098.वर्तमान शताब्दी के दिगंबर जैनाचार्य संघ

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वर्तमान शताब्दी के दिगंबर जैनाचार्य संघ

मोदीनगर में प्रवेश-

मध्यान्ह यहाँ से विहार कर धौलड़ी, निवाड़ी होते हुए १७ जनवरी, माघ वदी ६ को अपरान्ह में मोदीनगर पहुँच गई। यहाँ डेढ़ किलोमीटर पूर्व से ही श्रावकों ने बैंड बाजे के साथ जुलूस बना लिया। टेंट हाउस वालों ने प्रथम स्वागत करके आरती की। मध्य में अनेक दुकानों के सामने भक्तजन चरण प्रक्षालन कर आरती करते रहे थे। मैं दिल्ली से मोदीनगर व हस्तिनापुर से दिल्ली, जाते-आते में ११-१२ बार मोदीनगर आ चुकी थी किन्तु आज मोदीनगर की जैन समाज की उपस्थिति देखकर प्रसन्नता हुई। यहाँ विधान के लिए उत्साह बहुत अच्छा था। इसमें प्रमुख रूप से समाज को जोड़ने वाले सुशील कुमार जैन, मवाना वाले ही थे।

इन्द्रध्वज विधान-

इन्द्रध्वज विधान की रचना हुए १४ वर्ष हो चुके हैं। आज तक विधान रचयित्री (मेरे सानिध्य में) विधान कराने की लोगों की भावना होते हुए मैं इतना लम्बा विहार कर कहीं नहीं पहुंची थीं। हाँ! दिल्ली व हस्तिनापुर में मेरे सानिध्य में पच्चीसों विधान हो चुके हैं। मोदीनगर वालों को ही यह अवसर मिला था, जिसे वे अपना अहोभाग्य मान रहे थे। माघ वदी ४, १५ जनवरी १९९० को प्रातः रवीन्द्र कुमार ने आकर पं. प्रवीणचंद शास्त्री के द्वारा यहाँ विधान के लिए झंडारोहण करा दिया था।

माघ वदी ७, दिनाँक १८ जनवरी १९९० के दिन प्रातःकाल विधान शुरू हो गया। इस विधान में अनेक श्रावक, श्राविका बैठे थे, मुख्य इन्द्र सुशील कुमार जैन, मवाना वाले थे। प्रतिदिन विधान की पूजाएँ बहुत ही आनन्दपूर्वक संगीत लहरी के साथ चल रही थीं। मोदीनगर में सड़क पर बहुत दूर तक माइक लगाये गये थे, जिनके द्वारा मंदिर जी में चल रहे विधान की पूजाओं का आनन्द सड़क चलते जैन-जैनेतर लोग भी ले रहे थे। उस समय सारा शहर ही मानों धर्ममय बन गया था। प्रतिदिन प्रातः ९ बजे मेरा प्रवचन होता था। रात्रि में विद्वानों के व क्षुल्लक मोतीसागर जी के प्रवचन होते थे।

आर्यिका रत्नमती जी की पुण्यतिथि-

सन् १९८५ में माघ वदी ९ के दिन आर्यिका श्री रत्नमती माताजी ने समाधिमरण प्राप्त किया था। उनकी ५ वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में यहाँ रात्रि में सभा रखी गई। विद्वानों ने उनके गुणों का स्मरण करते हुए अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये और उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। पुनः कुन्दकुन्ददेव की द्विसहस्राब्दी के उपलक्ष्य में गोष्ठी का आयोजन हुआ। बाहर से आगत विद्वान प्रो. टीकमचंद, दिल्ली, प्रो. श्रेयांस कुमार, बड़ौत आदि ने तथा रवीन्द्र कुमार जैन ने कुन्दकुन्ददेव की कृतियों पर, समयसार ग्रंथ की टीकाओं पर विस्तृत प्रकाश डाला। एक दिन उपदेश में व्रतों पर प्रकाश डालने के बाद अनेक महिलाओं ने रोहिणी व्रत, णमोकार व्रत आदि व्रत ग्रहण किये।

कन्या इण्टर कालेज में उपदेश-

२५ जनवरी को ‘पी. वी.ए. एस. कन्या इण्टर कालेज’ में प्रवचन का कार्यक्रम रखा गया। क्षुल्लक मोतीसागर, आर्यिका चंदनामती के प्रवचन के बाद मेरा प्रवचन हुआ। कन्याएँ तो प्रसन्न हुर्इं ही, वहाँ की अध्यापिकाएँ व कालेज की संचालिका भी अति आनंदित हुर्इं। वहां से वापस आते समय सुशीलकुमार आदि ने गलियों से रास्ता निकाला। तब मार्ग से २५-३० गृहों के आगे भक्तों ने दूध से पादप्रक्षालन व आरती की। जगह-जगह लोगों ने सबको प्रसाद भी बांटे। भक्तों को तो आनन्द आ गया किन्तु मैं खूब थक गई। खैर! कभी-कभी भक्तों की प्रसन्नता में अपनी थकान व शारीरिक कष्ट भी हल्का ही हो जाता है।

महामहोत्सव की मीटिंग-

२६ जनवरी को जंबूद्वीप महामहोत्सव की मीटिंग हुई। दिल्ली, बड़ौत, मेरठ, अमीनगरसराय, मोदीनगर आदि के श्रावकों की अच्छी उपस्थिति रही, उत्साहपूर्ण वातावरण में सबको कार्य सौंपे गये। दिल्ली वालों ने यहाँ भी मुझसे दिल्ली विहार के लिए बहुत ही आग्रह किया किन्तु मेरा स्वास्थ्य अब अधिक विहार के लायक नहीं था अतः मैंने मना कर दिया। २७ जनवरी को पूर्णाहुतिपूर्वक हवन हुआ। रात्रि में वर्षा होने की उम्मीद थी, प्रातः बादल घिरे रहते हुए भी वर्षा नहीं हुई, हवन निर्विघ्न सम्पन्न हुआ, सबको खुशी हुई।

रथयात्रा महोत्सव-

२८ जनवरी, माघ वदी २, को रथयात्रा निकाली गई। यह इनकी वार्षिक रथयात्रा थी, यह विधान के समापन के साथ जुड़ गई अतः और भी विशेषता आ गई। इस इन्द्रध्वज विधान की अपने आप में कुछ विलक्षण ही विशेषता देखी गई है। कितने विधानकर्ताओं ने आकर कहा है कि- ‘‘माताजी! मेरे लिए यह विधान आशा से अधिक फलित हुआ है।’’ मेरठ के प्रेमचंद जैन (तेल वाले) कई बार यह वाक्य दोहराया करते हैं। १८ अप्रैल १९८८ को पं. धन्नालाल लश्कर वालों का पत्र आया था कि मैंने यह इन्द्रध्वज विधान ११ बार कराया है, उसके बाद तो उनकी संख्या और भी बढ़ी होगी। ये विद्वान कानजीपंथी कहलाते हैं। मैंने यह देखा है कि बीसपंथी, तेरहपंथी और कानजीपंथी सभी विद्वानों ने इस विधान को कराया है और पूजन की पंक्तियों की व जयमाला में आये विषयों की मुक्तकंठ से प्रशंसा भी करते हैं। अनेक प्रशंसा भरे पत्र विद्वानों व श्रावकों के यहाँ आते रहते हैं। मैं सोचा करती हूँ-‘‘इसमें मेरी वाक्य रचना कारण नहीं है प्रत्युत् जिनेंद्र भगवान की व उनके अकृत्रिम जिनबिंबों की भक्ति ही ऐसी अतिशयकारिणी है कि जिससे भक्तगण अनुरंजित-प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाते हैं।

मेरठ की ओर विहार-

यहाँ मोदी परिवार से कई शिक्षण संस्थाएँ चल रही हैं। कोटा से रानीवाला महेंद्र कुमार जैन की धर्मपत्नी प्रेमलता ने अपने पीहर में जाकर श्रीमती गायत्री देवी से ‘कन्या इंटर कालेज’ में मेरे प्रवचन कराने की प्रेरणा दी, ये महिलाएँ निवेदन के लिए आर्इं। मेरे पास अब समय नहीं था, फिर भी २९ जनवरी के मध्यान्ह विहार के बाद ही मैंने वहाँ कालेज में उपदेश का प्रोग्राम रख दिया। जैन मंदिर मोदीनगर से मध्यान्ह १२.३० बजे मेरठ की तरफ विहार करते हुए रास्ते मेें आधा घंटे वहाँ रुककर कन्याओं को उपदेश सुनाया व वहाँ से आगे विहार कर गई।

कल्पद्रुम विधान का निर्णय-

हस्तिनापुर में कई बार प्रेमचंद जैन व उनके पुत्र मुकेश कुमार जैन ने आकर यह निवेदन किया कि ‘‘माताजी! चाहे आप एक-एक किलोमीटर चलें, हम आपके सानिध्य में मेरठ के कमलानगर मंदिर में कल्पद्रुम विधान कराना चाहते हैं।’’

मैं हंसकर टाल देती थी और संघ के सभी लोग यह कह देते थे कि ‘‘न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी’’ किन्तु ये लोग निराश नहीं होते थे प्रयास करते ही रहते थे। जब मैें सरधना आ चुकी थी, तब मेरठ से श्री अमरचंद व अरविन्द कुमार (होम ब्रेड वाले)आये थे। उनके विशेष आग्रह से मेरे मुख से निकल गया था कि बड़ौत से निकलकर मेरठ होते हुए भी हस्तिनापुर जाया जा सकता है। तभी से ये दोनों परिवार के लोग सभी जगह आते रहे थे और मेरठ के लिए निवेदन करते रहे थे। अमीनगर सराय में मैंने प्रेमचंद जैन को कल्पद्रुम विधान के लिए निर्णय दे दिया था अतः मोदीनगर से अमरचंद जैन और प्रेमचंद जैन ने आकर व्यवस्था संभाली थी। ये सपरिवार मेरे संघ के साथ पैदल चले थे। मोदीनगर से विहार करके हम लोग परतापुर में ब्रेड फैक्ट्री पर आ गये। यहीं दो दिन आहार हुए थे। ३० जनवरी को सुरेन्द्र कुमार जी आये, उनके आग्रह से हम लोग माला फ्लोर मिल के मंदिर के दर्शन करने गये। मंदिर की रचना बहुत ही सुन्दर लगी। प्रदक्षिणा में अष्ट पहलू कमल बना है, वह बहुत ही अच्छा लगा।

कमला नगर-मेरठ में मंगल प्रवेश-

परतापुर से विहार कर रिठानी में बने नये मंदिर को देखते हुए ३१ जनवरी माघ शु. ५ को ४ बजे जुलूस के साथ कमलानगर के मंदिर में पहुँच गई। यहाँ पहुँचकर मंगल प्रवचन दिया पुनः एक नई कोठी मेें संघ को ठहराया गया क्योंकि यहाँ मंदिर में साधुओं के ठहरने के लिए व्यवस्था नहीं थी। २ दिन बाद अरविन्द कुमार के विशेष आग्रह से उनकी कोठी पर १० दिन ठहरी हूँ। प्रेमचंद जैन ने कई बार संघ के साधुओं से कहा कि-देखो तो! नौ मन तेल भी हो गया और राधा जी भी नाच गर्इं, मेरे यहाँ मेरठ में पूज्य माताजी आ गई हैं....।

कल्पद्रुम विधान प्रारंभ-

माघ शु. ६, १ फरवरी १९९० को प्रातः ९.१५ बजे कल्पद्रुम विधान के लिए श्री सुकुमार चंद जैन ने झंडारोहण किया। इस अवसर पर श्री कल्याणसागर जी महाराज भी ससंघ पधारे थे। सभी साधुओें के कल्पद्रुम विधान की महिमा पर प्रवचन हुए। बात यह है कि यह विधान चक्रवर्ती ही चतुर्थ काल में किमिच्छक दान देते हुए करते थे अतः आज भी स्थापना निक्षेप से चक्रवर्ती बनकर श्रावक यह विधान करते हैं। यहाँ श्री प्रेमचंद जी चक्रवर्ती बनकर खुले मन से यह विधान करा रहे थे। घटयात्रा, अंकुरारोपण क्रिया सम्पन्न हुई। २ फरवरी से विधान की पूजन प्रारंभ हो गर्इं। ७० से अधिक श्रावक-श्राविकाएँ विधान में समवसरण के चारों ओर बैठे हुए थे। मंदिर के पास विशाल पांडाल बनाकर यह विधान किया जा रहा था। विधान की पूजन के समय श्री सुकुमार चंद जैन आदि अनेक भक्तगण आ जाते थे और खूब रुचि से पूजन पढ़ते थे। श्री रतनलाल जैन आदि ३-४ श्रावक तो प्रतिदिन ३-४ घंटे बराबर पूजन पढ़ते थे। संगीत की लहरी के साथ पूजन का आनन्द बाहर शहर में दूर-दूर तक लगाये गये माइक के द्वारा जैन-जैनेतर सभी लोग ले रहे थे।

प्रतिदिन ९ बजे से मेरा प्रवचन होता था। कभी जिनभक्ति, कभी गुरुभक्ति आदि पर प्रकाश डालती थी। एक दिन मैंने जैन महाभारत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- द्रौपदी मात्र अर्जुन की पत्नी थी न कि पांचों पांडवों की। वास्तव में सती और पंचभर्तारी का परस्पर में पूर्ण विरोध है इत्यादि। मध्यान्ह में एक जैन महिला ने आकर कहा कि-‘‘हम लोगों को आज मालूम हुआ कि द्रौपदी पंचभर्तारी नहीं थी, हम लोगों को अटपटा तो यह विषय लगता था, अब पता चला कि यह मात्र कल्पना है, निराधार है, सती का अपवाद है।’’ मैं सोचने लगी-‘‘वास्तव में आज प्रथमानुयोग का स्वाध्याय नगण्य हो गया है और इधर टेलीविजन पर रामायण व महाभारत दिखाये जा रहे हैं, जिन्हें जैनेतर क्या जैन समाज भी बहुत ही रुचि से देखती है। खेद है कि जैन महाभारत, जैन रामायण, टी.वी. पर दिखाने के लिए जैन समाज कोई प्रयास करने के लिए नहीं सोच पाता है। यह विधर्मियों का प्रभाव देखकर कलिकाल को ही दोष देकर संतोष करना पड़ता है।

विधान का विषय-

इस विधान में भगवान के समवसरण का वैभव विशेष लिया गया है पुनः भगवान् के पंचकल्याणक, उनके माता-पिता, तीर्थंकर के पुण्यमय वर्ण, आदि की भी पूजा है। ब्राह्मी-सुन्दरी आदि महाआर्यिकाओं की पूजा है। अंत में भगवान के १००८ नामों की पूजा है। पूजा पढ़ते हुए गद्गद होकर एक दिन सुकुमार चंद बोले-‘‘माताजी! हस्तिनापुर में समवसरण के पूरा बन जाने पर मैं वहाँ यह विधान अवश्य कराऊँगा।’’ मैंने सोचा-‘‘विधान तो जब करायेंगे तब सही, पुण्य बंध तो इन्होंने कर ही लिया है।’’

चतुर्विधदान-

श्री प्रेमचंद ने प्रतिदिन १००-२०० आदि गरीब लोगों को भोजन कराया। किसी दिन वस्त्र, किसी दिन थाल आदि बांटे। प्रतिदिन औषधि वितरित की और ज्ञानरश्मि पुस्तक छपवाकर बांटी। विधान के बाद प्रेमचंद ने संकल्प किया कि मैं प्रतिमाह विधान समापन की ११ तारीख को गरीबों को भोजन कराऊँगा। ११ फरवरी को पूर्णाहुतिपूर्वक हवन सम्पन्न हुआ।

रथयात्रा-

१२ फरवरी, फाल्गुन वदी ३ को रथयात्रा हुई। इस दिन मौसम ठंडा होने से मैं भी पूरी रथयात्रा तक साथ में चली। महावीर भवन में मध्यान्ह की सामायिक की पुनः रथ के साथ ही वापस आ रही थी कि हरीश चंद जैन (सुमन प्रिन्टर्स) के अतीव आग्रह से प्रेस में गई जो कि रास्ते में ही था। उनकी पत्नी तथा प्रेस कर्मचारियों ने बड़े भाव-विभोर होकर मेरी अगवानी की तथा प्रेस में प्रकाशित अन्य अनेक ग्रंथ दिखाये। रथयात्रा वापस आने के बाद महिलाओं ने पांडाल में खूब नृत्य किया और गुलाल उड़ाई, सभी लोग भक्तिरस में आनन्द विभोर हो रहे थे। रथयात्रा के बाद हम लोग अपने-अपने स्थान पर आ गये पुनः खूब वर्षा हुई। शायद मेघ कुमार निर्विघ्न विधान की समाप्ति में खुशी होकर ही मानों रत्नों की वर्षा कर रहे हैं। प्रेमचंद जैन की धर्मपत्नी सब्जी देवी ने ऐसे शब्द बार-बार कहे।

अगले दिन विधान में भाग लेने वाले सभी लोग दो बसों में बैठकर हस्तिनापुर में सुमेरु की वंदना और तीर्थ की वंदना करने के लिए गए। वहाँ भी प्रेमचंद ने कर्मचारियों को वस्त्र आदि बांटे। इस प्रकार अच्छी प्रभावना के साथ यह विधान सम्पन्न हुआ। मेरठ आगमन पर यह अत्यन्त आनन्ददायक विषय रहा कि अष्टसहस्री ग्रंथ भाग तृतीय भी सुमन प्रिन्टर्स वालों ने मेरे वहाँ रहते हुए ही पूरा कर दिया तथा ग्रंथ के अंतिम प्रूफ मेरठ-मवाना के रास्ते में मुझे दिये। उनका दिन-रात का परिश्रम सफल रहा तथा ग्रंथ बहुत जल्दी पूर्ण हुआ।

जिनचैत्यालय स्थापना-

हरीश जैन सुमन प्रिन्टर्स ने मेरी प्रेरणा से घर में चैत्यालय बनाने का निश्चय किया। जंबूद्वीप-हस्तिनापुर से श्री मल्लिनाथ भगवान की जिनप्रतिमा लाई गई। कमलेश चंद शास्त्री ने ११ फरवरी को उनके घर जाकर वेदी शुद्धि कराई पुनः १२ फरवरी, फाल्गुन कृ. ३ को प्रातः ८ बजे के बाद हरीश जैन आकर आर्यिका चंदनामती को व क्षुल्लक मोतीसागर को ले गये। इन्होंने वहाँ जाकर विधिवत् मुहूर्त कर जिनप्रतिमा विराजमान करा दीं। उन सबको बहुत ही प्रसन्नता हुई। होना भी चाहिए क्योंकि तीन लोक के नाथ भगवान को घर में विराजमान करने का सौभाग्य बड़े पुण्य से प्राप्त होता है।

हरीश जैन ने सन् १९८७ से लेकर अब तक वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला के सर्वतोभद्रविधान आदि ७-८ विधान, जंबूद्वीप पूजाञ्जलि, अष्टसहस्री भाग-१,२,३, समयसार पूर्वार्ध, मेरी स्मृतियाँ, सती अंजना आदि अनेक कथा पुस्तके और बालविकास के पुनः संस्करण आदि अनेक ग्रंथ छापे हैं। अभी आचार्य वीरसागर स्मृतिग्रंथ आदि कई ग्रंथ छप रहे हैं। हरीश जी स्वयं बहुत ही रुचि से मुद्रण की व्यवस्था संभालते हैं। वे स्वयं तो कमलानगर मंदिर में दर्शन करने आते थे लेकिन इनकी पत्नी, पुत्र, पुत्री आदि परिवार के लोग वंचित रहते थे, जबसे चैत्यालय स्थापित किया है, कहते हैं, तब से आस-पास के कई जैन परिवार प्रतिदिन दर्शन करने आते हैं। यह प्रसन्नता की बात है।

णमोकार मंत्र सम्मेलन में उपदेश-

आचार्य श्री कल्याणसागर जी की प्रेरणा से जैन बोर्डिंग में णमोकार मंत्र का सम्मेलन रखा गया था। यहाँ णमोकार मंत्र की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। यद्यपि १० फरवरी को मेरा उपवास था, फिर भी मुनिश्री के विशेष आग्रह से मैं भी वहाँ पहुँची थी। मुनिश्री सुशील कुमार जी (स्थानकवासी साधु) आदि अनेक वक्ताओं के भाषण हुए पुनः मैंने अपने प्रवचन में महामंत्र के ३५ अक्षरों, ६४ वर्णों में पूरा द्वादशांग समाहित है इत्यादि विश्लेषण करते हुए यह भी बताया कि-

अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा। ध्यायेत् पंचनमस्कारं सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

इस श्लोक के अनुसार अपवित्र या पवित्र किसी भी स्थिति में नमस्कार मंत्र का ध्यानकर-मन में चिंतन का उपदेश है। मासिक धर्म की अशुद्धि में भी महिलाएँ मन-मन में मंत्र जप सकती हैं। ओष्ठ, जिव्हा आदि हिलाकर मुख से बोल नहीं सकती हैं। अग्नि बहुत अच्छी है, भोजन पकाती है इत्यादि, किन्तु उसे कोई सिर पर या जेब में नहीं रख लेते हैं। डाक्टर रोगी का ऑपरेशन करते हुए अपने मुख पर वस्त्र ढकता है, ऑपरेशन करके तीन बार साबुन से हाथ धोता है, उसे रोगी से ग्लानि नहीं है, फिर भी रोगों के कीटाणुओं से अपने को बचाता अवश्य है। वैसे ही णमोकार मंत्र बहुत अच्छा है किन्तु इसका सदुपयोग करने से ही अच्छा है। इसके दुरुपयोग से-अविनय से सुभौम चक्रवर्ती नरक चला गया है अतः मैं यही कहती हूँ कि मुनिश्री णमोकार मंत्र के प्रसार-प्रचार के साथ आगम की मर्यादा को अवश्य ध्यान में रखें.....।’’ इत्यादि। मुनिश्री से मवाना में चर्चा के समय भी मैंने उनसे यही निवेदन किया था कि-‘‘आप जैन आगम के अनुसार अस्पृश्य का स्पर्श न करें, मर्यादा में रहें, तभी आर्षपरम्परा के साधुओं का समर्थन मिल सकेगा।’’ प्रवचन सभा समापन के बाद हम लोगों ने णमोकार मंत्र के अनेक चित्रों की प्रदर्शनी भी देखी पुनः कमलानगर वापस आ गई। इस तरह १४ दिन मेरठ में रहते हुए कई बार श्री सुकुमारचंद जैन मेरे पास आये और समसामयिक चर्चाएँ भी हुर्इं। वर्तमान शताब्दी के दिगम्बर जैनाचार्य संघ

चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी-

इस शताब्दी में चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज हुए हैं। इनके दीक्षा गुरु आचार्य देवेन्द्रकीर्ति मुनिराज थे। इनके पट्टशिष्य आचार्य वीरसागर जी हुए हैं। इनके पट्टशिष्य आचार्य शिवसागर जी एवं इनके पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी हुए हैं। वर्तमान में इनके पट्टाचार्य श्री अजितसागर जी विद्यमान हैं। इस परम्परा में मुनियों की नवधाभक्ति में पहले पड़गाहन-प्रदक्षिणा, पुनः उच्चासन देकर पादप्रक्षालन पुनः अष्टद्रव्य से पूजा होती है। फिर आहार दिया जाता है। इस परम्परा मेंं ऐसे ही आर्यिकाओं की भी आहार के समय पड़गाहन प्रदक्षिणा, पाद प्रक्षालन व अष्टद्रव्य से पूजा सहित नवधा भक्ति की जाती है।

क्षुल्लकों के गेरुआ चादर व कौपीन (लंगोटी) रहती है। क्षुल्लिकाओं के पास एक साड़ी, एक चादर व धातु का कमंडलु रहता है। दोनों के पास मयूर पंखों की ही पिच्छिका होती है। आहार के समय क्षुल्लक, क्षुल्लिकाओं का पड़गाहन (प्रदक्षिणा बिना) पाद प्रक्षालन व अर्घ्य चढ़ाकर पूजा करके नवधाभक्ति के बाद थाली में आहार कराया जाता है। कोई-कोई अभी आज भी आचार्य श्री शांतिसागर जी से दीक्षित क्षुल्लिका अजितमती जी विद्यमान हैं। इनकी चर्या ऐसी ही है। कदाचित् वहीं से कटोरा पात्र लेकर भी आहार करते हैं। इसी परम्परा में आचार्यश्री शांतिसागर जी के प्रथम पट्टाधीश आचार्यश्री वीरसागर जी की शिष्या मैं-गणिनी आर्यिका ज्ञानमती और गणिनी आर्यिका सुपार्श्वमती जी अपने-अपने आर्यिका संघ सहित विद्यमान हैं। आर्यिका जिनमती, आर्यिका आदिमती, आर्यिका विशुद्धमती जी आदि धर्म प्रभावनारत हैं।

इस परम्परा में सज्जाति को विशेष महत्व दिया गया है जिसमें अंतर्जातीय, विजातीय और विधवा विवाह वर्जित है, ऐसे विवाह सहित श्रावकों को अभिषेक-पूजन, विधान व आहारदान का अधिकार नहीं दिया जाता है। आगम के अनुसार श्रावकों द्वारा पूजा में फल-फूल आदि से पूजा, जिसे वर्तमान में बीस पंथ कहते हैं, इसका समर्थन प्राप्त है। स्त्रियों द्वारा जिनेन्द्रदेव का अभिषेक भी चालू है और कानजी पंथ का विरोध है।

आचार्यश्री शान्तिसागरजी के एक शिष्य आचार्य पायसागर जी हुए हैं, उनके शिष्य आचार्य श्री जयकीर्ति जी हुए हैं। इनके शिष्य आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज हुए हैं। इस परम्परा में भी सारी बातें वहीं हैं। मात्र क्षुल्लक, क्षुल्लिकाएँ रेल, मोटर की सवारी करते रहे हैं। आचार्यश्री शांतिसागर जी के शिष्यों में यह बंधन था। अपवादरूप विशेष बीमारी आदि के कारण से उनकी शिष्या क्षुल्लिका अजितमती जी भी रेल, मोटर में नहीं बैठती हैं किन्तु व्यक्तिगत कार से उन्हें श्रावक एक गाँव से दूसरे गाँव आदि ले जाते हैं।

चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री के एक शिष्य आचार्यकल्पश्री चन्द्रसागर जी महाराज हुए हैं। इन्होंने क्षुल्लकों को श्वेत वस्त्र दिया और ग्यारह प्रतिमाओें की सूचक ग्यारह धागे की जनेऊ भी दी है तथा क्षुल्लक, क्षुल्लिकाओं को पात्र लेकर सात घर से भिक्षा लाकर भोजन करने की पद्धति भी डाली थी किन्तु उनकी यह भिक्षावृत्ति परम्परा तो आगे नहीं चल पाई है। आचार्यश्री सुधर्मसागर जी चारित्रचक्रवर्ती के ही शिष्य थे, वे भी इसी परम्परा के समर्थक थे। आचार्य कल्पश्री चन्द्रसागर जी के शिष्य क्षुल्लक श्री भद्रसागरजी थे जो कि गुरु की समाधि के बाद आचार्य श्री वीरसागर जी के संघ में ही आ गये थे। मुनि बनने पर इनका नाम धर्मसागर जी रखा गया था। ये ही इस परम्परा के तृतीय पट्टाधीश हुए हैं। इन्होंने क्षुल्लकों के गेरुये वस्त्र की परम्परा ही रखी है। इस परम्परा के साधु-साध्वी जनेऊधारी श्रावकों के हाथ से ही आहार लेते हैं।

आचार्यश्री वीरसागर जी के शिष्य एक क्षुल्लक जी थे, वे संघ से पृथक होकर दक्षिण चले गये। वहाँ अंकलीकर श्री आदिसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ले ली, आचार्यश्री महावीर कीर्ति जी के नाम से प्रसिद्ध हुए हैंं। यद्यपि दक्षिण में क्षुल्लकों को गेरुवे वस्त्र देने की ही परम्परा रही है। फिर भी आचार्यकल्प चन्द्रसागर जी और आचार्य श्री सुधर्मसागर जी की परम्परा के अनुसार इन्होंने अपने क्षुल्लक शिष्यों को ग्यारह धागे की यज्ञोपवीत दिया, श्वेत कोपीन व चादर दिया। ये आचार्यश्री बिना जनेऊ वालों से आहार तो लेते ही नहीं थे, उन्हें कमंडलु तक नहीं उठाने देते थे। आज इनकी परम्परा में मुख्य आचार्यश्री विमलसागरजी, आचार्य श्री सन्मतिसागर जी, आचार्य कुन्थुसागर जी आदि संघ सहित विराजमान हैं और गणिनी आर्यिका विजयमती जी भी धर्मप्रभावना कर रही हैं।

इस परम्परा में भी सज्जाति का विशेष महत्व है, आगमपंथ का समर्थन है तथा कानजीपंथ का विरोध है। मात्र क्षुल्लकों के गेरुवे वस्त्र और श्वेत वस्त्र के अन्तर के सिवाय चारित्रचक्रवर्ती की और महावीर कीर्ति जी की परम्परा में और कोई खास अन्तर नहीं है।

इन दोनों परम्पराओें में क्षुल्लक-क्षुल्लिकाओं को आहार के समय अर्घ्य चढ़ाया जाता है। आचार्यश्री वीरसागर जी की परम्परा में तो इनका पादप्रक्षालन भी किया जाता है और नवधाभक्ति मानी जाती है।

इन दोनों परम्पराओं में संघ में ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी जिनप्रतिमा अवश्य रखते हैं चूंकि दिगम्बर जैन समाज में तेरहपंथ-बीसपंथ के भेद में संघस्थ व्रती श्रावक-श्राविकाएँ कहीं विसंवाद न कराकर, अपने चैत्यालय की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक, हरे फल-फूलों से पूजन आदि करते रहते हैं।

आचार्यश्री शांतिसागर छाणी-

आचार्यश्री शांतिसागर नाम के एक आचार्य और हुए हैं, ये अपने गांव के नाम ‘छाणी’ से जाने जाते थे। ब्यावर में सन् १९३३ में में शांतिसागर आचार्यों का एक साथ चातुर्मास हुआ था। ये श्रावकों को तेरहपंथ का उपदेश देते थे। हरे फल व फूल चढ़ाने का, पंचामृत अभिषेक का व स्त्रियों द्वारा जिनाभिषेक का समर्थन नहीं करते थे। बाद में आचार्य सूर्यसागर जी, मुनिश्री विमलसागर जी आदि भी इसी परम्परा के समर्थक हुए हैं। आचार्यश्री विमलसागर जी से दीक्षित श्री सुमतिसागर जी आचार्य और निर्मलसागर जी आचार्य हैं। ये आचार्य भी तेरहपंथ विचारधारा के पोषक हैं।

सज्जाति के समर्थक होने से ये आचार्य भी अंतर्जातीय, विजातीय और विधवा विवाह के समर्थक नहीं हैं। ऐसे संबंध वालों से आहार भी नहीं लेते हैं और कानजीपंथ के भी विरोधी हैं। इनकी परम्परा में आर्यिकाओं का पड़गाहन, पाद प्रक्षालन होता है। पूजा अष्टद्रव्य से पृथक्-पृथक् न होकर सब मिलाकर अर्घ्य चढ़ाया जाता है। क्षुल्लकों कोे इनके यहाँ भी श्वेत वस्त्र देते हैं, अन्तर यही है कि ये जनेऊ नहीं देते हैं। क्षुल्लक-क्षुल्लिकाओं के आहार के समय पाद प्रक्षालन एवं अर्घ्य की परम्परा इनके यहाँ नहीं है। ये साधुवर्ग बिना जनेऊ वालों से भी आहार ले लेते हैं।

इन्हीं की परम्परा में आचार्य श्री निर्मलसागर जी के शिष्य मुनिश्री शांतिसागर जी (अलवर वाले) हैं। ये भी आचार्य कहलाते हैं। कुछ वर्षों से ये कानजी पंथ के समर्थक हो गये हैं और इन्होंने एक क्षुल्लक कुलभूषण तथा एक मुनि चंद्रसागर जी को दीक्षा दी है। ये भी कानजी पंथ का समर्थन करने लगे हैं जबकि उन पंथ वालों ने आज तक भी इन्हें नवधाभक्तिपूर्वक आहार नहीं दिया है।

आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के अनन्तर उपाध्याय श्री विद्यानंद जी और श्री बाहुबली मुनिजी आचार्य बने हैं। पहले श्री विद्यानंद मुनिश्री ने ‘दिगम्बर जैन साहित्य में विकार’ नाम से कानजी पंथ के साहित्य के विरोध में अच्छी पुस्तक लिखी थी। इन आचार्य देशभूषण जी की परम्परा में भी क्षुल्लकों को गेरुवे वस्त्र देते हैं तथा आहार के लिए कटोरा एक पात्र देते हैं।

आचार्यश्री वीरसागर जी के प्रथम शिष्य आचार्य श्री शिवसागर जी से श्री ज्ञानसागर जी ने मुनि दीक्षा ली थी। आज उनके शिष्य आचार्य श्री विद्यासागर जी प्रसिद्ध हैं। मुनिश्री ज्ञानसागर जी ने भी अपने क्षुल्लकों को श्वेतवस्त्र दिये थे और जनेऊ नहीं दी थी। उसी परम्परा के अनुसार आचार्य विद्यासागर जी भी क्षुल्लक-ऐलक को श्वेतवस्त्र देते हैं। अभी दो वर्ष पूर्व इन्होंने आर्यिका दीक्षायें दी हैं। उनके यहाँ यह बिल्कुल नई बात हुई है कि आर्यिकाओं के आहार के समय पाद-प्रक्षालन, पूजा एवं अर्घ्य की परम्परा ही नहीं है। क्षुल्लकों को भी अर्घ्य नहीं चढ़ाया जाता है।

आर्यिकाओं की नवधाभक्ति नहीं कराना, वर्तमान में सभी पुराने संघों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। जबकि मूलाचार आदि ग्रंथों के अनुसार आर्यिकाओं की चर्या मुनिवत् मानी गई है। दीक्षाविधि भी उनकी मुनि की दीक्षा विधि से ही की जाती है। प्रायश्चित्त ग्रंथ के अनुसार मुनि और आर्यिकाओं का प्रायश्चित्त भी समान है। क्षुल्लक-क्षुल्लिकाओं का उनसे आधा है इत्यादि।

इनके संघ के ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों में पूजा पद्धति में तेरहपंथ की ही परम्परा देखी जाती है। इस प्रकार वर्तमान के १००-१५० वर्षों के मुनिसंघों में जो मोटा-मोटी भेद देखने में आया है, मैंने उसे अति संक्षिप्त में यहाँ लिया है। विशेष जिज्ञासुओं को संघों में रहकर ही समझना चाहिए।

मुनिश्री कल्याणसागर जी, आचार्य सन्मति सागर जी (तेरहपंथी) के शिष्य हैं। इनकी परम्परा में भी क्षुल्लक श्वेतवस्त्र वाले हैं। ये सज्जाति को कुछ नहीं गिनते हैं। शास्त्रों में अस्पृश्य चांडाल आदि लोग, रजस्वला स्त्री, मांस अंडे, हड्डी, विष्ठा आदि का स्पर्श हो जाने से दंड स्नान की आज्ञा है किन्तु ये सभी के मस्तक पर पीछी रख देते हैं और सभी जाति के लोग इनके चरण छू लेते हैं। इस विषय पर सभी दिगम्बर जैन साधु वर्ग के साथ इनका मतभेद है। सुनने में आया है कि इनके दीक्षा गुरु भी इस बारे में सहमत नहीं थे। वर्तमान में ये णमोकार मंत्र के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं।

मेरठ से विहार-

फाल्गुन वदी ५, दिनाँक १४ फरवरी को मैंने संघ सहित कमलानगर से मध्यान्ह दो बजे विहार कर दिया और प्रेमपुरी में अमरचंद जैन होमब्रेड की कोठी पर आ गई। अमरचंद जी ने यहाँ कोठी पर शांति विधान का आयोजन किया हुआ था अतः मैंने आकर विधान में आशीर्वाद दिया। रात्रि विश्राम करके प्रातः आहार के बाद यहाँ से भी विहार कर दिया और तोपखाना आ गई। यहाँ निर्मल कुमार जैन की कोठी पर ठहरी। जब से मैंने मोदीनगर से विहार किया था, तब से लेकर यहाँ तक, श्री अमरचंद व अरविन्द जैन ने फैक्ट्री के सब काम छोड़ दिये थे। दिन भर संघ की भक्ति में, आहारदान आदि में अपना समय लगा रहे थे। प्रेमचंद जैन भी विधान व गुरुभक्ति में लगे हुए थे। प्रातः यहाँ मंदिर में प्रवचन किया। यहाँ श्री अशोक कुमार जैन ने त्रिलोकसार आदि ग्रंथ के आधार से बनाये गये कई एक चित्र और चार्ट दिखाये, मन प्रसन्न हुआ। मैंने इन्हें अष्टमूलगुण का चित्र यहाँ महोत्सव में लाने के लिए और इन बने हुए चित्रों को भी लाने के लिए प्रेरणा दी।

यहाँ रात्रि में कर्नाटक के एक श्रावक, जो कि अमेरिका में रहते हैं, ये साहू प्रमोद कुमार के साथ आये, इन्होंने क्षुल्लक जी से विदेश में जैनधर्म प्रचार के लिए खूब चर्चायें कीं। यहाँ से १६ तारीख को विहारकर श्री अरुण जैन मेयर की भावना से मैं इलेक्ट्रा विद्यापीठ पहुँची, वहाँ बच्चों को कुछ धर्मोपदेश सुनाकर शुभाशीर्वाद दिया। मेयर जी ने मुझे विद्यार्थियों के अध्ययन कक्ष आदि सुविधापूर्ण स्थल व मनोरंजन स्थल भी दिखाये। तत्पश्चात् यहाँ से विहार कर मैं संघ सहित इलेक्ट्रा नर्सरी में आ गई। यहाँ रात्रि विश्राम हुआ, प्रातः आहार के बाद यहाँ से भी विहार कर छोटे मवाना में बी.टी.सी. कन्या कालेज में ठहरी। प्रातः आहार के बाद यहाँ से भी विहार कर दिया व १८ फरवरी को बड़े मवाना आ गई। यहाँ वर्षा खूब हुई थी किन्तु कुछ देर वर्षा रुकते ही हम लोगों ने विहार कर दिया था जबकि खूब ठंड पड़ रही थी।

मवाना में विधान-

यहाँ मवाना में २० फरवरी को लखमीचंद जैन ने संघ के चैत्यालय को घर में ले जाकर अपने घर शांतिविधान किया। श्रीपाल जैन ने भी पंचपरमेष्ठी विधान किया। भगवान को विराजमान करने से साधु भी इनके यहाँ पहुँचे और इन लोगों को मंगल आशीर्वाद दिया। २१ फरवरी को जयभगवान जैन ने अपने घर पर शांति विधान किया और गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त किया। यहाँ से २१ फरवरी को विहार कर हम लोग हस्तिनापुर टाउन में राकेश जैन, मवाना वालों की कोठी पर ठहर गये।

हस्तिनापुर जंबूद्वीप स्थल पर मंगल प्रवेश-

प्रातः अभिषेक देखकर ९ बजे के बाद यहाँ से विहार कर दिया। जंबूद्वीप के अध्यक्ष महोदय रवीन्द्र कुमार जैन व मेरठ से आये अमरचंद जैन, अरविन्द जैन, प्रेमचंद जैन आदि ने स्वागत किया तथा बैंड बाजे व जुलूस के साथ वहाँ से विहार कराया। बड़े मंदिर के गुरुकुल के सभी बच्चे भी साथ-साथ चल रहे थे। मार्ग में श्री अनन्तवीर के घर पर स्थित चैत्यालय के दर्शन किये। वहाँ उन्होंने दूध से मेरे पादप्रक्षालन कर आरती की। बच्चों को नाश्ता कराया।

वहाँ से चलकर हम सभी बड़े मंदिर का दर्शन करके ११ बजे के बाद जंबूद्वीप स्थल पर आ गये। यहाँ गेट पर स्वागत, आरती के बाद अंदर प्रवेश कर हम लोगों ने कल्पवृक्ष भगवान महावीर स्वामी के दर्शन किये पुनः त्रिमूर्ति मंदिर में आकर दर्शन करके दो मिनट श्रावकों को मंगल आशीर्वाद दिया, बाद में आहार के लिए उठ गई।

इस प्रकार मेरा यह कार्तिक सुदी १ से लेकर फाल्गुन सुदी १२ तक का प्रवास मंगलमयी रहा है। यहां से निकलने के बाद से सर्वत्र स्थानों पर हस्तिनापुर से आने-जाने वाले अनेक यात्रियों ने आ-आकर दर्शन किये हैं और उपदेश भी सुने हैं। सर्वत्र जहाँ-जहाँ पहुँचना हुआ है, लोगों ने भक्ति करके, उपदेश सुनकर व व्रत, मंत्र आदि ग्रहण कर संघ से लाभ लिया है। यहाँ से विहार में मेरे साथ आर्यिका चंदनामती जी, पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर जी व क्षुल्लिका श्रद्धामती जी रही हैं तथा ब्र. कमलेश कुमार, ब्र. कु. आस्था व ब्र. कु. बीना भी संघ में थीं। ये सभी साधु सकुशल यहाँ आकर जंबूद्वीप के दर्शन कर प्रसन्न हुए। सर्वत्र बड़ौत, मेरठ आदि में मेरे संघ को रोकने के लिए लोगों ने बहुत प्रयास किये थे किन्तु यहाँ वैशाख में महामहोत्सव होने वाला है इसलिए ब्र. रवीन्द्र कुमार आदि के विशेष आग्रह से हमें वापस जंबूद्वीप स्थल पर आना हुआ है अन्यथा वह चातुर्मास कहीं भी हो सकता था।