063.दिल्ली की ओर माताजी का विहार।

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दिल्ली की ओर माताजी का विहार।

हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र का दर्शन-

भगवान शान्तिनाथ की जन्मभूमि पावन हस्तिनापुरी के वन्दन की अभिलाषा मन में जागृत हुई। संघ में स्थित आर्यिका आदिमती, श्रेष्ठमती और रत्नमती माताजी से परामर्श करके यात्रा की रूपरेखा बनाई। मुनिश्री संभवसागर जी और वर्धमान सागर जी से भी बातचीrत की। उस समय मेरे संघ में आर्यिका यशोमती और संयममती भी थीं। दो मुनि और हम छह आर्यिकाएं वहां से विहार करने को तैयार हुए। इसी बीच मैंने एक दिन दरियागंज के लाला उल्फतराय को बुलाकर क्षेत्र के बारे में जानकारी प्राप्त की और यह भी पूछा-

‘‘वहाँ हस्तिनापुर क्षेत्र पर मैं जंबूद्वीप रचना का निर्माण कराना चाहती हूँ। क्या वहाँ सुलभता से जगह उपलब्ध हो सकेगी?’’ ये उल्फतराय जी आचार्य धर्मसागर जी के संघ के दर्शनार्थ टोंक में आये थे, इनके साथ लाला श्यामलाल जी ठेकेदार भी थे। तभी से हमें इनका परिचय था तथा वर्तमान में ये इस हस्तिनापुर क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष भी थे अतः मैंने महताबसिंह जी जौहरी के कहने से इन्हें बुलाकर पूछा था।

इन्होंने कहा-‘‘माताजी! आप हस्तिनापुर पधारें, मैं स्वयं वहाँ आऊँगा और आपके मंगल कार्य में जितना हो सकेगा, उतना सहयोग भी करूँगा।’’ मैंने फाल्गुन में विहार किया। शाहदरा, जैनावॉच फैक्ट्री, गाजियाबाद, मोदीनगर, मेरठ और मवाना होते हुए हस्तिनापुर पहुँच गई। साथ में ब्रह्मचारिणी छुहाराबाई जी, ब्रह्मचारी मोतीचंद जी, कु. सुशीला, शीला और कला थीं। यहाँ क्षेत्र पर आकर भगवान शांतिनाथ के दर्शन किये। मन गद्गद हो गया। क्षेत्र की प्राकृतिक सुषमा देखी, पुनः यहाँ मंदिर से उत्तर की ओर पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी नशिया के दर्शन किये। भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ के गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान, इन चार-चार कल्याणकों से पवित्र भूमि की वंदना कर बहुत आनन्द हुआ, किन्तु इन नशियाओं पर ‘चरण’ नहीं विराजमान थे, प्रत्युत् साथिया बनी हुई थीं। सो बिना चरण के साथिया की वंदना करने में कुछ संतोष नहीं हुआ। मैंने यह बात यहाँ के महामंत्री सुकुमारचंद को कही, तब उन्होंने कहा-

‘‘आगे मीटिंग में विचार कर हम चरण स्थापना करायेंगे।’’ अस्तु। आचार्य श्री धर्मसागर जी भी यहाँ सन् १९७५ में आये थे, उन्होंने भी प्रेरणा दी किन्तु यहाँ चरण स्थापित नहीं हो सके थे। आचार्यश्री दूसरी बार वंदना करने ही नहीं गये, बोले- ‘‘बिना चरण के किनकी वंदना करना?’’ पुनः सन् १९८५ में यहाँ नशिया पर चरण विराजमान किये गये हैं, देखकर आज प्रसन्नता हो रही है।

उस समय फाल्गुन की आष्टाह्निका में मुनिश्री संभवसागर जी ने आठ उपवास किये। भक्ति में गद्गद मेरठ के जयचंद जी, जयकुमार जी और मवाना के बूलचंद जी आदि भी यहाँ ८-१० दिन रहकर चौका करके मुनि-आर्यिकाओं को आहारदान देने का और उनकी वैयावृत्ति का लाभ ले रहे थे। यहीं बड़े मंदिर की मूलवेदी में संघ के भगवान् शांतिनाथ जी की प्रतिमा जी विराजमान की गयी थीं। प्रतिदिन ब्र. सुशीला, शीला आदि उनका पंचामृत अभिषेक करती थीं। सभी लोग प्रेम से देखते थे। इधर से मेरठ, मवाना के श्रावक और यहाँ के प्रमुख ब्रह्मचारी हुकमचंद जी (सलावा वाले) तथा ब्र. सुशीला जी आदि सभी प्रसन्नचित्त थे।

हस्तिनापुर में जंबूद्वीप निर्माण की रूपरेखा-

मेरी चर्चा जंबूद्वीप निर्माण के बारे में चल रही थी। चैत्र कृ. एकम के दिन यहाँ पर मेला होता है। तब रथयात्रा पीछे पांडुकशिला के पास गई, वहाँ पर उपस्थित जन-समुदाय के मध्य सुकुमारचन्द आदि की प्रेरणा से मोतीचंद ने रेकसीन पर बना हुआ बड़ा सा ‘जंबूद्वीप’ का नक्शा फैलाकर दिखाया। सभी लोग बहुत प्रभावित हुए। सबने एक स्वर में कहा कि- ‘‘यह अपूर्व रचना यहीं हस्तिनापुर पावन तीर्थ पर ही बननी चाहिए।’’ इसी मध्य महामंत्री सुकुमारचंद जी ने मुझे उसी पांडुकशिला के पास में विस्तृत जगह दिखायी। वहाँ बीच में भगवान महावीर के जलमंदिर का शिलान्यास होने वाला था अतः इन लोगों का कहना था कि-

‘‘आप जंबूद्वीप के लिए जगह का चयन पहले कर लें पुनः शिलान्यास कराया जाये।’ किसी समय मैं अध्यक्ष उल्फतराय जी से कुछ परामर्श कर रही थी। तब उन्होंने कहा- ‘‘माताजी! आप अपनी रचना के लिए क्षेत्र की जगह कतई नहीं लेना। कमेटी के अध्यक्ष के नाते नहीं, प्रत्युत् आपके चिर-परिचित भक्त के नाते यह परामर्श दे रहा हूँ। वास्तव में इस कमेटी में पुराने विचारों के साधु-साध्वियों के प्रति आस्थावान् बहुत कम लोग हैं बल्कि आधुनिक विचारों से प्रभावित अधिकतम लोग हैं अतः आप अपनी कमेटी के माध्यम से स्वतंत्र ही जगह खरीद कराकर जंबूद्वीप निर्माण कार्य कराना।’’

यह राय उन्होंने कई बार दी अतः मैंने क्षेत्र के पदाधिकारियों की बार-बार प्रेरणा होने पर भी- ‘‘दिल्ली जाकर आगे विचार करके निर्णय करूँगी।’’ ऐसा कहकर यहाँ से-हस्तिनापुर से विहार कर दिया। मेरठ ४-५ दिन ठहरी, वहाँ पर भी सदर में ढोलकी मोहल्ले की धर्मशाला में मेरे सानिध्य में कई महानुभाव आकर इस निर्माण संबंधी चर्चाओं को किया करते थे।

मोतीचंद आदि ने आर्चीटेक्ट से निर्णय करके सुमेरु पर्वत का लगभग ढाई लाख का इस्टीमेंट बनाया था और उसमें मैंने ऐसा कहा था कि- ‘‘सुमेरु पर्वत के सोलह चैत्यालयों में से प्रत्येक के यदि पन्द्रह-पन्द्रह हजार के दातार हो जाते हैं, तो सुमेरु पर्वत बन जावेगा।’’ इसी बात को लेकर मेरठ के जयकुमार सर्राफ और उनके सुपुत्र मूलचंद ने एक चैत्यालय की स्वीकृति दे दी। सभी को प्रसन्नता हुई। इससे पूर्व सर्वप्रथम मोतीचंद ने पच्चीस हजार का दान दिया था, अतः प्रथम चैत्यालय उनका और द्वितीय चैत्यालय इन जयकुमार जी का निश्चित किया गया था।

दिल्ली के लिए विहार द्रुतगति से-

मेरठ में सहसा समाचार मिला कि- ‘‘आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज ससंघ दिल्ली के निकट आ चुके हैं वे चार-पांच दिन में दिल्ली पहुँचने वाले हैं।’’ मैंने निर्णय किया-‘‘अपने को दोनों टाइम चलकर आचार्यश्री के शहर के प्रवेश के समय पहुुंच जाना है।’’ मेरठ से विहार कर दिया। आर्यिका रत्नमती माताजी को दोनों टाइम चलने से पैरोें में जंघा तक बहुत ही दर्द होता। वे जैसे-तैसे उठते-बैठते बड़ी मुश्किल से पैदल चलकर दिल्ली पहुँचीं। उस समय उनके पैरों में सूजन आ गई थी। फिर भी मैं गुरु-भक्ति में ऐसी बेभान थी कि मैंने उनकी कुछ परवाह ही नहीं की। उनके मन में भी दीक्षागुरु के दर्शन की, संघ में मिलने की तीव्र उत्कंठा थी, अतः वे भी खुश थीं।

दिल्ली में पहाड़गंज के निकट मुनि संभवसागर जी और वर्धमान सागर जी तथा हम छहों आर्यिकाएँ आचार्यश्री के दर्शन करने पहुँच गये। सन् १९७१ में मैंने आचार्यश्री का संघ छोड़ा था और अब तीन वर्ष बाद दर्शन करके बहुत ही प्रसन्नता हुई। यहाँ संघ को लालमंदिर में ठहराया गया। ‘दिगम्बर जैन अतिथि भवन’ अर्थात् कम्मोजी की धर्मशाला में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज ससंघ विराज रहे थे।

जब दोनों संघ के आचार्य और उनके पीछे-पीछे सर्व मुनि-आर्यिकाएँ कूचा सेठ के बड़े मंदिर से आहार को निकलते थे, तब वह दृश्य देखते ही बनता था। मैं यहाँ नमिसागर औषधालय के ऊपर त्यागी भवन में ठहरी हुई थी। यहीं पर ‘जंबूद्वीप मॉडल’ बनकर तैयार होकर आ चुका था। मैं निर्वाणोत्सव के लिए उपयोगी पुस्तिकाओं को भी लिखने में लगी थी।

हस्तिनापुर क्षेत्र पर पुनरागमन-

एक दिन ‘जैन त्रिलोक शोध संस्थान’ के खास-खास सदस्यों को बुलाकर हस्तिनापुर में जंबूद्वीप रचना का निर्माण कार्य कराने हेतु जगह के बारे में विचार किया। लाला श्यामलाल जी, डॉ. कैलाशचंद जी, वैद्य शांतिप्रसाद जी, कैलाशचंद जी (करोलबाग वाले) आदि महानुभावों का एक स्वर से यही कहना रहा कि- ‘‘वहाँ क्षेत्र पर भी क्षेत्र वालों की जगह न लेकर अलग ही कोई जगह खरीदकर जंबूद्वीप बनाना उचित होगा।’’

पुनः संस्थान के लोगों की प्रार्थना से मैंने वैशाख मास में हस्तिनापुर विहार करने का विचार बनाया। अस्वस्थ अवस्था में भी आर्यिका श्री रत्नमती जी को आचार्यश्री धर्मसागर जी के संघ में छोड़ा और मैं यशोमती आर्यिका को साथ लेकर विहार करने को तैयार हुई। यद्यपि शाम को आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी से आशीर्वाद लेकर आ चुकी थी। फिर भी प्रातःकाल साढ़े पाँच बजे भगवान का दर्शन कर कम्मोजी की धर्मशाला में आई। वहाँ पता चला कि आचार्यश्री शौच के लिए बाहर गये हुए हैं। लगभग एक घंटा भी लग सकता है। मैं कुछ देर ठहरी रही, पुनः श्रावक लोग आकुलता करने लगे और कहने लगे-

‘‘माताजी! गर्मी का दिन है। आगे चलकर आहार करने में आपको तकलीफ होगी अतः अब चलो, आपने शाम को तो गुरुदेव से आशीर्वाद ले ही लिया था।’’ मैं उठी और णमोकार मंत्र का जाप कर परोक्ष में ही गुरु को नमस्कार कर बाहर सड़क पर आई कि इसी समय सामने से आते हुए गुरुदेव आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के दर्शन हो गये। मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई। आगे बढ़कर गुरुदेव को नमोऽस्तु कर उनके चरण छुए। आचार्य श्री ने भी आशीर्वाद देते हुए मेरे मस्तक पर पिच्छिका रख दी। गुरु का आशीर्वाद पाकर मैं सोचने लगी, ग्रंथों में लिखा है-मार्ग में सामने से यतीश्वर को आते हुए देखकर युद्ध के लिए प्रयाण-करते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था-

आरुरोह रथं पार्थ! गांडीवं चापि धारय।

निर्जितां मेदनीं मन्ये, निर्ग्रंथोयतिरग्रतः।।

हे अर्जुन! तुम रथ पर चढ़ जाओ और गांडीव धनुष को धारण कर लो। मैं इस पृथ्वी को जीती हुई ही समझ रहा हूँ, चूँकि सामने निग्रंथ यति दिख रहे हैं। इस सूक्ति को याद कर मुझे दृढ़ विश्वास हो गया कि मेरा यह हस्तिनापुर का विहार बहुत ही उत्तम है, कार्य की सफलता की सूचना दे रहा है। वह दिन वैशाख शुक्ला पूर्णिमा का था। मैं वहाँ से चलकर शाहदरा, जैनावाच फैक्ट्री, गाजियाबाद, मोदीनगर, मेरठ, मवाना होते हुए ज्येष्ठ कृ. तेरस को हस्तिनापुर आ गई। यहाँ ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी को भगवान् शान्तिनाथ का मोक्षकल्याणक होने से निर्वाण-दिवस का छोटा-मोटा मेला लगता है।

जंबूद्वीप निर्माण हेतु स्थल-

मैं यहाँ पर बड़े मंदिर जी के परिसर में ही एक कमरे में ठहरी थी। उस समय मेरे साथ एक आर्यिका थीं, ब्र. छुहाराबाई और ब्र. शीलाबाई ये दो बाइयां थीं, श्री मोतीचंद थे। यहाँ संघ के चैत्यालय की प्रतिमा जी मंदिर जी में ही विराजमान थीं। मोतीचंद जी, आत्माराम मैनेजर तथा मंदिर के अन्य पदाधिकारीगण और मवाना के लाला बूलचंद जी, लखमीचंद जी आदि का सहयोग लेते हुए जंबूद्वीप के लिए कोई खेत क्रय कराना चाहते थे।

मंदिर से लगभग एक फर्लांग दूर मंदिर के बगीचे से लगे हुए खेतों की तरफ ही मेरी दृष्टि थी, चूंकि इधर से ही नशिया के दर्शन के लिए श्रावक लोग जाते हैं। यहाँ पर श्री महेशचंद, जो कि डिप्टी साहब कहलाते हैं, वे भी इस पुनीत कार्य में सब प्रकार से सहयोग दे रहे थे। उनकी धर्मपत्नी कुसुमलता भी मेरी पास बैठकर इस विषय पर चर्चा किया करती थीं। बल्कि कई बार मेरे साथ इधर बगीचे की तरफ आ जाती थीं। ब्र. सुशीला जी आदि महिलाएँ भी खूब रुचि दिखाती थीं।

इधर एक बुद्धू चमार का खेत था, उसका सौदा चल रहा था। इसके पूर्व मोतीचंद, लाला बूलचंद जी आदि के साथ कई एक खेत और स्थान देख चुके थे। आषाढ़ वदी में प्रायः बुद्धू के खेत का सौदा तय हो गया था, बैनामा होने वाला था कि अकस्मात् उसकी पत्नी ने मना कर दिया। मुझे दिल्ली विहार के लिए भी आकुलता हो रही थी। चूंकि सन् १९७४ के इस निर्वाणोत्सव के चातुर्मास में मैंने दिल्ली वालों को दिल्ली के चातुर्मास का आश्वासन दे रखा था और दिल्ली में दोनोें आचार्य संघ तथा मुनिश्री विद्यानंद जी महाराज भी विराज रहे थे, उन सभी का भी आग्रह दिल्ली चातुर्मास के लिए ही था। इधर मेरा स्वास्थ्य कमजोर था। इस आषाढ़ की गर्मी में दिल्ली पहुँचने के लिए कम से कम पन्द्रह दिन तो मैं चाहती थी।

इस समय श्री बूलचंद जी (मवाना वालों) ने आकर निवेदन किया और पं. हुकमचंद ने भी कहा- ‘‘माताजी! आप यहीं चातुर्मास कर लीजिये।’’ जब मैंने सर्वथा अस्वीकृत कर दिया, तब लाला बूलचंद जी बोले- ‘‘माताजी! तब तो आप विहार कीजिये। मैं जगह को खरीदने की जिम्मेदारी लेता हूँ।’’ मैंने भी सोचा-‘‘ठीक है।’’

प्रथम जंबूद्वीप विधान की रचना-

उसी दिन रात्रि में सामायिक के बाद मैं एक जंबूद्वीप की पूजा बनाने बैठ गई। रात्रि के एक-दो बजे तक पूजा बनाकर अठत्तर चैत्यालयों के अठत्तर अर्घ बनाये पुनः सो गई। प्रातः ४ बजे उठकर सामायिक आदि से निवृत्त होकर पुनः कुछ पूर्णार्घ बनाये और जयमाला बनाई। पूजा पूर्ण कर रही थी कि मोतीचंद ने आकर कहा- ‘‘माताजी! बुद्धू की जगह के पास ही सड़क से लगा हुआ एक छोटा सा खेत दूसरे व्यक्ति का है। उससे मैंने सौदा तय कर लिया है। वह आज ही बैनामा कराने को कह रहा है। ‘‘मैंने प्रसन्नता से स्वीकृति दे दी।’’

इसके बाद नौ बजे के समय मैं आहार को महेशचंद जी के यहाँ गई थी, वहीं पर मोतीचंद आहार दे रहे थे। तब श्री सुुकुमार चंद जी ने उन्हें बुलाया और कहा- ‘‘मोतीचंद जी! मैंने उस खेत वाले किसान को बयाना में सौ रुपये दे दिये हैं। तुम्हारी जंबूद्वीप रचना के लिए जगह का सौदा पक्का हो गया है।’’ सुनकर खुशी हुई, पुनः अगले दिन प्रातः मवाना कचहरी में जाकर मोतीचंद ने बैनामा करा लिया और उसी दिन मैंने निर्णय किया कि- ‘‘कल आषाढ़ शुक्ला तीज, दि. २२-६-७४ को सुदर्शन मेरु का शिलान्यास कराकर मैं विहार करूँगी।’’ बैनामा कराने के लिए जाते समय सौ. कुसुमलता जैन ने बहुत ही सद्भावना से १००१ रुपये लाकर मोतीचंद के हाथ में दे दिये थे, पुनः बाद में बोलीं- ‘‘मैंने शुभ-शकुन के लिए यह तुच्छ राशि इस मंगल प्रसंग में भेंट की।’

सुदर्शन मेरु का शिलान्यास-

उसी दिन छोटा सा पंप्लेट छपवाया गया। मेरठ के श्री जयकुमार जैन सर्राफ और उनकी पत्नी तथा पुत्रों ने पूर्ण रूचि ली। इन्हें शिलान्यास के लिए प्राथमिकता दी गई। ये मेरठ से बस भी लाये और मंगल वातावरण में शिलान्यास विधि सम्पन्न हुई। उस समय नींव की दस फुट गहरी खुदाई में नीचे धरती से पानी आ गया था। वहाँ ही चौकी रखाकर मैं खड़ी हो गई। मोतीचंद ने और कु. शीला ने शिलान्यास के मंत्रों को पढ़कर पूर्ण विधि सम्पन्न की। इस समय आचार्य निर्मलसागर के शिष्य मुनि श्री शांतिसागर महाराज भी मौजूद थे।

दिल्ली की ओर विहार-

इसके बाद आहार करते ही मैं विहार करके टाउन में पहुँची और वहाँ से दिल्ली की तरफ प्रस्थान कर दिया। आस-पास के महलका, बड़ौत, सरधना आदि के श्रावकों का आग्रह विशेष होने से मैं इस मार्ग से निकली। दोनों टाइम चलती थीं। किसी गांव में विश्राम और किसी में आहार होता था। सात-आठ किलोमीटर से ज्यादा एक बार में चलना शक्य नहीं था। यह रास्ता दिल्ली तक लगभग नब्बे मील पड़ गया जो कि मुझे बहुत भारी पड़ा और मुझे खून के अतिसार (दस्त) होने लग गये। फिर भी मैं साहस कर आषाढ़ शुक्ला चौदश को प्रातः दिल्ली पहुँच गई और चातुर्मास का उपवास कर लिया।

यद्यपि मैं शास्त्र की आज्ञानुसार श्रावण कृष्णा चतुर्थी तक भी चलकर-पहुँचकर वर्षायोग स्थापना कर सकती थी किन्तु शरीर के साथ खींचतान करके पुनः बीमार पड़ जाना यह मेरा एक स्वभाव सा बन गया था। अस्तु......।’’