05. चतुर्थ चूलिका अधिकार ( द्वितीय महादण्डक )

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चतुर्थ चूलिका अधिकार(द्वितीय महादण्डक)

अथ द्वितीयो महादण्डक:

चतुर्थचूलिकाधिकार:
मंगलाचरणम्
चतुर्विंशति तीर्थेशा:, कुर्वन्तु भुवि मंगलम्।
समवसृतयस्तेषां-अस्माकं मंगलं क्रियात्।।१।।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे जीवस्थानचूलिकाया अन्तर्गतचतुर्थचूलिकायां द्वितीयो महादण्डक: कथ्यते तत्र तावत् सूत्रद्वयं वक्ष्यते।
अथ द्वितीयमहादण्डकप्रतिपादनप्रतिज्ञापनाय सूत्रमवतरति-तत्थ इमो विदियो महादण्डओ कादव्वो भवदि।।१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमदण्डकादभिन्नस्यापि एतस्य द्वितीयत्वं भवति, प्रकृतिभेदेन स्वामित्वभेदेन च भेदोपलंभात्।
देवा नारकाश्च या: या: प्रकृती: बध्नन्ति, तासां नामकथनाय सूत्रमवतरति-पंचण्हं णाणावरणीयाणं णवण्हं दंसणावरणीयाणं सादावेदणीयं मिच्छत्तं सोलसण्हं कसायाणं पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय-दुगुंछा। आउअं च ण बंधदि। मणुसगदि-पंचिंदियजादि-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाणं ओरालियसरीरअंगोवंगं वज्जरिसहसंघडणं वण्ण-गंध-रस-फासं मणुसगदि-पाओग्गाणुुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-पसत्थविहायगदी तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिण-उच्चागोदं पंचण्हं अंतराइयाणं एदाओ पयडीओ बंधदि पढम-सम्मत्ताहिमुहो अधो सत्तमाए पुढवीए णेरइयं वज्ज देवो वा णेरइओ वा।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमसम्यक्त्वाभिमुख: कश्चिद् देव: नारको वा सूत्रकथितप्रकृती: बध्नाति। अत्र सप्तमपृथिवीं वर्जयित्वा षण्णां नरकभूमीनां कश्चिदेव नारको एव गृह्यते।
प्रथममहादण्डके यथा औदारिकशरीर-औदारिकशरीरांगोपांगयो: बंधव्युच्छेद: जात:, तथा तस्यामेव विशुद्धौ वर्तमानदेवनारकयो: तयो: प्रकृत्यो: बंधव्युच्छेद: किन्न भवति ?
उच्यते-मनुष्यगति-तिर्यग्गत्युदयेन सहकारिकारणेन वर्जिता केवलं एकाकिनी विशुद्धि: तयो: बंधव्युच्छेदकरणक्षमा न भवति, कारणसामग्रीत: उत्पद्यमानस्य कार्यस्य विकलकारणात् समुत्पत्तिविरोधात्। देवनारकयो: तयो: औदारिक-औदारिकांगोपांगयो: ध्रुवबंधित्वसंभवात् च न बंधव्युच्छेद:। एवं वङ्काऋषभसंहननस्यापि बंधविनाशे कारणं वक्तव्यं।
‘आउगं च ण बंधदि’ इति ‘च’ शब्द: समुच्चयार्थत्वात् अन्याश्च प्रकृती: अवध्यमाना: सूचयति।
ता: कतमा: ?
असातावेदनीय-स्त्री-नपुंसकवेद-अरति-शोक-आयु:चतुष्क-नरक-तिर्यग्देवगति-एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियजाति-वैक्रियिक-आहारकशरीरं-समचतुरस्रसंस्थानं वर्जयित्वा पंचसंस्थानं वैक्रियिकाहार-शरीरांगोपांगं वङ्काऋषभसंहननं वर्जयित्वा पंचसहननं नरक-तिर्यग्-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी अप्रशस्तविहायोगति: आतपोद्योत-स्थावर-सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारण-अस्थिर-अशुभ-दुर्भग-दु:स्वर-अनादेय-अयश:कीर्ति-नीचैर्गोत्र-तीर्थकरमिति। एतासां प्रकृतीनां बंधव्युच्छेदक्रम: यथा प्रथममहादण्डके उक्त: तथा वक्तव्य:।
तात्पर्यमेतत्-कश्चिद् देवो नारको वा यदा सम्यक्त्वग्रहणाभिमुखो भवति तदा क्षयोपशमविशुद्ध्यादि-लब्धिप्रभावेण ज्ञानावरणादिप्रकृती: द्वासप्ततिश्च बध्नाति आयूंषि न बध्नाति ततश्च असातावेदनीयादय: चतुश्चत्वािंरशत्प्रकृतय: या: कथितास्ताश्चापि न बध्नातीति। अनया विशुद्ध्या वर्धमान: करणलब्धिं संप्राप्य सम्यक्त्वमहारत्नं हस्तगतं कर्तुं शक्नोति।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे श्रीभूतबलि-सूरिविरचितजीवस्थानचूलिकान्तर्गतचतुर्थचूलिकायां गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां द्वितीयमहादण्डको नाम चतुर्थ: चूलिकाधिकार: समाप्त:।

अथ द्वितीय महादण्डक (चतुर्थ चूलिका अधिकार)

-मंगलाचरण-

चौबीस तीर्थंकर भगवान जगत में मंगल करें, उनके समवसरण भी हम सबके लिये मंगलकारी होवें।।१।। अब षट्खण्डागम ग्रन्थराज के प्रथमखण्ड के छठे ग्रन्थ में जीवस्थान चूलिका के अन्तर्गत चौथी चूलिका में दूसरे महादण्डक नाम को कहेंगे, इसमें दो सूत्र कहेंगे।

अब दूसरे महादण्डक के प्रतिपादन की प्रतिज्ञा के रूप में सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

उन तीन महादण्डकों में से यह दूसरा महादण्डक कहने योग्य है।।१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथम दण्डक से अभिन्न होते हुये भी इस दण्डक के द्वितीयपना है, क्योंकि प्रकृतियों के भेद से और स्वामीपने के भेद से दोनों दण्डकों में भेद पाया जाता है।

अब देव और नारकी जिन-जिन प्रकृतियों को बांधते हैं उनके नामों का कथन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख देव तथा नीचे सातवीं पृथिवी के नारकी को छोड़कर शेष नारकी जीव, पाँचों ज्ञानावरणीय, नवों दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी आदि सोलह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, इन प्रकृतियों को बांधता है किन्तु आयुकर्म को नहीं बांधता है। मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, समचतुरस्र संस्थान, औदारिक-शरीर अंगोपांग, वङ्काऋषभनाराचसंहनन, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों को बांधता है।।२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुये कोई देव अथवा नारकी उपर्युक्त सूत्र में कथित प्रकृतियों को बांधते हैं। यहाँ सातवीं पृथिवी को छोड़कर छह नरकभूमियों के कोई नारकी ही ग्रहण किये गये हैं।

शंका-प्रथम महादण्डक में जिस प्रकार औदारिक शरीर और औदारिक शरीर-अंगोपांग, इन प्रकृतियों का बंध-व्युच्छेद हुआ है, उस प्रकार उसी ही विशुद्धि में वर्तमान देव और नारकियों के उन प्रकृतियों का बन्ध-व्युच्छेद क्यों नहीं होता ?

समाधान-सहकारी कारणरूप मनुष्यगति और तिर्यग्गति के उदय से वर्जित (रहित) अकेली विशुद्धि उन प्रकृतियों के बंध-व्युच्छेद करने में समर्थ नहीं है क्योंकि कारण-सामग्री से उत्पन्न होने वाले कार्य की विकल कारण से उत्पत्ति का विरोध है अर्थात् जो कार्य कारण-सामग्री की सम्पूर्णता से उत्पन्न होता है, वह कारण-सामग्री की अपूर्णता से उत्पन्न नहीं हो सकता है। दूसरी बात यह है कि देव और नारकियों में औदारिक शरीर आदि उन प्रकृतियों का ध्रुवबंध सम्भव है इसलिये उनका बंध-व्युच्छेद नहीं होता है।

इसी प्रकार वङ्कावृषभनाराचसंहनन के भी बंध-व्युच्छेद में कारण कहना चाहिये। ‘आउगं च ण बंधदि’ इस वाक्य में पठित ‘च’ शब्द समुच्चयार्थक है अतएव नहीं बंधने वाली अन्य भी प्रकृतियों को सूचित करता है।

शंका-वे नहीं बंधने वाली प्रकृतियाँ कौन सी हैं ?

समाधान-असातावेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति, शोक, आयुचतुष्क, नरकगति, तिर्यग्गति, देवगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, वैक्रियिक शरीर, आहारकशरीर, समचतुरस्रसंस्थान को छोड़कर शेष पाँच संस्थान, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, आहारकशरीर-अंगोपांग, वङ्काऋषभनाराचसंहनन को छोड़कर शेष पाँच संहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अप्रशस्तविहायोगति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, नीचगोत्र और तीर्थंकर, ये नहीं बंधने वाली प्रकृतियाँ हैं।

इन प्रकृतियों के बंध-व्युच्छेद का क्रम जिस प्रकार प्रथम महादण्डक में कहा है, उसी प्रकार यहाँ पर कहना चाहिये।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-कोई देव अथवा नारकी जब सम्यक्त्व ग्रहण करने के अभिमुख होता है, तब क्षयोपशम, विशुद्धि आदि लब्धियों के प्रभाव से ज्ञानावरण आदि बहत्तर प्रकृतियों को बांधता है। आयु को नहीं बांधता है, और असातावेदनीय आदि चवालीस प्रकृतियों को जो कि कही गयी हैं उनको भी नहीं बांधता है। इस प्रकार से वृद्धिंगत विशुद्धि से विशुद्ध होता हुआ करणलब्धि को प्राप्त करके सम्यक्त्वरूपी महारत्न को हस्तगत करना शक्य है, ऐसा समझना।

इस प्रकार श्रीमद् भगवान पुष्पदन्त-भूतबलि आचार्य प्रणीत षट्खण्डागम ग्रन्थराज के प्रथम खण्ड में, छठे ग्रन्थ में श्री भूतबलि सूरि विरचित जीवस्थान चूलिका के अन्तर्गत चौथी चूलिका में गणिनीज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में द्वितीय महादण्डक नाम का चौथा चूलिका अधिकार पूर्ण हुआ।