083.जंबूद्वीप स्थल में एक वर्ष तक विधान

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जंबूद्वीप स्थल में एक वर्ष तक विधान।

एक वर्ष तक विधान-

जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति का सारे भारत में भ्रमण होने से उसमें बोली लेने वाले यहाँ आकर ‘प्रतिष्ठा के समय सुमेरु पर्वत की पांडुक शिला पर भगवान का अभिषेक करेंगे’, इसका जोर-शोर से प्रचार हुआ था अतः सर्वकार्य एवं महान् प्रतिष्ठा का कार्य निर्विघ्न संपन्न हो, इस भाव से मैंने यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर विधि-विधान का आयोजन एक वर्ष से अधिक तक चलवाया था। चैत्र शुक्ला १५, १५ अप्रैल १९८४ से विधान शुरू हुआ। सर्वप्रथम माधुरी ने शांति विधान करके ११ दिन तक तीस चौबीसी विधान किया पुनः पंचपरमेष्ठी, नवदेवता, सिद्धचक्र आदि विधान आगे वैशाख शुक्ला १, दिनाँक २१ अप्रैल १९८५ तक चलते रहे हैं और जाप्य भी चलती रही हैं। इसमें विद्यापीठ के विद्यार्थियों का बहुत बड़ा सहयोग रहा है। रत्नमती माताजी की समाधि के अनन्तर मैंने अपने उपयोग को आर्तध्यान से हटाने के लिए जम्बूद्वीप पूजा, हस्तिनापुर पूजा, भगवान् आदिनाथ पूजा आदि पूजाएँ बनार्इं। प्रतिष्ठा में ज्ञानज्योति के इंद्रों द्वारा अभिषेक के ‘कलशपत्रक’ आदि बनवाने के कार्य में संलग्न हो गई।

'उ.प्र. मुख्यमंत्री का आगमन-

उ.प्र. के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी के, यहाँ मेरे दर्शनार्थ आने की शाम को सूचना मिली। रात्रि में ही यहीं जम्बूद्वीप के पास खेत में हेलीपैड बनवाया गया। ४ मार्च १९८५, फाल्गुन शुक्ला १२ को मध्यान्ह १२.२५ पर कैलाशचंद टिकैतनगर वाले हेलीकॉप्टर से मुख्यमंत्री जी के साथ आये। मुख्यमंत्री जी यहाँ जम्बूद्वीप आदि के दर्शन कर मेरे पास आये। प्रतिष्ठा को बड़े समारोह से मनाने के लिए चर्चायेें की। मेरा आशीर्वाद लिया। लगभग ४ घंटे यहां ठहरे थे। इसके बाद उनके आदेश से १४ अप्रैल १९८५ को उ.प्र. मंत्री प्रो. वासुदेव सिंह मेरठ जिले के अनेक अधिकारी वर्ग को साथ लेकर यहाँ आये। त्रिमूर्ति मंदिर के हॉल में मीटिंग हुई। शासन द्वारा सहयोग पर बारीकी से विचार-विमर्श हुआ। मेरा आशीर्वाद लेकर उन्होंने हर एक कार्यों में अधिकारीवर्ग को लगा दिया।

शान्ति मंत्र जाप्य-

इस प्रतिष्ठा की निर्विघ्न समाप्ति हेतु यह मंत्र भी छपाया गया था जिसे ज्ञान ज्योति में वितरित करते थे, सम्यग्ज्ञान में भी छपा दिया था। हजारों लोगों ने इस शांतिमंत्र को जपा था।

मंत्र-‘‘ॐ ह्रीं अर्हं असिआउसा नमः चतुर्विधसंघस्य सर्वलोकस्य च शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा।’

जम्बूद्वीप जिनबिंब प्रतिष्ठापना महोत्सव-

२८ अप्रैल से २ मई, तिथि वैशाख शुक्ला ८ से १२ तक , सन् १९८५ में ‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’ भ्रमण को पूर्ण कर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का आयोजन विशाल स्तर पर किया गया। यह महोत्सव वैशाख शुक्ला २, २२ अप्रैल से ही प्रारंभ हुआ था। इसके फोल्डर, पोस्टर, कुमकुम पत्रिका आदि छपाकर सारे भारत में इसका व्यापक प्रचार किया गया था।

इसमें २६ से २८ अप्रैल तक त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का भी आयोजन किया गया था।

मुनिसंघ आगमन और झंडारोहण-

सन् १९८३ से ही संघ के मोतीचन्द, रवीन्द्रकुमार, माधुरी और अन्य संस्थान के पदाधिकारी आचार्यश्री धर्मसागरजी के पास जा-जाकर यहाँ पधारने की प्रार्थना करते रहे थे। कु. माधुरी १४ फरवरी को यहाँ से निकलीं, दिल्ली से किशनगढ़ पहुँचीं। अनुनय-विनय के बाद आचार्यश्री एकदम दयाद्र्र हो गये और झट से ही उठकर भगवान् के दर्शन कर हस्तिनापुर आने के लिए फुलेरा की ओर विहार कर दिया। १५ फरवरी का यह मंगल दिवस आज भी मुझे याद आ जाता है। आचार्यश्री संघ सहित फुलेरा तक आ गये। वहाँ पर आचार्यश्री के घुटनों ने जवाब दे दिया अतः उनका आना असंभव हो गया पुनः आचार्यश्री की आज्ञा से संघ के कतिपय मुनि और आर्यिकाएँ वहाँ से विहार कर यहां २२ अप्रैल को प्रातः पधारे। गाजे-बाजे के साथ मुनिसंघ का भव्य स्वागत किया गया।

'झंडारोहण समारोह-

इसी दिन वैशाख शु. २, २२ अप्रैल को प्रतिष्ठाचार्य ब्र.सूरजमल जी को आचार्य निमंत्रण दिया गया और उन्हें हाथी पर बिठाकर जुलूस से लाया गया। ब्रह्मचारी जी ने चतुर्विध संघ के समक्ष नारियल चढ़ाकर प्रतिष्ठा कराने के लिए आज्ञा मांगी। साधुओं के एवं मेरे मंगल आशीर्वाद प्रवचन हुए। रथयात्रा पूर्वक श्रीजी को पांडाल में लाकर नूतन वेदी में विराजमान किया गया।

अनंतर ४१ फुट ऊँचे ध्वजदंड में बंधे हुए झंडे का मंत्रोच्चारणपूर्वक श्री निर्मलकुमार सेठी ने एवं मुख्य अतिथि उ.प्र. के आबकारी मंत्री प्रो. श्री वासुदेव सिंह ने झंडारोहण किया। भाषण के मध्य प्रो. वासुदेव सिंह ने कहा-

‘‘यहाँ हस्तिनापुर में कार्य का प्रारंभ हुआ है। यह ‘अथ’ है, ‘इति’ नहीं करना है। अपने को हर एक कार्य का ‘अथ’-शुभारंभ करना रहता है, ‘इति’-समापन नहीं।’’

सभी के समयोचित भाषण और साधुओं के मंगल आशीर्वाद हुए।

इसी दिन मध्यान्ह में एक बजे ‘नवदेवता विधान’ प्रारंभ किया गया। सायंकाल ४ बजे अंकुरारोपण विधि सम्पन्न हुई। प्रातः एवं मध्याह्न पांडाल में मुनियों एवं आर्यिकाओं के व रात्रि में विद्वानों के प्रवचन होते रहे।

२६ अप्रैल, वैशाख शु. ६-

इन्द्राणियों का जुलूस निकला। इस अवसर पर ये महिलाएँ विशेष रूप से छपायी गई केसरिया रंग की जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के बार्डर वाली साड़ियाँ पहने हुए सिर पर कलश लिए बहुत सुंदर दिख रही थीं। इन मंगल कलशों से प्रतिष्ठाचार्य ने जम्बूद्वीप में बनी हुई १८५ (एक सौ पचासी) नूतन वेदियों की शुद्धि की।

अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार-

यह सेमिनार २० नवम्बर १९८३ में ही करने का निर्णय लेकर तारीखें प्रसारित की गई थीं किन्तु ज्ञानज्योति भ्रमण और जम्बूद्वीप निर्माण के कार्यों की अधिकता होने से यह सेमिनार उस समय स्थगित कर दिया गया था और यह निश्चय किया गया था कि प्रतिष्ठा के दो दिन पूर्व से ही ये सेमिनार सम्पन्न किया जाये जिससे कि सेमिनार में पधारे प्रोफैसर एवं विद्वान् भी प्रतिष्ठा को देखने का लाभ ले सके। इस व्यवस्था के अनुसार उस दिन प्रातः ९ बजे मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति मूर्धन्य भाषाविद् प्रो. रमेश मोहन की अध्यक्षता में उ.प्र. शासन के वरिष्ठ मंत्री प्रो. वासुदेवसिंह ने दीप प्रज्ज्वलित कर सेमिनार का उद्घाटन किया। इस सेमिनार में अंतर्राष्ट्रीय गणित, इतिहास आयोग के प्रतिनिधि प्रो. राधाचरण गुुप्ता (रांची), प्रो. योशिमाशा मिचिवाकी गुन्मा विश्वविद्यालय जापान, प्रो. श्रीधर वाजपेयी (डीन-विज्ञान संकाय, रीवर्सस्टेट यूनिवर्सिटी नाइजीरिया) आदि अनेक प्रोफेसर पधारे थे। २६, २७ एवं २८ अप्रैल तक सभी सत्रों में सुचारू रूप से इन विद्वानों ने जैन गणित एवं तीन लोक पर अपने-अपने लेख पढ़े, अनेक चर्चायें हुर्इं और समय-समय पर उपस्थित होकर मैंने भी विद्वानों की समयोचित शंकाओं का समाधान किया।

२८ अप्रैल, वैशाख शु. ८-

श्री जे.के. जैन सांसद राज्यसभा की अध्यक्षता में, भारत सरकार के रक्षामंत्री श्री पी.वी. नरसिंहराव ने प्राचीन भारत की गणितीय उपलब्धियों की चर्चा करते हुए सेमिनार समापन की घोषणा की। अनंतर श्री निर्मलकुमार सेठी स्वागताध्यक्ष की अध्यक्षता में प्रो. ए.आर. किदवई, कुलाधिपति विश्वविद्यालय एवं भूतपूर्व राज्यपाल बिहार के मुख्य आतिथ्य में विद्वत् सम्मान समारोह किया गया। श्रीमान किदवई के समापन भाषण के उपरांत मैंने उद्बोधन एवं आशीर्वाद देकर सभा समापन की।

२७ अप्रैल, वैशाख शु. ७-

प्रतिष्ठाचार्य ने पांडाल में यागमंडल विधान, वास्तुविधान आदि कार्य संपन्न कराये। हस्तिनापुर में मंगल आगमन जिसका हुआ है, ऐसी ज्ञानज्योति के रथ में बैठने वाले इन्द्रों की बोलियाँ हुर्इं। यह ज्ञानज्योति ४ जून १९८२ को दिल्ली से प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के करकमलों से प्रवर्तित हुई थी और १०४५ दिनों तक संपूर्ण भारत की यात्रा करके यहाँ प्रवेश करने वाली थी।

२८ अप्रैल, वैशाख शु. ८-

इस मंगल दिवस, वैशाख शु. ८ को जंबूद्वीप ज्योति रथ के साथ-साथ, भगवान का रथ भी निकाला गया था जो कि भव्य जुलूस के साथ सेंट्रल टाउन से जंबूद्वीप तक आया। यहाँ से कुछ दूर आगे मैं भी ज्ञानज्योति के सामने पहुँची। हृदय हर्ष से आप्लावित हो रहा था। आज मैंने ४ जून १९८२ के बाद पुनः ज्ञानज्योति के दर्शन किये थे और उसकी शोभायात्रा में शामिल हुई थी।

भारत सरकार के केन्द्रीय रक्षामंत्री श्री पी.वी. नरसिंहराव हेलीकाप्टर से उतरकर श्री जे.के. जैन के साथ पहले मेरे स्थान पर आये और मंगल आशीर्वाद लिया। मैंने कुछ चर्चाएँ कीं, पुनः उन्हें कुछ सम्बोधन किया। अनंतर इन महानुभावों ने ज्ञानज्योति का स्वागत किया। तत्पश्चात् प्रतिष्ठा के विशाल पांडाल में सभा का आयोजन हुआ। अतिथियों के स्वागत और जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति से हुई उपलब्धि आदि के विषय में समयोचित भाषण हुए। श्री नरसिंहराव को रजत का ‘सुमेरु’ भेंट में दिया गया। इसी प्रकार जे.के. जैन, सांसद को भी रजत का सुमेरु भेंट में दिया गया।

'अखण्ड ज्योति स्थापना-

जम्बूद्वीप रचना के ठीक सामने ज्ञानज्योति के लिए एक गोल कमलाकार भवन बनवाया गया था। मंच से ये लोग वहाँ आ गये। यहाँ भवन के ठीक बीच में ज्ञानज्योति को प्रज्ज्वलित कराना था। उमड़ती भीड़ समूह में श्री जे.के. जैन के साथ रक्षामंत्री भी आ गये। मैंने जो प्रशस्ति बनायी थी, कु. माधुरी ने उसे पढ़ा और श्री पी.वी. नरसिंहराव ने एक स्विच दबाया, जिससे ज्योति जल उठी, जो सदा जलती ही रहेगी। उस समय ‘जंबूद्वीप ज्ञानज्योति’ की जयकार के नारे से सारा आकाशमण्डल गूूँज उठा। जो प्रशस्ति पढ़ी गई थी, सो यह है-

‘‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं आद्यानामाद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे हस्तिनापुरतीर्थक्षेत्रेऽस्मिन् पंचमकाले शतेन्द्रवंद्यप्रथमतीर्थंकर आदिब्रह्मणो भगवत्ऋषभदेवस्य परम्परायां अंतिमतीर्थंकर-देवाधिदेवभगवन्महावीर स्वामिनः सार्वभौमजिनशासने श्रीमूलसंघे दिगम्बर जैनाचार्य श्रीकुन्दकुन्दम्नाये सरस्वतीगच्छे, बलात्कारगणे चारित्रचक्रवर्तिआचार्यवर्यश्रीशांतिसागरमुनीन्द्रपरम्परायां तृतीयपट्टाधीश आचार्यशिरोमणि श्री धर्मसागरमहाराजसंघस्थमुनिआर्यिकादिसानिध्ये आचार्यचूड़ामणि-श्रीवीरसागरमहामुनेः शिष्यार्यिकारत्न श्रीज्ञानमतीमातुः सदुपदेशात् ससंघतत्सानिध्ये च मासोत्तममासे वैशाखमासे शुक्लपक्षेऽष्टम्यां तिथौ सूर्यवासरे इह भारतदेशे गणतंत्रशासने राष्ट्रपतिज्ञानीजैलसिंह प्रधानमंत्रीराजीवगांधीमहापुरुषस्य नेतृत्वकाले जे.के. जैनस्य (संसद सदस्य राज्यसभा) अध्यक्षतायां केन्द्रस्य रक्षामंत्रिणः श्री पी.वी. नरसिंहरावकरकमलाभ्यां ज्ञानज्योतिः प्रज्वाल्य तस्या-खण्डस्थापनां कारयामहे।

इदं ज्ञानज्योतिः सर्वजनाज्ञानांधकारं हरतु, सर्वत्र सदा शश्वत्कालं ज्ञानप्रकाशं वितरतु, देशे राष्ट्रे राज्ये सर्वग्रामे नगरे च शांतिं तुष्टिं पुष्टिं मंगलं च करोतु, इति स्वस्ति भवतु स्वाहा।’’

पुनः २८ अप्रैल को ही रात्रि में सौधर्म इन्द्र आदि की बोलियाँ हुर्इं। श्री त्रिलोकचंद कोठारी (कोटा) और उनकी धर्मपत्नी लाडाबाई ने भगवान ऋषभदेव के पिता-माता बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। यहाँ प्रतिष्ठा में विधिनायक मूर्ति भगवान ऋषभदेव की थी। सौधर्म इन्द्र बनने का पुण्ययोग श्रीनिवास जैन, नागौर वालों ने प्राप्त किया। रात्रि ११ बजे से प्रतिष्ठाचार्य ने दिक्कुमारियों द्वारा माता की सेवा के अभिनय कराये।

पुनः माता के १६ स्वप्न, उनका फल पूछना आदि क्रियाएँ दिखायीं। बाद में पिछली रात्रि में गर्भ कल्याणक क्रिया सम्पन्न हुई।

२९ अप्रैल, वैशाख शु. ९-

२९ अप्रैल को प्रातः भगवान ऋषभदेव का जन्म महोत्सव मनाया गया। उधर त्रिमूर्ति मंदिर में आजू-बाजू वेदियों में भगवान ऋषभदेव एवं भरत की प्रतिमाएँ ६ फुट की खड्गासन खड़ी हो गई थीं। इधर मंच पर इन्द्रादिकों द्वारा नृत्य आदि का कार्यक्रम शुरू हो गया। पश्चात् सौधर्मइन्द्र ने ऐरावत हाथी पर बैठकर भगवान को गोद में लेकर, पांडाल की तीन प्रदक्षिणा लगाई, अनन्तर जुलूस निकला।

यहाँ जंबूद्वीप स्थल के आसपास की विशाल भूमि पर मेले के अवसर पर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, आसाम, गुजरात, महाराष्ट्र आदि के नगर बसाये गये थे। छोलदारी और टेंटों में लगभग २५ हजार लोगों के ठहरने की व्यवस्था की गयी थी। उन मार्गों से होता हुआ जुलूस दिगम्बर जैन प्राचीन मंदिर के पास से होता हुआ लगभग १० बजे जंबूद्वीप स्थल पर आ गया। यहाँ सुमेरु पर्वत पर चढ़ने के लिए एक विशेष पैड के रूप में सीढ़ियों का निर्माण उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कराया गया था। इस ८४ पुâट ऊँचे सुमेरु पर हाथों में नारियल सहित कलशों को लेकर चढ़ते हुए इन्द्र-इन्द्राणियों का दृश्य देखते ही बनता था। वहाँ सुमेरु पर्वत पर पांडुकवन में, ईशान दिशा मेंं बनी हुई पांडुक शिला पर जन्मजात तीर्थंकर बालकस्वरूप जिनप्रतिमा का अभिषेक महोत्सव मनाया गया। इस जन्माभिषेक के समय हेलीकाप्टर से भक्त लोगों ने पुष्पवर्षा की थी।

मैंने अस्वस्थ शरीर होते हुए भी उमंग से पर्वत पर चढ़कर भगवान का जन्माभिषेक देखा था पुनः आकर आहार लिया था।

ज्ञानज्योति के इन्द्रों द्वारा अभिषेक-

‘‘ज्ञानज्योति के नगर-नगर में भ्रमण के अवसर पर इन्द्रों की बोलियाँ लेने वाले महानुभावों के पास हस्तिनापुर से ‘अभिषेक पास’ डाक द्वारा भेजे गये थे। उनके आधार पर समस्त इन्द्रों ने उसी दिन से प्रातः एवं मध्यान्ह अपनी-अपनी व्यवस्था के अनुसार प्रतिष्ठा से पूर्व भेजे गये ‘कलशपत्रक’ के अनुसार, कलशों को लेकर इस नूतन निर्मित सीढ़ियों से चढ़कर सुमेरु पर विराजमान भगवान का अभिषेक किया था। इस प्रकार अभिषेक करने वालोंं का इस प्रतिष्ठा में तांता ही लगा हुआ था। इस अभिषेक व्यवस्था को महेन्द्र कुमार जैन रानीवाला (कोटा) ने संभाला था।

'अधिवेशन-

इसी दिन मध्यान्ह में पांडाल में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान का अधिवेशन किया गया। सभा में मूड़विद्री के भट्टारक चारूकीर्ति जी ने अध्यक्ष पद ग्रहण किया। इस अधिवेशन में संस्थान एवं ज्ञानज्योति के कार्यकर्ताओं को प्रशस्ति-पत्र, स्वर्ण-पदक आदि भट्टारक जी के करकमलों से दिलाये गये एवं सम्मान किया गया।

रात्रि में भगवान का पालना झुलाना आदि कार्यक्रम हुए।

प्रसिद्ध गीतकार रवीन्द्र जैन बम्बई के गीत हुए पुनः जयपुर की ‘महिला जागृति संघ’ द्वारा ‘पुरुदेव नाटक’ का मंचन किया गया।

३० अप्रैल, वैशाख शु. १०-

३० अप्रैल को मध्यान्ह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त जी तिवारी हेलीकॉप्टर द्वारा हस्तिनापुर पधारे। सर्वप्रथम भगवान महावीर स्वामी का दर्शन कर मेरे स्थान पर आये। आशीर्वाद ग्रहण कर मंच पर पहुँचे। उनके साथ संसदीय राज्यमंत्री श्री हुकुमसिंह भी थे। सभा में इन अतिथियों के स्वागत के पश्चात् इन्हें जंबूद्वीप का प्रतीक रजत सुमेरु भेंट किया गया। मुख्यमंत्री जी से प्रतिष्ठाचार्य को रजत प्रशस्ति-पत्र भेंट में दिलाया गया।

पुनः श्री निर्मलकुमार सेठी ने कहा कि-

‘‘इस महोत्सव को सफल बनाने का मुख्य श्रेय ब्र. मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार को है। इन दोनों ने अपना जीवन समर्पण करके संस्थान को सर्वतोमुखी बनाया है अतः मुख्यमंत्री के करकमलों से इन दोनों को रजत प्रशस्ति-पत्र भेंट कराये गये।

ग्रंथ विमोचन-

मुख्यमंत्री ने ‘नियमसार प्राभृत’ ग्रंथ विमोचन कर मुझे समर्पित किया पुनः मेरे द्वारा अनुवादित एवं ज्ञानपीठ से प्रकाशित ‘मूलाचार’ ग्रंथ का विमोचन कर मुनिश्री निर्मलसागर जी एवं समस्त मुनिसंघ को भेंट में दिया। मुख्यमंत्री जी ने समयोचित बहुत अच्छा भाषण किया। अनन्तर भट्टारक चारुकीर्ति जी ने अपने भाषण में मेरी प्रशंसा करते हुए कहा- ‘‘माताजी केवल ज्ञानमती ही नहीं हैं, दर्शनमती हैं, चारित्रमती हैं, रत्नत्रय की प्रतिमूर्ति हैं। इनकी प्रेरणा से ही यह जंबूद्वीप रचना बनी है इत्यादि......।’’

उस समय मैं सोचने लगी-

‘‘आर्यिका पद में तो रत्नत्रय पूर्ण हो नहीं सकता है। भगवन् ! अगले भव में पुरुष पर्याय प्राप्त कर मैं रत्नत्रय को पूर्ण कर, रत्नत्रय की साक्षात् प्रतिमूर्ति बन जाऊँ, यही भावना जीवन भर बनी रहे, बस.....।’’

पुनः मैंने अपने प्रवचन में कुछ कन्नड़ की पंक्तियाँ बोलीं, कुछ मराठी में बोला और हिन्दी में प्रवचन एवं आशीर्वाद दिया। इस अवसर पर भारत के प्रत्येक प्रांत से अपार जन-समूह एकत्रित हुआ था। चूंकि जंबूद्वीप ज्ञानज्योति के सारे भारत भ्रमण में सर्वत्र गांव-गांव के लोगों ने इन्द्रों की बोलियां ली थीं एवं हस्तिनापुर में बन रही जंबूद्वीप रचना को देखने के भाव संजोये थे।

उत्तर प्रदेश में यह पहली प्रतिष्ठा थी जिसमें उत्तर, दक्षिण, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, आसाम, बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, हरियाणा आदि सभी प्रांत के नर-नारी भारी संख्या में आये हुए थे। मंच पर कार्यक्रम होने के बाद मुख्यमंत्री जी जंबूद्वीप के सामने आये। वहाँ पर लगाये गये शिलालेख का अनावरण कर उद्घाटन किया पुनः पश्चिम दिशा में बने हुए ‘विद्युत भवन’ में पहुँचे। वहाँ पर स्विच दबाकर जंबूद्वीप के चारों ओर बने हुए लवणसमुद्र के लाइट फव्वारे का उद्घाटन किया। बटन दबाते ही एक सेकेन्ड में सारे फव्वारे चलने लगे और लाइटें जल उठीं। उस समय का यह दृश्य बहुत ही सुन्दर लगा था। भोजनोपरांत मुख्यमंत्री जी अपने हेलीकाप्टर से रवाना हो गये।

'राज्याभिषेक एवं दीक्षाकल्याणक-

इसके बाद मध्यान्ह ३ बजे भगवान ऋषभदेव का राज्याभिषेक हुआ पुनः नीलांजना के नृत्य से प्रभु को वैराग्य दिखाकर, लौकांतिक देवों द्वारा स्तुति का दृश्य दिखाया गया। अनन्तर भगवान को पालकी में लेकर दीक्षा के लिए ले जाने का समारोह हुआ। इसके बाद वटवृक्ष के नीचे भगवान की दीक्षा विधि सम्पन्न हुई।

रात्रि में अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महासभा का खुला अधिवशेन हुआ। इसके बाद रात्रि में रोहतक के जैन कला केन्द्र युवा परिषद द्वारा ‘वैराग्य की ओर’ नाम से नृत्य नाटिका प्रस्तुत की गई, जिसे सभा की खचाखच भीड़ के लोगों ने देखा और सराहा।

१ मई, वैशाख शु. ११-

प्रातः ९ बजे भगवान के आहार का दृश्य दिखाया गया पुनः मध्यान्ह १ से २ तक मंच पर अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद का अधिवेशन हुआ। इधर प्रतिष्ठाचार्य गर्भागार के अंदर जिन प्रतिमाओं को सूरिमंत्र मुनिश्री निर्मलसागर जी द्वारा दिला रहे थे। वहां पर उस समय सभी मुनि संघ उपस्थित था। उस समय मैं भी वहाँ जाकर बैठ गई और देखती रही कि प्रतिष्ठाचार्य मंत्रों द्वारा पाषाण की मूर्तियोेंं की प्राण-प्रतिष्ठा करके भगवान बना रहे हैं, यह मंत्रों की शक्ति और महिमा अचिन्त्य है।

'समवसरण की रचना-

यहाँ मंच पर प्रतिष्ठाचार्य ने समवसरण की बारह सभा का दृश्य बनवाया। अंदर गंधकुटी में चारों तरफ मुख करके चार प्रतिमाएँ विराजमान कर दीं एवं चारों दिशाओं में एक-एक मानस्तंभ खड़े करके उनमें भी प्रतिमाएँ विराजमान कर दीं। बारह सभा में-

१. गणधर मुनि वर्ग

२. कल्पवासिनी देवियाँ

३. आर्यिका-श्राविका

४. ज्योतिर्वासी देवियाँ

५. व्यंतर देवियाँ

६. भवनवासी देवियाँ

७. भवनवासी देव

८. व्यंतर देव

९. ज्योतिर्वासी देव

१०. कल्पवासी देव

११. चक्रवर्ती आदि मनुष्य और

१२. तिर्यंचगण।

इस प्रकार बारह सभाओं में लोग बैठ गये। पर्दा खुलते ही सभा से जय-जयकारे के नारे लगने शुरू हो गये। कुछ क्षण बाद भगवान की दिव्यध्वनि को बतलाते हुए सबसे बड़े मुनि श्री निर्मलसागर जी ने मंगलाचरण किया, मुनिश्री वर्धमान सागरजी (दक्षिण वालों) ने प्रवचन किया एवं बाद में मेरा प्रवचन हुआ, जिसमें मैंने समवसरण रचना की महिमा बतलाई।

गणिनीपद से विभूषित-

समवसरण विघटन के पश्चात् मेरी प्रमुख शिष्या आर्यिका जिनमती ने आगे होकर गणिनीपद की क्रियायें करवायीं, पुनः नूतन पिच्छी, कमण्डलु और शास्त्र देकर ‘गणिनीपद’ से मुझे विभूषित कर उपस्थित सभी आर्यिकाओं ने ‘वंदामि’ किया और श्रावक-श्राविकाओं ने ‘गणिनी आर्यिकारत्न ज्ञानमती माताजी की जय’ बोलते हुए भक्ति प्रदर्शित की। इसी दिन रात्रि में शास्त्री परिषद का अधिवेशन हुआ।

२ मई, वैशाख शु. १२-

प्रातः पांडाल में मंच पर कैलाशपर्वत का दृश्य बनाया गया और वहाँ से भगवान को मोक्ष जाने के बाद इन्द्रों द्वारा, खासकर अग्निकुमार द्वारा, मुकुट से अग्नि निकालकर भगवान के शरीर की संस्कारस्वरूप हवन विधि की गयी पुनः निर्वाण कल्याणक की क्रियाएँ की गयीं।

धर्मध्वज स्थापना-

जम्बूद्वीप के ठीक सामने पूर्व में तथा इधर त्रिमूर्ति मंदिर के ठीक सामने उत्तर में ऊँचे ध्वजदण्ड में ध्वजा लगाई गई थी। मंत्रोच्चारणपूर्वक यह धर्मध्वजा चढ़ाई गई। श्री रमेशचंद जैन पी.एस. जैन मोटर्स दिल्ली वालों ने यह धर्मध्वजा फहरायी। उस समय जैन धर्म की जय-जयकार से सारा नभमण्डल गूँज उठा। उमड़ती भीड़ को नियंत्रित करने में जयपुर के कुशल स्वयंसेवकों की मैंने सभा में प्रशंसा की। धर्मध्वज का महत्त्व बतलाया। आज यह धर्मध्वज यहाँ हस्तिनापुर जंबूद्वीप में मेघपटल को छूता हुआ सदा लहराता रहता है और भव्य जीवों को मानों यहाँ बुलाता ही रहता है। यह हमेशा-हमेशा के लिए उच्च गगन में फहराता रहे, कभी झुके नहीं, यह मेरी मंगल कामना है।

'जम्बूद्वीप मेंं जिनबिम्ब विराजमान हुए-

मोक्ष कल्याणक के पश्चात् जंबूद्वीप रचना के अंदर वहाँ विराजमान होने वाली जिनप्रतिमाओं को हाथ में लेकर मस्तक पर रखकर उन-उन के दातारगण वहाँ पहुँच गये। पांडाल से लेकर जंबूद्वीप रचना तक महाराष्ट्र के स्वयंसेवक मधुर वाद्य बजा रहे थे। चतुर्विध संघ के मंगल सानिध्य में जिनप्रतिमाएँ विराजमान की जा रही थीं। कहीं मुनिश्री निर्मलसागर जी, कहीं मुनिश्री विपुलसागर जी आदि अपने हाथ से वेदी में अचलयंत्र रखकर जिनप्रतिमाएँ विराजमान करवा रहे थे। कहीं मैं वेदी में यंत्र रखकर, कहीं जिनमती आदि आर्यिकायें वेदी में यंत्र रखकर, जिनप्रतिमाएँ विराजमान करा रही थीं।

रथयात्रा-

जिनबिम्ब स्थापना के अनन्तर रथयात्रा निकाली गयी। इसमें श्रीजी को विराजमान करने के बाद दिल्ली के प्रेमचंद जैन दाने, वालों ने रथ को चलाने का सौभाग्य प्राप्त किया। रथयात्रा समारोह सम्पन्न होने के बाद वापसी में श्रीजी की प्रतिमा को महावीर मंदिर में विराजमान किया गया।

'समापन समारोह-

२ मई को मध्यान्ह में मंत्री प्रो. वासुदेव सिंह की अध्यक्षता में समापन समारोह मनाया गया। प्रतिष्ठा समिति के महामंत्री रवीन्द्र कुमार ने समस्त कार्यकर्ताओं को, प्रशासन के समस्त अधिकारियों को तथा समस्त स्वयंसेवक मंडलों को एवं समस्त अन्य सहयोगियों को प्रो. वासुदेव सिंह के करकमलों से जम्बूद्वीप का प्रतीक प्रशस्ति-पत्र एवं रजत पदक दिलाया एवं सभी महानुभावों का आभार व्यक्त किया।

मैंने प्रतिष्ठा समिति के अध्यक्ष मोतीचन्द जैन, कार्याध्यक्ष गणेशीलाल रानीवाला एवं महामंत्री रवीन्द्र कुमार जैन को बहुत-बहुत आशीर्वाद देकर उनके कार्यों की सराहना की एवं सभी कार्यकर्ताओं को मंगल आशीर्वाद दिया।

सम्मान के पश्चात् प्रो. वासुदेवसिंह ने प्रतिष्ठापना महोत्सव के समापन की घोषणा करते हुए कहा-

‘‘महोत्सव संपन्न होने का अर्थ यह नहीं है कि जम्बूद्वीप के कार्यों की ‘इति’ हो गई। यहाँ की कमेटी द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ जंबूद्वीप मेला आयोजित किया जावे। उत्तर प्रदेश सरकार मेले में पूर्ण सहयोग देती रहेगी।’’

मैंने पहले ही उनसे अहिंसा दिवस की घोषणा के बारे में चर्चा की थी। उसी के अनुसार उन्होंने उ.प्र. शासन की ओर से वर्ष के ८ दिवस ‘अहिंसा दिवस’ के नाम से मनाने की घोषणा की।

१. चैत्रवदी नवमी-ऋषभ जयंती

२. चैत्र शुक्ला ९-रामनवमी

३. चैत्र शुक्ला १३- महावीर जयंती,

४. वैशाख शु. ३-अक्षयतृतीया,

५. आश्विन शु. १५-शरद पूर्णिमा,

६. दो अक्टूबर-गांधी जयंती,

७. वैशाख शु. पूर्णिमा-बुद्धजयंती,

८. फाल्गुन कृ. १४-शिवरात्रि।

इन आठ दिनों में उत्तर प्रदेश शासन की ओर से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में मद्य-माँस की दुकानें बंद रहेंगी। इस घोषणा का सभा में भारी करतल ध्वनि से स्वागत किया गया।

ज्ञानज्योति वर्ष घोषणा-

समारोह के महामंत्री रवीन्द्र कुमार ने कहा कि जंबूद्वीप ज्ञानज्योति की यहाँ अखंड स्थापना हुई है। दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की घोषणा के अनुसार समस्त भारतवासी २८ अप्रैल १९८५ से २८ अप्रैल १९८६ तक ‘ज्ञानज्योति वर्ष’ मनायें। इस ज्ञानज्योति वर्ष के कार्यक्रम सभी को यहाँ से सूचित किये जायेंगे। जिनको वर्ष में निम्न दिवसों में विशेष समारोह से मनाने का निर्णय लिया गया था। यथा-

(१) ४ जून १९८६ को ज्ञानज्योति प्रवर्तन दिवस समारोह मनाइये। ऐसे ही

(२) भादों शुदी २-आचार्य शांतिसागर जी महाराज का सल्लेखना दिवस मनाइये।

(३) आश्विन सुदी १५ शरद पूर्णिमा दिवस मनाइये।

(४) पौष सुदी १० भगवान शांतिनाथ का केवलज्ञान दिवस मनाइये।

(५) वैशाख सुदी ३ अक्षय तृतीया दिवस मनाइये। इन पाँच दिनों में विशेष सभा आदि का आयोजन कीजिये।

'मंगल आशीर्वाद-

समापन के अवसर पर मैंने अपने आशीर्वादात्मक प्रवचन में कहा-

‘‘११ वर्ष पूर्व मैंने यहाँ जिस बीज को आरोपित किया था, आज वह वृक्ष रूप में फलित हुआ है, जिसे देखकर मुझे अपार हर्ष हो रहा है। भारतवर्ष की समस्त जैन समाज के योगदान से यह कार्य संपन्न हुआ है, मैं तो केवल निमित्तमात्र हूँ। उसके साथ मुझे गौरव है कि मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार जैसे दो शिष्य मुझे मिले, जिनके बल पर आज सारे कार्य सम्पन्न हुए। इन्हीं के साथ दिल्ली के अनेक महानुभाव लाला श्यामलाल जी ठेकेदार एवं गणेशीलाल जी रानी वाला (कोटा) आदि जुड़े हुए हैं। इन सभी भक्तों से मैंने जो भी कार्य कहा, इन लोगों ने संकोच नहीं किया। यदि मैंने अर्धरात्रि में भी इन्हें कार्य सौंपा, तो इन्होंने सहर्ष किया है, तभी आज यह संस्थान चतुर्मुखी प्रगतियों का केन्द्र बना हुआ है। ज्ञानज्योति भ्रमण के द्वारा सारी समाज का जो असीम सहयोग प्राप्त हुआ है, वह अविस्मरणीय रहेगा।’’

पुनः मैंने सभी को मंगल आशीर्वाद दिया और कहा-आप सभी के भावों में सदा धर्म की वृद्धि होती रहे, धर्मात्माओं के प्रति वात्सल्य भाव रहे ताकि धर्म, समाज और राष्ट्र एकता के सूत्र में बंध सके।

अनंतर भगवान ऋषभदेव के जयकारे के साथ समापन की घोषणा हुई। बाद में प्रतिष्ठाचार्य ने २२ अप्रैल को जिस ध्वजा का आरोहण कराया था, उस स्थान पर जाकर मंत्रोच्चारणपूर्वक उन्हीं प्रो. वासुदेव सिंह के द्वारा उस ध्वजा का अवरोहण किया पुनः प्रो. वासुदेव ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये। इस प्रकार प्रतिष्ठा का महान् कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

२ मई १९८५ के दिन ही मुनि संघ ने विहार कर दिया था। मात्र आर्यिका जिनमती जी और आर्यिका शुभमती जी यहाँ रुक गई थीं।

प्रतिष्ठा में विशेष सहयोग-

इस प्रतिष्ठापना समारोह में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज, परमपूज्य आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज, आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज, आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज आदि आचार्यों के आशीर्वाद प्राप्त हुए थे। मूडविद्री के भट्टारक चारुकीर्ति जी एवं लातुर के भट्टारकजी ने महोत्सव में पधारकर जम्बूद्वीप के कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद दिया था।

प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी सूरजमलजी, सहयोगी प्रतिष्ठाचार्य ब्र. कजोड़मल जी, पं. श्रीलाडलीप्रसाद जी तथा पं. धर्मचंद जी (तिवरी वाले) आदि ने विधिविधान के कार्यों को सुचारू किया एवं कराया।

उत्तर प्रदेश शासन का सहयोग विशेष होने से मुख्यमंत्री तिवारी जी, प्रो. वासुदेव सिंह, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री यहाँ पधारे। साथ ही मेरठ के जिलाधिकारी श्री एल.आर.सिंह, आयुक्त श्री गोस्वामी जी तथा अन्य विभागीय लोगों ने बहुत कुछ सहयोग दिया। केन्द्रीय सरकार के सहयोगी श्री जे.के. जैन एवं रक्षामंत्री श्री पी.वी. नरसिंहराव आये। इन्होंने ज्ञानज्योति की अखंड स्थापना की।

सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता श्री ब्रजभूषण कुमार एवं अधिशासी अभियंता श्री एम.पी. खरे ने शासन के आदेशानुसार ८४ फुट ऊँचे सुमेरु पर चढ़ने के लिए लोहे के पाईप की सीढ़ियों का निर्माण कराया।

सुरक्षा के लिए पुलिस एवं होमगाडर्स दोनों विभागों का सराहनीय सहयोग रहा है।

धार्मिक संस्थानों के स्वयंसेवकों के भी बहुत कुछ सहयोग रहे हैं। इन सभी कारणों से यह प्रतिष्ठा उत्तर प्रदेश में इस शताब्दी में अभूतपूर्व ही रही है।

इस प्रतिष्ठा की महती विशेषताओं को देखकर कुछ ईष्र्यालुजनों ने अनेक विघ्न उपस्थित करने चाहे किन्तु इतने महान कार्य में वे सब नगण्य रहे हैं अतः उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है। चूंंकि गुलाब के फूल में कांटे तो रहते ही हैं लेकिन फूल की सुगंध में मग्न हुए लोग उनकी परवाह नहीं करते हैं।