09.एकत्वाधिकार का वर्णन

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एकत्वाधिकार का वर्णन



।चतुर्थ अधिकार।।

(१)
जो परमात्मा चैतन्यरूप आनंद स्वरूप कहा मुनि ने।
जो नित्य और शाश्वत आत्मा है रहित व्रुâधादिक कर्मों से।।
ऐसा परमात्मा मुझे और सबको सुख शांति प्रदान करे।
एकत्व अधिकार के वर्णन करने की भी शक्ति प्रदान करे।।
(२)
जो पुद्गल धर्म अधर्म और आकाश काल से भिन्न सदा।
ज्ञानावरणादिक अष्टकर्म से भी जो रहे विरक्त सदा।।
जिसका देवेन्द्र और सब जन नित पूजन करते रहते हैं।
ऐसी चैतन्यरूप आत्मा का हम नित वंदन करते हैं।।
(३)
जिस आत्मा को अज्ञानीजन अनुभव भी नहिं कर सकते हैं।
उसको ज्ञानीजन ज्ञानचक्षु से नित अवलोकन करते हैं।।
जो सब पदार्थ में सारभूत ऐसी चैतन्य आत्मा को।
मैं नमस्कार नित करता हूँ साष्टांग नमा कर मस्तक को।।
(४)
यद्यपि प्रत्येक प्राणियों के तन में यह आत्मा राज रही।
फिर भी अज्ञान अंधेरे में जिन-जिन की आत्मा ढ़की हुई।।
वे नहीं जानते हैं कुछ भी बस बाह्य पदार्थों में भ्रमते।
चैतन्य उसे ही मान रहे भ्रम में ही यहाँ वहाँ फिरते।।
(५)
कई एक मनुष्य अनेक शास्त्र पढ़कर भी समझ नहीं पाते।
अपनी आत्मा की शक्ती को िंकचित भी जान नहीं पाते।।
जैसे लकड़ी में अग्नि छुपी पर अज्ञानी नहिं जान सके।
वैसे ही तीव्रमोह वश से निज आत्मा नहिं पहचान सके।

(६)
प्रबल मोहनी कर्म से अज्ञानी जो जीव।
नहीं मानते नहिं सुने करुणाकर कथनी।।
(७)
जन्मांध मनुज जब हाथी के इक भाग को ही स्पर्श करे।
उस रूप हस्ति को समझ उसे वह लंबा गोल ही समझ रहे।।
वैसे ही मंदबुद्धि प्राणी एकान्त स्वरूप वस्तु माने।
जबकी इक वस्तु के कई रूप अनेकांतवाद ऐसा माने।।
(८)
कई एक मनुज को कहीं से कोई थोड़ा सा भी ज्ञान मिले।
विद्वान मानकर अपने को सब जन को मूरख मान रहे।।
इस अहंकार के वश होकर विद्वानों की संगति न करे।
आचार्य हमें समझाते हैं इस मद से बड़ी विपत्ति मिले।।
(९)
संसार दुख में पंâसे हुए प्राणीउद्धारक धर्म एक।
विपरीत रूप कर दिया गया स्वार्थी दुष्टों से है अनेक।।
जो भ्रमित करे लोगों को वह ही धर्म कुपथ पर ले जाता।
इसलिए परख कर ग्रहण करो जिनधर्म ही सच्चा सुखदाता।।
(१०)
जो वीतराग सर्वज्ञ के मुख से कहा धर्म ही सच्चा है।
प्रामाण्य पुरुष के वचनों से ही गुण प्रमाणता प्रगटा है।।
इसलिए वीतरागी अथवा सर्वज्ञ प्रमाणिक कहे गए।
उनके द्वारा ही कहा गया यह धर्म प्रमाणिक भूत हुए।।
(११)
सब बाह्य वस्तु का सब जीवों के संग संबंध सदा रहता।
पर बाह्य विषय से भिन्न रूप अंतरंग ज्ञान जिसको रहता।।
वह ज्ञानानंद स्वरूप चित्यचैतन्य ज्ञान अति दुर्लभ है।
इसलिए भव्यजीवों ! इसका ही अनुभव करो मिले फल है।
(१२)
जिन पंचलब्धि की सामग्री से पात्र विशेष है बन जाता।
वह भव्य जीव इन लब्धि से है रत्नत्रय धारण करता।।
ये करण क्षयोपशम अरु विशुद्धि प्रायोग्य देशना कहलाती।
यह पाँच लब्धियाँ रत्नत्रयधारी को मुक्ती दिलवातीं।।
(१३)
सम्यग्दर्शन अरु ज्ञान चरित्र तीनों मुक्ती के कारण हैं।
यह मोक्ष प्राप्त करवाता है मुक्ती ही सुख का कारण है।।
इसलिए इसी को पाने का हर क्षण प्रयत्न करना चहिए।
सच्चा सुख यदि पाना चाहो रत्नत्रय को धरना चहिए।।
।।सम्यग्दर्शन का स्वरूप।।
(१४)
आत्मा का तो निश्चय सम्यग्दर्शन है ज्ञानी आत्मा का।
तो सम्यग्ज्ञान कहाता है रत रहना सदा आत्मा का।।
निश्चल रीति से रहना ही सम्यग्चारित्र कहाता है।
तीनों मुक्ति के आश्रय है रत्नत्रय यही कहाता है।।
(१५)
अथवा विशुद्ध निश्चयनय से चैतन्य रूप जो आत्मा है।
वह एक अखंड पदार्थ रूप निंह भेदरूप परमात्मा है।।
रत्नत्रय आदिक भेदों का उसमें कोई अवकाश नहीं।
इसलिए आत्मा के संग में रत्नत्रय का कुछ काम नहीं।।
(१६-१७)
यह आत्मा तो निश्चयनय से शुद्धात्मा जब तक नहीं बना।
तब तक प्रमाण नय अरु निक्षेप है भिन्न भिन्न सब रूप वहाँ।।
व्यवहार नयापेक्षा इसमें नय और प्रमाण निक्षेप दिखे।
निश्चयनय से यह एक नित्य चैतन्य रूप अनुभवन करे।।
(१८-१९)
जो जन्मरहित है परम शांत और एक समस्त कर्म विरहित।
अपने को अपने में जाने ठहरे अपने में स्थिरचित।।
बस वही मोक्ष जाने वाला और वही मोक्ष सुख प्राप्त करे।
वह ही अर्हत अरु जगन्नाथ उसको प्रभु ईश्वर आप्त कहें।।
(२०)
यह आत्मस्वरूप तेज जो है वह केवलज्ञान व दर्शरूप।
और अनंतसुक्ख स्वरूप कहा जिसने भी जाना इसी रूप।।
उसने ही सब कुछ जान लिया और देख लिया जिसने ये तेज।
उसने ही सब कुछ देख लिया सुन लिया उसी को मिले देव।।
(२१)
जानने योग्य यह आत्मा ही सुनने के योग्य यही इक है।
और वही देखने योग्य कही उससे सब भिन्न वस्तुएँ हैं।।
नहिं ज्ञान योग्य नहिं श्रवण योग्य नहिं दृष्टिगम्य कोई वस्तू।
ऐसा आचार्य कहें सबसे निज में निज के रमने हेतू।।
(२२)
गुरू का उपदेश श्रवण करके जो भव्य कृतार्थ हो जाते हैं।
अरु शास्त्रों का अध्ययन किया वैराग्य प्राप्त कर जाते हैं।।
ऐसे योगीजन इन सबको पाकर अपने को धन्य कहें।
बस एक यही चैतन्यरूप बाकी सब बाह्य वस्तु समझे।।
(२३)
जिस प्राणी ने प्रसन्नचित से इस आत्मा की वार्ता सुन ली।
वह भव्य जीव निश्चय से ही बनता मुक्ती का पात्र वही।।
इसलिए मोक्ष अभिलाषी को आत्मानुभवन करना चाहिए।
फिर मोक्ष नियम से जाएगा नहिं ज्यादा दिन जग में रहिए।।
(२४)
जो शुद्धात्मा में लीन हुआ प्राणी परब्रह्मात्मा जाने।
वह पुरुष परम ब्रह्मा स्वरूप ही निश्चय से ऐसा माने।।
इसलिए कहा है भव्यों से परमात्मा का नित ध्यान करे।
तब शीघ्र मोक्ष मिल जाएगा जो गुरुओं पर श्रद्धान करे।।
(२५)
बाकी जो अन्य पदार्थों से संबंध आत्मा का होता।
आचार्य हमें समझाते हैं उससे ही कर्मबंध होता।।
लेकिन जब वह एकतारूप शान्ती में स्थिर रहता है।
तब परपदार्थ से मोह त्याग वह मुक्तिरमा को वरता है।।
(२६)
जिस तरह पवन के थमने से सागर में लहरें थम जाती।
बस उसी तरह यह आत्मा भी कर्मों से जब है छुट जाती।।
तब सभी विकल्प रहित होकर केवलज्ञानी बन जाती है।
वह ही तब शांत अवस्था की धारी आत्मा बन जाती है।।
(२७)
सम्यग्दृष्टी विचार करता संयोग से वस्तु जो मुझे मिली।
वह सब मुझसे है पृथक््â तथा मुझको जो ऐसी बुद्धि मिली।।
संयोग से पैदा हुई वस्तु के त्याग से मैं हूँ मुक्त सदा।
मेरी आत्मा में किसी तरह के कर्मों का संबंध न था।।
(२८)
शुभ अशुभ कर्मरूपी राक्षस मेरा बिगाड़ क्या कर लेंगे।
यदि रागद्वेष का ही संबंध मेरी आत्मा संग ना होंगे।।
जब त्याग रूप मंत्रों से कीलित मेरी यह आत्मा होगी।
तब कर्म निशाचर से लड़ने की मंत्रों की शक्ती होगी।।
(२९)
जो रागद्वेष के कारण मिलने पर भी उसका त्याग करें।
ऐसे सज्जनगण कहलाते पर बिन कारण जो राग करें।।
वे प्राणी सर्व अनिष्टों को खुद ही आमंत्रित करते हैं।
इसलिए राग और द्वेष तजो इससे बस दुख ही मिलते हैं।।
(३०)
मन वचन काय की चेष्टा से चेष्टानुसार ही कर्म बंधे।
कर्मानुसार ही वृद्धी को भी प्रतिदिन प्राप्त किया करते।।
इसलिए मोक्ष के अभिलाषी मन वचन काय से भिन्न एक।
आत्मा की ही कर उपासना चैतन्यरूप जो कही एक।।
(३१)
आत्मा का कर्मों से मिलाप इसको ही द्वैत कहा मुनि ने।
इस द्वैत से निश्चय से होता है यह द्वैताद्वैत से मुक्ति मिले।।
जिस तरह लोह से लोहपात्र सोने से स्वर्णपात्र बनते।
बस उसी तरह से कर्मों के अनुसार जगत में हैं भ्रमते।।
(३२)
निश्चयनय से एकत्व रूप जो है अद्वैत बस मोक्ष वही।
व्यवहार नयापेक्षा कर्मों कर किया हुआ जो द्वैत वही।।
संसार यही कहलाता है जब तक कर्मों का साथ रहे।
जब छुट जाता संग कर्मों का उसको ही मुनिजन मोक्ष कहें।।
(३३)
जो बंध मोक्ष अरु राग द्वेष कर्मों से विरहित बुद्धी है।
आत्मा को शुभ और अशुभ मान कर द्वैत सहित जो बुद्धी है।।
वह निजानंद शुद्धात्मा के अद्वैत स्वरूप की अपकारी।
इसलिए असिद्धी कहलाती जग में आत्मा को भटकाती।।
(३४)
कर्मों का उदय उदीरण और सत्ता में जो भी रहना है।
वह सब कर्मों की है रचना आत्मा को इनसे बचना है।।
यह सब आत्मा से भिन्न तथा उत्कृष्ट कर्म से विरहित है।
बस केवलज्ञानमयी आत्मा कर्मों के व्यूह से विरहित है।।
(३५)
काले पीले नीले रंग के नभ में बनते आकार कई।
हाथी घोड़े का रूप कभी बादल में बने विकार कई।।
आकाश अर्मूितक होता है उन विकृति से नहिं कुछ होता।
बस उसी तरह से आत्मा का क्रोधादि विकार न कुछ करता।।

(३६)
निश्चयनय से इस आत्मा का कोई भी नाम नहीं होता।
इस तन के ये सब धर्म कहे नहिं आत्मा जन्म मरण करता।।
(३७)
ऐसा यदि कोई कहे हमसे यह आत्मा ज्ञान सहित होती।
यह भी कल्पना मात्र है बस ज्ञान, आत्मा भिन्न नहीं होती।।
(३८)
जो क्रिया व कारक संबंधों से रहित चेतनामय आत्मा।
उसकी जो उपासना करते वह भव्य मोक्ष पद है पाता।।
(३९)
वह आत्मा ही है परमज्ञान अरु दर्श और चारित्र वही।
तप वही किन्तु शुद्धात्मा से नहिं दर्श ज्ञान है भिन्न कोई।।
(४०)
चैतन्य आत्मा वही एक बस नमन योग्य कहलाती है।
मंगल स्वरूप है सर्व श्रेष्ठ भविजीवों की शरणार्थी है।।
(४१)
अप्रमत्त योगि की आत्मा का जो ध्यान वही आचार कहा।
आवश्यक क्रिया वही स्वाध्याय वही नहिं कुछ भी भिन्न वहाँ।
(४२)
आत्मा में स्थित वही पुरुष शील और गुणों का धारी है।
उस ही के निर्मल धर्म कहा वह निश्चय से ब्रह्मचारी है।।
(४३)
जो सर्वशास्त्र रूपी समुद्र का तीन रत्न पाने हेतु।
अध्ययन करे वह आत्मा ही सबमें मानी रमणीय वस्तु।।
इसलिए भव्य जीवों को इस चैतन्यस्वरूपी आत्मा में।
स्थिर रहना चहिए जिससे हो जाये लीन परमात्मा में।।
(४४)
वह आत्मा ही है परमतत्व वह ही उत्कृष्ट स्थान कही।
वह ही आराधन योग्य भव्य जीवों का उत्तम तेज वही।।
(४५)
और वही आत्मा जन्मरूप तरु के छेदन में शस्त्र सदृश।
अरु वही सज्जनों को है मान्य योगिजन ध्यान करें सहर्ष।।
(४६)
चैतन्य स्वरूपी आत्मा ही मुक्ती का मार्ग कहा जग में।
अतएव मोक्ष के अभिलाषी आनंद मानते हैं उसमें।।
इस आत्मा के अतिरिक्त कहीं आनंद प्रतीत नहीं होता।
इसलिए इसी का ध्यान करो इससे ही मोक्षमार्ग मिलता।।
(४७)
संसार ताप से खिन्न जीव शांतात्मा में आराम लहे।
जिस तरह धूप से तप्त प्राणि को शीतल घर में शांति मिले।।
(४८)
यह आत्मा एक किला जैसा जहाँ कर्म शत्रु नहिं घुस सकते।
निजबल से कर्म शत्रुओं का अपमान भी वे ही कर सकते।।
(४९)
वह आत्मा ही महती विद्या स्पुâरायमान है मंत्र वही।
वह ही है महाऔषधि जिससे हो जन्म जरादिक शीघ्र नष्ट।।
(५०)
जो शुद्धात्मा का ध्यान और अनुभवन मनन आदिक करते।
मुक्तीरूपी मनहर तरु पर सुखरूपी उत्तम फल मिलते।।
(५१)
त्रैलोक्य रूप घर का स्वामी उसको चैतन्य तेज समझो।
क्योंकी चैतन्य आत्मा बिन इस घर को भी तुम वन समझो।।
इसमें है शंका कोई नहीं यह तीन लोक का राजा है।
जो लीन रहे हरदम इसमें डर कर्मअरि भी भागा है।।
(५२)
जो शुद्ध निरंजन निराकार वह मैं ही एक आत्मा हूँ।
इसमें है संशय कोई नहीं पर इससे भिन्न शुद्धात्मा हूँ।।
(५३)
यदि करे मोक्ष की इच्छा भी उसका आचार्य निषेध करें।
क्योंकी इच्छाएँ मोहजनित इच्छा से सहित न मुक्ति वरे।।
(५४)
जब शुभ इच्छा भी र्विजत है फिर अन्य वस्तु का कहना क्या।
इसलिए मुमुक्षु शांत जन जो कोई भी इच्छा ना करना।।
(५५)
मैं एक तथा चैतन्यरूप उससे कुछ भी मैं भिन्न नहीं।
निश्चयनय से मेरी आत्मा का किसी से भी संबंध नहीं।।
(५६)
इन बाह्य शरीरादिक पदार्थ से मेरी आत्मा विरहित है।
अरु रागद्वेष रूपी मल से भी रहित आत्म में स्थित है।।
(५७)
आचार्य और भी कहते हैं चैतन्यामृत का पान करो।
भवभ्रमण में जो भी खेद हुआ हे भव्यपुरुष ! अब शांत करो।।
(५८)
आचार्य प्ररूपण करते हैं यह आत्मा है अत्यन्त सूक्ष्म।
स्थूल तथा यह एक भी है और स्वसंवेद्य अनेक रूप।।
(५९)
अवेद्य और अक्षर भी है उपमा से रहित अनक्षर है।
अवक्तव्य और अप्रमेय आकुलतारहित शून्य भी है।।
(६०)
चैतन्य स्वरूप तेजधारी मन वचन से कुछ नहिं कह सकते।
यह आत्मा दृष्टि अगोचर है इसका वर्णन नहिं कर सकते।।
(६१)
जैसे अम्बर में चित्रालेखन करना कितना दुर्लभ है।
वैसे ही अल्पज्ञानियों को परमात्मदर्श भी दुर्लभ है।।
(६२)
जो प्राणी उस शुद्धात्मा में स्थित रहता वह है महान।
पर केवल जो िंचतवन करे उसकी पूजा करता जहान।।
(६३)
सारे जग के ज्ञाता दृष्टा जो केवलज्ञान नेत्रधारी।
इसकी उपासना का उपाय करते हैं वे समताधारी।।
(६४)
ये स्वास्थ्य समाधी और साम्य चित का निरोध शुद्धोपयोग।
सब एक अर्थ कहने वाले पर शब्द भिन्न कहते हैं लोग।।
(६५)
जिसमें न कोई आकार वर्ण अक्षर और कोई विकल्प नहीं।
वह ही चैतन्य आत्मा है मुनिवर कहते हैं साम्य वही।।
(६६)
यह समता ही उत्कृष्ट कार्य और साम्य ही उत्तम तत्त्व कहा।
और साम्य ही मुक्ति हेतु सारे उपदेशों में उपदेश कहा।।
(६७)
इस साम्य से ही भवि जीवों को है सम्यग्ज्ञान प्राप्त होता।
शुद्धात्म रूप ये मोक्षद्वार इससे अविनाशी सुख मिलता।।
(६८)
सब शास्त्रों में है सारभूत ये साम्य ही कहा गणधर ने।
यह साम्य है दावानल समान सब कर्म अरि के नाशन में।।
(६९)
सब दुखों का हत्र्ता ये साम्य योगीजन ध्यान करें इसका।
आत्मा के कर्मजनित रागादिक दोषों को भी ये नशता।।
(७०)
अणिमादि रूप जो कमलखंड उसकी न जरा भी इच्छा है।
और समतारूप सरोवर में रमते रहने की इच्छा है।।
जिनकी अत्यन्त पवित्र दृष्टि है मुक्तिहंसिनी के ऊपर।
ऐसी उस शुद्धात्मा को मैं नित नमन करूँ मस्तक धर कर।।
(७१)
मृत्यू का ताप दुक्ख देता ज्ञानी को है अमृत समान।
जिस तरह घड़े की पाक विधी पानी भरने के योग्य जान।।
(७२)
सत्कुल में जन्म बुद्धि लक्ष्मी और कृतज्ञता आदिक जो गुण।
वे सब विवेक बिन व्यर्थ कहे ये सारे बन जाते दुर्गुण।।
(७३)
जड़ चेतन दो हैं तत्त्व कहे जो ग्रहण योग्य सो ग्रहण करें।
उसको विवेक गुण कहते हैं जो त्याग योग्य तो त्याग करें।।
(७४)
इस जग में मूढ़ मनुष्यों को कुछ सुख कुछ दुख मालुम पड़ता।
पर अंतर यही विवेकी में उसको जग में दुख ही दिखता।।
(७५)
जो हैं विवेकिजन उन्हें सभी रागादि कर्म तजना चहिए।
और दर्शनज्ञान स्वरूप आत्म के तेज में ही रमना चहिए।।
(७६)
यह जो चैतन्य वही मैं हूँ वह ही सबको जाने देखे।
पर निश्चयनय से मैं मेरी आत्मा से पृथक् यही देखें।।
(७७)
एकत्वसप्तति रूप नदी ‘‘श्री पद्मनंदि’’ हिम से निकली।
जो भव्य जीव स्नान करें यह मोक्षरूप सागर में मिली।।
इनके समस्त मल क्षय होकर अत्यन्त शुद्ध हो जाते हैं।
जो सदा इसी का ध्यान करें वे मोक्षलक्ष्मी पाते हैं।।
(७८)
जो भवसमुद्र से तिरने में पुल के समान उपेदश किया।
इसका आश्रय ले भविजन ने उत्तम आत्मा का ध्यान किया।।
इस क्षोभरहित आत्मा में रागादिक मल नहिं रह सकते हैं।
निर्मल चित के धारी होकर ज्ञानी यह चिंतन करते हैं।।
(७९)
यह आत्मा भिन्न तदनुगामी जो कर्म भी भिन्न सभी हमसे।
कर्म आत्मा संग जो है विकार, वह भी हैं भिन्न सभी मुझसे।।
जो काल क्षेत्र आदिक पदार्थ और गुण पर्याय सहित पदार्थ।
सब मुझसे भिन्न-भिन्न हैं यह ज्ञानीजन करते हैं विचार।।
(८०)
जो भव्य जीव इस आत्मतत्व का बारंबार अभ्यास करें।
और कथन करें मंथन अनुभव कर नौलब्धी भंडार भरें।।
वे भव्य जीव अविनाशी अरु अनंतदर्शन के धारक हैं।
क्षायिक चारित्र ज्ञान क्षायिक केवल लब्धी आदिक भी हैं।।
।।इति एकत्वसप्तति अधिकार।।

।।पंचम अधिकार।। ‘‘यदि भावना का कथन’’ (१) निज आत्मा का स्वरूप लखकर व्रत धारण कर वन में जाकर। और मोहजनित कर्मों के सब संकल्प विकल्पों को तजकर।। जो मुनिगण मनरूपी वायू से नहीं चलायमान होते। आत्मा में लीन वही मुनिगण पर्वत समान स्थिर रहते।। (२) चित की वृत्ती का कर निरोध इंद्रिय वश करके धैर्य सहित। स्वासोच्छवास को रोक तथा पर्यंकासन से हो स्थित।। निर्जन वन की वंâदराओं में मैं बैठ के आतम ध्यान करूँ। मुनिगण ऐसा विचार करते मैं कब शिवपथ को प्राप्त करूँ।। (३) धूली धूसरित वस्त्र विरहित पर्यंकासन से सहित शांत। और वचन रहित आँखे मूंदे जब निज स्वरूप कर लिया प्राप्त।। वन में भ्रम सहित मृगों का गण आश्चर्य सहित जब देखेगा। उस समय पुण्यशाली मेरे समान कोई भी नहिं होगा।। (४) हो किसी शून्य मठ में निवास और दिशारूप ही अम्बर हो। संतोषमयी धन क्षमारूप स्त्री तपरूपी भोजन हो।। मैत्री हो सभी प्राणियों में आतमस्वरूप का िंचतन हो। ये सभी वस्तुएँ पास मेरे फिर पर से नहीं प्रयोजन हो।। (५) जो उत्तमकुल में जन्म पाय सुन्दर निरोग तन प्राप्त करे। शास्त्रों को पढ़ वैराग्य प्राप्त कर तप को जो निर्बाध करे।। वह पुण्यवान बस इक जग में मदरहित ध्यान अमृत पीता। तो मानो वह मनुष्य घर के ऊपर मणिमयी कलश रखता।। (३९२) जो ग्रीष्म ऋतू में पर्वत पर योगीजन ध्यानलीन होते। वर्षा में वृक्षों के नीचे शिशि ऋतु में गगन तले करते।। ऐसे तप के धारी ध्यानी जिनकी आत्मा अत्यन्त शांत। उन योगी का पथ मिले मुझे उनको मेरा शत शत प्रणाम।। (३९३) इस भेद ज्ञान से जिस समाधि में मन की वृत्ति संकुचित है। ऐसी अद्भुत उत्कृष्ट समाधि धन्य शमिक मुनि के होती हैं।। मस्तक पर चाहे वङ्का गिरे तीनों लोकों के जलने पर। जिन मुनि के मन न विकार कोई चाहे प्राणों के नशने पर।। (३९४) जिसे कर्मों का संबंध नहीं और अहं शब्द आत्मावाचक। इस आत्मतत्त्व को जिन मुनिवर ने जान लिया सुन लिया कथन।। जिस मुनि को रहने सोने को निजतत्त्व ही श्रेष्ठ संपदा है। सुख भी है वही वृत्ति वो ही निजतत्त्व वही प्रिय लगता है।। (३९५) जो यतिभावन अष्टक सब पाप शत्रु को नष्ट करन वाला। और राजश्री व स्वर्ग मोक्ष की लक्ष्मी को देने वाला।। जिसकी रचना चैतन्यरत्न ‘‘श्री पद्मनंदिमुनि’’ ने की है। जो तीनों काल पढ़े उनको इच्छित अभीष्ट मिलता ही है।। ।।इति यतिभावनाष्टक पञ्चमाधिकार।।