07.भारतीय संविधान में जैनों की स्थिति

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भारतीय संविधान में जैनों की स्थिति

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५ (२ ख) के अनुसार ‘‘खंड (२) के उपखण्ड (ख) में हिन्दुओं के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत सिक्ख, जैन या बौद्धधर्म के मानने वाले व्यक्तियों के प्रति निर्देश हैं और हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा।’’

स्वतन्त्रता के बाद भारत के संविधान बनने के दौरान २५—०१—१९५० को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से एवं दूसरे महत्त्वपूर्ण नेताओं से जैनों का एक प्रतिनिधि मण्डल मण्डल मिला था और संविधान की धारा २५ (२ ख) से उत्पन्न होने वाली भ्रान्तियों के सम्बन्ध में एक ज्ञापन दिया था जिसके लिखित स्पष्टीकरण पत्र संख्या ३३/९४/५० दिनांक—३१—०१—१९५० (प्रधानमंत्री सचिवालय) द्वारा ‘‘जैनधर्म भिन्न धार्मिक समुदाय है और उनकी इस स्वीकृति स्थिति का संविधान किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करता’’ माना था। स्व. पं. जवाहरलाल नेहरू जी ने ३ सितम्बर, सन् १९४९ को इलाहाबाद के अपने भाषण में जैनों की स्वतंत्रता का उल्लेख करते हुए उसे ‘अल्पसंख्यक समाज’ कहा था। (स्टेट्समेन, प्रकाशन तिथि ०५—०९—१९४९)

सन् १८७२ में विशेष विवाह अधिनियम बनाया गया था, जिसमें जैनधर्म को स्वतन्त्र धर्म के रूप में लिखा गया था। सन् १९२३ में विशेष विवाह अधिनियम में परिवर्तन कर हिन्दुओं, बौद्धों सिक्खों व जैनों के अन्तर्गत धार्मिक विवाहों को कानूनी रूप से मान्यता दी थी व सन् १९५४ के अधिनियम में भी इसी को जारी रखा था। ‘‘मैं नहीं जानता कि मृत्यु के पश्चात् भी जीवन है या नहीं किन्तु यदि यह सत्य है कि मृत्यु पश्चात् भी जीवन है तो मैं चाहूँगा कि मैं भारत में पैदा होऊँ वो भी जैनधर्म में।’’

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जार्ज अल्बर्ट आइन्स्टाईन
(विश्व प्रसिद्ध महान् वैज्ञानिक)