08.अनित्यत्वाधिकार

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


।।तृतीय अधिकार।।

अनित्यत्वाधिकार



(२५३)
जिसके अंदर है दयाभाव वह नाश किसी का नहिं करता।
पर जिनप्रभु की वाणी ऐसी पल भर में मोह रिपू मरता।।
वह दयावान होकर के भी योगी का मोह नष्ट करती।
ऐसी वाणी के धारक प्रभु जयवंत रहें यह है विनती।।
(२५४)
यदि इक दिन खाया ना जाये अथवा रात्री में नींद न लें।
तो यह शरीर मुरझा जाता अग्नी से कमलपत्र जैसे।।
यह अस्त्र, रोग, जल, अग्नी से भी पल भर में नश जाता है।
इसलिए ममत्व तजो इससे यह कभी न साथ निभाता है।।
(२५५)
दुर्गंध अशुचि मल मूत्र आदि से तन की बनी दीवारें हैं।
ऊपर से चमड़ी ढ़की हुई क्षुध तृषा दुख भंडारे हैं।।
वृद्धावस्था रूपी अग्नी चउ तरफ से घेरे बैठी है।
ऐसी काया कुटि को पवित्र माने वह मूढ़मती ही है।।
(२५६)
यह तन जल का बुलबुला सदृश और इन्द्रजाल सम लक्ष्मी है।
स्त्री धन पुत्र मित्र आदिक मेघों के सदृश विनाशी हैं।।
मदमत्त विषय संबंधी सुख स्त्री के चंचल नेत्र सदृश।
इनके मिलने पर सुखी न हो नहिं मिलने पर तू शोक न कर।।
(२५७)
यद्यपि जग में दुख शोक आदि तन से संबंधित होते हैं।
यह दु:ख शोक की भूमी है विद्वतजन ऐसा कहते हैं।।
इसलिए आत्मिंचतवन करो जिससे निंह जन्म दुबारा हो।
इस जन्म मरण के रोगों से मिल जाए हमें छुटकारा हो।।
(२५८)
जो पूर्वजन्म में संचित है नहिं जिसका कोई निवारण है।
स्त्री सुतादि का मरण सदा, कर्मों के वश हो दुखप्रद है।।
उन्मत्त समान शोक करना क्योंकि उससे कुछ नहिं मिलता।
अरु व्यर्थ शोक करने से धर्म, अर्थ मूर्ख नर का नशता।।
(२५९)
जिस तरह सूर्य का उदय अस्त होने के लिए स्वभावी है।
वैसे ही यह शरीर निश्चय नश्वर है अवश्यंभावी है।।
इसलिए काल के आने पर जब प्रियजन कोई मरते हैं।
तो ज्ञानीजन निंह शोक करें ऐसा श्री गुरुवर कहते हैं।।
(२६०)
जिस तरह वृक्ष पर पूâल पत्र फल आदि समय पर आते हैं।
कालानुसार वे नष्ट होय नहिं सदा एक से रहते हैं।।
वैसे ही बस कर्मानुसार सत्कुल में जन्म मरण होता।
लेकिन जो ज्ञानीजन होते उसमें नहिं सुखी दुखी होता।।
(२६१)
जिस दुख का कोई अंत नहीं ऐसे प्रियजन के मरने से।
जो शोक करे वह अंधकार में नृत्य कर रहा है जैसे।।
सब वस्तु जगत में नश्वर है, हे भव्य ! नहीं तुम शोक करो।
दुखसंतति को जड़ से काटे, ऐसे जिनधर्म की शरण गहो।।
(२६२)
जिसका जिस समय मरण होना है पूर्वजन्म में लिखा गया।
उस समय वही होगा ऐसा है भव्यजीव ! ये कहा गया।।
जिस तरह सर्प जिस मार्ग गया उसको पीटना अकारण है।
बस उसी तरह प्रियजन के दुख का धर्म ही एक निवारण है।।
(२६३)
जो मूर्ख दुख की निवृत्ति हेतु व्यापार आदि को करते हैं।
निजकर्म के वश से सुख हो या दुख उनसे अच्छे रहते हैं।।
क्योंकी जो स्त्री पुत्र आदि के मरने पर अति शोक करें।
वे मूर्खशिरोमणि कहलाते वह पापबंध भी बहुत करें।।
(२६४)
जो इंद्रजाल सम जग अनित्य यह नहीं जानता नहिं सुनता।
अथवा प्रत्यक्ष न देख रहा निस्सार है कदली खम्भे सा।।
फिर अन्य लोक जो चले गए उनकी खातिर क्यों रोते हो।
रत्नत्रय का आराधन कर निज को क्यों पर में खोते हो।।
(२६५)
जो पैदा हुआ मरण उसका इक दिन होना तो निश्चित है।
तीनों लोकों में कोई नहीं जो बचा सके यह प्रकृति है।।
एकांत और निर्जन वन में रोने से लाभ नहीं होगा।
आचार्य हमें संबोध रहे इस वृथा शोक से क्या होगा।।
(२६६)
यह इष्ट वियोग अनिष्ट योग सब पाप उदय से होता है।
जो पूर्वजन्म में पाप किए उनके फल से सब मिलता है।।
तू शोक किसलिए करता है आगे पापों का नाश करो।
जिससे निंह होवे इष्ट वियोग अनिष्ट संयोग का उदय न हो।।
(२६७)
यदि नष्ट हुई वस्तू वापस आ जाए अथवा सुख देवे।
या र्कीित बढ़ाए दुनिया में तो कहा शोक करते रहिए।।
वरना जैसा आचार्य कहें दुख से सुख धर्म नहीं मिलता।
इसलिए शोक को छोड़ दे जो विद्वान पुरुष वह ही बनता।।
(२६८)
रात्री के समय एक तरु पर पक्षी आकर निवास करते।
होते ही पूर्व दिशाओं में सब जुदे-जुदे हो उड़ जाते।।
वैसे ही इक कुल में जन्में अपने अपने कर्मानुसार।
सब नाना कुल में जन्म धरे फिर क्यों रोए कर-कर विचार।।
(२६९)
नाना प्रकार के दुखरूपी सर्पों व हस्तियों से जो व्याप्त।
अज्ञान तथा नरकादि गती से सहित जगत में फिरे त्रस्त।।
उसमें गुरुओं के वचन रूप दीपक प्रकाश सम होते हैं।
सच्चे मारग को देख चतुरजन मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।।
(२७०)
पूर्वोर्पािजत कर्मों द्वारा जो मरण समय है कहा गया।
उसके अनुसार मरण होता नहीं आगे पीछे कोई गया।।
आचार्य हमें समझाते हैं आत्मीय जनों के मरने पर।
अज्ञानी प्राणी शोक करे जिससे आते हैं दुख उन पर।।
(२७१)
पक्षी और भौंरे एक वृक्ष से डाल पुष्प बदला करते।
वैसे ही प्राणी इक गति से दूजी गति में जाया करते।।
इसलिए प्राणियों की अनित्यता जान नहीं दुख शोक करें।
मतिमान वही कहलाते हैं जो दोनों में समभाव धरें।।
(२७२)
भ्रमते अनंत कालों में यदि ये जीव मनुषगति पा जावे।
यदि खोटे कुल में जन्म हुआ तो भी यह जन्म वृथा जावे।।
कुल श्रेष्ठ मिला फिर भी कोई मर गया गर्भ में ही मानो।
इसलिए नरोत्तम कुल पाकर के धर्म की शक्ती पहचानो।।
(२७३)
यद्यपि द्रव्र्यािथनयापेक्षा यह लोक सदा है विद्यमान।
तो भी पर्यार्यािथक नय कहता मेघ सदृश यह नाशवान।।
हे बुद्धिमान ! तुम ये समझो प्रियजन के सुख में क्या रखा।
यदि प्रिय मनुष्य मर भी जाए तो दुख करने में क्या रखा।।
(२७४)
लंघ जाते बड़े समुद्रों को पर्वत और देशों को प्राणी।
विस्तृत नदियाँ भी तिर जाते पर मृत्युकाल टलता नाहीं।।
इसलिए कौन ऐसा होगा जो धर्माराधन ना करके।
नित शोक करेगा नरकगती को पाने की इच्छा करके।।
(२७५)
खोटी चेष्टाओं के द्वारा जो कर्म उदय से सब प्राणी।
इस जग में जन्म मरण करते ये तो परंपरा है अनादि।।
पर आचार्यों ने कहा बावलापन जो अधिक रुदन करते।
प्रियजन की मृत्यु पर शोक अधिक और जन्म हुए पर हैं हंसते।।
(२७६)
लोभों का भ्रम व मूर्खता है दु:खों से व्याप्त इस दुनिया में।
आपत्ति आगमन शोक करें क्यों सुख की करें अपेक्षा वे।।
क्योंकी जैसे शमशान भूमि में रहकर कौन पुरुष होगा।
जहाँ भूत पिशाच चितायें ही होंगी डरने से क्या होगा।।
(२७७)
जैसे चंद्रमा सदा नभ में भ्रमता रहता है वैसे ही।
यह प्राणी एक गती से दूजी गती घूमता कहें यही।।
हो उदय अस्त घटना बढ़ना राशी से राशि बदलता है।
इस काया की स्थिती यही निंह हर्ष शोक फिर करता है।।
(२७८)
स्त्री पुत्रादिक सब पदार्थ बिजली के सदृश विनाशी हैं।
मत शोक करो तुम बुद्धिमान चंचल है आनी जानी है।।
जैसे अग्नी में उष्णपना सर्वदा रहेगा है स्वभाव।
वैसे ही सभी पदार्थों में उत्पाद ध्रौव्य व्यय तीन भाव।।
(२७९)
प्रियजन की मृत्यु पर शोक अधिक करने से बंधते कर्म बहुत।
और कर्म असाता हो जाते तिर्यंच नरकगति में परिणत।।
इसलिए बने जैसे करके कर शांत हृदय दुख को तजिए।
वरना वटवृक्ष समान बड़ा दुखदायी बन जाता दुख ये।।
(२८०)
प्रतिसमय आयु का क्षय होता यमराज का मुख इसको जानो।
इस मुख में हुए प्रविष्ट सभी खुद को भी जाना है मानो।।
फिर भी अज्ञानी शोक करे मरने पर अपने प्रियजन के।
आश्चर्य बहुत करते गुरुवर क्यूं समझ नहीं आता सबके।।
(२८१)
यह प्राणी ना तो मरा कभी निंह उसके घर मर रहा कोई।
आगे ना कोई मरेगा यदि तो शोक करे तब उचित सही।।
पर जीव अनन्तों बार मरा मर रहा मरेगा नियति यही।
फिर दुख करना निंह उचित लगे आचार्यवर्य कह गये यही।।
(२८२)
यह सूर्यदेव भी इक दिन में इक बार सुशोभित होता है।
वह भी संध्या में अस्त होए संदेश सभी को देता है।।
इस जग में सभी पदार्थों की नहिं रहती एक अवस्था है।
इसलिए हृदय में शोक न कर यह तो प्राचीन व्यवस्था है।।
(२८३)
यह चंद्र सूर्य अरु पक्षि पवन आकाश में विचरण करते हैं।
पृथ्वी पर चलने वाले पशु िंसह व्याघ्र जमीं पर चलते हैं।।
जल में चलने वाले मछली और मगर आदि जल में चलते।
पर यम सब जगह चला जाता इस काल से ना कोई बचते।।
(२८४)
तीनों लोकों में देव देवि विद्या मणि मंत्र तंत्र कोई।
आश्रितजन अथवा मित्र आदि राजादिक कुछ ना करे कोई।।
जो कर्म पूर्व में बंधे हुए उसका फल निश्चित मिलता है।
इसलिए शुभाशुभ कर्मों के फल से विद्वान न डरता है।।
(२८५)
क्या कहें अधिक जो देव सभी अणिमादिक ऋद्धीधारी थे।
रावण ने उसका नाश किया जबकि वे शक्तीशाली थे।।
उस रावण को भी रामचन्द्र ने मानव होकर हरा दिया।
फिर रामचन्द्र भी कालबली के मुख में देखो समा गया।।
(२८६)
इस शोक रूप दावानल से जगकानन१ व्याप्त हो रहा है।
इस वन में लोकरूप जो मृग वह मृगी के पीछे भगता है।।
यह कालरूप जो व्याघ्र खड़ा वह किसी को ना जीने देता।
वह युवा वृद्ध या बालक हो नहिं सदा काल जीवित रहता।।
(२८७)
इस भवकानन में मनुषरूप जो वृक्ष काल की अग्नी में।
संपदा रूप जो लतायुक्त स्त्रीरूपी बेलें उसमें।।
आिंलगन करती रहे सदा पुत्रादि पल्लवों का धारी।
रति से उत्पन्न हुआ जो सुख उन फल से लदा हुआ भारी।।
(२८८)
सब सुख की अभिलाषा करते पर सुख कर्मानुसार मिलता।
सबकी मृत्यू होना निश्चित फिर जीव मृत्यु से क्यों डरता।।
इस तरह मूढ़बुद्धी प्राणी भय कामयुक्त होकर जग में।
दुखरूप तरंगों से जो युत इस भव समुद्र में फिरते वे।।
(२८९)
जैसे धीवर के बिछे जाल में मछली क्रीड़ा करती है।
पर मरण रूप आपत्ती पर निंह ध्यान तनिक वो देती है।।
बस वैसे ही सुखरूप नीर में कालरूप जो जाल पड़ा।
उस पर निंह ध्यान जरा देता बस जीवन व्यर्थ गवां देता।।
(२९०)
इस जग से कितने चले गए और जाते हुए देखकर भी।
इस मोहकर्म के वश होकर आत्मा को माने निश्चल ही।।
वृद्धावस्था आने पर भी निंह लक्ष्य धर्म में रखता है।
प्रत्युत स्त्री पुत्रादिक में अधिकाधिक प्रीती करता है।।
(२९१)
जो दुष्चेष्टा से किए कर्ममय कारीगर से बनी देह।
खोटी संधी खोटे बंधन से सहित नाशकर कही देह।।
नाना दोषों से सहित सप्तधातू से भी ये है संयुत।
फिर क्यों कर स्थिर मान रहा ये आधि व्याधि आदिक से युत।।
(२९२)
जग में वांछित लक्ष्मी पा ली सागरों राज्यसुख भोग लिया।
अरु स्वर्गों में भी दुर्लभ जो रमणीय विषय सुख प्राप्त किया।।
पर जिस क्षण मृत्यु पास आए विषसंयुत भोजन के समान।
धिक्कार हो ऐसी लक्ष्मी को मुक्ती का आश्रय लो पुमान।।
(२९३)
जब तब भूखा निर्दयी तथा सबका विनाश करने वाला।
यमराज सामने ना आये नहिं कोई काम आने वाला।।
तलवार वीरता और सुभट आदिक योद्धा रथहस्ति आदि।
सब चीज व्यर्थ हो जाती है बुधि पुरुष यत्न करिए नित ही।।
(२९४)
राजा भी निर्धन हो जाते पूर्वोर्पािजत निज कर्मों से।
सर्वथा व्याधि से रहित युवा क्षण भर लगता है नशने में।।
जब सारभूत इस जीवन की अरु धन की ये स्थिति होती।
फिर अहंकार किस वस्तू का सब ही तो नाशवान होती।।
(२९५)
जो स्त्री पुत्र संपदा में मानव अभिमान किया करते।
वे चंचल पवन झकोरे में दीपक सम खुद भ्रम में रहते।।
जैसे उन्मादीजन नभ को मुष्ठी से व्यर्थ प्रहार करे।
सूखी नदि को तिरना जैसे प्यासा मरीचिका को पीवे।।
(२९६)
राजा रूपी मृग लक्ष्मी रूपी मृगी के लिए लड़ते हैं।
फिर भाई पुत्र आदिक कोई ईष्र्या के वश नहिं दिखते हैं।।
तब बहुत बड़ी आपत्ति रूप धनुधारी यम की फिक्र नहीं।
विद्वान भी कुछ नहिं सोच सके तब होता है आश्चर्य सही।।
(२९७)
जो मनुज मोह के वश होकर प्रियजन की मृत्यु से शोक करें।
निंह कोई गुण की प्राप्ती हो उल्टा निश्चय से दोष जने।।
दुख बढ़ता जाता है एवं चारों पुरुषार्थ नष्ट होते।
मतिविभ्रम हो रोगी होकर दुर्गति रथ से भव भ्रमण करें।।
(२९८)
आपत्ति रूप जग में रहकर यदि कोई दुख मानता है।
फिर वो ऐसे शुभ कार्य करे जो मुक्तीपथ को जाता है।।
जैसे चौराहे पर मकान बनवा कर मालिक खेद करे।
जब पथिक उल्लंघन कर जाए तब बुरा मानना व्यर्थ रहे।।
(२९९)
आचार्य मनुष्यों से कहते क्या वायुरोग हो गया तुम्हें।
अथवा गृह भूत पिशाच लगे उन्मत समान जो क्रिया करे।।
जब पता सभी को स्त्री धन जीवन विद्युत सम चंचल है।
फिर भी निज हित के कार्य न कर माने जग को वो निश्चल है।।
(३००)
जो चला गया उसकी खातिर ऐसा तू शोक कदापि न कर।
गर अच्छा वैद्य बुला लेता अथवा औषधि होती हितकर।।
क्योंकी जैसे चमड़े के बंध वर्षा ऋतु में ढीले होते।
वैसे ही मृत्यु समीप अगर सारे प्रयत्न निष्फल होते।।
(३०१)
जहाँ शरण नहीं ऐसे वन में बलवान व्याघ्र ने पकड़ा है।
तब दीन पशू मैं मैं करके मर जाता कर्म ने जकड़ा है।।
ऐसे कर्मों के व्याघ्रों से जकड़ा मनुष्य मैं मैं करता।
यह घर मेरा यह प्रिया मेरी यह मेरा मेरा कर मरता।।
(३०२)
मृत्यू से नष्ट किए ऐसे आयू के दिन प्रतिक्षण घटते।
फिर भी अज्ञानी जीव सभी कुछ देख के भी निश्चल समझे।।
आचार्य हमें समझाते हैं यहाँ कोई पदार्थ न अविनाशी।
इस खण्ड खण्ड आयू को लख निंह मोह करो जग के वासी।।
(३०३)
जब ब़ड़े बड़े ऋद्धीधारी चंद्रादि सूर्य इंद्रादिक भी।
मृत्यू को प्राप्त किया करते तब कीट सदृश जन अन्यों की।।
क्या बात कहें इसलिए पुत्र स्त्री धन का निंह मोह करो।
जिससे आना निंह पड़े यहाँ ऐसा कोई शुभ कार्य करो।।
(३०४)
संयोग के साथ वियोग लगा और जन्म मरण का साथ यहाँ।
संपति के संग विपत्ति लगी सुख के संग दुख का साथ कहा।।
वैसे ही जग में बार-बार जीवों की अवस्थाएँ बदलें।
कभी नरकगती कभी स्वर्ग और मानव तिर्यंच भेष धर ले।।
(३०५)
हमको कल्याण की प्राप्ती हो यह मानव यही विचार करे।
पर दैवयोग से जो होना होता है वह ही प्राप्त करे।।
इसलिए मोह के वश होकर खोटे विकल्प का त्याग करे।
अरु रागद्वेष रूपी विष को तज साम्यभाव को ग्रहण करे।।
(३०६)
आचार्य और भी कहते हैं घर प्रियतम सुख जीवन आदिक।
वायू से वंâपित ध्वज पट सम चंचल है अब क्या कहें अधिक।।
जो स्त्री धन और मित्र आदि में मोह व्याप्त है उसे तजो।
बस एक धर्म ही परम मित्र है उसको ही तुम सदा भजो।।
(३०७)
पुत्रादि शोक रूपी अग्नी को शांत करे जिनकी वाणी।
यतियों में श्रेष्ठ ‘‘पद्मनंदि’’ नामक यति की शीतल वाणी।।
उनके मुखरूपी मेघों से सद्बोध रूप जो धान्य उगा।
ऐसे ‘‘अनित्य पञ्चाशत’’ का हम मनन करें दुख शोक भगा।।

।।इति अनित्यपञ्चाशत् अधिकार।।