05.इन्द्रिय मार्गणा

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इन्द्रिय मार्गणा

प्रश्न:1-इन्द्रिय किसे कहते हैं?

उत्तर-जैसे-नवग्रैवेयक आदि में उत्पन्न हुए अहमिन्द्र देव स्वामी-सेवक आदि के भेद से रहित मैं ही इन्द्र हूँ । ' इस प्रकार मानते हुए एक-एक होकर आज्ञा आदि की पराधीनता से रहित होते हुए अपने को स्वामी मानते हैं, उसी प्रकार स्पर्शन आदि इन्द्रियाँ भी अपने-अपने स्पर्श आदि विषयों में ज्ञान उत्पन्न करने के लिए अन्य इन्द्रियों की अपेक्षा न करते हुए स्वयै समर्थ होती हैं, इस प्रकार अहमिन्द्रों के समान इन्द्रियाँ हें । (गो. जी. 164)

प्रश्न:2- कितने प्रकार की होती हैं?

उत्तर-इन्द्रियाँ दो प्रकार की होती हैं - 1. द्रव्येन्द्रिय 2. भावेन्द्रिय ।

द्रव्येन्द्रिय - पुद्‌गल द्रव्य रूप इन्द्रिय द्रव्येन्द्रिय है अथवा निर्वृत्ति और उपकरण को द्रव्येन्द्रिय कहते हैं ।

भावेन्द्रिय - लब्धि और उपयोग को भावेन्द्रिय कहते हैं । (त. सू 2718)

प्रश्न:3-निर्वृत्ति कितने प्रकार की है?

उत्तर-निर्वृत्ति दो प्रकार की है - 1. बाह्य -हाल 2. आष्यन्तर निर्वृत्ति ।

बाह्म निर्वृत्ति - चक्षु आदि में मसूर आदि के आकार रूप बाह्य निर्वृत्ति है (सु. बो. 94)

इन्द्रिय नाम वाले आत्मप्रदेशों में प्रतिनियत आकाररूप और नामकर्म के उदय से विशेष अवस्था को प्राप्त जो पुद्‌गल प्रचय होता है, उसे बाह्य निर्वृत्ति कहते हैं । (सर्वा. 294)

आभ्यन्तर निर्वृत्ति - उत्सेधांगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण विशुद्ध आत्मप्रदेशों की चक्षुरादि के आकाररूप से रचना होना आभ्यन्तर निर्वृत्ति है । (रा. वा. 3)

प्रश्न:4-उपकरण कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तर-उपकरण दो प्रकार के होते हैं - 1. बाह्य उपकरण और 2. अध्यन्तर उपकरण । बाड़ा उपकरण - नेत्र सम्बन्धी पलक, दोनों बरौनी आदि बाह्य उपकरण हैं । इसी प्रकार सभी इन्द्रियों के उपकरण जानना चाहिए । '

अभ्यन्तर उपकरण - आँख में सफेद और काला मण्डल अध्यन्तर उपकरण है । (श्लो. 5

प्रश्न:5-इन्द्रियाँ कितनी होती है?

उत्तर-इन्द्रियाँ पाँच होती हैं - 1 स्पर्शन 2 रसना 3, प्राण 4. चक्षु और 5 कर्ण ।

प्रश्न:6-इन्द्रिय मार्गणा किसे कहते हैं?

उत्तर-एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय आदि सत्व, भूत और प्राणियों' में जीवों की खोज करने को इन्द्रिय मार्गणा कहते हैं ।

प्रश्न:7-इन्द्रिय मार्गणा कितने प्रकार की है?

उत्तर-इन्द्रिय मार्गणा पाँच प्रकार की है-

उत्तर-( 1) एकेन्द्रिय( 2) द्वीन्द्रिय (3) त्रीन्द्रिय (4) चतुरिन्द्रिय ( 5) पंचेन्द्रिय १२- द्र. सं. 1 टी.) एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय तथा अनीन्द्रिय जीव होते हैं । (ध.1/233 )

प्रश्न:8-यहाँ इन्द्रिय मार्गणा में कौनसी इन्द्रिय को ग्रहण करना चाहिए?

उत्तर-यहाँ आसव के कारण प्राण आदि स्थानों पर भावेन्द्रिय को ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि, यहाँ पर भावेन्द्रियों की अपेक्षा पंचेन्द्रियपना स्वीकार किया है । (ध.1/265)

प्रश्न:9-अनीन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?

उत्तर-जो नियम से इन्द्रियों के उन्मीलन आदि व्यापार से रहित है' क्योंकि वे अशरीरी हैं, उनके इन्द्रिय व्यापार का कारण जाति नामकर्म आदि कर्मों का अभाव है, इसी से अवग्रह आदि क्षायोपशमिक ज्ञानों के द्वारा पदार्थों को ग्रहण नहीं करते हैं । तथा इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध से होने वाले सुख से भी युक्त नहीं हैं, वे जिन और सिद्ध नामधारी जीव अनीन्द्रिय अनन्तज्ञान और सुख से युक्त होते हैं; क्योंकि उनका ज्ञान और सुख शुद्ध आत्मस्वरूप की उपलब्धि से उत्पन्न हुआ है । (गो. जी. 174 टी.)

प्रश्न:10-अनीन्द्रिय जीव कौन- कौनसे हैं?

उत्तर-तेरहवें, चौदहवें गुणस्थान वाले तथा सिद्ध भगवान अनीन्द्रिय होते हैं । यद्यपि तेरहवें- चौदहवें गुणस्थान वाले जीवों के द्रव्येन्द्रियाँ पाई जाती हैं परन्तु उनके भावेन्द्रियाँ नहीं पाई जाती हैं, क्योंकि उनके मतिज्ञानावरणादि कर्मों का क्षयोपशम नहीं पाया जाता है|

तलिका सख्या 5

एकेन्द्रिय

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 1 तिर्यंच
2 इन्द्रिय 1 एकेन्द्रिय
3 काय 5 पू,जल,अग्नि,वायु,वनस्पति पृथ्वी आदि पाँचों स्थावरों को ग्रहण करना चाहिए।
4 योग 3 औदारिकद्विक, कार्मण
5 वेद 1 नपुंसक स्त्रिवेद तथा पुरुषवेद नहीं है
6 कषाय 23 16 कषाय 7 नोकषाय
7 ज्ञान 2 कुमति-कुश्रुत
8 संयम 1 असंयम
9 दर्शन 1 अचखुदर्शन
10 लेश्या 3 कृ. नी. का. शुभ लेश्याएँ नहीं हैं।
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 2 मिथ्यात्व, सासादन सासादन सम्यक्त्व निर्वृत्यपर्याप्तकावस्था में होता है।
13 संज्ञी 1 असैनी
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 2 मिथ्यात्व, सासादन
16 जीवसमास 14 एकेन्द्रिय सम्बन्धी
17 पर्याप्त 4 आ. श. इ. श्वासो. भाषा तथा मनःपर्याप्ति नहीं है ।
18 प्राण 4 स्पर्श. कायबल. श्वासो. आयु
19 संज्ञा 4 आ. भ. मै. पीर.
20 उपयोग 3 2 ज्ञानो. 1 दर्शनो.
21 ध्यान 8 4 आर्त्त, 4 रौद्र
22 आस्रव 38 5 मि. 7 अ. 23 क. 3 यो स्पर्शनइन्द्रिय तथा षदकाय की हिंसा सम्बन्धी अविरति होती है
23 जाति 52 ला. एकेन्द्रिय सम्बन्धी विकलत्रय एवं पंचेन्द्रिय सम्बन्धी जाति नहीं है ।
24 कुल 67 ला.क. एकेन्द्रिय सम्बन्धी विकलत्रय एवं पंचेन्द्रिय सम्बन्धी कुल होती है ।

प्रश्न:-11 एकेन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?

उत्तर- जिन जीवों का चिह्न स्पर्शविषयक ज्ञान है, वे जीव एकेन्द्रिय हैं । जिन जीवों के एक ही इन्द्रिय होती है, वे एकेन्द्रिय जीव हैं । जैसे-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, इतरनिगोद, नित्यनिगोद, आदि । (गो. जी. 166)

प्रश्न:-12 एकेन्द्रिय जीवों के द्रव्यवेद नहीं पाया जाता है, इसलिए उनके नपुंसकवेद का अस्तित्व कैसे बतलाया है?

उत्तर-एकेन्द्रियों में द्रव्यवेद मत होओ; क्योंकि उसकी यहाँ प्रधानता नहीं है । अथवा द्रव्यवेद की एकेन्द्रियों में उपलब्धि नहीं होती है, इसलिए उसका अभाव सिद्ध नहीं होता है । किन्तु सम्पूर्ण प्रमेयों को जानने वाले केवलज्ञान से उसकी सिद्धि हो जाती है । किन्तु यह ज्ञान छद्‌मस्थों में नहीं पाया जाता है । (य. 1)

प्रश्न:-13 एकेन्द्रिय जीव खीभाव व पुरुषभाव नहीं समझते, उनके खी-पुरुष विषयक अभिलाषा कैसे बन सकती है?

उत्तर-नहीं; क्योंकि जो पुरुष सीवेद से सर्वथा अनजान है और णह के भीतर वृद्धि को प्राप्त हुआ है, ऐसे पुरुष के भी वासना देखी जाती है, इसलिए एकेन्द्रिय जीवों के सी-पुरुष भाव में नहीं समझने पर भी (नपुंसक) वेद होने में कोई बाधा नहीं है । (ध. 1 ' 346)

प्रश्न:-14 एकेन्द्रियों के कषायों का सद्‌भाव कैसे सिद्ध होता है?

उत्तर-वीन और न् साउथवेल्स के जंगलों में डक मारने वाले वृक्ष होते हैं । इन वृक्षों पर नुकीले काँटे होते हैं । इनकी पत्तियाँ घने बालों वाली होती हैं । इन वृक्षों के समीप जाने ५ पर पत्तियाँ शरीर से चिपक जाती हैं और अपने रोंयें छोड़ देती हैं, यह उनकी क्रोध कषाय कही जा सकती है ।

बरगद आदि वृक्ष अपनी डालियों से शाखाएँ निकालकर भूमि तक पहुँचा देते हैं तथा उन्हें ही अपने जड़ और तने के रूप में परिवर्तित कर लेते हैं । यूकेलिप्टस कुछ ही दिनों में 200 - 3०० फुट ऊँचाई तक सीधा-सीधा बढ्‌कर एक प्रकार से अपने अभिमान को ही प्रगट करता है ।

कीट-भक्षी पौधे स्पष्टरूप से मायावी दिखाई देते हैं । ये अपने रूप, रस, मथ से कटि, पतंगों आदि को अपनी ओर आकर्षित करके नष्ट कर देते हैं । इसी प्रकार अमरबेल भी धीरे- धीरे बढ्‌कर उसी वृक्ष को नष्ट कर देती है ।

कई वनस्पतियाँ अपना भोजन जमीन के भीतर अपनी जड़ों 7 तनों में संचित कर लेती हैं । यूकेलिप्टस अपनी अबू- बाजू का इतना पानी इकट्ठा करके रख लेता है कि 4 - 5 वर्ष तक अकाल पड़ने पर भी वह नहीं सूखता । यह उसकी कषाय का परिणाम

प्रश्न:-एकेन्द्रिय जीवों के मिथ्यात्व कैसे सिद्ध होता है?

उत्तर-एकेन्द्रिय जीवों के गृहीत- अगृहीत आदि सभी मिथ्यात्व सम्भव हैं; क्योंकि जिनका हृदय सातप्रकार के मिथ्यात्वरूपी कलक से अंकित है, ऐसे मनुष्यादि गति सम्बन्धी जीव पहले ग्रहण की हुई मिथ्यात्व पर्याय को न छोड्‌कर जब स्थावर पर्याय को प्राप्त करते हैं, तो उनके सातों' ही प्रकार का मिथ्यात्व पाया जाता है । इस कथन में कोई विरोध नहीं है । (ध. 17277)

प्रश्न:-क्या सभी एकेन्द्रिय जीवों के सभी मिथ्यात्व हो सकते हैं?

उत्तर-नहीं, जो एकेन्द्रिय अथवा द्वीन्द्रिय आदि जीव जिन्होंने आज तक संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याय को प्राप्त नहीं किया है उनके पाँचों गृहीत मिथ्यात्व नहीं हो सकते हैं, क्योंकि मन के अभाव में जीव में किसी के उपदेश को ग्रहण करने की क्षमता नहीं हो सकती है । उपदेश को ग्रहण किये बिना गृहीत मिथ्यात्व नहीं हो सकता है । ४- पु.)

प्रश्न:-एकेन्द्रिय जीवों के कम- से- कम कितने प्राण होते हैं?

उत्तर-एकेन्द्रिय जीवों के कम-से-कम तीन प्राण होते हैं-

1 स्पर्शन इन्द्रिय 2. कायबल 3. आयु ।

श्वासोच्छास पर्याप्ति पूर्ण होने के पहले श्वासोच्छास प्राण नहीं होता है, इसलिए निर्वृत्यपर्याप्त तथा लब्ध्यपर्यातक जीवों के तीन प्राण होते हैं ।

प्रश्न:-एकेन्द्रिय जीवों के आहारादि संज्ञाएँ कैसे सिद्ध होती ईं?

उत्तर-सम्पूर्ण रूप से छाल को उतार देने पर वृक्ष वनस्पति का मरण हो जाता है और जल, वायु आदि के मिलने से वे हरे- भरे हो जाते हैं इसलिए आहारसंज्ञा स्पष्ट है ।

स्पर्श कर लेने पर लाजवन्ती आदि वनस्पतियाँ संकुचित हो जाती हैं, अत: भय संज्ञा भी स्पष्ट है । स्त्रियों के कुल्ले के जल से सिंचित होने से कुछ लताएँ आदि हर्षित (पुष्पित) हो जाती हैं तथा स्त्रियों के पैरों के ताड़न से कुछ वनस्पतियों में पुष्प, अंकुर आदि प्रादुर्भूत हो जाते हैं इसलिए मैथुन संज्ञा भी स्पष्ट है ।

वृक्ष की जड़ें निधान-खजाने आदि की दिशा में फैल जाती हैं इसलिए परिग्रह संज्ञा भी स्पष्ट है । ( मू आ. 217)

लगभग पूरी बुझी हुई अग्नि भी थोड़ा वायु का झोंका लग जाने पर या रुई आदि अनुकूल

1 १ ऐकान्तिक ४ सांशयिक ११ छ (17) व्रआहित (४) वैनयिक ४४ स्वाभाविक ४४ विपरीत

प्रश्न:-ईंधन मिलने पर सचेत पुनर्जीवित हुई) देखी जाती है, इसको उनकी आहार सज्ञा कह सकते हैं ।

उत्तर:-अग्नि से अग्नि आगे-आगे बढ़ती हुई देख कर परिग्रह संज्ञा कही जा सकती है । इसी प्रकार पृथ्वी आदि में भी संज्ञाएँ पाई जाती हैं ।

सिद्धान्त की दृष्टि से वेद कर्म के बन्ध का कारण वेद का उदय कहा गया है । उनके (स्केन्द्रिय जीवों के) वेद का बन्ध होता है इसलिए उनके मैथुनसंता होती ही है, ऐसे ही अएकायिक आदि के उदय के साथ समझना चाहिए ।

प्रश्न:1-एकेन्द्रिय जीवों के वचनयोग नहीं होता है, फिर उनके मृषानन्दी रौद्रध्यान कैसे हो सकता है?

उत्तर:-एकेन्द्रिय जीवों के भी स्पर्शन इन्द्रिय के माध्यम से झूठ बोलने में आनन्द की तथा झूठ बोलने वाले की अनुमोदना सम्बन्धी कल्पनाएँ हो सकती हैं ।

दूसरी बात, रौद्रध्यान के लिए बोलने की या वचनयोग की अतिआवश्यकता भी नहीं है । अत: उनके मृषानन्दी रौद्रध्यान होने में कोई बाधा नहीं है ।

प्रश्न:-एकेन्द्रिय जीवों के अपर्याप्त अवस्था में कितने आसव के प्रत्यय होते हैं?

उत्तर:-एकेन्द्रिय जीवों के अपर्याप्त अवस्था में 36 आसव के प्रत्यय होते हैं - 5 मिथ्यात्व, 7 अविरति, 23 कषाय, 1 योग (औदारिक मिश्र) काय योग-- 36


प्रश्न:-एकेन्द्रिय जीवों की 52 लाख जातियाँ कौन- कौनसी हैं?

उत्तर-एकेन्द्रिय जीवों की जातियाँ-

पृथ्वीकायिक 7 लाख नित्यनिगोद 7 लाख

जलकायिक 7 लाख इतर निगोद 7 लाख

अग्रिकायिक 7 लाख वनस्पति कायिक 1० लाख

वायुकायिक 7 लाख कुल- 52 लाख ।


प्रश्न:-एकेन्द्रिय के कितने कुल हैं?

उत्तर:-एकेन्द्रिय जीवों के 67 लाख करोड़ कुल हैं-

पृथ्वीकायिक 22 लाख करोड़ वायुकायिक 7 लाख करोड़

जलकायिक 7 लाख करोड़ वनस्पतिकायिक 28 लाख करोड़

अग्निकायिक 3 लाख करोड़ योग न् 67 लाख करोड़ कुल

तालिका संख्या 6

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 1 तिर्यञ्चगति
2 इन्द्रिय 1 स्वकीय द्वीन्द्रिय के द्वीन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 4 1 वचनयोग 3 काययोग अनुभय वचनयोग होता है ।
5 वेद 1 नंपुसक
6 कषाय 23 16 कषाय 7 नोकषाय स्त्री तथा पुरुषवेद नहीं होते हैं
7 ज्ञान 2 कुमति-कुश्रुतज्ञान
8 संयम 1 असंयम
9 दर्शन 1,2 चखुदर्शन, अचक्षु. चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रिय के ही होता है ।
10 लेश्या 3 कृ. नी. का.
11 भव्य 2 भव्य, अभव्य
12 सम्बक्ल 2 सासा. मिथ्यात्व
13 संज्ञी 1 असैनी
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 2 मिथ्यात्व, सासादन
16 जीवसमास स्वकीय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय,चतुरिन्द्रिय में से
17 पर्याप्ति 5 आ. श. इ. श्वा. भा. मनःपर्याप्ति नहीं होती है ।
18 प्राण 6,7,8 द्वीन्द्रिय के 6, त्रीन्द्रिय के 7, चतुरिन्द्रिय के 8 प्राण
19 संज्ञा 4 आ. भ. मैं. पीर.
20 उपयोग 3,4 2 ज्ञानो. 1 दर्शनो,; 2 दर्शनो चतुरिन्द्रिय जीव के 4 उपयोग हैं ।
21 ध्यान 8 4 आ. 4 रौ.
22 आस्रव स्वकीय 40,41,42 द्वीन्द्रिय के 4०, त्रीन्द्रिय के 41 चतुरिन्द्रिय के 42 ।
23 जाति स्वकीय 2 ला.2 ला.2 ला.
24 कुल स्वकीय 7 ला.क,8 ला.क.,29 ला.क.


प्रश्न :- द्वीन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?

उत्तर : जिनका चिह्न स्पर्श और रस विषयक ज्ञान है वे द्वीन्द्रिय जीव हैं । जिन जीवों के दो इन्द्रियाँ पाई जाती हैं वे द्वीन्द्रिय जीव हैं । जैसे- शंख, कृमि, लट (कँचुआ), सीप, गिजाई, जौंक, कौड़ी, सूचीमुख, आदि । (गो. जी. 166)

प्रश्न:- त्रीन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?

उत्तर:- जिनका चिह्न स्पर्श, रस तथा गन्ध विषयक ज्ञान है वे जीव त्रीन्द्रिय हैं । जिन जीवों के तीन इन्द्रियाँ होती हैं वे त्रीन्द्रिय जीव हैं । जैसे-कुन्धु, पिपीलिका, चींटा, लूँ बिच्छू कनखजूरा, खटमल, लीखें आदि । (गो. जी. 166)

प्रश्न:- चतुरिन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?

उत्तर :- जिनका चिह्न स्पर्श, रस, गन्ध तथा वर्ण विषयक ज्ञान है वे चतुरिन्द्रिय जीव हैं । जिनके चार इन्द्रियाँ हैं वे चतुरिन्द्रिय जीव हैं । जैस झिंगुर, डाँस, मच्छर, पतंगा, भ्रमर आदि । (गो. जी. 166)

प्रश्न :- विकलत्रयों में चींटा- चींटी, भ्रमर- भ्रमरी आदि स्त्री-पुरुष देखे जाते हैं, अत: उनके भी स्त्री- पुरुष वेद मानने में क्या बाधा है?

उत्तर :- विकलत्रयों में भी स्त्री-पुरुष लिक् वाले नाम देखे जाते हैं । लोक में नपुसक लिक् वाले शब्दों का उच्चारण भी स्त्री या पुरुष वेद के रूप में ही होता है । जैसे पुस्तक शब्द नपुसक लिङ्ग का है फिर भी, पुस्तक रखी है, ऐसा ही बोला जाता है । दूध शब्द नपुंसक लिङ्ग का है फिर भी पूछिक् में बोला जाता है । इसी प्रकार से विकलत्रय, एकेन्द्रिय आदि में भी बोला जाता है । एकेन्द्रियों में भी कमल- कमलिनी आदि ।

इसका अर्थ उनके स्त्री-पुरुष वेद हो गया, ऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर तो अजीवों में भी चमचा-चमची, भगोना- भगोनी, कटोरा-कटोरी आदि व्यवहार होता है तो उनके भी स्त्री-पुरुष वेद हो जायेगा । लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि अजीवों के तो वेद ही नहीं हो सकता है । अत: आगम में एकेन्द्रिय तथा विकलत्रयों के नपुसक वेद ही कहा गया है, सो सत्य है ।

प्रश्न :- क्या ढाई द्वीप के बाहर के विकलत्रय जीवों में भी नपुंसक वेद ही होता है?

उत्तर :- नहीं, ढाई द्वीप के बाहर विकलत्रय जीव नहीं होते हैं । विकलत्रय जीव तो मात्र कर्मभूमिया तिर्यंचों में ही होते हैं ।

प्रश्न :- क्या ढाई द्वीप के बाहर कहीं पर भी विकलत्रय जीव नहीं होते हैं?

उत्तर :- नहीं, ढाई द्वीप के बाहर असख्यात द्वीप-०० में मात्र पंचेन्द्रिय तिर्यंच होते हैं लेकिन अन्त के स्वयम्पूरमण द्वीप तथा स्वयम्पूरमण समुद्र में विकलत्रय जीव भी पाये जाते हैं । उनके भी नपुसक वेद ही पाया जाता है । ( ध. 47243)

प्रश्न:-क्या कर्मभूमिया मनुष्य- तिर्यंचों के समान विकलत्रय जीवों के भी वेद की विषमता हो सकती है?

उत्तर:-नहीं, कर्मभूमिया मनुष्य-तिर्यंचों के समान विकलत्रय जीवों के वेद की विषमता नहीं हो सकती है, क्योंकि कहा है - नारकसम्हर्च्छिनो नपुंसकानि । ।त. सु 275० । । नारकी एवं समर्चन जन्म वाले जीवों के एक नपुसक वेद ही होता है । विकलत्रय जीव भी समर्चन जन्म वाले होते हैं इसलिए उनके वेद की विषमता नहीं हो सकती है ।

प्रश्न:-चींटी आदि के अण्डे देखे जाते हैं, अत: उनके नपुंसक वेद ही कैसे हो सकता है?

उत्तर:-चींटी आदि जीवों के अण्डों की उत्पत्ति गर्भ से नहीं होती है । चींटियाँ आदि केवल यहाँ- वहाँ के मल-मूत्र आदि गन्दे स्थानों से सड़े-गले पुद्‌गलों को लेकर विशेष स्थानों में रख लेती है । कालान्तर में वे ही पुद्‌गल पिण्ड चींटी आदि के शरीर बन जाते हैं । (श्लो. मे 52)

इसी प्रकार सिर की जुएँ भी जो लीख के रूप में अण्डों जैसी दिखाई देती हैँ, उनकी उत्पात्ते भी ऐसे ही जानना चाहिए । इसलिए अण्डाकार दिखाई देने पर भी ये सब नपुंसक वेद वाले ही होते है ।


प्रश्न:-विकलत्रय जीवों के कितने प्राण होते हैं?

उत्तर:-विकलत्रय जीवों के प्राण-

दो इन्द्रिय जीवों के पर्याप्तावस्था में 6 प्राण - 2 इन्द्रियाँ (स्प. रस.) 2 बल

(वच. का.) श्वासोच्चवास तथा आयु ।

तीन इन्द्रिय जीवों के पर्याप्तावस्था में 7 प्राण - 3 इन्द्रियाँ (स्प. रसघ्रा.) 2 बल, श्वासोच्चवास तथा आयु ।

चतुरिन्द्रिय जीवों के पर्याप्तावस्था में 8 प्राण - 4 इन्द्रियाँ सरस. प्रा.च.) 2 बल, श्वासोच्चवास तथा आयु ।

इन सबके निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था में श्वासोच्छवास तथा वचन बल नहीं होता है अत: इनके क्रमश: 4, 5 तथा 6 प्राण होते हैं । (गो. जी. 133)


प्रश्न:-विकलत्रय जीवों के कितने उपयोग होते हैं?

उत्तर:-. द्वीन्द्रिय तथा त्रीन्द्रिय जीवों के 3 उपयोग होते हैं- कुमतिज्ञानो., कुधुतज्ञानो. तथा अचखुदर्शनो. ।

चतुरिन्द्रिय जीवों के 4 उपयोग होते हैं- कुमतिज्ञानो., कुश्रुतज्ञानो., चखुदर्शनो. तथा अचखुदर्शनो. ।

नोट - द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय जीवों के चक्षुइन्द्रिय के अभाव में चखुदर्शनो. नहीं होता हैं । विकलत्रय जीवों के कितने आसव के प्रत्यय होते हैं? विकलत्रय जीवों के आसव के प्रत्यय-

द्वीन्द्रिय जीवों के 4० आसव के प्रत्यय होते हैं - 5 मिथ्यात्व, 8 अविरति (षट्‌कायिक जीव एवं दो इन्द्रिय सम्बन्धी) 23 कषाय, 4 योग|

त्रीन्द्रिय जीवों के 41 आसव के प्रत्यय होते हैं - 5 मिथ्यात्व 9 अविरति, 23 कषाय, 4 योग ।

चतुरिन्द्रिय जीवों के 42 आसव के प्रत्यय होते हैं- 5 मिथ्या. 1० अवि. 23 कषाय, 4 योग । इन्हीं जीवों के निर्वृत्यपर्याप्तक तथा लस्थ्यपर्याप्तक अवस्था में तीन योग (औदारिक काययोग, कार्मणकाययोग तथा वचनयोग) कम करने पर क्रमश: 37, 38, 39 आसव के प्रत्यय है ।

इन्हीं जीवों के विग्रहगति में औदारिकद्विक तथा वचनयोग कम करने पर क्रमश: 37, 38 ' 39 आसव के प्रत्यय हैं ।


प्रश्न:-एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय जीवों के षट्‌कायिक जीवों की हिंसा सम्बन्धी आसव के प्रत्यय कैसे हो सकते हैं?

उत्तर:-मकड़ी के समान कुछ विशेष जाति की झाड़ियाँ मनुष्य जैसे बड़े-बड़े जीवों को भी पकड़ती हुई देखी जाती हैं । चींटियाँ लट आदि को पकड़कर ले जाते हुए प्रत्यक्ष देखी जाती हैं, गाय, भैंस, मनुष्य आदि को कीड़े- मकोड़े आदि काटते हुए देखे जा सकते हैं अत: उनके भी षट्‌कायिक जीवों सम्बन्धी आसव होता ही है क्योंकि हिंसा का त्याग किये बिना यदि कोई हिंसा नहीं भी करता है या किसी के निमित्त से हिंसा नहीं भी होती है तो भी उसे हिंसा का पाप लगता ही है । अत: एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय जीवों के भी षट्‌कायिक जीवों की हिंसा सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय होते ही हैं ।

तालिका संख्या 7

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 4 न.ति.म.दे.
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 15 4 म. 4 व. 7 का.
5 वेद 3 स्त्री, पुरुष, नपुंसक मनुष्य-तिर्यव्व की अपेक्षा तीनों वेद होते हैं
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 3 कुज्ञान, 5 ज्ञान
8 संयम 7 सा. छे. प. सू यथा. संय. अस.
9 दर्शन 4 चक्षु. अचक्षु. अवधि. केवल. मनुष्यों के चारों दर्शन होते हैं।
10 लेश्या 6 कृ. नी. का. पी. प. शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्षा. उ. क्षायो. सा. मिश्र. मि.
13 संज्ञी 2 सैनी, असैनी
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 14 पहले से चौदहवें तक
16 जीवसमास 2 सैनी पंचेन्द्रिय, असैनीपंचेन्द्रिय तिर्यच्चों की अपेक्षा असैनी सम्बन्धी जीवसमास है ।
17 पर्याप्ति 6 आ.श.इ.श्वा.भा.म.
18 प्राण 10 5 इ.3 बल,श्वा.आयु
19 संज्ञा 4 आ. भ. मै. पीर.
20 उपयोग 12 8 ज्ञानो,. 4 दर्शनो. मनुष्यों की अपेक्षा कहे हैं
21 ध्यान 16 4 आ. 4 री. 4 ध. 4 शु.
22 आसव 57 5 मि. 12 अ. 25 क. 15 यो. पंचेन्द्रिय सम्बन्धी
23 जाति 26 ला. पंचेन्द्रिय सम्बन्धी एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक की जातियाँ नहीं हैं ।
24 कुल 108 1/2 ला.क. पंचेन्द्रिय सम्बन्धी एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक के? नहीं हैं

प्रश्न:-पंचेन्द्रिय जीव किसे कहते हैं?

उत्तर:-जिनका चिह्न स्पर्श, रस, गंध, वर्ण तथा शब्द विषयक ज्ञान है, वे पंचेन्द्रिय जीव हैं । जिनके पाँच इन्द्रियाँ होती हैं, वे पंचेन्द्रिय जीव हैं । जैसे-देव, नारकी, मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बैल आदि । (गो. जी. 166)

मनुष्य, देव, नारकी, तिर्यव्व संज्ञी, असंज्ञी तिर्यस्थ्य, साँप, फन वाले नाग, सरकने वाले अजगर आदि तथा चौपाये आदि पाँच इन्द्रिय जीव कहलाते हैं ।


प्रश्न:-पंचेन्द्रिय तिर्यस्थ्य कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तर:-पंचेन्द्रिय तिर्यब्ज तीन प्रकार के होते हैं - 1 जलचर 2 थलचर 3 नभचर ।

जलचर - जो पानी में रहते हैं, जल ही जिनका जीवन है वे जलचर जीव हैं । जैसे मछली, महामख्स, तन्दुलमक्य, आदि ।

थलचर - जो धरती पर निवास करते हैं, वे थलचर हैं । जैसे हाथी, घोड़ा, बैल, गाय, चीता, भैंस आदि ।

नभचर - जो आकाश में उड़ते हैं, वृक्षों पर रहते हैं, वे नभचर हैं । जैसे कबूतर, चिड़िया, तोता, मैना, कोयल आदि ।


प्रश्न:-क्या कोई ऐसा पंचेन्द्रिय जीव है जो सभ्य? मार्गणा के सभी भेदों को प्राप्त कर सकता है?

उत्तर:-ही, एक निकट भव्य पंचेन्द्रिय जीव सम्बक्ल मार्गणा के सभी भेदों को प्राप्त कर सकता है । जैसे- किसी मिथ्यादृष्टि के मिथ्यात्व होता है । वही जब प्रथमोपशम सम्बक्ल प्राप्त करता है तो उसको प्रथमोपशम सम्बक्ल होता है । उसी के यदि अनन्तानुबन्धी चतुष्क में से किसी एक का उदय आ जावे तो वह सासादन सम्यग्दृष्टि बन जाता है । उसी के यदि सम्बग्मिथ्यात्व प्रकृति का उदय आ जावे तो वह सम्बग्मिथ्यादृष्टि बन जायेगा । उसी के यदि सम्यक् प्रकृति का उदय आता है तो वह क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि होता है । वही क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि यदि अनन्तानुबन्धी चतुष्क तथा मिथ्यात्व, सम्बग्मिथ्यात्व तथा सम्यक् प्रकृति का क्षय कर देता है तो वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है । इस प्रकार एक जीव के सम्बक्ल मार्गणा के सभी भेद हो जाते हैं ।

नोट - 1 सम्यक् प्रकृति तथा सम्बग्मिथ्यात्व प्रकृति का उदय मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि दोनों के आ सकता है । 2, सम्बक्ल मार्गणा के सभी भेद एक भव में मनुष्यगति वाले के ही हो सकते हैं


प्रश्न:-क्या सभी पंचेन्द्रिय जीवों के छहों पर्याप्तियाँ होती हैं?

उत्तर:-नहीं, मात्र सैनी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवों के ही छहों पर्याप्तियाँ होती है । सैनी लब्ध्यपर्यातक जीवों के छहों पर्यातियाँ नहीं होती हैं, क्योंकि शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने के पहले ही उसका मरण हो जाता है इसलिए उनको लब्ध्यपर्यातक ' अपर्याप्तक कहा जाता है । उसके छह अपर्याप्तियाँ होती है ।


प्रश्न:-पंचेन्द्रिय जीवों के पन्द्रह योग किस अपेक्षा होते हैं?

उत्तर:-पंचेन्द्रिय जीवों के - चार मनोयोग तथा 3 वचन योग (अनुभय वचनयोग बिना)

संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यव्व तथा तीनों गति के जीवों की अपेक्षा ।

अनुभय वचनयोग - संज्ञी तथा असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों की अपेक्षा ।

औदारिकद्बिक - मनुष्य - तिर्यब्ज की अपेक्षा ।

वैक्रियिकद्रिक - देव - नारकी की अपेक्षा ।

आहारक द्विक - छठे गुणस्थान की अपेक्षा ।

कार्मणकाययोग - विग्रह गति तथा केवली समद्‌घात की अपेक्षा ।


प्रश्न:-पंचेन्द्रिय जीवों की 26 लाख जातियों कौन-कौनसी हैं?

उत्तर:-पंचेन्द्रिय जीवों की 26 लाख जातियाँ-

नारकियों की 4 लाख, तिर्यव्यपैचेन्द्रियों की 4 लाख ।

मनुष्यों की 14 लाख, देवों की 4 लाख । ८ कुल 26 लाख ।


प्रश्न:-पंचेन्द्रिय जीवों के 108 ?? लाख करोड़ कुल कौन- कौन से हैं?

उत्तर:-पंचेन्द्रिय के कुल-

नारकियों के - 25 लाख करोड़, तिर्यच्चों में जलचरों के - 12 -ा? लाख करोड़

थलचरों के - 19 लाख करोड़

नभचरों के - 12 लाख करोड़

मनुष्यों के 14 लाख करोड़, देवों के - 26 लाखकरोडू । ज् 1०8 -2 लाख करोड़ । किन जीवों के इन्द्रियाँ नहीं होती हैं? तेरहवें-चौदहवें गुणस्थान में भावेन्द्रियाँ नहीं होती हैं, क्योंकि वहाँ इन्द्रियावरण कर्म का क्षयोपशम नहीं होता है । विग्रहगति में तथा जब तक इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तब तक स्केन्द्रियाँ नहीं होती हैं क्योंकि वहाँ इन्द्रिय के यभ्ये नाम र्क्म अ अय नहीं होता है।

- समुच्चय प्रश्नोत्तर -

प्रश्न:-किस इन्द्रिय वाले जीव किस गति में होते हैं?

उत्तर:-तिर्यंच गति में एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय जीव होते हैं । नरक, मनुष्य तथा देवगति में केवल संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव ही होते हैं । मनुष्य गति में अनिन्द्रिय जीव भी होते हैं । पंचम सिद्ध गति में भी अनिन्द्रिय जीव ही होते हैं ।


प्रश्न:-कौन- कौनसे प्राण इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं?

उत्तर:-चार प्राण इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं-

स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, श्वासोच्छवास और आयु ।

रसनाइन्द्रिय आदि प्राण - एकेन्द्रिय जीवों के नहीं होते ।

वचनबल प्राण भी - एकेन्द्रिय जीवों के नहीं होता ।

मनोबल प्राण - एकेन्द्रिय से चतुरिंन्द्रिय तक नहीं होते ।


प्रश्न:-ऐसे कितने उपयोग हैं जो इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में नहीं पाये जाते हैं?

उत्तर:-9 उपयोग इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में नहीं पाये जाते हैं-

6 ज्ञानोपयोग-मतिज्ञानो., -लजान,, अवधिज्ञानो., मन: पर्ययज्ञानो., केवलज्ञानो. तथा विभंगावधिज्ञानो.'

3 दर्शनोपयोग- चक्षुदर्शनी., अचक्षुदर्शनो., अवधिदर्शनो.

इनमें से चक्षुदर्शनो. को छोड्कर शेष आठ उपयोग संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के ही होते हैं । चक्षुदर्शनो. एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय तथा त्रीन्द्रिय जीवों के नहीं होता है । मात्र तीन उपयोग (कुमतिज्ञानो. कुसुतज्ञानो. तथा अचक्षुदर्शनो.) इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं ।

प्रश्न:-आस्रव के ऐसे कौन- कौनसे कारण हैं, जो इन्द्रियमार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं?

उत्तर:-आस्रव के 38 प्रत्यय ऐसे हैं, जो इन्द्रिय मार्गणा के सभी भेदों में पाये जाते हैं-

5 मिथ्यात्व, 23 कषाय, 7 अविरति तथा 3 योग- 38 ।

स्त्रीवेद, पुरुषवेद - एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक नहीं होते हैं ।

रसनाआदि चार इन्द्रिय - एकेन्द्रिय आदि जीवों के नहीं होती हैं ।

तथा मन सम्बन्धी अविरति

4 मनोयोग 3 वचनयोग - एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रिय तक नहीं हैं ।

आहारकद्विक तथा वैक्रियिकद्विक

अनुभयवचनयोग - एकेन्द्रिय जीवों के नहीं है ।

प्रश्न:-आसव के ऐसे कौन- कौन से प्रत्यय हैं जो एकेन्द्रिय में नहीं होते हैं लेकिन पंचेन्द्रिय के होते हैं?

उत्तर:-आसव के 19 प्रत्यय ऐसे हैं जो एकेन्द्रिय के नहीं होते हैं लेकिन पंचेन्द्रिय के होते हैं- 5 अविरतियाँ - रसना, प्राण, चक्षु, कर्ण तथा मन सम्बन्धी ।

2 कषाय - स्त्रीवेद तथा पुरुषवेद ।

12 योग - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग, आहारकद्विक तथा वैक्रियिकद्रिक ।

पंचेन्द्रिय जीवों के जाति तथा कुल अधिक हैं या एकेन्द्रिय जीवों के?

उत्तर:-पंचेन्द्रियों में कुल अधिक हैं, लेकिन एकेन्द्रियों में जातियाँ अधिक हैं ।

पंचेन्द्रियों में 1०8 -?2 लाख करोड़ कुल हैं तो एकेन्द्रिय में मात्र 67 लाख करोड़ कुल ही हैं ।

प्रश्न:-पंचेन्द्रियों के मात्र 26 लाख जातियों हैं तो एकेन्द्रिय जीवों की 52 लाख जातियाँ हैं । इन्द्रिय मार्गणा के किस भेद में सबसे ज्यादा जीवसमास हैं?

उत्तर:-एकेन्द्रिय जीवों के 14 जीवसमास हैं- पृथ्वीकायिक के दो, जलकायिक के दो, अग्रिकायिक के दो, वायुकायिक के दो तथा वनस्पतिकायिक के छह इस प्रकार च् 14 जीवसमास हैं ।

प्रश्न:-कौनसी इन्द्रिय वालों के एक काययोग एवं एक वचनयोग होता है?

उत्तर:-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तथा असंज्ञीपंचेन्द्रिय जीवों की पर्याप्त-अवस्था में एक औदारिक काययोग और एक अनुभयवचनयोग होता है ।