058.रवीन्द्रकुमार ने संघ में शास्त्री कोर्स का अध्ययन किया

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रवीन्द्रकुमार ने संघ में शास्त्री कोर्स का अध्ययन किया

शास्त्री कोर्स का अध्ययन-

उस समय टोंक में रवीन्द्र कुमार ने मेरे पास शास्त्री कोर्स के तीन खंडों का अध्ययन एक साथ प्रारंभ कर दिया। गोम्मटसार कर्मकांड की लगभग चार सौ गाथाएँ थीं। राजवार्तिक पूर्वार्ध-उत्तरार्ध थे। न्याय में अष्टसहस्री थी। रवीन्द्र कुमार ने हिन्दी से ही इन विषयों को पढ़ना, मनन-चिंतन और अभ्यास करना चालू कर दिया। मोतीचन्द्र का शास्त्री का तृतीय वर्ष का कोर्स चल रहा था।

संघ का विहार टोंक से होकर छोटे-छोटे गांवों में होते हुए लावा नाम के गाँव में पहुंच गया। यहाँ इन सबकी पढ़ाई और प्रश्नोत्तर खूब चलते थे। यहाँ सायंकाल में प्रतिक्रमण के बाद आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज इन लोगों से गोम्मटसार कर्मकांड के प्रश्न करते थे। किस गुणस्थान में कितनी प्रकृतियाँ बंध से व्युच्छिन्न होती हैं? किस गुणस्थान में कितनी प्रकृतियाँ उदय से व्युच्छिन्न होती हैं? इत्यादि।

इन प्रश्नों के अनुसार मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार आदि उत्तर देते रहते थे। आचार्यश्री बहुत ही प्रसन्न होते थे। गोम्मटसार कर्मकांड, राजवार्तिक आदि का अध्ययन कई मुनिराज भी कर रहे थे। संघ यहाँ से विहार कर मालपुरा आ गया। गर्मी के दिनों में यहीं पर कुछ दिन ठहरा।

परीक्षा-

यहीं पर सोलापुर से धार्मिक परीक्षा के प्रश्न-पत्र आ गये। इन सभी छात्र-छात्राओं ने उनके उत्तर लिखे, परीक्षाएँ दीं। मैंने कई वर्ष पूर्व ‘‘आचार्य शिवसागर विद्यालय’’ नाम से संघ मे ही धार्मिक परीक्षा देने का स्थान निश्चित कर दिया था। संघ में मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार, कु. शीला, कु. सुशीला, कु. विमला, कु. कला, कु. त्रिशला आदि सभी ने अपने-अपने अध्ययन के अनुसार शास्त्री आदि की परीक्षाएँ दीं। उत्तर कापियाँ सोलापुर भेज दी गर्इं और समय पर इन सभी के उत्तीर्णता के प्रमाण-पत्र आ गये।

समयसार का स्वाध्याय-

इधर संघ में समयसार आदि ग्रन्थों के स्वाध्याय नहीं चलाये जाते थे। रवीन्द्र कुमार बार-बार आग्रह करते थे कि- ‘‘माताजी! आजकल समयसार को पढ़कर कानजी मत वाले अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं इसलिए आप भी हम लोगों को समयसार का स्वाध्याय कराइये और सही अर्थ समझाइये।’’ मैंने इन्हें आश्वासन दिया था कि-

‘‘एक बार तुम अष्टसहस्री के सारांश पढ़ लो, गोम्मटसार कर्मकांड, राजवार्तिक पढ़ लो पुनः समयसार का स्वाध्याय कराऊँगी।’’ सो अब पुनः आग्रह विशेष से मैंने यहाँ मालपुरा में समयसार का स्वाध्याय शुरू किया। समयसार के अंतर्गत निश्चय-व्यवहारनयों को समझने के लिए ‘आलापपद्धति’ नाम की छोटी पुस्तिका है उसे साथ में ही पढ़ाना शुरू कर दिया। इसमें नयों के संक्षेप से अट्ठाइस भेद किये हैं और भी विषय अच्छी तरह समझाए गये हैं।

‘‘मैं समझती हूँ कि अध्यात्म ग्रन्थों के स्वाध्याय के पहले यह आलापपद्धति पुस्तिका हर एक व्यक्ति को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। इसके पढ़ लेने से अध्यात्म ग्रन्थों के अर्थ का अनर्थ नहीं हो सकेगा। साथ ही श्री पूज्यपाद स्वामी द्वारा विरचित समाधि तंत्र और इष्टोपदेश भी अवश्य पढ़ना चाहिए।’’ रवीन्द्र कुमार ने मेरी आज्ञा के अनुसार बड़नगर के एक श्रेष्ठी श्रावक ब्र. श्री मिश्रीलाल जी टोंग्या को तत्त्वार्थसूत्र और इष्टोपदेश पढ़ाना प्रारंभ कर दिया। इससे इनका स्वयं का भी इन विषयों का अच्छा अभ्यास हो गया। अब सन् १९७१ के चातुर्मास के लिए अजमेर के श्रावकों का विशेष आग्रह चल रहा था। आचार्यश्री ने स्वीकृति दे दी। समय पर संघ अजमेर पहुँच गया।

वर्षायोग स्थापना-

यहाँ आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी की पूर्वरात्रि में सेठ साहब की नशिया में आचार्यश्री ने अपने विशाल संघ सहित वर्षायोग की स्थापना की। छोटे धड़े की नशिया में प्रातः काल उपदेश होता था। उसमें छगनलाल जी आदि अनेक प्रबुद्ध श्रावक आते थे। पहले मेरा प्रवचन होता था। कुछ ईष्र्यालु लोगों ने मेरा उपदेश बंद करा दिया, तब अनेक प्रबुद्ध लोगों को बहुत अखरा, चूंकि उन दिनों मैंने आप्तमीमांसा का अध्यापन जैसा बना रखा था जिसमें कई एक महानुभाव भाग ले रहे थे। मैं तो प्रातः और मध्याह्न खास करके अध्ययन-अध्यापन में ही लगी रहती थी।

चर्चायें-

एक बार सरसेठ श्री भागचन्द जी सोनी के साथ पं. हुकुमचन्द भारिल्ल अष्टसहस्री के प्रागभाव-प्रध्वंसाभाव आदि के बारे में कुछ विशेष समझने की जिज्ञासा लेकर आये। मैंने भी उन्हें अच्छी तरह से वह विषय, जैसा हिन्दी में अनुवाद किया था, समझाया। वे लोग इस अष्टसहस्री न्यायग्रन्थ के प्रायः अभाव आदि प्रकरण को समझकर कहने लगे- ‘‘माताजी! यह अष्टसहस्री ग्रन्थ, जिनका आपने अनुवाद किया है, शीघ्र ही प्रकाशित होना चाहिए। इसमें बहुत से रत्न भरे हुए हैं जो कि हिन्दी के छपने में प्रकाश में आयेंगे और अपना भी प्रकाश फैलायेंगे?’’ सेठ साहब भागचन्द जी सोनी मेरे समयसार के स्वाध्याय में भी बहुत बार आकर बैठते थे और निश्चय व्यवहारनय के समन्वय को सुनकर बहुत खुश होते थे। कहा करते थे कि- ‘‘यह नयों का समन्वय न समझने से ही आज अपनी दिगम्बर जैन समाज में टुकड़े हो रहे हैं।’’ मेरा कहना है कि-

‘‘गुरु-मुख से और गुरु-परम्परा से यदि ग्रन्थ का अध्ययन किया जाता है तो अर्थ का सही बोध होता है अन्यथा अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।’’ आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज कहा करते थे- तत्त्वार्थसूत्र की दूसरी अध्याय में एक सूत्र है ‘‘न देवाः’’ कोई भी व्याकरणाचार्य इसका यही अर्थ करेगा कि ‘‘देव नहीं होते हैं’’ किन्तु ऐसा अर्थ करने से महान अनर्थ हो जायेगा। वहाँ पूर्वापर संबंध जोड़ने से कुछ अन्य ही अर्थ करना होता है। वहाँ इस सूत्र से पूर्व एक सूत्र है-‘‘नारकसम्मूचछनो नपुंसकानि’’ पुनः यह सूत्र है ‘‘ न देवाः’’ अतः अर्थ है कि-‘‘नारकी और संमूर्छन जन्म वाले जीव नपुंसक ही होते है’’ और देव नपुंसक नहीं होते हैं। इसलिए अध्यात्म ग्रन्थ भी यदि कानजी भाई दिगम्बर गुरुओं से पढ़ लेते तो आज अर्थ का अनर्थ होने की संभावना भी नहीं होती और न ही एक नया पंथ कायम होता, प्रत्युत अनादिनिधन आर्षपरम्परा की ही प्रभावना होती। खैर! ‘‘वे ही भव्यात्मा आज पुण्यशाली हैं जिन्होंने गुरुमुख से विद्या प्राप्त की है।’’ इस प्रकार यहाँ का यह चातुर्मास चल रहा था।

आर्यिकाओं का समाधिमरण-

भाद्रपद में आर्यिका वासुमती माताजी ने एक माह के उपवास करने की भावना की थी किन्तु दस उपवास में ही उनका स्वास्थ्य एकदम बिगड़ा, तभी आचार्यश्री के सानिध्य में उनकी समाधि हो गई।

आर्यिका शांतिमती माताजी ने पूरे भाद्रपद के सोलहकारण व्रत के एक माह के उपवास किये थे। इनकी भी अंत में समाधि हो गई। आर्यिका पद्मावती माताजी ने भी टोंक के समान इस बार भी भाद्रपद में सोलह कारण के बत्तीस उपवास किये थे। मात्र बाईस उपवास के बाद एक बार ही उन्होंने आहार के लिए उठकर, जरा सा गर्म जल लिया था। इकतीसवें उपवास के दिन-आसोज वदी एकम को क्षमावाणी के बाद आकर मैंने देखा कि इनका स्वास्थ्य गड़बड़ है। उसी क्षण आचार्य श्री को बुलाया। सारा मुनिसंघ आ गया था। इन्होंने हाथ से मेरी साड़ी पकड़ रखी थी। मैंने विधिवत् संबोधन किया। इन्होंने भी सबसे क्षमा याचना करते हुए नमोऽस्तु किया। देखते-देखते क्षण भर में वे नश्वर शरीर को छोड़कर स्वर्गस्थ हो गर्इं।

उस समय उनके गृहस्थाश्रम के पति लालचन्द जी म्हसवड़ वाले वहाँ मौजूद थे। इन्होंने २२ उपवास के बाद जल लेते समय उन्हें आहार में जल दिया था। इनकी समाधि से मुझे कुछ धक्का अवश्य लगा। यह एक ऐसी शिष्या थीं जो छाया के समान सदा मेरे साथ रहती थीं। आहार और निहार के सिवाय किसी समय भी मुझे नहीं छोड़ा था। इनके सामने चाहे जिस साधु, साध्वी या श्रावक, श्राविका ने चाहे जैसी गुप्त बातें कहीं हो, रहस्यमयी परामर्श हुए हों, कभी भी कोई बात बाहर नहीं गई थी। इतनी विश्वस्त शिष्या मुझे क्या किसी को भी मिलना प्रायः कठिन रहता है। मेरे प्रति इनकी इतनी श्रद्धा भक्ति थी कि कभी छोटी-मोटी गलती पर अनुशासन करने पर भी भक्ति में अन्तर नहीं पड़ता था। उपवास करके भी मेरी वैयावृत्ति करके बहुत ही तृप्त होती थीं। मेरे स्वाध्याय में, अध्यापन में, एकचित्त हो बैठी रहती थींं। इनकी समाधि के बाद एक आर्यिका नेमामती जी थीं। इन्होंने अत्यधिक वृद्धावस्था से सल्लेखना ले रखी थी। विधिवत् इनकी भी सल्लेखना हुई।

इस चातुर्मास में चार आर्यिकाओं की सल्लेखना से शहर के जैनेतर लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वास्तव में उपवास उतने ही करने चाहिए जिससे शरीर एकदम जीर्ण न हो जाये। फिर भी उपवास लेकर भले ही शरीर छूट जावे पर दृढ़ता से नियम पालना, शरीर से निर्मम हो जाना भी सामान्य बात नहीं है।

शरीर तो इस जीव ने अनादिकाल से अनन्त-अनन्त धारण किये हैं किन्तु संयमपूर्वक समाधिमरण एक बार भी नहीं किया है। यही कारण है कि आज तक पुनःपुनः जन्म धारण करना, शरीर धारण करना पड़ रहा है अतः संयम की रक्षा और समाधिपूर्वक मरण होना, वह भी चतुर्विध संघ के सानिध्य में, यह कम पुण्य की बात नहीं है। अनेक जन्म के पुण्य योग से ही ऐसा अवसर मिलता है।

जैन ज्योतिर्लोक पर उपदेश-

सन्मति परिषद् के कार्यकर्ताओं के द्वारा मोनिया इस्लामिया स्कूल के विशाल प्रांगण में मेरा प्रवचन ‘जैन ज्योतिर्लोक’ के विषय में रखा गया। सर सेठ भागचन्द जी सोनी भी स्वयं इसमें आगे हुये। मोतीचन्द ने बड़े उत्साह से कार्यक्रम संपन्न कराया। वह उपदेश अत्यधिक प्रभावशाली रहा। अनेक गणमान्य महानुभाव, अनेक प्रोफैसर, विद्वान आदि वहाँ पधारे थे, अनेक पत्रकार भी आये थे। मैंने बहुत ही सरल भाषा में जैन ग्रन्थों के आधार से सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, उनकी गलियाँ, उनकी किरणें, उनके आकार, यहाँ से उनकी ऊँचाई, एक मिनट में चन्द्रमा कितने मील चलता है? कितना बड़ा है, इत्यादि विषयों पर अच्छा प्रकाश डाला। जैन धर्म के अनुसार सूर्य, चन्द्र आदि के बारे में उपदेश सुनकर लोग बहुत प्रसन्न हुए।

जंबूद्वीप निर्माण की चर्चा-

यहाँ अजमेर में सेठ साहब की नशिया में अयोध्या की रचना और पांडुकशिला नाम से भव्य रचना बनी हुई है। जिसको देखने के लिए हजारों जैनेतर लोग दिन भर आते रहते हैं। अब तो वहाँ व्यवस्था के लिए टिकट भी रखा गया है। सेठ साहब ने कई बार मुझसे इस मध्यलोक के चैत्यालय की चर्चा की। मोतीचन्द का बार-बार यह कहना रहा कि- ‘‘माताजी! आप मात्र जंबूद्वीप रचना के निर्माण को ही लक्ष्य में रखिये, तभी निर्माण कार्य संभव हो सकेगा।’’ सेठ साहब ने एक-दो बार कहा-

‘‘माताजी! आप एक बार मेरे यहाँ उस पांडुकशिला आदि रचना को अंदर चलकर तो देखो! क्या-क्या चीजें बनी हुई हैं?’’ उनके निवेदन पर एक दिन मैं, कई एक साधु-साध्वियाँ और मोतीचन्द उनके साथ गये। सेठ साहब ने उनके दरवाजे खुलवाये, हम लोगों ने अंदर प्रवेश किया, वहाँ मध्यलोक के तेरहद्वीप तक की रचना बनी हुई है। जंबूद्वीप के बारे में सेठ साहब हर एक विषय को समझा करते थे कि- कितने फुट में जंबूद्वीप? कितने फुट में सुमेरु? कितने फुट में क्या-क्या लेना है? रुचि से परामर्श भी दिया करते थे। एक दिन उन्होंने मंदिर के ऊपर की छत पर मोतीचन्द से उस विशाल रचना का नक्शा खिंचवाया। उनका कहना था कि- ‘‘माताजी! इस भव्य रचना का एक छोटा ८-१० फुट का मॉडल अवश्य बन जावे जिससे रचना बनवाने में सुविधा रहेगी।’’ सेठ साहब इस रचना में इतनी अधिक रुचि लेते थे कि मुझे भी उनकी भावना और प्रेम देखकर प्रसन्नता होती थी।

अष्टसहस्री ग्रन्थ प्रकाशन की प्रेरणा-

सेठ साहब ने जब से प्रागभाव आदि के बारे में चर्चायें सुनी थीं और मेरे द्वारा लिखित-पैंसिल से अनुवादित कापियाँ देखी थीं, तब से बार-बार कहते थे- ‘‘माताजी! यह महान् गन्थ अनुवाद सहित बहुत शीघ्र छपना चाहिए।’’ यहाँ पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य भी एक बार आये थे। उन्होंने भी बार-बार कहा- ‘‘मोतीचन्द जी! आप माताजी द्वारा अनुवादित ग्रन्थ-अष्टसहस्री को शीघ्र ही प्रेस मेें देकर छपावो। इसमें देर मत करो, अनेक विद्वान् इससे लाभ लेंगे।

अष्टसहस्री छपाने का संकल्प-

जब से मेरा अनुवाद कार्य चल रहा था, तभी से जब-जब संघ में सेठ चांदमल जी पांड्या गोहाटी वाले आते, तब-तब वे कहते कि- ‘‘माताजी! आपके द्वारा जिसका अनुवाद किया जा रहा हैै, सर्वत्र कई विद्वान् मेरे से पूछ चुके हैं कि ‘आप उसे कब छपा रहे हैं’ अतः इस ग्रन्थ को मैं ही छपाऊँगा।’’ मुझे सुनकर प्रसन्नता होती थी। मैं कह देती-‘‘ठीक है, पूरा होने दीजिये।’’ पूरा होने के बाद यहाँ अजमेर में भी उन्होंने कई बार कहा- ‘‘माताजी! उस ग्रन्थ की पांडुलिपि प्रेस में दीजिये या मुझे दीजिये।’’ मैंने कहा-‘‘अभी मेरी पेंसिल से लिखी कापियाँ ही हैं। इसको प्रेस कापी-पांडुलिपि रूप में लिखने वाला कोई विद्वान् नहीं मिल रहा है।’’ उस समय तक टाइप कराने की बात हम लोगों के मस्तिष्क में भी नहीं आई थी और मोतीचन्द पांडुलिपि के लिए विद्वान ढूँढ रहे थे।

माँ मोहिनी का घर से अंतिम प्रस्थान-

सन् १९७१ में अजमेर के इस चातुर्मास में माता मोहिनी अपने बड़े पुत्र कैलाश चंद व उनकी धर्मपत्नी चन्दा को साथ लेकर संघ के दर्शनार्थ आर्इं। उस समय उनके साथ पुत्री कु. माधुरी भी आई थी। यहाँ माँ मोहिनी अपने परिवार सहित प्रतिदिन कई एक साधुओं का पड़गाहन कर उन्हें आहार देती थीं और अपना जीवन धन्य समझती थीं।

माधुरी को ब्रह्मचर्य व्रत-

इधर मैं अपने स्वभाव से लाचार थी। इसलिए ही मैंने माधुरी को समझाना शुरू कर दिया। जब माधुरी समझ गई और दृढ़ हो गई, तब मैंने उसे चुपचाप मंदिर जी में एकान्त में बुलाकर कहा- ‘‘जाओ किसी को पता न चले, चुपचाप श्रीफल लेकर आ जाओ।’’ माधुरी आ गई और मैंने उसे भगवान् के समक्ष ही आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया। माधुरी ने प्रसन्न हो झट से मेरे चरण छुये और अपने स्थान पर चली गयी। उस दिन भाद्रपद शुक्ला दशमी (सुगंध दशमी) थी। पश्चात् वह कैलाश जी के साथ केशरिया जी की यात्रा करने चली गई। उधर मुनिश्री श्रुतसागर जी के संघ का दर्शन किया। मोहिनी जी पुनः वापस अजमेर आ गर्इं और कैलाश जी को समझाकर घर भेजते समय यही सान्त्वना दी कि- ‘‘तुम एक महीने बाद आकर मुझे ले जाना, अभी मैं कुछ दिन आर्यिका अभयमती जी के पास रहना चाहती हूँ।’’ इस बार अभयमती जी ने अजमेर के पास ही किशनगढ़ में आचार्य ज्ञानसागर जी के संघ सानिध्य में चातुर्मास किया था। वे उनके पास अध्ययन कर रही थीं। माँ मोहिनी किशनगढ़ जाकर अभयमती जी के पास एक माह करीब रहीं पुनः वापस अजमेर आ गर्इं।

आर्यिका रत्नमती-

दीपावली के बाद एक दिन मोहिनी जी मेरे पास आकर सहसा बोलीं- ‘‘माताजी! अब मेरी इच्छा घर जाने की नहीं है। कैलाश, प्रकाश, सुभाष तीनों लड़के योग्य हैं, कुशल व्यापारी हैं। माधुरी, त्रिशला अभी छोटी हैं। कुछ दिनों बाद इनकी शादी ये भाई करा देंगे। अब मेरा मन पूर्ण विरक्त हो चुका है। मैं दीक्षा लेकर आत्मकल्याण करना चाहती हूँ।’’ मैं तो कई बार प्रेरणा देती ही रहती थी अतः मैं इतना सुनते ही बहुत प्रसन्न हुई और बोली- ‘‘आपने बहुत अच्छा सोचा है-‘जब लों न रोग जरा गहे तब लों झटिति निज हित करो।’ इस पंक्ति के अनुसार अभी आपका शरीर भी साथ दे रहा है अतः अब आपको किसी की भी परवाह न करके आत्म साधना में ही लग जाना चाहिए.....। अच्छा, एक बात मैं आज आपको और बता दूँ, मैंने सुगन्ध दशमी के दिन माधुरी को ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया है, अतः उसकी तो शादी का सवाल ही नहीं उठता है।’’

इतना सुतने ही मोहिनी जी को आश्चर्य हुआ और बोलीं- ‘‘अभी माधुरी की उम्र्र १३ वर्ष की होगी। वह ब्रह्मचर्य व्रत क्या समझे....? अभी से व्रत क्यों दे दिया? हाँ! कुछ दिन संघ में रखकर धर्म पढ़ा देतीं, यही अच्छा था....। खैर! अब मैं किसी के मोक्षमार्ग में बाधक क्यों बनूँ? जिसका जो भाग्य होगा, सो होगा। मुझे तो अब आर्यिका दीक्षा लेनी है।’’ मैंने उसी समय रवीन्द्र कुमार को बुलाया और माँ के भाव बता दिये। रवीन्द्र का मन एकदम विक्षिप्त हो उठा, वे अपनी माँ से बोले- ‘‘आपका शरीर अब दीक्षा के लायक नहीं है। आपको बहुत ही कमजोरी है। जरा सा बच्चे शोर मचा दें, उतने से तो आपके सिर में दर्द होने लगता है। दीक्षा लेकर एक बार खाना, पैदल चलना, केशलोंच करना......यह सब आपके वश की बात नहीं है।’’ किन्तु मोहिनी जी ने कहा-

‘‘मैंने सब सोचकर ही निर्णय किया है....... अतः अब तो मुझे दीक्षा लेनी ही है।’’ मैंने रवीन्द्र की विक्षिप्तता देखी तो उसी समय मोतीचन्द को बुला लिया। रवीन्द्र कुछ कारणवश जरा इधर-उधर हुए कि मैंने मोतीचन्द को सारी स्थिति समझा दी और बाजार से श्रीफल लाने को कहा। वे तो खुशी से उछल पड़े और जल्दी से जाकर श्रीफल लाकर माँ मोहिनी के हाथ में दे दिया। मोहिनी जी उस समय मेरे साथ सेठ साहब की नशिया में पहुंँचीं और आचार्यश्री के समक्ष श्रीफल हाथ में लिए हुए बोलीं- ‘‘महाराज जी! मैं आपके कर कमलों से आर्यिका दीक्षा लेना चाहती हूँ।’’ ऐसा कहकर आचार्यश्री के समक्ष श्रीफल चढ़ा दिया। महाराज जी प्रसन्न मुद्रा में मेरी ओर देखने लगे। सभी पास में उपस्थित संघ के साधुवर्ग प्रसन्न हो मोहिनी जी की सराहना करने लगे और कहने लगे- ‘‘आपने बहुत अच्छा सोचा है। गृहस्थाश्रम में रहकर सब कुछ कर्तव्य आपने कर लिया है, अब आपके लिए यही मार्ग उत्तम है।’’ आचार्य महाराज बोले- ‘‘बाई! तुम्हारा शरीर बहुत कमजोर है। सोच लो, यह जैनी दीक्षा खाँडे की धार है।’’ मोहिनी जी ने कहा- ‘‘महाराज जी! संसार में जितने कष्ट सहन करने पड़ते हैं, उनके आगे दीक्षा में क्या कष्ट है? अब तो मैंने निश्चित ही कर लिया है।’’ मैंने वहाँ से अतिविश्वस्त एक श्रावक को टिकैतनगर भेज दिया कि जाकर घर वालों को समाचार पहुँचा दो। घर से तीनों पुत्र, पुत्रवधुएँ ब्याहीं हुई चारों पुत्रियाँ, चारों जमाई, माधुरी, त्रिशला और मोहिनी जी के भाई भगवानदास जी ये सभी लोग अजमेर आ गये। सभी लोग माँ मोहिनी जी को चिपट गये और रोने लग गये। सभी ने इनकी दीक्षा रोकने के लिए बहुत ही प्रयत्न किये। आचार्यश्री से मना किया और मोह में आकर उपद्रव भी करने लगे। आश्चर्य इस बात का हुआ कि रवीन्द्र भी उसी में शामिल हो गये, चूँकि अभी उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत नहीं लिया था, न सदा संघ में रहने का ही उनका निर्णय हुआ था। इन सब प्रसंगों में मोहिनी जी पूर्ण निर्मोहिनी बन गर्इं और अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुई। अन्ततोगत्वा उनकी दीक्षा का कार्यक्रम बहुत ही उल्लासपूर्ण वातावरण में चला। साथ में कु. विमला तथा ब्र. फूलाबाई की भी दीक्षा हुई थी। मगसिर वदी तीज (दि. ५-११-१९७१) का यह उत्तम अवसर अजमेर समाज में ऐतिहासिक अवसर था।

सेठ साहब की निरभिमानता-

दीक्षा के पूर्व माता मोहिनी ने व्रतिकों को प्रीतिभोज कराया। उसमें कुछ खास लोगों को भी आमंत्रित किया। सर सेठ भागचन्द जी सोनी को भी बुलाया था। सेठ साहब से पाटे पर बैठने के लिए निवेदन किया किन्तु सेठ साहब पंक्ति में ही बैठ गये और बोले- ‘‘हम सभी धर्र्म-बंधु समान हैं, सबके साथ ही बैठेंगे।’’ उनकी इस सरलता और निरभिमानता को देखकर सभी को बहुत हर्ष हुआ। सेठ साहब प्रायः मध्याह्न में मेरे पास समयसार के स्वाध्याय में बैठते थे। साथ में सेठानी जी और उनकी पुत्रवधू भी बैठती थीं। दीक्षा के प्रसंग में भी सेठजी हर कार्य में सहयोगी बने हुए थे।

प्रथम केशलोंच-

दीक्षा के दिन मोहिनी जी के सिर के बाल बहुत ही छोटे-छोटे थे, लगभग एक महीना ही हुआ था जब उन्होंने केश काटे थे अतः इतने छोटे केशों का लोंच करना-कराना बहुत ही कठिन था। मैं चुटकी से केश निकाल रही थी। सिर लाल-लाल हो रहा था। उनके पुत्र, पुत्रियाँ ही क्या, देखने वाले सभी लोग ऐसा लोंच देख-देखकर अश्रु गिरा रहे थे और मोहिनी जी के साहस तथा वैराग्य की प्रशंसा कर रहे थे। दीक्षा के अवसर पर अनेक साधुओं ने यह निर्णय लिया कि माता मोहिनी ने अनेक रत्नों को पैदा किया है। सचमुच में ये साक्षात रत्नों की खान हैं अतः इनका नाम रत्नमती सार्थक है। इसी के अनुसार आचार्यश्री ने इनकी आर्यिका दीक्षा में इनका नाम ‘‘रत्नमती’’ घोषित कर दिया। अपनी जन्मदात्री माता की आर्यिका दीक्षा के अवसर पर आर्यिका अभयमती जी भी किशनगढ़ से अजमेर आ गर्इं थीं। मुझे तो वैसे ही दीक्षा दिलाने में बहुत ही खुशी होती थी, पुनः इस समय खुशी का क्या कहना? इस समय तो मेरी जन्मदात्री माँ एवं घर से निकलने में भी सहयोग देने वाली सच्ची माँ दीक्षा ले रही थी। इस प्रकार से बहुत ही विशेष प्रभावनापूर्वक यह दीक्षा आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज के करकमलों से सम्पन्न हुई। अजमेर में एक राज. मोइनिया इस्लामिया उ.मा. विद्यालय, स्टेशन रोड के प्रांगण में यह दीक्षा का कार्यक्रम रखा गया था, जहाँ पर अगणित जैन-जैनेतर लोगों ने भाग लिया था।

रवीन्द्र कुमार का घर वापस आना-

माँ की दीक्षा के बाद भाई कैलाशचन्द जी ने सोचा- ‘‘अब यहाँ संघ में रवीन्द्र कुमार जी को छोड़ना कदापि उचित नहीं है। नहीं तो ये भी ब्रह्मचर्य व्रत ले लेंगे। इन्हें तो घर ले जाकर नई दुकान की योजना बनवानी चाहिए जिसमें इनका दिमाग व्यस्त हो जाये और ये माँ के वियोग को भूल जायें.....।’’ तभी तीनों भाइयों ने रवीन्द्र को समझा-बुझाकर घर चलने के लिए तैयार कर लिया और मेरे पास आज्ञा लेने आये। यद्यपि मेरी इच्छा नहीं थी और न रवीन्द्र ही मन से जाना चाहते थे किन्तु भाइयों के आग्रह ने उन्हें लाचार कर दिया। तब मुझे भी आज्ञा देनी पड़ी। इन सभी लोगों ने दो-तीन दिन रहकर अपनी माँ-आर्यिका रत्नमती जी को और सभी साधुओं को आहारदान दिया। एक दिन मैं इनके चौके में पहुँच गई । मेरे साथ आर्यिका अभयमती जी, आर्यिका रत्नमती जी का भी पड़गाहन कर लिया। एक साथ तीनों माताजी को सभी भाइयों ने, बहुओं ने, सभी बेटियों ने और जमाइयों ने आहार देकर अपने जीवन को धन्य माना था। अनन्तर ये लोग अपनी माँ के वियोग की आन्तरिक वेदना को अन्दर में लिये हुये और मेरे स्वभाव की-हर किसी को मोक्षमार्ग में लगाने के भाव की, चर्चा करते हुए रवीन्द्र को साथ लेकर अपने घर चले गये।

घर में भाइयों की प्रेरणा से रवीन्द्र कुमार ने कुछ दिनों बाद नवीन दुकान खोलने का विचार बनाया। पुरानी दुकान के ऊपर ही एक सुन्दर दुकान बनवानी शुरू कर दी।