08. आठवाँ भव

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(आठवाँ भव)

प्रश्न १ -अयोध्यापति आनंद कुमार के माता-पिता का क्या नाम था?

उत्तर -कुमार आनंद की माता का नाम महारानी प्रभाकारी तथा पिता का नाम राजा वङ्काबाहु था?

प्रश्न २ -राजा आनन्द कुमार किस पद पर आरूढ़ थे?

उत्तर -महामण्डलीक पद पर।

प्रश्न ३ -उनके अधीन कितने राजागण थे?

उत्तर -८ हजार मुकुटबद्ध राजा उनकी आज्ञा को शिरसा वहन करते थे।

प्रश्न ४ -महाराजा आनन्द ने आष्टाह्निक महापर्व में कौन सा अनुष्ठान किया?

उत्तर -महाराजा आनन्द ने आष्टाह्निक महापर्व में नन्दीश्वर पूजन का अतुल वैभव के साथ आयोजन किया।

प्रश्न ५ -इसकी सलाह किसने दी?

उत्तर -इसकी सलाह स्वामिहित नामक विवेकशील मंत्री ने दी।

प्रश्न ६ -जिनेन्द्रदेव की पूजा से क्या फल मिलता है?

उत्तर -जिनेन्द्रदेव की पूजा सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली है।

प्रश्न ७ -पर्व के दिनों में की गई पूजा क्या फल प्रदान करती है?

उत्तर -पर्व के संयोग से वह पूजा अतिशय पुण्य को प्रदान करने वाली हो जाती है। जिनपूजा के समान इस संसार में और कोई उत्तम कार्य नहीं है। जिनेन्द्रदेव की पूजा की भावना ही सभी दु:खों को दूर करने का एक अमोघ उपाय है।

प्रश्न ८ -नन्दीश्वर महापूजा में कौन से महामुनि पधारे?

उत्तर -विपुलमति नामक महामुनि पधारे।

प्रश्न ९ -राजा ने उनसे क्या निवेदन किया?

उत्तर -राजा ने उनसे अचेतन प्रतिमाओं व्दारा सचेतन को पुण्य फल प्रदान करने की जिज्ञासा शांत करने हेतु निवेदन किया।

प्रश्न १०-मुनिराज ने उसका क्या उत्तर दिया?

उत्तर -राजा ने कहा कि जिनमंदिर और उनकी प्रतिमाओं के दर्शन करने वालों के परिणामों में जितनी निर्मलता और प्रकर्षता होती है वैसी अन्य कारणों से नहीं हो सकती है। जैसे-कल्पवृक्ष, चिंतामणि आदि अचेतन होते हुए भी मनवांछित और मनचिंतित फल देने में समर्थ हैं, उनसे भी कहीं अधिक वैसी ही जिनप्रतिमाएं सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने में समर्थ है।

प्रश्न ११-वीतराग मुद्रा के दर्शन का क्या फल है?

उत्तर -प्रतिमारूप में वीतरागमुद्रा को देखकर जिनेन्द्रदेव का स्मरण होता है जिससे अनन्तगुणा पुण्यबंध हो जाता है।

प्रश्न १२-जिनप्रतिमा के दर्शन न करने वाले अथवा निन्दा करने वालों को क्या फल मिलता है?

उत्तर -जो मूढ़जन जिनप्रतिमाओं का दर्शन नहीं करते हैं या उनकी निन्दा करते हैं वे स्वयमेव अनन्त संसार सागर में डूब जाते हैं।

प्रश्न १३-उसके पश्चात् मुनिराज ने राजा को क्या बताया?

उत्तर -उसके बाद मुनिराज ने राजा के सामने तीन लोक के अकृत्रिम चैत्यालयों तथा सूर्य, चन्द्र आदि के विमान में स्थित जिनबिंब का वर्णन किया।

प्रश्न १४-सूर्य का विमान कितने योजन का है?

उत्तर -४८/६१ योजन।

प्रश्न १५-एक योजन में कितने मील होते हैं?

उत्तर -४००० मील।

प्रश्न १६-सूर्य का विमान पृथ्वीतल से कितने योजन एवं कितने मील की ऊँचाई पर है?

उत्तर -सूर्य का विमान पृथ्वीतल से ८०० योजन अर्थात् ३२००००० मील की ऊँचाई पर है।

प्रश्न १७-सूर्य की किरणें कितनी और कैसी हैं?

उत्तर -इसमें १२ हजार किरणें हैं जो कि अति उग्र और उष्ण हैं।

प्रश्न १८-यह विमान कैसा है?

उत्तर -यह विमान अर्धगोलक के सदृश है अर्थात् जैसे गेंद या नारंगी को बीच से काटने पर जैसा आकार होता है वैसा ही इन विमानों का आकार है।

प्रश्न १९-सूर्य के विमान को कौन खींचता है?

उत्तर -सूर्य के विमान को आभियोग्य (वाहन) जाति के १६००० देव सतत खींचते रहते हैं।

प्रश्न २०-कौन सी दिशा में कौन से आकार के कितने देव रहते हैं?

उत्तर -४००० देव पूर्व दिशा में सिंह का आकार धारण करते हैं, ४००० देव पश्चिम में बैल का आकार, ४००० देव दक्षिण में हाथी का आकार एवं ४००० देव उत्तर में घोड़े का आकार धारण किये रहते हैं।

प्रश्न २१-सूर्य का विमान किस धातु का बना हुआ है?

उत्तर -सूर्य का विमान पृथ्वीकायिक चमकीली धातु से बना है जो कि अकृत्रिम है।

प्रश्न २२-किस कर्म के उदय से सूर्य की किरणें चमकती हैं?

उत्तर -सूर्य बिम्ब में स्थित पृथ्वीकायिक जीवों के आतप नामकर्म का उदय होने से उसकी किरणें चमकती हैं तथा उसके मूल में उष्णता न होकर किरणों में ही उष्णता होती है।

प्रश्न २३-आकाश में सूर्य की कितनी गलियाँ हैं?

उत्तर -१८४ गलियाँ हैं।

प्रश्न २४-जम्बूव्दीप में कितने सूर्य एवं कितने चन्द्रमा हैं?

उत्तर -जम्बूव्दीप में २ सूर्य और २ चन्द्रमा हैं।

प्रश्न २५-एक मिनट में सूर्य की गति लगभग कितने मील प्रमाण है?

उत्तर -४४७६२३ मील प्रमाण।

प्रश्न २६-सूर्य विमान में क्या-क्या हैं?

उत्तर -सूर्य विमान में नीचे का गोल भाग तो हम-आपको दिख रहा है तथा ऊपर के समतल भाग में चारों तरफ गोल तटवेदी है उसमें चारों दिशाओं में गोपुर-मुख्य फाटक हैं। इस विमान के बीचों-बीच में उत्तम वेदी सहित राजांगण हैं, उसके ठीक बीच में रत्नमय दिव्यकूट है। उस कूट पर वेदी एवं ४ तोरणव्दाराे से युक्त जिनमंदिर है।

प्रश्न २७-उन जिनभवनों में कितनी जिनप्रतिमाएँ हैं?

उत्तर -१०८ जिनप्रतिमाएँ।

प्रश्न २८-उनकी भक्ति-वन्दना देवगण किस प्रकार करते हैं?

उत्तर -सभी देवगण गाढ़ भक्ति से जल, चंदन, तंदुल, पुष्प, नैवेध्य, दीप, धूप और फलों से नित्य ही उनकी पूजा करते रहते हैं।

प्रश्न २९-इन जिनभवनों में सूर्य देव के भवन किस प्रकार के बने हैं?

उत्तर -इन जिनभवनों के चारों ओर समचतुष्कोण, लंबे और नाना प्रकार के सुंदर-सुंदर सूर्य देव के भवन बने हुए हैं।

प्रश्न ३०-ये भवन किस वर्ण के हैं?

उत्तर -कितने ही भवन मरकत वर्ण के, कितने ही कुंदपुष्प के और कितने ही सुवर्ण सदृश बने हुए हैं।

प्रश्न ३१-इन सूर्य भवनों में सूर्यदेव कहाँ विराजते हैं?

उत्तर -इन सूर्य भवनों में सिंहासन पर सूर्य देव विराजमान होते हैं।

प्रश्न ३२-सूर्य इन्द्र की कितनी देवियाँ हैं?

उत्तर -सूर्य इन्द्र की मुख्य देवियाँ चार हैं और अन्य बहुत सारी देवियाँ हैं।

प्रश्न ३३-उन चार मुख्य देवियों के नाम बताइये?

उत्तर -वे चार मुख्य देवियाँ हैं-द्युतिश्रुति, प्रभंकरा, सूर्यप्रभा और अर्चिमालिनी।

प्रश्न ३४-सूर्य विमान के जिनमंदिर की असाधारण विभूति को सुनकर आनंद महाराज ने क्या किया?

उत्तर -सूर्य विमान के जिनमंदिर की असाधारण विभूति को सुनकर आनंद महाराज को बहुत ही श्रद्धा हो गई। वह प्रतिदिन आदि और अंत समय में दोनों हाथ जोड़कर, मुकुट झुकाकर, सूर्य विमान में स्थित जिनप्रतिमाओं की स्तुति करने लगा और महल की छत पर प्रतिदिन अघ्र्यॅ चढ़ाकर पूजा करने लगा। साथ ही कारीगरों के व्दारा मणि और सुवर्ण का एक सूर्य विमान बनवाकर उसमें कांतियुक्त सुन्दर जिनमंदिर बनवाया तथा शास्त्रोक्त विधि से भक्तिपूर्वक आष्टान्हिक, चतुर्मुख, रथावर्त, सर्वतोभद्र तथा कल्पवृक्ष नाम की महापूजाएं कीं।

प्रश्न ३५-सूर्य उपासना की परम्परा कब से शुरू हुई?

उत्तर -आनंद महाराज को सूर्य की पूजा करते देख उनकी प्रामाणिकता से देखा-देखी अन्य लोग भी स्वयं भक्तिपूर्वक सूर्यमंडल की स्तुति करने लगे। इस लोक में उसी समय से सूर्य की उपासना चल पड़ी है।

प्रश्न ३६-आनन्द महाराज को वैराग्य किस निमित्त से हुआ?

उत्तर -उन्हें एक समय दर्पण में मुख अवलोकन करते ही मस्तक पर एक धवल केश दिखाई दिया और वे विषय-भोगों से विरक्त हो गए।

प्रश्न ३७-उन्होंने किन गुरु से दीक्षा ग्रहण की?

उत्तर -उन्होंने सागरदत्त मुनिराज के समीप जिनदीक्षा ग्रहण की।

प्रश्न ३८-अट्ठाईस मूलगुण कौन से हैं?

उत्तर -५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इन्द्रियनिरोध, ६ आवश्यक और ७ शेष गुण ये २८ मूलगुण होते हैं।

प्रश्न ३९-पंच महाव्रतों के नाम बताइये?

उत्तर -अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रह त्याग महाव्रत।

प्रश्न ४०-अहिंसा महाव्रत किसे कहते हैं?

उत्तर -सम्पूर्ण त्रस-स्थावर जीवों की विराधना का त्याग करना अहिंसा महाव्रत है।

प्रश्न ४१-सत्य महाव्रत किसे कहते हैं?

उत्तर -असत्य और अप्रशस्त वचन बोलने का सर्वथा त्याग करना सत्य महाव्रत है।

प्रश्न ४२-अचौर्य महाव्रत का क्या लक्षण है?

उत्तर -किसी की बिना दी हुई वस्तु ग्रहण करना अचौर्य महाव्रत है।

प्रश्न ४३-ब्रह्मचर्य महाव्रत का क्या लक्षण है?

उत्तर -स्त्री मात्र का त्याग कर देना ब्रह्मचर्य महाव्रत है।

प्रश्न ४४-परिग्रह त्याग महाव्रत की परिभाषा बताओ?

उत्तर -वस्त्र मात्र भी परिग्रह का त्याग कर देना परिग्रह त्याग महाव्रत है।

प्रश्न ४५-समितियाँ कितनी होती हैं परिभाषा सहित बताइये?

उत्तर -चार हाथ आगे जमीन देखकर चलना ईर्या समिति है, हित-मित-प्रिय वचन बोलना भाषा समिति, छ्यालिस दोष तथा बत्तीस अंतराय टालकर शुद्ध आहार लेना एषणा समिति, देख-शोधकर पुस्तक आदि रखना, उठाना आदाननिक्षेपण समिति और प्रासुक भूमि में मल-मूत्रादि विसर्जन करना उत्सर्ग समिति है।

प्रश्न ४६-पंचेन्द्रिय निरोध किसे कहते हैं?

उत्तर -स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र इन पांच इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना पंचेन्द्रिय निरोध है।

प्रश्न ४७-छह आवश्यकों के नाम बताओ?

उत्तर -सामायिक, स्तुति, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग ये षट् आवश्यक हैं।

प्रश्न ४८-सामायिक किसे कहते हैं?

उत्तर -साम्यभावपूर्वक त्रिकाल सामायिक करना सामायिक आवश्यक है।

प्रश्न ४९-स्तुति और वंदना में क्या अंतर है?

उत्तर -चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति करना स्तुति आवश्यक है और एक तीर्थंकर आदि की स्तुति करना वंदना है।

प्रश्न ५०-प्रतिक्रमण क्या है?

उत्तर -लगे हुए दोषों को दूर करना प्रतिक्रमण है।

प्रश्न ५१-प्रत्याख्यान व कायोत्सर्ग में क्या अन्तर है?

उत्तर -आगामी दोषों का त्याग करना या आहार आदि का त्याग करना प्रत्याख्यान है और योगमुद्रा आदि से स्थिर चित्त होकर कायोत्सर्ग, ध्यानादि करना कायोत्सर्ग आवश्यक है।

प्रश्न ५२-सात शेष गुण कौन-कौन से हैं?

उत्तर -वस्त्र मात्र का त्यागकर दिगम्बर रहना, केशलोंच करना, स्नान नहीं करना, दंतधावन नहीं करना, भूमिशयन करना, एक बार भोजन करना और खड़े होकर आहार लेना ये सात शेष गुण हैं।

प्रश्न ५३-तीर्थंकर प्रकृति बंध के लिए कारणभूत कौन सी भावनाएं हैं?

उत्तर -सोलहकारण भावना।

प्रश्न ५४-आनंद महाराज ने दीक्षा लेने के पश्चात् क्या किया?

उत्तर -आनंद महाराज २८ मूलगुणों का पालन करते हुए बारह प्रकार के तपश्चरण में तत्पर थे और २२ परिषहो को जीतते हुए उत्तरगुणों को भी धारण कर रहे थे। गुरु के पादमूल में बैठकर उन्होंने ग्यारह अंग तक श्रुत का अध्ययन किया। अनंतर तीर्थंकर नामकर्म के लिए कारणभूत सोलहकारण भावनाओं का चिंतवन किया।

प्रश्न ५५-सोलहकारण भावनाओं के नाम बताइये?

उत्तर -दर्शनविशुद्धि, विनयसम्पन्नता, शीलव्रतेष्वनतिचार, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, संवेग, शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तप, साधुसमाधि, वैय्यावृत्यकरण, अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुत भक्ति, प्रवचन भक्ति, आवश्यक अपरिहाणि, मार्ग प्रभावना एवं प्रवचन वात्सल्य ये १६ भावनाएं हैं।

प्रश्न ५६-दर्शनविशुद्धि भावना किसे कहते हैं?

उत्तर -पच्चीस मलदोष रहित विशुद्ध सम्यग्दर्शन को धारण करना दर्शनविशुद्धि है।

प्रश्न ५७-विनयसम्पन्नता का अर्थ बताओ?

उत्तर -देव, शास्त्र, गुरु तथा रत्नत्रय का विनय करना।

प्रश्न ५८-शीलव्रतेष्वनतिचार का मतलब बताइये?

उत्तर -व्रतों और शीलों में अतिचार नहीं लगाना।

प्रश्न ५९-‘अभीक्ष्णज्ञानोपयोग’ किसे कहते हैं?=

उत्तर -सदा ज्ञान के अभ्यास में लगे रहना।

प्रश्न ६०-संवेग का क्या अर्थ है?

उत्तर -धर्म और धर्म के फल में अनुराग होना।

प्रश्न ६१-शक्तितस्त्याग और शक्तितस्तप में क्या अन्तर है?

उत्तर -अपनी शक्ति के अनुसार आहार, औषधि, अभय और ज्ञानदान देना शक्तितस्त्याग और अपनी शक्ति को न छिपाकर अंतरंग-बहिरंग तप करना शक्तितस्तप है।

प्रश्न ६२-साधु-समाधि का लक्षण बताओ?

उत्तर -साधुओं का उपसर्ग आदि दूर करना या समाधि सहित वीरमरण करना।

प्रश्न ६३-वैय्यावृत्यकरण का क्या अर्थ है?

उत्तर -व्रती, त्यागी, साधर्मी की सेवा करना, वैय्यावृत्ति करना।

प्रश्न ६४-अर्हत्भक्ति और आचार्यभक्ति में क्या अंतर है?

उत्तर -अरहंत भगवान की भक्ति करना अर्हत्भक्ति और आचार्य की भक्ति करना आचार्यभक्ति है।

'प्रश्न ६५-बहुश्रुतभक्ति व प्रवचनभक्ति में क्या अन्तर है?

उत्तर -उपाध्याय परमेष्ठी की भक्ति करना बहुश्रुतभक्ति एवं जिनवाणी की भक्ति करना प्रवचन भक्ति है।

'प्रश्न ६६-मार्गप्रभावना किसे कहते हैं?

उत्तर -जैनधर्म का प्रभाव फैलाना।

'प्रश्न ६७-प्रवचन वात्सल्य किसे कहते हैं?

उत्तर -साधर्मीजनों में अगाध प्रेम करना प्रवचनवात्सल्य है।

'प्रश्न ६८-मुनिराज आनन्द के ऊपर उपसर्ग किसने किया?

उत्तर -एक समय मुनिराज क्षीर वन में प्रायोपगमन सन्यास लेकर प्रतिमायोग से ध्यान में लीन थे तभी कमठचर पापी भील के जीव एक सिंह ने दहाड़ कर मुनिराज पर धावा बोल दिया और उनके कंठ को पकड़कर तीक्ष्ण नखों से सारे बदन को छिन्न-भिन्न कर खा लिया।

'प्रश्न ६९-मुनि ने उस उपसर्ग को किस प्रकार सहन किया?

उत्तर -मुनिराज उस पशुकृत उपसर्ग को परम शांतभाव से सहन करते हैं और अनंत गुणों के निधान, आत्मा के चिंतन में अपना उपयोग लगा देते हैं और इस नश्वर भौतिक मल-मूत्र के पिंड स्वरूप देह को छोड़कर दिव्य वैक्रियक देह धारण कर लेते हैं।

'प्रश्न ७०-उन्होंने किस गति की प्राप्ति की?

उत्तर -वे अच्युत स्वर्ग के प्राणत नामक विमान में इन्द्र हो गए।

'प्रश्न ७१-सिंह का जीव मरकर कहाँ गया?

उत्तर -सिंह का जीव मरकर नरक गया।