मै नमोऽस्तु मे नित्यं, द्रव्यभावश्रुताप्तये।।१।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदंतभूतबलिसूरिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे श्रीपुष्पदंताचार्य-
कृत-‘सत्प्ररूपणानाम’ ग्रन्थस्य श्रीवीरसेनाचार्यरचितधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्था-धारेण विरचिते विंशतिशततमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागर-स्तस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या-जंबूद्वीपरचनाप्रेरिका-गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां अयं चतुर्दश-मार्गणा प्ररूपक: तृतीयो महाधिकार: समाप्त:।

श्लोकार्थ-

हस्तिनापुर तीर्थ का हम स्तवन करते हैं तथा हस्तिनापुर में जन्म लेने वाले शांति, कुंथु, अरहनाथ भगवान को एवं वहाँ आहार ग्रहण करने वाले महामुनि प्रभु ऋषभदेव और अकम्पनाचार्यादि सात सौ मुनियों की भी हम स्तुति करते हैं। भगवान् शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ तीर्थंकरों की जन्मभूमि हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र पर वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ इक्कीसवें (२५२१) वर्ष की शरदपूर्णिमा (आश्विन शु. १५) तिथि के दिन अपने जन्मदिवस (६२वें जन्मदिवस) के पवित्र अवसर पर जम्बूद्वीप रचना के द्वितीयमहामहोत्सव के समय जब सुमेरुपर्वत की पांडुकशिला पर श्रीशांतिनाथ भगवान् का महामस्तकाभिषेक चल रहा था, उस अभिषेक को देखकर पुन: ‘‘रत्नत्रयनिलय’’ नामक वसतिका में आकर षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथमखण्ड की संस्कृतटीका का लेखन करने की भावना से ‘‘सिद्धान्त सिद्ध्यर्थमानम्य’’ इत्यादि मंगलाचरण की पंक्तियाँ लिखकर ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम वाली टीका को लिखना मैंने प्रारंभ किया था।

उसके पश्चात् महाराष्ट्र प्रान्त में स्थित मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में अनेक वर्षों से रुके हुए महापंचकल्याणक-महोत्सव एवं श्रीमुनिसुव्रत भगवान् के प्रथम महामस्तकाभिषेक आयोजन को निर्विघ्नरूप से सम्पन्न कराने के लक्ष्य से वीर निर्वाण संवत् २५२२ की मगसिर शुक्ला षष्ठी-२७ नवम्बर १९९५ को हस्तिनापुर से मांगीतुंगी के लिए मेरा संघसहित मंगल विहार हो गया। तब विहार करते हुए मार्ग में भी मेरा यह टीकालेखन का कार्य बराबर चलता रहा और उस मंगलविहार के मध्य रास्ते-रास्ते में अनेक प्रकार के धर्मप्रभावनात्मक कार्यों के द्वारा कई तीर्थों पर एवं कई महानगरों में भी मेरी प्रेरणा से क़ैलाशपर्वत, सम्मेदशिखर पर्वत एवं सिद्धाचल आदि नई-नई रचनाओं के शिलान्यास भी श्रद्धालु भव्यजनों के द्वारा किये गये। पुन: वीरनिर्वाणसंवत् पच्चीस सौ बाईसवें (२५२२) वर्ष में ही फाल्गुन शुक्ला सप्तमी तिथि को ईसवी सन् १९९६ के द्वितीय मास की २५ फरवरी तारीख को राजस्थान प्रान्त के पिड़ावा ग्राम में श्रीपार्श्वनाथ‎ समवसरण मंदिर के शिलान्यास के मंगल अवसर पर इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ की ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नामक टीका को पूर्ण करते हुए मुझे अत्यन्त हर्ष की अनुभूति हो रही है। टीका से सहित यह सत्प्ररूपणा नामक षट्खण्डागम ग्रंथ मेरे श्रुतज्ञान की पूर्ति के लिए होवे अर्थात् मुझे श्रुतज्ञान से परिपूर्ण करे, यही जिनेन्द्र भगवान से मेरी प्रार्थना है।

श्लोकार्थ-

जिनेन्द्र भगवान के मुखकमल से प्रगट हुआ श्रुतज्ञान केवलज्ञान का बीज है अर्थात् केवलज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, इसलिए द्रव्य और भाव दोनों प्रकार के श्रुत की प्राप्ति के लिए उस श्रुतज्ञान को मेरा नमस्कार होवे। इस प्रकार श्रीमान् भगवत्पुष्पदन्त और भूतबली आचार्य द्वारा प्रणीत षट्खण्डागम नामक महाग्रंथ के प्रथमखण्ड में श्रीपुष्पदन्त आचार्य द्वारा रचित सत्प्ररूपणा की धवलाटीका को प्रमुख आधार बनाकर तथा अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से इस बीसवीं शताब्दी के प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्यश्री वीरसागर महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका, गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में यह चौदह मार्गणाओं का प्ररूपण करने वाला तृतीय महाधिकार समाप्त हुआ।

ग्रन्थस्योपसंहार: क्रियते-

जीयात् ऋषभदेवस्य, शासनं जिनशासनम्।

अन्तिमवीरनाथस्या-प्यहिंसाशासनं चिरम्।।१।।
एवं ‘णमो अरिहंताणं’ इति पंचनमस्कारगाथासूत्रमादौ कृत्वा गुणस्थानमार्गणाप्ररूपणसूचनादिप्रकारेण ‘पीठिकानाम्नि’ प्रथमाधिकारे सप्तसूत्राणि कथितानि आसन्। तदनु द्वितीयमहाधिकारे चतुर्दशगुणस्थानानां नामलक्षणनिरूपणत्वेन ‘संतपरूवणदाए’ इत्यादिना षोडशसूत्राणि गतानि। पुन: मार्गणाप्ररूपके तृतीये महाधिकारे चतुर्दशमार्गणासु गुणस्थानव्यवस्था-व्यवस्थापनपरत्वेन ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादिना चतु:पंचाशदधिक-एकशतसूत्राण्यभवन् अत्र पर्यंतं सप्त-षोडश-चतु:पञ्चाशदधिकशतसूत्राणां मेलने सप्तसप्तत्यधिकशतसूत्रै: त्रिभिर्महाधिकारैरयं सत्प्ररूपणानामग्रन्थ: पूर्णतामगात्।
अर्हन्तो मंगलं कुर्यु:, सिद्धा: कुर्युश्च मंगलम्।
आचार्या: पाठकाश्चापि, साधवो मम मंगलम्।।१।।
समाप्तोऽयं ग्रन्थ:

उपसंहार

अब ग्रंथ का उपसंहार किया जाता है-

श्लोकार्थ - भगवान् ऋषभदेव का शासन जो जिनशासन कहलाता है वह जिनशासन पृथ्वी पर जयशील होवे तथा अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का भी अहिंसामयी शासन चिरकाल तक जयशील होवे।।१।।

इस प्रकार ‘‘णमो अरिहंताणं’’ इत्यादि पंचनमस्कार गाथासूत्र को आदि में करके गुणस्थान, मार्गणाप्ररूपणसूचना आदि प्रकार से ‘‘पीठिका’’ नाम के प्रथम महाधिकार में सात सूत्र कहे गये। उसके पश्चात् चौदह गुणस्थानों के नाम और लक्षण के निरूपण की मुख्यता से ‘‘संतपरूवणदाए’’ इत्यादि सोलह सूत्र द्वितीय महाधिकार में पूर्ण हुए। पुन: चौदह मार्गणाओं में गुणस्थानव्यवस्था के व्यवस्थापन की मुख्यता से ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादि के द्वारा मार्गणा का प्ररूपण करने वाले तृतीय महाधिकार में एक सौ चौवन सूत्र हुए। यहाँ तक सात, सोलह और एक सौ चौवन सूत्र हुए।

यहाँ तक सात, सोलह और एक सौ चौवन इन सभी सूत्रों को मिलाकर कुल एक सौ सतत्तर सूत्रों से तीन महाधिकारों के द्वारा यह ‘‘सत्प्ररूपणा’’ नाम का ग्रंथ पूर्ण हुआ।

श्लोकार्थ-अर्हन्त भगवान् मेरा मंगल करें और सिद्धपरमेष्ठी मंगल करें तथा आचार्य, उपाध्याय एवं साधुपरमेष्ठी भी मेरे लिए मंगलकारी होवें।।१।।

इस प्रकार अन्त्यमंगलसूचक मंगलाचरणपूर्वक ग्रंथ का समापन हुआ।

प्रशस्ति

जंबूद्वीपेऽथ प्राग्द्वीपे, भरतेऽप्यार्यखण्डके।

यावन्ति जिनबिम्बानि, स्तूयन्ते तानि भक्तित:।।१।।
पार्श्वनाथ‎ जिनं नत्वा, केवलज्ञानभूषितम्।
शारदां हृदि संस्थाप्य, वंदे सर्वान् गणीश्वरान्।।२।।
शासनं वीरनाथस्य, वर्तते भुवि सांप्रतम्।
गौतमादिमहर्षीणा - मनुवीचिपरंपरा।।३।।
तस्यां च मूलसंघेऽस्मिन्, कुन्दकुन्दन्वयो महान्।
बलात्कारगण: ख्यात:, शारदागच्छ इत्यपि।।४।।
एतस्यां मणिमालायां, प्रथमाचार्यविश्रुत:।
श्रीशान्तिसागराख्योऽसौ, चारित्रचक्रभृद् महान्।।५।।
तस्य पट्टाधिपोऽप्याद्य:, गुरु: श्रीवीरसागर:।
यस्माज्ज्ञानमती जाता, ह्यल्पज्ञाहं किलार्यिका।।६।।
श्री देशभूषण: सूरि-र्ममाद्यो विश्रुतो गुरु:।
यत्प्रसादात् गृहं त्यक्त्वा, लब्धं प्राक् क्षुल्लिकाव्रतम्।।७।।
गुरुभक्त्या सरस्वत्या:, प्रसादाच्च मया मनाक्।
शास्त्रमधीत्य शिष्याणा-मध्यापनरताभवम्।।८।।
मुनयोऽप्यार्यिकाश्चापि, ह्यनेके ब्रह्मचारिण:।
विद्यां शिक्षां गृहीत्वा मत्, कुर्वन्तीह प्रभावनाम्।।९।।
षट्खण्डागमग्रन्थस्य, प्राक्खण्डे सत्प्ररूपणा।[५]
सूरिणा पुष्पदन्तेन, तत्सूत्राणि[६] कृतानि वै।।१०।।
राजस्थाने पिडावाख्ये, ग्रामे भक्तजनाश्रिते।
द्विद्विपंचद्विवीराब्दे, सप्तम्यां फाल्गुने सिते।।११।।
तस्य सदनुयोगस्य, सिद्धान्तज्ञानलब्धये।
टीका चिन्तामणिर्नाम्ना, सिद्धान्तादिरपूर्यत।।१२।।
तत्रस्थभाक्तिकैर्भक्त्या, श्रीपाश्र्वसमवसृते:।
अस्मद्मंगलसानिध्ये, शिलान्यासोऽथ कारित:।।१३।।
यावज्जैनेन्द्रधर्मोऽयं, नंद्याच्च भुवि शांतिकृत्।
तावच्चिन्तामणिर्नाम्ना, जीयाज्ज्ञानमतीकृति:।।१४।।
अर्हन्तो मंगलं कुर्यु:, पार्श्वनाथ‎श्च मंगलम्।
चतुर्विंशतितीर्थेशा, नित्यं कुर्वन्तु मंगलम्।।१५।।
शारदा गुरवश्चापि, कुर्युर्जगति मंगलम्।
जैनेन्द्रशासनं नित्यं, कुर्यात्सर्वस्य मंगलम्।।१६।।
।।इति शं भूयात्।।


प्रशस्ति का हिन्दी अनुवाद

श्लोकार्थ-मध्यलोक के प्रथम द्वीप जम्बूद्वीप में जो भरतक्षेत्र है उसके आर्यखण्ड में जितने भी जिनबिम्ब विराजमान हैं, उन सबकी मेरे द्वारा स्तुति की जाती है।।१।।

केवलज्ञान लक्ष्मी से विभूषित श्री पार्श्वनाथ‎ जिनेन्द्र को नमस्कार करके शारदा-सरस्वती माता को अपने हृदय में स्थापित करके मैं सभी गणधर देवों की वंदना करती हूँ।।२।।

वर्तमान में इस पृथिवीतल पर भगवान महावीर स्वामी का शासन चल रहा है और इन्द्रभूति गौतमगणधरस्वामी आदि महर्षियों की अनुवीचि-अविच्छिन्न क्रम परम्परा भी चल रही है।।३।।

उसी गुरुपरम्परा के मूलसंघ में इस समय आचार्य श्रीकुन्दकुन्द की आम्नाय में महान् बलात्कारगण एवं शारदा गच्छ भी विख्यात है।।४।।

इस परम्परारूपी मणिमाला में इस युग (बीसवीं शताब्दी) के प्रथम आचार्य के रूप में श्रीशांतिसागर नाम के महान् चारित्रचक्रवर्ती दिगम्बर मुनिराज हुए हैं।।५।।

उनके प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्रीवीरसागर जी गुरुदेव हुए हैं जिनसे मैं अल्पज्ञ आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ‘‘ज्ञानमती’’ रूप में प्रगट हुई अर्थात् ज्ञानमती नाम प्राप्त किया।।६।।

जिनकी कृपाप्रसाद से सर्वप्रथम गृहत्याग करके क्षुल्लिकादीक्षा धारण की थी, वे श्रीदेशभूषण नाम के आचार्यप्रवर मेरे आद्यगुरु हैं।।७।।

गुरुभक्ति एवं सरस्वती माता के प्रसाद से मैंने कुछ शास्त्रों का अध्ययन करके संघस्थ अनेक शिष्यों को उनका अध्यापन भी कराया है।।८।।

अनेक मुनि, आर्यिका एवं ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी मुझसे विद्या और शिक्षा को ग्रहण करके अद्यावधि खूब धर्मप्रभावना कर रहे हैं।।९।।

षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा नाम का जो प्रकरण है श्री पुष्पदन्त आचार्य ने उन सूत्रों की रचना की है अर्थात् उसके आगे के सूत्रों की रचना श्री भूतबली आचार्य ने की है।।१०।।

राजस्थान प्रान्त में पिड़ावा नाम का एक ग्राम है जहाँ भगवान् की भक्ति में अनुरक्त श्रावकगण निवास करते हैं, उस ग्राम में वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ बाईस (२५२२) की फाल्गुन शुक्ला सप्तमी तिथि को (२५ फरवरी १९९६ को) मैं संघ सहित पहुँची।।११।।

उसी दिन पिड़ावा में इस सत्प्ररूपणा ग्रंथ की ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम की टीका को मैंने लिखकर पूर्ण किया, यह टीका मेरे सैद्धान्तिकज्ञान को पूर्ण करने में निमित्त बने, यही भावना है।।१२।।

उसी फाल्गुन शुक्ला सप्तमी के दिन पिड़ावा के श्रद्धालु भक्तों ने मेरे ससंघ मंगल सानिध्य में श्रीपार्श्वनाथ‎ समवसरण रचना का शिलान्यास भी किया था।।१३।।

जब तक इस धरती पर जिनेन्द्र भगवान् का जैनधर्म सभी को शांति को प्रदान करता हुआ वृद्धि को प्राप्त होता रहे तब तक मुझ गणिनी ज्ञानमती द्वारा रचित यह ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम की टीका भी पृथ्वी पर जयशील होती रहे, यही मेरी अभिलाषा है।।१४।।

अरिहंत परमेष्ठी हम सबके लिए मंगलकारी होवें एवं पार्श्वनाथ‎ तीर्थंकर भगवान् सबका मंगल करें तथा चौबीसो तीर्थंकर भगवान् नित्य ही मंगलप्रद होवें।।१५।।

सरस्वती माता एवं साधुपरमेष्ठी गुरुजन इस जगत् में मंगल करें तथा जिनेन्द्र भगवान् का जैनशासन नित्य ही सबका मंगल करे, यही मंगलभावना है।।१६।।


भावार्थ-षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथमखण्ड की टीका का समापन करते हुए पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने उपर्युक्त प्रशस्ति में अपनी गुरुपरम्परा का किंचित् परिचय प्रदान किया है तथा ग्रंथ समापन की मंगलबेला में अपनी हार्दिक प्रसन्नता भी व्यक्त की है जो प्रत्येक ग्रंथरचयिता की मनोभावना का परिचायक है।

।। इति शुभं।।


हिन्दी टीकाकत्र्री की प्रशस्ति

-शंभु छंद-

अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय सर्वसाधु को नमन करूँ।
गुरु शांति सिंधु अरु वीर सिंधु के पद में भी शत नमन करूँ।।
बीसवीं सदी के प्रथम सूरि श्री शांतिसागराचार्य हुए।
उन प्रथम शिष्य श्री वीरसिंधु जी प्रथम पट्ट आचार्य हुए।।१।।

इन वीर सिंधु गुरु की शिष्या आर्यिका ज्ञानमति माताजी।
ये गणिनीप्रमुख बीसवीं सदि की प्रथम बालसति माताजी।।
इनकी शिष्या आर्यिका चंदनामती मात मैं कहलाई।
गार्हस्थ्य अवस्था की लघु भगिनी बन इनसे शिक्षा पाई।।२।।

गृहकूप से कर अवलम्बन दे मुझको निकाल भवपार किया।
अल्पायू में व्रत ब्रह्मचर्य देकर मेरा उद्धार किया।।
सन् उन्निस सौ नवासी तेरह[७] अगस्त मैंने दीक्षा पाई।
आगम अनुसार बने चर्या यह पहली गुरुशिक्षा पाई।।३।।

श्री गणिनीप्रमुख ज्ञानमति माताजी की छत्रच्छाया में।
रत्नत्रय आराधना के स्वर्णिम क्षणों को मैंने पाया है।।
षट्खण्डागम सूत्रों पर संस्कृत टीका रची मातुश्री ने।
सिद्धान्तसुचिन्तामणि टीका अनमोल निधी इस युग की है।।४।।

उसकी हिन्दी टीका लिखने का मुझको है सौभाग्य मिला।
इस माध्यम से मेरी आत्मा में सम्यग्ज्ञान प्रसून खिला।।
सिद्धान्त ग्रंथ स्वाध्याय से मानो ज्ञानामृत का पान किया।
अपने गुरुवर की ज्ञानगंग में हो प्रसन्न स्नान किया।।५।।

षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा सर्वप्रथम।
उसका हिन्दी अनुवाद पूर्ण कर धन्य हुआ मेरा जीवन।।
पच्चिस सौ चौबिस वीर संवत् फाल्गुन कृष्णा सप्तमि तिथि है।
जिनवर सुपाश्र्व के मोक्षकल्याणक से पवित्र यह शुभ तिथि है।।६।।

अट्ठारह फरवरि सन् उन्निस सौ अट्ठानवे बुधवार दिवस।
श्री जम्बूद्वीप हस्तिनापुरि में सिद्ध मंदिरों के सम्मुख।।
श्री ज्ञानमती माताजी की सन्निधि में लेखन पूर्ण हुआ।
उनके करकमलों में कृति को अर्पण कर मन संतुष्ट हुआ।।७।।

गुरुचरणों में नतमस्तक हो बस यही कामना करती हूँ।
मिल जावे ज्ञानशक्ति मुझको बस यही प्रार्थना करती हूँ।।
इन षट्खण्डागम ग्रंथों की आगे भी हिन्दी लिख पाऊँ।
स्वाध्याय अध्ययन कर अपने सिद्धांतज्ञान को प्रगटाऊँ।।८।।

जयशील रहे सिद्धांतसुचिंतामणि टीका इस धरती पर।
जब तक सूरज चंदा तारे एवं नदियों का कल-कल स्वर।।
गणिनी माता श्री ज्ञानमती के ज्ञान का भी सम्मान रहे।
इन ग्रंथों का स्वाध्याय सतत करने वाले श्रुतज्ञान लहें।।९।।

।। इति शुभं भूयात् ।।
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टिप्पणी

  1. गोम्मटसार जीवकांड टीका।
  2. गोम्मटसार जीवकांड टीका, पृ. ९२९।
  3. आहारादायकानपि-आहारग्रहणकर्ता भगवान ऋषभदेव:, अकंपनाचार्यादिमुनिवराश्च तं तानपि च नुम:।
  4. ईसवी सन् २७-११-१९९५ को हस्तिनापुर से मांगीतुंगी के लिए संघ का विहार हुआ।
  5. ‘अस्ति’ इति क्रियाध्याहार: कर्तव्य:।
  6. ततोऽग्रे सर्वाणि सूत्राणि श्रीभूतबलिसूरिविरचितानीत्येवं सूच्यते।
  7. श्रावण शुक्ला ग्यारस तिथि।