06 - गतिमार्गणासार

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गतिमार्गणासार

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मार्गणा—जिनके द्वारा अथवा जिनमें जीवों का मार्गण्—अन्वेषण किया जाता है उन्हें मार्गणा कहते हैं। मार्गणा के १४ भेद हैं।

गति, इंद्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञा और आहार ये चौदह मार्गणा हैं।

मार्गणा के दो भेद भी हैं—सान्तर और निरंतर। उपर्युक्त चौदह मार्गणायें निरंतर मार्गणा कहलाती हैं जिनमें अंतर—विच्छेद नहीं पड़ता उनको निरंतर मार्गणा कहते हैं। संसारी जीवों के उपर्युक्त १४ मार्गणाओं में से किसी का विच्छेद नहीं पड़ता वे सभी जीवों के और सदा ही पाई जाती है इसलिए निरंतर मार्गणा कही जाती हैं और जिनमें अंतर—विच्छेद पड़ जाता है उन्हें सान्तर मार्गणा कहते हैं अर्थात् कुछ मार्गणा ऐसी भी हैं कि जिनमें समय के एक नियत प्रमाण तक विच्छेद पाया जाता है। उन्हीं को सांतर मार्गणा कहते हैं।

ये सांतर मार्गणाएँ आठ हैं—उपशम सम्यक्त्व, सूक्ष्मसांपराय संयम, आहारककाय योग, आहारक मिश्र योग, वैक्रियक मिश्र काययोग, लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य, सासादन सम्यक्त्व और मिश्र ये आठ सांतर मार्गणाएँ हैं। उपशम सम्यक्त्व का उत्कृष्ट विरह काल ७ दिन का है। सूक्ष्म सांपराय का महीना, आहारक योग का पृथक्त्व वर्ष, आहारक मिश्र का पृथक्त्व वर्ष, वैक्रियक मिश्र का १२ मुहूर्त, अपर्याप्त मनुष्य का पल्य से असंख्यातवें भाग, सासादन सम्यक्त्व और मिश्र का पल्य के असंख्यातवें भाग है और सबका जघन्य अंतर काल एक समय है। मतलब यह है कि यदि तीन लोक में कोई भी उपशम सम्यग्दृष्टि न रहे तो ऐसा अंतर सात दिन के लिए पड़ सकता है। उसके बाद कोई न कोई उपशम सम्यग्दृष्टि अवश्य ही होता है।

गति मार्गणा—गति नामकर्म के उदय से होने वाली जीव की पर्याय विशेष को अथवा चारों गतियों में गमन करने के कारण को गति कहते हैं। गति शब्द के निरुक्ति के अनुसार तीन तरह के अर्थ संभव हैं। गम्यते इति गति:, गमनं वा गति: और गम्यते अनेन सा गति:। इन निरुक्ति अर्थों में गतिनाम कर्म के उदय से होने वाली जीव की नर, नारक आदि पर्याय विशेष को ही ग्रहण करना चाहिए।

गति के चार भेद हैं—नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, देवगति।

नरक गति—जो द्रव्य क्षेत्र काल भाव में स्वयं तथा परस्पर में प्रीति को प्राप्त नहीं होते हैं उनको ‘नारत’ कहते है अर्थात् जो किसी भी अवस्था में स्वयं या परस्पर में प्रीति को प्राप्त न हों वे नारत—नारकी कहलाते हैंैं अथवा जो ‘नरान् कायंति’ मनुष्यों को क्लेश पहुँचावें उनको नारक कहते हैं क्योंकि नीचे सातों ही भूमियों में रहने वाले नारकी निरंतर ही स्वाभाविक, शारीरिक, मानसिक, आगंतुक तथा क्षेत्रजन्य इन पाँच प्रकार के दु:खों से दु:खी रहते हैं। नरकगति नामकर्म के उदय से जीव नरक में आयु पर्यंत महान् कष्टों का अनुभव करते रहते हैं। न रमन्ते इति नारता—नारका—इस व्युत्पत्ति के अनुसार नारकी आपस में कभी भी प्रेम नहीं करते हैं।

तिर्यग्गति—जो मन वचन काय की कुटिलता को प्राप्त हों अथवा जिनकी आहारादि संज्ञायें दूसरों को स्पष्ट दिखें और जो निकृष्ट अज्ञानी हों, जिनमें पाप की बहुलता हो वे तिर्यंच कहलाते हैं। निरुक्ति के अनुसार ‘तिर: तिर्यग्भावं-कुटिल परिणामं अन्वति इति तिर्यंच’ जो कुटिल-मायाचार परिणामों को प्राप्त करें वे तिर्यंच कहलाते हैं। इससे तिर्यंचगति में मायाचार की बहुलता जानी जाती है।

मनुष्यगति—जो नित्य ही तत्त्व-अतत्त्व, आप्त-अनाप्त आदि का विचार करें, जो मन के द्वारा गुण-दोषादि का विचार स्मरण आदि कर सकें, जो मन के विषय में उत्कृष्ट हों, शिल्प कलादि में कुशल हों तथा युग की आदि में मनुओं से उत्पन्न हुये हों वे मनुष्य कहलाते हैं। ‘मनु अवबोधने’ मनु धातु से मनु शब्द बनता है और जो मनु की संतान हैं उसे मनुष्य कहते हैं। यहाँ निरुक्ति के अनुसार अर्थ किया गया है।

देवगति—जो देवगति में होने वाली अणिमा, महिमा आदि आठ ऋद्धियों से सुखी होें, सदा रूप यौवन आदि में दीप्ति को प्राप्त हों वे देव कहलाते हैं। ‘दीव्यंति इति देव:’ दिव् धातु क्रीड़ा, विजिगीषा, दीप्ति, मोद आदि अर्थ में है उससे देव शब्द निष्पन्न हुआ है।

इन चारों गतियों के अर्थ में निरुक्ति अर्थ प्रधान है किन्तु यह सर्वथा लागू नहीं होता है। मुख्यत: जो उन-उन गति नामकर्म के उदय से उस-उस भव को प्राप्त करते हैं। वे उस गति वाले कहलाते हैं।

सिद्धगति—एकेन्द्रिय आदि जाति, वृद्धावस्था, मरण, भय, अनिष्ट संयोग, इष्ट वियोग, इनसे होने वाले दु:ख, आहारादि वाञ्छायें, रोग आदि जिस गति में नहीं पाये जायें वह ‘सिद्धगति’ कहलाती है। इसे पंचम गति भी कहते हैं। यह सिद्धगति मार्गणातीत है, सभी कर्मों के क्षय से प्रकट होती है।

विशेष—तिर्यंचों के पाँच भेद हैं—सामान्य तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त तिर्यंच, योनिमती (भावस्त्री वेदी) तिर्यंच और अपर्याप्त तिर्यंच।

मनुष्यों के चार भेद हैं—सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य, योनिमती (भावस्त्री वेदी) मनुष्य और लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य। इनमें पंचेन्द्रिय भेद इसलिये पृथक नहीं हैं कि मनुष्यों में पंचेन्द्रिय मनुष्य ही होते हैं एकेन्द्रिय आदि नहीं होते हैं।

पर्याप्त मनुष्यों की संख्या—७ ९ २ २ ८ १ ६ २ ५ १ ४ २ ६ ४ ३ ३ ७ ५ ९ ३ ५ ४ ३ ९ ५ ० ३ ३ ६ । इन चारों गतियों में एक मनुष्यगति ही ऐसी गति है कि जिसमें आठों कर्मों का नाश कर यह जीव सिद्धपद को प्राप्त कर सकता है अतएव इस दुर्लभ मनुष्य पर्याय को प्राप्त करके संयम को धारण करके संसार परम्परा को समाप्त करना चाहिये।