075. दिल्ली में गजरथ महोत्सव

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दिल्ली में गजरथ महोत्सव

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जन्मदिवस समारोह-

२३ अक्टूबर १९८० आश्विन शुक्ला पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को मेरे जन्म दिवस का समारोह रखा गया। यद्यपि मेरा पूर्ण विरोध था, फिर भी पन्नालाल जी सेठी डीमापुर वालों ने आग्रहपूर्वक यह कार्यक्रम कराया। इस कार्यक्रम के साथ समयसार प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी रखा गया। मेरी बहुत दिनों से इच्छा थी कि ‘समयसार ग्रन्थराज की वाचना’ विद्वद् वर्ग के समक्ष सम्पन्न हो। यह कार्यक्रम २३ अक्टूबर से २ नवम्बर तक रखा गया। प्रारंभ में जन्मजयंती समारोह दरियागंज में महावीरवाटिका के विशाल पांडाल में मनाया गया। इस ४७वें जन्मजयंती समारोह में केन्द्रीय पेट्रोलियम रसायन मंत्री श्री प्रकाशचंद जी सेठी तथा केन्द्रीय पर्यटन विमानन मंत्री ए.पी. शर्मा ने भाग लिया।

केन्द्रीय मंत्री श्री ए. पी. शर्मा ने वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला के ४७वें पुष्प ‘दिगम्बर मुनि’ पुस्तक का विमोचन किया जो कि मेरे द्वारा लिखित छपायी गयी थी। श्री प्रकाशचंद सेठी ने मंगलदीप प्रज्ज्वलित कर समयसार शिविर का उद्घाटन किया। अनंतर प्रकाशचंद सेठी ने ही ४७वें मंगल जन्म दिवस के उपलक्ष्य में ४७ विद्युत् दीपों को प्रज्ज्वलित किया। इसी के साथ ‘भगवान् बाहुबली’ नाम से बनवाया गया ९० मिनट के कैसेट को टेपरेकार्डर में लगाकर उसके बटन को दबाकर उसका भी उद्घाटन किया। इसी मध्य सभी प्रमुख अतिथियों-साहू अशोक कुमार जैन तथा अमरचंद पहा़डिया आदि अनेक महानुभावों ने विनयांजलि समर्पित की। पन्नालाल सेठी डीमापुर ने वृहद् प्रीतिभोज का आयोजन कर लगभग ५००० लोगों को भोजन कराया।

रात्रि में भी सभा का आयोजन किया गया, जिसमें अनेक विद्वानों और श्रीमन्तों ने अपने-अपने उद्गार व्यक्त करते हुए गुरुभक्ति प्रदर्शित की। मेरे दीक्षित जीवन में सन् १९६६ में ब्र. सुमितबाई शहा ने सोलापुर में मेरे मना करने पर भी आचार्यश्री विमलसागर जी के सानिध्य में मेरा जन्म दिवस कार्यक्रम मनाया था। पुनः यह दूसरी बार दिल्ली में सन् १९८० में मेरा जन्म दिवस मनाया गया है।

समयसार वाचना-

अनन्तर २४ अक्टूबर से डॉ. पन्नालाल जी साहित्याचार्य सागर को कुलपति बनाकर समयसार वाचना शुरू की गयी। इस अवसर पर पं. कैलाशचंद जी सिद्धान्तशास्त्री भी पधारे थे। उनसे प्रथम ही मंगलाचरण कराया गया। मैंने शिविर के पूर्व के नियम ग्रहण कराए। प्रोफैसर लक्ष्मीचंद जी, पं. कुंजीलाल जी (गिरडीह), शिवचरण लाल जी (मैनपुरी) आदि विद्वानों ने समयसार गाथाओं का वाचन करके अर्थ प्रस्तुत किया।

प्रतिदिन लगभग डेढ़ घंटा मैं भी समयसार की गाथाओं का वाचन कर विशेष अर्थ बतलाती थी। इस प्रकार २४ अक्टूबर से समयसार वाचना के अतिरिक्त प्रतिदिन रात्रि में चारित्रपाहुड़ एवं रत्नकरंड पद्यावली पर भी कक्षाएँ चलीं। इस शिविर में लगभग ८५ लोगों ने भाग लिया।

इस शिविर के मध्य अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद, शास्त्री परिषद, आचार्य वीरसागर संस्कृत विद्यापीठ, आचार्य शान्तिवीर दिगम्बर जैन सिद्धान्त संरक्षिणी सभा, इन चारों की बैठक सम्पन्न हुई। सभी ने सहस्राब्दी महोत्सव में सक्रिय सहयोग देने का निर्णय लिया। २ नवम्बर १९८० को लाल मंदिर के सरस्वती भवन में इस शिविर का समापन समारोह मनाया गया। श्री रमेशचंद जैन (पी.एस. जैन) ने मेरे द्वारा लिखित-मुद्रित हुई कई पुस्तकों का विमोचन किया। वे थीं-भगवान वृषभदेव, संस्कार, प्रभावना, जीवनदान, उपकार और नियमसार पद्यावली। राजेन्द्र प्रसाद (कम्मोजी), अमरचंद पहाड़िया आदि को अभिनंदन-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस शिविर में समयसार पर जो कुछ मैंने विशेष मंथन कर विद्वानों को बतलाया था, उसमें से कुछ नमूने देखिये-

समयसार में विशेष ज्ञातव्य-

‘‘यह समयसार ग्रंथ श्री कुन्दकुन्ददेव कृत महान् आध्यात्मिक ग्रंथ है। वर्तमान में इसकी दो संस्कृत टीकायें उपलब्ध हैं-एक श्री अमृतचन्द्रसूरि कृत ‘आत्मख्याति’ तथा दूसरी श्री जयसेनाचार्यकृत ‘तात्पर्यवृत्ति’। पहली टीका में ४१५ गाथायें हैं और दूसरी टीका में ४३९ गाथाएँ हैं। इस समयसार में व्यवहारनय की उपयोगिता पर जगह-जगह प्रकाश डाला गया है। इस ग्रंथ को पढ़ने के अधिकारी भी मुख्य रूप से मुनिगण हैं, गौणरूप से श्रावक, जैसा कि श्री जयसेनाचार्य ने लिखा है- ‘‘अत्र तु ग्रन्थे पंचमगुणस्थानादुपरितनगुणस्थानवर्तिनां वीतरागसम्यग्दृष्टीनां मुख्यवृत्या ग्रहणं सरागसम्यग्दृष्टीनां गौणवृत्येति।’’

इस ग्रंथ में पंचम गुणस्थान से ऊपर के गुणस्थान वाले वीतराग सम्यग्दृष्टियों को ही मुख्य रूप से ग्रहण किया है। सरागसम्यदृष्टियों को तो गौणरूप से ही लिया है। समयसार में व्यवहारनय की उपयोगिता- आचार्यश्री कुन्दकुन्ददेव ने सर्वप्रथम गाथा ७ में ही कहा है कि ‘‘व्यवहारनय से ही ज्ञानी के चारित्र, दर्शन और ज्ञान कहे जाते हैं किन्तु निश्चयनय से न ज्ञान है, न दर्शन है और न चारित्र ही है, यह आत्मा ज्ञायकमात्र शुद्ध है।’’ पुनः कहते हैं-

जिस प्रकार से किसी म्लेच्छ को उसकी भाषा में बोले बिना उसे समझाना शक्य नहीं है, उसी प्रकार से व्यवहार के बिना परमार्थ का उपदेश ही अशक्य है। आगे पुनः गाथा १३वीं में व्यवहार को अभूतार्थ कहकर तत्क्षण ही अगली गाथा में कहते हैं- ‘‘परमभावदर्शी-परम शुद्ध आत्मा का अनुभव करने वाले ऐसे महामुनियों के लिए शुद्ध द्रव्य का कथन करने वाला ऐसा शुद्धनय ही ज्ञातव्य है, अनुभव करने योग्य है किन्तु जो अपरमभाव में स्थित हैं अर्थात् चतुर्थ, पंचम, छठे अथवा सातवें गुणस्थान में स्थित हैं, उनके लिए व्यवहारनय का उपदेश दिया गया है। इसकी टीका में श्री अमृतचन्द सूरि ने भी कहा है कि जो अंतिम सोलहवें ताव से शुद्ध हुए सुवर्ण के समान परम शुद्ध भाव का अनुभव करते हैं, उनके लिए ही शुद्धनय प्रयोजनीभूत है किन्तु जो एक-दो आदि ताव से शुद्ध सुवर्ण के समान अपरमभाव का अनुभव करते हैं, उनके लिए व्यवहारनय प्रयोजनीभूत है क्योंकि तीर्थ और तीर्थ का फल व्यवहारनय से ही चलता है।’’

कलश काव्य में भी कहते हैं- ‘‘पहली पदवी पर पैर रखने वालों के लिए यद्यपि यह व्यवहारनय हाथ का अवलम्बन स्वरूप है, फिर भी पर से रहित चित्-चमत्कार मात्र परम अर्थ-शुद्ध आत्मा को अन्तरंग में देखने वालों के लिए वह व्यवहारनय कुछ भी नहीं है।’’ इस कथन से भी स्पष्ट है कि पहली सीढ़ी पर पैर रखने वाले ऐसे चतुर्थ, पंचम और छठे गुणस्थानवर्ती जीवों के लिए व्यवहारनय सहारा है, हाथ का अवलम्बन है। गाथा २२वीं में यह कहा है कि ‘‘कर्मरूप मैं हूँ अथवा ये मेरे हैं’’ ऐसा समझने वाला अज्ञानी है पुनः तत्काल अनेकांत की व्यवस्था करते हुए कहते हैं कि ‘‘यह आत्मा जिनभावों को करता है, उन्हीं का कर्ता होता है यह निश्चयनय का कथन है और व्यवहारनय की अपेक्षा यह पुद्गल कर्मों का कर्ता होता है।’’

आगे चलकर शंका होती है कि ‘‘यदि जीव और शरीर एक नहीं है, तो तीर्थंकरों और आचार्यों की स्तुति मिथ्या हो जावेगी? इस पर समाधान यह है कि ‘‘व्यवहारनय की अपेक्षा से जीव और शरीर एक है और निश्चय की अपेक्षा से ही कथमपि एक नहीं है।’’ तथा तीर्थंकर आदि के शरीर आदि की स्तुति व्यवहारनय की अपेक्षा से ही होती है। आगे आचार्य देव आठ प्रकार के कर्म और उनके फल आदि को पुद्गलमय कहते हैं पुनः समाधान रूप में गाथा ५१ में कहते हैं-

‘‘रागादि भाव आदि जो भी अध्यवसान परिणाम हैं, वे सब जीव हैं यह व्यवहारनय का उपदेश है ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है। इसी गाथा की टीका में श्री अमृतचन्द्रसूरि कहते हैं-‘‘व्यवहारनय अपरमार्थ होते हुए भी परमार्थ का प्रतिपाद है और तीर्थ प्रवृत्ति का निमित्त है अतः उसका दिखलाना न्याय ही है। व्यवहारनय को माने बिना शरीर से जीव में परमार्थ से भेद होने से त्रस और स्थावर जीवों की व्यवस्था नहीं होगी पुनः कोई भी उन त्रस-स्थावरों को राख के समान मर्दित कर देगा और ऐसा करने पर भी हिंसा नहीं होगी तब उसके कर्मबंध नहीं होगा पुनः राग, द्वेष, मोह से जीव में सर्वथा भेद रहने से मोक्ष के उपाय को ग्रहण करना कैसे हो सकेगा? और तब तो मोक्ष का ही अभाव हो जावेगा।’’ उपर्युक्त गाथा में तथा टीका में व्यवहारनय की उपयोगिता विशेष रीति से ध्यान देने योग्य है।

गाथा ५५ से यह बतलाया है कि जीव के वर्ण, रस, गंध, स्पर्श आदि तथा गुणस्थान आदि कुछ भी नहीं है। पुनः नय विवक्षा खोलते हुए कहते हैं- ‘‘व्यवहारनय की अपेक्षा से वर्ण आदि से लेकर गुणस्थानपर्यंत ये सभी भाव जीव के ही हैं किन्तु निश्चयनय की अपेक्षा से ये कुछ भी नहीं है।’’ इस बात को सुनकर कोई शिष्य प्रश्न कर देता है कि हे भगवन् ! शास्त्र में तो जीव के एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, पर्याप्त, अपर्याप्त आदि नाना भेद माने हैं सो कैसे? तब पुनः आचार्य समाधान करते हैं-‘‘पर्याप्त-अपर्याप्त, सूक्ष्म और बादर आदि जो भी जीव के भेद परमागम में कहे हैं, वे सभी व्यवहारनय की अपेक्षा से ही हैं।’’ गाथा ८९ और ९० में भी निश्चय और व्यवहार के कार्य को स्पष्ट कर रहे हैं-‘‘निश्चयनय से यह आत्मा अपने आपका ही कर्ता है और अपने आप का ही भोक्ता है किन्तु व्यवहारनय से यह आत्मा अनेक प्रकार से पुद्गल कर्मों का कर्ता है और उसी प्रकार के पुद्गल कर्मों का भोक्ता भी है।’’

निश्चयनय के जानने वाले महामुनियों ने जो यह आत्मा के कर्तापने की बात बतलाई है, उसको जो समझ लेता है, वही भव्यजीव सम्पूर्ण कर्तृत्व को छोड़ सकता है। इस गाथा की टीका में श्री जयसेनाचार्य ने कहा है कि ‘‘जो ऐसा समझ लेता है कि यह आत्मा निश्चयनय से अपने भावों का ही कर्ता है और व्यवहारनय से कर्मों का कर्ता है, वह जीव सराग सम्यग्दृष्टि होता हुआ अशुभ कर्म के कर्तृत्व को छोड़ता है पुनः निश्चय चारित्र के साथ अविनाभूत ऐसा वीतराग सम्यग्दृष्टि होकर शुभ-अशुभ ऐसे सम्पूर्ण कर्मों के कर्तृत्व से छूट जाता है।’’

इस प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि चतुर्थ गुणस्थान से लेकर सातवें गुणस्थान तक के जीव अशुभकर्म के कर्तृत्व से ही छूटने का प्रयत्न करते हैं, इससे आगे के जीवों के शुभ कर्म का कर्तृत्व चल रहा है जो कि दशवें तक चलता रहता है, आगे वह भी छूट जाता है। आगे कहते हैं, यह आत्मा व्यवहारनय की अपेक्षा से घट, पट, रथ आदि द्रव्यों का कर्ता है, इन्द्रियों का, ज्ञानावरण आदि कर्मों का शरीर आदि नो-कर्मों का और क्रोधादि रूप नाना प्रकार के भाव कर्मोें का भी कर्ता है। यह आत्मा पुद्गल कर्म को उपजाता है, करता है, बाँधता है, परिणमाता और ग्रहण भी करता है, यह सब व्यवहारनय का कथन है। आगे जीव को कथंचित् अकर्ता सिद्ध करते हुए कहते हैं-

‘‘बन्ध के करने वाले सामान्य प्रत्यय चार हैं-मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग। उनके ही भेद मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवलीपर्यंत तेरह हो जाते हैं। ये गुणस्थान पुद्गल कर्म के उदय से होते हैं अतः अचेतन हैं। ये ही कर्मों को करते हैं इसलिए आत्मा इन कर्मों का भोक्ता भी नहीं है क्योंकि ये गुणस्थान ही कर्म को करने वाले हैं अतः यह जीव अकर्ता है।’’

इन गाथाओं की तात्पर्यवृत्ति टीका में आचार्य कहते हैं कि ये मिथ्यात्व आदि प्रत्यय और गुणस्थान न एकान्त में जीवरूप हैं और न पुद्गलरूप हैं किन्तु चूना और हल्दी के मिले हुए रंग के समान हैं अतः ये अशुद्ध निश्चयनय से और अशुद्ध उपादानरूप से चेतन हैं,जीव से संबंधित हैं तथा शुद्ध निश्चयनय से और शुद्ध उपादानरूप से अचेतन हैं, पौद्गलिक हैं।

कोई प्रश्न करता है कि सूक्ष्म शुद्ध निश्चयनय से किसके हैं? तो आचार्य कहते हैं-सूक्ष्म शुद्ध निश्चयनय से तो इनका अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि ‘सव्वे शुद्धा हु सुद्धणया।’’ इस नियम के अनुसार तो सभी जीव शुद्ध ही हैं पुनः ये रागादि प्रत्यय कहाँ टिकेगे? आगे पुनः इसी कर्तृकर्म अधिकार में कहते हैं-

‘‘जीव में कर्मबद्ध हैं और उस जीव के प्रदेशों में मिले हुए हैं, यह व्यवहारनय का पक्ष है और जीव में कर्म न बंधे हुए और न स्पर्शित ही हैं, यह निश्चयनय का पक्ष है। इस प्रकार से जीव से कर्म बंधे हुए हैं अथवा नहीं बंधे हुए हैं, ये दोनों ही नय पक्ष हैं। जो इन दोनों पक्षों से ऊपर आ चुके हैं, वे ही महामुनि समयसार रूप हैं। जो समयरूप आत्मा का अनुभव करने वाले हैं, वे दोनों ही नयों के कथन को केवल जानते हैं किन्तु इन दोनों में से किसी के पक्ष को ग्रहण नहीं करते हैं।।’’

महामस्तकाभिषेक-

रवीन्द्र कुमार ने फरवरी १९८१ का सम्यग्ज्ञान ‘भगवान बाहुबली’ विशेषांक निकाला। मोतीचन्द, रवीन्द्रकुमार और मालती ये तीनों एक महीने के लिए श्रवणबेलगोल पहुँचे। यहाँ से ७ फरवरी को निकलकर ९ फरवरी को वहाँ पहुँच गये। वहाँ पर मेले के उद्घाटन से लेकर आखिर तक सारे कार्यक्रमों को अच्छी तरह से देखा है और यहां आकर मुझे सुनाया तथा मार्च के सम्यग्ज्ञान में भी छपवाया।

मैंने यहाँ तमाम पत्र-पत्रिकाओं में इस महामस्तकाभिषेक का प्रचार पढ़ा। २२ फरवरी को रेडियो से भी श्रावकों ने सुनाया एवं भगवान् बाहुबली का अभिषेक टेलीविजन पर भी दिखाया गया। इस सहस्राब्दी महोत्सव का सारे भारत में ही क्या, विदेशों में भी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जितना प्रचार हुआ है, शायद ही किसी जैनधर्म के प्रचार का इतना बड़ा आयोजन ढाई हजार वर्षों में हुआ होगा।

२१ फरवरी को श्रीमती इंदिरा गांधी ने हेलीकाप्टर से भगवान् के ऊपर पुष्पवृष्टि की, दूरबीन यंत्र से दूर से ही भगवान् के दर्शन किये चूँकि वे पहाड़ पर चढ़ नहीं सकती थीं। विशाल सभा के मध्य भाषण किया। इस भारत की नेता के निमित्त से जैन-जैनेतरों में दिगम्बर जैन मूर्ति भगवान् बाहुबली के प्रति बहुत बड़ा आकर्षण बढ़ा।

भट्टारक श्री चारूकीर्ति महाराज ने दो-तीन वर्ष तक सारे भारत में घूम कर इस महोत्सव को सफल बनाने का अथक प्रयास किया था। भारत की सारी जैन समाज ने ही नहीं, प्रत्युत् सारे दिगम्बर जैन मुनियों-आर्यिकाओं ने भी भक्ति से श्रद्धा व्यक्त की थी और तमाम साधुवर्ग वहाँ पहुँचे थे। यहाँ २२ फरवरी को जो १००८ कलशों द्वारा भगवान का अभिषेक होना था वे कलश पहले से ही श्रावकों ने आरक्षित कर लिये थे तथा जिन्होंने मंगल कलश प्रवर्तन में बोलियाँ ली थीं उन्हें भी कलश करने का पास दिया गया था।

हम लोगों ने तो वी.डी.ओ. में भगवान् का अभिषेक देखकर ही इतना आनंद प्राप्त किया तो साक्षात् अभिषेक करने वालों और देखने वालों को जो आनन्द आया होगा, वे अनुभव करने वाले ही जान सकते हैं। उन सबको महान् पुण्यबंध करने का यह अवसर मिला था।

विभिन्न कार्यक्रम-

वहाँ २० फरवरी को आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज का हीरक जयंती महोत्सव मनाया गया। यहाँ विभिन्न संघों में लगभग २० दीक्षाएँ हुर्इं। यहाँ पर पंचकल्याणक महोत्सव भी किया गया है जिसमें विधिनायक भगवान् नेमिनाथ थे। १४ फरवरी से १९ फरवरी तक यह पंचकल्याणक समारोह सम्पन्न हुआ।

चामुंडराय मंडप में विद्वानों के भाषण और साधु-साध्वियों के प्रवचन भी होते रहते थे। सांस्कृतिक कार्यक्रम-नाटक आदि भी होते रहते थे। १८ फरवरी को महिला सम्मेलन हुआ। १९ फरवरी को सर्वधर्म सम्मेलन हुआ, जिसमें श्वेताम्बर, दिगम्बर और वैदिक सम्प्रदाय के साधुगण उपस्थित हुए।

२३ फरवरी को अखिल भारतीय दिगम्बर जैन सिद्धांत संरक्षिणी सभा की बैठक हुई और २४ फरवरी को दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान का अधिवेशन हुआ। इसमें मेरी पुस्तक ‘जैनभारती’ का विमोचन हुआ। इसकी विद्यानंद आदि मुनियों ने, विद्वानों ने बहुत ही प्रशंसा की और इसे अनेक भाषाओं में प्रकाशित करने के लिए बार-बार प्रेरणा दी। २५ फरवरी को अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महासभा का अधिवेशन हुआ। यहाँ सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य यह हुआ कि-

दिगम्बर जैन मुनि, आर्यिकायें, क्षुल्लक और क्षुल्लिकाएँ तब मिलकर १५१ थे। यह साधु सम्मेलन यहाँ कई दिनों तक चला और कई एक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गये। इन साधुओं में प्रमुख आचार्य संघों में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज, आचार्य शिरोमणि श्री विमलसागर जी महाराज, आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज, एलाचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज आदि। पहला प्रस्ताव यह रहा कि-

‘‘यह दिगम्बर जैन मुनि सम्मेलन यह निश्चय करता है कि ‘दिगम्बर जैन मुनि परिषद’ के नाम से एक परिषद गठित की जाये। इसमें सात प्रमुख आचार्य, सात आर्यिकाएँ, एक ऐलक, एक क्षुल्लक, एक क्षुल्लिका और एक भट्टारक के नाम रखे गये। ऐसी यह १८ साधुओं की परिषद बनायी गयी थी। इसमें मेरा भी नाम रखा गया था। इसमें प्रस्ताव तो सभी महत्वपूर्ण थे, साथ ही सातवाँ प्रस्ताव अत्यधिक महत्वपूर्ण था। प्रस्ताव नं. ७-दिगम्बर जैन मुनि सम्मेलन निश्चय करता है कि पिडशुद्धि वाले दिगम्बर जैन धर्मानुयायी ही मुनिजनों एवं त्यागियों को आहार दे सकते हैं और दीक्षा ले सकते हैं।’’

साथ ही यह भी निर्णय लिया गया था कि जो प्रमुख आचार्य धर्मसागर जी एवं आर्यिका ज्ञानमती जी आदि यहाँ उपस्थिति नहीं हैं, उनसे समर्थन प्राप्त कर ही ये नियम सभी साधु-साध्वी समुदाय में लागू किये जायेंगे। इस श्रवणबेलगोल में लाखों भक्तगण पहुँचे थे, ऐसा अनुमान लगाया गया। रवीन्द्र कुमार, मोतीचन्द और मालती वहाँ से ५ मार्च को चलकर ८ मार्च को दिल्ली आ गये।

यात्रियों का समूह-

इस महामस्तकाभिषेक के महीनों पूर्व से ही श्रवणबेलगोल जाने वाली बसों का तांता लगा रहता था। दिल्ली से होकर जाने वाले यात्री यहाँ कम्मोजी की धर्मशाला में आकर मेरा उपदेश सुनते थे और २२ फरवरी के बाद भी वापसी लौटने वाले यात्री इधर दिल्ली, हस्तिनापुर से जाते समय मेरा उपदेश सुनने की कोशिश करते थे।

गजरथ महोत्सव-

यहाँ दिल्ली में एक प्रेमचंद जैन हैं जो लालकिले के सामने सुभाष मैदान में बैठकर पक्षियों के लिए दाना बेचते हैं, उन्होंने एक गजरथ बनवाया पुनः लाल मंदिर में इंद्रध्वज विधान कराकर गजरथ निकालने का निर्णय किया। मुझसे प्रार्थना करके मेरा सानिध्य चाहा अतः ९ मार्च से १६ मार्च तक दिगम्बर जैन लाल मंदिर में इस विधान का आयोजन बहुत ही प्रभावनापूर्ण रहा। विधानाचार्य पं. पंचाराम शास्त्री थे। मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार, मालती और माधुरी ने भी समय-समय पर पूजा पढ़ने एवं उपदेश करने आदि कार्य को करके लोगों को आनंदित किया। १६ तारीख को विशाल गजरथ दिल्ली के प्रमुख बाजारों में होकर निकला। श्रीजी की रथयात्रा का यह आयोजन यहाँ दिल्ली में प्रथम बार था।

इन प्रेमचंद जैन, दाना वालों ने सन् १९८५ की जम्बूद्वीप प्रतिष्ठा के अवसर पर यहाँ जम्बूद्वीप के लिए भी एक रथ बनवाकर भेंट किया। ये दाना बेचने वाले महानुभाव ऐसे ही कई एक रथ बनवाकर भिन्न-भिन्न मंदिरों में भेंट कर चुके हैं।

यह एक दाना बेचने वाले जैन श्रावक की उदारता का उदाहरण बहुत ही अच्छा लगता है। यहाँ दिल्ली में सन् १९७९-१९८० के दो चातुर्मास हुए। सात स्थान पर मेरे सानिध्य में इंद्रध्वज विधान हुए एवं कई जगह शांति विधान, पंचपरमेष्ठी विधान, ऋषिमंडल विधान आदि हुए। तीन शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर विशाल रूप में एवं कई एक छोटे-छोटे शिविर भी हुए। समय-समय पर प्रवचनों से भी दिल्ली समाज ने धर्मलाभ लिया। अब मेरा विचार हस्तिनापुर की ओर विहार करने का बन गया।