08.एकत्वाधिकार प्रश्नोत्तरी

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एकत्वाधिकार

प्रश्न १७०—द्रव्य के कितने भेद हैं ?
उत्तर—द्रव्य के छ: भेद हैं—जीव, पुद्गल धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

प्रश्न १७१—चैतन्य स्वरूप तेज कैसा है ?
उत्तर—चैतन्य स्वरूप तेज पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल से सर्वथा भिन्न है तथा ज्ञानावरणादि कर्मों से रहित है और बड़े—बड़े देव व इन्द्रादिक सदा उसकी पूजन करते हैं।

प्रश्न १७२—चैतन्य आत्मा का अनुभव किसे होता है ?
उत्तर—चैतन्य आत्मा का अनुभव अखण्ड ज्ञान के धारक ज्ञानी को ही हो सकता है।

प्रश्न १७३—चैतन्य आत्मा को कहाँ प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर—निर्मल चैतन्य आत्मा प्रत्येक प्राणी की देह में विराजमान है तो भी जिन मनुष्यों की आत्मा अज्ञानान्धकार से ढकी हुई है वे इसको नहीं जानते हैं तथा चैतन्य से भिन्न बाह्य पदार्थों में ही चैतन्य के भ्रम से भ्रान्त होते हैं।

प्रश्न १७४—वस्तु का स्वरूप कैसा है ?
उत्तर—वस्तु का स्वरूप अनेकान्त स्वरूप है।

प्रश्न १७५—क्या धर्म को परीक्षा करके ग्रहण करना चाहिए ?
उत्तर—संसार संकट में फंसे हुए प्राणियों का उद्धार करने वाला धर्म है किन्तु स्वार्थी दुष्टों ने उसको विपरीत ही कर दिया इसलिए भव्य जीवों को धर्म परीक्षा करके ही ग्रहण करना चाहिए।

प्रश्न १७६—कौन सा धर्म प्रमाण करने योग्य है ?
उत्तरसमस्त लोकालोक के पदार्थों के जानने वाले तथा वीतरागी मनुष्य का कहा हुआ धर्म ही प्रमाणीक होता है।

प्रश्न १७७—लब्धि कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर—लब्धि ५ प्रकार की होती है—(१) देशना (२) प्रायोग्य (३) विशुद्धि (४) क्षयोपशम तथा (५) करण।

प्रश्न १७८—देशना लब्धि किसे कहते हैं ?
उत्तर—सत्य उपदेश का नाम देशना है।

प्रश्न १७९—प्रायोग्य लब्धि का लक्षण बताओ ?
उत्तर—पंचेन्द्रीपना, सैनीपना, गर्भजपना, मनुष्यपना, ऊँचा कुल यह प्रायोग्य नामक लब्धि है।

प्रश्न १८०—क्षयोपशम लब्धि क्या है ?
उत्तर—सर्वघाती प्रकृतियों का उदयाभावी क्षय तथा देशघाती प्रकृतियों का उपशम क्षयोपशम लब्धि है।

प्रश्न १८१—विशुद्धि लब्धि किसे कहते हैं ?
उत्तर—परिणामों की विशुद्धता का नाम विशुद्धि लब्धि है।

प्रश्न १८२—करण लब्धि किसे कहते हैं ?
उत्तर—अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण यह करणलब्धि है।

प्रश्न १८३—वास्तविक सुख कहाँ है ?
उत्तर—वास्तविक सुख की प्राप्ति मोक्ष में है।

प्रश्न १८४—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यग्चारित्र की परिभाषा बताइए ?
'उत्तर'—आत्मा का निश्चय सम्यग्दर्शन है, आत्मा का ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और आत्मा में निश्चय रीति से रहना सम्यक्चारित्र है।

प्रश्न १८५—शुद्ध निश्चयनय और व्यवहारनय से आत्मा का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—शुद्ध निश्चयनय से आत्मा नित्य तथा चैतन्यस्वरूप है और व्यवहारनय से प्रमाण, नय तथा निक्षेप स्वरूप है।

प्रश्न १८६—अशुभ कर्मों का बन्ध कैसे होता है ?
उत्तर—राग—द्वेष के होने से ही शुभ तथा अशुभ कर्मों का बन्ध होता है।

प्रश्न १८७—द्वैत किसे कहते हैं ?
उत्तर—कर्म तथा आत्मा के मिलाप का नाम द्वैत है।

प्रश्न १८८—जीव संसारी कब तक है और मुक्त कब तक ?
उत्तर—जब तक कर्म तथा आत्मा का मिलाप रहेगा तब तक तो संसारी है किन्तु जिस समय कर्म तथा आत्मा का मिलाप छूट जाएगा तब मुक्त हो जाएगा।

प्रश्न १८९—संसार और मोक्ष कब तक है ?
उत्तर—जब तक कर्मों का सम्बन्ध है तब तक संसार है और जब कर्मों का सम्बन्ध छूट जाता है उस समय मोक्ष है।

प्रश्न १९०—आचार्यों ने चैतन्य स्वरूपी तेज को किसकी उपमा दी है ?
उत्तर—आचार्यों ने चैतन्यस्वरूपी तेज को प्रबल विद्या, स्फुरायमान तेज और जन्म, जरा आदि को नाश करने वाली परम औषधि कहा है।

प्रश्न १९१—परमात्मा का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—परमात्मा अगम्य तथा दृष्टि के अगोचर है इसलिए जिस प्रकार अमूर्तिक आकाश पर चित्र लिखना कठिन है उसी प्रकार परमात्मा का वर्णन करना भी अत्यन्त कठिन है।

प्रश्न १९२—साम्य किसे कहते हैं ?
उत्तर—जिसमें न कोई आकार है, न कोई अक्षर है, न कोई नीला आदि वर्ण है, न कोई विकल्प है किन्तु केवल एक चैतन्य ही है वही साम्य है।

प्रश्न १९३—साम्य से किसकी प्राप्ति होती है ?
उत्तर—साम्य से भव्य जीवों को सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होती है, अविनाशी सुख मिलता है, साम्य ही शुद्धात्मा का स्वरूप है तथा साम्य ही मोक्षरूपी मकान का द्वार है। समस्त शास्त्रों का सारभूत यह साम्य ही है।

प्रश्न १९४—साम्य का दूसरा अर्थ क्या है ? इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर—साम्य का दूसरा अर्थ समता है जिसकी प्राप्ति शास्त्र के अध्ययन से होती है।

प्रश्न १९५—जिसके पास विवेक नहीं है वह मनुष्य कैसा है ?
उत्तर—जिसके पास विवेक नहीं है उसका मनुष्यपना, उत्तम कुल में जन्म, धन, ज्ञान और कृतज्ञपना होकर भी निष्फल है।

प्रश्न १९६—विवेक किसको कहते हैं ?
उत्तर—संसार में चेतन और अचेतन दो प्रकार के तत्त्व हैं, उनमें ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करने वाले तथा त्याग करने योग्य को त्याग करने वाले पुरुष का जो विचार है उसी को विवेक कहते हैं।

प्रश्न १९७—विवेकी मनुष्य को यह संसार कैसा लगता है ?

उत्तर—मूर्ख पुरुषों को इस संसार में कुछ सुख तथा कुछ दुख मालूम पड़ता है किन्तु जो हिताहित के जानने वाले विवेकी हैं उनको तो इस संसार में सब दुख ही दुख निरन्तर मालूम होता है।