07.योग मार्गणा

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज



योग मार्गणा

प्रश्न1-योग मार्गणा किसे कहते हैं?

उत्तर :कर्म वर्गणा रूप पुद्‌गल स्कन्धों को ज्ञानावरण आदि कर्म रूप से और नोकर्म वर्गणा रूप पुद्‌गल स्कन्ध को औदारिक आदि नोकर्म रूप से परिणमन में हेतु जो सामर्थ्य है तथा आत्मप्रदेशों के परिस्पन्द को योग कहते हैं । जैसे-अग्रि के संयोग से लोहे में दहन शक्ति होती है, उसी तरह अंगोपांग और शरीर नामकर्म के उदय से जीव के प्रदेशों में कर्म और नोकर्म को ग्रहण करने की शक्ति उत्पन्न होती है । (गो. जी. 216)

जीवों के प्रदेशों का जो संकोच-विकोच और परिभ्रमण रूप परिस्पन्दन होता है, वह योग कहलाता है । (ध. 1०7437)

मन, वचन और काय वर्गणा निमित्तक आत्मप्रदेश का परिस्पन्द योग है । (ध. 10437) उपर्युक्त योगों में जीवों की खोज करने को योग मार्गणा कहते हैं ।

प्रश्न2-योग कितने होते हैं?

उत्तर :योग दो प्रकार के हैं- 1. द्रव्य योग 2. भाव योग ।

योग के तीन भेद हैं- 1 मनोयोग. 2 वचनयोग. 3 काययोग । (त. सू 6)

योग के पन्द्रह भेद होते हैं -

4 मनोयोग - सत्यमनोयोग, मृषामनोयोग, सत्यमृषामनोयोग असत्यमृषामनोयोग । (सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, उभयमनोयोग, अनुभयमनोयोग)

4 वचनयोग - सत्यवचनयोग, मृषावचनयोग, सत्यमृषावचनयोग, असत्यमृषा- वचन योग । (सत्यवचनयघो, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग, अनुभयवचनयोग)

7 काययोग - औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रकाययोग, वैक्रियिककाययणे, वैक्रियिकमिश्रकाययोग, आहारककाययोग, आहारकमिश्रकाययोग तथा कार्मणकाययोग ।

प्रश्न3- द्रव्ययोग किसे कहते हैं?

उत्तर :भावयोग रूप शक्ति से विशिष्ट आत्मप्रदेशों में जो कुछ हलन-चलन रूप परिस्पन्द होता है वह द्रव्य योग है । ( गो.जी. 216)

प्रश्न4-भावयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :पुद्‌गल विपाकी अंगोपांग नामकर्म और शरीर नामकर्म के उदय से मन, वचन और काय रूप से परिणत तथा कायवर्गणा, वचनवर्गणा और मनोवर्गणा का अवलम्बन करने वालेसंसारी जीव के लोकमात्र प्रदेशों में रहने वाली जो शक्ति कर्मों को ग्रहण करने में कारण है वह भावयोग है । (मै।. म्बूँ।. मै 16)

प्रश्न5-मनोयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :अध्यन्तर में वीर्यान्तराय और नोइन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम रूप मनोलब्धि के सन्निकट होने पर और बाह्य निमित्त रूप मनोवर्गणा का अवलम्बन होने पर मनःपरिणाम के प्रति अभिमुख हुए आत्मा के प्रदेशों का जो परिस्पन्द होता है उसे मनोयोग कहते हैं । (रा. वा. 671०)

मनोवर्गणा से निष्पन्न हुए द्रव्य के आलम्बन से जो संकोच-विकोच होता है वह मनोयोग है । (ध. 7776)

प्रश्न6-वचनयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :भाषा वर्गणा सम्बन्धी पुद्‌गल स्कन्धों के अवलम्बन से जीव प्रदेशों का जो संकोच-विकोच होता है वह वचनयोग है । ४. ' 76)

शरीर नामकर्म के उदय से प्राप्त हुई वचन वर्गणाओं का अवलम्बन लेने पर तथा वीर्यान्तराय का क्षयोपशम और मति अकरादि ज्ञानावरण के क्षयोपशम आदि से अध्यन्तर में वचनलब्धि का सान्निध्य होने पर वचन परिणाम के अभिमुख हुए आत्मा के प्रदेशों का जो परिस्पन्दन होता है वह वचनयोग कहलाता है । (सर्वा. 610)

प्रश्न7-काययोग किसे कहते हैं?

उत्तर :वीर्यान्तराय कर्म का क्षयोपशम होने पर औदारिक आदि सात प्रकार की कायवर्गणाओं में से किसी एक के अवलम्बन की अपेक्षा करके जो आत्मा के प्रदेशों में परिस्पन्दन होता है, वह काययोग है (सर्वा. मि. 671) जो चतुर्विध शरीरों' के अवलम्बन से जीवप्रदेशों का संकोच-विकोच होता है, वह काययोग है । (य. 7 ' 76)

वात, पित्त व कफ आदि के द्वारा उत्पन्न परिश्रम से जीव प्रदेशों का जो परिस्पन्द होता है वह काययोग कहा जाता है । (ध. 1०7437)

प्रश्न8-योग मार्गणा कितने प्रकार की होती है?

उत्तर :योग मार्गणा के अनुवाद की अपेक्षा मनोयोगी, वचनयोगी तथा काययलेईा तथा अयोगी जीव होते हैं । (व. खै. 17278 - 8०) अत: योग मर्प्ताया तीन प्रकार की होती है - मनोयोग, वचनयोग, काययोग ।

1. औदारिक, वैक्रियिक, आहारक एव कार्मण शरीर ।

तैजस शरीर के निमित्त से योग नहीं बनता है, इसलिए उसे ग्रहण नहीं किया है ।

प्रश्न9-योगमार्गणा में द्रव्य योग को ग्रहण करना चाहिए या भावयोग को?

उत्तर :योगमार्गणा में भावयोग को ही ग्रहण करना चाहिए । सूत्र में आये हुए ' इमानि' पद से प्रत्यक्षीभूत भावमार्गणा स्थानों का ग्रहण करना चाहिए । द्रव्य मार्गणाओं का ग्रहण नहीं किया गया है, क्योंकि द्रव्य मार्गणाएँ देश, काल और स्वभाव की अपेक्षा दूरवर्ती हैं, अतएव अल्पज्ञानियों को उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । ( ध. 17131)

प्रश्न10-योग क्षायोपशमिक है तो केवली भगवान के योग कैसे हो सकता है?

उत्तर :वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण कर्म के क्षय हो जाने पर भी सयलेकेवली के जो तीन प्रकार की वर्गणाओं की अपेक्षा आत्मप्रदेश-पीरस्पन्दन होता है वह भी योग है, ऐसा जानना चाहिए । (सर्वा. 61०)

सयोग केवली में योग के अभाव का प्रसग नहीं आता, योग में क्षायोपशमिक भाव तो उपचार से हैं । असल में तो योग औदयिक भाव ही है और औदयिक योग का सयोग केवली में अभाव मानने में विरोध आता है । ४.)

शरीर नामकमोदय से उत्पन्न योग भी तो लेश्या माना गया है, क्योंकि वह भी कर्मबन्ध में निमित्त होता है । इस कारण कषाय के नष्ट हो जाने पर भी योग रहता है । ७.)

नोट - शरीर नाम कर्म कीं उदीरणा व उदय से योग उत्पन्न होता है इसलिए योग मार्गणा औदयिक है । ९.? 316)

प्रश्न11-अयोग केवली (योग रहित जीव) कैसे होते हैं?

उत्तर :जिन आत्माओं के पुण्य-पाप रूप प्रशस्त और अप्रशस्त कर्मबन्ध के कारण मन, वचन, काय की क्रिया रूप शुभ और अशुभ योग नहीं हैं वे आत्माएँ चरम गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली और उसके अनन्तर गुणस्थानों से रहित सिद्ध पर्याय रूप परिणत मुक्त जीव होते हैं । (गो. जी. 243) जो मन, वचन, काय वर्गणा के अवलम्बन से कर्मोंके ग्रहण करने में कारण आत्मा के प्रदेशों का पीरस्पन्दन रूप जो योग है, उससे रहित चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगी जिन होते हैं । ( वृद्रसं. टी. 13) तालिका संख्या 11

सत्यमनवचन तथा अनुभय मनोयोग

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 4 न.ति.म.दे.
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय एकेन्द्रियादि के ये योग नहीं हैं।
3 काय 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय सत्यमनोयोगी के सत्य मनोयोग
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 8 3 कुज्ञान. 5 ज्ञान
8 संयम 7 सा.छे.प.सू.यथा.संय.असं.
9 दर्शन 4 चक्षु. अच. अव. केव.
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्ष.क्षायो..उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 1 सैनी, सैनी-असैनी से रहित के भी होते हैं ।
14 आहार 1 आहारक, अनाहारक अवस्था में पर्याप्ति पूर्ण नहीं होने से ये तीनों योग नहीं होते ।
15 गुणस्थान 13 पहले से 13 वें तक
16 जीवसमास 1 सैनी पंचे.
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा.भा . म.
18 प्राण 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ.
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 12 8 ज्ञानो. 4 दर्शनो.
21 ध्यान 14 4 आ . 4 रौ. 4 ध. 2 शु. आदि के दो शुक्ल ध्यान हैं
22 आस्रव 43 5 मि. 12 अवि.25 क.1यो. स्वकीय योग
23 जाति 26 ला. ना.म.देव तथा पंचेन्द्रिय तिर्यंच की
24 कुल 108 1/2ला.क. ना.म.देव तथा पंचेन्द्रिय तिर्यंच की

प्रश्न12- :सत्य मनोयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :सम्यग्ज्ञान के विषयभूत अर्थ को सत्य कहते हैं । जैसे-जल ज्ञान का विषय जल सत्य है, क्योंकि स्नान-पान आदि अर्थक्रिया उसमें पाई जाती हैं । सत्य अर्थ का ज्ञान उत्पन्न करने की शक्ति रूप भाव मन सत्य मन है । उस सत्य मन से उत्पन्न हुआ योग अर्थात् प्रयत्न विशेष सत्य मनोयोग है । (गो. जीजी. 217 - 18)

प्रश्न13-सत्य वचनयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :सत्य अर्थ का वाचक वचन सत्य वचन है । स्वर नामकर्म के उदय से प्राप्त भाषा पर्याप्ति से उत्पन्न भाषा वर्गणा के आलम्बन से आत्मप्रदेशों में शक्ति रूप जो भाव वचन से उत्पन्न योग अर्थात् प्रयत्न विशेष है, वह सत्यवचन योग है । (गो. जी. 22० सं. प्र.)

दस प्रकार के सत्यवचन में वचन वर्गणा के निमित्त से जो योग होता है वह सत्य वचन योग है । (पस. प्रा.)

प्रश्न14-अनुभय मनोयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :जो मन सत्य और असत्य से युक्त नहीं होता, वह असत्यमृषामन है अर्थात् अनुभय अर्थ के ज्ञान को उत्पन्न करने की शक्ति रूप भावमन से उत्पन्न प्रयत्न विशेष अनुभय मनोयोग है । ( गो.जी. 219)

अनुभय ज्ञान का विषय अर्थ अनुभय है, उसे न सत्य ही कहा जा सकता है और न असत्य ही कहा जा सकता है । जैसे-कुछ प्रतिभासित होता है । यहाँ सामान्य रूप से प्रतिभासमान अर्थ अपनी अर्थक्रिया करने वाले विशेष के निर्णय के अभाव में सत्य नहीं कहा जा सकता और सामान्य का प्रतिभास होने से असत्य भी नहीं कहा जा सकता । इसलिए जात्यन्तर होने से अनुभय अर्थ स्पष्ट चतुर्थ अनुभय मनोयोग है । जैसे-किसी को बुलाने पर ' हे देवदत्त' यह विकल्प अनुभय है । ( गो. जी. 217)

प्रश्न15-सत्य तथा अनुभय मन- वचनयोग का कारण क्या है?

उत्तर :सत्य तथा अनुभय मन-वचनयोग का मूल कारण (निमित्त) प्रधानकारण पर्याप्त नामकर्म और शरीर नामकर्म का उदय है । (गो. जी. 227)

प्रश्न16-सत्य मनोयोगी के क्षायिकसम्य? में कितने गुणस्थान होते हैं?

उत्तर :सत्य मनोयोगी के क्षायिक सम्बक्ल में चौथे से तेरहवें गुणस्थान तक के 1० गुणस्थान होते हैं ।

प्रश्न17-सत्य वचनयोगी के केवलदर्शन में कितने गुणस्थान हो सकते हैं?

उत्तर :सत्य वचनयोगी के केवलदर्शन में एक ही गुणस्थान होता है-तेरहवीं ।

प्रश्न18-सत्य मनोयोगी जीव के कम-से-कम कितने प्राण होते हैं?

उत्तर :सत्य मनोयोगी जीव के कम-से-कम चार प्राण होते हैं- 1. वचन बल 2. कायबल 3. श्वासोच्चवास 4 भू.- आयु । ये चार प्राण सयोगकेवली की अपेक्षा कहे गये हैं ।

प्रश्न19-केवली भगवान के मनोयोग है तो मनोबल क्यों नहीं कहा गया है?

उत्तर :अंगोपांग नामकर्म के उदय से हृदयस्थान में जीवों के द्रव्य मन की विकसित खिले हुए अष्टदल पद्‌म के आकार रचना हुआ करती है । यह रचना जिन मनोवर्गणाओं के द्वारा होती है उनका श्रीजिनेन्द्र भगवान सयोगिकेवली के भी आगमन होता है इसलिए उनके उपचार से मनोयोग कहा गया है । लेकिन ज्ञानावरण तथा अन्तराय कर्म का अत्यन्त क्षय हो जाने से उनके मनोबल नहीं होता है । क्योंकि मनोबल की उत्पत्ति ज्ञानावरण तथा अन्तराय कर्म के क्षयोपशम से होती है । (गो. जी. 229)

प्रश्न20-क्या ऐसे कोई सत्य मनोयोगी हैं जिनके मात्र दो संज्ञाएँ हों?

उत्तर :ही, नवम गुणस्थान के सवेदी मनोयोगी मुनिराज के मात्र दो संज्ञाएँ पाई जाती हैं- 1. मैथुन सज्ञा 2. परिग्रह सज्ञा ।

प्रश्न21-सत्यादि तीन योगों में चौदह ध्यान ही क्यों होते हैं?

उत्तर :इन सत्यादि तीन योगों में चार आर्त्तध्यान, चार रौद्रध्यान, चार धर्मध्यान तथा दो शुक्लध्यान होते हैं । जब केवली भगवान मनोयोग तथा वचनयोग को नष्ट कर देते हैं एवं जब सूक्ष्म काययोग रह जाता है तब तीसरा श्लक्रियाप्रतिपाती ध्यान होता है । अर्थात् तीसरा शुक्लध्यान औदारिक काययोग से ही होता है । जैसा कि तत्त्वार्थख्य महाग्रन्थ में भी कहा है-

त्येकयोगकाययोगायोगानाम्' ' (9) शुक्लध्यान........... तीसरा शुक्लध्यान काययोग से होता है मनोयोग तथा वचनयोग से नहीं । इसीलिए इन तीनों योगों में 14 ध्यान ही कहे हैं, पन्द्रह नहीं ।

प्रश्न22-अनुभय मनोयोगी के आसव के कम-से-कम कितने प्रत्यय होते हैं?

उत्तर :अनुभय मनोयोगी के आसव का कम-से-कम एक प्रत्यय हो सकता है । ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें गुणस्थान में केवल एक स्वकीय अर्थात् अनुभयमनोयोग सम्बन्धी आसव का प्रत्यय होगा, क्योंकि एक समय में एक ही योग हो सकता है

तालिका संख्या 12

अनुभय वचनयोग

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 4 न.ति.म.दे.
2 इन्द्रिय 4 द्वी. त्री. चतु. पंचे.
3 काय 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय अनुभय वचनयोग
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 8 3 कुज्ञान. 5 ज्ञान
8 संयम 7 सा.छे.प.सू.यथा.संय.असं.
9 दर्शन 4 चक्षु. अच. अव. केव. केवलदर्शन मनुष्यों में ही होता है।
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्ष.क्षायो..उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 2 सैनी, असैनी
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 13 पहले से 13 वें तक
16 जीवसमास 5 द्वी.त्री.चतु.सै.असैनी पंचे.
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा. भा. म.
18 प्राण 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ.
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 12 8 ज्ञानो. 4 दर्शनो.
21 ध्यान 14 4 आ. 4 रौ. 4 ध. 2 शु. तीसरा चौथा शुक्लध्यान
22 आस्रव 43 14 योग बिना अनुभय वचन योग ही होता है।
23 जाति 32 ला. द्वीन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यन्त
24 कुल 132 1/2ला.क. द्वीन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यन्त एकेन्द्रिय सम्बन्धी कुल नहीं है।

प्रश्न23-अनुभयवचन योग किसे कहते हैं?

उत्तर :जो सत्य और असत्य अर्थ को विषय नहीं करता वह असत्यमृषा अर्थ को विषय करने वाला वचन व्यापार रूप प्रयत्न विशेष अनुभय वचन योग है । दो इन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों की जो अनकरात्मक भाषा है तथा संज्ञी पंचेन्द्रियों की जो आमन्त्रण आदि रूप अक्षरात्मक भाषा है जैसे- ' 'देवदत्त! आओ' ', यह मुझे दो' ' क्या करूँ' ' आदि सब अनुभयवचनयोग कहे जाते हैं । (गोजी. 221)

उपर्युक्त देवदत्त आओ' ' आदि को अनुभव वचन योग क्यों कहा गया है? 'देवदत्त आओ' ' आदि वचन श्रोताजनों को सामान्य से व्यक्त और विशेष रूप से अव्यक्त अर्थ के अवयवों को बताने वाले हैं । इनसे सामान्य से व्यक्त अर्थ का बोध होता है इसलिए इन्हें असत्य नहीं कहा जा सकता और विशेष रूप से व्यक्त अर्थ को न कहने से इन्हें सत्य भी नहीं कहा जा सकता है । (गो. जी. 223)

प्रश्न24-अनक्षरात्मक भाषा में सुव्यक्त अर्थ का अंश नहीं होता है, तब वह अनुभय रूप कैसे हो सकती है?

उत्तर :अनक्षरात्मक भाषा को बोलने वाले दो इन्द्रिय आदि जीवों के सुख-दुःख के प्रकरण आदि के अवलम्बन से हर्ष आदि का अभिप्राय जाना जा सकता है । इसलिए व्यक्तपना सम्भव है । अत: अनक्षरात्मक भाषा भी अनुभय रूप ही है । (गो. जी. 226)

प्रश्न25-सयोग केवली के अनुभय एवं सत्यवचनयोग की सिद्धि कैसे होती है?

उत्तर :भगवान की दिव्य ध्वनि के सुनने वालों के श्रोत्र प्रदेश को प्राप्त होने के समय तक अनुभव भाषा रूप होना सिद्ध है । उसके अनन्तर श्रोताजनों के इष्ट पदार्थों में संशय आदि को दूर करके सम्यग्ज्ञान को उत्पन्न करने से सयोग केवली भगवान के सत्यवचनयोगपना सिद्ध है । (गो. जी.)

प्रश्न26-तीर्थकर तो वीतराग हैं अर्थात् उनके बोलने की इच्छा का तो अभाव है फिर उनके मात्र सत्य वाणी ही क्यों नहीं खिरी, अनुभय वाणी भी क्यों खिरी?

उत्तर :तीर्थंकरों के जीव ने पूर्व में ऐसी भावना भायी थी कि संसार के सभी जीवों का कल्याण कैसे हो । उसी भावना से उनके सहज तीर्थंकर गोत्र (प्रकृति) का बन्ध पड़ गया था । इसी के उदय में वाणी खिरती है । अनादि काल से जीव अज्ञान के कारण पौद्‌गलिक कर्मों से बँधा हुआ है । ऐसे जीवों को मोक्षमार्ग दिखाने के लिए जीव का तादात्म्य सम्बन्ध अपनी गुण-पर्याय के साथ किस प्रकार का है, उसी का ज्ञान कराने के लिए सत्यवाणी खिरी है और जीव की पौद्‌गलिक कर्मों के संयोग से कैसी अवस्था हो रही है । इसका ज्ञान कराने के लिए अनुभय वाणी खिरी है । यह दोनों प्रकार की वाणी एक साथ सहज खिर रही है । इस वाणी को सुनकर ही गणधर देवों ने सूत्रों की रचना की है । (चा. चक्र)

प्रश्न27-क्या, कोई ऐसे अनुभयवचनयोगी है, जिनके वेद नहीं हो?

उत्तर :ही, नवम गुणस्थान के अवेद भाग से लेकर तेरहवें गुणस्थान तक के अनुभयवचनयोगी वेद रहित होते हैं । इसी प्रकार सत्यादियोगों में भी जानना चाहिए ।


प्रश्न28-अनुभयवचनयोगी के कम- से- कम कितनी कषायें होती हैं?

उत्तर :दसवें गुणस्थान की अपेक्षा अनुभयवचनयोगी के कम-से-कम एक कषाय होती है तथा ग्यारहवें से 13 वें गुणस्थान तक अनुभयवचनयोगी कषाय रहित भी होते हैं ।

प्रश्न29-अनुभयवचनयोगी जीव संज्ञी होते हैं या असंज्ञी?

उत्तर :अनुभयवचनयोगी जीव संज्ञी भी होते हैं और असंज्ञी भी होते हैं तथा इन दोनों से अतीत अर्थात् संज्ञी- असंज्ञीपने से रहित सयोग केवली भगवान के भी अनुभयवचनयोग पाया जाता

प्रश्न30-अनुभयवचनयोगी के अवधिज्ञान में कितने गुणस्थान हो सकते हैं?

उत्तर :अनुभयवचनयोगी के अवधिज्ञान में चौथे गुणस्थान से 12 वें गुणस्थान तक के 9 गुणस्थान होते हैं ।

प्रश्न31-अनुभयवचनयोगी के कौनसे संयम में सबसे ज्यादा गुणस्थान होते हैं?

उत्तर :सामायिक-छेदोपस्थापना संयम में अनुभयवचनयोगी के छठे से नवमे गुणस्थान तक के चार गुणस्थान होते हैं । असंयम में पहले से चौथे तक चार गुणस्थान होते हैं ।

प्रश्न32-क्या ऐसे कोई अनुभयवचनयोगी हैं जिनके मात्र एक ही सभ्य? होता है?

उत्तर : ही, तेरहवें गुणस्थान में तथा क्षपक श्रेणी के 8 वें, 9 वें, 1० वें 12 वें गुणस्थान में केवल एक क्षायिक सम्बकव ही होता है ।

द्वीन्द्रिय से असैनी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक तक के जीवों में भी सम्बक्च मर्लणा में से केवल एक मिथ्यात्व ही होता है ।

प्रश्न33-अनुभयवचनयोगी अनाहारक क्यों नहीं होते?

उत्तर :अनुभयवचनयोग में अनाहारकपना नहीं होने के दो कारण हैं-

पहली बात : मात्र कार्मण काययोग में ही जीव अनाहारक होता है । दूसरी बात : भाषा पर्याप्ति पूर्ण हुए बिना वचनयोग नहीं होता, अनाहारक अवस्था में भाषा पर्याप्ति पूर्ण होना तो बहुत दूर, प्रारम्भ भी नहीं होती है ।

प्रश्न३४-अनुभय मनोयोग में जातियों ज्यादा हैं या अनुभय वचन योग में?

उत्तर :अनुभयवचनयोग में जातियाँ ज्यादा हैं क्योंकि वह द्वीन्द्रिय जीवों से लेकर तेरहवें गुणस्थान तक पाया जाता है तथा अनुभयमनोयोग पंचेन्द्रिय से तेरहवें गुणस्थान तक होता है । अर्थात् अनुभय मनोयोग में 26 लाख जातियाँ है और अनुभय वचनयोग में 32 लाख जातियाँ

तालिका संख्या 13

असत्य- उभय मनोयोग - वचनयोग

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 4 न.ति.म.दे.
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय असत्यमनोयोग में असत्य-मनोयोग
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 7 3 कुज्ञान. 5 ज्ञान केवलज्ञान नहीं हैं
8 संयम 7 सा.छे.प.सू.यथा.संय.असं.
9 दर्शन 3 चक्षु. अच. अव.
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्ष.क्षायो..उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 1 सैनी,
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 12 पहले से 12 वें तक
16 जीवसमास 1 सैनी पंचे.
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा. भा. म.
18 प्राण 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ.
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 10 7 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 14 4 आ. 4 रौ. 4 ध. 2 शु.
22 आस्रव 43 14 योग बिना
23 जाति 26 ला. ना.ला.ति.4 ला.मनु.14 ला.तथा देवों की 4 ला.
24 कुल 108 1/2ला.क. ना.25 ला.क.,ति.43 1/2 ला.क.,मनु.14ला.क.,देव 26 ला.क.

प्रश्न35-असत्यमनोयोग किसे कहते हें?

उत्तर :असत्य अर्थ को विषय करने वाले ज्ञान को उत्पन्न करने की शक्ति रूप भाव मन से उत्पन्न प्रयत्न विशेष मृषा अर्थात् असत्यमनोयोग है । जैसे-मरीचिका में जलज्ञान का विषय जल असत्य है । क्योंकि उसमें स्नान-पान आदि अर्थक्रिया का अभाव है । (गो.जी.)

प्रश्न36-असत्य वचनयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :असत्य अर्थ का वाचक वचन असत्यवचन व्यापार रूप प्रयत्न असत्यवचन योग है । (गो. जी. 220)

प्रश्न37-उभय मनोयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :सत्य और असत्य दोनों के विषयभूत पदार्थ को उभय कहते हैं; जैसे-कमण्डलु को यह घट है, क्योंकि कमण्डलु घट का काम देता है इसलिए कथंचित् सत्य है और घटाकार नहीं है इसलिए कथंचित् असत्य भी है । सत्य और मृषा रूप योग को असत्यमृषा मनोयोग कहते हैं । (गोजी. 219)

प्रश्न38-उभयवचनयोग किसे कहते हैं?

उत्तर :कमण्डलु में घट व्यवहार की तरह सत्य और असत्य अर्थ विधायक वचन व्यापार रूप प्रयत्न उभय वचनयोग है । (गो. जी. 22०)

प्रश्न39-प्रमाद के अभाव में श्रेणिगत जीवों के असत्य और उभयमनोयोग एवं वचन योग कैसे हो सकता है?

उत्तर :नहीं, क्योंकि आवरण कर्म से युक्त जीवों के विपर्यय और अनध्यवसाय ज्ञान के कारणभूत मन का सद्‌भाव मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है । परन्तु इसके सम्बन्ध से क्षपक या उपशमक जीव प्रमत्त नहीं माने जा सकते हैं, क्योंकि प्रमाद मोह की पर्याय है । (ध. 1)

ऐसी शंका व्यर्थ है क्योंकि असत्यवचन का कारण अज्ञान बारहवें गुणस्थान तक पाया जाता है इस अपेक्षा से वहाँ पर असत्यवचन के सद्‌भाव का प्रतिपादन किया है और इसीलिए उभयसंयोगज सत्यमृषावचन भी बारहवें गुणस्थान तक होता है, इस कथन में कोई विरोध नहीं आता है । (ध. 1)

प्रश्न40-ध्यानस्थ अपूर्वकरणादि गुणस्थानों में वचनयोग या काययोग का सद्‌भाव कैसे हो सकता है?

उत्तर : नहीं, क्योंकि ध्यान अवस्था में भी अन्तर्जल्प के लिए प्रयत्न रूप वचनयोग और कायगत न्ल्यू प्रयत्नरूप काययोग का सत्व अपूर्वकरण आदि गुणस्थानवर्ती जीवों के पाया ही जाता है इसलिए वहाँ वचनयोग एवं काययोग भी सम्भव ही हैं । (ध. 2 ' 434)


प्रश्न 41-: संसार में ऐसे कौन-कौन से जीव हैं जिनके मनोयोग नहीं होता है? उत्तर : ससार के जीव जिनके मनोयोग नहीं होता है,

उत्तर :एकेन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीव ।

लब्ध्यपर्याप्त तथा जब तक मन: पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तब तक ।

तेरहवें गुणस्थान में केवली समुद्‌घात तथा छठे गुणस्थान में आहारक समुद्‌घात में जब तक मन: पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती । चौदहवें गुणस्थान में अयोगी ।

मनोयोग का निरोध होने के बाद तेरहवें गुणस्थान में ।

प्रश्न42-क्या लब्ध्यपर्याप्तक सैनी जीवों के भी असत्यवचनयोग होता है?

उत्तर :नहीं, किसी भी लब्ध्यपर्यातक जीव के औदारिकमिश्र तथा कार्मण काययले को छोड्‌कर अन्य कोई योग नहीं होता है क्योंकि भाषा तथा मनःपर्याप्ति पूर्ण हुए बिना वचन तथा मनोयोग नहीं बन सकता है ।

प्रश्न43-असत्य तथा उभय मन- वचन योग का कारण क्या है?

उत्तर :आवरण का मन्द उदय होते हुए असत्य की उत्पत्ति नहीं होती अत: असत्यमनोयोग, असत्यवचनयप्तो, उभय मनोयोग, उभय वचनयोग का मूल कारण आवरण के तीव्र अनुभाग का उदय ही है, यह स्पष्ट है । इतना विशेष है कि तीव्रतर अनुभाग के उदय से विशिष्ट आवम्ण असत्यमनोयोग और असत्य वचनयोग का कारण है । और तीव्र अनुभाग के उदय से विशिष्ट आवरण उभयमनोयघो और उभयवचनयप्तो का कारण हे । (गो. जी. 227) यदि सत्य तथा अनुभय मन- वचन योग का कारण आवरणकर्म का तीव्र मन्द अनुभाग होता है

प्रश्न44- तो केवली भगवान के योग कैसे बनेंगे?

उत्तर :यद्यपि योग का निमित्त आवरणकर्म का मन्द-तीव्र अनुभाग का उदय है किन्तु केवली के सत्य और अनुभययोग का व्यवहार समस्त आवरण के क्षय से होता है । (गो. जी. 227) असत्य वचनयोगी के मनःपर्ययज्ञान कितने गुणस्थानों में होता है? असत्य वचनयोगी के मनःपर्ययज्ञान छठे गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक के सात गुणस्थानों में होता है ।

प्रश्न45-असत्य और उभय मनोयोगी के कितने कुल नहीं होते हैं?

उत्तर :असत्य और उभय मनोयोगी के 91 लाखकरोड़ कुल नहीं होते हैं-

पृथ्वीकायिक के 22 लाखकरोड़ वनस्पतिकायिक के 28 लाखकरोड़

जलकायिक के 7 लाखकरोड़ द्वीन्द्रिय के 7 लाखकरोड़

अग्रिकायिक के 3 लाखकरोड़ त्रीन्द्रिय के 8 लाखकरोड़

वायुकायिक के 7 लाखकरोड़ चतुरिन्द्रिय के 9 लाखकरोड़


तालिका संख्या 14

अौदारिक काययोग -

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 2 तिर्यञ्च, मनुष्य
2 इन्द्रिय 5 ए. द्वी. त्री. चतु. पंचे.
3 काय 6 पृथ्वी आदि 5 स्थावर 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय औदारिक काययोग
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 8 3 कुज्ञान. 5 ज्ञान
8 संयम 7 सा.छे.प.सू.यथा.संय.असं. अस. तथा संयमातिर्यच्च के भी होते हैं ।
9 दर्शन 4 चक्षु. अच. अव.केव.
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सभ्यक्व 6 क्ष.क्षायो..उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 2 सैनी,असैनी,
14 आहार 1 आहारक, अनाहारक नहीं होते
15 गुणस्थान 13 पहले से 13 वें तक
16 जीवसमास 19 14 एकेन्द्रियसम्बन्धी, 5 त्रस के
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा. भा. म.
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ.
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 12 8 ज्ञानो. 4 दर्शनो.
21 ध्यान 15 4 आ. 4 रौ. 4 ध. 3 शु. अन्तिम शुक्लध्यान नहीं है ।
22 आस्रव 43 5 मि.12 अ.25 क.1 यो.
23 जाति 76 ला. ति.62 ला.मनु.14 ला. देव नारकियों की जाति नहीं है।
24 कुल 148 1/2ला.क. ति.134 1/2 ला.क.,मनु.14ला.क. देव नारकियों के कुल नहीं हैं।

प्रश्न46-औदारिक काययोग किसे कहते हैं?

उत्तर :औदारिक शरीर के लिए आत्मप्रदशों की जो कर्म और नोकर्म को आकर्षण करने की शक्तिहै उसेहीऔदारिक काययोग कहते हैं । ऐसी अवस्थामें औदारिक वर्गणा केस्कन्धों का औदारिककाय रूप परिणमन में कारण जो आत्मप्रदेशों का पीरस्पन्द है वह औदारिककाययोग है । (गोजी. 230)

उदार या स्कूल में जो उत्पन्न हो उसे औदारिक जानना चाहिए । उदार में होने वाला जो काययोग है वह औदारिककाययोग है । (पसंप्रा.) औदारिक शरीर द्वारा उत्पन्न हुई शक्ति से जीव के प्रदेशों में परिस्पन्द का कारणभूत जो प्रयत्न होता है उसे औदारिककाययोग कहते हैं । ७.)

प्रश्न47-औदारिक काययोग किस-किस के होता है?

उत्तर :औदारिक काययोग

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि के,

वृक्ष, लता, गुल्म, आम्र, जामफल, लौकी, परवल आदि सब्जियों के,

गाय, भैंस, हाथी, घोड़ा, कबूतर, चिड़िया, मयूर आदि के,

चींटी, कीड़े, भ्रमर, लट, केंचुआ आदि के,

भोगभूमिया, कर्मभूमिया, कुभोगभूमिया मनुष्य-तिर्यंचों के,

तीर्थंकर भगवान, अरिहन्त केवली, ऋद्धिधारक मुनिराज आदि के,

85० प्लेच्छ खण्डों में, आर्यखण्डों में तथा समस्त पर्याप्त तिर्यंच-मनुष्यों के औदारिक काययोग होता है ।

प्रश्न48-क्या ऐसे कोई औदारिक काययोगी हैं जिनके कषायें नहीं होती हैं?

उत्तर :ही, ग्यारहवें, बारहवें तथा तेरहवें गुणस्थान वाले औदारिक काययोगी के कषायें नहीं होती हैं । यद्यपि चौदहवें गुणस्थान में भी कवायें नहीं होती हैं लेकिन वहाँ औदारिक काययोग नहीं होता है ।

प्रश्न49-क्या ऐसा कोई औदारिक काययोगी है जिसके मतिज्ञान नहीं होता?

उत्तर :ही, प्रथम, द्वितीय, तृतीय गुणस्थान में तथा तेरहवें गुणस्थान वाले जीवों के मतिज्ञान नहीं होता है । यद्यपि चौदहवें गुणस्थान में भी मतिज्ञान नहीं है लेकिन वहाँ योग का अभाव


प्रश्न-50- :औदारिक काययोग किसे कहते हैं?

उत्तर :-औदारिक शरीर के लिए आत्मप्रदशों की जो कर्म और नोकर्म को आकर्षण करने की शक्तिहै उसे हीऔदारिक काययोगकहते हैं । ऐसी अवस्थामें औदारिक वर्गणा के स्कन्धों का औदारिककाय रूप परिणमन में कारण जो आत्मप्रदेशों का परिस्पन्द है वह औदारिककाययोग है । (गोजी. 23०)

उदार या स्कूल में जो उत्पन्न हो उसे औदारिक जानना चाहिए । उदार में होने वाला जो काययोग है वह औदारिककाययोग है । (पसंप्रा.) औदारिक शरीर द्वारा उत्पन्न हुई शक्ति से जीव के प्रदेशों में परिस्पन्द का कारणभूत जो प्रयत्न होता है उसे औदारिककाययोग कहते हैं । ४२९)

प्रश्न51-औदारिक काययोग किस-किस के होता है?

उत्तर :औदारिक काययोग -

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि के,

वृक्ष, लता, गुल्म, आम्र, जामफल, लौकी, परवल आदि सब्जियों के,

गाय, भैंस, हाथी, घोड़ा, कबूतर, चिड़िया, मयूर आदि के,

चींटी, कीड़े, भ्रमर, लट, केंचुआ आदि के,

भोगभूमिया, कर्मभूमिया, कुभोगभूमिया मनुष्य- तिर्यंचों के,

तीर्थंकर भगवान, अरिहन्त केवली, ऋद्धिधारक मुनिराज आदि के,

85० प्लेच्छ खण्डों में, आर्यखण्डों में तथा समस्त पर्याप्त तिर्यंच-मनुष्यों के औदारिक काययप्तो होता है ।

प्रश्न52- ऐसे कोई औदारिक काययोगी हैं जिनके कवायें नहीं होती हैं?

उत्तर :ही, ग्यारहवें, बारहवें तथा तेरहवें गुणस्थान वाले औदारिक काययोगी के कषायें नहीं होती हैं । यद्यपि चौदहवें गुणस्थान में भी कवायें नहीं होती हैं लेकिन वहाँ औदारिक काययोग नहीं होता है ।

प्रश्न53-क्या ऐसा कोई औदारिक काययोगी है जिसके मतिज्ञान नहीं होता?

उत्तर :ही, प्रथम, द्वितीय, तृतीय गुणस्थान में तथा तेरहवें गुणस्थान वाले जीवों के मतिज्ञान नहीं होता है । यद्यपि चौदहवें गुणस्थान में भी मतिज्ञान नहीं है लेकिन वहाँ योग का अभाव


प्रश्न54--औदारिक काययोग में केवलदर्शन किस अपेक्षा से पाया जाता है?

उत्तर :औदारिक काययोग में केवलदर्शन सयोगकेवली भगवान की अपेक्षा होता है । यद्यपि केवलदर्शन अयोगी केवली और सिद्ध भगवान के भी होता है लेकिन उनके कोई योग नहीं होता है इसलिए औदारिक काययोग में केवल तेरहवें गुणस्थान में ही केवलदर्शन कहा है । 55-औदारिक काययोग में कम-से- कम कितनी पर्याप्तियों होती हैं?

उत्तर :औदारिक काययोग में कम-से- कम चार पर्यातियाँ होती हैं- आहार पर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति तथा श्वासोच्चवास पर्याप्ति । ये चार पर्याप्तियाँ एकेन्द्रिय की अपेक्षा जाननी चाहिए ।

प्रश्न56-औदारिक काययोग में कितने प्राण होते हैं?

उत्तर :औदारिक काययोग में कम-से-कम 2 प्राण होते हैं- . तेरहवें गुणस्थान में श्वासोच्चवास तथा वचनयोग का निरोध होने पर उनके काय बल एव आयु प्राण ।

. औदारिक काययोग में अधिक-से- अधिक 1० प्राण होते हैं-

5 इन्द्रिय, 3 बल, श्वासोच्चवास तथा आयु

1० प्राण संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यातक जीवों के होते हैं ।

प्रश्न57-क्या औदारिक काययोगी के आठों ज्ञानोपयोग एक साथ हो सकते हैं?

उत्तर :यद्यपि नाना जीवों की अपेक्षा औदारिक काययोगी के आठों ज्ञानोपयोग एक साथ हो जाते हैं लेकिन एक जीव की अपेक्षा आठों ज्ञानोपयोग एक साथ नहीं हो सकते हैं । क्योंकि अभिव्यक्ति की अपेक्षा एक जीव के एक समय में एक ही ज्ञानोपयोग हो सकता है । फिर भी एक जीव के नाना समयों की अपेक्षा आठों ज्ञानोपयोग एक जीवन में हो सकते हैं ।

औदारिक काययोगी मिथ्यादृष्टि एवं सासादन सम्यग्दृष्टि के तीन कुज्ञानो. होते हैं- कुमति, कुसुत, कुअवधि ज्ञानो. ।

चौथे, पाँचवें गुणस्थान में तीन ज्ञानो. होते हैं-

मति, सुत तथा अवधिज्ञानो. ।

छठे से 12 वें गुणस्थान तक 4 ज्ञानो. होते हैं-

मतिज्ञानो., हतशानो., अवधिज्ञानो. और मन: पर्ययशानो. ।

तेरहवें गुणस्थानवर्ती औदारिक काययोगी के 1 ज्ञानो. है- केवलज्ञानो. ।

तालिका संख्या 15

अौदारिकमिश्र काययोग -

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 2 तिर्यञ्च, मनुष्य
2 इन्द्रिय 5 ए. द्वी. त्री. चतु. पंचे.
3 काय 6 पृथ्वी आदि 5 स्थावर 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय अौदारिकमिश्र
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 8 3 कुज्ञान. 5 ज्ञान कुअवधि तथा मनःपर्ययज्ञान नहीं हैं।
8 संयम 2 यथा.असं.
9 दर्शन 4 चक्षु. अच. अव.केव.
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यत्क्व 4 क्षा.क्षायो.सा.मि. मिश्र और उपशम नहीं होते।
13 संज्ञी 2 सैनी,असैनी,
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 4 1 ला.2 रा.4 था .13 वाँ
16 जीवसमास 19 14 एकेन्द्रियसम्बन्धी, 5 त्रस के
17 पर्याप्ति 2 आ. श. इन्द्रिय श्वासोच्चवासादि पर्यातियाँ पर्याप्तक के ही होती हैं ।
18 प्राण 10 4 इन्द्रिय 1 बल श्वा.आ. कायबल होता है।
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 10 6 ज्ञानो. 4 दर्शनो.
21 ध्यान 10 4 आ. 4 रौ. 2 ध.
22 आस्रव 43 5 मि.12 अ.25 क.1 यो. 14 योग नहीं हैं।
23 जाति 76 ला. ति.62 ला.मनु.14 ला. देव नारकियों की जाति नहीं है।
24 कुल 148 1/2ला.क. ति.134 1/2 ला.क.,मनु.14ला.क. देव नारकियों के कुल नहीं हैं।

प्रश्न58- : औदारिकमिश्र काययोग किसे कहते हैं?

उत्तर : मिश्रकाययोग कहते हैं । क्योंकि यह योग औदारिक वर्गणाओं और कार्मणवर्गणाओं इन दोनों के निमित्त से होता है । अतएव इसको औदारिक मिश्र काययोग कहते हैं । (गो. जी. 231) औदारिकमिश्र वर्गणाओं के अवलम्बन से जो योग होता है वह औदारिकमिश्र काययोग हे । (सर्वा. 61)

प्रश्न59-यदि कार्मण काययोग की सहायता से मिश्रयोग होता है तो ऋजुगति से जाने वाले के मिश्रयोग कैसे बनेगा?

उत्तर :सर्वार्थसिद्धि आदि ग्रन्थों में सात प्रकार की काय वर्गणाएँ बताई गई हैं । उनमें से जो औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र तथा आहारकमिश्र वर्गणाएँ हैं उनको औदारिक मिश्रादि अवस्थाओं में ग्रहण करने से औदारिक मिश्र आदि योग बन जाते हैं । इसमें कोई बाधा नहीं है ।

नोट - इसी प्रकार केवलीसमुद्‌घात में औदारिक मिश्र काययोग बन जाता है ।

प्रश्न60-किन-किन जीवों के औदारिक मिथकाययोग ही होता है?

उत्तर :जो जीव ऋजुगति से लब्ध्यपर्यातक तिर्यच्च-मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं उनके औदारिकमिश्रकाययोग ही होता है क्योंकि वे औदारिककाययप्तो होने के पहले ही मरण को प्राप्त हो जाते हैं तथा ऋजुगति से आने के कारण कार्मणकाययोग नहीं है ।

प्रश्न61-क्या कोई ऐसे जीव भी हैं जिनके औदारिकमिश्र काययोग के समान वैकियिकमिश्र का्ययोग ही हों?

उत्तर :नहीं, संसार में ऐसे कोई जीव नहीं हैं जिनके औदारिकमिश्र काययोग के अल वैक्रियिकमिश्रकाययोग ही हो, क्योंकि मनुष्य-तिर्यच्चों के समान देव-नारकियों में ० भी जीव शरीर पर्याप्ति पूर्ण होने के पहले मरण को प्राप्त नहीं होते हैं । ' ब्रह्मों वैक्रियिकमिश्रकाययोगवाले जीव नियम से वैक्रियिक काययोगी बनते ही हैं । इसलिए ०- वैक्रियिकमिश्र काययोगी जीव नहीं हो सकते हैं ।

प्रश्न62-औदारिकमिश्र काययोग में कम-से- कम कितनी कषायें हो सकती हैं?

उत्तर :औदारिकमिश्रकाययोग में कम- से- कम 19 कषायें हो सकती हैं - 4 अप्रत्याख्यानावरण 4 प्रत्याख्यानावरण, 4 संज्वलन 6 हास्यादि नोकषायें तथा पुरुष वेद ।

ये 19 कषायें चतुर्थगुणस्थानवर्ती जीव की अपेक्षा कही गई हैं । अर्थात् औदारिकमिश्र ' वाले सम्यग्दृष्टि जीवों के अनन्तानुबन्धी चतुष्क, सीवेद तथा नपुंसक वेद नहीं होते हैं

तेरहवें गुणस्थान में भी औदारिकमिश्र काययोग है लेकिन वहाँ कवायें नहीं होती हैं ।

प्रश्न63-क्या ऐसे कोई औदारिकमिश्र काययोग वाले जीव हैं जो भव्य ही हों?

उत्तर :ही, दूसरे तथा चौथे गुणस्थान वाले और तेरहवें गुणस्थान वाले औदारिकमिश्र काययोगी जीव भव्य ही होते हैं तथा औदारिकमिश्रकाययोगी सादि मिथ्यादृष्टि जीव भी भव्य ही होते |

प्रश्न64-औदारिकमिथकाययोग में कौन-कौनसे सम्यक्त्व नहीं होते हैं?

उत्तर :औदारिकमिश्रकाययोग में दो सम्बक्ल नहीं होते हैं- 1० सम्बग्मिथ्यात्व2 उपशम सभ्यक्ल । क्योंकि इन दोनों सम्यकों में मरण नहीं होता है । यद्यपि द्वितीयोपशम सम्बक्ल में मरण होता है लेकिन वे मरकर मनुष्य-तिर्यच्चों में उत्पन्न नहीं होते हैं जिससे उनके औदारिकमिश्रकाययोग बन जावे ।

प्रश्न65-औदारिकमिथकाययोग में क्षायिक सम्यग्दर्शन किस-किस अपेक्षा पाया जाता है?

उत्तर : औदारिकमिश्रकाययोग में क्षायिक सम्यग्दर्शन की अपेक्षाएँ-

1. बद्धायुष्क मनुष्य जब क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करके अथवा कृतकृत्य वेदक बनकर भोगभूमि में जाता है ।

2 क्षायिकसम्यग्दृष्टि देव-नारकी मरकर जब मनुष्य बनते हैं ।

3 तेरहवें गुणस्थान की समुद्‌घात अवस्था में जब औदारिकमिश्रकाययोग होता है ।

प्रश्न66-औदारिक मिअकाययोगी सम्यग्दृष्टि के छहों लेश्याएँ कैसे सम्भव हैं?

उत्तर :छठी पृथ्वी से निकलकर जो अविरतसम्यग्दृष्टि मनुष्य पर्याय में आते हैं उनके अपर्याप्तकाल में वेदक सम्यक के साथ कृष्णलेश्या पाई जाती है । ४. ' 752)

पहली से छठी पृथ्वी तक के असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीव अपने-अपने योग्य कृष्ण, नील, कापोत लेश्या के साथ मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार असंयतसम्यग्दृष्टि देव भी अपने-अपने योग्य पीत, पथ और शुक्ल लेश्याओं के साथ मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार अविरतसम्यग्दृष्टि मनुष्यों के अपर्याप्त काल में अर्थात्-औदारिकमिश्रकाययोग में छहों लेश्याएँ बन जाती हैं ।

प्रश्न67-औदारिक मिश्र काययोग में कम-से-कम आसव के कितने प्रत्यय हैं?

उत्तर :औदारिकमिश्रकाययोग में कम-से-कम आसव का एक प्रत्यय होता है-

तेरहवें गुणस्थान में समुद्‌घात की अपेक्षा केवल औदारिकमिश्र काययथे सम्बन्धी आसव का प्रत्यय पाया जाता है ।

प्रश्न68-औदारिक मिश्र काययोग में कौन- कौनसी जातियों नहीं होती हैं?

उत्तर :औदारिकमिश्रकाययोग में 8 लाख जातियाँ नहीं होती हैं- 4 लाख देवों की, 4 लाख नारकियों की ।

तालिका संख्या 16

वैक्रियिक काययोग -

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 2 नरक,देव
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रीय
3 काय 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय वैक्रियिक काययोग
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 8 3 कुज्ञान. 5 ज्ञान कुअवधि तथा मनःपर्ययज्ञान नहीं हैं।
8 संयम 1 असंयम
9 दर्शन 3 चक्षु. अच. अव.
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यत्क्व 6 क्षा.क्षायो. उ.सा.मिश्र .मि.
13 संज्ञी सैनी,
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 4 पहला,दूसरा,तीसरा,चौथा
16 जीवसमास 1 सैनी पंचेन्द्रिय
17 पर्याप्ति 6 आ. श.इ.श्वा.भा.मन.
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय 3 बल .श्वा.आ.
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 9 6 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 10 4 आ. 4 रौ. 2 ध.
22 आस्रव 43 5 मि.12 अ.25 क.1 यो. 14 योग नहीं हैं।
23 जाति 8 ला. 4 ला.नार. 4 ला.देव मनुष्य तिर्यञ्चों की जातियाँ नहीं हैं ।
24 कुल 51ला.क. 25 ला.क.,नरक के .126ला.क.देवों के मनुष्य तिर्यञ्चों के कुल नहीं हैं

प्रश्न69-वाकोयककाययोग किसे कहते हैं?

उत्तर-नाना प्रकार के गुण और ऋद्धियों से युक्त देव तथा नारकियों के शरीर को वैक्रियिक अथवा विगुर्व कहते हैं और इसके द्वारा होने वाले योग को कैर्णीक अथवा वैक्रियिक काययोग कहते हैं । (गो. जी. 222)

प्रश्न70-वैकियिक शरीर एवं वैकियिक काययोग में क्या विशेषता है?

उत्तर-वैक्रियिक शरीर एव वैक्रियिक काययोग में विशेषता -

1.तेजकायिक तथा वायुकायिक और पंचेन्द्रिय तिर्यज्व तथा मनुष्यों के भी वैक्रियिक शरीर होता है लेकिन वैक्रियिक काययोग नहीं होता है । देव-नारकियों के वैक्रियिक शरीर भी होता है और वैक्रियिक काययोग भी होता है ।

2.मनुष्य-तिर्यव्यों के वैक्रियिक शरीर में नाना गुणों और ऋद्धियों का अभाव है लेकिन देवों के वैक्रियिक शरीर में नाना गुण और अणिमादि ऋद्धियाँ होती हैं ।

3.अष्टाह्निका में नन्दीश्वर द्वीप में पूजा के लिए, पंचकल्याणक आदि के समय देवों का मूल वैक्रियिक शरीर नहीं जाता है फिर भी यदि उस समय काययोग होता है तो वैक्रियिक काययोग ही होता है ।

4.नारकियों के वैक्रियिक शरीर की अपृथक् विक्रिया होती है, देवों के वैक्रियिक शरीर की पृथक् तथा अपृथक् दोनों विक्रिया होती हैं लेकिन दोनों के वैक्रियिक काययोग


प्रश्न71-वैक्रियिक काययोग वालों के .उपशम सभ्य? कितनी बार हो सकता है?

उत्तर-वैक्रियिक काययोग वालों के अपने जीवन में अनेक बार उपशम सम्बक्म हो सकता है क्योंकि एक बार प्रथमोपशम सम्बक्ल प्राप्त करने के बाद पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल व्यतीत होने पर जीव पुन: प्रथमोपशम सम्बक्ल प्राप्त करने के योग्य हो जाता है । वैक्रियिक काययोग वालों की उत्कृष्ट आयु तैंतीस सागरोपम प्रमाण होती है इसलिए उनके अनेक बार उपशम सम्बक्म होने में कोई बाधा नहीं है । ७. के आधार से)

प्रश्न72- वैकियिक काययोग वालों के पंचमादि गुणस्थान क्यों नहीं होते है?

उत्तर-वैक्रियिक काययोग वालों के पंचमादि गुणस्थान नहीं होने के कारण-

( 1) वैक्रियिक काय वालों के अप्रत्याख्यानावरण तथा प्रत्याख्यानावरण कषाय का तीव्र उदय पाया जाता है इसलिए उनके संयमासंयम तथा संयम नहीं हो सकता है अर्थात् पंचमादि गुणस्थान नहीं हो सकते ।

(2) भोगभूमि में पंचमादि गुणस्थान न होने का कारण भोग की प्रधानता कही गई है फिर देवों में तो भोगभूमि से भी ज्यादा भोग पाये जाते हैं फिर वहाँ सयम कैसे हो सकता है और नारकियों में कषायों की सहज रूप से तीव्रता रहती है, उनके संयम कैसे हो सकता हे?

(3) जिनके नियत भोजन है अर्थात् इतने समय के बाद नियम से उनको भोजन करना ही होगा । ऐसी स्थिति में त्याग रूप प्रवृत्ति कैसे हो सकती है? संभवत: वैक्रियिक काययोग वालों के सयम नहीं होने का एक कारण यह भी माना जा सकता है ।

प्रश्न73- वैक्रियिक काययोग वाले देव महीनों? वर्षों? पक्षों तक भोजन नहीं करते हैं, इसी प्रकार नारकी भी बहुत काल के बाद थोड़ी सी मिट्टी खाते हैं उनके नित्य आहार संज्ञा कैसे कही जा सकती है?

उत्तर-वैक्रियिक काययोग वाले भले ही पक्षों? महीनों तक भोजन नहीं करें फिर भी उनके आहार सज्ञा का अभाव नहीं हो सकता, क्योंकि आहार सज्ञा जिनागम में छठे गुणस्थान तक बताई गई है और उसका अंतरंग कारण असातावेदनीय कर्म का उदय? उदीरणा कहा गया है । ये दोनों ही कारण वैक्रियिक काययोग वालों के पाये जाते हैं इसलिए उनके भी नित्य आहार सज्ञा कहने में कोई विरोध नहीं है । (गो. जी. 135 के आधार से)

प्रश्न74-वैकियिक काययोग में छहों लेश्याएँ किस अपेक्षा पायी जाती हैं?

उत्तर-वैक्रियिक काययोग में तीन अशुभ लेश्याएँ नारकियों की अपेक्षा होती हैं तथा तीन शुभ लेश्याएँ देवों की अपेक्षा होती हैं ।

प्रश्न75-वैकियिक काययोगी के तीसरे गुणस्थान में कितने उपयोग होते हैं?

उत्तर-तीसरे गुणस्थान वाले वैक्रियिक काययोगी के 6 उपयोग होते हैं-

- मिश्रमतिज्ञानो., मश्रश्रुतज्ञानो. तथा मिश्र अवधिज्ञानो. ।

- चखुदर्शनी., अचखुदर्शनो., अवधि दर्शनों. ।

प्रश्न76-वैकियिक काययोगी सम्यग्दृष्टि के कितने आसव के प्रत्यय होते हैं?

उत्तर-वैक्रियिक काययोगी सम्यग्दृष्टि के आसव के 34 प्रत्यय होते हैं-

12 अविरति, 21 कषाय, 1 योग (वैक्रियिक काययोग) ८34 प्रत्यय


तालिका सख्या 17

वैक्रियिक मिश्र काययोग -

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 2 नरक,देवगति मनुष्य-तिर्यंच गति नहीं हैं
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रीय
3 काय 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय वैक्रियिक मिश्र
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 8 2 कुज्ञान. 3 ज्ञान कुअवधि तथा मनःपर्ययज्ञान केवलज्ञान नहीं हैं।
8 संयम 1 असंयम
9 दर्शन 3 चक्षु. अच. अव. केवलदर्शन नहीं हैं।
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यत्क्व 6 क्षा.क्षायो. उ.सा.मि.
13 संज्ञी 1 सैनी,
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 3 पहला,दूसरा,चौथा
16 जीवसमास 1 सैनी पंचेन्द्रिय
17 पर्याप्ति 2 आ. श. इ.श्वा. भा. मनःपर्याप्ति नहीं हैं ।
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय 1 बल . आ. श्वासो. वचन तथा मनोबल प्राण नहीं हैं ।
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 8 5 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 10 4 आ. 4 रौ. 2 ध. विपाकविचय तथा संस्थानविचय धर्म ध्यान नहीं हैं।
22 आस्रव 43 5 मि.12 अ.25 क.1 यो. वैक्रियिक मिश्र काययोग
23 जाति 8 ला. 4 ला.नार. 4 ला.देव मनुष्य तिर्यञ्चों की जातियाँ नहीं हैं ।
24 कुल 51ला.क. 25 ला.क.,नरक के .26ला.क.देवों के मनुष्य तिर्यञ्चों के कुल नहीं हैं


प्रश्न77 :वैक्रियिक मिथकाययोग किसे कहते हैं?

उत्तरजब तक वैक्रियिक शरीर पूर्ण नहीं होता तब तक उसको वैक्रियिकमिश्र कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग को, आत्मप्रदेश परिस्पन्दन को वैक्रियिक मिश्रकाययोग कहते हैं । (गो. जी. 234)

प्रश्न78-वैकियिक मिथकाययोग में कम-से- कम कितनी कषायें होती हैं?

उत्तरवैक्रियिक मिश्रकाययोग में कम- से-कम 2० कषायें होती हैं- अप्रत्याख्यानावरण प्रत्याख्यानावरण, संज्वलन तीनों के क्रोध मान, माया, लोभ । 8 नोकषाय, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, नपुंसक वेद । उपर्युक्त कषायें चतुर्थ गुणस्थानवर्ती सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा कही गयी हैं ।

यहाँ नपुसक वेद सम्यग्दर्शन को लेकर प्रथम नरक में जाने वाले की अपेक्षा कहा गया है अन्यथा सम्यग्दृष्टि मरकर नपुंसक वेद वाला नहीं बनता है ।

प्रश्न79-किन- किन जीवों के वैकियिकमिश्र काययोग में अवधिज्ञान होता है?

उत्तरजो जीव मनुष्य पर्याय में गुणप्रत्यय अवधिज्ञान प्राप्त करते हैं, वे अनुगामी अवधिज्ञान को लेकर जब नरकगति (बद्धायुष्क क्षायिक सम्यग्दृष्टि वा कृतकृत्य वेदक की अपेक्षा) में जाते हैं तथा मनुष्य-तिर्यज्व अनुगामी अवधिज्ञान को लेकर देवगति में जाते हैं तब उनके वैक्रियिक मिश्रकाययोग में अवधिज्ञान का अस्तित्व बन जाता है । अर्थात् वैक्रियिक मिश्र काययोग में स्थित सम्यग्दृष्टि जीव के अवधिज्ञान हो सकता है ।

प्रश्न80-वैकियिक मिथकाययोगी अभव्य जीवों के कितनी लेश्याएँ होती हैं?

उत्तरवैक्रियिक मिश्र काययोगी अभव्य जीवों के छहों लेश्याएँ होती हैं - तीन अशुभ लेश्याएँ नारकियों तथा भवनत्रिक की अपेक्षा तथा तीन शुभ लेश्याएँ देवों की अपेक्षा होती हैं । शुक्ल लेश्या भी बन जाती है क्योंकि अभव्य जीव का उत्पाद नवें ग्रैवेयक तक माना गया

प्रश्न81-वैकियिक मिश्र काययोगी क्षायिक सम्यग्दृष्टि के कितने वेद होते हैं?

उत्तरवैक्रियिक मिश्र काययोगी क्षायिक सम्यग्दृष्टि के दो वेद होते हैं -

पुरुषवेद - वैमानिक देवों की अपेक्षा ।

नपुंसक वेद - प्रथम नरक की अपेक्षा ।

प्रश्न82-ऐसा कौनसा सम्य? है जो वैक्रियिक मिथकाययोग में तो होता है लेकिन औदारिकमिथकाययोग में नहीं होता है?

उत्तरद्वितीयोपशम सम्बक्च श्रेणी में अथवा द्वितीयोपशम सम्यक के साथ मरण की अपेक्षा वैक्रियिकमिश्रकाययोग में हो सकता है, लेकिन औदारिक मिम्रकाययोग में नहीं हो सकता है, क्योंकि कोई भी देव-नारकी द्वितीयोपशम सम्पक्क प्राप्त नहीं कर सकता । इसका भी कारण यह है कि द्वितीयोपशम सम्बक्ल उपशम श्रेणी के सम्मुख मुनिराज के ही होता है । उतरते समय अन्य गुणस्थानों में भी हो सकता है ।

प्रश्न83-वैकियिक मिथकाययोग में कितने सभ्य? नहीं होते हैं?

उत्तरवैक्रियिकमिअकाययोग में एक सम्यक नहीं होता है- मिश्र । क्योंकि इसमें मरण नहीं होता है ।

सासादन सम्बक्ल एव द्वितीयोपशम सम्बक्च देवों की अपेक्षा वैक्रियिकमिश्रकाययोग में बन जायेंगे ।

प्रश्न84-किन जीवों के वैकियिक मिथकाययोग में क्षयोपशम सभ्य? पाया जाता है?

उत्तर वैमानिक देवों में उत्पन्न होने वाले सम्यग्दृष्टि जीव अथवा कृतकृत्य वेदक जीवों के वैक्रियिकमिश्रकाययोग में क्षायोपशमिक सम्बक्ल पाया जाता है ।

बद्धायुष्क (जिसने नरकायु को बाँध लिया है) कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि जब प्रथम नरक में जाता है उसके भी वेदक (क्षायोपशमिक) सम्बक्ल पाया जाता है ।

प्रश्न85-वैकियिक मिथकाययोग में दो धर्मध्यान किस अपेक्षा कहे जाते हैं?

उत्तरवैक्रियिक मिश्र काययले में दो धर्मध्यान - आज्ञाविचय और अपायविचय देवों की अपेक्षा कहे गये हैं, क्योंकि नारकियों के तो एक आज्ञाविचय धर्मध्यान ही होता है ।

वैक्रियिक मिथकाययोग में कम-से- कम कितने आसव के प्रत्यय हो सकते हैं? वैक्रियिकमिश्रकाययोग में (सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा) कम-से-कम आसव के 33 प्रत्यय हो सकते हैं-

12 अविरति, 2० कषाय तथा 1 योग (वैक्रियिक मिश्र) ।

5 मिथ्यात्व, 4 अनन्तानुबन्धी, सीवेद तथा 14 योग नहीं होते हैं ।

वैक्रियिक मिथकाययोगी के दूसरे गुणस्थान में कितनी जातियों होती हैं? दूसरे गुणस्थान वाले वैक्रियिकमिश्रकाययोगी के 4 लाख जातियाँ होती हैं क्योंकि सासादन गुणस्थान को लेकर जीव नरक में नहीं जाता है और वैक्रियिक मिश्रकाययोग में सासादनगुणस्थान उत्पन्न नहीं होता है; इसलिए वहाँ नरकगति सम्बन्धी जातियाँ नहीं पाई जाती हैं । इसी प्रकार कुल भी 26 लाखकरोड़ ही जानना चाहिए ।


तालिका संख्या 18

आहारकद्विक काययोग

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 1 मनुष्यगति
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय आहारक में आहारक
5 वेद 1 पुरुषवेद
6 कषाय 11 16 कषाय 9 नोकषाय स्त्री नपुंसक वेद नहीं हैं।
7 ज्ञान 3 मति.श्रुत.अवधि. मनःपर्यय और केवलज्ञान नहीं हैं।
8 संयम 2 सा.छे.
9 दर्शन 3 चक्षु. अच. अव. केवलदर्शन नहीं है ।
10 लेश्या 3 पी.प.शु. अशुभ लेश्या नहीं है।
11 भव्यत्व 1 भव्य,
12 सम्यक्त्व 2 क्ष.क्षायो. उपशम के साथ आहारक ॠद्धि नहीं होती।
13 संज्ञी 1 सैनी,
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 1 पहले से 12 वें तक
16 जीवसमास 1 सैनी पंचे.
17 पर्याप्ति 6/2 आ. श. इ. श्वा. भा. म. आहारक मिश्र काययोग में दो पर्याप्तियाँ होती है ।
18 प्राण 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ. आहारकमिश्र में श्वासो. तथा दो बल नहीं हैं ।
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 6 3 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 7 3 आ. 4 ध. निदान आर्त्तध्यान नहीं है।
22 आस्रव 12 11क.1 योग संज्वलन की चार तथा 7 नोकषाय
23 जाति 14 ला. मनुष्य सम्बन्धी
24 कुल 14 ला.क. मनुष्य सम्बन्धी

प्रश्न86- : आहारक काययोग किसे कहते हैं

उत्तरअसंयम का परिहार, संदेह को दूर करना आदि के लिए आहारकऋद्धि के धारक छठे गुणस्थानवर्ती मुनिराज के आहारक शरीर नामकर्म के उदय से आहारक शरीर होता है, इसके निमित्त से जो योग होता है वह आहारक काययोग है । (गो. जी. 235)

प्रश्न87-आहारक मिश्र काययोग किसे कहते हैं?

उत्तरजब तक आहारक शरीर पर्याप्त नहीं होता है तब तक उसको आहार मिश्र कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग को आहारकमिश्र काययोग कहते हैं । (ध. 1 ' 297)

प्रश्न89-आहारक काययोग में कितने संयम होते हैं?

उत्तरआहारक काययोग में दो संयम होते हैं - 1. सामायिक 2. छेदोपस्थापना । पीरहारविशुद्धि संयम के साथ आहारकऋद्धि नहीं होती तथा शेष संयम छठे गुणस्थान में नहीं हो सकते हैं इसलिए यहाँ दो संयम कहे गये हैं । प्रश्न90-आहारकमिश्र काययोग में कौन-कौनसे सभ्य? नहीं हो सकते हैं?

उत्तरआहारकमिश्र काययोग में चार सम्बक्ल नहीं हो सकते हैं- 1. मिथ्यात्व 2. सासादन 3. मिश्र 4. उपशम सम्यक । उपशम सम्यक के साथ आहारकऋद्धि नहीं होती है इसलिए यहाँ उसका ग्रहण नहीं किया है ।

प्रश्न91-आहारकमिश्र काययोग में कितने ध्यान हो सकते हैं?

उत्तरआहारकमिश्र काययोग में सात ध्यान पाये जाते हैं- निदान के बिना 3 आर्त्तध्यान तथा चार धर्मध्यान होते हैं ।

प्रश्न92-आहारक शरीर की कौन-कौनसी विशेषताएँ हैं?

उत्तरआहारक शरीर की विशेषताएँ-

( 1) रस आदि सात धातुओं से रहित होता है ।

(2) समचतुरस संस्थान वाला होता है ।

(3) अस्थिबन्धन से रहित अर्थात् संहनन से रहित होता है ।

(4) चन्द्रकान्तमणि से निर्मित की तरह अत्यन्त स्वच्छ होता है ।

(5) एक हस्त प्रमाण अर्थात् चौबीस व्यवहारीगुल परिमाण वाला होता है ।

(6) उत्तमांग मस्तक से उत्पन्न होता है ।

(7) पर से अपनी और अपने से पर की बाधा से रहित होता है ।

(8) आहारक शरीर छठे गुणस्थान वाले मुनिराज के ही होता है । (गो. जी. 237)


तालिका संख्या 19

कार्मण काययोग -

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 44 न. ति. म. देव
2 इन्द्रिय 5 ए. द्वी. त्री. चतु. पंचे.
3 काय 6 5 स्थावर 1 त्रस
4 योग 1 स्वकीय कार्मण काययोग
5 वेद 3 स्त्री. पुरु. नपु.
6 कषाय 25 16 कषाय 9 नोकषाय
7 ज्ञान 6 2 कुज्ञान. 4 ज्ञान कुअवधि तथा मनःपर्ययज्ञान नहीं हैं।
8 संयम 2 यथा.असं.
9 दर्शन 4 चक्षु. अच. अव.केव.
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यत्क्व 5 क्षा.क्षायो.उ. सा.मि.
13 संज्ञी 2 सैनी,असैनी,
14 आहार 1 आहारक,
15 गुणस्थान 4 1 .2 .4 .13 वाँ
16 जीवसमास 19 14 एकेन्द्रियसम्बन्धी, 5 त्रस के
17 पर्याप्ति 0 एक भी पर्याप्ती नहीं हैं ।
18 प्राण 7 5 इन्द्रिय 1 बल .आ. कायबल होता है।
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर.
20 उपयोग 10 6 ज्ञानो. 4 दर्शनो.
21 ध्यान 10 4 आ. 4 रौ. 2 ध.
22 आस्रव 43 5 मि.12 अ.25 क.1 यो.
23 जाति 84 ला. चारों गति सम्बन्धी
24 कुल 199 1/2ला.क. चारों गति सम्बन्धी

प्रश्न93-कार्मणकाययोग किसे कहते हैं?

उत्तर-ज्ञानावरणादिक अष्ट कर्मों के समूह को अथवा कार्मण नामकर्म के उदय से होने वाली काय को कार्मणकाय कहते हैं और उसके द्वारा होने वाले योग कर्मापकर्षण शक्ति युक्त आत्मप्रदेशों के परिस्पन्दन को कार्मण काययोग कहते हैं । (गो. जी. 241) कार्मण शरीर के निमित्त से जो योग होता है उसे कार्मण काययोग कहते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि अन्य औदारिकादि शरीर वर्गणाओं के बिना केवल एक कर्म से उत्पन्न हुए वीर्य के निमित्त से आत्मप्रदेश परिस्पन्दन रूप जो प्रयत्न होता है उसे कार्मण काययोग कहते हैं । (ध. 1? 297) प्रश्न94-क्या कार्मण काययोग मात्र विग्रहगति में ही होता है?

उत्तर-नहीं, विग्रहगति में तो कार्मणकाययोग ही होता है लेकिन 13 वें गुणस्थान की समुद्‌घात अवस्था में भी तीन समय तक बिना विग्रहगति के भी कार्मण काययोग होता है ।

प्रश्न95-कार्मण काययोग में कुअवधिज्ञान क्यों नहीं होता?

उत्तर-कुअवधिज्ञान अनुगामी नहीं होता, जिसको साथ ले जाने से कार्मण काययोग में कुअवधिज्ञान बन जावे और कार्मण काययोग के अल्पकाल में कुअवधिज्ञान उत्पन्न भी नहीं हो सकता इसलिए कार्मण काययोग में कुअवधिज्ञान नहीं होता है ।

प्रश्न96-कार्मण काययोग में अवधिज्ञान किस- किस अपेक्षा होता है?

उत्तर-कार्मण काययोग में अवधिज्ञान की अपेक्षाएँ-

1. अनुगामी अवधिज्ञान को लेकर जाने वाले चारों गति के जीवों के ।

2. सर्वार्थसिद्धि से आने वाले जीवों के

3. तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले देव और नरकगीत से आने वाले जीवों के, आदि ।

प्रश्न97- कार्मणकाययोग में चसुदर्शन किन-किन जीवों में पाया जाता है?

उत्तर-कार्मण काययोग में स्थित चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव प्रथम, द्वितीय गुणस्थानवर्ती तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के चतुर्थगुणस्थान में भी चखुदर्शन पाया जाता है ।

प्रश्न98-कार्मणकाययोग में कौनसा सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो सकता है?

उत्तर-कार्मणकाययोग में कोई भी सम्यग्दर्शन उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि सम्यग्दर्शन की पूर्व भूमिका में जिस विशुद्धि की आवश्यकता होती है वह विशुद्धि इतने अल्पकाल में नहीं हो पाती है इसलिए वहाँ कोई भी सम्यग्दर्शन उत्पन्न नहीं हो सकता है ।

प्रश्न99- किन-किन योगों में सैनी जीव ही होते हैं |

उत्तर-11 योगों में सैनी जीव ही होते हैं-

4 मनोयोग, 3 वचनयोग (अनुभयवचनयोग बिना) आहारककाययले, आहारकमिश्रकाययोग, वैक्रियिककाययोग तथा वैक्रियिकमिश्र काययोग । विशेष - दो मनोयोग तथा दो वचन योग सैनी-असैनी से रहित जीवों के भी होते हैं । ऐसे कौन से योग हैं जो असैनी जीवों के भी होते हैं? चार योग असैनी जीवों के भी होते हैं-

1० औदारिककाययोग 2. औदारिकमिश्रकाययोग

3. कार्मणकाययोग 4. अनुभयवचनयोग ।

प्रश्न100-किस- किस योग में चार गुणस्थान ही होते हैं?

उत्तर-तीन योगों में 4 ही गुणस्थान होते हैं -

औदारिकमिश्र काययोग - पहला, दूसरा, चौथा, तेरहवां

कार्मण काययोग - पहला, दूसरा, चौथा, तेरहवां

वैकियिक काययोग - पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा

प्रश्न101-किस- किस योग में 13 गुणस्थान होते हैं?

उत्तर-पाँच योगों में 13 गुणस्थान होते हैं-

2 मनोयोग - सत्यमनोयोग, अनुभयमनोयोग ।

2 वचनयोग - सत्यवचनयले, अनुभयवचनयोग ।

1 काययोग - औदारिककाययले ।

प्रश्न102-कितने योगों में सभी जीवसमास होते हैं?

उत्तर-तीन योगों में सभी जीवसमास होते हैं ।

1. औदारिक 2. औदारिकमिश्र तथा 3? कार्मणकाययोग ।

प्रश्न103-ऐसे कौनसे योग हैं जिनमें श्वासोच्छास प्राण नहीं पाया जाता है?

चार योगों में श्वासोच्चवास प्राण नहीं पाया जाता है- 1. औदारिकमिश्र 2. वैक्रियिकमिश्र 3. आहारकमिश्र 4? कार्मणकाययोग ।

प्रश्न104-ऐसे कौन- कौनसे योग हैं जिनमें संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है?

उत्तर-4 मनोयोग, 4 वचनयोग, औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रकाययोग तथा कार्मण काययोग; इन 11 योगों में संज्ञाओं का अभाव भी हो सकता है ।

प्रश्न105-किस-किस योग में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं?

उत्तर-चार योगों में संज्ञातीत जीव नहीं होते हैं -

. वैक्रियिक द्विक - क्योंकि देव-नारकी चतुर्थ गुणस्थान से आगे नहीं जा सकते हैं । . आहारक द्विक - छठे गुणस्थान में ही होता है ।

प्रश्न106-कौन-कौनसे योग में आसव के 43 प्रत्यय होते हैं?

उत्तर-आहारककाययोग तथा आहारकमिश्रकाययोग को छोड्‌कर शेष 13 योगों में अर्थात् 4 मनोयोग, 4 वचनयोग, औदारिकद्बिक, वैक्रियिकद्रिक तथा कार्मण काययघो में आसव के 43 प्रत्यय होते हैं ।

प्रश्न107-सबसे कम आसव के प्रत्यय किस काययोग में होते हैं?

उत्तर-सबसे कम आसव के प्रत्यय आहारकद्बिक काययोग में होते हैं- इन में आसव के 12 प्रत्यय हैं 4 संज्वलन कषाय, 6 नोकषाय, 1 पुरुषवेद तथा 1 योग । आहारक काययोग मेंआहारकतथा आहारकमिश्रमें आहारकमिश्रकाययोगहोताहै । जहाँकेवल औदारिक्काययले ही शेष रहता है ऐसे अरहन्त केवली भगवान के आसव का मात्र एक (औदारिककाययोग रूप) प्रत्यय शेष रहता है । इसी प्रकार औदारिक मिश्र तथा कार्मण काययोग में भी केवली भगवान के एक ही स्वकीय योग रूप आसव का प्रत्यय होता है ।

प्रश्न108-अयोगी केवली के 24 स्थानों में से कौन- कौनसे स्थान होते हैं?

उत्तर-अयोगी केवली के 24 स्थानों में से 17 स्थान होते हैं-

(1) गति मनुष्यगति

(2) इन्द्रिय पंचेन्द्रिय

(3) काय त्रस

(4) ज्ञान केवलज्ञान

(5) संयम यथाख्यात

(6) दर्शन केवलदर्शन

(7) भव्यत्व - भव्य

(8) सम्बक्च - क्षायिक सम्बक्ल

(9) आहारक -अनाहारक

(1०) गुणस्थान - चौदहवाँ

(11) जीवसमास -पंचेन्द्रिय

(12) पर्याप्ति -छह

(13) प्राण -1 आयु

(14) उपयोग -केवलज्ञान केवलदर्शन

(15) ध्यान -1 ब्पयुरतक्रियानिवृति

(16) जाति -14 लाख ।

(17) कुल -14 लाख करोड़ ।

प्रश्न109- : किस-किस योग में किस अपेक्षा से नपुंसक वेद होता है?

उत्तर-योगों में नपुंसक वेद की अपेक्षाएँ -

चार मनोयोगों एव तीन वचनयोगों में - पर्याप्त नारकी, पर्याप्त तिर्यंच तथा पर्याप्त मनुष्यों में ।

अनुभय वचन योग में - पर्याप्त द्वीन्द्रिय से लेकर पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त मनुष्य तथा पर्याप्त नारकियों के ।

औदारिक काययोग - पर्याप्त एकेन्द्रिय से लेकर नवम गुणस्थान के सवेद भाग तक । औदारिक मिश्र काययोग - निर्वृत्यपर्यातक तथा लब्ध्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यंचों में । वैक्रियिक काययोग - पर्याप्त नारकियों के ।

वैक्रियिक मिश्रकाययोग - निर्वृत्यपर्यातक नारकियों के ।

कार्मण काययोग - अनाहारक नारकी, मनुष्य तथा तिर्यंचों के ।

विशेष : 1. आहारकद्विक काययोग में नपुंसक वेद नहीं होता है ।

2. औदारिक मिश्र काययोग, कार्मण काययोग तथा सत्य अनुभय मन वचन योग में केवली भगवान को ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे वेदातीत होते हैं ।