08.वेदमार्गणा

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5.वेद मार्गणा

प्रश्न1-वेद मार्गणा किसे कहते हैं?

उत्तर-वेद कर्म के उदय से होने वाले भाव को वेद कहते हैं । (य. 1) आत्मा की चैतन्य रूप पर्याय में मैथुनरूप चित्त विक्षेप के उत्पन्न होने को वेद कहते है । (गो. जी. 272) वेदों में जीवों की खोज करने को वेदमार्गणा कहते हैं ।

प्रश्न2-वेदमार्गणा कितने प्रकार की है?

उत्तर-वेद मार्गणा तीन प्रकार की है- 1. स्त्रीवेद 2 व पुरुषवेद 3? नपुंसकवेद । ३- द्र. सं. 1 टी.) वेद मर्थणा के अनुवाद से स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद तथा अपगतवेद वाले जीव होते (ध.1/340)

अथवा - वेद दो प्रकार के हैं- 1८३ द्रव्य वेद 2? भाव वेद ।

प्रश्न3-स्वीवेद किसे कहते हैं?

उत्तर-जिसके उदय से जीव पुरुष में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह स्त्रीवेद है । जिसके उदय से पुरुष के साथ रमने के भाव हों वह स्त्रीवेद हे । (गो. जी. 271)

प्रश्न4-पुरुषवेद किसे कहते हैं?

उत्तर-जिसके उदय से जीव सी में अभिलाषा रूप मैथुन सज्ञा से आक्रान्त होता है वह पुरुषवेद हे । जिसके उदय से स्त्री के साथ रमने के भाव हों वह पुरुषवेद है । (गो. जी. 271)

प्रश्न5- नपुंसकवेद किसे कहते हैं?

उत्तर-जिसके उदय से जीव के स्त्री और पुरुष की अभिलाषा रूप तीव्र कामवेदना उत्पन्न होती है वह नपुंसकवेद है । जिसके उदय से स्त्री तथा पुरुष दोनों के साथ रमने के भाव हों वह नपुसक वेद है । (गो. जी. 271)

प्रश्न6-द्रव्यवेद किसे कहते हैं?

उत्तर-जो योनि, मेहन आदि नामकर्म के उदय से रचा जाता है वह द्रव्यवेद है । (सवी. 2)

प्रश्न7- भाववेद किसे कहते ई?

उत्तर-भाव लित्र आत्मपरिणाम स्वरूप है । वह सी, पुरुष व नपुंसक इन तीनों में एक-दूसरे की अभिलाषा लक्षण वाला है और वह चारित्रमोह के विकल्परूप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक वेद नामके नोकषाय के उदय से होता है । (रा. वा. 2? 6)

प्रश्न8-वेद मार्गणा में किस वेद को ग्रहण करना चाहिए?

उत्तर-वेद मार्गणा में भाववेद को ग्रहण करना चाहिए क्योंकि यदि यहाँ द्रव्यवेद से प्रयोजन होता तो मनुष्य स्त्रियों के अपगतवेद स्थान नहीं बन सकता, क्योंकि द्रव्यवेद चौदहवें गुणस्थान् के अन्त तक पाया जाता है । परन्तु अपगतवेद भी होता है । इस प्रकार वचन निर्देश नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से किया गया है । (जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ भाववेद से प्रयोजन है, द्रव्यवेद से नहीं ।) (य. 2? 513)

तालिका संख्या-20

स्त्रीवेद

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 3 ति.म.दे. नहीं होता है ।
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस विकलत्रय के नहीं होता है ।
4 योग 13 4 म.4 व.5 का. आहारकद्विक नहीं होता है ।
5 वेद 1 स्वकीय स्त्रीवेद
6 कषाय 23 16 कषाय 7 नोकषाय पुरुष एवं नपुंसकवेद नहीं हैं।
7 ज्ञान 6 3 कुज्ञान. 3 ज्ञान मनःपर्यय तथा केवलज्ञान नहीं हैं।
8 संयम 4 सा.छे.संय.असं.
9 दर्शन 3 चक्षु. अच. अव. केवलदर्शन अवेदी के होता है।
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्ष.क्षायो.उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 1 सैनी,असैनी
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 9 पहले से नौवें तक नौवें गुणस्थान के सवेद भाग तक होता है।
16 जीवसमास 2 सैनी तथा असैनी पंचे.
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा.भा . म.
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ.
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. पीर. आहार और भय संज्ञा से रहित भी है ।
20 उपयोग 9 6 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 13 4 आ . 4 रौ. 4 ध. 1 शु.
22 आस्रव 53 5 मि. 12 अवि.23 क.13यो.
23 जाति 22 ला. 4 ला.ति.14 मनु.4 देव की नरक सम्बन्धी जाति नहीं है।
24 कुल 83 1/2ला.क. तीन गति संबंधि नरक सम्बन्धी कुल नहीं हैं ।

प्रश्न9-स्त्रीवेद किसके समान होता है?

उत्तर-सीवेद के उदय में जीव पुरुष को देखते ही उसी प्रकार द्रवित हो उठता है जिस प्रकार आग को छूते ही लाख पिघल जाती है । विधा, 4789) स्त्रीवेद कण्डे की अग्रि के समान माना गया है ।

प्रश्न10-स्त्रीवेदी जीव कहाँ-कहाँ पाये जाते हैं?

उत्तर-मनुष्यगति, तिर्यञ्चगति में तथा देवों में सोलहवें स्वर्ग तक सीवेदी जीव पाये जाते हैं । लेकिन समर्चन लस्थ्यपर्यातक मनुष्य-तिर्यच्चों में स्त्रियाँ नहीं होती हैं क्योंकि समर्चन जीव नपुसक वेद वाले ही होते हैं ।

प्रश्न11-स्त्रीवेदी के आहारकद्विक काययोग क्यों नहीं होते हैं?

उत्तर-अप्रशस्त वेदों के साथ आहारक ऋद्धि उत्पन्न नहीं होती है । ( ध. 2 ' 667)

प्रश्न12-क्या स्त्रीवेदी की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में भी अवधिदर्शन हो सकता है?

उत्तर- नहीं, क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव स्त्रीवेदी में उत्पन्न नहीं होता । अवधिदर्शन सम्यग्दृष्टि तथा सम्बग्मिथ्यादृष्टि के होता है, तीसरे गुणस्थान वाले का मरण नहीं होता, इसलिए स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में अवधिदर्शन नहीं हो सकता । इसी प्रकार नपुंसक वेद में जानना चाहिए लेकिन नरक की अपेक्षा नपुंसकवेदी की निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में भी अवधिदर्शन होता है ।

प्रश्न13-स्त्रीवेद वाले के कौन-कौन से संयम नहीं हो सकते हैं?

उत्तर-स्त्रीवेद वाले के 3 सयम नहीं हो सकते हैं- 1. परिहारविशुद्धि 2. सूक्ष्म साम्पराय 3. यथाख्यात सयम । परिहारविशुद्धि संयम पुरुषवेद वाले के ही होता है । सूक्ष्म साम्पराय तथा यथाख्यात संयम अवेदी जीवों के होते हैं इसलिए स्त्रीवेद में ये तीनों सयम नहीं होते हैं । इसी प्रकार नपुंसक वेद में भी ये संयम नहीं हो सकते हैं ।

प्रश्न14-स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में कितने सभ्य? हो सकते हैं?

उत्तर-स्त्रीवेदी के निर्वृत्यपर्यातक अवस्था में दो सम्बक्ल हो सकते हैं- 1. मिथ्यात्व, 2. सासादन । पर्याप्त अवस्था में सभी सम्बक्ल हों सकते हैं क्योंकि भावस्त्रीवेदी मोक्ष जा सकते हैं ।

प्रश्न15-खीवेदियों में कौन-कौनसी संज्ञाओं का अभाव हो सकता है?

उत्तर-सीवेदियों में दो संज्ञाओं का अभाव हो सकता है- 1. आहार संज्ञा, 2 भयसज्ञा । सातवें गुणस्थान से आहार संज्ञा का तथा आठवें गुणस्थान के आगे भय संज्ञा भी नहीं होती


तालिका संख्या 21

पुरुषवेद

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 3 ति. म. देव नरकगति नहीं होता है ।
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 15 4 म. 4 व. 7 का.
5 वेद 1 पुरुषवेद
6 कषाय 23 16 कषाय 7 नोकषाय स्री एवं नपुंसकवेद नहीं हैं।
7 ज्ञान 7 3 कुज्ञान 4 ज्ञान केवलज्ञान अपगतवेदी के होते हैं।
8 संयम 5 सा. छे. प. सय. असं.
9 दर्शन 3 चक्षु. अच. अव. केवलदर्शन नहीं है ।
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्षा.क्षायो.उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 2 सैनी,असैनी
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 9 पहले से नौवें तक
16 जीवसमास 2 सैनी तथा असैनी पंचेन्द्रिय
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा.भा . म.
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय 3 बल श्वा.आ. १० प्राण सैनी के ही होते है ।
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. परि.
20 उपयोग 10 7 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 13 4 आ . 4 रौ. 4 धर्म. 1 शु.
22 आस्रव 55 5 मि. 12 अवि. 23 क. 15यो.
23 जाति 22 ला. 4 ला.तिर्य.14ला.मनु.4ला.देव. नारकियों की जातियाँ नहीं है ।
24 कुल 83 1/2ला.क. 43 1/2 ला.क. तिर्य. 14ला.क. मनु. 26 ला.क.देव

प्रश्न16-पुरुषवेद में जीव की स्थिति कैसी होती है?

उत्तर-पुरुषवेद युक्त प्राणी स्त्री को देखते ही वैसे ही पिघल जाता है जैसे-जमे हुए घी का घड़ा अग्नि के स्पर्श होते ही क्षणभर में पानी-पानी हो जाता है । (व. चा. 4 / 90)

पुरुषवेद तृण की अग्रि के समान कहा गया है ।

प्रश्न17-क्या ऐसे कोई पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद नहीं होता है?

उत्तर-हाँ, ऐसे भी पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद नहीं होता है । वे हैं- 1. सभी नारकी 2. नौवें गुणस्थान के अवेद भाग से आगे विराजमान सभी जीव 3. सर्न्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीव 4. स्त्री तथा नपुंसक वेद वाले जीवों के भी पुरुष वेद नहीं होता है ।

प्रश्न18- ऐसे कौनसे असैनी पंचेन्द्रिय जीव हैं जिनके पुरुषवेद भी होता है?

उत्तर-जो जीव गर्भ से उत्पन्न होने पर भी मन से रहित हैं उन तोता मैना आदि तिर्यच्चगति के पंचेन्द्रिय जीवों के पुरुषवेद भी हो सकता है अर्थात् उनके तीनों वेद होते हैं ।

प्रश्न 19-पुरुषवेदी के कौन-कौनसे संयम नहीं हो सकते है?

उत्तर-पुरुषवेदी के दो संयम नहीं हो सकते हैं- 1. सूक्ष्म साम्पराय और 2. यथाख्यात । क्योंकि ये दोनों संयम अवेदी जीवों के होते हैं ।

प्रश्न 20- पुरुषवेद तो भगवान के भी दिखता है तो उनके चारों शुख्म ध्यान क्यों नहीं कहे? उत्तर- यद्यपि द्रव्य पुरुषवेद भगवान के भी दिखता है लेकिन उनके भाववेद नहीं होता है क्योंकि भाववेद का कारण मोहनीय कर्म (वेद कषाय) का उदय कहा है । भगवान के वेद कषाय का उदय नहीं पाया जाता है । यहाँ सभी कथन भाववेद की अपेक्षा किया गया है इसलिए पुरुषवेद वालों के चारों शुक्लध्यान नहीं होते हैं । नवमें गुणस्थान तक वेद है वहाँ एक ही शक्ल ध्यान होता है ।

प्रश्न21-पुरुषवेद वालों के कम- से-कम कितने प्राण होते हैं?

उत्तर-पुरुषवेद वालों के कम-से-कम 7 प्राण होते हैं । सैनी या असैनी पंचेन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्तक अवस्था में 5 इन्द्रिय, 1 कायबल तथा आयु प्राण । आहारकमिश्र अवस्था में भी ये ही सात प्राण होते हैं ।

प्रश्न22-पुरुषवेदी के कम-से- कम कितने आसव के प्रत्यय होते हैं?

उत्तर-पुरुषवेदी के कम-से-कम आसव के चौदह प्रत्यय होते हैं-

4 कषाय - (संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ)

9 योग - 4 मनोयोग, 4 वचनयोग, 1 औदारिककाययोग ।

1 वेद - पुरुषवेद । ये आसव के प्रत्यय 9 वें गुणस्थान में सवेद भाग तक होते हैं ।


तालिका संख्या 22

नपुंसकवेद

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 3 न. ति. म. देवगति नहीं है।
2 इन्द्रिय 5 ए. द्वी. त्री. चतु. पंचे.
3 काय 6 5 स्थावर 1 त्रस
4 योग 13 4 म. 4 व. 5 का. आहारकद्विक नहीं होता है ।
5 वेद 1 स्वकीय नपुंसकवेद
6 कषाय 23 16 कषाय 7 नोकषाय
7 ज्ञान 6 3 कुज्ञान 3 ज्ञान मनःपर्यय तथा केवलज्ञान नहीं हैं ।
8 संयम 4 सा. छे. संय. असं.
9 दर्शन 3 च. अच. अव. केवलदर्शन नहीं है ।
10 लेश्या 6 कृ.नी.का.पी.प.शु.
11 भव्यत्व 2 भव्य, अभव्य
12 सम्यक्त्व 6 क्षा.क्षायो.उ.सा.मिश्र.मि.
13 संज्ञी 2 सैनी,असैनी
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 9 पहले से नौवें तक
16 जीवसमास 19 14 स्थावर के 5 त्रस के
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा.भा . म.
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय, 3 बल श्वा.आयु .
19 संज्ञा 4 आ.भ.मै. परि.
20 उपयोग 9 6 ज्ञानो. 3 दर्शनो.
21 ध्यान 13 4 आ . 4 रौ. 4 धर्म. 1 शु. पृथक्ववितर्कदीचार शुक्लध्यान है ।
22 आस्रव 53 5 मि. 12 अ. 23 क. 13यो. 2 योग और 2 नोकषाय नहीं है ।
23 जाति 80 ला. 4ला.न. 62ला.तिर्य. 14ला.मनु. देवसम्बन्न्धी जाति नहीं है ।
24 कुल 173 1/2ला.क. ना.ति.मनु. सम्बन्धी देव सम्बन्धी कुल नहीं है।

प्रश्न 1- नपुंसकवेद किसके सामान है ?

उत्तर- नपुंसकवेद के उदय से जीव ईंट पकाने के आवे की अग्रि के समान तीव्र कामवेदना से पीड़ित होने से कलुषित चित्तवाला होता है । (गो. जी. 275)
ईटों के आवे के समान जब किसी प्राणी में काम उपभोग सम्बन्धी भयंकर विकलता होती तथा अत्यन्त निन्दनीय कुरूपपना होता है वही नपुंसक वेद का परिपाक है ।

(व. चा. 4 / 91)

प्रश्न 2 किन-किन जीवों के नपुंसक वेद ही होता है-

उत्तर- वे जीव जिनके नपुंसक वेद ही होता है, वे हैं -

1. सातों पृथिवियों के नारकी 2. एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय ।

3. समर्चन संज्ञी पंचेन्द्रिय 4. सम्पूर्च्छन असंज्ञी पंचेन्द्रिय ।

प्रश्न 3 - कहाँ - कहाँ पर नपुंसक वेद नहीं होता है?

उत्तर-वे स्थान जहाँ नपुंसक वेद नहीं होता- 1. देवगति में सभी देव-देवांगनाओं के । 2. भोग भूमि तथा कुभोग भूमि में । 3. परिहारविशुद्धि संयमी के । 4. आहारक तथा आहारकमिश्र काययोग में । 5. मन: पर्ययज्ञानी जीवों के । 6. किसी भी ऋद्धिधारी मुनिराज के तथा । 7. उसी भव में तीर्थंकर होने वाले जीवों के तथा सभी प्लेच्छों के नपुंसक वेद नहीं होता है । 63 शलाका पुरुषों के भी नपुंसक वेद नहीं होता है ।

भवनवासी, वान- व्यतर, ज्योतिषी, कल्पवासी देव, तीस भोगभूमियों में उत्पन्न तिर्यब्ज- मनुष्य, भोगभूमि के प्रतिभाग में उत्पन्न असख्यात वर्ष की आयु वाले (कुभोग भूमिया) तथा सर्व प्लेच्छ खण्डों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य-तिर्यव्व नपुंसकवेद वाले नहीं होते हें । (आ. समु. 34)

प्रश्न 4 - विग्रहगति में शरीर नहीं होता अत: वहाँ खी, पुरुष तथा नपुंसक वेद कैसे हो सकता

उत्तर-यद्यपि अनाहारक अवस्था में शरीर नहीं होता है फिर भी वहाँ उनके भाववेद का अभाव नहीं होता है क्योंकि भाववेद वेदकषाय के उदय से होता है । विग्रहगति में भी वेद का उदय रहता है इसलिए वहाँ भी तीनों वेदों का सद्‌भाव कहा गया है ।

प्रश्न 5- नपुंसक वेद वाले के कम-से- कम कितने प्राण होते हैं?

उत्तर-नपुंसकवेद वाले के कम-से-कम 3 प्राण हो सकते हैं - एकेन्द्रिय जीवों की निर्वृत्यपर्याप्त

अवस्था में या लब्ध्यपर्यातक एकेन्द्रिय जीवों के 3 प्राण होते हैं । .

प्रश्न 6- नपुंसक वेद में कितने शुक्लध्यान हो सकते हैं?

उत्तर-नपुंसक वेद में पहला ' 'पृथक्लवितर्क वीचार' ' शुक्लध्यान हो सकता है । यह ध्यान आठवें नवमें गुणस्थान की अपेक्षा कहा गया है । जो आचार्य दसवें गुणस्थान तक धर्मध्यान मानते हैं उनकी अपेक्षा नपुंसकवेद में एक भी शुक्लध्यान नहीं हो सकता है । इसी प्रकार स्त्रीवेद और पुरुषवेद में भी जानना चाहिए ।

प्रश्न 7- तीनों वेदों में मनुष्य-तिर्यथ्य आदि की पूरी-पूरी जातियाँ ग्रहण की गई हैं तो क्या सभी तिर्यथ्य, मनुष्य स्वीवेद, पुरुषवेद या नपुंसक वेद वाले होते हैं अथवा हो सकते हैं?

उत्तर-नहीं, सभी मनुष्य-तिर्यच्च स्त्री, पुरुष, नपुसक वेद वाले नहीं होते तथा न हो ही सकते हैं लेकिन प्रत्येक जाति में तीनों वेद वाले जीव उत्पन्न होते हैं, हो सकते हैं । जैसे-पर्याप्त मनुष्य उनतीस अक प्रमाण होते हैं और मनुष्यों की जातियाँ मात्र चौदह लाख बताई गई हैं । एक-एक जाति में करोड़ों, करोड़ों मनुष्य उत्पन्न हो सकते हैं, उन करोड़ों मनुष्यों में कोई सी वेद वाला, कोई पुरुष वेद वाला तो कोई नपुंसक वेद वाला हो सकता है । सम्भवत: इसीलिए तीनों वेदों में पूरी-पूरी जातियों का ग्रहण किया गया है ।

नोट : इसी प्रकार कुलों में भी जानना चाहिए ।

तालिका संख्या 23

अपगतवेदी

क्रम स्थान संख्या विवरण विशेष
1 गति 1 मनुष्यगति
2 इन्द्रिय 1 पंचेन्द्रिय
3 काय 1 त्रस
4 योग 11 4 म. 4 व. 3 का. औदारिकद्विक और कार्मण
5 वेद 0
6 कषाय 4 संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ कषायातीतभी होते हैं ।
7 ज्ञान 5 मति. श्रु. अव. मन.केवल.
8 संयम 4 सा. छे. सू. य.
9 दर्शन 4 च. अच. अ. केव.
10 लेश्या 1 शुक्ल लेश्यातीत भी होते हैं।
11 भव्यत्व 1 भव्य भव्याभव्य से रहित भी होते हैं।
12 सम्यक्त्व 2 क्षायिक, उपशम
13 संज्ञी 1 सैनी सैनी असैनी से रहित भी होते हैं।
14 आहार 2 आहारक, अनाहारक
15 गुणस्थान 6 नवें से चौदहवें तक नवें के अवेदभाग से ग्रहण करना चाहिए ।
16 जीवसमास 1 सैनी पंचेन्द्रिय समासातीत भी होते हैं ।
17 पर्याप्ति 6 आ. श. इ. श्वा. भा. म. पर्याप्ति से रहित भी होते हैं ।
18 प्राण 10 5 इन्द्रिय 3 बल, श्वाआ. प्राणातीत भी होते हैं।
19 संज्ञा 1 परिग्रह सज्ञातीत भी होते हैं।
20 उपयोग 9 5 ज्ञा. 4 दर्शन.
21 ध्यान 4 चारों शुक्लध्यान ध्यानातीत भी होते हैं।
22 आस्रव 15 4 क. 11 योग आस्रवरहित भी होते हैं।
23 जाति 14 ला. मनुष्य सम्बन्धी जाति से रहित भी होते हैं।
24 कुल 14 ला.क. मनुष्य सम्बन्धी कुलातीत भी होते हैं।


प्रश्न 1 - अपगतवेदी किसे कहते हैं?

उत्तर- जो स्री, पुरुष तथा स्री-पुरुष दोनों की अभिलाषा रूप परिणामों की तीव्र वेदना से होने वाले संक्लेश से रहित हैं, वे अपगतवेदी हैं । जो कारीष, तृण तथा इष्टपाक की अग्रि के समान परिणामों के वेदन से उन्मुक्त हैं और अपनी आत्मा में उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अनन्तसुख के धारक भोक्ता हैं वे अपगतवेदी हैं । (पं. सं. प्रा. 1 / 108)

जिनके तीनों प्रकार के वेदों से उत्पन्न होने वाला संताप दूर हो गया है वे वेदरहित जीव हैं । (ध. १ / ३४२)

प्रश्न 2 - अपगतवेदी जीवों के कितनी कषायें होती हैं?

उत्तर-अपगतवेदी जीवों के 4 कवायें होती हैं संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ ।

नवमें गुणस्थान में पहले वेद का अभाव होता है । उसके बाद संज्वलन कषायों का नाश होता है । इसलिए नवमें गुणस्थान में संज्वलन क्रोधादि चारों पाये जाते हैं तथा दसवें गुणस्थान में केवल सैज्वलन लोभ पाया जाता है । (ध. 2) ग्यारहवें से चौदहवें गुणस्थान तक तथा सिद्ध भगवान भी अपगतवेदी होते हैं लेकिन उनके कषाय भी नहीं होती है ।

प्रश्न 3 - अपगतवेद में पाँचों ज्ञान किस अपेक्षा से पाये जाते हैं?

उत्तर-अपगतवेदी के 9 वें, 1० वें, 11 वें तथा 12 वें गुणस्थान में मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ज्ञान होता है । तेरहवें और चौदहवें गुणस्थान में केवलज्ञान पाया जाता है । (ध. 2) सिद्ध भगवान के ज्ञान को भी केवलज्ञान कहते हैं ।

नोट - इसी प्रकार चार दर्शनों में भी जानना चाहिए ।

प्रश्न 4 - अपगतवेद में संयम की विवेचना किस प्रकार करनी चाहिए?

उत्तर-अपगतवेद में - सामायिक-छेदोपस्थापना सयम नवमें गुणस्थान की अवेद अवस्था में होते है ।

सूक्ष्म साम्पराय संयम - दसवें गुणस्थान में होता है ।

यथाख्यात संयम - 11 वें, 12 वें, 13 वें तथा 14 वें गुणस्थान में पाया जाता है । (ध. 2)

प्रश्न 5 - अपगतवेद में दो सम्यकत्व किस अपेक्षा से कहे गये हैं?

उत्तर - अपगतवेदी के उपशम सम्यकत्व - उपशम श्रेणी में स्थित नवमें (अवेद भाग में) दसवें तथा ग्यारहवें गुणस्थान में पाया जाता है ।

क्षायिक सम्यकत्व - उपशम श्रेणी में स्थित नवमें से ग्यारहवें गुणस्थान तक तथा क्षपक श्रेणी में स्थित नवमें, दसवें, बारहवें गुणस्थान में और तेरहवें, चौदहवें गुणस्थान तथा सिद्ध भगवान के भी पाया जाता है । (ध. 2)


प्रश्न 6 - अपगतवेदी के वेद का अभाव भाव की अपेक्षा होता है या द्रव्य की अपेक्षा ?

उत्तर- (यद्यपि पाँचवें गुणस्थान से आगे भी द्रव्यवेद का सद्‌भाव पाया जाता है, परन्तु केवल द्रव्य वेद से ही विकार उत्पन्न नहीं होता है ।) यहाँ पर तो भाववेद का अधिकार है । इसलिए भाववेद के अभाव से ही उन जीवों को अपगतवेदी जानना चाहिए, द्रव्यवेद के अभाव से नहीं । (ध. 1 / 345)

समुच्चय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 - किन-किन जीवों के तीनों वेद होते हैं?

उत्तर-तिर्यंच असंज्ञी पंचेन्द्रिय से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक तीनों वेद से युक्त होते हैं । ' (ध. 1 /सु 1०7 - 8) मनुष्य मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक तीनों वेद वाले होते है । आगम में नवें गुणस्थान के सवेद भाग पर्यन्त द्रव्य से एक पुरुषवेद और भाव से तीनों वेद हैं ऐसा कथन किया है । (गो. जीजी. 271)

प्रश्न 2- कौन सी गति के जीवों में एक, दो, तीन वेद तथा वेद रहित अवस्था भी होती है?

उत्तर- मनुष्यगति के जीवों में एक वेद, दो वेद, तीन वेद तथा वेद रहित अवस्था भी होती है- एक पुरुष वेद - आहारक ऋद्धि, मनःपर्ययज्ञान, परिहारविशुद्धि संयम तथा सभी शलाका पुरुषों के आदि.... ।

एक नपुंसक वेद - सभी समर्चन मनुष्यों के ।

दो वेद - भोगभूमि, कुभोगभूमि तथा सर्व प्लेच्छ खण्डों में

तीन वेद - कर्मभूमिया मनुष्य ।

अपगतवेदी - नवमें गुणस्थान के अवेद भाग से आगे 14 वें गुणस्थान तक के मनुष्य ।

प्रश्न 3- ऐसे कौन-कौन से योग हैं जो तीनों वेद वालों के भी होते हैं और अपगतवेदी के भी होते हैं?

उत्तर- 11 योग तीनों वेदों में भी होते हैं तथा अपगतवेदी के भी होते हैं -

4 मनोयोग, 4 वचनयोग तथा 3 (औदारिकद्विक तथा कार्मण) काययोग (ध. 2)

प्रश्न 4 - ऐसा कौन- कौनसा वेद है जिसकी अनाहारक अवस्था में तीन ही गतियाँ होती है?

उत्तर-तीनों ही वेदों की अनाहारक अवस्था में तीन गतियाँ ही होती हैं -

स्रीवेद में -२: - तिर्यगति, मनुष्यगति, देवगति ।

पुरुषवेद में - तिर्यशाति, मनुष्यगति, देवगति ।

नपुंसक वेद में - ' नरकगति, तिर्यञ्चगति, मनुष्यगति ।

प्रश्न 4 -नरकगति में जाते समय द्रव्य स्री और पुरुष वेदी के कम-से-कम कितने आस्रव के प्रत्यय हो सकते हैं?

उत्तर-द्रव्य सीवेदी जो यहाँ से नरकगति में जा रहा है उसके विग्रहगति में कम-से-कम आसव के 41 प्रत्यय हो सकते हैं - 5 मिथ्यात्व, 12 अविरति, 23 कषाय तथा 1 योग । द्रव्य पुरुषवेदी के नरक में जाते समय कम-से-कम - 32 आसव हैं - 12 अविरति, 19 कषाय तथा 1 योग ।

नोट: द्रव्य पुरुषवेदी ही सम्यग्दर्शन को लेकर नरकगति में जा सकता है क्योंकि क्षायिक सम्यग्दर्शन तथा कृतकृत्य वेदक सम्यक द्रव्य पुरुष-वेदी के ही होते हैं । इसलिए उसके 5 मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी आस्रव के प्रत्यय निकल जावेंगे ।

प्रश्न 6 - क्या अपगतवेदी आसव रहित भी होते हैं?

उत्तर- हाँ, चौदहवें गुणस्थानवर्ती अपगतवेदी आस्रवरहित ही होते हैं । सिद्ध भगवान भी आस्रवरहित ही होते हैं ।

प्रश्न 7- किस-किस स्थान के सभी उत्तर भेदों में तीनों वेद पाये जाते हैं?

उत्तर- 8 स्थानों के सभी उत्तर भेदों में तीनों वेद पाये जाते हैं- ( 1) लेश्या (2) भव्यत्व ( 3) सम्बक्च (4) संज्ञी (5) आहार (6) पर्याप्ति (7) प्राण ( 8) संज्ञा ।