07.नंदिमित्र बलभद्र एवं श्रीदत्त नारायण

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नंदिमित्र बलभद्र एवं श्रीदत्त नारायण

भगवान मल्लिनाथ के तीर्थ में नंदिमित्र नाम के सातवें बलभद्र एवं श्रीदत्त नाम के सातवें नारायण हुए। इनके तीसरे भव पूर्व का चरित्र लिखा जाता है-अयोध्या के राजा के दो पुत्र थे। ये दोनों पिता को प्रिय नहीं थे अत: राजा ने इन दोनों को छोड़कर अपने छोटे भाई को युवराज पद दे दिया। तब इन दोनों भाइयों ने यह समझा कि यह सब मंत्री ने कराया है अत: मंत्री के प्रति वैर भाव धारण कर ये दोनों राजकुमार महामुनि शिवगुप्त से दीक्षा लेकर तपश्चरण करने लगे पुन: अंत में समाधिपूर्वक मरण कर सौधर्म स्वर्ग में सुविशाल विमान में देव हो गए।

वहाँ से च्युत होकर एक देव वाराणसी के इक्ष्वाकुवंशीय राजा अग्निशिख की अपराजिता रानी से नंदिमित्र नाम के बलभद्र हुए हैं एवं इन्हीं राजा की दूसरी केशवती रानी से दूसरे देव ने जन्म लेकर श्रीदत्त नाम प्राप्त किया है। बत्तीस हजार वर्ष की इनकी आयु थी। बाईस धनुष (२२²४·८८ हाथ) ऊँचा शरीर था, क्रम से बलभद्र के शरीर का वर्ण शुक्ल व नारायण के शरीर का वर्ण इन्द्रनील मणि के समान था।

इधर मंत्री का जीव क्रम से कुछ पुण्य संचित करके विजयार्ध पर्वत पर मन्दरपुर नगर का स्वामी बलीन्द्र विद्याधर हुआ। किसी एक दिन इस बलीन्द्र ने दोनों राजा-नंदिमित्र व श्रीदत्त के पास दूत भेजा और कहलाया कि आपके पास भद्रक्षीर नाम का एक गंधहस्ती है, उसे हमारे यहाँ भेज दीजिए। इन दोनों ने दूत से कहा कि वे बलीन्द्र विद्याधर राजा अपनी पुत्रियों का हमारे साथ विवाह कर दें, तब यह गंधहाथी दिया भी जा सकता है। यह सब सुनकर विद्याधर बलीन्द्र अपना चक्ररत्न आगे कर युद्ध के लिए चल पड़े।

इधर दक्षिणश्रेणी के सुरकांतार नगर के स्वामी केसरीविक्रम जो कि ‘केशवती’ के भ्राता थे, उन्होंने सम्मेदशिखर पर विधिपूर्वक सिद्ध की गई सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी ऐसी दो विद्याएँ ‘श्रीदत्तनारायण’ को दे दीं। इस प्रकार इन दोनों ही बलवान राजाओं की सेना में भयंकर युद्ध होता रहा। बलीन्द्र विद्याधर के पुत्र शतबली में और बलभद्र नंदिमित्र में आपस में बहुत ही युद्ध हुआ। उसमें बलभद्र ने शतबली को यमराज के मुख में पहुँचा दिया। पुत्र की मृत्यु देख ‘बलीन्द्र’ राजा ने अत्यंत कुपित हो श्रीदत्त पर अपना चक्र चला दिया परन्तु वह चक्र श्रीदत्त की तीन प्रदक्षिणा देकर इनकी दाहिनी भुजा पर आ गया। श्रीदत्त ने उसी चक्र से उस बलीन्द्र विद्याधर का वध कर दिया।

युद्ध समाप्त होते ही दोनों भाइयों ने ‘अभयघोषणा’ की और चक्ररत्न को प्राप्त कर तीनों खण्डों को अपने आधीन कर लिया। दोनों भाइयों ने बलभद्र व नारायण पद को प्राप्त कर चिरकाल तक राज्य सुखों का अनुभव किया है। अंत में बलभद्र नंदिमित्र ने संभूत जिनेन्द्र के पास अनेक राजाओं के साथ दीक्षा लेकर केवलज्ञान प्राप्त कर पृथिवी पर श्रीविहार करके धर्मोपदेश दिया है अनंतर सम्पूर्ण कर्मों का नाश कर मोक्ष प्राप्त किया है। ये नंदिमित्र सिद्ध परमात्मा हम सभी की आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए सद्बुद्धि प्रदान करें, यही प्रार्थना है।