07.कषाय मार्गणा अधिकार

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कषाय मार्गणा अधिकार

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ द्वाभ्यामन्तरस्थलाभ्यां चतुर्भिः सूत्रैः कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले चतुःकषायाणां स्थितिप्रतिपादनत्वेन ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले अकषायाणां कालनिरूपणत्वेन ‘‘अकसाई’’ इत्यादिसूत्रमेकं इति पातनिका भवति।
इदानीं सकषायिणां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
कसायाणुवादेण कोधकसार्ई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई केवचिरं कालादो होंति ?।।१२८।।
जहण्णेण एयसमओ।।१२९।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१३०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अविवक्षितकषायात् क्रोधकषायं प्राप्य एकसमयं स्थित्वा कालं कृत्वा नरकगतिं मुक्त्वान्यगतिषु उत्पन्नस्य एकसमयोपलंभात्। क्रोधस्य व्याघातेन एकसमयो नास्ति, व्याघातितेऽपि क्रोधस्यैव समुत्पत्तेः।
एवं शेषाणां त्रयाणां कषायाणां अपि एकसमयप्ररूपणा कर्तव्या। विशेषेण तु एतेषां त्रयाणां कषायाणां व्याघातेनापि एकसमयप्ररूपणा कर्तव्या। मरणेन भण्यमाणे एकसमये मानस्य मनुष्यगतिं, मायायाः तिर्यग्गतिं, लोभस्य देवगतिं मुक्त्वा शेषासु तिसृषु गतिषु उत्पादयितव्या।
कुतः ?
नरकगति-मनुष्य-तिर्यग्-देवगतिषु उत्पन्नानां प्रथमसमये यथाक्रमेण क्रोध-मान-माया-लोभानां चैवोदयदर्शनात्। जघन्येन एतत्कालप्ररूपणा ज्ञातव्या।
अविवक्षितकषायात् विवक्षितकषायं गत्वोत्कृष्टकालं तत्र स्थितः कश्चिद् जीवः, तस्यापि अंतर्मुहूर्तादधिककालानुपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले सकषायाणां कालनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम् ।
संप्रति कषायविरहितानां कालकथनाय सूत्रमवतरति-
अकसाई अवगदवेदभंगो।।१३१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र अकषायाणां उपशमश्रेण्यपेक्षया जघन्येन एकसमयः, क्षपकश्रेण्यपेक्षया उत्कृष्टेनान्तर्मुहूर्तमिति। उत्कर्षेण उपशमश्रेणिं प्रतीत्य अंतर्मुहूर्तं, क्षपकश्रेणिमाश्रित्य देशोनपूर्वकोटिकालप्रमाणं भणितमस्ति।
तात्पर्यमेतत्-इमे क्रोधादिकषायाः सततं आत्मानं िंहसन्ति एषां निमित्तेन आत्मा संसारे परिभ्रमति एतज्ज्ञात्वा कषायान् कृशीकरणार्थं निरंतरं उपायो विधेयः। रागद्वेषमोहादीनां निराकरणाय परमसाम्यं भावनीयं, पुनश्च यैः रागादयः जिताः तेषां शरणं गृहीतव्यं। उक्तं च श्रीपद्मनन्दिदेवै:-
रागो यस्य न विद्यते क्वचिदपि प्रध्वस्तमोहग्रहा-
दस्त्रादेः परिवर्जनात् न च बुधैद्र्वेषोऽपि संभाव्यते।
तस्मात् साम्यमथात्मबोधनमतो जातः क्षयः कर्मणा-
मानन्दादिगुणाश्रयस्तु नियतं सोऽर्हन् सदापातु वः।।३।।
एवं द्वितीयस्थले अकषायाणां कालकथनमुख्यत्वेन एकं सूत्रं गतं।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधकनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकारःसमाप्तः।

अथ कषायमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो अन्तर स्थलों में चार सूत्रों के द्वारा कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में चारों कषायों की स्थिति का प्रतिपादन करने वाले ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में अकषायी-कषायरहित जीवों का काल निरूपण करने वाले ‘‘अकसाई’’ इत्यादि एक सूत्र हैं। इस प्रकार यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब कषाय सहित जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुसार जीव क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी कब तक रहते है ?।।१२८।।

जघन्य से एक समय तक जीव क्रोधकषायी आदि रहते हैं।।१२९।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव क्रोधकषायी आदि रहते हैं।।१३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अविवक्षित कषाय से क्रोधकषाय को प्राप्त होकर, एक समय रहकर और फिर मरकर नरकगति को छोड़ अन्य गतियों में उत्पन्न हुए जीव के एक समय पाया जाता है। क्रोध के व्याधात से एक समय नहीं पाया जाता, क्योंकि व्याघात को प्राप्त होने पर भी पुन: क्रोध की ही उत्पत्ति होती है।

इसी प्रकार शेष तीन कषायों की प्ररूपणा करनी चाहिए। विशेष इतना है कि इन तीन कषायों के व्याघात से भी एक समय की प्ररूपणा करनी चाहिए। मरण की अपेक्षा एक समय कहने पर मान की मनुष्यगति, माया की तिर्यंचगति और लोभ की देवगति को छोड़कर शेष तीन गतियों में जीव को उत्पन्न करना चाहिए।

क्यों ?

कारण कि नरक, मनुष्य, तिर्यंच और देवगतियों में उत्पन्न हुए जीवों के प्रथम समय में यथाक्रम से क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय देखा जाता है। जघन्य से यह कालप्ररूपणा जानना चाहिए।

अविवक्षित कषाय से विवक्षित कषाय को प्राप्त करके वहाँ उत्कृष्टकाल तक रहकर कोई जीव स्थित रहा, क्योंकि उसके भी वहाँ अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कषाय सहित जीवों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब कषायरहित जीवों का काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अकषायी जीवों का काल अपगतवेदियों के समान होता है।।१३१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ अकषायी जीवों का काल उपशम श्रेणी की अपेक्षा जघन्य से एक समय है और क्षपकश्रेणी की अपेक्षा उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त है। उत्कृष्ट से उपशमश्रेणी की अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त है और क्षपकश्रेणी की अपेक्षा कुछ कम पूर्वकोटिवर्ष प्रमाण कहा गया है।

तात्पर्य यह है कि-ये क्रोधादि कषायें आत्मा की हमेशा हिंसा करते हैं, इन्हीं के निमित्त से आत्मा संसार में परिभ्रमण करता है ऐसा जानकर कषायों को कृश करने का निरन्तर पुरुषार्थ करना चाहिए। राग-द्वेष-मोह आदि का निराकरण करने हेतु परम समताभाव रखने की भावना भानी चाहिए, पुन: जिन्होंने रागादि को जीत लिया है, उनकी शरण को प्राप्त करना चाहिए।

आचार्य श्री पद्मनंदिदेव ने भी कहा है-

श्लोकार्थ-मोह तथा परिग्रह के नाश हो जाने के कारण न तो किसी पदार्थ में जिन अर्हंत भगवान का राग ही प्रतीत होता है तथा अर्हंत भगवान ने समस्त शस्त्र आदि को छोड़ दिया है इसलिए विद्वानों को किसी में जिन अर्हंत भगवान का द्वेष भी देखने में नहीं आता तथा द्वेष के न रहने के कारण जो शान्तस्वभावी हैं तथा शान्तस्वभावी होने के ही कारण जिन अर्हंत भगवान ने अपनी आत्मा को जान लिया है तथा आत्मा का ज्ञाता होने के कारण जो अर्हंत भगवान कर्मों से रहित हैं तथा कर्मों से रहित होने के ही कारण जो आनन्द आदि गुणों के आश्रयरूप हैं, ऐसे अर्हंत भगवान आप सबकी व हमारी सदा रक्षा करो अर्थात् ऐसे अर्हंत भगवान की मैं सदा शरण लेता हूँ। अर्थात् जो रागी तथा द्वेषी है और निरन्तर स्त्रियों में राग करता है तथा जो मोही है और शत्रु से भीत होकर जो निरन्तर शस्त्र को अपने पास रखता है तथा कर्मों का मारा नाना प्रकार की गतियों में भ्रमण करता रहता है, ऐसा स्वयं दु:खी व्यक्ति दूसरे की क्या रक्षा कर सकता है ? किन्तु जो वीतराग हैं तथा काल मोह आदि जिनके पास भी नहीं फटकने पाते और जो जन्म मरणादि से रहित हैं और कर्मों के जीतने वाले हैं वही दूसरे की रक्षा कर सकते हैं, इसलिए ऐसे ही आप्त (अर्हन्त) की मैं शरण लेता हूँ।

इस तरह से द्वितीय स्थल में अकषायी जीवों का काल कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।