064.सम्यग्ज्ञान पत्रिका का विमोचन

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सम्यग्ज्ञान पत्रिका का विमोचन।

वहाँ लाल मंदिर में आचार्यश्री धर्म सागरजी ने पूर्व रात्रि में ससंघ चातुर्मास स्थापित किया। साहू शांतिप्रसाद जी ने आचार्यश्री के समक्ष आकर चातुर्मास स्थापना के लिए निवेदन किया और फूलों के गुच्छे चढ़ाये।

सम्यग्ज्ञान पत्रिका का विमोचन-

श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन ‘वीर शासन जयन्ती’ के पावन दिवस पर मेरे द्वारा चार अनुयोगों के लेखों से सुसज्जित ‘सम्यग्ज्ञान’ नामक मासिक पत्रिका का यहीं लाल- मंदिर में आचार्य श्री धर्मसागर जी के करकमलों से विमोचन हुआ, जो आज चौदहवें वर्ष में प्रवेश करते हुए सारे भारत में ही नहीं, विदेशों में भी सम्यग्ज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रहा है।

आचार्यश्री धर्मसागर जी का संघ दरियागंज में-

यहाँ लाल मंदिर में आचार्यश्री ने एक दिन दिल्ली की भीड़ व इस स्थान को लक्ष्य कर कहा-‘‘माताजी! यहाँ खुला स्थान नहीं है।’’ मैंने कहा-‘‘महाराज जी! दरियागंज में बाल आश्रम में बहुत बड़ा चौक है, कमरे भी बहुत बड़े-बड़े हैं एवं आहार के समय जाते हुए सड़के भी बहुत चौड़ी हैं, वह स्थान आपको जंचेगा।’’ पुनः दरियागंज वाले लाला उल्फतराय जी को बुलाकर मैंने कहा- ‘‘लाला जी! आचार्यश्री के संघ को दरियागंज ले चलना है।’’ वे घबरा गये और तीन-चार बार मुझे समझाने आये कि-

‘‘माताजी! दरियागंज में इतने बड़े संघ की व्यवस्था संभव ही नहीं है, आप कहीं आचार्य महाराज के सामने कह भी नहीं देना।’’ फिर भी मैं उन्हें बार-बार बुलाकर समझाती रही। तब उन्होंने कहा- ‘‘वहाँ शुद्ध जल का नियम लेने वाले श्रावक ना के बराबर हैं। वहाँ के बाबू पार्टी के लोग भला कौन शुद्ध जल का नियम लेंगे?’’ मैंने कहा-‘‘देखो! आचार्यश्री के प्रभाव से वहाँ बहुत लोग आहार देने वाले हो जावेंगे, आप चिंता मत करो।’’ तब राय साहब उल्फतराय ने कहा-

‘‘आप महाराजजी से निवेदन कर दीजिये कि वे अपने साथ सिर्पक दो मुनि को लेकर दरियागंज चलें।’’ मैंने कहा-‘‘यह संभव नहीं है! हां आपसे मैंने पहले ही कहा था कि आर्यिकाएँ सब यहीं रहेंगी, मुनिगण सभी वहाँ जायेंगे।’’ राय साहब ने मंजूर किया, पुनः दरियागंज में चर्चा करके वहाँ के कतिपय महानुभावों को साथ लेकर आये और आचार्यश्री से निवेदन किया। महाराज जी से पहले ही मैंने प्रार्थना कर दी थी कि-

‘‘आप मुनियों को साथ लेकर ही पधारें। पहले वहाँ पर व्यवस्था ठीक बने, फिर आर्यिकाओं को वहाँ आने की आज्ञा देना।’’ आचार्यश्री संघ सहित दरियागंज पधारे, वहाँ पर उन्हें खुला वातावरण और खुला क्षेत्र मिला, तब वे बहुत ही संतुष्ट हुए। धीरे-धीरे वहाँ पर प्रबुद्ध लोगों ने भी आहार देना, चौका लगाना शुरू कर दिया पुनः आचार्यश्री की आज्ञा से उल्फतराय जी ने आर्यिकाओं को भी वहीं बुला लिया। मैं यहाँ त्यागी भवन में ही रही। प्रायः दूसरे-तीसरे दिन दर्शनार्थ चली जाया करती थी। एक दिन वहाँ के सेठ शांति लाल जी कागजी ने निवेदन किया।-

‘‘माताजी! आप भी यहीं आ जाइये, हम लोग प्रातः आधा घण्टे आपका उपदेश सुनना चाहते हैं।’’ आचार्यश्री की भाषा मारवाड़ी होने से लोगों को समझने में कभी कुछ कम आता था, अतः लोग मेरी अपेक्षा रखते थे। लोगों ने आचार्यश्री से आज्ञा लेकर प्रतिदिन मेरा उपदेश शुरू कर दिया। पहले मैं बोलती, उसके बाद आचार्यश्री उपदेश देते थे। लोगों में उपदेश सुनने का आकर्षण बढ़ रहा था। तभी एक दिन संघ में आकर एक विघ्न संतोषी व्यक्ति ने कहा- ‘‘महाराज जी! क्या संघ के सब साधु-साध्वियां मूर्ख हैं, एक ज्ञानमती ही ज्ञानवान् हैं? मैं देख रहा हॅूं चार-पांच दिन से, बस इनका ही उपदेश हो रहा है।’’ आचार्यश्री बहुत ही सरल प्रकृत्ति के व्यक्ति थे, उन्होंने ऐसी बात सुनकर सहज ही कह दिया- ‘‘ठीक है, कल से एक-एक आर्यिका और एक-एक मुनि का नम्बर रहेगा।’’

उस समय संघ में मुनि अभिनन्दनसागर जी और आर्यिका जिनमती के सिवाय उपदेश की शैली प्रायः अन्य साधुओं में कम थी, कोई-कोई साधु-साध्वी तो मात्र उपदेश देने के अभ्यास के लिए ही बिठा दिये जाते थे। तब एक श्रावक ने आकर मुझसे कहा,‘‘माताजी! यह क्या हुआ? यहाँ तो अच्छे वक्तव्य के धनी साधुओं को उपदेश के लिए बिठाना चाहिए। कुछ साधु तो ऐसा लगता है कि उपदेश देना सीख रहे हैं अतः सभा में लोगों की उपस्थिति तो घटती जा रही है।’’ खैर! मैंने इसमें कोई रंज-गम नहीं किया, चूंकि मैं ऐसे प्रसंगों को सहने में अभ्यस्त थी। इस घटना के पूर्व ही एक दिन पं. बाबूलाल वक्ता ने शास्त्र पढ़ते हुए आचार्यश्री के समक्ष सभा में कह दिया- ‘‘बिना समयसार के पढ़े सम्यग्दर्शन नहीं हो सकता?’’

आचार्यश्री ने बीच में ही टोक दिया-‘‘पंडित जी, ऐसा मत बोलो। सब अनुयोगों के स्वाध्याय से सम्यग्दर्शन हो सकता है। कहाँ लिखा है कि समयसार को पढ़े बिना सम्यग्दर्शन नहीं हो सकता?’’ उस दिन से पं. बाबूलाल वक्ता सावधान होकर ही बोलते थे। उनके यहाँ भी चौका लगता था और वे स्वयं भी संघ के साधुओं को पड़गाहन कर आहारदान देते थे। यहाँ दशलक्षण पर्व में सुभाष मैदान में बड़ा पांडाल बनाया गया था। प्रातः विद्यानंद जी महाराज प्रवचन करते थे। मध्यान्ह में आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज तत्त्वार्थसूत्र के एक-एक अध्याय का अर्थ सहित विवेचन करते थे और मैं एक-एक धर्म पर प्रतिदिन प्रवचन करती थी।

इस प्रकार दशलक्षण पर्व सानंद व्यतीत हुआ। इन्हीं दिनों यहाँ प्रायःहर सप्ताह ही निर्वाणोत्सव के मनाने के विषय में साधु वर्ग में सभायें होती रहती थीं। श्री विद्यानंद जी मुनिराज कई बार मुझे बुलाकर परामर्श करते थे। एक-दो बार मैंने आहार के उपरांत ऊपर चढ़ने में असमर्थता व्यक्त की तो मुनिश्री स्वयं नीचे आकर कमरे में बैठ गये और परामर्श का विषय शुरू कर दिया। उन दिनों मुनिश्री की सरलता और वात्सल्य भावना का ही यह परिणाम हुआ कि यह महोत्सव बहुत ही सफलता के साथ सम्पन्न हुआ था।

संगीति का आयोजन-

राष्ट्र संत विनोबा भावे की भावना के अनुसार ब्र. जिनेन्द्रप्रसाद वर्णी ने एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम ‘समणसुत्तं’ रखा गया। इसमें जैनधर्म के मूल-मूल सिद्धान्त आ जायें और इसे जैन धर्म के चारों सम्प्रदाय के साधु मान्य कर लेवें एवं आशीर्वाद दे देवें। इस उद्देश्य से यहाँ दरियागंज में सर्व साधुओं के समुदाय में एवं विद्वानों के समूह में एक गोष्ठी का आयोजन किया था। उसमें मैंने भी भाग लिया था और कई एक सुझाव दिये थे।

भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा-

दिगम्बा जैन त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप रचना निर्माण के लिए क्रय की गई भूमि पर स्थापित होने वाली श्वेत पाषाण की अति मनोज्ञ सवा नौ फुट उत्तुंग मूर्ति जयपुर (मकराना) से यहाँ हस्तिनापुर में २७-८-७४ को आ गई थीं। इस मूर्ति का न्यौछावर श्री संतोष कुमार जी जैन (ज्योति इम्पेक्स) दिल्ली वालों ने प्रदान किया था। इस मूर्ति को पेटी में बंद ही यहाँ बड़े मंदिर के गुरुकुल में रखा दिया गया था।

जम्बूद्वीप केलेंडर-

भगवान महावीर के इस महामहोत्सव के अवसर पर अत्यन्त सुन्दर सात रंगों में छपाकर ‘जम्बूद्वीप कैलेंडर’ तैयार कराया गया। यह अपने आप में बहुत ही आकर्षक था।

ग्रन्थ प्रकाशन-

इधर अष्टसहस्री ग्रंथ का प्रथम भाग ‘सम्राट प्रेस’ पहाड़ीधीरज पर छप रहा था। कुछ अन्य पुस्तके जैसे ‘भगवान् महावीर कैसे बने?’ आदि पुस्तके कूचा सेठ में अन्य प्रेसों में छप रही थीं। मोतीचंद जी प्रातः काल से निकल कर इन दोनों प्रेस में जाते, प्रूफ आदि देखते और कागज, कवर आदि की व्यवस्था करते। शाम को शायद ही किसी दिन आकर भोजन कर पाते थे अन्यथा रात्रि में ही आ पाते थे।