07. दान का उपदेश

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दान का उपदेश



।।द्वितीय अधिकार।।
(१)
श्री नाभिराय के पुत्र ऋषभ जग में सदैव जयवंत रहें।
कुरु गोत्र रूप गृह के प्रदीप श्रेयांस नृपति जयवंत रहें।।
इन दोनों से व्रत दान तीर्थ उत्पन्न हुआ इस वसुधा पर।
इसलिए इन्हें हम नमन करें ये धर्मतीर्थ के संचालक।।
(२)
जिनका यश शरद काल के उज्जवल मेघ समान भ्रमण करता।
ऐसे राजा श्रेयांस हुए स्मरण जिन्हें जग है करता।।
तीनों लोकों के पूज्यनीक का जिनके घर आहार हुआ।
श्री आदिनाथ को दे आहार जिनका जग में यशगान हुआ।।
(३)
घर धन्य हुआ जग धन्य हुआ जब प्रभुवर ने पारणा करी।
राजा श्रेयांस भी धन्य हुए देवों ने रत्न की वर्षा की।।
इस रत्नवृष्टि से धरती ने ‘‘वसुमति’’ इस नाम को प्राप्त किया।
अक्षय हो गया वहाँ भोजन ‘‘अक्षय तृतिया’’ विख्यात हुआ।।
(४)
दुर्लभ मानव तन को पाकर जो लोभ वूâप में गिरे हुए।
जो स्वप्न समान मिला यौवन उसमें ही निज को भूल गए।।
यह इंद्रजाल सम अस्थिर है ऐसा गुरुवर संबोध रहे।
अब आगे दया भावना से आचार्य हमें उपदेश रहे।।
(५)
जो स्त्री पुत्र धनादिक में अत्यन्त मोह से भरा हुआ।
एवं विशाल सागर रूपी गृह आश्रम में जो पंâसा हुआ।।
उसके उद्धार हेतु गुरु ने नौका स्वरूप है कहा दान।
सात्विक भावों से दिया हुआ वह दान बना देता महान।।
(६)
यदि खेवटिया हो चतुर लहर से नाव पार कर देता है।
वैसे ही इस भवसागर में रहकर भी दान यदि देता है।।

तो वह मनुष्य घर में रहकर भी शुभगति का ही बंध करे।
इसलिए गृहस्थाश्रम में रह उत्कृष्ट दानविधि पूर्ण करें।।
(७)
नाना प्रकार के दुख सहकर जो धन को पैदा करते हैं।
सुत और प्राण से प्यारे धन का सदुपयोग जो करते हैं।।
वह दान किया धन ही वास्तव में अच्छी गति देने वाला।
वरना विपत्ति का कारण धन यह ही गुरुओं ने लिख डाला।।
(८)
भोगादिक में जो नष्ट हुई वह कभी न वापस आती है।
पर जो लक्ष्मी सन्तों को चउविध दानों में दी जाती है।।
वटवृक्ष सरीखी कोटि गुना होकर आगे फल देती है।
जो निरभिमान हो दान करें तो इंद्र संपदा देती है।।
(९)
जैसे जैसे मकान बनता कारीगर भी वैसे ऊपर जाता।
श्रावक मुनिगण को दे अहार, मुक्तीपथ ओर पहुंच जाता।।
सत्पात्र दान देकर खुद भी मुक्तीपथ को पा जाता है।
इसलिए दान देने वाला निज पर हितकारि कहाता है।।
(१०)
जो मुनि को शांकपिण्ड का भी आहार भक्तिपूर्वक देते।
वे श्रावक पुण्य उपार्जन करके हैं अनंत सुख को लभते।।
जैसे किसान थोड़े बीजों को बोकर धान बहुत पाता।
वैसे ही थोड़ा दान दिया, भावों से बहुगुणा फल जाता।।
(११)
मन वचन काय की शुद्धी से मुनिगण को देते जो अहार।
उससे न बड़ा है पुण्य कोई गर पात्रदान में रुचि महान।।
यह भवसमुद्र से तिरने में है कारणभूत न अन्य कोई।
इसकी अभिलाषा इंद्र करे पर दे सकते हैं श्रावक ही।।
(१२)
रत्नत्रय मोक्ष का कारण है इसको मुनिगण पालन करते।
उनको जिससे शक्ती मिलती वह अन्न तो श्रावकजन देते।।
इसलिए गृहस्थाश्रम में गुरु ने व्रत से ज्यादा है पुण्य कहा।
आहारदान अति फलदायी सब आचार्यों ने यही कहा।।
(१३)
नाना प्रकार आरंभों से जो पाप उर्पािजत होता है।
वह व्रत करने से कम कटता पर दान बहुत फल देता है।।
इसलिए सदा प्रीतिपूर्वक उत्तम पात्रों में दान करें।
ऊँचे फल के जो अभिलाषी वे ऊँचे फल भी प्राप्त करें।।
(१४)
जैसे नदियाँ पर्वत से गिरने में कुछ छोटी हो जातीं।
जब सागर में जाकर मिलतीं तब लहरों से बढ़ती जाती।।
बस उसी तरह सम्यग्दृष्टि के पहले लक्ष्मी कम होती।
लेकिन मुनियों के दान पुण्य से चक्रवर्ति सम है बढ़ती।।
(१५)
परमात्म बोध घर में रहकर के कभी नहीं हो सकता है।
पर सम्यग्दृष्टी धर्म अर्थ अरु काम मोक्ष वर सकता है।।
आहारौषधि अरु अभय शास्त्र जो चउविध दान दिया करते।
पुरुषार्थ सिद्धि के अभिलाषी सब पल भर में हैं पा लेते।।
(१६)
जो मोक्षमार्ग में स्थित हैं ऐसे साधू के सुमिरन से।
सब पाप नष्ट हो जाते हैं फिर और अधिक अब क्या कहने।।
आहार औषध अरु वसतिदान से भव समुद्र तिर जाता है।
इससे न बड़ा उपकार कोई यह महादान कहलाता है।।
(१७)
जिस घर में मुनि के चरण पड़े वह घर पवित्र हो जाता है।
जिस मन में मुनि की जगह न हो वह श्रावक निंह कहलाता है।।
इसलिए गृहस्थों को घर में आहारदान देना चहिए।
उनके चरणोदक से घर को मन को पवित्र करना चहिए।।
(१८)
वह देव ही क्या जो स्त्री को लखकर विकार को प्राप्त हुआ।
वह धर्म ही क्या जिसमें न दया करुणा का भाव हो मिला हुआ।।
जिससे आत्मा का ज्ञान न हो वह गुरू नहीं हो सकता है।
जहाँ पात्रों को नहिं दान दिया वह व्यर्थ संपदा खोता है।।
(१९)
तीनों लोकों को वश करने का मंत्र स्वरूप दानव्रत है।
उससे उत्पन्न धर्म से ही उत्तम गुण सुख ऐश्वर्य रहे।।
जो उत्तम गुण के अभिलाषी मानव वे दान जरूर करें।
ऐसा गुरुजन का कहना है इससे ही मानव शीघ्र तिरे।।
(२०)
सत्पात्र दान से इक प्राणी संचय करता है पुण्य बहुत।
दूजा प्राणी जो भोगों में लक्ष्मी को करता व्यर्थ बहुत।।
क्योंकी आगामी कालों में उसका न कोई फल मिलता है।
पर पात्रदान करने वाला धन संपति का फल चखता है।।
(२१)
नहिं दान करे नहिं व्रत आदिक नहिं शास्त्रों का भी पठन करें।
ऐसे प्राणीगण जन्म मरण के दुक्ख भोग कर व्यर्थ करें।।
इसलिए कहा आचार्यों ने धन पात्रदान में सदा करें।
शक्ती अनुसार तपस्या कर शास्त्रों का पाठन सदा करें।।
(२२)
इस दुर्लभ नरभव को पाकर उत्तम तप करना श्रेष्ठ कहा।
बस इसी तरह धनवान व्यक्ति को पूजन दान विशेष कहा।।
क्योंकी जो दान व पूजन में निज संपत्ति का उपयोग करें।
वरना वह संपति वृथा कही केवल कर्मों को जोड़ रहे।।
(२३)
जो मिली हुई संपत्ती को, सत्पात्र आदि में दान करें।
वरना ये वैभव दुर्गति में ही ले जाने का काम करे।।
सत्पात्र दान से रहित व्यक्ति को भिक्षा लेना उत्तम है।
क्योंकी भिक्षुक संक्लेश रहित आरंभ परिग्रह भी कम है।।
(२४)
जिस घर में प्रभु के चरण कमल की पूजा नहीं करी जाती।
संयमी जनों को दान आदि भक्ती से कभी न दी जाती।।
ऐसा गृहस्थ जल में प्रवेश करने के लायक कहा गया।
आचार्य कहें उस मानव का सारा जीवन है व्यर्थ गया।।
(२५)
भवसागर में भ्रमते भ्रमते मुश्किल से नरभव प्राप्त हुआ।
इस नरतन को भी पा करके यदि तपश्चरण भी नहीं किया।।
तो गुरुवर हमसे कहते हैं अणुव्रत तो धारण करो सही।
उत्तम पात्रों में दान करो जिससे मिलता है मोक्ष नहीं।।
(२६)
यात्रा पर जाते समय व्यक्ति जो खाद्य वस्तु लेकर चलता।
वह सुखपूर्वक गंतव्य पूर्ण कर लेता कोई नहीं चिंता।।
वैसे ही जो परलोक गमन करने वाले प्राणीगण हैं।
उनको बस दान व्रतादिक से उत्पन्न पुण्य सुखकारण है।।
(२७)
इस कामभोग धन यश खातिर जो जो प्रयत्न हम करते हैं।
वे दैवयोग से हो सकते निष्फल पर यदि हम करते हैं।।
र्हिषत मन से जो किया गया वह दान न निष्फल जाता है।
इसलिए दान हरदम करिए यह ही बस पुण्यप्रदाता है।।
(२८)
बैरी भी यदि निज घर आये भोजन सम्मान दिया जाता।
फिर उत्तम रत्नत्रयधारी को क्यों ना दान दिया जाता।।
इसलिए सभी सज्जन प्राणी मुनिगण को नवधा भक्ती से।
आहार हर्षपूर्वक देवे और पुण्य कमा लेवे सच में।।
(२९)
आचार्य प्ररूपण करते हैं बिन दान दिये जो दुख होता।
उतना दुख सज्जन पुरुषों को निंह पुत्र मरण से है होता।।
दुर्दैव योग से यदि कोई हो जाए कार्य जो इष्ट नहीं।
उतना नहिं होता दुख मगर अपने से होए अनिष्ट नहीं।।
(३०)
जो धनी पुरुष जिनमंदिर का निर्माण कार्य धारे चित में।
अथवा जो कारणभूत धर्म के अन्य कार्य करते मन से।।
उनसे भी दान विशेष कहा दृष्टांत है चंद्रकांत मणि का।
जब चंद्रकिरण स्पर्श करे तब ही उससे पानी गिरता।।
(३१)
जो धन होने पर भी श्रावक नहिं पात्रदान में रुचि रखते।
मायाचारी के वश होकर अपने को धर्मात्मा कहते।।
अगले भव में तिर्यंचगती पा करके बहुत दुख सहते।
इसलिए कपट से दूर रहो ऐसा आचार्यवर्य कहते।।
(३२)
अपनी शक्ती अनुसार दान जितना भी बने देना चाहिए।
वो एक ग्रास दो ग्रास तथा आधा चौथाई भी रहिए।।
क्योंकी आचार्य हमें कहते कब किसके पास पूर्णता से।
जितना धन उससे ज्यादा की नहिं इच्छा पूर्ण हुई उससे।।
(३३)
मिथ्यादृष्टी और पशुओं को भी उत्तम भोगभूमि मिलती।
मुनि के आहारदान अनुमोदन से भी है सुरगति मिलती।।
सम्यग्दृष्टी का पात्रदान क्रमश: मुक्तीपथ देता है।
इसलिए दान की महिमा से इस जग में सब कुछ मिलता है।।
(३४)
जिस नर के पास यथोचित धन फिर भी नहिं बुद्धी रुचि उसमें।
तो समझो छोड़ अमूल्य रत्न भटके वह मूर्ख धरातल में।।
ऐसे मनुष्य को मिली हुई संपति भी बिना प्रयोजन हो।
इसलिए प्रमाद को तज करके, बाकी संपत्ति दान में दो।।
(३५)
मणि के समान उत्तम नरभव में धन को पाकर दान करे।
ऐसी जिनवर की आज्ञा है उससे विपरीत न काम करे।।
वरना रत्नों से भरी हुई टूटी नैया कब पार करे।
गर समयचक्र में डूब गये तो दुर्लभ मणि ना प्राप्त करें।।
(३६)
जो इस भव में यश परभव में सुख की खातिर नहिं दान करे।
तो समझो उसको उस धन का वह मालिक निंह बस दास रहे।।
इच्छानुसार निज धन को व्यय दानादिक में करना चहिए।
वह ही अगले भव संग जाए उससे है भिन्न पर का कहिए।।
(३७)
जिनमंदिर बनवाने में जो धनराशी खर्च करी जाती।
प्रभु की पूजन आचार्यों के पूजन में जो खर्ची जाती।।
इसके अतिरिक्त संयमीजन अरु दुखित जनों को दान करें।
यह ही धन अपना कहलाता बाकी धन सब बेकार रहे।।
(३८)
जितना जल निकले वूâप से वह उतना ही बढ़ता रहता है।
हे भव्यात्मन् ! बस उसी तरह यह धन भी दान से बढ़ता है।।
संयमी पात्र में देने से वह दान बहुत फल को देता।
पर कभी पुण्य क्षय होने से मिथ्यादानों से है घटता।।
(३९)
लौकिक विवाह आदिक कार्यों में किया गया जो लोभ कहा।
उसमें बस थोड़ा दोष ढूंढ कहते लोभी वंâजूस महा।।
लेकिन जो अर्हत् पूजन में है किया लोभ वह ठीक नहीं।
इहभव परभव में सम्यग्दर्शन गुण का घातक बने वही।।
(४०)
मृत्यू पश्चात् न यश पैâले इस जग में ऐसे मानव का।
पैदा होना भी व्यर्थ कहा धन होते हुए दरिद्री सा।।
है निष्कलंक फिर भी उसका गुणगान न कोई गाता है।
इसलिए दान देना चहिए यह शास्त्र हमें बतलाता है।।
(४१)
कर्मानुसार इक कुत्ता भी जब अपनी भूख मिटा लेता।
कर्मानुसार इक राजा भी मनचाहा भोजन खा लेता।।
नरभव पाकर विवेकपूर्वक उत्तम पात्रों में दान करें।
नरभव पाना तब ही सार्थक ना इसका तू अभिमान करे।।
(४२)
परदेश में रहकर श्रमपूर्वक जो पैदा किया गया धन है।
वह पुत्रों से भी प्यारा है और प्राणों से प्यारा धन है।।
उस धन की सफलगती केवल आचार्य दान ही कहते हैं।
वरना विपत्ति ही विपति मिले सज्जनगण ऐसा कहते हैं।।
(४३)
मरणोपरांत यह धन वैभव थोड़ी भी दूर नहीं जाता।
शमशान भूमि से ही बंधू समूह वापस घर आ जाता।।
बस एक पुण्य ही मित्र तेरा जो सदा साथ में जायेगा।
इस दान से बढ़कर पुण्य नहीं यह मुक्ती भी दिलवायेगा।।
(४४)
सौभाग्य शूरता सुख विवेक विद्या शरीर धन उत्तम कुल।
ये सब कुछ पात्रदान से ही मिलता है देखा कितना कुछ।।
आचार्य हमें सम्बोध रहे हरदम प्रयत्न करते रहना।
बुद्धी अनुवूâल रहे जिससे भव भव में पड़े नहीं भ्रमना।।
(४५)
पहले मकान बनवा लूं मैं फिर पुत्रों का विवाह कर दूं।
थोड़ा धन संचित कर रख लूं फिर बचे तभी दान में दूं।।
ऐसा विचार करते करते प्राणी का अंत समय आता।
इसलिए प्रथम कुछ दान करो जो साथ तुम्हारे है जाता।।
(४६)
लोभी मनुष्य धन होने पर भी निंह खुद भी उपभोग करे।
ऐसे मनुष्य का जीना क्या नहिं दान करे बस कोष भरे।।
आचार्य कृपण की िंनदा कर कौए को उत्तम कहते हैं।
जो सबको पास बुला करके संग मिलकर भोजन करते हैं।।
(४७)
उत्प्रेक्षा अलंकार से युत कुछ शब्दों में यूं कहते हैं।
धन ने सोचा उदार के घर रहने से भ्रमते रहते हैं।।
इसलिए कृपण के घर में सुख शांती से रहना अच्छा है।
निंह व्यर्थ घूमना पड़े हमें सोते रहने की इच्छा है।।
(४८)
अब पात्रों के भेदों का वर्णन गुरुवर हमें बताते हैं।
उत्तम है पात्र मुनी आदिक मध्यम श्रावक कहलाते हैं।।
सम्यग्दृष्टी व्रत रहित गृही है जघन्य पात्र की श्रेणी में।
अरु मिथ्यादृष्टि व्रती कुपात्र अव्रति अपात्र की श्रेणी में।।
(४९)
निर्मल भावों से दिया हुआ उत्तम पात्रों का दान सदा।
उत्तम फल देने वाला है मध्यम दानों का फल न वृथा।।
देता है क्रमश: स्वर्ग भोगभूमी उत्तम मध्यम आदिक।
फल दान का मिलता है अवश्य निंह कह सकते हैं और अधिक।।
(५०)
आहार औषध और अभय शास्त्र ये चार दान के भेद कहे।
इन चारों दानों से मिलता है महामोक्षफल शास्त्र कहें।।
पर इससे भिन्न गो कनक भूमि रथ स्त्री आदिक दान करे।
वह फल न कोई देने वाला ये व्यर्थ के ही सब काम कहें।।
(५१)
जो जिनमंदिर के लिए धरा धन दान स्वरूप दिए जाते।
उसके प्रभाव से बहुत काल जिनमत की ज्योति जला जाते।।
जिनमंदिर बनवाकर दाता ने जिनमत का उद्धार किया।
उस धन का सदुपयोग करके अपने कर्मों को काट लिया।।
(५२)
इससे विपरीत कृपण जन को दानादिक कार्य न रुचते हैं।
मिथ्यात्व हृदय में भरा हुआ बस दोष ढूंढते रहते हैं।।
जैसे उल्लू को दिनकर का प्रकाश अच्छा निंह लगता है।
वैसे ही लोभी को सुखप्रद यह दान न अच्छा लगता है।।
(५३)
जो निकट भव्य है जीव उसे दानोपदेश से खुशी मिले।
लेकिन अभव्य जीवों को यह उपदेश बहुत अप्रिय लगते।।
जैसे भ्रमरों की संगत से विकसित हो पुष्प चमेली का।
और चन्द्रकिरण से कमल खिले निंह खिले काष्ठ और पत्थर का।।
(५४)
दानोपदेश के प्रकरण को आचार्य विराम लगाते हैं।
रत्नत्रय से भूषित गुरूवर श्री वीरनंदि को ध्याते हैं।।
उनके प्रभाव से ‘‘पद्मनंदि’’ नामक मुनिवर ने रचना की।
बावन श्लोकों में रचकर दानी की उत्तम महिमा की।।